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Saturday, January 8, 2022

भाषा के बीच की खाई भरती फिल्में


कोरोना की तीसरी लहर के आरंभ होने के पहले एक बड़ी हिंदी फिल्म रिलीज हुई, जिसका नाम है 83। रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण जैसे बड़े सितारों और कबीर खान जैसे निर्देशक के होने के बावजूद यह फिल्म बुरी तरह असफल रही। इतनी बड़ी स्टार कास्ट के बावजूद फिल्म का लागत भी नहीं निकाल पाना कई सवाल खड़े करता है। फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को चार उसके अधिक स्टार दिए थे, लेकिन ये फिल्म नहीं चली। समीक्षा को फिल्म की सफलता से नहीं जोड़ा जा सकता है। मुझे याद है मैं बहुत छोटा था तब फिल्म शोले रिलीज हुई थी। उसकी प्रकाशित समीक्षा का शीर्षक अबतक याद है। शीर्षक था, शोले जो भड़क न सका। शोले ऐसा भड़का कि उसने सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। फिल्म 83 को समीक्षकों ने सर पर चढ़ाया लेकिन दर्शकों पर जादू नहीं चल सका। कुछ लोगों का तर्क है कि फिल्म 83, जो कि 1983 में भारत के क्रिकेट विश्व कप जीतने पर आधारित है, का क्लाइमैक्स दर्शकों को मालूम है इस वजह से फिल्म नहीं चली। इस तरह के तर्क देनेवालों के सामने रामलीलाओं के मंचन का उदाहरण है। रामलीला का क्लाइमैक्स सभी को पता है। बावजूद इसके रामलीला में भारी भीड़ उमड़ती है। इसलिए यह तर्क सही प्रतीत नहीं होता है कि क्लाइमैक्स पता होने की वजह से फिल्म नहीं चली। कुछ लोगों का तर्क है कि लोग क्रिकेट देखने सिनेमा हाल में नहीं जाते हैं और निर्देशक ने फिल्म में क्रिकेट बहुत अधिक दिखाई है। अलग अलग लोग अलग अलग तर्क। पर मुझे लगता है कि इसपर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या दिल्ली के जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी दीपिका की तस्वीर अब भी दर्शकों के मन पर अंकित है?  2020 के जनवरी में दीपिका की फिल्म छपाक आई थी तब वो अपने फिल्म के प्रमोशन को ध्यान में रखते हुए दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी हो गई थी। तब उनकी फिल्म छपाक पिट गई थी। अब एक बार फिर 83 में दीपिका की उपस्थिति और फिल्म का असफल होना, कहीं कोई संकेत तो नहीं है? अगर ये संकेत सही है तो फिल्मी दुनिया के कलाकारों को सावधान हो जाना चाहिए। उनको ये बात समझ में आ जानी चाहिए कि फिल्म और राजनीति दोनों अलग अलग हैं। दोनों का घालमेल नुकसान पहुंचा सकता है।  

इसी समय एक दूसरी फिल्म आई पुष्पा, जो मूलरूप से तेलुगू में बनी है। इस फिल्म को हिंदी में डब करके रिलीज की गई। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इसके नायक अल्लू अर्जुन हैं। फिल्म भले ही एक्शन ड्रामा है लेकिन पूरा परिवेश दक्षिण भारतीय है, फिर भी हिंदी के दर्शकों को भाया। इस फिल्म को दर्शकों ने 83 से अधिक पसंद किया। कमाई भी अधिक रही। वजह है फिल्म की कहानी और उसको कहने का अंदाज। पुष्पा फिल्म के निर्देशक सुकुमार ने फिल्म 83 के निर्देशक कबीर खान से बेहतर तरीके से अपनी कहानी को दर्शकों के सामने रखी। दर्शकों ने उसको पसंद किया। कबीर खान फिल्म 83 को भव्य और ग्लैमरस बनाने के चक्कर में कहानी को यथार्थ से दूर ले गए। नतीजा यह हुआ कि दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया। दंगल हो या फिर सुल्तान दोनों फिल्में भव्य भी थीं, ग्लैमर भी था लेकिन निर्देशक ने यथार्थ की डोर नहीं छोड़ी। दूसरी एक बात जो फिल्म 83 को अति साधारण फिल्म बना देती है वो यह कि इस फिल्म से दर्शकों की भावनाएं नहीं जुड़ पाई। 1983 की विश्व कप जीत के बाद पैदा और जवान हुई पीढ़ी खुद को इस फिल्म के साथ आईडेंटिफाई नहीं कर पाई। निर्देशक इसमें चूक गए। फिल्म चक दे इंडिया के निर्देशक शमित अमीन अपनी फिल्म को दर्शकों की संवेदना से जोड़ने में सफल रहे थे। फिल्म भी सुपरहिट रही थी। 

फिल्म 83 के फ्लॉप होने की को दर्शकों की बदलती पसंद से जोड़कर भी देखा जा सकता है। ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म के लोकप्रिय होने के बाद से फिल्मी सितारों से अधिक लोग कहानी को पसंद करने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी फिल्मों से स्टार और सुपरस्टार वाली व्यवस्था खत्म हो जाएगी । दरअसल ओटीटी ने दर्शकों की रुचि का विस्तार किया है। अब हिंदी भाषी दर्शक अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में अपेक्षाकृत अधिक देखने लगे हैं। ओटीटी के पहले ये विकल्प मौजूद नहीं था। पहले होता ये था कि तमिल भाषा की फिल्म सिर्फ तमिलनाडु या पडुचेरी में दिखाई जाती थी। अन्य प्रदेशों में उसको दिखाने के लिए उस प्रदेश की भाषा में डब करना पड़ता था। एक दौर में टीवी पर दक्षिण भारतीय भाषाओं की हिंदी में डब की गई फिल्में खूब दिखाई जाती थीं। ओटीटी के प्रचलन में आने के बाद से अब दर्शक मूल भाषा में फिल्में देखना पसंद करने लगे हैं। अभी पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी जिसमें ये बताया गया था कि मलयालम में बनी फिल्म को केरल के बाहर के दर्शकों ने अधिक देखा। अब मलयालम या मराठी फिल्मों को गैर मलयाली और गैर मराठी दर्शक भी देख रहे हैं। जिनको पहले क्षेत्रीय फिल्में कहा जाता था आज वो मुख्यधारा की फिल्में बन रही हैं। अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा हो या मलयाली फिल्म कुरुथी हो या फिर तमिल फिल्म सरपता परमबराई हो। इन सबकी सफलता ने ये साबित किया है कि क्षेत्रीय फिल्में अपनी भौगोलिक सीमा से बाहर निकलकर दूसरी भाषा के लोगों को भी पसंद आ रही हैं। अमेजन प्राइम वीडियो के एक अधिकारी का बयान प्रकाशित हुआ था कि तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्म के पाचस प्रतिशत दर्शक उनके अपने प्रदेशों के बाहर के होते हैं। भाषाई फिल्मों की व्याप्ति बढ़ने से जो सबसे महत्वपूर्ण घटित हो रहा है वो ये कि भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्यता कम हो रही है। हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषा के कुछ लोगों के मन में जो दुर्भाव था वो कम हो रहा है। जब इस तरह के लोग ये जानते पढ़ते हैं कि हिंदी भाषी लोग अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को उनसे अधिक संख्या में देख रहे हैं तो उनके मन से हिंदी प्रति दुर्भावना कम या खत्म हो रही है। इस तरह से अगर हम देखें तो भाषाई वैमनस्यता दूर करने में फिल्में अब बड़ी भूमिका निभा रही हैं।ये बहुत बड़ी बात है। 

