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Saturday, November 30, 2024

आरंभिक भारतीय फिल्मों से बदलेगा इतिहास


गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जानेवालों की अपेक्षा होती है कि उनको कुछ बेहतरीन विदेशी फिल्में देखने को मिल जाएं। वहां पहुंचने वाले सिनेमाप्रेमी फेस्टिवल के शेड्यूल में से अपनी पसंद की फिल्में तलाशते और उसपर चर्चा करते नजर आते हैं। हाल ही में गोवा में समाप्त हुए फिल्म फेस्टिवल में सात भारतीय क्लासिक फिल्मों को भी नेशनल फिल्म आर्काइव आफ इंडिया ने रिस्टोर (मूल जैसा बनाया) किया। इन फिल्मों का प्रदर्शन फेस्टिवल के दौरान हुआ। इन फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया लेकिन सबसे अधिक रोमांच तो दादा साहब फाल्के की 1919 में बनाई गई फिल्म कालिया मर्दन को देखते समय हुआ। दादा साहब फाल्के ने 1919 में जब इस फिल्म का निर्माण किया था तो बाल कृष्ण की भूमिका उनकी बेटी मंदाकिनी फाल्के ने की थी। ये मूक फिल्म थी। करीब 50 मिनट की इस फिल्म को लाइव संगीत के साथ प्रदर्शित किया गया। उन 50 मिनट में दर्शक मूक फिल्मों के दौर में चले गए थे। जहां पर्दे पर पात्र अपने हाव भाव से दृष्य को जीवंत करते थे और पर्दे के नीचे या साथ बैठे साजिंदे अपने वाद्ययंत्रों से संगीत देकर उन दृष्यों में रोचकता पैदा करते थे। कालिया मर्दन फिल्म में जब नदी में खेल रहे बाल कृष्ण को महिलाएं गोद में लेकर ऊपर उठातीं तो हाल में बैठे आर्केस्ट्रा से निकलने वाला संगीत गजब का प्रभाव पैदा करता था। पर्दे पर जब बाल कृष्ण बांसुरी बजाते तो हाल में बैठा बांसुरी वादक वैसे ही धुन निकालता। 

एक बेहद ही मजेदार दृष्य है इस फिल्म है। कृष्ण और उनके बाल सखा को गांव की एक महिला अपमानित करती है। उन शरारती बच्चों पर पानी फेंक देती है। इससे कृष्ण जी क्षुब्ध हो जाते हैं। अपने साथियों के साथ उस महिला के घर में घुसकर माखन चोरी कर लेते हैं। माखन चोरी से क्रोधित वो महिला कृष्ण के साथियों को पीट देती है। अपमानित बालकों ने महिला से बदला देने की ठानी। एक रात कृष्ण जी उनके घर में घुस जाते हैं। महिला अपने पति के साथ सो रही होती है। नटखट कृष्ण ने सोते हुए पुरुष की दाढ़ी और महिला के बाल आपस में बांध दिए। बाद में जब वो उस कमरे से निकलने का प्रयास करते हैं तो असफल हो जाते हैं। बाल कृष्ण की बदमाशियों को दादा साहब फाल्के ने जिस खूबसूरती के साथ दिखाया है कि आज भी दर्शक आनंदित हो उठते हैं। उनको ये याद ही नहीं रहता है कि इस लंबे दृष्य में किसी तरह का कोई संवाद नहीं है। है तो सिर्फ पार्श्व संगीत। फेस्टिवल के समापन समारोह में रमेश सिप्पी ने इस बात को रेखांकित किया कि आज से 105 वर्ष पहले बनी फिल्म कितनी सुंदर थी और किस तरह से उसमें कहानी को आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने फिल्म के कैमरा वर्क की प्रशंसा भी की। यह अनायस नहीं है कि दादा साहब फाल्के को भारतीय फिल्म जगत का पितामह कहा जाता है। इसके अलावा राज कपूर की मास्टरपीस फिल्म आवारा, देवानंद कि हम दोनों, तपन सिन्हा की हारमोनियम, ए नागेश्वर राव की तेलुगु फिल्म देवदासु और सत्यजित राय की सीमाबद्ध और ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिन्दुस्तानी को भी रिस्टोर करके दिखाया गया। नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के अंतर्गत इन फिल्मों पर काम हुआ। यह कार्य महत्वपूर्ण है। 

