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Saturday, July 26, 2025

बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए


मई 2013 के अपने संपादकीय में 'हंस' पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव ने लिखा था, इधर हमारे अशोक वाजपेयी अपने रोजनामचे यानी कभी-कभार (साप्ताहिक स्तंभ) में अक्सर ही बताते रहते हैं कि उन्होंने देश-विदेश की किन गोष्ठियों में भाग लिया और उनकी तुलना में हिंदी कहां कहां और कितनी दरिद्र है। वस्तुत: यह सुनते सुनते मेरे कान पक गए हैं कि हम लोगों में क्या कमी है और हिंदी कहां कहां पिछड़ी हुई है। यह हिंदी वैशिंग मुझे मनोरोग जैसा लगने लगा है। मेरे दफ्तर में आनेवाले ज्यादातर लोग जब हिंदी कविता और कहानियों की कमजोरी और कमियों का रोना रोते हैं तो उसके पीछे भावना यही होती है कि देखिए इन कमियों और कमजोरियों को किस तरह अपनी महान रचनाओं के द्वारा मैं पूरा कर रहा हूं। इस टिप्पणी में उaन्होंने मेरा भी नाम लिया था। राजेंद्र यादव आगे कहते हैं कि यह अशोक और अनंत विजय जैसों की तरह ज्यादा पढ़ने और घूमने से उपजी हुई तकलीफ नहीं, बल्कि एक सुना सुनाया और आत्मप्रचार को सही सिद्ध करने का हथकंडा है। लगता है या तो ये लोग केवल अपने बारे में बोल सकते हैं या हिंदी को लेकर छाती माथा कूटने की लत में लिप्त हैं। कभी-कभी तो मुझे कहना पड़ता है कि हम हिंदुस्तानी या हिंदीवाले का रोदन बंद कीजिए और बताइए कि हमें क्या करना है। लगभग 12 वर्ष पहले यह संपादकीय लिखा गया था। समय का चक्र घूमा, राजेंद्र यादव का निधन हो गया। संजय सहाय हंस के संपादक बने। संपादक बदलने से पसंद नापसंद भी बदले। हंस पत्रिका अलग ही राह पर चल पड़ी। जिस हिंदी वैशिंग को राजेंद्र यादव मनोरोग जैसा मानते थे उसी अशोक वाजपेयी के हिंदी, हिंदी साहित्य और हिंदी समाज के वैशिंग को हंस के जुलाई अंक में छह पृष्ठों में जगह दी गई है। राजेंद्र यादव के निधन के बाद पत्रिका की नीतियों में ये विचलन अलग विमर्श की मांग करता है। इस पर चर्चा फिर कभी। अशोक वाजपेयी के लेख पर विचार करते हैं जिसका शीर्षक है, हिंदी समाज ने आधुनिक हिंदी साहित्य को खारिज कर दिया है? शीर्षक में जो प्रश्नवाचक चिह्न है उसका उत्तर अपने आलेख में खोजने का प्रयत्न किया है। अशोक वाजपेयी का यह लेख सामान्यीकरण और फतवेबाजी का काकटेल बनकर रह गया है। वाजपेयी को अपने द्वारा बनाई चलाई संस्थानों की विफलता और व्यर्थता का तीखा अहसास होता है। अपने इस एहसास में वे हिंदी विश्वविद्यालय को भी शामिल करते हैं जिसके वह पहले कुलपति थे। जिस हिंदी साहित्य की मृत्यु की संभावना अशोक वाजपेयी तलाश रहे हैं, उसी हिंदी साहित्य में एक कहावत है कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे। हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहते हुए उसको दिल्ली से चलाना। मित्रों-परिचितों और उनके बेटे बेटियों को विश्वविद्यालय के विभिन्न पदों पर नियुक्त करना। वर्षों बाद उसकी विफलता और व्यर्थता के अहसास में ऊभ-चूभ करके प्रचार तो हासिल किया जा सकता है, लेकिन इससे पाठकों को विमर्श के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता है। साहित्य की मृत्यु की संभावना की जगह आशंका जताते तो उचित रहता। अशोक वाजपेयी हिंदी समाज की व्यापक समझ पर भी प्रश्न खड़े करते हैं। वह कहते हैं कि हिंदी समाज कितना पारंपरिक रहा, कितना आधुनिक हो पाया है, इस पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है। इसके फौरन बाद अपना निष्कर्ष थोपते हैं कि हमारी व्यापक सामाजिक समझ जितनी आधुनिकता की अधकचरी है, उतनी परंपरा की भी। अब यहां अशोक जी से यह पूछा जाना चाहिए कि वह लंबे समय तक सरकार में रहे, कांग्रेसी मंत्रियों के करीबी रहे, संसाधनों से संपन्न रहे, लेकिन हिंदी समाज की समझ को विकसित करने के लिए क्या किया। दूसरों को कोसने से बेहतर होता है स्वयं का मूल्यांकन करना। यह देखना भी मनोरंजक है कि अशोक वाजपेयी आज के समय में वासुदेवशरण अग्रवाल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे मेधा के लेखक ढूंढ रहे हैं। अशोक जी साहित्य में परंपरा की अंतर्ध्वनि भी सुनना चाहते हैं। लेकिन इसके कारण पर नहीं जाते हैं। हिंदी साहित्य में स्वाधीनता के पहले जो भारतीयता या हिंदू परंपरा थी उसको किस पीढ़ी ने बाधित किया। हिंदू या भारतीय परंपरा को खारिज करनेवाले कौन लोग थे। किन आलोचकों ने साहित्य में भारतीय परंपरा की जगह आयातित विचारों को तरजीह दी। हिंदी समाज से अगर भारतीयता की परंपरा नहीं संभली तो क्या हिंदी के साहित्यकारों ने उस पर उसी समय अंगुली उठाई। तब तो उसको प्रगतिशीलता बताकर जय-जयकार किया गया। परंपरा के अधकचरेपन को अशोक वाजपेयी हिंदुत्व के अधकचरेपन से भी जोड़ते हैं। यहां यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि कैसे हिंदी समाज का मानस अधकचरेपन को स्वीकार करने के लिए तैयार किया गया। कैसे भारतेंदु से लेकर जयशंकर प्रसाद तक, कैसे मैथिलीशरण गुप्त से लेकर धर्मवीर भारती तक और कैसे दिनकर से लेकर शिवपूजन सहाय तक के भारतीय विचारों को हाशिए पर डालने का षड्यंत्र रचा गया। योजनाबद्ध तरीके से भारतीय विचारों पर मार्क्सवादी विचार लादे गए। आज अशोक वाजपेयी को हिंदी विभागों में विमर्श की चिंता सताती है, लेकिन जब वह कुलपति थे तो एक दो पत्रिका के प्रकाशन के अलावा हिंदी विभागों को उन्नत करने के लिए क्या किया? ये बताते तो उनकी साख बढ़ती, अन्यथा सारी बातें बुढ़भस सी प्रतीत हो रही हैं। अशोक स्वयं मानते हैं कि डेढ़ दो सदियों पहले उत्तर भारत में उच्च कोटि की सर्जनात्मकता थी। उसका श्रेष्ठ भारत का श्रेष्ठ था। वह साहित्य, चित्रकला, स्थापत्य, संगीत आदि में उत्कृष्टता अर्जित कर सका। यहां भी कारण पर नहीं जाते हैं और ऐसा लगता है कि उनकी अपनी कुंठा इस लेख पर हावी हो गई है। दिनकर बच्चन, पंत, प्रसाद, निराला की तरह अशोक वाजपेयी की कविता किसी भी पाठक को याद है। नहीं है। अशोक वाजपेयी को हिंदुत्व की विचारधारा से तकलीफ है। वह हिंदुत्व की विचाधारा को हिंदू धर्म चिंतन और अध्यात्म से अलग मानते हैं। दरअसल यहां भी वह इसी दोष के शिकार हो जाते हैं। अपने मन के भावों को लच्छेदार भाषा में पाठकों को भरमाते हैं। तर्क और तथ्य हों या न हों। पत्रकारिता को भी वह चालू मुहावरे में परिभाषित करने का प्रयास करते हैं। घिसे पिटे शब्द उठाकर लाते हैं। वह साहित्य के प्रतिपक्ष होने की कल्पना करते तो हैं, लेकिन अपने सक्रिय साहित्यिक जीवन को बिसरा देते हैं। संस्कृति मंत्रालय में रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार लेना कौन सा प्रतिपक्ष रच रहा था। दरअसल अशोक वाजपेयी जिस हिंदी समाज के पतन को लेकर चिंतित हैं, कमोबेश उन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। उनकी आलोचना करने के लिए उन्होंने साहित्य का मैदान चुना। राहुल गांधी की पैदल यात्रा में शामिल होकर वह अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक कर ही चुके हैं। इसलिए अशोक वाजपेयी के इस लेख की आलोचनाओं को उसी आईने में सिर्फ देखा ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसका मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। इस पूरे लेख को पढ़ने के बाद अशोक वाजपेयी के ही दशकों पूर्व अज्ञेय और पंत को निशाना बनाकर लिखे एक लेख का शीर्षक याद आ रहा है, बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाये। उस लेख में वाजपेयी ने लिखा था कम से कम हिंदी में तो कवि के बुजुर्ग होने का सीधा मतलब अकसर अप्रसांगिक होना है।   


Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए। 


Saturday, June 13, 2020

साहित्य की नामवरी असावधानी के स्मारक

कोरोना के संकट के दौरान पुस्तकें पढ़कर समय बिताना एक बेहतर विकल्प है। बाजार आदि भले ही खुल गए हैं लेकिन बहुत आवश्यक होने पर ही वहां जाना होता है। लोगों से मिलने-जुलने वाली संस्कृति पर भी फिलहाल विराम लगा हुआ है। पिछले करीब अस्सी दिन में कई किताबें पढ़ने का सुयोग बना। नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को करीब बीस साल बाद दोबारा पढ़ी। इसी क्रम में नामवर सिंह की ही एक और पुस्तक ‘हिंदी का गद्यपर्व’ पढ़ी। यह किताब नामवर सिंह के जीवित रहते ही 2010 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी और इसका संपादन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक आशीष त्रिपाठी ने किया है। मैंने इस पुस्तक की पहली आवृत्ति, जो 2011 में प्रकाशित हुई थी, पढ़ी। नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक आशीष त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘यह पुस्तक साक्ष्य है नामवर जी के सक्रिय साठ वर्षों का-एक दस्तावेजी साक्ष्य। इसमें उनका पहला प्रकाशित निबंध है और अभी तक लिखित अंतिम निबंध द्वा सुपर्णा... और पुनर्नवता की प्रतिमूर्ति।‘ संपादक के इन दावों को पढ़कर इस पुस्तक को पढ़ने की रुचि और बढ़ गई।
इस किताब में एक लेख है ‘हिंदी साहित्य के पच्चीस वर्ष’। इस लेख के बारे में बताया गया है कि ‘स्वतंत्रता की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर साहित्य अकादमी ने भारत की विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक प्रगति का एक सर्वेक्षण अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था, इंडियन लिटरेर सिंस इंडिपेंडेंस। इस ग्रंथ के लिए हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण किया था डॉ नामवर सिंह ने। उस सर्वेक्षण का हिंदी रूप।‘ इस पूरे लेख में कई त्रुटियां हैं। नामवर सिंह जैसी पकी आंखों वाले आलोचक जो तथ्यों को लेकर बहुत सावधान रहते थे उनसे एक लेख में इतनी तथ्यात्मक गलतियां चौंकाती हैं। इस लेख (पृ.71) में उन्होंने निर्मल वर्मा की मशहूर कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन वर्ष 1960 बताया है। जबकि इस कहानी का प्रकाशन 1957 में हुआ था। प्रेमचंद के स्मृति दिवस 8 अक्तूबर 1957 को ‘हंस’ का साहित्य संकलन-1, प्रकाशित हुआ था, जिसके संपादक बालकृष्ण राव और अमृतराय थे। इस संकलन में पहली बार निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन हुआ था। आश्चर्य की बात ये है कि ‘हंस’ के उस संकलन में नामवर सिंह का भी लेख प्रकाशित है। सिर्फ 15 वर्ष के अंतराल में नामवर सिंह से ये चूक हो जाती है। वो भी तब जब नामवर सिंह ने निर्मल की इस कहानी को ‘नई कहानी की पहली कृति’ घोषित करते हुए एक लंबा लेख लिखा था। अगर नामवर सिंह से ये चूक हुई है तो वो एक बेहद असावधान आलोचक थे और अगर अनुवाद और संपादन में ये भूल हुई है तो ये अक्षम्य है। महत्वपूर्ण ये है कि इस पुस्तक का प्रकाशन नामवर सिंह के जीवित रहते हो गया था, लेकिन इस भूल की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साहित्य के शोधार्थियों को ध्यान में रखकर अगर विचार किया जाए तो ये गलती बहुत बड़ी नजर आती है। 
इस पुस्तक में सिर्फ एक गलती नहीं है बल्कि अनेक तथ्यात्मक भूलें हैं। अपने इसी लेख में नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘रोमांटिक मोह के युग में भी मुक्तिबोध मोहभंग के प्रयास करते रहे। उन्होंने 1953 में यह लिखा था कि ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’।‘  नामवर सिंह अपने जीवनकाल में लगातार मुक्तिबोध की कविताओं पर बोलते-लिखते रहे थे। मुक्तिबोध को वामपंथी विचारधारा के अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील भी रहे। वामपंथी विचारधारा के कवि के तौर पर मुक्तिबोध का रेखांकन करते-करते नामवर सिंह इस कविता का प्रकाशन वर्ष लिखने में चूक कर बैठे। मुक्तिबोध की ये प्रसिद्ध कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ पटना से प्रकाशित काव्य संकलन ‘विविधा’ में छपी थी जिसका प्रकाशन 1956-57 में हुआ था। इस काव्य संकलन के संपादक राजेन्द्र किशोर और रणधीर सिन्हा थे। इस एक तथ्य के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि नामवर सिंह असावधान आलोचक थे। साहित्य के इतिहास में तिथियों का बहुत महत्व होता है और एक भी गलत तिथि का उल्लेख कालखंडों के आकलन के निष्कर्षों को गलत कर सकता है। इसी पुस्तक में एक लेख है ‘एक अन्तर्यात्रा के प्रदेश’ इस लेख की पहली पंक्ति है सन 1884 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का अवसान हुआ और रामचंद्र शुक्ल का उदय। ये तो बहुत ही बड़ी चूक है क्योंकि भारतेन्दु हरिश्चंद्र का निधन 1884 में नहीं बल्कि 1885 में हुआ। इसके आलोक में देखें तो पहली पंक्ति से वो जो स्थापित करना चाहते थे उसकी बुनियाद ही गलत थी। पता नहीं किन परिस्थितियों में नामवर सिंह ने अपने लेख में भारतेन्दु का अवसान उनकी मृत्यु के पहले ही मान लिया था। इसी लेख में ‘हंस’ के आत्मकथा अंक का प्रकाशन वर्ष 1931 बताया गया है जबकि इसका प्रकाशन 1932 में हुआ था। बाद में बनारस के एक प्रकाशक ने भी ‘हंस’ के इस अंक को प्रकाशित किया था। इस पुस्तक में तथ्यात्मक भूलों के अलावा प्रूफ और नाम में भी ढेरों गलतियां हैं, ईश्वरचंद्र को रमेशचंद्र, नागेन्द्र को नरेन्द्र, रामकुमार को राजकुमार कह दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि न तो संपादक ने और न ही प्रकाशक ने तथ्यों के अलावा लेखों में उल्लिखित नामों को जांचने का कष्ट किया। 
2019 में राजकमल प्रकाशन से ही नामवर जी के साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम है ‘आमने सामने’। इस पुस्तक का संकलन संपादन नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने किया। इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा किया गया नामवर सिंह का एक साक्षात्कार प्रकाशित है जिसका शीर्षक है, ‘भैरव का सोंटा’। इसमें एक जगह विश्वनाथ त्रिपाठी साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को छोड़ने और न छोड़ने पर उनकी राय पूछते हैं। इसके उत्तर में नामवर सिंह अपनी बात रखते हैं कि ये संस्था लेखकों की है, सरकार से क्या लेना देना। अपनी बात रखने के क्रम में वो बताते हैं कि साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ तो कृष्णा कृपलानी इसकी सचिव थीं। इसको पढ़ते हुए स्पष्ट है कि नामवर सिंह ये कह रहे थे कि कृष्णा कृपलानी महिला थीं। जबकि साहित्य अकादमी से प्रकाशित डी एस राव की पुस्तक ‘फाइव डिकेड्स’ में भी और इसके हिंदी अनुवाद में भी इस बात का साफ उल्लेख है उनका नाम कृष्ण कृपलानी था और वो पुरुष थे। भारत सरकार ने 1954 में उनको दो वर्षों के लिए साहित्य अकादमी के पहले सचिव के रूप में नियुक्त किया था। बाद में अकादमी के कार्यकारी मंडल ने उनको कई सेवा विस्तार दिए और वो 1971 तक साहित्य अकादमी के सचिव पद पर बने रहे।  अब ये इतनी हास्यापद बात है कि नामवर सिंह की छवि को देखते हुए इसको स्वीकार कर पाना थोड़ा कठिन है कि नामवर सिंह को ये नहीं पता होगा कि साहित्य अकादमी के पहले सचिव पुरुष थे, महिला नहीं। पता तो इस बात का विश्वनाथ त्रिपाठी को भी होना ही चाहिए। फिर एक संपादक भी हैं जिन्होंने इस तथ्य पर गौर नहीं किया, क्या इतनी असावधानी होनी चाहिए थी ? और सबसे उपर तो प्रकाशक की भी जिम्मेदारी बनती है। एक अच्छा आलोचक वो होता है जिसकी स्मृति बहुत अच्छी हो, वो आलसी न हो और तथ्यों की जांच करने के लिए सिर्फ अपनी स्मृति पर भरोसा न रखे और संदर्भ ग्रंथ देखने के लिए बार बार अपनी मेज से उठे। क्या नामवर इतने सतर्क आलोचक थे? लगता तो नहीं।   


