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Sunday, November 15, 2015

असहिष्णुता की आड़ में सियासत

बिहार चुनाव के खत्म होते ही देश में बढ़ रहे असहिष्णुता को लेकर हर रोज हो रहा हंगामा लगभग खत्म सा हो गया है । ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार चुनाव में एनडीए और बीजेपी की हार के बाद देश के असहिष्णु होने को लेकर छाती कूटनेवालों के कलेजे को ठंडक पड़ गई हो । संभव है कि असहिष्णुता का मुद्दा केंद्र की मोदी सरकार को बिहार चुनाव के दौरान बैकफुट पर लाने के लिए उठाया गया हो । इस बात के पुष्ट प्रमाण तो नहीं मिल सकते हैं लेकिन पर्याप्त संकेत अवश्य मौजूद हैं । बिहार में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद लगता है देश का माहौल अपेक्षाकृत सहिष्णु हो गया है और पुरस्कार लौटा रहे साहित्यकारों, फिल्मकारों आदि की आहत संवेदना पर मरहम लग गया हो । पुरस्कार वापसी की राजनीति पर इस स्तंभ में कई बार चर्चा हो चुकी है लेकिन इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में किस तरह से भारत की वैश्विक छवि को दरकाने की कोशिश की गई । आज जबकि भारत को विकास की पटरी पर तेज रफ्तार से दौड़ने के लिए विदेशी निवेश की सख्त आवश्यकता है । लंबे समय बाद देश में बहुमत वाली सरकार के आने के बाद विदेशी निवेशकों में आर्थिक सुधार को लेकर भरोसा बनना शुरू हुआ था लेकिन देश की राजनीति के चक्कर में विरोध पक्ष इतना आगे बढ़ गया कि उन्होंने हमारे देश को ही असहिष्णु घोषित करने का काम शुरू कर दिया । स्थितियां इस तरह की बनाई गई कि कानून व्यवस्था के मुद्दे को मानवाधिकार का मुद्दा बना दिया गया, गैर सरकारी संगठनों के विदेशी चंदों की जांच और कुछ संगठनों पर पाबंदी को परोक्ष रूप से अभिवयक्ति की आजादी से जोड़ दिया गया । अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा बताने वाले बहुधा यह भूल जाते हैं कि इतने तीखे विरोध की आजादी उनको है जिसमें वो पूरे देश की छवि को भी उन्मुक्त होकर दांव पर लगा सकते हैं । भारत के असहिष्णु होने की बात करनेवालों की अज्ञानता पर क्षोभ होता है । बगैर भारत को, उसकी संस्कृति को, उसके समाज को जाने-समझे उसके असहिष्णु होने की बात कहना और फिर उसको प्रचारित करने से पूरे देश की बदनामी होती है जिसके लिए किसी को क्षमा नहीं किया जाना चाहिए । क्या कोई एक संगठन, एक व्यक्ति पूरे हिंदुत्व का ठेकेदार हो सकता है । कदापि नहीं । किसी एक संतनुमा नेता या नेत्री के बयान के आधार पर पूरे धर्म को कठघरे में खड़े करने से आरोप लगाने वाले समुदाय पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं । द हिंदूज एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री और ऑन हिंदुइज्म जैसी किताब की लेखिका वेंडी डोनिगर ने भी अपनी किताब ऑन हिंदुइज्म में लिखा है – हिंदू धर्म की विशेषता उसकी विविधता है । हिंदू धर्म की एक और विशेषता है कि वो गैर हिंदुओं के आइडिया और परंपरा को भी अपने में आत्मसात कर लेती है । इस वजह से हिंदी धर्म इस्लाम, क्रिश्चैनियटी आदि से बिल्किल अलग दिखता है । वो यह भी मानती है कि हिंदू धर्म की विविधता ही उसकी ताकत है और वो इस्लाम या क्रिश्चैनियटी की तरह एक खुदा, गॉड या एक भगवान के इर्द गिर्द नहीं घूमती है और ना ही किसी एक किताब के आधार पर चलती है । हलांकि वेंडी डोनिगर इस बात पर चिंता जताती हैं कि हिंदू धर्म में कट्टरता के तत्व दिखाई देने लगे हैं लेकिन ये तत्व धार्मिक नहीं होकर राजनीतिक हैं । इस बात पर बहस हो सकती है लेकिन चंद लोगों के विवादित बयानों के आधार पर पूरे धर्म को या फिर पूरे देश को बदनाम करना बेहद आपत्तिजनक है ।