हम वापस लौटते हैं फिल्म कालिया मर्दन की ओर। आज से 105 वर्ष पहले बनी इस फिल्म के केंद्र में श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप है। उस दौर में जितनी भी फिल्में बन रही थीं सभी भारतीय पौराणिक कथाओं और पात्रों पर आधारित थीं। दादा साहब फाल्के की पत्नी ने उनको कृष्ण के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए उनकी पत्नी ने अपने गहने गिरवी रखे। उससे मिले पैसे को लेकर फाल्के लंदन गए और वहां से सिनेमैटोग्राफी सीखकर वापस लौटे। अब उनके सामने अपने सपने को साकार करने की चुनौती थी। उन्होंने पहले कृष्ण और फिर राम पर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन संसाधन के अभाव में उसको छोड़ना पड़ा। फिर राजा हरिश्चंद्र की कहानी पर काम आरंभ किया। विज्ञापन के बावजूद कोई महिला इस फिल्म में अभिनय के लिए तैयार नहीं हो रही थी। निराशा बढ़ती जा रही थी। पास की दुकान में चाय पीने गए। वहां चायवाले लड़के, सालुंके, पर उनकी नजर पड़ी और उस लड़के को तारामती के रोल के लिए तैयार किया गया। इस तरह भारतीय फिल्म में एक पुरुष ने पहली अभिनेत्री का रोल किया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म बन गई। 3 मई 1913 को बांबे के कोरोनेशन हॉल में उसका प्रदर्शन हुआ। फिल्म लगातार 12 दिन चली। 1914 में लंदन में प्रदर्शित हुई। इनकी दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में नाटकों में काम करनेवाली कमलाबाई गोखले ने अभिनय किया। कमला बाई को फिल्म में अभिनय के लिए उस वक्त फाल्के साहब ने आठ तोला सोना, दो हजार रुपए और चार साड़ियां दी थीं। इसके बाद इन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ बनाई। कहते हैं कि इस फिल्म ने इतनी कमाई की कि टिकटों की बिक्री से जमा होनेवाले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था। सफलता के बाद इनको फाइनेंसर मिल गया। उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। इसी फिल्म कंपनी से दादा साहब फाल्के ने कालिया मर्दन फिल्म का निर्माण किया। फाल्के साहब ने अपने जीवन काल में करीब 900 लघु फिल्में और 20 फीचर फिल्में बनाईं। भारतीय सिनेमा के शोधार्थियों को इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि दादा साहब फाल्के भारतीय पौऱाणिक पात्रो को लेकर ही फिल्में क्यों बनाते रहे। 

जिस तरह से नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के अंतर्गत पुरानी भारतीय फिल्मों को रिस्टोर करने का कार्य हो रहा है, उसको और बढ़ाने और भारतीय दर्शकों तक पहुंचाने की आवश्यकता है। स्वाधीनता के बाद फिल्मी दुनिया में कई ऐसे निर्माता निर्देशक आए जिन्होंने जो वामपंथी विचार के प्रभाव वाले थे। स्वाधीनता के बाद तत्कालीन भारत सरकार फिल्मी जगत के लोगों को सोवियत रूस भेजकर उनके प्रभाव में आने का रास्ता खोल रही थी। अनके पुस्तकों और दस्तावेजों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि किस तरह से सोवियत रूस ने अपने विचारों को भारत में फैलाने के लिए फिल्म और साहित्य जगत का उपयोग किया और सफलता भी प्राप्त की। रूस को सफलता इस कारण मिली क्योंकि उस समय भारत सरकार का सहयोग उनको प्राप्त था। गीतों से लेकर संवाद में पूंजी और पूंजीपतियों पर परोक्ष रूप से हमले शुरु हो गए थे। जमींदारों से लेकर पैसेवालों को बुरा आदमी दिखाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी थी। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास हुआ। कहा जाता है कि उस समय से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी परोक्ष समर्थन इस कार्य के लिए था। अगर नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन अपने काम में तेजी लाती है, इसको सरकार की तरफ से उचित संसाधन उपलब्ध होता है तो संभव है कि आनेवाले दिनों में भारतीय फिल्मों के इतिहास को फिर से लिखने की आवश्यकता पड़े। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में भारतीय फिल्मों की प्रवृत्तियों पर जो कार्य हो रहे हैं उनकी भी दिशा बदल सकती है।    


Friday, May 3, 2024

फिल्म फेस्टिवल की रोचक कथा


कोरोना महामारी के दौरान फिल्मों के भविष्य को लेकर खूब चर्चा हुई। फिल्म के कई विशेषज्ञों ने सिनेमा हाल में फिल्मों के प्रदर्शन के अंत की आशंका भी जताई थी। इस तरह की तमाम आशंकाएं गलत साबित हुईं और भारतीय फिल्में न केवल पहले की तरह लोकप्रिय हुईं बल्कि पूरे देश में फिल्म संस्कृति और गाढ़ी हुई। फिल्मों की संस्कृति को मजबूत करने में फिल्म फेस्टिवल्स का बड़ा योगदान रहा है। दिल्ली में कई फिल्म फेस्टिवल्स होते रहे हैं। विश्व का सबसे बड़ा घुमंतू फिल्म फेस्टिवल का आयोजन पिछले ग्यारह वर्षों से दैनिक जागरण करता रहा है। जागरण फिल्म फेस्टिवल का आरंभ दिल्ली से होता है और देश के 18 शहरों में आयोजित होता है। दिल्ली में ओशियान फिल्म फेस्टिवल भी होता था। बीते कल (शुक्रवार) से दिल्ली में हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल का आरंभ हुआ है। गोवा में आयोजित होनेवाला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (इफी) की शुरुआत मुंबई में हुई थी लेकिन उसी वर्ष दिल्ली में भी इसका आयोजन किया गया था। तब इस फेस्टिवल का आयोजन भारत सरकार के फिल्म प्रभाग ने किया था। दिल्ली में अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल शुरु होने की भी एक दिलचस्प कहानी है। जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके करीब एक वर्ष बाद 1948 में भारत सरकार ने फिल्म प्रभाग की स्थापना की थी। तब इसका काम भारत सरकार से जुड़े कार्यों के बारे में जनता को बताना था। महेन्द्र मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय सिनेमा’ में लिखा है, ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म्स डिवीजन की स्थापना 1948 में हुई। फिल्म्स डिवीजन उस समय शायद दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक केंद्र था जिसमें समाचार और अन्य राष्ट्रीय विषयों पर वृत्तचित्र बनाए जाते थे। ये वृत्तचित्र, समाचार चित्र और लघु फिल्में पूरे देश में प्रदर्शन के लिए बनती थीं। प्रत्येक फिल्म की नौ हजार प्रतियां बनती थीं जिनकी संख्या कभी कभी चालीस हजार तक पहुंच जाती थीं। ये भारत की तेरह प्रमुख भाषाओं और अंग्रेजी में पूरे देश में सभी सिनेमाहॉलों में मुफ्त प्रदर्शित की जाती थीं। समाचार चित्रों और लघु फिल्मों एवं वृत्तचित्रों का परोक्ष रूप से दर्शकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने उनकी रुचि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।‘ 