Friday, March 13, 2020

असमय चला गया प्रतिभाशाली कथाकार

हिंदी के प्रतिभाशाली लेखक, कहानीकार और संपादक प्रेम भारद्वाज ने बहुत ही कम उम्र में दुनिया छोड़ दी। हिंदी साहित्य में जब राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ अपनी कहानियों और पत्रिका में उठाए गए विवादों की वजह से चर्चा बटोर रहा था तब प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ के संपादन का बीड़ा उठाया था। अपने संपादकीय कौशल की वजह से प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ को हिंदी साहित्य की एक ऐसी पत्रिका के रूप में स्थापित किया जो ‘हंस’ को चुनौती देने लगा था। राजधानी के साहित्य जगत में बहुधा इस बात की चर्चा होती थी साहित्य में अब नोएडा और दरियागंज के बीच मुकाबला है। ‘हंस’ का प्रकाशन दरियागंज से होता था जबकि ‘पाखी’ नोएडा से निकलती है। प्रेम भारद्वाज भी अपने संपादकीयों में अक्सर विवाद उठाने की कोशिश करते थे लेकिन वो राजेन्द्र यादव की तरह खुलकर नहीं खेलते थे। वो परोक्ष रूप से अपनी बात कहते थे। प्रेम भारद्वाज आज से करीब बीस-बाइस साल पहले पटना से दिल्ली आए थे। ‘पाखी’ में उन्होंने लंबे समय तक काम किया। साहित्यिक पत्रिका में संसाधनों की कमी की बात हमेशा सामने आती है लेकिन बावजूद इसके प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ की स्तरीयता को कभी कम नहीं होने दिया। पाखी में उन्होंने नए लेखकों को जोड़ा।
मुझे याद पड़ता है कि पिछले वर्ष के विश्व पुस्तक मेला में प्रेम भारद्वाज की मांग सबसे अधिक थी। हमलोग मजाक में कहते भी थे कि वो घंटे के हिसाब से कार्यक्रमों में उपस्थित हो रहे हैं। लगातार किताबों पर होनेवाले कार्यक्रमों का संचालन करना या फिर नई किताबों पर बोलना यह साबित करता था कि प्रेम भारद्वाज के अध्ययन का दायरा बहुत विस्तृत था। कुछ सालों पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। फिर अप्रिय परिस्थियों में उनको ‘पाखी’ छोड़ना पड़ा था जिसके बाद उन्होंने दिल्ली से ही ‘भवन्ति’ नाम की साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस पत्रिका के शुरुआती अंकों ने काफी चर्चा बटोरी थी। अचानक एक दिन खबर आई थी कि प्रेम भारद्वाज नोएडा के मेट्रो अस्पताल में भर्ती हो गए हैं। बाद मे पता चला था कि कैंसर ने उनको अपनी चपेट में ले लिया है। नोएडा-दिल्ली और अहमदाबाद में उनका इलाज चला और वो ठीक होने लगे थे। सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए थे और उन्होंने पाठकों को भरोसा दिया था कि जल्द ही ‘भवन्ति’ का नया अंक सामने होगा। अचानक एक दिन खबर फैली की उनको ब्रेन हेमरेज हो गया। उसके चंद दिनों बाद प्रेम भारद्वाज के निधन की खबर से हिंदी जगत सन्न रह गया। उऩका कहानी संग्रह ‘फोटो अंकल’ काफी चर्चित रहा था। प्रेम भारद्वाज ने सबरंग साहित्य के लिए कई बार लिखा था। उनको श्रद्धांजलि।

