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Saturday, September 12, 2020

कवरेज से कठघरे में न्यूज चैनल


लगभग चार साल बाद नोएडा के फिल्म सिटी गया। ये वही इलाका है जहां ज्यादातर न्यूज चैनलों के कार्यालय हैं। कोरोना की वजह से फिल्म सिटी में रौनक थोड़ी कम थी। न्यूज चैनल में कार्यरत एक मित्र से कुछ काम के सिलसिले में मिलने गया था। कोरोना की वजह से दफ्तर में बाहरियों के प्रवेश की मनाही थी। इस वजह से हमलोग फिल्म सिटी स्थित एक चाय की दुकान पर बैठकर बातें कर रहे थे। इतने में तीन पुराने सहयोगी चाय पीने उसी दुकान पर आ गए। ये सब अलग अलग चैनलों में काम करते हैं लेकिन चाय साथ ही पीते थे। वहीं खड़े खड़े बातें होने लगीं। मुझे ध्यान नहीं था कि वो दिन गुरूवार था और उसी दिन चैनलों की टीआरपी आती है। टीआरपी रेटिंग पर बातें होने लगी। न्यूज चैनल में लंबे समय तक काम करने की वजह से टीआरपी रेटिंग वाले दिन की अहमियत का पता था। उस दिन होनेवाली बातें भी वही थीं जो चार पांच साल पहले हुआ करती थी। लिहाजा मुझे लगा कि थोड़ी देर में ये बातें खत्म भी हो जाएगी लेकिन मेरे एक मित्र ने दूसरे को रेटिंग को लेकर छेड़ दिया। रिया,सुशांत, कंगना से लेकर चीन और कोरिया के घटनाक्रम केंद्र में आने लगे थे। तबतक मुझे लग रहा था कि हल्की फुल्की बातें हो रही हैं थोड़ी देर में हंसी मजाक करके खत्म हो जाएगी। सब इस वक्त अलग अलग न्यूज चैनलों में काम जरूर कर रहे थे लेकिन एक समय में सभी एक ही न्यूज चैनल का हिस्सा होते थे, गहरे मित्र भी थे। 

जिस मित्र ने दूसरे मित्र को रेटिंग कम होने को लेकर छेड़ा था उसने एक और बात कह दी जिसको लेकर बात बढ़ गई। उसने कह दिया कि ये पुराना फॉर्मूला है कि जो चैनल अपनी स्टोरी को लेकर जितना गिरेगा उसकी टीआरपी उतनी ही बढ़ेगी। ये जुमला सालों से फिल्म सिटी में गूंजता रहा था लेकिन मजाक में। पहले वाले मित्र ने कहा कि यार तुम ज्यादा ज्ञान मत दो। हमें मालूम है कि चैनलों ने टीआरपी के लिए क्या क्या नहीं किया। आज जब तुम्हारे चैनल की टीआरपी कम हो गई है तो तुम स्टोरी का वर्गीकरण करने लगे। जिस चैनल में इन दिनों तुम काम कर रहे हो न उस चैनल को आसमान में साईं बाबा की आंख दिखाई दी थी और घंटों तक वो विजुअल चलता रहा था। जरा याद कर लो । 

हम तीन लोग चुपचाप खड़े होकर उन दोनों की बातें सुन रहे थे। दोनों की बातों में तल्खी बढ़ने लगी थी। बीच बचाव करने की गरज से हम तीन में से एक बोल पडा कि अरे जाने दो भाई, सभी चैनलों ने कभी न कभी, कुछ न कुछ ऐसा चलाया है जो न्यूज चैनल पर नहीं चलना चाहिए था। इतना सुनना था कि आपस में झगड़ रहा हमारा एक साथी उसके उपर ही बिफर गया। कहने लगा कि तुम भी इसके साथ हो गए और ज्ञान देने लगे। वो दिन भूल गए जब तुमने स्वर्ग में सीढ़ी लगाई थी। वो दिन भूल गए जब ‘एरिया 51’ और ‘बारमूडा ट्राइंगल’ जैसे टीआरपी बटोरनेवाले कार्यक्रम लिखा करते थे। बड़े शौक और अकड़ से कॉलर ऊंचा करके उस दौर में घूमा करते थे कि इस हफ्ते नौ बजे की हमारी टीआरपी सबसे अधिक रही। शांति से अपनी बात कह रहा हमारा वो मित्र अपने ऊपर हुए व्यक्तिगत हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाया। अब पलटवार करने की बारी उसकी थी। बोला तुम क्या कम हो, आज जहां काम कर रहे हो उस चैनल को देख लोग सबसे पहले तो तुम्हीं लोगों ने ये काम शुरू किया था। प्रिंस जब गड्ढे में गिरा था तो किसने गानेवालों को स्टूडियो में बुलाकर गाना गवाया था। किसने स्टूडियो में हवन और पूजन करवाया था। क्या न्यूज चैनल में ये सब बातें उचित थीं। जिस दिन प्रिंस गड्ढे में गिरा था, दरअसल उस दिन ही न्यूज भी गड्ढ़े में गिरा था। 

हमारा चौथा मित्र जो शांति से सारी बातें सुन रहा था, वो जरा वामपंथी मिजाज का था। बहस बढ़ने लगी तो उसने भी सोचा कि वो क्यों पीछे रहे। उसने कहा कि देखिए दरअसल हमको पूरी गंभीरता से और समग्रता में न्यूज चैनलों की इस समस्या का विश्लेषण करना चाहिए। हमें इस बात को भी रेखांकित करना चाहिए कि कब से न्यूज चैनलों पर खबरों से अलग हटकर कटेंट देने की शुरुआत हुई। वो कौन सी सामाजिक-राजनीति-आर्थिक परिस्थितियां थीं जिनमें उस दौर में चैनलों को इस तरह की चीजें दिखाने को मजबूर किया था। अब तीनों मिलकर उसपर टूट पड़े। ज्यादा समग्रता-वमग्रता की बातें मत करो, जरा सोचो कि न्यूज चैनलों पर आत्मा से बातें करवानेवाले कार्यक्रम क्यों चले थे। एक मुस्लिम महिला के पति के गायब होने के बाद जब उसकी शादी किसी और से हो गई थी और उसके बाद जब उसका पहला पति लौट आया था तो इस घटना का तमाशा क्यों बना था। क्यों सरेआम कैमरे के आगे पंचायत लगावकर निजी रिश्तों को तार तार किया गया था। जब न्यूज चैनलों पर मंदिर का रहस्य से लेकर बिना ड्राइवर की कार और नागिन का इंतकाम चलता था तब तो तुम खामोश रहते थे। अब सैद्धांतिक बातें कर रहे हो। अब सभी एक साथ बोलने लगे थे और मैं सोच रहा था कि यार गलत दिन अपने मित्रों से मिलने आ गया। 