अपनी तमाम कमियों और राजनीतिक एजेंडा के बावजूद ओटीटी पर दिखाई जानेवाले कंटेट ने मनोरंजन की दुनिया को पहले से अधिक समावेशी बनाया है। अब फिल्मों में पहले की अपेक्षा अधिक प्रयोग हो रहे हैं। एक और बात जो रखांकित की जानी चाहिए वो ये कि ओटीटटी पर भारतीय फिल्मों को वैश्विक दर्शक भी मिलने लगे हैं। इसके भी कई फायदे हैं। अब वैश्विक मंचों पर भारतीय फिल्मों की चर्चा होने लगी है। पूरी दुनिया का ध्यान भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की ओर जाने लगा है। भारत कहानियों का देश है, कथावाचकों का देश है। कहानियां भी हैं और कहने का अलग अलग अंदाज भी है। कहने के विविध अंदाज को भी वैश्विक दर्शक मिले हैं। कोरोना के संकट ने एक बार फिर से सिनेमा हाल के जरिए फिल्म के व्यवसाय को बाधित किया है। फिर से फिल्मों के ओटीटी पर दिखाने का दौर आरंभ होगा। ओटीटी पर आनेवाली फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों को भारतीय दर्शकों की रुचियों में आ रहे बदलाव का ध्यान रखना होगा। कहानी को यथार्थ के रास्ते पर चलाकर ही प्रयोग करने होंगे। सफलता की कुंजी वहीं हैं।  


Saturday, January 18, 2020

रणनीतिक चूक से असफल हुई फिल्म


अजय देवगन की फिल्म तान्हाजी ने एक बार फिर से ये साबित किया कि दर्शकों की अपने ऐतिहासिक चरित्रों में खासी रुचि है। ये फिल्म रिलीज के पहले ही सप्ताह में सौ करोड़ के कारोबारी आंकड़ें को पार करके अपनी सफलता का परचम लहरा चुकी है। जबकि इसके साथ ही दीपिका पादुकोण की फिल्म छपाक भी रिलीज हुई थी जिसको मेघना गुलजार जैसी मशहूर शख्सियत ने निर्देशित किया था। अपनी फिल्म की रिलीज के पहले दीपिका ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों को मूक समर्थन देकर मीडिया में सुर्खियां बटोरने का उपक्रम भी किया था। बावजूद इसके फिल्म छपाक को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। छपाक एक सप्ताह में लागत भी नहीं निकाल सकी और सप्ताह का कलेक्शन 26 करोड़ से नीचे रहा। बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक दीपिका की फिल्प ‘छपाक’ फ्लॉप हो गई है। सोशल मीडिया पर तमाम क्रांतिकारी शूरवीरों ने भी दीपिका की इस फिल्म को सफल बनाने की मुहिम चलाई थी लेकिन उस फिल्म को लेकर जो एक अवधारणा लोगों तक पहुंचनी चाहिए थी वो बन नहीं पाई। रिपोर्ट क मुताबिक ‘छपाक’ ने बड़े शहरों में भी अच्छा बिजनेस नहीं किया और रिलीज होने के अगले शुक्रवार को उसका बिजनेस सवा करोड़ तक पहुंच गया। फिल्म छपाक का विषय अच्छा है लेकिन उसका ट्रीटमेंट और निर्देशन उस स्तर का नहीं है कि वो फिल्म से कोई छाप छोड़ सके। एसिड पीड़िता के दर्द को समाज में प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति महसूस करता है, इस हमले के खिलाफ उसके मन से प्रतिरोध की आवाज भी उठती रहती है लेकिन फिर भी लोग इस फिल्म को अपेक्षित संख्या में देखने नहीं गए। इसकी वजह यही रही कि ये फिल्म लोगों के बीच आपसी बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाई। ‘छपाक’ जैसी फिल्मों को कभी भी बंपर ओपनिंग नहीं मिली है और इस तरह की फिल्में धीरे-धीरे ही बेहतर कारोबार करती हैं। हाल ही में रिलीज हुई निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15’ भी इसी रास्ते पर चलकर सफल हुईं। ‘आर्टिकल 15’ के बारे में उसके विषय के बारे में, उसके ट्रीटमेंट के बारे में, आयुष्मान खुराना के अभिनय के बारे में लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई और फिर धीरे-धीरे दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हॉल जाने लगे और फिल्म सफल हो गई। लोगों के बीच चर्चा से फिल्म हिट होने का एक और सटीक उदाहरण है फिल्म ‘शोले’। 1975 में जब फिल्म ‘शोले’ रिलीज हुई थी तब ना तो चौबीस घंटे के न्यूज चैनल थे, ना ही वेबसाइट्स और ना ही सोशल मीडिया। ट्विटर और फेसबुक का तो अता-पता ही नहीं था इस वजह से लाइव समीक्षा भी नहीं हो पाती थी फिल्मों की। तब अखबारों में विज्ञापन आया करते थे। फिल्म समीक्षा छपा करती थी। पोस्टरों से लोगों को फिल्मों की जानकारी मिलती थी या कई शहरों में तो रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर फिल्म का प्रचार किया जाता था। जब अगस्त 1975 में ‘शोले’ रिलीज हुई थी तो लगभग सभी अखबारों ने इसको फ्लॉप करार दे दिया था। समीक्षकों को ये फिल्म अच्छी नहीं लगी थी। एक अखबार में तो फिल्म समीक्षा का शीर्षक था- ‘शोले’ जो भड़क न सका। लेकिन फिल्म को लेकर जब लोगों के बीच बातचीत शुरू हुई तो फिर माउथ पब्लिसिटी ने वो असर दिखाया जिसके आगे प्रचार के सारे माध्यम पिछड़ गए। ‘शोले’ की सफलता की कहानी लिखने की आवश्यकता नहीं है। ‘शोले’ की सफलता के पीछे भी दर्शकों में आपस में हुई बातचीत के फैलने का असर ही माना जाता है। ये एक कारक था लेकिन इसके अलावा इसका निर्देशन और सभी कलाकारों का अभिनय भी कमाल का था।
दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने की एक वजह उनका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाना भी रहा। वो छात्रों के बीच गईं, मौन रहीं लेकिन उनके आसपास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की उपस्थिति और वामपंथी विचारधारा के लोगों के दीपिका के पक्ष में आने से फिल्म के खिलाफ माहौल बन गया। जेएनयू जाकर दीपिका वामपंथियों के साथ खड़ी दिखी। इस स्तंभ में विस्तार से इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इस वजह से गई कि उनकी प्रचार टीम को दीपिका के इर्द गिर्द चर्चा चाहिए थी। प्रचार टीम इस बात का आकलन करने में चूक गई कि बाजार के औजार तभी सफल हो सकते हैं जब उसके साथ व्यापक जन समुदाय हो। बाजार उस विचारधारा के कंधे के पर नहीं चल सकता है जिस विचारधारा को पूरे देश ने लगभग नकार दिया। इसका प्रकटीकरण चुनाव दर चुनाव होता रहा। प्रचार टीम की इस रणनीतिक चूक का खामियाजा फिल्म को भुगतना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक कोई फिल्म तभी सफळ मानी जाती है जबकि उसको देखने के लिए कम से कम पचास लाख लोग पहुंचें। इस पचास लाख की संख्या से एक तय फॉर्मूल के आधार पर धनार्जन देखा जाता है।
बाजार के स्वभाव को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि आमिर और शाहरुख खान की फिल्मों के फ्लॉप होने या उनकी चमक फीकी पड़ने के पीछे उनका 2014 के बाद दिया गया बयान रहा है। जन के मानस पर जो बात एक बार अंकित हो जाती है उसको कुछ लोग आक्रामक तरीके से प्रकट कर देते हैं जबकि ज्यादातर लोग खामोशी से उसका प्रतिरोध करते हैं। फिल्मों के वितरण के कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि जनता के मन को समझते हुए ही शाहरुख और आमिर दोनों ने अपना रास्ता बदला और वो दोनों नरेन्द्र मोदी से मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ते और प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की तस्वीरों को प्रचारित भी करते हैं ताकि जनता को ये संदेश जा सके कि वो अब मोदी के विरोध में नहीं हैं। दूसरी बात ये कि देश की जनता खासकर हिंदी फिल्मों के दर्शक इस बात को पसंद नहीं करते हैं कि राजनीति को फिल्मों के सफल होने का उपयोग किया जाए। इस बात के दर्जनों उदाहरण हैं कि जब फिल्म के कलाकारों ने फिल्म रिलीज के पहले राजनीति का दांव चला है उसका फायदा नहीं हुआ उल्टे नुकसान हो गया।  
दीपिका के जेएनयू जाने से जो प्रतिरोध हुआ उसका फायदा अजय देवगन की फिल्म को मिला। आज जिस तरह से देशभर में राष्ट्रवाद को लोग पसंद कर रहे हैं और उसके खिलाफ सुनने को तैयार नहीं है। कोई भी देश अपने स्वर्णिम इतिहास और उस इतिहास के उन चरित्रों को बेद पसंद करते हैं जिन्होंने देश की गौरव गाथा लिखी और अपनी वीरता, शौर्य और अपने कृत्यों से देश का नाम रौशन किया। अपने अतीत को लेकर गौरव का उभार इस वक्त पूरी दुनिया में है। इस वैश्विक परिघटना से भारत भी अछूता नहीं है। अब भारत औपनिवेशिक गुलामी से मानसिक रूप से भी लगभग मुक्त हो चुका है। आजादी के बाद की फिल्मों को देखें तो उस दौर में फिल्मकार अंग्रेजों के जुल्म को दिखाते थे और फिर नायक उस जुल्म के खिलाफ खड़ा होता था। उसको देखने के लिए जनता की भारी भीड़ उमड़ती थी। ये क्रम काफी लंबे समय तक चलता रहा। क्रांति और लगान भी इसी थीम पर बनी और उसको दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला। इसके बाद भारत पाकिस्तान के युद्ध पर आधारित फिल्में बनीं। पाकिस्तानियों को हारते हुए देखकर लोग खूब ताली बजाते थे और टिकट खिड़की पर दर्शक टूट पड़ते थे।  
हिंदी फिल्मों में अब वो दौर बदल गया है। अब लोग भारत की गौरव गाथा को देखना चाहते हैं। चाहे वो खेल के मैदान में लिखी गई गौरव गाथा हो, विज्ञान की दुनिया की खास उपलब्धि हो या फिर आजाद भारत की सैन्य उपलब्धियां हों। चाहे वो अक्षय कुमार की फिल्म गोल्ड हो, उनकी ही फिल्म मिशन मंगल हो या फिर फिर विकी कौशल की फिल्म उरी हो। ये बदलाव इस बात को रेखांकित करता है कि भारत में सिनेमा के दर्शकों का मन और मिजाज दोनों बदल रहा है। सिर्फ फिल्म ही क्यों अगर हम वेब सीरीज की या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर भी देखें तो ऐतिहासिक चरित्रों के इर्द गिर्द बनी सीरीज बेहद सफल हो रही है। ना सिर्फ सफल हो रही बल्कि लगातार इस तरह की सीरीज बनने की घोषणाएं भी हो रही हैं। नेटफ्लिक्स से लेकर अमेजन और जी फाइव से लेकर एमएक्स तक के प्लेटफॉर्म पर गौरव गाथाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। बाजार का अच्छा जानकार वही होता और माना जाता है जो देश के मूड को भांपते हुए जनता के मन मुताबिक चीज उसके सामने रखे। सफलता मिलती ही है नहीं तो फिर उसका ‘छपाक’ हो जाता है।    