फिल्म प्रभाग के चीफ प्रोड्यूसर थे मोहन भवनानी। वो दिल्ली में ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय के कार्यालय में बैठते थे। मोहन भवनानी जून 1951 में फिल्म विशेषज्ञों के एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पेरिस गए थे। ये कार्यक्रम यूनेस्को ने आयोजित किया था। उस कार्यक्रम में फिल्म फेस्टिवल के आयोजनों और उसके प्रभाव पर जमकर चर्चा हुई थी। वहां से लौटकर मोहन भवनानी ने भारत सरकार को फिल्म फेस्टिवल के आयोजन संबंधी एक प्रस्ताव दिया। उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया। उस समय तय ये किया गया था कि फिल्म फेस्टिवल का आयोजन देश के चार शहरों- बांबे (अब मुंबई), दिल्ली, कलकत्ता (अब कोलकाता) और मद्रास (अब चेन्नई) में करवाने का निर्णय हुआ। तय ये किया गया कि इनमें देशी विदेशी दोनों फिल्में दिखाई जाएंगी। दिल्ली में इस आयोजन को लेकर काफी तैयारियां की गई थीं। फिल्मी सितारों ने नईदिल्ली इलाके में रोडशो किया था। सितारों को देखने के लिए दिल्ली की सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ी थी। कहीं-कहीं इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजकपूर और नरगिस के अलावा भी कुछ कलाकारों ने दिल्ली में आयोजित प्रथम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भाग लिया था। दिल्ली में उस समय सिनेमाघरों की संख्या कम थी इस कारण कई जगहों पर अस्थायी टेंट लगाकर सिनेमाघर बनाए गए थे और प्रोजोक्टर पर फिल्में दिखाई गई थीं। दिल्ली में चार हजार दर्शकों के लिए अस्थायी सिनेमाघर तैयार किए गए थे। 21 फरवरी 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में आयोजित फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ किया था। इस समारोह में भाग लेनेवाले कलाकारों के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में विशेष भोज का आयोजन किया था और बताया जाता है कि राजेन्द्र बाबू पूरे समय उपस्थित रहे थे। उन्होंने दुनियाभऱ में फिल्मों के ट्रेंड के बारे में कलाकारों से बातचीत की थी। इस रात्रिभोज में उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री आर आर दिवाकर भी उपस्थित थे।

दिल्ली में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में अमेरिका, इटली, फ्रांस और रूस समेत 23 देशों के फिल्मकारों ने भाग लिया था। अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मशहूर निर्देशक फ्रैंक कैपरा ने किया था। इसमें 40 फीचर फिल्में और करीब 100 गैर फीचर फिल्में प्रदर्शित की गई थीं। दिल्ली के दर्शकों ने इटली की फिल्म बायसकिल थीब्स, मिरेकल इन मिलान और ओपन सिटी को खूब पसंद किया था। इस फिल्म फेस्टिवल में ही जापान के प्रख्यात फिल्म निर्देशक अकीरा कुरोसावा की फिल्म राशोमन भी दिखाई गई थी। कहा जाता है कि पहले फिल्म फेस्टिवल में ही बिमल राय ने इटली की फिल्म बायसकिल थीब्स देखने के बाद ही उनके मन में दो बीघा जमीन बनाने का आयडिया आया। कहा तो ये भी जाता है कि इस फिल्म ने ही भारतीय फिल्मकारों को यथार्थवादी फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। 

1952 में आयोजित फिल्म फेस्टिवल के बाद अपने देश में विदेशी फिल्मों को लेकर रुचि जाग्रत हुई। कई अन्य देशों के फिल्मों से परिचय होना आरंभ हुआ। अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की उस समय काफी चर्चा हुई थी, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी दिल्ली के आयोजन में उपस्थित थे। बावजूद इसके दूसरे आयोजन में नौ वर्ष लगे और अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का दूसरा संस्करण 1961 में आयोजित हो सका। फिल्म फेस्टिवल का दूसरा संस्करण नईदिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित किया था। चार वर्षों के बाद फिर फेस्टिवल का आयोजन हुआ। फिर चार वर्षों के अंतराल पर दिल्ली के अशोक होटल में इसका आयोजन हुआ। इसके बाद फिल्म फेस्टिवल का आयोजन तीन चार वर्षों के अंतराल पर होता रहा। 1983 में अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन दिल्ली के सीरीफोर्ट आडिटोरियम में हुआ था।  फिल्म फेस्टिवल देश के अलग अलग शहरों में हो रहा था। लंबे अंतराल के बाद दिल्ली में होता था तो दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता रहती थी। दिल्ली में भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का 34वां संस्करण अक्तूबर 2003 में आयोजित किया गया था। इसके बाद से केंद्र सरकार ने निर्णय लिया और अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल को प्रतिवर्ष गोवा में आयोजित किया जाएगा। तब से गोवा में आयोजित हो रहा है। दिल्ली में जागरण फिल्म फेस्टिवल, हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल और आईआईसी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है जिसमें दर्शकों को क्षेत्रीय और विदेशी फिल्में देखना का अवसर मिल जाता है।   