Friday, October 11, 2019

बंद गली का आखिरी मकान


मशहूर लेखक धर्मवीर भारती के एक कहानी संग्रह का नाम है ‘बंद गली का आखिरी मकान’। भारती के इस कहानी संग्रह की काफी चर्चा हुई। एक जमाने में उस पुस्तक जितनी ही चर्चा हुई थी दिल्ली के दरियागंज इलाके के एक बंद गली के आखिरी मकान की। ये मकान था साहित्यिक पत्रिका हंस का कार्यालय। 1990 के बाद के कई वर्षों में ये मकान दिल्ली की साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बन गया था। अंसारी रोड के इस मकान में हंस के संपादक और अपने जमाने के मशहूर कथाकार राजेन्द्र यादव बैठते थे। यहीं से वो हंस पत्रिका का संपादन किया करते थे। दोपहर बाद दफ्तर पहुंचते थे और उनके दफ्तर पहुंचते ही साहित्यिक रुचि के लेखकों का जमावड़ा शुरू हो जाता था। उस जमाने में तो यहां तक कहा जाता था कि जो लेखक दिल्ली आता था वो एक बार दरियागंज की इस गली में अवश्य आता था। संपादक के कमरे में काम कम अड्डेबाजी ज्यादा होती थी। काम तो पीछे वाले कमरे में सहायक संपादक और बगल वाले कमरे में हंस के सहयोगी स्टाफ करते थे। यादव जी के कमरे में अनौपचारिक गोष्ठियां हुआ करती थी। पूरे देशभर के साहित्याकारों की चर्चा होती थी, कौन क्या लिख रहा है, कौन क्या कर रहा है, कहां क्या सेंटिंग हो रही है आदि आदि। इन विषयों पर खुलकर चर्चा होती थी। इसी बीच कई रचनाकार अपनी रचनाएँ लेकर यादव जी के कमरे में आते जाते रहते थे। राजेन्द्र यादव उनसे उनकी रचनाएँ लेते थे, उनका हाल चाल पूछते और अगर रचनाकार दिल्ली के बाहर का होता तो उसके शहर के बारे में जानकारी हासिल करते।
उन दिनों हिंदी साहित्य में ये चर्चा आम थी कि सभी साहित्यिक साजिशें बंद गली के उसी मकान में रची जाती थी। लेखकों को उठाने गिराने के खेल का ताना-बाना वहीं बुना जाता था। ऐसा नहीं था कि वहां सिर्फ साजिशें ही रची जाती थी, ये राजेन्द्र यादव का एक स्टाइल भी था कि वो इन चर्चाओं से कई रचनात्मक चीजें निकाल लिया करते थे। राजेन्द्र यादव ने जब दलित और स्त्री विमर्श की शुरुआत की थी तो उसके पीछे भी हंस कार्यालय में होनेवाली अनौपचारिक चर्चाओं का बड़ा हाथ था। उन्हीं चर्चाओं में एक दिन मराठी में दलित साहित्य पर चर्चा हो रही थी तो उसी चर्चा में ये बात निकली थी कि हिंदी में दलित लेखन की स्थिति क्या है। विमर्श के माहिर राजेन्द्र यादव ने फौरन उसमें संभावना भांप ली और तत्काल दलित विमर्श की शुरुआत कर दी। हंस के कार्यालय में स्थापित से लेकर नवोदित लेखिकाओं का भी खूब आना जाना होता था। यादव जी अपनी आदत के मुताबिक सबसे हंसी मजाक किया करते थे। लेखिकाओं की एक टोली के साथ की चर्चा से ही स्त्री विमर्श का स्वर प्रसफुटित हुआ था। हिंदी के दो प्रमुख विमर्श दलित और स्त्री विमर्श की शुरुआत अंसारी रोड, दरियागंज की एक गली के आखिरी मकान से हुई थी। इल मकान ने हिंदी साहित्य की ना केवल बहुत सारी घटनाएं देखी बल्कि कई लेखक-लेखिकाओं को सफलता के शिखर पर पहुंचते हुए भी देखा। राजेन्द्र यादव के निधन के बाद हलांकि ये मकान भी है, औपचारिक गोष्ठियां भी होती हैं लेकिन वो वैचारिक या रचनात्मक उष्मा नहीं दिखाई देती है। धीरे-धीरे दरियागंज की गली का ये मकान सृजनात्मक रूप से सूना होने लगा है।

