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Saturday, August 29, 2026

पुस्तक को चर्चित करने का खेल


कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर विवाद जैसा हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की पुस्तक बिलांगिंग,ए जर्नी आफ लव के भारत में प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक में मतभेद है। इस पर चर्चा करने के पहले जरा इस पुस्तक की घोषणा की पृष्ठभूमि देखते हैं। पहले इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर इस पुस्तक का कवर आया। लोगों ने पोस्ट करना आरंभ किया, सोनिया जी की पुस्तक आ रही है। उत्सुकता का वातावरण बनाया गया। एक्स और फेसबुक पर कवर के बाद कहा जाने लगा कि सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में राजीव गांधी से मिलने से लेकर गांधी परिवार की बहू बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है। जो लोग भी पोस्ट कर रहे थे उनमें से किसी ने पुतक पढ़ी नहीं थी। पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आ रही है। अमेरिका का प्रकाशक इसको प्रकाशित कर रहा है। राजीव और सोनिया ने प्रेम विवाह किया था। किताब के नाम में जर्नी आफ लव को उनकी प्रेमकथा से जोड़कर लोगों ने पोस्ट लिखे। पुस्तक के प्रति उत्सुकता का वातावरण गाढ़ा हुआ। अब चर्चा हो रही है कि प्रकाशक पेंग्विन इंडिया ने भारत में उनकी पुस्तक को छापने से मना कर दिया है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर चर्चा ने जोर पकड़ा। बताया जाने लगा कि प्रकाशक ने लेखिका से कुछ प्रसंगों और अंशों को बदलने का आग्रह किया गया। लेखिका ने प्रकाशक की बात मानने से इंकार कर दिया। इसको विवाद का रूप दिया गया। इस प्रसंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा। 

प्रकाशक पेंग्विन ने अपनी तरफ से सफाई दी। घोषणा की कि सोनिया गांधी की पुस्तक पेंग्विन से प्रकासित नहीं हो रही है। आगे लिखा कि प्रकाशक होने के नाते उनका विशेषाधिकार और जिम्मेदारी है कि वो किसी भी पुस्तक के किसी भी प्रसंग का फैक्ट चेक करें। लेखक को अपनी राय से अवगत करवाएं, जो कि पुस्तक के हित में हो। ये प्रकाशन जगत की समान्य प्रक्रिया है। पेंग्विन ने आधिकारिक बयान में कहा वो अब भी इस पुस्तक को छापने के इच्छुक हैं। साथ ही बताया कि प्रकाशक और लेखक के बीच जो भी बात हुई है उसकी गोपनीता बरकरार रखना चाहते हैं। पेंग्विन ने सही कहा है। कथेतर पुस्तकों में फैक्ट चेक करने की आवश्यकता होती है। फिक्शन में तो किसी तरह प्रसंग काल्पनिक कहकर चल जाता है। जब आप किसी पुस्तक को संस्मरणात्मक कहते हैं या किसी घटना के आधार पर लिखते हैं तो उसकी प्रामाणिकता तो सिद्ध करनी ही होती है। ये तो प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया है। जो लेखक कथेतर गद्य लिखते हैं उनको ये पता भी है। मैंने ही लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी की हार और स्मृति इरानी की जीत को केंद्र में रखकर अमेठी संग्राम नाम की पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक के कई प्रसंगों पर प्रकाशक ने आपत्ति जताई थी। कइयों की उसकी प्रामणिकता के बारे में आशंकित थे। प्रियंका गांधी से संबंधित एक घटना मेरी पुस्तक में उल्लिखित है। प्रियंका पर टिप्पणी सुनने के बाद  स्मृति इरानी ने एक बेहद कठोर निर्णय लिया था। उस निर्णय का उनके चुनाव परिणा पर असर पड़ सकता था। इस प्रेसंग को लेकर प्रकाशक आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए बोला। जब उस घटना के साक्षियों के वर्जन आए तब प्रकाशक संतुष्ट हुए। दूसरी पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य को लेकर भी प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। जिनको हमने साथ बैठकर हल किया था। यह तो लेखक और प्रकाशक के बीच चलनेवाली एक रुटीन प्रक्रिया है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। 