Saturday, December 3, 2022

विवाद का कारण बनते गुलामी के चिह्न


स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने पांच प्रण बताए थे। इसमें से एक प्रण गुलामी के चिह्नों को समाप्त करने का है। अमृत काल में अपेक्षा की गई कि इन पांच प्रण को आत्मसात किया जाए। प्रधानमंत्री ने जब गुलामी के चिह्नों को हटाने की बात की तो उनको इस बात का अंदाज होगा कि सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहने के कारण इसके चिह्न हमारे जीवन और सरकारी क्रियाकलापों में रच-बस गए हैं। उनको हटाना कठिन है। इसका ताजा उदाहरण है गोवा में आयोजित 53वें अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (इफ्फी) में विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स को लेकर उठा विवाद। अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन और इजरायल के फिल्मकार नादव लैपिड ने इस फिल्म को भद्दा और प्रोपगंडा फिल्म बताया। ये कहने के लिए उन्होंने इफ्फी के समापन समारोह के मंच का उपयोग किया। जहां उनके सामने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, कई मंत्री और जूरी के अन्य सदस्य उपस्थित थे। ये भी गुलामी के एक चिह्न के बने रहने के कारण ही हुआ। कैसे ? इसको समझने के लिए फिल्म समारोह के नियमों को देखते हैं। 

इस वर्ष फिल्म समारोह का आयोजन राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) ने किया। एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक की तरफ से जारी नियम के बिंदु संख्या 3 (1) में कहा गया है कि फीचर फिल्म के अंतराष्ट्रीय कंपटीशन में कुल 15 फिल्में होंगी। इनमें से तीन भारतीय फिल्में होंगी। फिक्शन फिल्म की अवधि 70 मिनट या उससे अधिक होनी चाहिए। इसी नियमावली के 4.4 में कहा गया है कि अंतराष्ट्रीय कंपटीशन के लिए एक जूरी होगी जिसमें चेयरमैन और कम से कम दो सदस्य या अधिकतम चार सदस्य होंगे। इसके अगले बिंदु में ये स्पष्ट किया गया है कि फिल्मों के बारे में जूरी का फैसला उपस्थित सदस्यों के सामान्य बहुमत के आधार पर होगा। जूरी फिल्मों की प्रविष्टियों के बारे में निर्णय लेने के लिए अपने नियम बना सकती है। इसी में आगे कहा गया है कि एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक और/या उनके प्रतिनिधि जूरी के साथ फिल्मों पर मंथन के दौरान उपस्थित रहेंगे, लेकिन उनको वोट देने का अधिकार नहीं होगा। अब इस पूरी नियमावली में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि अंतराष्ट्रीय जूरी का चेयरमैन कैसे नियुक्त किया जाता है। बताया जा रहा है कि इफ्फी के अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन का चयन एनएफडीसी करती है। इस वर्ष आयोजित मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, जिसका आयोजन भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत होता है, की अंतराष्ट्रीय जूरी का मैं सदस्य था। मेरे साथ इजरायल के डान वोलमैन, फ्रांस में बस गई ईरानी फिल्मकार मीना राड, फ्रांस के ही जेएन पियरे और भारत से नल्लामुत्थू सदस्य थे। इसमें सभी सदस्यों ने आम सहमति के आधार पर मीना राड का चुनाव जूरी के चेयरमैन के तौर पर किया था। इस पूरी प्रक्रिया और फिल्मों के चयन के दौरान फिल्म डिवीजन के एक सहयोगी निरंतर उपस्थित थे। सारी बातें सुन रहे थे और नोट्स भी ले रहे थे। जो नियमवाली थी उसमें भी ये स्पष्ट लिखा गया था कि सदस्य आम सहमति के आधार पर चेयरमैन का चयन करेंगे। किसी कारणवश अगर सहमति नहीं बन पाती है तो फेस्टिवल डायरेक्टर चेयरमैन की नियुक्ति करेगा। मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन भारतीय फिल्मकार भी होते रहे हैं। आमतौर पर वरिष्ठता को आधार बनाया जाता है।      

इफ्फी ने जो 53वें फिल्म फेस्टिवल के लिए नियमावली जारी की उसमें इस बात का भी उल्लेख नहीं है कि अंतराष्ट्रीय जूरी का सदस्य कोई भारतीय नहीं हो सकता है। लंबे समय से ये एक अलिखित सा नियम या कहें कि परंपरा चल रही है कि इंटरनेशनल जूरी का सदस्य कोई विदेशी फिल्मकार ही होगा। फिल्म फेस्टिवल में जब से अंतराष्ट्रीय जूरी बनने लगी होगी तब किसी ने कह या तय कर दिया होगा कि अंतराष्ट्रीय जूरी का सदस्य कोई विदेशी होगा। तब से ही ये चला आ रहा है। किसी ने इस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी। इस बर्ष भी यही हुआ होगा और फेस्टिवल डायरेक्टर ने किसी की अनुशंसा पर इजरायली फिल्मकार नादव लैपिड को चेयरमैन नियुक्त कर दिया होगा। यहां ये देखा जाना चाहिए कि किसने नादव लैपिड की अनुशंसा किसने की थी। इसी तरह की स्थितियों के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुलामी के चिह्न हटाने की बात अपने पांच प्रण में की थी।