बहस लंबी चलती देख नंदू ने दूसरी बार चाय भेज दी। सबने चाय ली तो मुझे लगा कि अब बात खत्म हो जाएगी, लेकिन उस मित्र ने फिर से बात छेड़ दी जिसके चैनल की टीआरपी इन दिनों बढ़ी हुई थी। उसने वामपंथी मित्र पर तंज कसा कि देखो यहां कोई दूध का धुला नहीं है, तुम्हारे जो आदर्श हैं न उनके चैनल ने ही सबसे पहले एंकरिंग का मजाक बनवाया। बंटी और बबली फिल्म रिलीज होनेवाली थी या हुई थी तो अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी से एंकरिंग करवाई थी। तब से ही एंकरिंग का तमाशा बनना शुरू हुआ। अब भड़कने की बारी वामपंथी मित्र की थी, वो तो शुरू हो गया और लगा नाम लेकर सबकी बखिया उधेड़ने। उस दौर के संपादकों को बुरा भला कहने। उसकी आवाज भी ऊंची होने लगी थी। बात बिगड़ती देख मैंने कहा कि अब हम सबको चलना चाहिए। एक ने कहा भड़ास सुनते जाओ। वामपंथी मित्र अपेक्षाकृत जल्दी शांत हो गए। सभी इस पर सहमत दिखे कि टीवी न्यूज चैनलों के आरंभिक दिनों में गलतियां हुईं। एक ने तो कह भी दिया कि ‘जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय’। अब मेरे चारों मित्र उन पुराने न्यूज चैनल संपादकों के ज्ञान देने से झुब्ध दिखे जिनके कार्यकाल में खबरों के नाम पर तमाशा हुआ करता था। एक मित्र ने कहा कि क्या ही अच्छा होता कि नैतिकता आदि के प्रश्न उठानेवाले उस दौर के संपादक पहले ये मानते कि उन्होंने गलतियां की थीं। कहते कि न्यूज चैनल अपने शैशवावस्था में थे, गलतियां हुईं। अब तो न्यूज चैनलों की आय़ु बीस साल से अधिक हो गई है, अब जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। ऐसा होता तो पुराने संपादकों के उपदेश में वजन भी आता अन्यथा ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली बात लगती है। मैंने अपने मित्रों से विदा ली। लौटते समय बहुत देर तक सोचता रहा कि इसका क्या हल है? कब कोई खड़ा होगा और कहेगा कि खबरों को खबर की तरह चलाएं और उसकी सुनी भी जाएगी। उत्तर नहीं मिल पाया। 