Thursday, July 4, 2019

हिंदी विभागों में रचनात्मक लेखन


हिंदी के मशहूर कथाकार और साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव हमेशा कहा करते थे कि विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग प्रतिभाओं की कब्रगाह हैं।  उनकी इस भावना का हिंदी के कई साहित्यकार समर्थन भी करते रहे हैं। यादव जी कहा करते थे कि विश्वविद्यालय और कॉलेजों के हिंदी विभागों में रचनात्मक लेखन करनेवाले लोग कम होते जा रहे हैं और जो हैं वो भी बेहद शास्त्रीय किस्म का लेखन कर रहे हैं। हो सकता है ऐसा कहने के लिए उनके पास अपनी वजहें हों लेकिन उनके वक्तव्य के पहले भी और बाद में भी कम से कम दिल्ली विश्वविद्लय के हिंदी विभाग से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के हिंदी विभागों में भी कई रचनात्मक लेखक हुए। एक दौर था जब दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज के हिंदी विभाग में गंगाप्रसाद विमल, सुधीश पचौरी, कमलकिशोर गोयनका और प्रताप सहगल जैसे लेखक शिक्षण कार्य कर रहे थे। उसी कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में भीष्म साहनी भी पढ़ाते थे। नरेन्द्र कोहली जैसे हिंदी के शीर्ष लेखक भी दिल्ली विश्वविदयालय के कॉलेज के हिंदी विभाग में पढ़ा चुके हैं। यह सूची बहुत लंबी है। मौजूदा दौर में भी दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के हिंदी विभागों में कई लेखक हैं। इनमें से कुछ लेखकों की कृतियां तो इतनी लोकप्रिय हैं कि वो दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की सूची में भी शामिल हो चुकी हैं।
दिल्ली के देशबंधु कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर संजीव कुमार हिंदी की युवा पीढ़ी के शीर्ष आलोचकों में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने कहानी पर कई अच्छी आलोचनात्मक टिप्पणियां लिखी हैं। संजीव कुमार ने अनुवाद का काम भी किया है। संजीव कुमार ने कहानी भी लिखी है। उनको आलोचना के लिए दिया जानेवाले प्रतिष्ठित देवीशंकर अवस्थी सम्मान भी मिल चुका है। संजीव कुमार ने जैनेन्द्र और अज्ञेय का सृजनात्मक मूल्यांकन भी किया है। संजीव कुमार की अभी हाल ही में कहानी आलोचना पर एक किताब भी आई है।
जाकिर हुसैन इवनिंग कॉलेज में हिंदी के चर्चित लेखक प्रभात रंजन भी हिंदी पढ़ाते हैं। मनोहर श्याम जोशी पर अभी प्रभात रंजन की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘पालतू बोहेमियन’ प्रकाशित होकर चर्चित हो रही है। इसके पहले प्रभात रंजन ने मुजफ्फरपुर की बाइयों को केंद्र में रखकर ‘कोठागोई’ ने नाम से एक औपन्यासिक कृति की रचना की थी। प्रभात रंजन जमकर अनुवाद भी करते हैं। उनकी अनूदित पुस्तक ‘आई डू व्हाट आई डू’, जिसके लेखक रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन हैं, दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की अनुवाद श्रेणी में अपना स्थान बना चुकी है।
दिल्ली विश्वविद्लय के सत्यवती कॉलेज में हिंदी के शिक्षक प्रवीण कुमार ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया है। उनकी कृति ‘छबीला रंगबाज का शहर’ दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की कथा श्रेणी में अपना स्थान बना चुकी है। उनकी इस कृति की खूब चर्चा भी हुई थी। मशहूर कथाकार काशीनाथ सिंह ने इसपर लिखा था-दूसरे शहर झख मारें बिहार के इस अलबेले छबीला रंगबाज के शहर के आगे, इसे लंबी कहानी कहूं या लघु उपन्यास, जितना ही जबरदस्त है उतना ही मस्त।
इसी तरह किरोड़ीमल कॉलेज में हिंदी विभाग से संबद्ध प्रज्ञा ने भी हाल के दिनों में एक कहानीकार के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। उनकी कहानी ‘मन्नत टेलर्स’ को पाठकों ने खूब सराहा। इसी नाम से उनका एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। दिल्ली विश्वविद्यालय के ही श्रद्धानंद कॉलेज के हिंदी विभाग में कार्यरत उमाशंकर चौधरी ने भी अपनी कहानियों से हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। उनका हाल ही में एक उपन्यास आया है, ‘अंधेरा कोना’। बिहार की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास को लेकर पाठकों में उत्सुकता है।       