इफ्फी की नियमावली में एक और बात लिखी हुई है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है कि फिल्मों पर जब जूरी के सदस्य मंथन करेंगे तो एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक या उनके प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे। अब यहां प्रश्न ये उठता है कि मंच से जो बात नादव लैपिड ने कही क्या उसपर मंथन के दौरान चर्चा नहीं हुई। उन्होंने तो एक साक्षात्कार में ये भी कहा कि स्पेन और फ्रांस के जूरी सदस्य से बात कर ली जाए वो भी इसी मत के थे। अंतराष्ट्रीय जूरी के एकमात्र भारतीय सदस्य सुदोप्तो सेन ये दावा कर रहे हैं कि नादव लैपिड ने जो मंच से बोला ये उनकी व्यक्तिगत राय है। एनएफडीसी को मंथन के दौरान उपस्थित अपने प्रतिनिधि से बात करनी चाहिए और सच की तह तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने मंथन के दौरान नोट्स लिए होंगे या जूरी के सदस्यों की राय भी दर्ज हुई होगी, उसको देखा जाना चाहिए कि उन्होंने क्या लिखकर दिया है। उससे राय स्पष्ट हो जाएगी। ऐसा क्यों हुआ इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आगे क्या किया जाए जिससे ऐसी अप्रिय घटनाएं न हों । एक तो जूरी चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया एकदम स्पष्ट हो और दूसरा जिनको बनाया जाए उनकी पृष्ठभूमि के बारे में भी चयनकर्ता या अनुशंसा करनेवाले को जानकारी हो। 

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इस वर्ष 4 जुलाई को 53वें इफ्फी के लिए मंत्री की अध्यक्षता में एक संचालन समिति का गठन किया था। इसमें कुल 26 सदस्य थे, जिनमें से 13 गैर सरकारी सदस्य थे। संचालन समिति के गठन के साथ ही इस समिति का उत्तरदायित्व और उसकी भूमिका तय की गई थी। इसमें 13वें बिंदु पर स्पष्ट है कि ये समिति इंटरनेशनल जूरी सदस्यों का चयन करेगी। गैर सरकारी सदस्यों में करण जौहर समेत कई बड़े नाम हैं। यह जानना दिलचस्प होगा कि जूरी के चयन में संचालन समिति के सदस्यों की कोई भूमिका थी या नहीं? अगर थी तो नादव लैपिड का नाम किसने सुझाया था। इफ्फी के लिए संचालन समिति को अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय करने की आवश्यकता है। कई नाम तो ऐसे हैं जो बस सूची में हैं। देखा जाना चाहिए कि सदस्यों की जो भूमिका और उत्तरदायित्व तय किए गए हैं उसको लेकर वो कितने गंभीर हैं। 

फिल्मों से जुड़े आयोजनों और पुरस्कारों के बारे में मंत्रालय को गंभीरता से विचार करना होगा। इनको पुराने ढर्रे पर चलते हुए काफी समय हो गया है। बदलते वक्त के साथ चलना होगा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। उसमें इतनी अधिक श्रेणियां और पुरस्कार हैं कि पुरस्कार वितरण समारोह काफी लंबा हो जाता है। इसको तर्कसंगत बनाना होगा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फीचर फिल्म और लेखन का पुरस्कार एक साथ कर देना चाहिए। गैर फीचर फिल्म और अन्य पुरस्कार को मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल से जोड़ देना चाहिए क्योंकि वो फेस्टिवल गैर-फीचर फिल्मों का ही है। फिल्म समारोहों के नियमों पर पुनर्विचार करके उसको स्पष्ट करना होगा। एक पूर्णकालिक फेस्टिवल निदेशक की नियुक्ति करनी होगी ताकि वो पूरे वर्ष फेस्टिवल को लेकर कार्ययोजना बनाकर अमल कर सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अह्वान के अनुसार जहां जहां गुलामी के चिह्न हैं उनको हटाने का प्रयास सरकारी स्तर पर भी करना होगा।

Saturday, November 6, 2021

चयन की पारदर्शिता पर उठे सवाल


फिल्मकारों और फिल्मों से जुड़ी एक संस्था है जिसका नाम है फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया (एफएफआई)। अन्य कामों के अलावा ये संस्था हमारे देश की उस फिल्म का चयन भी करती है जो आस्कर अवार्ड के लिए भेजी जाती है। आस्कर के लिए भेजी जानी वाली फिल्मों के चयन को लेकर बहुधा विवाद होते रहते हैं। इस वर्ष भी हुआ। इस वर्ष फिल्म फेडरेशन ने तमिल फिल्म ‘कुझंगल’ का चयन किया और हिंदी फिल्म ‘सरदार उधम’ को नहीं भेजा गया। तर्क ये दिया गया कि फिल्म सरदार उधम बहुत लंबी है और इसमें अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव दिखाया गया है। वैश्वीकरण के इस दौर में घृणा का ये भाव अपेक्षित नहीं है। किसी फिल्म को आस्कर में नहीं भेजने के ये कारण समझ से परे है। स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म शिंडलर्स लिस्ट जिसने आस्कर में कई पुरस्कार जीते थे वो तीन घंटे से अधिक अवधि की फिल्म है। इस फिल्म की लंबाई पर कभी आस्कर की जूरी ने सवाल नहीं उठाया। इस फिल्म को लेकर कभी प्रश्न नहीं उठा कि इसमें नाजियों का चित्रण आपत्तिजनक है। इसके अलावा फिल्म गान विद द विंड की लंबाई भी तीन घंटे अट्ठावन मिनट थी। फिल्म मेरा नाम जोकर की लंबाई के बारे में सबको ज्ञात ही  है। इस फिल्म की अवधि इतनी अधिक थी इसमें दो मध्यांतर थे। हमारे यहां से भी पूर्व में कई ऐसी फिल्में हैं जो आस्कर में भेजी जा चुकी है जो फिल्म सरदार उधम से लंबी है।  इसलिए एफएफआई की तरफ से जो तर्क दिए गए वो बचकाने तो हैं ही अपने देश के इतिहास को भी सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देखने के दोष का शिकार हो गया। जलियांवाला बाग नरसंहार का जब चित्रण होगा तो उसको इसी तरह से देखा जाएगा। दरअसल इस तरह की बचकानी दलीलों की वजह से एफएफआई की साख लगातार छीजती चली गई है। आज भले ही ये संस्था दावा करे कि वो भारतीय फिल्मकारों की प्रतिनिधि संस्था है लेकिन वर्तमान दौर के बड़े फिल्मकार या तो इससे जुड़े नहीं हैं या यहां सक्रिय नहीं हैं। भारत सरकार को इस संस्था को मान्यता पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।