Thursday, April 6, 2017

साख बचाने की चुनौती

एक मंत्री का सेक्स चैट, जिसमें मादक बातें हो रही हों किसी भी टीवी चैनल के लॉंच के दिन के लिए अच्छी स्टोरी मानी जा सकती है । ना सिर्फ अच्छी स्टोरी बल्कि ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक अपनी पहुंच बनाने का एक उपक्रम भी, बशर्ते कि जो ऑडियो क्लिप एयर किया जाए वो प्रामाणिक हो और दोनों पक्षों की बातें समझ में आ रही हों । लेकिन केरल के एक टीवी चैनल मंगलम टीवी ने अपने लॉंच के दिन के लिए एक ऐसा प्रपंच रचा जिससे पूरी पत्रकारिता शर्मसार हो गई । केरल का रीजनल चैनल मंगलम टीवी ने अपने लॉंच वाले दिन अपने पहले न्यूज बुलेटिन में दो ऑडियो क्लिप चलाना शुरू किया जिसमें एक शख्स कामुक बातें कर रहा था । चैनल का दावा था कि उस ऑडियो क्लिप में आवाज केरल के परिवहन मंत्री ए के शशिन्द्रन की है । कथित सेक्स चैट के एयर होते ही केरल की राजनीति में भूचाल आ गया और पिनयारी विजयन सरकार की आलोचना शुरू हो गई । कामुक बातों वाली इस ऑडियो क्लिप में सिर्फ मर्द की ही आवाज सुनाई जा रही थी और बार बार ये दावा किया जा रहा था कि मंत्री ए के शशिन्द्रन एक महिला से बात कर रहे हैं जो उनसे किसी शिकायत के सिलसिले में मिली थी । इस ऑडियो क्लिप के एयर होने के चंद घंटों के अंदर ही परिवहन मंत्री ए के शशिन्द्रन ने पद से इस्तीफा दे दिया ।
ए के शशिन्द्रन के इस्तीफे से बात खत्म नहीं हुई । अब उस ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े होने लगे थे क्योंकि उसको ध्यान से सुनने के बाद यह प्रतीत हो रहा था ऑडियो क्लिप की जबरदस्त एडिटिंग की गई है । सरकार ने भी आनन फानन में इल पूरे मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया और एसआईटी को भी पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए । तबतक ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता और मंत्री ए के शशिन्द्रन जिस महिला से बात कर रहे थे उसकी आवाज नहीं सुनाने को लेकर चैनल की चौतरफा आलोचना भी शुरू हो गई थी । चौतरफा घिरता देख चैनल के सीईओ सामने आए और उन्होंने बगैर शर्त माफी मांगी और बताया कि मंत्री एक स्टिंग ऑपरेशन के शिकार हो गए थे और उनके चैनल की एक महिला पत्रकार ने ही मंत्री से बात की थी । मतलब कि महिला पत्रकार हनी ट्रैप की टूल बनीं । सार्वजनिक माफी के बाद भी यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है क्योंकि दो ऑडियो क्लिप ने एक मंत्री के सार्वजनिक जीवन पर दाग लगा दिया, इनको मानसिक प्रताड़ना झेलने को मजबूर किया गया, उनका इस्तीफा हो गया आदि आदि । चैनल की माफी के बावजूद एसआईटी ने चैनल के सीईओ समेत नौ कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज कर सीईओ और चार अन्य को गिरफ्तार कर लिया है । जांच चलेगी, संभव है सजा भी हो जाए, चैनल पर केबल एंड टेलीविजन एक्ट के तहत कार्रवाई भी हो लेकिन पत्रकारिता के पवित्र पेशे पर जो दाग लगा है वो आसानी से मिटने वाला नहीं है । केरल की पत्रकार और बौद्धिक बिरादरी इस घटना से सन्न है । लेखकों ने एक बयान जारी कर इसकी निंदा की है वहीं पत्रकारों के संगठन ने दफ्तर के बाहर जाकर प्रदर्शन किया ।
दरअसल अगर हम देखें तो खासकर हिंदी टीवी में जब से नादान संपादकों की एक फौज आई है तो इस तरह की घटनाएं ज्यादा होने लगी हैं । पहले जो संपादक होते थे उनको पत्रकारिता की परंपरा के साथ साथ अपनी जिम्मेदारी का एहसास भी होता था । इस दौर के ज्यादातर टीवी के संपादकों को पत्रकारिता के मानदंडों से कुछ लेना देना ही नहीं है, पत्रकारिता की साख को लेकर कोई चिंता नहीं । उनको बस चिंता रहती है कि कुछ भी चलाकर रेटिंग आ जाए । इस दौर में खासकर हिंदी चौनलों में चंद ही टीवी संपादक बचे हैं जो इन दंद फंद से दूर रहते हैं । कई संपादकों को तो लगता है कि वो खबर बना भी सकते हैं । मंगलम टीवी की घटना खबर बनाने की इसी तरह की नादानी का एक शर्मनाक नमूना है । पूर्व में भी खबर बनाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें कार्रवाई भी हुई लेकिन सवाल तो वही है कि खबरों को बनाने की प्रवृत्ति क्यों ? टीवी में जिस तरह से युवाओं को लेकर संपादकों की रट सामने आती है वह अच्छी बात है लेकिन उनको अनुभव पर भी ध्यान देना चाहिए । मंगलम टीवी जैसी घटना को सिर्फ अनुभवी पत्रकार ही रोक सकता है या कम से कम सचेत कर सकता है ।  

भूत-प्रेत, नाच-गाना, मंदिर का रहस्य, पेड़ से टपकती श्रद्धा, जैसे विषयों को लेकर न्यूज चैनलों पर जिस तरह से घंटों तक प्रोग्रामिंग की जाती है उसमें संपादकों की मौन या मुखर सहमति तो रहती ही है बाजार का भी परोक्ष या प्रत्यक्ष दबाव रहता है । एक अनुमान के मुताबिक टीवी पर सालभर में करीब तीस हजार करोड़ के विज्ञापन आते हैं । इन विज्ञापनों का आधार अमूमन टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट ( टीआरपी ) ही रहता है । अब जब विज्ञापन का आधार ही टीआरपी है तो इसको हासिल करने का दबाव तो रहेगा ही । अनुभवी संपादक इस तरह के दबाव को झेल जाते हैं और रेटिंग हासिल करने का प्रामाणिक रास्ता तलाशते हैं लेकिन नादान संपादक तुरत फुरत रेटिंग के चक्कर में गलती कर बैठते हैं, कई बार तो अपने अनुभवी साथियों की सलाह को दरकिनार करके भी । मंगलम टीवी जैसी घटनाएं ना हों इसके लिए एडिटर्स गिल्ड, ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन और न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन जैसी संस्थाओं को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है । साख पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है और जिस तरह से खबरों को बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, उससे साख छीजती है, वो बेहद चिंता की बात है । 