Saturday, November 11, 2017

लेखकीय आत्मलज्जा का सवाल

इस स्तंभ में पहले भी कई बार चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी साहित्य के लिए फेसबुक और वहां चलनेवाली बहसें काफी महत्वपूर्ण हो गई हैं। महत्वपूर्ण इस वजह कि साहित्य की नई नई प्रवृत्तियों, रचनाओं पर तो संवाद होते ही हैं, साहित्यक विवाद भी अक्सर अब पत्रिकाओं की बजाए फेसबुक पर उठने लगे हैं। कई बार विवाद सिले हुए पटाखे की तरह उठते ही फुस्स हो जाते हैं तो बहुधा वो लंबे समय तक चलते हैं। समय के साथ साथ इन विवादों का दायरा भी विस्तार लेता है। इन दिनों फेसबुक पर साहित्यक चोरियों के आरोपों को लेकर घमासान मचा है। इस वक्त आरोपों के बवंडर में हैं हिंदी की कथाकार रजनी मोरवाल। रजनी मोरवाल पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्रियों का इस्तेमाल ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित अपनी कहानी ‘महुआ’ में किया है। पुराने फेसबुक पोस्ट के साथ साथ ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित रजनी मोरवाल की कहानियों के अंश फेसबुक पर पोस्ट किए जा रहे हैं। तमाम तरह की बातें हो रही है, आरोप लगाए जा रहे हैं । थाने, मुकदमे तक की बातें हो रही हैं। बौद्धिक संपदा की चोरी को लेकर कानूनची भी सक्रिय हैं। आरोपों के कोलाहल के बीच एक दिलचस्प मोड़ इस पूरे विवाद में आया। रजनी मोरवाल पर जिस फेसबुक पोस्ट को अपनी कहानी में उपयोग करने का आरोप लगा है उसपर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। फेसबुक पर सक्रिय चंद लोगों ने मूल फेसबुक पोस्ट को  कुबेरनाथ राय जी के निबंध का हिस्सा बताकर पोस्ट करना शुरू कर दिया। स्तंभ लिखे जाने तक इस तरह की बात करनेवाले लोग ये नहीं बता पाए हैं कि वो अंश कुबेरनाथ जी के किस निबंध का हिस्सा है। इसपर खामोशी है। कुछ लोगों का कहना है कि पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई साम्रगी और रजनी मोरवाल की कहानी के अंश दोनों गूगल बाबा की कृपा से अवतरित हुए हैं, इस कारण से दोनों में समानता है। अब सत्य क्या है इसबारे में तो आनेवाले दिनों में ही पता चल पाएगा। फिलहाल तो रजनी मोरवाल पर संगीन आरोप हैं और साहित्य जगत में आम धारणा बनती जा रही है कि उन्होंने पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्री का उपयोग बगैर क्रेडिट दिए किया। फेसबुक पर सक्रिय लोग इसको साहित्यिक चोरी कह रहे हैं। इस पूरे प्रकरण पर रजनी मोरवाल जी का पक्ष आना शेष है।   
इस घटना के बाद कुछ उत्साही लोगों ने पुराने मामलों को उछालना शुरू कर दिया, गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। रजनी मोरवाल के मुद्दे के सामने आने के बाद जयश्री राय पर को लेकर भी लोगों ने बातें करनी शुरू कर दी। उनपर भी आरोप लगाया जाने लगा कि उन्होंने अपनी कहानियों में विवेक मिश्र की नकल की, अपने उपन्यासों में मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास के अंश का उपयोग कर लिया, कहीं मृदुला गर्ग के उपन्यास की पंक्तियां जस का तस उठाकर रख दी आदि आदि। जयश्री राय को लेकर इस तरह की चर्चा पुरानी रही है। इसके पहले हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश पर भी इस तरह के आरोप लगे थे। आलोचक रविभूषण के लेख से भी विवाद हुआ था। तब भी केस मुकदमे की बातें हुई थीं, लेकिन वो फेसबुक का दौर नहीं था। साहित्यक चोरी को लेकर आजादी के पहले सरस्वती पत्रिका के अंकों में भी लेख आदि छपे थे जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।