आस्कर में भारतीय फिल्म की प्रविष्टि को लेकर विवाद अभी ठंडा भी हुआ नहीं था कि एक और विवाद सामने आ गया है। इसमें भी फिल्म फेडरेशन का नाम आ रहा है। ये विवाद उठा है गोवा में आयोजित होनेवाले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (आईआईएफआई) के दौरान दिखाई जाने वाली एक फिल्म डिक्शनरी को लेकर। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया का आयोजन गोवा में 20 से 28 नवंबर तक है। इसका आयोजन सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक संस्था फिल्म समारोह निदेशालय करती है। इस अंतराष्ट्रीय फेस्टिवल के दौरान इंडियन पैनोरमा के अंतर्गत दिखाई जानेवाली फिल्मों की सूची जारी की गई। इस सूची में आमतौर पर चौबीस फिल्में होती हैं जो फेस्टिवल के दौरान दिखाई जाती हैं। इन फिल्मों का चयन एक जूरी करती है। जूरी सदस्यों और अध्यक्ष का चयन फिल्म समारोह निदेशालय करती है। इस बार भी बारह सदस्यों की एक जूरी ने इंडियन पैनोरमा के तहत दिखाई जानेवाली फिल्मों का चयन किया। इस जूरी के अध्यक्ष कन्नड फिल्मकार एस वी राजेन्द्र सिंह बाबू थे। राजेन्द्र सिंह बाबू के बारे में बताते चलें कि उन्होंने पिछले चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार किया था। उनकी अध्यक्षता वाली जूरी ने 24 फिल्मों का चयन किया और अपनी संस्तुति फिल्म समारोह निदेशालय को भेज दी। जब निदेशालय ने इंडियन पेनोरामा के फिल्मों की घोषणा की तो उसमें 24 की जगह 25 फिल्मों के नाम थे। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार में मंत्री ब्रत्य बसु की फिल्म डिक्शनरी को इसमें शामिल किया गया। जब इस बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया ने एकमात्र इसी फिल्म की संस्तुति की थी और इंडियन पैनोरमा के नियमों के अंतर्गत फिल्म समारोह निदेशालय की आतंरिक समिति ने इस फिल्म का चयन किया। 

यहां तक तो सबकुछ सामान्य लगता है कि एफएफआई ने एकमात्र फिल्म की संस्तुति की और निदेशालय की समिति ने उसका चयन कर लिया। लेकिन इसके तह में जाने पर एक असामान्य कहानी सामने आई। ममता बनर्जी सरकार में मंत्री और फिल्मकार ब्रत्य बसु की फिल्म डिक्शनरी की प्रविष्टि इंडियन पैनोरमा के लिए आई थी। इंडियन पैनोरमा की जूरी ने आरंभिक दौर में ही इस फिल्म को देखकर उसको फेस्टिवल के दौरान प्रदर्शित करने योग्य नहीं पाया। इस बीच फिल्म फेडरेशन ने डिक्शनरी को लेकर अपनी संस्तुति फिल्म समारोह निदेशालय को भेज दी। निदेशालय की आतंरिक कमेटी ने इसका चयन कर 25 फिल्मों की सूची जारी कर दी। ये ज्ञात नहीं हो सका कि निदेशालय ने फिल्म फेडरेशन से ये बात जाननी चाही कि नहीं उनकी तरफ से एकमात्र फिल्म की संस्तुति ही क्यों आई, जबकि आमतौर पर वो पांच फिल्मों की संस्तुति करते हैं।  नतीजा यह हुआ कि एक ऐसी फिल्म जिसको जूरी ने रिजेक्ट कर दी थी वो प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों की सूची में आ गई। प्रश्न ये उठता है कि अगर इस तरह की कार्यप्रणाणी है तो फिर जूरी की राय का क्या अर्थ है? क्यों बीस पच्चीस दिन तक जूरी के सदस्य दो सौ बीस फिल्मों को देखकर उसमें से 24 फिल्मों का चयन करते हैं। हर फिल्म पर माथापच्ची होती है। फिल्म समारोह निदेशालय को इस पूरे प्रकरण पर स्थिति साफ करनी चाहिए। फिल्मों के चयन को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए अन्यथा चयन की प्रक्रिया से फिल्मकारों का विश्वास डिग जाएगा। 