Thursday, January 9, 2020

आंकड़ों ने बनाया आंदोलनकारी!


आज दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ रिलीज हो रही है। इसके दो दिन पहले अचानक शाम को ये खबर आई कि दीपिका पादुकोण जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंच गई। इस खबर के साथ ही सोशल मीडिया पर घमासान मच गया। ट्वीटर के बयानवीरों ने इसको दीपिका की हिम्मत के साथ जोड़कर उनकी शान में कशीदे पढ़ने शुरू कर दिए। कई लोग तो इतने जोश में आ गए कि उनकी इस बात के लिए तारीफ करनी शुरू कर दी कि इतनी बड़ी फिल्म को दांव पर लगाकर आंदोलनकारी छात्रों के साथ खड़ी हो गई। ट्वीटर पर जोशीले ट्वीट्स तूफानी अंदाज में लिखे जाने लगे। सोशल मीडिया पर ही दूसरा पक्ष विरोध में उठ खड़ा हुआ और दीपिका के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचने को उनकी फिल्म के प्रमोशन से जोड़ दिया। दोनों पक्षों में सोशल मीडिया पर भिड़ंत हो गई। ट्वीटर पर ‘छपाक’ फिल्म के पक्ष और विपक्ष में बनाया गया हैशटैग ट्रेंड करने लगा। बॉलीवुड के भी अनुराग कश्यप जैसे सूरमाओं को ये लगा कि उनके विरोध को दीपिका के साथ आने से ताकत मिली है। वो भी जोश में आ गए। लेकिन उऩको ये नहीं समझ आया कि दीपिका पादुकोण का वहां पहुंचने के पीछे की वजह एक रिपोर्ट थी।
दरअसल एक कंपनी ऑरमैक्स, सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट जारी करती है जिसके आधार पर पहले दिन बॉक्स ऑफिस ओपनिंग (एफबीओ)  के बारे में अंदाज लगाया जाता है। ऑरमैक्स सिनेमैट्रिक्स निश्चित तारीख पर रिलीज होनेवाली फिल्मों के प्रमोशन कैंपन को चार आधार पर ट्रैक करती है ताकि पहले दिन फिल्म की ओपनिंग का अंदाज लगाया जा सके। ये चार आधार होते हैं बज़ (चर्चा), रीच (पहुंच), अपील और इंटरेस्ट (रुचि)। ये एक रियल टाइम रिपोर्ट होती है जो किसी भी फिल्म के प्रमोशन कैंपेन को रोजाना ट्रैक करती है। इसको फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस मॉडल कहते हैं। इस रिपोर्ट के सब्सक्राइवर को इसके अलावा उनकी मांग के अनुरूप अन्य आंकड़े और जानकारियां भी दी जाती हैं। फिल्म जगत में इस रिपोर्ट पर बड़ी फिल्म निर्माता कंपनी काफी भरोसा करती हैं।इसके आधार पर प्रमोशन कैंपेन को डिजायन भी किया जाता है और उसमें बदलाव भी किया जाता है। इंडस्ट्री से जुड़े लोग इसको बखूबी जानते और समझते भी हैं। इस कंपनी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस व्यवस्था को भरोसेमंद और व्यापक बनाने के लिए फिल्मों के 29 मार्केट से जानकारियां उठाई जाती है। उन जानकारियों और सूटनाओं के आधार पर उसका विश्लेषण किया जाता है और फिर सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट तैयार की जाती है।
इस रिपोर्ट में फिल्मों पर असर डालनेवाले बाहरी कारकों का भी ध्यान रखा जाता है। इसके प्रभाव को भी इसमें शामिल किया जाता है। बाहरी कारक यानि फइल्म रिलीज की तारीख के दिन या उसके आसपास पड़नेवाले त्योहार,छुट्टियां,क्रिकेट मैच, परीक्षाएं या मौसम का भी ध्यान रखकर विश्लेषित किया जाता है और फिर रिपोर्ट तैयार की जाती है। गौरतलब है कि फिल्म ‘धूम 3’ के लिए एफबीओ रिपोर्ट साढे बत्तीस करोड़ रुपए की ओपनिंग की थी जबकि वास्तविक ओपनिंग 30.9 करोड़ रु की रही जो कि पूर्वानुमान के बहुत करीब थी। फिल्म ‘आर..राजकुमार’ के लिए ओपनिंग का पूर्वानुमान 8.3 करोड़ रु का था जबकि वास्तविक ओपनिंग 8.8 करोड़ रुपए की हुई थी। कंपनी मानती है कि उसकी रिपोर्ट एकदम सटीक नहीं होती है और उसमें पांच फीसदी उपर नीचे की गुंजाइश होती है। बेवसाइट का दावा है कि फिल्म उद्योग के कई स्टूडियोज उनकी इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हैं।  
अब शुरू होती है दीपिका के जेएनयू पहुंचने की असली कहानी। जिस दिन दीपिका शाम को जेएनयू पहुंचती हैं उस दिन यानि 7 जनवरी को दिन में ये रिपोर्ट आती है जिसमें वो उपर उल्लिखित चारों मापदंडों पर तीसरे स्थान पर आती है जबकि आज ही रिलीज होनेवाली अजय देवगन-काजोल की फिल्म ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ पहले स्थान पर थी। पहुंच में भी फिल्म ‘छपाक’, इसी दिन रिलीज होनेवाली फिल्म ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ और 24 जनवरी को रिलीज होनेवाली फिल्म ‘स्ट्रीट डांसर’ से पीछे थी। दर्शकों की रुचि में भी दीपिका की फिल्म ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ से पीछे चल रही थी। इससे भी चिंता की बात ये थी कि एफबीओ में ‘छपाक’ और ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ की पहले दिन की ओपनिंग में बहुत अधिक फर्क था। टतानाजी, द अनसंग वॉरियरट को इस रिपोर्ट में ‘छपाक’ से लगभग दुगनी ओपनिंग मिलने का पूर्वानुमान लगाया गया था। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट के आते ही फिल्म ‘छपाक’ का प्रमोशन देख रहे लोगों ने रणनीति बदली और उसके बाद ही दीपिका के जेएनयू जाने की योजना बनी।  दीपिका जेएनयू पहुंच गई। दीपिका के जेएनयू जाने को लेकर सोशल मीडिया पर भले ही हो हल्ला मचा हो लेकिन सिनेमैट्रिक्स की 9 जनवरी की रिपोर्ट बताती है कि इसका मामूली फायदा ‘छपाक’ को हुआ। चार मापदंडों पर दीपिका के जेएनयू जाने का थोड़ा ही असर हुआ लेकिन फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस ओपनिंग के पूर्वानुमान पर कोई असर नहीं पड़ा। जबकि ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ के एफबीओ में मामूली वृद्धि होती दिख रही है। आज दोनों फिल्म रिलीज होगी और उसके वास्तविक आंकड़ें आएंगे तो पता चलेगा कि दीपिका की जेएनयू जाने की रणनीति कितनी कामयाब रही और फिल्म को ओपनिंग में या कारोबार में कितना फायदा हो पाया या इसका कोई असर नहीं पड़ा।