इंटरनेटट मीडिया पर अब इस तरह की बातें आ रही हैं कि सोनिया जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक भेंट के प्रसंग को लेकर प्रकाशक ने आपत्ति जताई। चीन-भारत संबंध के अध्याय को लेकर प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित प्रसंगों की प्रामाणिकता को लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहते थे। संस्मरणों में इस तरह की बातें होती हैं जो बहुधा लेखक की धारणा पर आधारित होती है । उससे किसी अन्य की छवि पर असर पड़ सकता है। संभव है कि उक्त प्रसंगों में इस तरह की धारणाएं हों जिसको लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहता हो। यही आश्वस्ति तो कांग्रेस के नेता 2010 में चाह रहे थे जब स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द रेड साड़ी’ भारत में प्रकाशित होनेवाली थी। जेवियर मोरो ने 2008 में स्पैनिश भाषा में सोनिया गांधी की जीवनी लिखी थी। उसका अनुवाद इटैलियन, फ्रेंच और डच भाषा में हुआ था। भारत में जब मोरो की पुस्तक के प्रकाशन की बात आई थी को कांग्रेस के नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। जहां तक मुझे स्मरण है कि जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भी भेजी गई थी। उस पुस्तक के कुछ प्रसंगों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को आपत्ति थी। इमरजेंसी में सोनिया गांधी की भूमिका, सोनिया और मेनका गांधी के बीच के संबंध, गांधी परिवार की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेताओं को आपत्ति थी। कांग्रेस नेताओं ने तब जेवियर मोरो की पुस्तक को असत्य, अर्धसत्य और अपमानजनक बताया था। उस समय जेवियर मोरे ने ये दावा किया था कि सोनिया गांधी की जीवनी लिखने के लिए इटली स्थित सोनिया गांधी के पैतृक शहर लुसियाना में काफी समय बिताया था। उसने तो यहां तक दावा किया था कि पुस्तक प्रकाशन के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया जी की बहन नाडिया को दिखाई गई थी। सोनिया जी को भेजने का दावा भी मोरो ने किया था। बाद में जब केंद्र में सरकार बदली तब 2015 में ये पुस्तक भारत में प्रकाशित हो सकी। मोरो ने विवादों के बीच अपनी पुस्तक को फिक्शनलाइज्ड बायोग्राफी कहा था। पुस्तक पर डिस्क्लेमर भी लगाया था कि बातचीत संवाद और स्थितियां लेखक की व्याख्या पर आधारित है। यह आवश्यक नहीं कि वो प्रामाणिक भी हो। 

अब जब सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक आ रही है तो वही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं जो उस समय जेवियर मोरो की पुस्तक का विरोध कर रहे थे। प्रामाणिकता की मांग करनेवाले वही लोग या तो अब खामोश हैं या प्रकाशक को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ना तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है और ना ही इसमें किसी प्रकार के दबाव की बात है। यह मामला सीधे तौर पर प्रसंगों की प्रामाणिकता का है। संभव था कि सोनिया जी इसको फिक्शनलाइज्ड संस्मरण कह देती और पेंग्विन आपत्ति नहीं करता। पर ऐसा नहीं होने के संकेत हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक विवाद सामने आते रहे हैं जब प्रकाशक, लेखक की बातों से असहमत होते हैं और पुस्तक छापने से इंकार देते हैं। सोनिया जी की पुस्तक का विवाद को भी इसी आईने में देखे जाने की जरूरत है। हां, इन प्रसंगों से इतना अवश् हुआ कि पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। चर्चा होगी तो बिक्री पर असर पड़ना स्वाभाविक है। 