इसके पहले भी फिल्म समारोह निदेशालय के फैसलों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2017 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में फिल्म एस दुर्गा और फिल्म न्यूड के प्रदर्शन को लेकर अच्छा खासा विवाद उठा था। फिल्म एस दुर्गा और फिल्म न्यूड को इंडियन पैनोरमा से बाहर करने के फैसले के खिलाफ जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि बिना उनको बताए इन फिल्मों को प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों की सूची से बाहर कर दिया गया । ऐसी अप्रिय स्थिति इस बार भी हो सकती है कि जूरी के अध्यक्ष या सदस्य इस बात को लेकर इस्तीफा दे दें कि उनकी राय के खिलाफ फिल्म का प्रदर्शन होने जा रहा है।  एस दुर्गा के प्रदर्शन को लेकर तो विवाद इतना बढ़ा था कि इस फिल्म के निर्माता सूचना और प्रसारण मंत्रालय के खिलाफ केरल हाईकोर्ट चले गए थे। उस वक्त भी फिल्म समारोह निदेशालय की कार्यपद्धति को लेकर सवाल उठे थे। अब एक बार फिर से नियमों की आड़ में एक ऐसी फिल्म को जोड़ा गया जिसको जूरी ने खारिज किया था। विवाद बढ़ने के बाद अगर निदेशालय इस फिल्म को सूची से हटाती भी है तो उससे एक राजनीतिक विवाद जन्म ले सकती है। ममता बनर्जी की पार्टी को भारतीय जनता पार्टी पर या मोदी सरकार पर निशाना साधने का एक मौका मिल जाएगा। वो ये आरोप लगा सकती हैं कि उनकी पार्टी के नेता की फिल्म को जानबूझकर हटा गया। एक ऐसा मुद्दा खड़ा हो सकता है जिसमें राजनीति नहीं है सिर्फ अफसरों की लापरवाही या कुछ और है। केंद्र सरकार ने कुछ दिनों पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्रालय की फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं के पुनर्गठन की बात की थी, अब वक्त आ गया है कि उस घोषणा पर अमल किया जाए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं का पुनर्गठन हो और नियमों को पारदर्शी बनाकर जिम्मेदारियां भी तय की जाएं ताकि भविष्य में विवाद न हों और फेस्टिवल की लोकप्रियता भी बढ़े। 