Wednesday, May 14, 2014

सर्वे की कसौटी पर खबरिया चैनल

लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण की वोटिंग खत्म होने के साथ ही देशभर के तमाम खबरिया चैनलों पर एक्जिट पोल या पोस्ट पोल के नतीजे आने शुरू हो गए । अलग अलग चैनल तो अलग अलग सर्वे करनेवाली एजेंसियां और अलग अलग नतीजे । हर चैनल अपने अपने विषेशज्ञों की राय से इस या उस गठबंधन को चुनाव बाद मिलनेवाली संभावित सीटों का एलान कर चुका है । अमूनन हर चैनल भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन को बहमुत देता नजर आ रहा है । अपवाद के तौर पर एक न्यूज चैनल है जो एनडीए को तकरीबन ढाई सौ सीट दे रहा है । लेकिन इसके उलट एक और चैनल एनडीए को साढे तीन सौ सीटें देने पर तुला हुआ है । तुर्रा यह कि हर चैनल अपने सर्वे के सबसे सटीक और सबसे विश्वसनीय होने का दावा भी करता चल रहा है । लगता है कि न्यूज चैनल यह मानकर बैठे हैं कि जनमानस की स्मृति कमजोर होती है और उसे दो हजार चार और दो हजार नौ के सर्वे याद नहीं हैं । लिहाजा सटीक और विश्वसनीय का डंका पीटने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है । उन्हें यह भी याद नहीं है पिछले दो लोकसभा चुनाव के दौरान तमाम एक्जिट पोल के नतीजे धरे रह हए थे । दो हजार चार के लोकसभा चुनाव के दौरान देश में फील गुड का वातावरण तैयार किया गया था । ऐसा माहौल था कि देश उन्नति के पथ पर तेजी से दौड़ रहा है और देश की इस तीव्र उन्नति का फायदा जनता को हो रहा है । अर्थवय्वस्था भी दहाई के आंकड़ें को छूने को बेताव दिख रही थी । इन तीव्रताओं और बेताबियों का भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने भी फायदा उठाना तय किया, लिहाजा तय समय से पहले लोकसभा चुनाव का एलान कर दिया गया । फील गुड फैक्टर और शाइनिंग इंडिया की पृष्ठभूमि में देश में चुनाव होने लगे । एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी जैसा तपा तपाया नेता, जिसके ओजस्वी भाषण की जनता दीवानी थी । लोग घंटों तक उनके भाषणों का इंतजार करते थे । दूसरी तरफ उन्नीस सौ छियानवे के बाद देश की सत्ता से बाहर कांग्रेस । वही कांग्रेस जिसके बारे में नब्बे के दशक के अंत में राजनितिक पंडितों ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि उसका अंत हो गया है । वही कांग्रेस जिसने सीताराम केसरी के पार्टी अध्यक्ष रहते विभाजन और नेताओं का पलायन दोनों झेला था। बाद में सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी अपने आपको मजबूत करने की कोशिश कर रही थी । उस वक्त कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार हो चुकी थी । वाजपेयी जी बनाम सोनिया गांधी के इस जंग में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का पलड़ा भारी दिख रहा था । दो हजार चार के चुनाव के बाद न्यूज चैनलों से सर्वे दिखाने शुरू कर दिए थे । कमोबेश सभी सर्वे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में वापसी करता दिख रहा था । न्यूज चैनलों और अखबारों के सर्वे में एनडीए को दो सौ नब्बे तक सीटें दी गई थी । कुछ चैनलों ने थोड़ी सावधानी बरतते हुए ढाई सौ सीटें दी थी लेकिन इससे कम कोई भी नहीं गया था । इन्ही न्यूज चैनलों और अखबारों ने कांग्रेस को सहयोगियों के साथ एक सौ उनहत्तर से लेकर दो सौ पांच सीटें दी थी । दो हजार चार में जब मतगणना शुरू हुआ था तो ट्रेड मिल पर दौड़ते हुए स्वर्गीय प्रमोद महाजन का फुटेज और वहीं से दिया गया इंटरव्यू लोगों का अब भी याद है । उन्होंने सुबह सुबह सुबह दावा किया था कि एनडीए की सत्ता में वापसी हो रही है । उनके अति आत्मविश्वास का कारण पिछले दो तीन दिनों से दिखाए जा रहे एक्जिट पोल के नतीजे थे । लेकिन जैसे