अभी दो साल पहले दो हजार पंद्रह में भी साहित्यिक चोरी को लेकर फेसबुक पर काफी हो हल्ला मचा था। उस वक्त भी फेसबुक पर जारी चर्चा के आधार पर मैंने कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित किया था। दरअसल पिछले कुछ सालों में कुछ कवयित्रियां ऐसी आ गईं जो हैं जो पुराने कवियों की कविताओं की तर्ज पर शब्दों को बदलते हुए लोकप्रियता के पायदान पर ऊपर चढ़ना चाहती हैं। हिंदी साहित्य जगत में हमेशा से ऐसे लोग रहे हैं जो इस तरह की प्रतिभाहीन लेखिकाओं की पहचान कर उनकी महात्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाते हैं । इसके कई फायदे होते हैं । उन फायदों की फेहरिश्त यहां गिनाने का कोई अर्थ नहीं है । दो हजार पंद्रह में जब एक कवयित्री को लेकर विवाद उठा था तब भी ये बात आई थी कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक क्या कर रहे हैं, वो खामोश क्यों हैं। बयानवीर लेखक संगठन क्या कर रहे हैं। तब भी कुछ नहीं हो पाया था और आशंका है कि इस बार भी शायद ही कोई पहल हो या किसी प्रकार का ठोस कदम उठाया जा सके।  
यहां चर्चा हो रही है हिंदी साहित्य में साहित्यिक चोरी के आरोपों की जो कि एक बार फिर से उभर कर सामने आ गया है और इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में विमर्श के केंद्र में है। साहित्यिक चोरी के आरोपों पर फेसबुक पर ही निंदा करके मामला शांत हो जा रहा है। क्या साहित्यिक चोरी का सवाल बड़ा साहित्यिक सवाल नहीं है जिससे टकराने की कोशिश की जानी चाहिए। हद तो तब हो जा रही है जब उन रचनाओं को पुरस्कृत भी कर दिया जा रहा है जिनपर साहित्यिक चोरी का आरोप है। पुरस्कृत कर देने से रचनाओं को एक प्रकार की वैधता तो मिल ही जाती है। रघुवीर सहाय और पवन करण की कविताओं की छाया जिन कविताओं में दिखी थी उनपर बहुत बातें हो चुकी हैं और उनको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। इस तरह की तिकड़म करनेवाले लेखकों और लेखिकाओं को ये सोचना चाहिए कि साहित्य के पाठक इतने सजग हैं कि साहित्यिक चोरी करके कोई बचकर निकल नहीं सकता है । जब साहित्यिक चोरी पकड़ी जाती है तो यह कहकर बचने और बचाने की कोशिश की जाती है कि दोनों रचनाकारों की जमीन एक रही होगी। इसके अलावा यह भी कहा जाने लगा है कि हिंदी में साहित्यिक चोरी के ज्यादतर आरोप लेखिकाओं पर क्यों लगते हैं। ऐसा हाल में देखा जाने लगा है खासकर फेसबुक के लोकप्रिय होने के बाद से। लेकिन अगर बौद्धिक संपदा की चोरी है तो चोरी है उसमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं किया जाना चाहिए।
फेसबुक पर जो साहित्य की दुनिया है वो पत्र-पत्रिकाओं की साहित्यिक दुनिया से अलग है। फेसबुक के जरिए प्रसिद्धि हासिल करनेवालों का एक पूरा गिरोह वहां सक्रिय है। फेसबुक ये साहित्यिक गिरोह अपने गैंग के सदस्यों की रचनओं की जमकर वाहवाही करने लग जाता है । लाइक्स और कमेंट की बौछार कर दी जाती है। आम और तटस्थ पाठकों को लगता है कि कोई बहुत ही क्रांतिकारी रचना आई है । फेसबुक पर सक्रिय इस साहित्यिक गिरोह के कर्ताधर्ता ये भूल जाते हैं कि ये आभासी दुनिया है और इसका फैलाव अनंत है । इसके दायरे में जो भी चीज आ जाती है वो बहुत दूर तक जाती है । सुदूर बैठा पाठक जो साहित्य के समीकरणों को नहीं समझता है और जो गंभीरता से साहित्य को घोंटता है वह जब इस तरह की साहित्यक चोरी को देखता है तो प्रमाण के साथ उजागर कर देता है ।
अब अगर हम इस प्रवृत्ति के बढ़ते जाने की वजहों की पड़ताल करते हैं तो सबसे बड़े दोषी के तौर पर मुझे तो गूगल बाबा ही नजर आते हैं। अपनी रचनाओँ में अपने अनुभवों को और अपने ज्ञान को पिरोने की बजाए अब कुछ लेखकों ने शॉर्टकट रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। कहीं से किसी कथा का कोई प्लॉट दिमाग में आत ही सबसे पहले गूगल की शरण में जाते हैं। गूगल पर लगभग हर तरह की सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कई बार स्त्रोत के साथ तो कई बार बगैर किसी स्त्रोत के। लेखकों को अपने प्लॉट के हिसाब से जो सामग्री मिलती है उसको उठा लेते हैं और उसको अपनी रचना में इस्तेमाल कर लेते हैं। जल्दी प्रसिद्धि की चाहत में स्त्रोत आदि की जांच करने या उसका उल्लेख करने का ध्यान नहीं रहता है। जिसका परिणाम यह होता है कि दो तीन लेखकों की रचनाओं  समानता दिखाई देती है। जिसकी पहले छपी होती है उसकी बल्ले बल्ले और जिसकी बाद में छपती है उसपर साहित्यिक चोरी का आरोप।