Monday, November 20, 2017

अराजक नहीं होती कलात्मक आजादी

गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के पहले विवाद की चिंगारी भड़काने की कोशिश की गई, जब दो फिल्मों को इंडियन पेमोरमा से बाहर करने पर जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया। दरअसल पूरा विवाद फिल्म ‘सेक्सी दुर्गा’ और ‘न्यूड’ को इंडियन पेनोरमा से बाहर करने पर शुरु हुआ है। जूरी के अध्यक्ष ने इस बिनाह पर इस्तीफा दे दिया कि उनके द्वारा चयनित फिल्म को बाहर कर दिया गया। ‘सेक्सी दुर्गा’ फिल्म के निर्माता इस पूरे मसले को लेकर केरल हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं और उन्होंने आरोप लगाया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने गैरकानूनी तरीके से उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोका है। लेकिन गोवा में आयोजित होनेवाले फिल्म फेस्टिवल से जुड़े लोगों के मुताबिक कहानी बिल्कुल अलहदा है। उनका कहना है कि जूरी ने बाइस फिल्मों के प्रदर्शन की संस्तुति कर दी जबकि नियम बीस फिल्मों के दिखाने का ही है। इस कारण दो फिल्म को बाहर करना ही था। यहां यह सवाल उठ सकता है कि इन दो फिल्मों को ही क्यों बाहर का रास्ता दिखाया गया। यह संयोग भी हो सकता है और अन्य वजह भी हो सकती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है।  
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के आयोजन से जुड़े लोगों ने एक बेहद दिलचस्प कहानी बताई। उनके मुताबिक ‘सेक्सी दुर्गा’ को मुंबई के एक फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन की इजाजत मंत्रालय ने नहीं दी थी और उनका नाम रिजेक्टेड फिल्मों की सूची में रखा गया था। बताया जाता है कि उसके बाद निर्माताओं ने इस फिल्म का नाम ‘एस दुर्गा’ रख दिया और सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लिया। जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सर्टिफिकेट दे दिया तो उसका प्रदर्शन मुंबई के फिल्म फेस्टिवल में हुआ। जब गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन की बारी आई तो अनसेंसर्ड फिल्म जूरी के पास भेजी गई। जूरी ने अपने विवेक से फैसला लेते हुए इस फिल्म को इंडियन पेनोरमा में सेलेक्ट कर लिया। जब ये बात खुली तो मंत्रालय ने इसको प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी। इस तरह की कई कहानियां इस फिल्म को लेकर चल रही हैं। अब चूंकि मामला अदालत में है तो सबको अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए। लेकिन जनता को ‘एस दुर्गा’ के नाम से फिल्म दिखाने का उपक्रम करना चालाकी ही तो है, पहले प्रचारित करो कि फिल्म का नाम ‘सेक्सी दुर्गा’ है और फिर उसको ‘एस दुर्गा’ कर दो। और फिर अपनी सुविधानुसार सरकार, आयोजक या अन्य संगठनों को कठघरे में खड़ा कर दो।
दूसरी फिल्म ‘न्यूड’ के बारे में कहा जा रहा है कि वो पूरी नहीं थी इसलिए भी उसके प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई। लेकिन फिल्म ‘न्यूड’ की कहानी को लेकर हिंदी की लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने बेहद संगीन इल्जाम लगाया है। मनीषा का आरोप है कि ‘न्यूड’ फिल्म की कहानी उनकी मशहूर कहानी ‘कालंदी’ की नकल है। उन्होंने लिखा कि- जिस ‘न्यूड’ फिल्म की चर्चा हम सुन रहे हैं, उन रवि जाधव जी से मेरा लंवा कम्युनिकेशन हुआ है। उनके स्क्रिप्ट राइटर कोई सचिन हैं। फिल्म की कहानी मेरी कहानी ‘कालंदी’ की स्टोरी लाइन पर है। जहां मेरी जमना का बेटा का फेमस फोटोग्राफर बनता है, वहां एक बिगड़ैल व्यक्ति बन जाता है। मेरी जमना की मां भी वेश्या है, पर वो वेश्या ना बनकर न्यूड मॉडल बनती है और उसका बेटा शक करता है कि मेरी मां भी किसी गलत धंधे में है। पीछा करता है, स्टूडियो में झांकता है, अपनी मां को न्यूड पोज में देखता है। प्रोफेसर है एक जो जमुना को सपोर्ट करता है। जब ये बना रहे थे तो मुझे पता चल गया था। मैंने रवि जाधव से संपर्क किया था। रवि जाधव पूरी चतुराई से ये बताने लगे कि जे जे आर्ट्स से उनका पुराना रिश्ता है। वो उस गरीब न्यूड मॉडल को जानते हैं। यह उऩकी किसी लक्ष्मी की स्टोरी है. पर ट्रेलर पोल खोल गया।‘ मनीषा के इन आरोपों पर अभी फिल्मकार का पक्ष आना बाकी है। इस मामले का निपटारा भी ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत से ही होगा क्योंकि हिंदी लेखिका मनीषा ने भी अदालत जाने का मन बना लिया है।इन दिनों हिंदी साहित्य में चौर्यकर्म पर खुलकर बहस हो रही है।    
ये तो हुई इन फिल्मों से जुड़ी बातें लेकिन इस संबंध में मेरा ध्यान अनायास ही फिल्मों के नाम और उनके पात्रों पर चला जाता है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी है, कलात्मक आजादी भी है लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब कलात्मक आजादी की आड़ में शरारतपूर्ण तरीके से काम किया जाता है। कहा जाता है कि दीपा मेहता की फिल्म ‘फायर’ मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी ‘लिहाफ’ की जमीन पर बनाई गई है। अब यहां देखें कि ‘लिहाफ’ के पात्रों का नाम ‘बेगम जान’ और ‘रब्बो’ है लेकिन जब ‘फायर’ फिल्म बनती है तो उनके पात्रों का नाम ‘सीता’ और ‘राधा’ हो जाता है। ये है कलात्मक आजादी का नमूना। इस तरह के कई उदाहरण मिल जाते है। अब इसमें अगर एक समुदाय के अनेकों लोगों को शरारत लगता है तो उनकी बात को भी ध्यानपूर्वक तो सुना ही जाना चाहिए।  
ऐसे में यह भी विचार करना चाहिए कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है । मकबूल फिदा हुसैन के उन्नीस सौ सत्तर में बनाए गए सरस्वती और दुर्गा की आपत्तिजनक तस्वीरों के मामले में दो हजार चार में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर ने एक फैसला दिया था। जस्टिस कपूर ने आठ अप्रैल दो हजार चार के अपने फैसले में लिखा- इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के करोड़ो हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है- एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की । इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना इन करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही साथ ही उन करोड़ों लोगों की धर्म और उसमें उनकी आस्था का भी अपमान है ।
शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है । कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिव्यक्त कर सकता है । इन मनोभावों और आइडियाज की अभिव्यक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को भुला या विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है । अगर किसी को अभिवयक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षित है कि इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हे अपमानित करने के लिए । हो सकता है कि ये धर्मिक प्रतीक या देवी देवता एक मिथक हों लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक धर्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलाफ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर कहा जाता है तो इससे धार्मिक भावनाएं बेतरह आहत होती है।‘ अपने बारह पन्नों के जजमेंट में विद्वान न्यायाधीश ने और कई बातें कही और अंत में आठ शिकायतकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी क्योंकि धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने आदि के संबंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं उसमें राज्य या केंद्र सरकार की पू्र्वानुमति आवश्यक होती है, जो कि इस केस में नहीं थी । ( जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो लेकिन भाव वही हैं )
अब सवाल यही कि जब संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर साफ तौर पर बता दिया गया है तो हर बार उसको लांघने की कोशिश क्यों की जाती है। क्या कलाकार की अभिव्यक्ति की आजादी आम आदमी रो मिले अधिकार से अधिक है। इसपर हमें गंभीरता से विचार करना होगा। ऐसी शरारतों से ही कुछ उपद्रवी तत्वों को बढ़ावा मिलता है कि वो भावनाएं आहत होने के नाम पर बवाल कर सकें। लेकिन जिन फ्रिंज एलिमेंट की गम निंदा करते हैं उनको जमीन देने के लिए कौन जिम्मेदार है इसपर विचार करना भी आवश्यक है। कलात्मक आजादी के नाम पर किसी को भी किसी की धार्मिक भावनाओं के साथ खेलने की इजाजत ना तो संविधान देता है और ना ही कानून तो फिर ऐसा करनेवालों को अगर फिल्म फेस्टिवल से बाहर का रास्ता दिखाया गया है तो गलत क्या है।