दरअसल अगर हम फिल्मी कलाकारों को देखें तो विवादित विषयों को उठाकर या उनके साथ खड़े होकर फिल्म प्रमोशन की रणनीति बहुत पुरानी है। दीपिका पादुकोण की ही फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर उठा विवाद अभी पाठकों और दर्शकों के मानस पर अंकित ही है।पूर्व में भी बॉलीवुड के हीरो इस तरह के विवादों को हवा देते रहे हैं, कभी किसी को डर लगने लगता है तो किसी की पत्नी को डर लगने लगता है तो कभी किसी अभिनेता को अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है। कई बार फिल्म के उन अंशों को जानबूझकर लीक कर दिया जाता है जो विवाद पैदा कर सकते हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं जब विवाद उठाने के बाद निर्माता सफाई देते हैं कि इस तरह का कोई प्रसंग इस फिल्म में नहीं है। कई बार इस तरह की रणनीति सफल होती है और कई बार असफल। दीपिका की फिल्म छपाक का प्रमोशन देख रही टीम ने इस बार आंदोलन के साथ जाकर फिल्म को सफल करने का दांव चला है। सफलता तो दर्शकों के हाथ में है, दांव पर तो सिनेमैट्रिक्स की रिपोर्ट की साख भी है।   

Sunday, February 28, 2016

सलमान रश्दी पर खामाशी क्यों

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देशप्रेम और देशद्रोह और हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर मचे कोलाहल के बीच धर्मनिरपेक्षता के ध्वजवाहकों को दूसरे मसलों पर ध्यान देने की फुरसत नहीं है । हर मसले पर फौरन प्रेस बयान जारी करनेवाली वामपंथी लेखकों की संस्था जनवादी लेखक संघ खामोश है । ये खामोशी है भारतीय मूल के मशहूर लेखक सलमान रश्दी को लेकर । हाल ही में खबर आई कि ईरान की कई मीडिया और अन्य संस्थानों ने सलमान रश्दी को जान से मारनेवाले की इनामी राशि में इजाफा कर दिया है । इन सब लोगों ने मिलकर छह लाख डालर इकट्ठा किया और एलान किया कि ये राशि पहले से घोषित इनामी राशि में जोड़ दी जाएगी । सत्ताइस साल पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने सलमान रश्दी की जान मारनेवाले को इनाम देने का एलान किया था । उनकी नाराजगी सलमान की 1988 में छपी किताब सैटेनिक वर्सेस को लेकर थी । खुमैनी ने उस किताब को ईशनिंदा और इस्लाम का मजाक उड़ाने का दोषी करार दिया था । खुमैनी के उस फतवे के बाद सलमान रश्दी निर्वासित जीवन बिता रहे हैं और उनको कई बार जान से मारने की नाकाम कोशिश हुई । करीब सत्ताइस साल से संगीनों के साए में जीवन बिता रहे सलमान रश्दी की जिंदगी खतरे में आ गई है । ईरान के एक मंत्री ने कहा है कि खुमैनी साहब का फतवा उनेक लिए धार्मिक अध्यादेश की तरह है जो कभी भी अपनी ताकत और महत्ता नहीं खो सकता है ।
अब सवाल यही उठता है कि पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन इस मसले पर कमोबेश खामोश क्यों हैं । सलमान रश्दी को जान से मारने के फतवा को पूरा करने के लिए बढ़ाई गई इनामी राशि के खिलाफ उनकी कलम नपुंसक क्यों हो गई है । नोम चोमस्की से लेकर उमर खालिद और कन्हैया कुमार पर छाती कूटनेवाले हमारे वामी मित्रों के मुंह इस मसले पर क्यों सिल गए हैं । सलमान रश्दी के पक्ष में और ईरान के खिलाफ किसी भी तथाकथित प्रगतिशील जमात ने बयान तक जारी नहीं किया । उन विश्वविद्लायों को प्रोफसरों का क्या जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जारी बवाल पर हस्ताक्षरित बयान जारी किया । क्या उनके हाथ कांपने लगते हैं । उस जनवादी लेखक संघ को सलमान रश्दी के मसले पर क्यों सांप सूंघ गया है जो ईमेल पर फौरन बयान आदि जारी कर विरोध जताने के लिए मशहूर हैं । दरअसल ये इनका वर्ग चरित्र है । ये चुनिंदा मामलों पर शोरगुल मचाते हैं । इनकी इसी चुनिंदा प्रतिक्रया की वजह से दूसरे लोगों को ये लगता है कि प्रगतिशील जमात का विरोध एकतरफा होता है । इस भावना के बढ़ते जाने से कट्टरपंथियों को जमीन मिलती है और वो आम लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं कि वामपंथी सिर्फ एक जमात के पक्ष में खड़े होते हैं । लंबे वक्त तक जब जनता देखती है कि वामपंथियों का विरोध सचमुच एक ही जमता के लिए होता है तो वो कट्टरपंथी की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं । नतीजा इस चुनिंदा विरोध से कट्टरता को बढ़ावा मिलता है । वामपंथियों को ये लगता है कि मुसलमानों के मसलों पर दखल देने से उनकी धर्मनिरपेक्षता की छवि को धक्का लगेगा, जबकि ऐसा है नहीं । किसी भी दल या संगठन को जनता के हितों की बात करनी चाहिए लेकिन अफसोस कि भारत की प्रगतिशील जमात भी जाति और धर्म के बाड़े से बाहर नहीं जा पाई है । समानता की बुनियादी सिद्धांत का दावा करनेवाले ये संगठन, दरअसल अपनी दुकान चलाते हैं और कारोबार के लिहाज से ही अपने कदम उठाते हैं ताकि मुनाफा हो सके ।