जैसे दिन चढ़ता गया तस्वीर बदलती चली गई और एनडीए एक सौ नवासी और कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ दो सौ बाइस के आंकड़े तक पहुंच गया । तमाम एक्जिट पोल के नतीजे धरे के धरे रह गए । सभी सर्वे और भविष्यवाणी बेमानी साबित हुए थे । तकरीबन यही हाल दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के नतीजों के वक्त हुआ था । तमाम खबरिया चैनल और अखबारों ने दोनों गठबंधन को लगभग बराबर-बराबर सीटें मिलने का अनुमान लगाते हुए सर्व दिखाए थे । यह अवश्य था कि सभी सर्वे में यूपीए को ज्यादा सीटें दी गई थी । लेकिन तब भी नतीजे तो गलत ही साबित हुए थे । एनडीए की सीटें एक सौ उनसठतक सिमट गई तो यूपीए दो सौ बासठ तक जा पहुंची । यहां एरक बार फिर से इन सर्वे और एक्जिट पोल के नतीजों पर सवाल खड़े हुए थे ।  
इस बार के लोकसभा चुनाव खत्म होने और वोटों की गिनती के बीच तमाम न्यूज चैनलों पर आए इन सर्वे को देखने के बाद यह लगता है कि पूरे देश में बीजेपी या ज्यादा सटीक तरीके से कहें तो नरेन्द्र मोदी की लहर है । इन खबरिया चैनलों के सर्वे के मुताबिक मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी एक बार फिर रायसीना हिल पर कब्जा जमाने जा रही है वहीं दस साल तक रायसीना हिल्स पर राज करनेवाली कांग्रेस आजादी के बाद के सबसे बुरे दौर से गुजरती दिख रही है । इन चुनाव बाद सर्वे के नतीजों से तो यही लगता है कि कांग्रेस इस चुनाव में अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन करने जा रही है । इन सर्वे में एक और बात जो रेखांकित करने योग्य है वह यह कि अलग अलग चैनलों पर इस सर्वे का सैंपल साइज अलग अलग है । अबतक दिखाए गए सभी सर्वे में सैंपल साइज बहुत ज्यादा बड़ा नहीं है । सैंपल साइज का आकार उतना महत्व नहीं रखता है लेकिन इसमें सबसे जरूरी यह होता है कि उसमें किन लोगों की नुमाइंदगी है । भारत में जब भी चुनाव होता है तो उसमें जाति और धर्म की अहम भूमिका होती है । इसलिए अगर सैंपल साइज में इस फैक्टर को नजरअंदाज कर दिया जाता है तो उसके गलत होने का खतरा बढ़ जाता है । इसी तरह से अगर सैंपल साइज बीस बाइस हजार का भी है और उसमें ग्रामीण और शहरी वोटरों का अनुपात गड़बड़ाता है तो नतीजों पर असर पड़ता है ।
भारत में चुनावी सर्वेक्षण बहुत पुरानी अवधारणा नहीं है । पश्चिम में यह अवधारणा बहुत पुरानी है और वहां इस वजह से सटीक होती है कि आबादी कम है और जाति धर्म संप्रदाय का ज्यादा झोल नहीं है ।  कई देशों में तो दो दलीय व्यवस्था होने से भी सर्वे के गलत होने के चांस कम होते हैं । भारत में यह अवधारणा साठ के दशक में आई जब उन्नीस सौ साठ के चुनाव में पहली बार दिल्ली की एक संस्था मे सर्वे किए थे । लेकिन इक्कीसवीं सदी के एन पहले जब भारत का आकाश प्राइवेट न्यूज चैनलों के लिए खुला तो फिर इस तरह के सर्वे की मांग बढ़ गई । हाल के दिनों में जिस तरह से न्यूज चैनलों की बाढ़ आ गई उसके बाद तो चुनाव के दौरान सर्वे की भी सुनामी आ गई । कई छोटी बड़ी एजेंसियां सर्वे के इस मैदान में उतर गई । जब मांग बढ़ी को सर्वे में एक तरह का खेल भी शुरू हुआ । हाल ही में सरवे करनेवाली एक एजेंसी के कुछ लोग कैमरे पर इस खेल को स्वीकारते नजर आए थे । कई ऐसी एजेंसियां भी मैदान में आ गई हैं जो अपना सर्वे मुफ्त में न्यूज चैनलों के मुहैया करवाती हैं और उनकी एकमात्र शर्त होती है कि उनके नतीजों को बगैर किसी फेरबदल के प्रसारित किया जाए । अब इसके पीछे का मोटिव तो साफ तौर पर समझा जा सकता है । इस बार के चुनाव नतीजों में कांग्रेस, बीजेपी और अन्य दलों के साथ साथ मीडिया की साख का भी फैसला होना है । राजनीतिक दलों के भविष्य के साथ साथ मीडिया के भविष्य का फैसला भी होगा ।