देश में बढ़ते असहिष्णुता का प्रचार करने में कामयाबी पाने के बाद वही ताकतें अब विदेश में भी सक्रिय हो गई हैं और भारत की छवि पर बट्टा लगाने की कोशिश हो रही है । जब देश में पुरस्कार वापसी का आंदोलन चल रहा था तो अमेरिका और ब्रिटेन के अखबारों ने इस पर लेख लिखे थे । भारत को असहिष्णु बताने वाले इन अखबारों को अमेरिका में गुजरातियों और ब्रिटेन में सिखों पर नस्लीय हमले नजर नहीं आते हैं । दूसरे देश की चिंता करने के पहले इन अखबारों को अपने देश की कट्टरता को बेनकाब करना चाहिए । जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ब्रिटेन के दौरे पर थे तो उनके वहां पहुंचने के दिन ही एक अखबार ने अनीश कपूर का एक लेख छापा । इस लेख का शीर्षक था- इंडिया इज बीइंग रूल्ड बाय अ हिंदू तालिबान । अनीश कपूर के इस लेख में तमाम तरह की आपत्तिजनक बाते हैं जो ना सिर्फ भारत का अपमान है बल्कि यहां की सवा सौ करोड़ जनता का भी अपमान है । अनीश कपूर ने उत्साह में ऐसे ऐेसे शब्दों का प्रयोग किया है जिसमें वो लोकतांत्रिक मर्यादाओं को लांघते और छिन्न भिन्न करते मजर आते हैं । अनीश कपूर ने अपने लेख की शुरुआत इस बात से की भारत में विविधता की संस्कृति गंभीर खतरे के दौर से गुजर रही है । कपूर इस बात को लेकर उत्तेजित नजर आते हैं कि मोदी सरकार उन अराजक हिंदुओं को सहन कर रही है जो बीफ खानेवालों को अनुशासित कर रहे हैं, जो जाति व्यवस्था के खिलाफ और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के खिलाफ बोलनेवालों को कथित तौर पर सुधारने का काम कर रहे हैं । उत्तेजना में बहुधा लोग अतार्किक हो जाते हैं । यह अनीश कपूर की भड़ास है जो उनके लेख में उनके विचार के तौर पर सामने आई है । भड़ास इस वजह से क्योंकि उसमें तर्क का कोई स्थान नहीं होता है । इस पूरे लेख में सिर्फ फतवेबाजी की गई है कहीं कोई दृष्टांत या तर्क नहीं है ।
इस लेख का शीर्षक ही अनीश कपूर की भारत के बारे में अज्ञानता को प्रदर्शित करती है । अनीश को यह मालूम होना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र की जड़े इतनी गहरी हो गई हैं कि यहां कोई तालिबान शासन नहीं कर सकता है । दरअसल अनीश का यह लेख पूरे तौर पर भारत को बदनाम करने की मंशा से लिखा गया है । वो अपने लेख में लिखते हैं कि भारत को ब्रिटेन के लोग कश्मीर में हो रहे अत्याचार और हाल के दिल दहला देनेवाले रेप केस की वजह से जानते हैं । अनीश को कश्मीर में होनेवाला कथित अत्याचार दिखाई देता है लेकिन गुलाम कश्मीर में मानवाधिकार के उड़ रहे चीथड़े उनको दिखाई नहीं देते हैं । जिस ब्रिटेन का वो गुणगान करते नजर आ रहे हैं वहां सिखों पर पिछले दिनों हुए हमले का जिक्र नहीं करते हैं । कश्मीर के किस अत्याचार की बात कर रहे हैं अनीश । वहां लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार काम कर रही है । पता नहीं अनीश कपूर किस दुनिया में रहते हैं कि उनको भारत में हिंदू अत्याचार की लहर दिखाई दे रही है । अनीश ने अपने लेख में लिखा है कि भारत में हिंदू वर्जन ऑफ तालिबान अपना प्रभाव बढ़ा रहा है । अनीश को यह जानना आवश्यक है कि हिंदू और तालिबान दोनों दो ध्रुव हैं जो कभी नहीं मिल सकते । भारत की सवा सौ करोड़ जनता