ये पहला मौका नहीं है जहां वामपंथियों ने इस तरह का रुख अपनाया है । पहले भी कई मौकों पर देखा गया है कि वो बहुसंख्यक समाज की गड़बड़ियों को लेकर जितने मुखर होते हैं उतनी मुखरता के साथ वो अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याओं पर अपना पक्ष नहीं रखते हैं । चाहे वो सलमान का मसला हो या फिर तसलीमा नसरीन का हो । पहले पश्च्म बंगाल की प्रगतिशील सरकार ने तसलीमा के साथ न्याय नहीं किया और फिर उसके बाद ममता बनर्जी की सरकार ने भी वामपंथियों से लाख विरोध के बावजूद तसलीमा नसरीन को बंगाल में रहने की इजाजत नहीं दी । तसलीमा नसरीन की अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार किसी भी प्रगतिशील लेखक को याद नही आया । जब बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने तसलीमा नसरीन को बंगाल से निकाला था तब भी ये वामपंथी लेखक और उनके संगठन खामोश रहे थे । दरअसल प्रगतिशीलता के चोले के पीछे वोटबैंक की राजनीति काम करती है । ये बात सबको पता है कि जो तीन लेखक संगठन, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच, हैं वो सब अपने राजनीतिक दलों से संबद्ध हैं । इन लेखक संगठनों को अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह देखना होता है उसी अनुसार ये अपनी रणनीति बनाते हैं । सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन के मामले से वोटबैंक की राजनीति जुड़ी हुई है लिहाजा इन प्रगतिशीलों के आका खामोश हैं । जब आका खामोश तो फिर कारकुनों की क्या मजाल कि जुबान से कुछ भी निकल जाए । दरअसल यही वजह भी रही कि हमारे देश में इन प्रगतिशील लेखकों की साख छीजती चली गई । साख के कम होने का प्रमाण पुरस्कार वापसी के वक्त भी देखने को मिला । चालीस पचास लेखकों ने पुरस्कार वापस किए लेकिन एक सर्वे के मुताबिक उनके खिलाफ उस दौर में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सवा सौ से ज्यादा लेख छपे थे ।   दपअसल जब भी इस तरह का मामला सामने आता है तो मुझे राजेन्द्र यादव और हंस के साथ हुआ वाकया याद आता है । दिल्ली में हंस की सालाना गोष्ठी में कथित क्रांतिवारी कवि बरवर राव को आना था । राजेन्द्र यादव से उन्होंने वादा भी किया था और अंत तक झूठ बोलते रहे कि एयरपोर्ट पर पहुच गए हैं, रास्ते में हैं लेकिन उनका रास्ता मंजिल की तरफ ना जाकर कहीं और चला गया था । वरवर राव की इस वादा खिलाफी का किसी वामपंथी लेखक ने विरोध नहीं किया था बल्कि उनके कदम को यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की गई थी कि वो दक्षिणपंथी लेखक के साथ मंच कैसे साझा कर सकते हैं । जीवनभर वामपंथ का खूंटे से बंधे रहे राजेन्द्र यादव उस वक्त वामपंथियों के रुख से खासे झुब्ध थे । उन्होंने तब माना था कि इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध होती जा रही है लेकिन आस्था के वशीभूत वो उनको बेनकाब करने से तब भी बचे थे ।  

Monday, February 22, 2016

अभिव्यक्ति की अराजकता !

हिंदी के वरिष्ठ कथाकार और साहित्यक पत्रिका हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव हमेशा आपसी बातचीत में और अपने साक्षात्कारों में कहते थे कि देश के विश्वविद्लायों के हिंदी विभाग रचनात्मकता की कब्रगाह हैं । उनका कहना था कि विश्वविद्लायों के हिंदी विभागों के शिक्षक नया कुछ भी नहीं कर पाते हैं और सूर, कबीर,तुलसी और मीरा से आगे नहीं बढ़ पाते हैं । राजेन्द्र यादव ने उपन्यास समीक्षा के औजारों और प्रणाली पर लिखा था- यह समीक्षा विश्वविद्यालयों के आसपास मंडराती है और एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर के उपन्यासों पर अभ्यास करता है । इस प्रकार की समीक्षाओं को बाद में एक जिल्द में समेटकर कोई भारी-भरकम डरावना सा नाम दे दिया जाता है । संपादक होते हैं कोईउपन्यासकार-समीक्षक डॉक्टर । राजेन्द्र यादव के इस तंज को समझा जा सकता है । यहां वो पीएचडी वाले प्रोफेसरों को डॉक्टर कह कर संबोधित करते हैं क्योंकि अब भी विश्वविद्यालयों में एक दूसरे को डॉक साब कहने की परंपरा है । कालांतर में राजेन्द्र यादव ने अपना दायरा बढ़ा लिया था और उनको लगने लगा था कि भारत के विश्वविद्यालय रचनात्मकता के कब्रगाह हैं । वो उन शिक्षकों को को गाहे बगाहे आड़े हाथों लेते रहते थे जो कि शिक्षण कार्य की बजाए साहित्य की राजनीति में मशरूफ रहते थे, गोष्ठियों सेमिनारों से लेकर नेताओं की गणेश परिक्रमा में लगे रहते थे । दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जारी विवाद के बीच राजेन्द्र यादव का कथन सही ही लगता है । इसी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी के एक शिक्षक के खिलाफ छात्रों ने पर्चे आदि छपवाकर बांटे थे । उनपर आरोप था कि वो शिक्षण कार्य से इतर सभी कामों में गंभीरता से लगे रहते हैं । इन दिनों उनको भी जेएनयू की चिंता सता रही है । यही हाल देशभर के कमोबेश सभी विश्वविद्यालयों का है । देश के चंद विश्वविद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो हर जगह हालात इतने बुरे हैं जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती । दिल्ली के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना जिन उद्देश्यों के लिए की गई थी वो कहां हासिल किया जा रहा है । हाल के दिनों में इस तरह का कोई शोध सामने नहीं आया है जिसकी अंतराष्ट्रीय स्तर पर तो छोड़िए राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई हो । क्या जेएनयू की स्थापना का उद्देश्य सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे छात्रों को सुविधा मुहैया करवाना था । अगर ये था तो इलाहाबाद और पटना विश्वविद्यालय क्या बुरे थे ।
दरअसल जेएनयू के माहौल और कामकाज पर विचार करें तो यहां शोधादि से ज्यादा चर्चा उसके कार्यक्रमों और प्रदर्शनों की होती है । अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर विश्वविद्यालय कैंपस में अभिव्यक्ति की अराजकता है । विश्वविद्यालय की स्थापना काल से ही हां वामपंथी विचारों का दबदबा रहा है, लिहाजा इन सेमिनारों के विषय और वक्ता भी उसी विचारधारा के अनुरूप तय किए जाते हैं । तर्क ये दिया जाता है कि छात्रों के बीच तर्कशक्ति के विकास और उनकी सोच को पैना करने के लिए इस तरह का माहौल सबसे मुफीद है । तर्क की आड़ में विचारधारा का प्रचार होता है । संभव है यह दलील ठीक हो लेकिन इसी जेएनयू में दूसरी विचारधारा के साथ अस्पृश्यता भी देखने को मिलती है । यह अस्पृश्यता सिर्फ सेमिनार और भाषणों में नहीं दिखाई देती है बल्कि छुआछूत की ये प्रवृत्ति शोध प्रबंध आदि में देखने को मिलती है । इस बात के कई ऐसे प्रमाण मौजूद हैं जब वामपंथी विचारधारा के खिलाफ शोध करनेवालों को कोर्ट से जाकर इंसाफ की गुहार लगानी पड़ी । कोर्ट के आदेश के बाद उनके रिसर्च को मान्यता दी गई और फिर डिग्री भी । केंद्र में सत्ता बदलने के बाद देश में फासीवाद आने का एलान करनेवाली वामपंथी जमात को यह समझना होगा कि नरेन्द्र मोदी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के मुखिया है और जनता ने उनको पांच सालों के लिए चुना है । उनका राजनीतक विरोध करना विपक्ष का अधिकार है । लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक भी है लेकिन अपनी पाजनीति के लिए विश्वविद्यालयों और छात्रों का इस्तेमाल करना बिल्कुल ही उचित नहीं है । वामपंथियों के लिए फासीवाद का मतलब है बीजेपी, आरएसएस और नरेन्द्र मोदी । उनके लिए स्कूलों में योग शिक्षा भी फासीवाद है, उनके लिए स्कूलों में वंदे मातरम गाना भी फासीवाद है, उनके लिए सरस्वती वंदना भी फासीवाद है, उनके लिए अकादमियों या सरकारी पदों से उनको हटाया जाना भी फासीवाद है, उनके लिए इतिहास अनुसंधान परिषद में बदलाव की कोशिश भी फासीवाद है । दरअसल उनके लिए वामपंथ कीचौहद्दी से बाहर किससी भी तरह का कार्य फासीवाद है । इस तरह का शोरगुल इन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त भी मचाया था । बावजूद इसके देशभर की अकादमियों से लेकर तमाम सरकारी गैर सरकारी पदों पर अब भी वामपंथी विचारधारा के ध्वजवाहक ही राज कर रहे हैं बस उनके सामने हटाए जाने का खतरा है । दरअसल जब तक कांग्रेस की सरकार रही तो इन अकादमियों और विश्वविद्यालयों पर कमोबेश वामपंथियों का ही कब्जा रहा और वो अपनी मनमानी चलाते रहे । अब इन मनमानियों पर से परदा उठने लगा तो उनको फासीवाद नजर आने लगा है । अगर मार्क्सवादियों के अतीत पर नजर डाले तो ये साफ तौर पर सामने आता है तमाम वामपंथी अपने कार्यप्रणाली से लेकर मन-मिजाज तक में तानाशाह होते हैं या यों कहे कि फासीवादी होते हैं । देश के तमाम विश्वविद्यालय इस बात के गवाह हैं कि वैकल्पिक विचारधारा के लोगों को नौकरी आदि से किस तरह से वामपंथियों ने वंचित किया था और अब भी कर रहे हैं । लेनिन ने कभी कहा भी था कि कम्युनिस्टों की राजनीति को कोई नैतिकता या फिर कानून रोक नहीं सकती है । चीन और रूस इस बात के जीते जागते सबूत हैं । कम्युनिज्म के नाम पर वहां तानाशाही नहीं तो क्या है ।