Thursday, December 4, 2008

बुड्डों ने किया बेड़ागर्क- अनुपम श्रीवास्तव

सचिन जब भी फ्लॉप होते हैं तो यही आवाज़ एडिटोरियल मीटिंगों में गूंजती है कि 'बाहर करो बूढ़ों को' मगर सचिन कभी न कभी मौका देखकर अपने खेल से सभी को चुप कर देते हैं। मैं उन पत्रकारों की बात नहीं कर रहा हूं जो सिर्फ़ इसको भगवान जाग उठा या भगवान सो गया से ज्यादा नहीं समझते। चूंकि सारे संपादकों की रुचि क्रिकेट में है तो क्रिकेट का गुरु बनने की हर कोई कोशिश करता है या फिर दिखने की।
जब मैंने पत्रकारिता का ये प्रोफेशन ज्वाइन ही किया था तब किसी ने कहा था कि सीख जाओगे वक्त के साथ और ये भी जोड़ दिया की तुम अभी बच्चे हो। 'अच्छे-अच्छे गधे घोड़े बन गए इस प्रोफेशन में।' चाहे वो नेता, क्षेत्र या अपने बाप के दम पर आए हों।
कुम्बले और गांगुली रिटायर हो गए और बाकी सभी बूढ़ों का यही हाल होना है मगर जाने क्यों सचिन की बात अलग है। ये खिलाड़ी सारी दुनिया से टक्कर लेता है। शायद भारत का राइस ग्राफ भी ऐसा है जैसा सचिन का रहा। पिछले 19 सालों में जैसा कि लोग अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन की भूमिका में देखते थे। तब शायद भारत का भी लुकआउट वैसा ही था जैसा अमिताभ बच्चन की भूमिका रहती थी एंग्री यंग मैन में, जो शायद समाज से दुखी रहता था और उसका फ्रस्ट्रेशन परदे पर दिखता था।
मैंने सचिन के साथ जिया है क्योंकि जब से मैंने होश संभाला सचिन ही देखा। मुझे हमेशा से लगता है कि सचिन हम लोगों के मोटिवेटर हैं और 'सिंबल ऑफ़ होप' हमेशा रहे हैं। कहीं न कहीं मुझे मेरे पूरे स्ट्रगल पीरियड में जाने क्यों सचिन हमेशा याद रहते हैं।
चलो ये तो रहा हाल खेल का। देश-विदेश में जो घटनाएं हो रही हैं उससे हम पत्रकारों पर भारी संकट है। चुनाव का वक्त करीब है... तो आप किस आइडियोलॉजी से जुड़े पत्रकार हैं ये प्रश्न हमेशा आपसे जाने अंजाने पूछा जाता है मगर क्या जवाब है आपके पास। क्या आप संघी हैं या फिर वामपंथी या फिर बताएं कि leftist, rightist, centrist, capitalist हैं। हैं क्या आप। पत्रकार क्या कहे, साहब मैं तो पेट भरने आया हूं प्रोफेशनल हूं। मेरा इंटरेस्ट था इसलिए आया। 'आई एम हेयर बाई चॉइस नोट बाइ डीफॉल्ट ओर बाई चांस'... चल डॉयलाग मत मार। मुझे तो वही याद आता है जो मेरे रिश्तेदारों ने कहा था - जो कुछ नहीं कर पाता जिन्दगी में वही पत्रकार बनता है।
अब जमाना चाहे जो हो गया हो लाखों रुपये में मॉस कम्युनिकेशन की डिग्री मिलती हो या लाखों रुपये की नौकरी है और फिर वही मानसिक डाउनमार्केट सॉरी खांटी पत्रकारों के बीच की जिंदगी। मेरे पास नौकरी मांगने आए एक इन्टर्न ने कहा- सर मेरे पापा ने लाखों रुपये खर्चे कर ये कोर्स कराया है बस मुझे नौकरी दे दीजिए बाकी मैं कर लूंगा, नौकरी बची रहने का भी जुगाड़ देख लूंगा। बाकी मैं सीख लूंगा। मुझे बॉस, नौकरी दे दीजिये।
मैं जब मुंबई में था तो कई नए पत्रकार कहते थे कि जर्नलिस्ट "Is always ahead of times "। "master of all traits"- शायद वो अंग्रेजी के पत्रकार थे इसलिए कहते थे। मीडिया समाज का आईना होता है या फिर में पूछता हूं ' मीडिया में बीते लोग समाज का'... सही कहा बीड़ू
मैं भी कहां फंस गया, ज्ञान की बातों में, ज्ञान कि बातों से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। खैर, आजकल दफ्तरों में भी खेल होने लगा है। कंट्रोल में रहेगा। आजकल जैसा सारे न्यूज चैनलों में माहौल है थोड़ा चिल्लाइये, डोज दीजिये फिर जानिये आपकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा। सब डर कर काम करेंगे। खौफ का माहौल होगा, आपकी सब जी हुजूरी करेंगे बस खलीफा बन जाएंगे फिर क्या आप ही आप हैं।
शायद हम हिन्दुस्तानियों को डंडे के बिना काम करने की आदत ही नहीं है। तभी दिमागी शोरगुल में भी हमारी जिंदगी कटती है। नेचुरल इंस्टिंक्ट, टेलेंट क्या होता है। फ्लेयर इसलिये नहीं है क्योंकि सभी नौकरी या खानापूर्ति करने आए हैं। किसको दोष दें आप। अगर सब कुछ ठीक होता तो जो हाल हिन्दी न्यूज़ चैनलों का दिवालियापन है क्या दिवालियापान..अरे... भाई अगर ख़बर नहीं होगी तो हम क्या दिखायेंगे।
राखी सावंत का हैप्पी बर्थडे ही तो दिखायेंगे भले ही वो ऐश्वर्या, माधुरी या तब्बू, कैटरीना, दीपिका नहीं। अगर वो मीडिया को यूज, सॉरी..समय देना चाहें तो क्या बुराई है। ड्रामा हर रोज मिलता नहीं है। देश में हार्ड न्यूज़ देखता कौन है। हांलाकि चुनाव चल रहे हैं मगर फिर भी रेटिंग का सवाल है।
वो तो भला हो मुंबई ब्लास्ट का कि कुछ जर्नलिज्म करने को मिला। हम सब ने वो ही किया जो कभी भी किसी ने नहीं किया था। जाहिर तौर पर खबर ही ऐसी थी। मगर कहीं न कहीं हर पैमाने पर होड़ लगी हुई थी। आखिर बुराई क्या है इसमें। .......थैंक्स मुंबई ब्लास्ट....180 फीसदी का इजाफा हुआ व्यूअरशिप में। मगर अब तो ये खबर भी ख़त्म हो रही है। पब्लिक मेमोरी इज शॉर्ट ..अब फिर से नया कुछ खोजना पड़ेगा।
चुनाव है न मगर क्या जो जनता का गुस्सा है नेताओं के प्रति इससे चैनल संख्या या पोलिंग करने वालो की संख्या में इजाफा होगा। इस रिसेसन के दौर में भी हमारी निकल पड़ी..सही है बिड़ू। बाकवास बंद कर और नौकरी कर।
छोड़िए, नौकरी कीजिए..नौकरी...नहीं सर नहीं आपको सचिन बनना ही होगा... सचिन बनिए...सचिन बनिए...सचिन।