Friday, January 6, 2017

आरोपों की कमजोर जमीन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कपड़े को लेकर खासा विवाद उठाने की कोशिश समय समय पर की जाती रही है । उनपर अलग अलग समारोह में अलग अलग कपड़ों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल करने की कोशिशें भी की गईं । विरोधियों ने तो उनके सरकारी निवास के बिजली पानी ता बिल भी आरटीआई से मंगवा कर खबर बनाने की कोशिश की । कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने तो मोदी सरकार पर सूट-बूट की सरकार का जुमला चस्पां करने की भी कोशिश की । बावजूद इसके जब कोई शख्सियक सियासी धरातल पर मजबूती से खड़ा हो और व्यक्तिगत उपयोग के लिए  सरकारी धन के उपयोग का कोई आरोप उसपर ना तो हो इस तरह के सियासी कोलाहल समय के साथ हाशिए पर चले जाते हैं क्योंकि बदलते भारत में जनता अब विकालस के इर्द गिर्द सियासत चाहती है । जनता अपने इस मूड का एहसास सियासी दलों को चुनावों में करवाती रही है । कुछ दल जनता के इस मूड को भांप कर अपनी रणनीति बनाते हैं और सफल होते हैं लेकिन कुछ दल घिसी पिटी लीक पर चलते हुए बदलाव नहीं कर पाते हैं और लगातार असफलता का स्वाद चखते रहते हैं । प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर घेरने वाले उनके विरोधियों को यह नहीं पता है जो सवाल वो उठाते हैं उसके चक्रव्यूह में उनके दल का शीर्ष नेतृत्व ही गहरे तक धंसा हुआ है । नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगानेवाले कांग्रेस के लोग यह भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अपने परिवार को वो तमाम सुख सुविधाएं मुहैया नहीं करवाईं जो कांग्रेस के प्रथम परिवार को हासिल होती रही हैं । आज भी प्रधानमंत्री के भाई अपने अपने छोटे छोटे घरों में अपनी नियमित आय के साथ जीवन बसर करते हैं । ना सिर्फ उनके भाई बल्कि उनका विस्तारित परिवार भी कभी मोदी के प्रधानमंत्री बनने का बेजा तो दूर की बात फायदा उठाते भी नहीं दिखता है । मोदी के एक भाई को इस बात का मलाल भी है लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि के सिद्धांतों में दीक्षित नरेन्द्र मोदी ने इस तरह की बातों से अपने को अलग रखा है ।
पंडित जवाहर लाल नेहरू जब देश के प्रधानमंत्री थे उस वक्त भी इंदिरा गांधी अपने दोनों बच्चों के साथ सरकारी घर में रहती थीं । जाहिर है उनको उस वक्त की सरकारी सहूलियतें भी मिलती रही होंगी । इसी तरह से जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उनके दोनों बेटे और बहू भी उनके साथ ही सरकारी आवास में रहते रहे । उस दौर में भी जब राजीव गांधी एयर इंडिया की नौकरी कर रहे थे तब भी । जाहिक है सरकारी सहूलियतों का लाभ उनके दोनों बेटे भी उठाते रहे होंगे । वो दौर गांधी परिवार के साथ जनता के रोमांटिसिज्म का दौर था लिहाजा उस वक्त किसी तरह का सवाल नहीं उठा । संभव है कि इस उदाहरण से कुछ लोगों को तकलीफ हो लेकिन पुरानी कहावत है कि जब आप एक ऊंगली किसी की तरफ उठाते हैं तो चार उंगलियां आपकी तरफ भी उठती हैं ।
दरअसल ये सवाल सिर्फ गांधी परिवार का नहीं है, ये सवाल भारतीय राजनीति में परिवारवाद को प्रश्रय देने का भी है । आजादी के बाद से लेकर अबतक अगर हम पूरे देश की सियासी जमीन का मुआयना करें तो यह साफ तौर रेखांकित किया जा सकता है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कुछ परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति को अपनी जागीर बना ली । जम्मू कश्मीर में शेख अबद्ल्ला की तीसरी पीढ़ी सूबे की कमान संभाल चुकी है । उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और उनका परिवार, बिहार में लालू यादव और उनका कुनबा, तमिलनाडू में करुणानिधि और उनका परिवार, आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और उनका परिवार। लोकतंत्र में परिवारवाद को बढ़ावा देने के झंझटों से भले ही अलग अलग जातियों के एकजुट होने का खतरा पैदा नहीं होता हो लेकिन इससे लोकतंत्र अलग तरीके से कमजोर होता है ।    
इन पारिवारिक सियासी जागीरदारों ने भारतीय लोकतंत्र का कितना नुकसान किया और कितनी प्रतिभाओं की बलि ली है इसका आंकलन होना शेष है । इन पारिवारिक सियासत और कबीलाई सरकारों में फर्क सिर्फ इतना है कि कबीलाओं में सत्ता को लेकर हिंसक झगड़े हुआ करते थे लेकिन इस जंग में खून नहीं बहता है । सत्ता को लेकर सियासी दांव पेंच तो उसी तरह के चलते हैं और अंत में कबीले के सरदार के फैसलों को मानने के लिए सभी बाध्य होते हैं । हाल ही में इसका नमूना उत्तर प्रदेश में देखने को मिला जहां यादवों के नेता मुलायम सिंह यादव की विरासत को लेकर उनके बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके छोटे भाई और सूबे में मंत्री शिवपाल यादव के बीच तलवारें खिचीं थी और अखिलेश ने पिता को ही बेदशकल कर दिया । अखिलेश को लगता है कि मुलायम सिंह यादव के पुत्र होने की वजह से सियासी विरासत पर उनका स्वाभाविक हक है ।
सुदूर दक्षिण में भी अगर देखें तो अलग अलग मौके पर पांच बार तमिलनाडू में सत्ता संभालने वाले करुणानिधि के कुनबे में भी जो कलह हुआ था उसके पीछे भी वजह तमिल राजनीति के इस पुरोधा की राजीतिक विरासतत ही थी । करुणानिधि के बेटों अड़ागिरी और स्टालिन के बीच जमकर झगड़ा हुआ । एम के स्टालिन ने बहुत करीने से डीएमके कार्यकर्ताओं के बीच अपने को करुणानिधि के वारिस के तौर पर स्थापित किया । दोनों के बीच के संघर्ष में करुणानिधि ने स्टालिन को चुना और अड़ागिरी पार्टी से बाहर हो गए । आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी एन टी रामाराव की विरासत को लेकर उनके परिवार में संघर्ष हुआ था । एन टी रामाराव को तो उनके दामाद ने चंद्रबाबू नायडू ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपदस्थ कर दिया क्योंकि उनको शक था कि एनटीआर अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को सत्ता सौंपना चाहते थे । उस वक्त एनटी रामाराव के बेटों ने चंद्रबाबू का साथ दिया था लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही को नायडू ने सबको किनारे लगा दिया ।
इन पार्टियों में इस तरह का झगड़े इस वजह से भी होते हैं कि ये दल किसी एक शख्स के इर्दगिर्द चलनेवाले दल हैं और किसी विचारधारा से इनका बहुत लेना देना होता नहीं है । विचारधाराओं के आधार पर चलनेवाली पार्टियों में सत्ता संघर्ष का इतना वीभत्स रूप दिखाई नहीं देता है । वक्त आ गया है कि अब देश की जनता इन पारिवारिक पार्टियों को चिन्हित करे और उनको सवालों के कठघरे में खड़ा करे क्योंकि पारिवारिक सियासी जागीर लोकतंत्र के लिए गभीर चिंता का विषय है