इस बात पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए कि करदाताओं के पैसे से चलनेवाली इस तरह के विश्वविद्यालयों में एक खास विचारधारा के पोषकों को ही सिर्फ बार-बार जगह क्यों दी जाती रही है । आज असहिष्णुता और देशप्रेम पर सवाल खड़े करनेवालों ने कभी भी इस सवाल से टकराने की जहमत क्यों नहीं उठाई । एक खास विचारधारा को छात्रों के बीच बढ़ाने और उसको प्रचारित करने वालों के खिलाफ कभी किसी भी कोने अंतरे से आवाज नहीं आई । इस बात का विश्लेषण किया जाना चाहिए कि क्या इस तरह से एक विचारधारा को प्रचारित करने और मजबूत करने की वजह से ही वहां कश्मीर की आजादी और भारत विरोधी नारा लगानेवालों को खाद पानी मिला । पड़ताल तो इस बात की भी होनी चाहिए कि इस खाद पानी का इंतजाम करनेवाले कौन लोग थे । जेएनयू में वो कौन सी परिस्थियां थी कि डेमोक्रैटिक स्टूडेंट्स यूनियन जैसा संगठन वहां पनपा जिसको कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने बैन कर दिया । वौ कौन लोग थे जो नक्सलियों के समर्थन में काम करनेवाली इस संस्था के मेंटॉर थे । इस बात को भी उजागर करना चाहिए कि उक्त छात्र यूनियन ने क्या किया था कि केंद्र सरकार को उसको बैन बैन करना पड़ा था । वो कौन लोग थे जो दंतेवाड़ा में जवानों की शहादत पर जश्न मनाते थे । जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के खिलाफ नोम चोमस्की, ओरहम पॉमुक समेत दुनिया भर के करीब एक सौ तीस बुद्धिजीवियों ने बयान जारी किया । उनके बयान के शब्दों से साफ है कि उन्हें किस बात से दिक्कत है । अमेरिका, कनाडा, यू के समेत कई देशों के प्रोफेसरों ने इस बात पर आपत्ति जताई है कि भारत की मौजूदा सरकार असहिष्णुता और बहुलतावादी संस्कृति पर हमला कर रही है । उन्होंने जेएनयू में कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को शर्मनाक घटना करार दिया है । अब नोम चोमस्की की प्रतिबद्धता तो सबको मालूम ही है । इन शिक्षाविदों ने जिस तरह की भाषा लिखी है वो उनके पूर्वग्रह को साफ तौर पर सामने लाता है । इस बयान में लिखा है कि जेएनयू परिसर में कुछ लोगों ने , जिनकी पहचान विश्वविद्यालय के छात्र के तौर पर नहीं हो सकी है, कश्मीर में भारतीय सेना की ज्यादतियों के खिलाफ नारेबाजी की । नोम चोमस्की को शायद ये ब्रीफ नहीं दिया गया कि वहां भारत की बर्बादी के भी नारे लगाए गए थे । इनमें से सभी प्रोफेसरों से ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि अपने बयान में उन्होंने ये बात किस आधार पर कही कि भारत की बर्बादी और कश्मीर की आजादी का नारा लगानेवाले जेएनयू के छात्र नहीं थे । क्या उमर खालिद के बारे में उनको जानकारी नहीं है । लेकिन उनको तो अपनी विचारधारा की रक्षा में खड़ा होना है । इस स्तंभ में पहले भी इस बात की ओर इशारा किया गया था कि एक ही वक्त पर कश्मीर से लेकर जेएनयू और दिल्ली के प्रेस क्लब में अफजल को हीरो बनाने की कोशिश के पीछे की मंशा को उजागर किया जाना चाहिए ।  