किसी भी प्रकार के तालिबान को पनपने नहीं देगी चाहे उसे राजाश्रय ही क्यों ना मिला हो । अनीश भारत के लोकतंत्र को बहुत ही हल्के में ले रहे हैं । दरअसल उनके लेख की मंशा आखिर में आकर स्पष्ट होती है जहां वो ग्रीनपीस पर पाबंदी और तीस्ता शीतलवाड का मुद्दा उठाते हैं । तीस्ता किसी और वजह से नहीं बल्कि अपने ट्रस्ट के पैसों में हेराफेरी के आरोप में अदालतों के चक्कर लगा रही है । क्या सिर्फ इस बात को लेकर कि वो गुजरात दंगों के पीड़ितों की लड़ाई लड़ रही हैं उनको इस बात का हक मिल जाता है कि वो चंदे में गड़बड़ी के आरोपों से बच निकले ।

दरअसल अगर हम देखें तो यह एक बड़े अंतराष्ट्रीय डिजायन का हिस्सा नजर आता है । नरेन्द्र मोदी के दौरे के ठीक एक दिन पहले पेन इंटरनेशनल, जो कि साहित्य और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करनेवाली संगठन हैं, के बैनर तले सलमान रश्दी जैसे करीब सौ लेखकों ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र भेजा ।इस पत्र में डेविड कैमरून से मांग की गई है कि वो भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कदम उठाएं । अपने पत्र में उन्होंने भारत में पिछले दो वर्षों में सार्वजनिक बुद्धिजीवियों पर हुए हमले को मुद्दा बनाया गया है । यह ठीक है कि हर संस्था को अपनी बात कहने का हक है लेकिन उतना ही हक उसका प्रतिवाद करनेवाले को भी है । पेन इंटरनेशनल भी तब खामोश रही थी जब दाभोलकर की हत्या की गई थी, या जब कामरेड पानसारे को मार डाला गया था । विचार और धारा की लड़ाई में देश की छवि को बट्टा लगानेवालों को सोचना होगा क्योंकि इस लड़ाई से अंतत देश की जनता का नुकसान होगा । 

Monday, February 24, 2014

फैसले पर उठते सवाल

हिंदू धर्म पर कई किताब लिखनेवाली मशहूर लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब- द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को पेंग्विन बुक्स ने भारतीय बाजार से वापस लेने और छपी हुई अनबिकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया । प्रकाशक के इस फैसले के बाद लेखकों के एक बड़े समुदाय में इस बात को लेकर खासी निराशा और क्षोभ है । पेंग्विन के कोर्ट के बाहर किए गए इस समझौते पर लेखकों ने विरोध जताना शुरू कर दिया है । बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका अरुंधति राय ने तो पत्र लिखकर पेंग्विन से स्थिति स्पष्ट करने की गुजारिश की है । वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ वरदराजन और लेखक ज्योतिर्मय शर्मा ने पेंग्विन से अपनी किताबों को नष्ट करने और क़ापीराइट वापस करने का अनुरोध किया है । सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने पत्र में साफ लिखा है कि उन्हें अब पेंग्विन पर भरोसा नहीं रह गया है लिहाजा वो गुजरात दंगों पर लिखी गई उनकी किताब- दे मेकिंग ऑफ अ ट्रेजडी- के अधिकार वापस कर दें । सिद्धार्थ का मानना है कि कल को अगर किसी समूह की भावना इस किताब से आहत हो जाती है और वो भारतीय दंड विधान की धारा 295 के तहत केस कर देता है, तो संभव है कि पेंग्विन उनकी किताब को भी वापस लेने का फैसला कर ले । विरोध के इस तरह के स्वर ‘सहमत’ की ओर से भी उठे । पीइएन इंटरनेशनल की भारत इकाई ने भी प्रकाशक के इस फैसले का विरोध किया । पेंग्विन विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक है और उसके पास ना तो साधन की कमी है और ना ही संस्धान की तो फिर उसके