Monday, November 3, 2008

मीडिया की अधूरी खबर

हाल के दिनों हिंदी के वरिष्ठ पत्रकारों में एक नई प्रवृति उभरकर सामने आई है । वरिष्ठ पत्रकारों/संपादकों ने पूर्व में छपे अपने लेखों को एक जगह इकट्ठा करके आकर्षक शीर्षक और गंभीर भूमिका के साथ पुस्तकाकार छपवाना शुरु कर दिया है । संभवत: ये पत्रकारिता के छात्रों की बढती संख्या को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, मीडिया के बढ़ते बाजार में से अपना हिस्सा लेने का प्रयास । इसी कड़ी में पत्रकार अरविंद मोहन की किताब- मीडिया की खबर- छपकर आई है । इस किताब में अरविंद मोहन के पूर्व में छपे सत्रह लेख और मीडिया पर उनके पूर्व में लिखे गए स्तंभ की टिप्पणियां संकलित हैं ।
इस किताब का जो बेहद दिलचस्प लेख है वो है - प्रिंट बनाम टीवी । इस लेख की शुरुआत तो अरविंद ठीक करते हैं लेकिन जैसे-जैसे वो आगे बढ़ते हैं, प्रिंट के प्रति उनका मोह उजागर होता जाता है । अरविंद मोहन लिखते हैं -"जिस भी घटना, रिपोर्टिंग, लेखन में ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी होगी, उसमें कभी टीवी लीड नहीं लेगा ।" ये एक ऐसा निष्कर्ष है जिसके समर्थन में लेखक ने कोई तर्क नहीं दिया है । ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिसमें टीवी ने लीड ली, मसलन जेसिका लाल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड, उपहार सिनेमा अग्निकांड के दोषियों को सजा दिलवाने में न्यूज चैनलों की भूमिका अहम रही और उसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । या फिर हाल में ऑस्ट्रेलिया सीरीज में हरभजन सिंह-साइमंड्स विवाद में खबरिया चैनलों ने जिस तरह आगे बढ़कर लीड ली उसे अखबारों को फॉलो करने को मजबूर होना पड़ा । दरअसल अगर हम राष्ट्रीय पाठक सर्वे के आंकड़ों पर गौर करें तो पाते हैं कि खबरिया चैनलों के बढने के साथ साथ अखबारों और पत्रिकाओं की प्रसार संख्या में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है । हिंदी भाषी क्षेत्रों के अलावा अन्य भाषाओं में भी यही हाल है । वहां भी टीवी चैनलों के बढ़ने के साथ पाठकों की संख्या भी बढ़ी ।अपने इस लेख में लेखक विरोधाभास का भी शिकार हो गया है । एक जगह वो लिखतेहैं- "जिस दौर में टीवी अपने यहां ताकत बढाता गया, उस दौर में अखबारों, पत्रिकाओं के बंद होने का क्रम भी बढ़ा है( पृ.95) ।" वहीं इसी लेख में दूसरी ओर लिखते हैं -"बहरहाल ये धारणा पूरी तरह गलत साबित हुई कि कि टीवी खासकर न्यूज चैनलों के आने से समाचार पत्रों के दुर्दिन आ जाएंगे, बल्कि इसके उलट हो रहा है । जहां टीवी को देखा जा रहा है, वहीं प्रिंट की पाठक संख्या पिछले दो साल में दस फीसदी बढ़ी है ।" अब पाठक ही तय करें । न्यूज चैनलों को लेकर लेखक का पूर्वग्रह भी इस लेख में सामने आता है जब वो कहते हैं कि अखबार लगभग पौने दो सौ खबरे देता है जबकि चैनलों के एक गंटे के बुलेटिन में बमुश्किल पंद्रह खबरें होती है । ये ठीक है लेकिन चौबीस घंटे के न्यूज चैनल में कितने ऐसे बुलेटिन होते हैं और फिर चैनलों खबरों का फॉलोअप या अपडेट तुरत फुरत दे सकते हैं तो अखबारों को चौबीस घंटे का इंतजार करना पड़ता है । मेरे कहने का ये मतलब नहीं है कि खबरों के मामले में अखबारों से ज्यादा अहम न्यूज चैनल हैं । मेरा ये मानना है कि दोनो की अपनी महत्ता है और किसी को कमतर करके आंकने के लिए हमारे पास मजबूत तर्क होने चाहिए ।
इस पूरी किताब में अरविंद मोहन के विचार और पसंद नापसंद उनके लेखों में प्रमुखता से सामने आए हैं । 'इतवारी अखबारों के बहाने' वाले लेख में भी । दिनमान टाइम्स, चौथी दुनिया, संडे मेल और संडे ऑब्जर्वर के प्रकाशन को लेखक हवा के झोंके की तरह बताते हुए कहते हैं कि रिपोर्ट जुटाने के मामले में इनमें से किसी अखबार ने जोर नहीं दिखाया । क्या अरविंद जी को 'चौथी दुनिया' की मेरठ दंगों की रिपोर्टिंग या फिर किसान आंदोलन की कवरेज याद नहीं है या फिर वो इसे याद करना नहीं चाहते । हाशिमपुरा-मलियाना में हुए अमानवीय हत्याकांड पर वीरेन्द्र सेंगर की रिपोर्ट- ' लाइन में खड़ा किया, गोली मारी, और लाशें बहा दी'- ने उस वक्त राष्ट्रीय स्तर पर हडकंप मचा दिया था । अरविंद जी जिसे हवा का झोंका कह रहे हैं वो तो आंधी थी । चौथी दुनिया की टीम को अब भी पत्रकारिता के इतिहास में कुछ बेहद अच्छी टीमों में से एक में गिना जाता है । इस किताब में एक लेख- भाजपाई मीडिया मैनेजमेंट- विचारोत्तेजक है । इसमें अरविंद मोहन ने ये साबित करने की कोशिश की है कि कम्युनिस्टों के बाद सुनियोजित और व्यवस्थित ढंग से मीडिया में घुसपैठ का प्रयास संघ या भाजपा की तरफ से ही हुआ। इस लेख में लेखक ने इसे सोदाहरण साबित भी किया है । इसके अलावा इस किताब का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख 'संपादक के नाम पत्र' है । अखबारों और पत्रिकाओं में नियमित छपनेवाले पाठकों के पत्रों की महत्ता और उसके असर को मोहन ने अपने अनुभवों के आधार पर स्थापित किया है । 'साझा इतिहास, साझी विरासत' लेख भी पत्रकारिता के इतिहास को समझने में सहायक हैं लेरकिन प्रूफ की गलतियों से कई नाम गलत छपे हैं ।
'खबरों की खबर' वाले अध्याय में छपी टिप्पणियों के साथ उसका प्रकाशन वर्ष भी छपा है, जिसकी वजह से उस पूरे दौर को समझने में सहूलियत होती है । लेकिन अन्य लेखों में प्रकाशन वर्ष के उल्लेख न होने से भ्रम की स्थिति बन जाती है ।
कुल मिलाकर अगर हम 'मीडिया की खबर' पर विचार करें तो कह सकते हैं कि अरविंद मोहन ने मीडिया को बाजार के बरक्श रखकर देखने की कोशिश की है, जिसमें वो कई जगह सफल भी होते दिखते हैं, लेकिन अगर समग्रता में विचार करें तो ये किताब अखबारी लेखों का ऐसा संग्रह है जिससे कोई साफ तस्वीर नहीं उभरती ।
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समीक्ष्य पुस्तक- मीडिया की खबर
लेखक- अरविंद मोहन
प्रकाशक- शिल्पायन, 10295, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा
दिल्ली- 110032
मूल्य - 150 रुपये