Sunday, February 14, 2016

बार-बार बेनकाब वामपंथी

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकवादी अफजल गुरू को लेकर किए गए एक सेमिनार ने मार्क्सवादियों के मंसूबों को एक बार फिर से उघाड़ कर रख दिया है । वामपंथियों का गढ़ माने जानेवाले जवाहरलाल युनिवर्सिटी में आतंकवादी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने को विषय बनाकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए। इसके अलावा वहां आजाद कश्मीर के पक्ष में भी जमकर नारेबाजी हुई । खबर आने के तीन दिन बाद दिल्ली पुलिस नींद से जागी और धरपकड़ शुरु हुई । युनिवर्सिटी के छात्र संघ के अध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया । इसके अलावा दिल्ली के प्रेस क्लब में भी इसी तरह की एक गोष्ठी हुई जिसमें भारत विरोधी नारे लगे । यहां भी केंद्र में अफजल गुरू ही था । उसके अलावा कश्मीर में भी अफजल गुरू के नाम पर कार्यक्रम आदि हुए जहां आजाद कश्मीर की बात की गई और भारत विरोधी नारे लगे । कश्मीर में तो पहले भी भाड़े के आतंकवादियों ने इस तरह की हरकतें की हैं लेकिन चिंता की बात है कि इस तरह के वाकयात कश्मीर से निकलकर दिल्ली तक पहुंच गए हैं । क्या इन आयोजनों को कोई एक सूत्र संचालित कर रहा है । क्या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश है । क्या इस तरह के आयोजनों की आड़ में भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने की गहरी साजिश रची जा रही है । जांच एजेंसियों को इस बात की भी पड़ताल करनी चाहिए । यह पड़ताल इसलिए भी आवश्यक है कि जेएनयू में जिस तरह से अफजल गुरू और कश्मीर की आजादी के समर्थनमें नारे लगे उसके पाकिस्तान में बैठा आतंकी सरगना हाफिज सईद के नाम से एक ट्वीट भी सामने आया जिसमें इसका समर्थन किया गया । इस बात का पता लगना भी आवश्यक है कि इन कार्यक्रमों की फंडिंग कहां से हो रही है । इस तरह के आयोजनों से जुड़े तमाम लोगों के अतीत को भी खंगालने की आवश्यकता है । इनमें से कई लोग तो वो भी भी हैं जिन्होंने भारत के असहिष्णु होने की आवाज उठाई थी । प्रेस क्लब के सेमिनार हॉल की बुकिंग करवाने वाले अली जावेद तो साहित्य अकादमी के बाहर जुलूस में भी दिखे थे । इन सारे सूत्रों को मिलाकर जांच की जानी चाहिए कि क्या भारत या भारत सरकार को बदनाम करने के लिए कोई संगठन या ग्रुप सक्रिय तो नहीं है । क्या कोई सरगना कहीं दूर बैठकर इन सारे कार्यक्रमों को हवा तो नहीं दे रहा है । पड़ताल इस बात की भी होनी चाहिए कि जब से गैर सरकारी संगठनों की फंडिंग पर भारत सरकार ने सख्ती दिखाई है तब से ही इस तरह के वाकयात क्यों सामने आ रहे हैं । यह पूरा मसला हिंदू या मुसलमान का नहीं है बल्कि ये मामला राष्ट्रवादी और देशद्रोहियों के बीच का है ।
जेएनयू में आतंकवादी अफजल गुरू के के ‘ज्यूडिशियल किलिंग’ के नाम पर जिस तरह से भारत के खिलाफ जंग की बातें की गई उसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कवच नहीं पहनाया जा सकता है । हमारा संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी जरूर देता है लेकिन वही संविधान इस अधिकार की सीमा भी तय करता है । किसी को भी, मतलब किसी को भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के खिलाफ बगावत के लिए उकसाने या उसके लिए माहौल बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है । उन लोगों की मंशा पर भी सवाल खड़े किए जाने चाहिए जो इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखने की कोशिश कर रहे हैं । देशद्रोहियों को देशद्रोही कहना ही होगा । ‘भारत की बर्बादी’ के नारों के समर्थन में किसी तरह की बात करनेवालों को भी देशद्रोहियों की श्रेणी में रखना ही होगा । वो लाख चीखें लेकिन उनके नापाक मंसूबों को बेनकाब करने का वक्त आ गया है । इसको जेएनयू की अस्मिता और गौरवशाली अतीत से जोड़कर देखनेवाले भी सामने आने शुरु हो गए हैं । छात्र संघ के अध्यक्ष की गिरफ्तारी और युनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस के प्रवेश को लेकर भी बयानबाजी शुरू हो गई है । ऐसा करनेवाले ललबबुआओं को ये समझना होगा कि देश से बड़ा कोई संस्थान नहीं होता और जहां देश की बर्बादी की बात की जाए वहां पुलिस के जाने से रोकना भी देशद्रोह है । यह अच्छी बात है कि वामपंथियों ने इस बार जेएनयू में जो हुआ उसकी निंदा की परंतु उन्होंने उस निंदा के साथ लेकिन शब्द जोड़कर अपनी राजनीति को बढ़ाने की भी कोशिश की । वो जेएनयू के बारे में या उसके अतीत के बारे में इस तरह की बातें कर रहे हैं जैसे कि वो उनकी मिल्कियत रही हो और अपनी मिल्कियत पर शासन के दौरान जो अच्छे काम किए गए उसका इश्तेहार चस्पां कर रहे हों । अतीत में की गई कथित अच्छाई की आड़ में मिल्कियत पर आए खतरे के लिए बुक्का फाड़कर रो रहे हों । बजाए इस बात के उनको देशद्रोहियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जांच की मांग करनी चाहिए थी ।
वामपंथियों की आस्था दरअसल कभी राष्ट्र में कभी रही ही नहीं । एक छोटा सा उदाहरण – हमारे देश में सक्रिय राजनीतिक पार्टियों के नाम देखें । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल आदि लेकिन जरा वामपंथी पार्टियों के नाम पर नजर डालें – भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी ) । ये क्यों । क्योंकि इनको भारत से या किसी भी राष्ट्र से कुछ लेना देना नहीं है । ये खुद को भारत में काम करनेवाली कम्युनिस्ट पार्टी मानती हैं । राष्ट्रवाद इनके सिद्धातों में है ही नहीं । उन्नीस सौ बासठ में जब भारत और चीन में युद्ध हुआ था तब भी वामपंथियों ने ये प्रचारित किया था कि बुर्जुआ नेहरू ही हमलावर थे । 1962 का प्रसंग आते ही अब भी वामपंथी खामोश हो जाते हैं । चीन को दोष देना उनके बूते से बाहर है । सिद्धांत से तो है  ही । कम्युनिस्टों को आपसी बहस आदि में राष्ट्रवादी शब्द अपमानजनक लगता रहा है, वो लोग राष्ट्रवाद को दोष मानते हैं या कालांतर में उन्होंने राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से जोड़ दिया । उनके आका मार्क्स भी मानते थे कि मजदूरों का कोई देश नहीं होता और जब देश ही नहीं होता तो देश भक्ति या राष्ट्रभक्ति उनके लिए छद्म या छलावा है । यहां यह बताना जरूरी है कि लेनिन ने भी उन्नीस सौ उन्नीस में कोमिंटर्न यानि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल बनाया था क्योंकि तब उनका मानना था कि यूरोप के कम्युनिस्ट अपने पथ से भटक गए हैं । जेएनयू के मामले में भी कम्युनिस्टों का रवैया कुछ उसी तरह का रहा है । कम्युनिस्ट हमेशा से भारत को देश नहीं बल्कि कई राष्ट्रीयताओं का झुंड मानते रहे हैं । यहां तक कि पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री रहे अशोक मित्रा ने भी कश्मीर की आजादी को लेकर एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा था । हम अगर इस बात पर गहराई से विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि राष्ट्रवाद में निष्ठा नहीं होने की वजह से ही कम्युनिस्टों का पूरी दुनिया में ये हश्र हुआ है और वो हाशिए पर चले गए। अब भी वो मार्क्सवाद के रोमांटिसिज्म में जी रहे हैं और दुनिया के एक होने का सपना देख रहे हैं । लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए वो ये मानते हैं कि – पॉवर ग्रोज़ आउट ऑफ द बैरल ऑफ अ गन । तो यह बात साफ है कि कम्युनिस्ट पूरी दुनिया में सत्ता हासिल करने के लिए तमाम तरह के षडयंत्र आदि में लिप्त रहे हैं और अब भी कोशिश करते रहे हैं ।
राष्ट्रवाद भारत की आजादी की लड़ाई लड़नेवाली कांग्रेस पार्टी के खाते में था लेकिन वामपंथियों के प्रभाव में धीरे-धीरे उन्होंने राष्ट्रवाद को प्लेट में सजाकर भारतीय जनता पार्टी को सौंप दिया । कांग्रेस हमेशा से लेफ्ट टू सेंटर की विचारधारा की पोषक रही है । जिस पार्टी ने आजादी की लड़ाई में देश की अगुवाई की आज उसके हाथ से राष्ट्रवाद का मुद्दा निकल गया है । कांग्रेस पार्टी को इस बात पर आत्ममंथन करना होगा कि ऐसा क्योंकर हुआ । भारत में आतंकवादियों के पक्ष में एकजुट होनेवाले लोग भारत की बर्बादी का दिवास्वप्न भले ही देख रहे हों लेकिन उनको ये समझना होगा कि हमारा महान देश किसी विचारधाऱा का या किसी वाद या संपद्राय का मोहताज नहीं है इसके सहिष्णु नागरिक ही इसकी ताकत हैं । भारत की बर्बादी का सपना देखनेवालों का हश्र पूरी दुनिया ने देखा है । जो पाकिस्तान दिन रात भारत का सपना देखता है वहां की हालत देख लीजिए । भारत से अलग होने के बाद वो एक बार फिर से टूटा, आतंक को पनाह देकर भारत को बर्बाद करने का सपना देखनेवाला पाकिस्तान आज खुद बर्बादी के ज्वालामुखी पर खड़ा है । हमारे देश की बहुलता को बदनाम करनेवाले लोग इतिहास के साथ दफन होते चले गए और भारत आज भी सीना ताने खड़ा है । हां इतना अवश्य करना चाहिए कि भारत की सरजमीं पर कोई अगर इसको बर्बाद करने का सपना देखे तो उसको उसकी सही जगह पर पहुंचा देना चाहिए ।  