एक छोटे से संगठन  के सामने घुटने टेकने से साहित्य जगत हैरान है । दिल्ली की एक अदालतत में वेंडी डोनिगर की किताब पर शिक्षा बचाओ समिति नाम के एक अनाम संगठन ने केस किया । इसको किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और इसके अगुवा दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था । तीन साल बाद पेंगिवन ने याचिकाकर्ता से समझौता कर लिया । ये तो किताब के प्रकाशक की कमजोरी है जो अदालती कार्रवाई के झमेले में नहीं पड़ना चाहता है । विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक, जिसके पास ना तो पैसे की कमी है और ना ही संसाधनों की, उसने अदालती कार्रवाई के झंझट से मुक्त होने के लिए समझौता किया । वैसे भी इंटरनेट के इस युग में किसी भी कृति पर पाबंदी संभव ही नहीं है ।पेंग्विन के फैसले के बाद जिस तरह से किंडल पर ये कृति ई बुक्स के रूप में धड़ाधड़ बिक रही है इससे यह बात साफ हो गई है कि किताब वापसी का कोई अर्थ है नहीं । इस मामले में तो वेंडी डोनिगर चाहे तो किताब छापने का अधिकार पेंग्विन से लेकर किसी अन्य प्रकाशक को दे सकती है । दूसरा प्रकाशक इसको छापने के लिए स्वतंत्र होगा क्योंकि अदालत ने इस किताब के भारत में प्रकाशन और वितरण पर पाबंदी नहीं लगाई है ।
इस तरह का ये कोई पहला केस नहीं है । इसके पहले भी प्रकाशकों ने भय और आशंका के मारे गुटों के सामने घुटने टेक दिए थे । मशहूर स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित किताब भारत में अब तक छप नहीं सकी है । अपनी किताब रेड साड़ी में जेवियर मोरो ने सोनिया गांधी की जीवन यात्रा को इटली से लेकर भारत तक अपने नजरिए से देखने की कोशिश की है । जैसे ही इस किताब के भारत में छपने की खबर आई तो कांग्रेस के नेताओं के कान खड़े हो गए और उन्होंने जोरदार विरोध शुरू कर दिया । पार्टी के नेता और मशहूर वकील अभिषेक मनुसिंघवी ने अदालती कार्रवाई की भी धमकी दी थी । अब तक जेवियर मोरो की किताब भारत में छप नहीं पाई है । इसी तरह से महात्मा गांधी पर जब पत्रकार जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब द ग्रेट सोल प्रकाशित हुई तो खूब हो हल्ला मचा था । एयर इंडिया पर लिखी जितेन्द्र भार्गव की किताब के कुछ पन्ने हटाने के बाद ही उसको प्रकाशक ने रिलीज किया । प्रकाशकों के बीच ये एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है । पहले दुनियाभर के प्रकाशक लेखकीय स्वतंत्रता को लेकर ना केवल सजग रहते थे बल्कि अंतिम दम तक उसको बनाए रखने के लिए संघर्ष भी करते थे । अब अगर किसी किताब पर कहीं से धमकी आ गई तो प्रकाशक बीच का रास्ता तलाशने में लग जाते हैं । प्रकाशन जगत के साथ साथ अभिव्यक्ति की आजादी के लिए प्रकाशकों की ये प्रवृत्ति खतरनाक है ।

वेंडी डोनिगर को इस बात की आशंका थी कि उसकी इस किताब को लेकर कुछ हिंदुओं को आपत्ति हो सकती है । प्रोफेसर वेंडी डोनिगर ने लिखा था– कई हिंदू धार्मिक नेता इस किताब को समुद्र में फेंक देना चाहेंगे क्योंकि उन्हें इसमें तथ्यों के साथ खिलवाड़, धार्मिक प्रसंगों की गलत व्याख्या आदि आदि दिखाई देंगे । लेखिका इतने पर ही नहीं रुकती हैं उन्होंने अपनी इसी किताब में ये भी लिखा है कि – हमें हिंदू धर्म मैं मौजूद ज्ञान और दर्शन का उपयोग करना चाहिए क्योंकि यहां मौजूद साहित्य उच्च कोटि का है और हिंदू धर्म सर्व को समाहित करता चलता है । वेंडी डोनिगर को भारतीय धर्म और धर्मग्रंथों की रुचि के