Monday, October 13, 2008

टीवी के लौंडे-लफाड़े

देशभर के अखबारों में आजकल टेलिविजन चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन पर खूब चर्चा हो रही है। सरकारी चैनल दूरदर्शन ने भी मीडिया के सरोकार के बहाने इसपर एक वृहद चर्चा आयोजित की। कमोबेश इस तरह से स्टिंग ऑपरेशन के बहाने खबरिया चैनलों पर लगाम लगाने के सरकार के इरादे को समर्थन मिल रहा है।
सवाल ये भी उठाए जा रहे हैं कि न्यूज चैनलों पर नाग नागिन और भूत प्रेत दिखाए जा रहे हैं। आलोचकों का ये भी कहना है कि न्यूज चैनलों से खबरें गायब हो गई है, बाकी सबकुछ है। इसके अलावा टीआरपी को लेकर भी खूब शोरगुल मचाया जा रहा है। जिन्हें टीआरपी की एबीसी भी पता नहीं है, वो भी न्यूज चैनलों की इस बात के लिए जमकर आलोचना करने में जुटे हैं कि वो टीआरपी बटोरने के लिए किसी भी हद तक जा रहे हैं।
टीआरपी के बारे में आधी अधूरी जानकारी रखनेवाले विद्वान, लेखक और अपने आपको मीडिया के जानकार बतानेवाले टीआरपी के सैंपल साइज पर भी सवाल उठा रहे हैं। कोई कह रहा है कि दो हजार बक्से से ये कैसे तय हो सकता है तो कोई इसकी संख्या पांच हजार बता रहा है। तो कहीं इसकी कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। बात-बात में सीएनएन और बीबीसी के उदाहरण दिए जाते हैं। लेकिन इसपर जो भी चर्चा हो रही है वो बहुत ही सतही और सुनी सुनाई बातों के आधार पर की जा रही है।
टीआरपी और इस व्यवस्था को कोसना आजकल फैशन हो गया है लेकिन न्यूज चैनलों पर लिखनेवाले मित्रों के लेखों को पढ़कर लगता है कि वो बगैर किसी तैयारी के लिख रहे हैं। टीआरपी और इस व्यवस्था की आलोचना करनेवालों को ये पता होना चाहिए कि ये व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था है। किसी भी और देश में टीआरपी के इतने बक्से नहीं लगे हैं।
पूरे भारत में अभी टीआरपी के सात हजार बक्से लगे हैं और रिसर्च करनेवालों की एक पूरी टीम हफ्तेभर इसपर काम करती है। और अगर टीआरपी को ध्यान में रखकर कंटेंट तय किया जा रहा है तो इसमें बुराई क्या है। क्या अखबार और पत्र-पत्रिकाएं सर्कुलेशन और रीडरशिप को ध्यान में रखकर अपना कंटेंट तय नहीं करते हैं। अगर टीआरपी के सैंपल साइज पर सवाल उटाए जा रहे हैं तो अखबारों के रीडरशिप सर्वे पर कोई सवाल क्यों नहीं उठता। पांच लाख के सर्कुलेशन वाले अखबार की रीडरशिप यानी पाठक संख्या पचास साठ लाख से ज्यादा दिखाई जाती है।
बारह लाख बिकनेवाली चालीस पृष्ठ की पत्रिका की पाठकसंख्या एक करोड़ से ज्यादा बताई जाती है। मतलब ये कि उक्त अखबार और पत्रिका की एक प्रति को लगभग दस लोग लोग पढ़ते हैं। क्या ऐसा संभव है। ये तो सिर्फ किसी बात की तरफ इशारा भर करता है। चलिए मान भी लिया जाए कि ऐसा होता होगा तो फिर सवाल ये उठता है कि नेशनल रीडरशिप सर्वे और इंडियन रीडरशिप सर्वे का सैंपल साइज क्या होता है। क्या इन सर्वे के सैंपल साइज इतना बावेला मचा।
अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापन से जुड़े लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि इन रीडरशिप सर्वे के आधार पर पत्र-पत्रिकाएं विज्ञापनदाताओं के पास जाकर कितना शोर मचाते हैं।
दूसरी जो सबसे हल्की बात न्यूज चैनलों के बारे में कही जाती है कि वो नाग नागिन और भूत प्रेत दिखाते रहते हैं। क्या इस तरह का फतवा जारी करने वाले किसी भी व्यक्ति ने सारे न्यूज चैनलों पर चलनेवाले कंटेट का अध्ययन किया है। कतई नहीं। अगर वो गंभीरता से इस पर विचार करते तो इस तरह का स्वीपिंग रिमार्क नहीं आता। एकाध न्यूज चैनल हैं जो इसे दिखाते हैं तो क्या उसके आधार पर सारे न्यूज चैनलों के कंटेट को हल्का करार दिया जा सकता है।
क्या अखबारों में और पत्र-पत्रकिओं में भूत-प्रेत और नाग-नागिन के बारे में खबरें नहीं छपती। दरअसल हर मीडियम, में चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक, हर तरह के कंटेंट मिलते हैं कहीं मसाला ज्यादा होता है और कहीं गंभीरता ज्यादा होती है। दरअसल न्यूज चैनलों की आलोचना से पत्रकारिता का वर्ग-संघर्ष सामने आता है। कुछ लोगों के मन में कुंठा घर कर गई है कि वो पंद्रह बीस साल तक कलम घिसने के बाद एक छोटी सी गाड़ी में ही चल पा रहे हैं जबकि न्यूज चैनलों में चार पांच साल काम करके ही लोग लंबी-लंबी गाड़ियों में चलने लगते हैं।
कई अखबारों के स्थानीय संपादक मेरे मित्र हैं जिन्हें मैंने ये कहते सुना है कि ये टीवी वाले लौंडे-लफाड़े ऐश कर रहे हैं और हम साले जीवन भर कलम ही घिसते रह जाएंगें। इसमें तो इन "लौंडे-लफाड़ों" का दोष नहीं है। बल्कि उन्हें तो अवसर मिला और जिस माध्यम में वो काम कर रहे हैं वहां आय हो रही है, तो पैसे मिल रहे हैं। साथ ही ये भी देखना होगा कि अखबारों में काम का दवाब कितना होता है और टीवी में कितना होता है। अखबार तो एक बार निकाल कर आप चौबीस घंटे के लिए निश्चिंत हो गए लेकिन न्यूज चैनलों में तो हर आधे घंटे में आपको एक अखबार निकालना होता है। काम के दवाब के हिसाब से कंपशेसन मिलता है।
और रही बात स्टिंग आपरेशन की तो क्या एक चैनल की गैरजिम्मेदारी के आधार पर ये कहना उचित है कि स्टिंग पर रोक लगा देनी चाहिए। क्या स्टिंग से देश का भला नहीं हुआ है। क्या स्टिंग से देश में सर्वोच्च स्तर पर चलनेवाले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश नहीं हुआ। अगर एक व्यापक सामाजिक हित में स्टिंग किया जा रहा हो तो उसपर रोक लगाने की कोई वजह नहीं है। लेकिन ये भी आवश्यक है कि स्टिंग को ऑन एयर डालने से पहले उसके हर पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और ये भी सोचना चाहिए कि इस स्टिंग से समाज का भला हो रहा है या नहीं । व्यक्तिगत दुश्मनी या बदला लेने की नीयत से किया जानेवाला स्टिंग सर्वथा निंदनीय है और कोई भी उसका पक्षधर नहीं है। राजनेता और सरकार तो हमेशा से ये चाहते रहे हैं कि मीडिया पर लगाम लगे ताकि वो स्वच्छंदतापूर्वक मनमाफिक काम कर सके।