Friday, February 21, 2014

कलंकित पेशा, शर्मसार समाज

दिल्ली में जिस वक्त एक पूर्वोत्तर के छात्र की कथित पिटाई से मौत पर बवाल मचा हुआ था उसी वक्त पूर्वोत्तर से एक ऐसी खबर आई जो शर्मनाक होने के साथ साथ समाज को चिंतित करनेवाली थी । दिल्ली में पूर्वोत्तर की छात्र की मौत का मामला इतना तूल पकड़ा कि उसके कोलाहल में ये खबर दब कर रह गई ।  पूर्वोत्तर के ही एक विश्वविद्यालय की शोध छात्रा ने अपने शोध निर्देशक की हरकतों से तंग आकर खुदकुशी कर ली। खबरों के मुताबिक शोध निर्देशक छात्रा के साथ अश्लील हरकतें करता था और छात्रा के विरोध के बाद उसको तरह तरह से तंग करता था । इस तरह का वाकया भारत की गुरु शिष्य परंपरा पर कलंक है, हमारे समाज पर बदनुमा धब्बा है । दरअसल हाल के दिनों में पूरे देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से इस तरह की बेचैन करनेवाली खबरें नियमित अंतराल पर आती रहती हैं । चाहे वो दिल्ली विश्वविद्यालय हो या फिर देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली का ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय । हर जगह से छात्राओं के यौन शोषण की खबरों के आरोप शिक्षक पर लगते रहे हैं। विश्वविद्यालय की जांच में बहुधा शिक्षक दोषी पाए जाते रहे हैं और उनपर कार्रवाई भी होती है। कई बार जुर्माना और पदावनति तो कई बार शिक्षकों को मुअत्तल तक किया जाता रहा है । दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को तो इस तरह के आरोप में अपनी नौकरी तक गंवानी पड़ी । उनको अदालत से भी राहत नहीं मिली ।  सवाल नौकरी जाने या सजा मिलने का नहीं है सवाल है कि शिक्षा के संस्थानों में ऐसी कुत्सित मानसिकता वाले लोगों की बढ़ती संख्या और कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यौन शोषण की बढ़ती घटनाएं ।
हमारे समाज में आदिकाल से गुरु को भगवान से उपर का दर्जा प्राप्त है । गुरू को ब्रहमा, विष्णु और महेश तक कहा गया है । कहा तो  भी गया है कि गुरू भगवान से भी ऊपर होते हैं । याद कीजिए – गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारि वा गुरू की जिमि गोविंद दियो बताय । मतलब यह कि अगर गुरु और भगवान दोनों साथ खड़े हों तो पहले गुरु को प्रणाम करूंगा क्योंकि गुरु ने ही तो भगवान के बारे में बताया है । उस देश में जहां गुरू को इतना ऊंचा दर्जा हासिल है वहां अगर कोई भी शिक्षक अपनी छात्रा के साथ यौन शोषण करता या करने की कोशिश करता है तो वो अक्षम्य अपराध है, समाज को कलंकित करनेवाला अपराध, भरोसे का कत्ल करने का अपराध, मान्यताओं को धराशायी करने का अपराध। इस तरह के अपराध या घिनौनी करतूतों की सजा पदावनति या नौकरी से बर्खास्तगी नहीं हो सकती है । जिस छात्रा को के साथ किसी शिक्षक ने बदसलूकी की है उसकी मानसिक स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । लेकिन इस तरह के ज्यादातर मामलों में ये देखा गया है कि आरोपी शिक्षकों को मामूली सजा देकर यौन शोषण के मामले को रफा दफा कर दिया जाता है । होना यह चाहिए कि इस तरह के अपराध के लिए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान हो । दिल्ली में निर्भया गैंगरेप के बाद बने कानून के तहत उनपर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि गुरू-छात्र के बीच के भरोसे के रिश्ते को कोई कलंकित करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सके । इस कानून क बनानेवाले स्वर्गीय जस्टिस जे एस वर्मा ने इस तरह के अपराध पर विस्तार से विचार किया है । लेकिन हमारे यहां की सरकारें छात्राओं के यौन शोषण के मामलों को लेकर संवेदनशील नहीं हैं । निर्भया गैंगरेप के पहले केंद्र सरकार ने कार्यस्थल पर यौन शोषण का एक बिल सितंबर दो हजार बारह में लोकसभा में पेश किया था । संवेदनहीनता इतनी कि इस बिल पर व्यापक चर्चा तक नहीं की गई थी । निर्भया गैंगरेप के बाद देशभर में उठे जनज्वार ने सरकार को फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया ।
 दरअसल इन मामलों में होता यह है कि छात्रा जब भी अपने यौन शोषण की शिकायत करती है तो विश्वविद्यालय शिकायत की जांच के लिए एक कमेटी बना देती है । यौन शोषण का केस सामने आने के बाद विशाखा गाइडलाइंस के मुताबिक विश्वविद्यालय के ही कर्मचारियों की कमेटी बनाई जाती है जिसमें आधी सदस्य महिलाएं होती हैं, इसके अलावा महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ काम करनेवाली गैर सरकारी संस्था का भी एक सदस्य इस कमेटी में होता है ।  विशाखा गाइडलाइंस के मुताबिक ऐसे मामलों में सबसे पहले भारतीय दंडविधान की धाराओं के अंतर्गत सक्षम अधिकारियों के पास मामला दर्ज करवाना होता है । लेकिन हमारे देश के विश्वविद्यालयों में ये देखा जाता है कि यौन शोषण का केस दर्ज करवाने के पहले एक इंटरनल कमेटी से उसकी जांच करवाई जाती है । अब जबकि नए कानून के मुताबिक यौन शोषण और बलात्कार की परिभाषा बदल गई है तो जरूरत इस बात की है कि मामला के सामने आने के बाद फौरन बाद आरोपी के खिलाफ केस दर्ज हो और कानून के हिसाब से कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो । ताकि फिर हम गर्व से कह सकें – गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुर देवो महेश्वर: ।