केंद्र में रहे हैं । उन्होंने ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का अनुवाद किया है । उनकी किताब- शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी काफीमशहूर है । द हिंदूज- एन ऑलटेरनेटिव हिस्ट्री की भूमिका में वो स्वीकार करती है कि दलितों और महिलाओं ने हिंदू धर्म के फैलाव और उत्थान में बड़ा योगदान किया है । महिलाओं और दलितों के इस योगदान को सदियों से नजरअंदाज किया जाता रहा है । वेंडी डोनिगर ने अपनी इस किताब में हाशिए के इन लोगों की नजरों से इतिहास को देखने की कोशिश की है । इस किताब में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को लेकर पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है । उनकी इन प्रस्थापनाओं पर कई विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं । वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है । हमारे धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक एक आदर्श हिंदू वह है जो लगातार सवाल खड़े करता है, जवाब को तर्कों की कसौटी पर कसता है और किसी भी चीज, अवधारणा और तर्क को अंतिम सत्य नहीं मानता है । हिंदू धर्म की इस आधारभूत गुण को आत्मसात करते हुए वेंडी डोनिगर ने कई व्याख्याएं की हैं और कुछ असुविधाजनक सवाल खड़े किए हैं । इस किताब में कई ऐसी बातें हैं जो वेंडी डोनिगर ने संस्कृत में पहले से सुलभ हैं और उसको अंग्रेजी के पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है । अंत में फिर से सवाल वही उठता है कि क्या तथ्यों और संदर्भों को समझे बगैर किए गए विरोध के सामने घुटने टेकना कितना जायज है । यह सवाल तब और बड़ा हो जाता है जब पेंग्विन जैसा बड़ा संस्थान अदने से विरोध के आगे सरेंडर कर देता है । 

Sunday, February 16, 2014

विवाद के बहाने राग फासीवाद

मशहूर अमेरिकी लेखिका और शिकागो विश्वविद्यालय में इतिहास और धर्म में प्रोफेसर वेंडी डोनिगर की किताब- द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को उसके प्रकाशक पेंग्विन बुक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने बाजार से वापस लेने और छपी हुई बाकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया गया है । यह फैसला अदालत में उस किताब पर चल रहे केस के मद्देनजर याची शिक्षा बचाओ समिति के साथ समझौते के बाद हुआ । दरअसल दिल्ली की एक संस्था को इस किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और उस संगठन से जुड़े दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में इस किताब के कुछ अंशों को हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था । किताब के खिलाफ याचिका दायर होने के तीन साल बाद आउट ऑफ द कोर्ट एक समझौता हुआ जिसके तहत किताब को वापस लेने का फैसला हुआ । दरअसल इस किताब के छपने के बाद से ही विवाद शुरू हो गया था । इस किताब के छपने के बाद ही अमेरिका में इसको खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो चुका है । लंदन में तो लेखिका पर अंडे तक फेंके जा चुके हैं । साइबर दुनिया में भी इस किताब के खिलाफ अभियान चल रहा है । इस मामले के सामने आने के बाद कई लोग इस बात पर छाती कूटने लगे कि ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है । कई लोग इसको हिंदू संगठनों की कथित फासीवादी मानसिकता करार दे रहे हैं । सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों को हिंदू