Wednesday, November 19, 2014

गलतियों को सुधारने का वक्त

खुशवंत सिंह ने अपने स्तंभ में किसी को उद्धृत किया था – दिल्ली के कनॉट प्लेस के बाहरी सर्किल का नाम इंदिरा गांधी और भीतरी सर्किल का नाम राजीव गांधी कर दिया गया था । इसपर तंज करते हुए उस शख्स ने लिखा था कि बेहतर होता कि कनॉट प्लेस का नाम मां-बेटा चौक कर दिया जाता । पहली नजर में यह वाक्य व्यंग्य में कही गई लग सकती है लेकिन अगर में गहराई में विचार करें तो भारत में गांधी नेहरू परिवार के नेताओं को जितनी तवज्जो मिली उतनी अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को नहीं मिल पाने को क्षोभ भी झलकता है । वजह साफ है कि नेहरू जी के बाद इंदिरा गांधी लंबे समयतक प्रधानमंत्री रहीं उसके बाद भी राजीव गांधी और परोक्ष रूप से सोनिया गांधी का सत्ता पर कब्जा रहा । जनता पार्टी के दौरान तीन साल में मोरारजी देसाई सरकार और पार्टी के अंतर्कलह से जूझते रहे । कालांतर में विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर, देवगौड़ा और गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में सरकार किसी तरह बस चल सकी थी । अटल बिहारी वाजपेयी के तीसरे कार्यकाल में इतिहास के पुर्नलेखन की बात हुई । गांधी नेहरू परिवार से आगे निकलकर राजनीतिक नेतृत्व ने अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की ओर देखना शुरू किया । उनके कामों और संघर्षों को जनता के सामने लाने का काम शुरू हुआ लेकिन पचास साल की धमक को पांच साल में संतुलित नहीं किया जा सका । दूसरे अटल जी की सरकार सहयोगियों के सहारे चल रही थी । उसका भी अपना एक अलग दबाव था । अब तीस वर्षों के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार आई है तो यह उम्मीद जगी है कि देश के अन्य नायकों को भी उनका उचित सम्मान मिलेगा । इसका यह मतलब कतई नहीं है कि नेहरू-गांधी परिवार के योगदान और देश के त्याग को भुला दिया जाए लेकिन इसका यह मतलब भी कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि सिर्फ उनके ही योगदान को रेखांकित किया जाता रहे । मोदी सरकार ने इस दिशा में पहल शुरू की है ।
सरदार पटेल के कामों, विचारों और संघर्षों के बारे में जनता को बताने का काम शुरू किया गया है । नर्मदा नदी पर सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा के लिए गुजरात सरकार ने बजट प्रावधान कर दिया है । उनके जन्मदिन पर रन फॉर यूनिटि करके देश को एकता का संदेश दिया गया । दरअसल हुआ यह कि कांग्रेस के लंबे शासन काल के दौरान नेहरू गांधी परिवार से बाहर के नेता हाशिए पर रहे । सरदार वल्लभ भाई पटेल को लंबे समय के बाद भारत रत्न दिया गया । इंदिरा गांधी के शासन के दौरान 1974 में उनके खतों को कई खंडों में छापा गया था लेकिन कालांतर में उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं रहा । इसी तरह से अगर हम देखें तो कांग्रेस की विचारधारा से इतर राष्ट्रवाद की अवधारणा पर मजबूती से काम करनेवाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर दीन दयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख के कामों पर सरकार का ध्यान नहीं गया । ध्यान तो कांग्रेस की सरकार का भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद पर भी नहीं गया । भारत के इतिहास में संविधानसभा के अध्यक्ष और भारतीय गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति को उचित स्थान और सम्मान नहीं मिला। संविधान सभा के अध्यक्ष की प्रतिमा संसद भवन में आजतक नहीं लगी जबकि संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष की प्रतिमा परिसर के अंदर है । राजेन्द्र बाबू को हाशिए पर इस वजह से रखा गया कि उन्होंने कभी भी नेहरू का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया ।