संगठनों पर हमला करने का एक बहाना चाहिए होता है । प्रकाशक के इस फैसले में उनको संभावना नजर आई और वो फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने लगे । सवाल ये उठता है कि साल दो हजार नौ में किताब छपी उसके पांच साल बाद इस किताब को वापस लेने का फैसला प्रकाशक ने लिया । इसमे फासीवाद कहां से आ गया । क्या अब इस देश में किसी को भी अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार नहीं है । क्या शांतिपूर्ण तरीके से कोई विरोध नहीं जताया जा सकता है ।  क्या अहिंसक तरीके से विरोध करना फासीवाद है । इस तरह के मामले तो पूरे विश्व में होता रहा है कि अगर किसी को किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति है तो वो अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं । इस किताब के खिलाफ याचिकाकर्ता ने भी भारतीय संविधान के तहत मिले अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए कोर्ट में केस किया । अदालत में मुकदमा चल ही रहा था कि दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया, इसमें फासीवाद और हिंदू संगठनों की मनमानी कहां से आ गया । ये तो किताब के प्रकाशक की कमजोरी है जो अदालती कार्रवाई के झमेले में नहीं पड़ना चाहता है । विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक, जिसके पास ना तो पैसे की कमी है और ना ही संसाधनों की, उसने अदालती कार्रवाई के झंझट से मुक्त होने के लिए समझौता किया । वैसे भी इंटरनेट के इस युग में किसी भी कृति पर पाबंदी संभव ही नहीं है । और इस मामले में तो अगर लेखक चाहे तो वो इसको छापने का अधिकार पेंग्विन से लेकर किसी अन्य प्रकाशक को दे सकता है । वो इसको छापने के लिए स्वतंत्र होगा क्योंकि अदालत ने इस किताब के भारत में प्रकाशन और वितरण पर पाबंदी नहीं लगाई है । इस किताब की लेखिका ने भी इसके बाद ट्विट कर अपनी नाराजगी जताई । वेंडी डोनिगर के मुताबिक भारतीय कानून इसके लिए जिम्मेदार है । अब ये तो हर देश के नागरिक को हक है कि वो अपने देश के कानून के मुताबिक काम कर सके । लेकिन छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों को तो ना तो कानून में आस्था है और ना ही अदालत में । कई बार ये उचित ही प्रतीत होता है कि प्रगतिशीलता का परचम लहरानेवाले बगैर किसी बात के बतंगड़ बनाने में जुट जाते हैं । इस समझौते का विरोध करनेवाले कई लोगों ने तो इस किताब को पढ़ा भी नहीं है और बगैर पढ़े ही उसके बारे में अपनी राय बनाए बैठे हैं ।
ये तो बातें हुआ छद्म प्रगतिवादियों की जो बेवजह का वितंडा खड़ा कर रहे हैं । अब बात की जाए इस किताब और इसके लेखिका की । भारत के धर्म और उसका धार्मिक इतिहास वेंडी डोनिगर की रुचि के केंद्र में रहे हैं । वो संस्कृत और इंडियन स्टडीज में पीएचडी कर चुकी हैं । संस्कृत में लिखे गए कई मशहूर ग्रंथों का उन्होंने अनुवाद किया है । ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का अनुवाद वो कर चुकी हैं । इसके अलावा शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी जैसी विचारोत्तेजक कृतियां वेंडी डोनिगर ने लिखी हैं । अपनी इल किताब द हिंदूज एन ऑलटेरनेटिव हिस्ट्री की भूमिका में लेखिका ने स्वीकार किया है कि इस किताब को लिखने के पीछे उनका एजेंडा तय है । वो यह बताना चाहती है कि जो समूह पारंपरिक रूप से विकास के लिए और अन्य सामाजिक स्थितियों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं हैं दरअसल उनकिी भूमिका कितनी और कैसी रही है । वेंडी डोनिगर साफ तौर पर कहती हैं कि उनका मानना है कि दलितों और महिलाओं ने हिंदू धर्म के फैलाव और उत्थान में बड़ा योगदान किया है । महिलाओं और दलितों के इस योगदान को सदियों से नजरअंदाज किया जाता रहा है । वेंडी डोनिगर ने अपनी इस किताब में हाशिए के इन लोगों की नजरों से इतिहास को देखने की कोशिश की है । इस किताब में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को लेकर पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है । उनकी इन प्रस्थापनाओं पर कई विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सदियों कीविकास यात्रा को तय करते हुए हिंदू धर्म बना है और देश की सर्वोच्च अदालत तो अब भी इसको धर्म के बजाए एक जीवन दर्शन मानती है । हिंदुओं का धर्म तो सनातन धर्म है । हिंदुत्व की बात करने पर जो दो चीज प्रमुखता से सामने आती है वो है कर्म और धर्म । ये दोनों अवधारणाएं अलग अलग कालखंड में हिदुत्व के केंद्र में रही हैं । वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है । हमारे धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक एक आदर्श हिंदू वह है जो लगातार सवाल खड़े करता है, जवाब को तर्कों की कसौटी पर कसता है और किसी भी चीज, अवधारणा और तर्क को अंतिम सत्य नहीं मानता है । हिंदू धर्म की इस आधारभूत गुण को आत्मसात करते हुए वेंडी डोनिगर ने कई व्याख्याएं की हैं और कुछ असुविधाजनक सवाल खड़े किए हैं । इस किताब में कई ऐसी बातें हैं जो वेंडी डोनिगर ने संस्कृत में पहले से सुलभ हैं और उसको अंग्रेजी के पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है । जैसे वो अपनी इस किताब में वैदिक काल में प्रचलित बहुदेववादी अवधारणा को एकेश्वरवाद का ही एक रूप मानती है । अपनी इस अवधारणा को अपने तर्कों के साथ इस तरह से पेश करती है कि वो कोई नई बात कह रही हों जबकि संस्कृत में पहले से ही सर्वदेवा नमस्कार केशवम प्रतिगच्छति कहा गया है ।  

वेंडी डोनिगर को इस बात की आशंका थी कि इस किताब को लेकर कुछ हिंदुओं को आपत्ति हो सकती है । उन्होंने इस किताब की भूमिका में इसके संकेत भी किया है । वेंडी ने लिखा है – कई हिंदू धार्मिक नेता इस किताब को समुद्र में फेंक देना चाहेंगे क्योंकि उन्हें इसमें तथ्यों के साथ खिलवाड़, धार्मिक प्रसंगों की गलत व्याख्या आदि आदि दिखाई देंगे । लेखिका इतने पर ही नहीं रुकती हैं उन्होंने अपनी इसी किताब में ये भी लिखा है कि – हमें हिंदी धर्म मैं मौजूद ज्ञान और दर्शन का उपयोग करना चाहिए क्योंकि यहां मौजूद साहित्य उच्च कोटि का है और हिंदू धर्म सर्व को समाहित करता चलता है । इन बातों से लेखिका की मंशा और उसकी आशंका का पता चलता है । दिक्तत वहां होती है जहां जहां पश्चिमी देशों के विद्वान किसी भी भारतीय मिथकीय प्रसंग की व्याख्या का आधार अपने समाज की रीतियों को बना लेते हैं । दरअसल होना यह चाहिए कि बारतीय मिथकीय चरित्रों की व्याख्या के तर्कों का आधार भारतीय समाज में उस वक्त की या वर्तमान की मान्यताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए । ताकि इस तरह के विवादों से बचा जा सके । वेंडी डोनिगर की किताब एक बेहतरीन शोध का नतीजा है और वो एक वैकल्पिक इतिहास प्रस्तुत करती है । इस किताब को वापस लेकर पेंग्विन इंडिया ने गलती की है । भारतीय पाठकों के साथ छल भी । इस गलती को तत्काल सुधारे जाने की जरूरत है ।