केंद्र में आई मोदी की सरकार ने इतिहास की इन गलतियों से सबक लेते हुए उसे ठीक करने के संकेत देने शुरू किए हैं । श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय के नाम से कई राष्ट्रीय योजनाओं की शुरुआत हुई है । मोदी सरकार ने भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद के माध्यम से भी कई अहम कामों की शुरुआत की है । दक्षिणी राज्यों और पूर्वोत्तर में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के इरादे से सरकार ने वहां के स्थानीय नायकों को महत्व देने का फैसला लिया है । राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक ने अपने दशहरा भाषण में दक्षिण के महान शासक राजेन्द्र चोल को याद किया था और अब संघ ने राजेन्द्र चोल और सम्राट हेमू विक्रमादित्य को इतिहास में अहमियत दिलाने का फैसला किया है । राजेन्द्र चोल और हेमू दोनों ने कई युद्ध लड़े थे और आक्रमणकारियों को परास्त किया था । इसके अलावा सरकार ने फैसला किया है कि नगा स्वतंत्रता सेनानी रानी मां, शहीद अशपाकउल्लाह खान, महर्षि अरविदों से लेकर अन्य भारतीय चिंतकों और स्वतंत्रता सेनानियों के कामों को जनता के बीच पहुंचाया जाएगा ।  अब बिडंवना यह है कि वामपंथ की ओर झुकाव रखनेवाले बुद्धिजीवी इनको हिंदुत्व का नायक मानते हुए सरकार पर आरोप लगाना शुरू कर चुके हैं । दरअसल सबसे पहले यही गलती कांग्रेस ने की । कांग्रेस की अगुवाई में हम आजाद हुए लेकिन उसने वोटबैंक की राजनीति के चक्कर में राष्ट्रवाद को थाली में परोसकर भाजपा को दे दिया । देश में आयातित विचारधारा का प्रचार प्रसार करने और विदेशी नेतृत्व में आस्था रखनेवालों ने देश की बौद्धिक संपदा को फलने फूलने नहीं दिया। गांधी जी ने 6 अक्तूबर 1946 को हरिजन में एक लेख लिखकर चेताया भी था- ‘हममें विदेशों के दान की बजाय हमारी धरती जोकुछ पैदा कर सकती हो उसपर ही अपना निर्वाह कर सकने की योग्यता और साहस होना चाहिए । अन्यथा हम एक स्वतंत्र देश की तरह रहने के हकदार नहीं होंगे । यही बात विदेशी विचारधाराओं के लिए भी लागू होती है । मैं उन्हें उसी हद तक स्वीकार करूंगा जिस हद तक मैं उन्हें हजमन कर सकता हूं और उनमें परिस्थितियों के अनुरूप फर्क कर सकता हूं । लेकिन मैं उनमें बह जाने से इंकार करूंगा ।‘ लेकिन हमने गांधी की चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया और उसी में बहते चले गए । अब वक्त आ गया है पूर्व की गलतियों को सुधारते हुए देश के महानुभावों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का ।