साहित्यिक चोरी को लेकर हिंदी में गंभीर विमर्श की दरकार है और इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो इस बारे में संपादकों को भी सोचने की जरूरत है। जिन लेखकों पर आरोप लग रहे हैं उनको छापना बंद करना चाहिए या उनको अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। कायदे से तो हंस पत्रिका में रजनी मोरवाल जी का पक्ष प्रकाशित होना चाहिए और संपादक को भी अपना पक्ष रखना चाहिए। पाठकों को पता तो लगे कि दोषी कौन है और है और दोषी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। अन्यथा पत्रिका पर भी पाठकों का भरोसा कम हो सकता है।   

Saturday, June 11, 2016

हिंदी के बुढ़ाते युवा लेखक

बात  नब्बे के शुरुआती दशक की रही होगी, संभवत उन्नीस सौ तिरानवे की । उस वक्त राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका हंस की हिंदी साहित्य में तूती बोलती थी । यादव जी अपनी पत्रिका में नए नए प्रयोग के उसको नई ऊंचाई प्रदान कर रहे थे । आमतौर पर उन दिनों हंस के प्रकाशन की तिथि के आसपास पत्रिका के कार्यालय चला जाता था । उसका एक फायदा यह होता था कि डाक डाकुओं के प्रकोप से पत्रिका बच जाती थी और वक्त से पहले हंस पढ़ने की चाहत भी पूरी हो जाती थी । ऐसे ही एक दिन हंस का अंक छप कर आया था । अंत उलटते पलटते उसमें एक महिला कथाकार की तस्वीर पर नजकर गई । सालों पुरानी तस्वीर छपी थी बल्कि यों कहें कि उनकी उस जमाने की तस्वीर छपी थी जब वो युवा रही होंगी । उस वक्त वो अपने उम्र के चौथे वय में थीं लेकिन यादव जी हंस के पन्नों पर उनको जवान बनाए हुए थे । मैंने यादव जी से चुटकी ली और उसकी वजह जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि अरे वो तो अभी युवा लेखिका है । मेरे अनुमान के मुताबिक जिस यादव जी उनको युवा बता रहे थे उस वक्त वो पैंसठ के आसपास की रही होंगी । यादव जी ने इस तरह के कई युवा लेखक हिंदी साहित्य को दिए । मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि उनका मानना था पाठक कगानीकार की फोटो देखकर कहानियां पढ़ लेते हैं या इसको इस तरह भी कहा जा सकता है कि कहानीकारों की ग्लैमरस फोटो देखकर पत्रिका भी खरीद लेते हैं । इसी सोच के तहत यादव जी लेखिकाओं की तरुणाई की तस्वीरें छापते रहे और उन्होंने युवा लेखक के बारे में साहित्य में एक भ्रम की स्थिचि पैदा की । जवानी की तस्वीरें देख-देख कर रचनाकार खुद तो युवा मानचा रहा और साथी लेखकों से ये अपेक्षा भी करता रहा कि उसे युवा लेखक माना जाए । दूसरी ओर रवीन्द्र कालिया ने युवाओं पर एक के बाद एक कई अंक निकालकर हिंदी साहित्य तो युवामय कर दिया था । दर्जनों लेखक तब से लेकर अबतक युवा ही बने हुए हैं । कालिया जी ने जिलस तरह से युवा लेखकों की फौज खड़ी की थी उससे तई बेहतरीन लेखक निकल कर आए लेकिन जो बच गए वो सिर्फ युवा लेखन की दुकान खोलकर साहित्य में अपने उत्पादन को खपाने की फिराक में रहते हैं । रवीन्द्र कालिया ने कभी सोचा नहीं होगा कि उन्होंने जिन युवा लेखकों को मंच देकर साहित्य की दुनिया में लांच किया था वो लॉंचिंग पैड पर ही जमकर बैठ जाएंगे । इसी तरह से 27-28 दिसबंर 1970 में पटना में एक विशाल युवा लेखक सम्मेलन हुआ था । उस दौर के सभी चर्चित युवा लेखकों को उसमें बुलाया गया था । उस वक्त भी युवा लेखकों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी थी लेकिन मोटेतौर पर चालीस के आसपास के लेखकों को बी उसमें बुलाया गया था । कुछ अपवाद अवश्य थे । जैसे नामवर सिंह तैंतालीस के थे । परंतु ज्यादातर लेखक तीस साल के थे जिनमें अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, वेणुगोपाल. इब्राहिम शरीफ आदि थे । तब नागार्जुन को उसमें बुलाया गया था परंतु उन्होंने तब लिखा था या कहा था कि वो युवा लेखक सम्मेलन में बूढ़े बंदर की तरह इधर उधर डोलना नहीं चाहते हैं । उस वक्त जिन युवा लेखकों की पहचान की गई थी उसमें से ज्यादातर कालांतर में हिदीं साहित्य के मूर्धन्य कवि, कहानीकार और आलोचक के तौर पर स्थापित हुए ।      
दरअसल हिंदी साहित्य में युवा लेखकों को लेकर बेहद भ्रम की स्थिति है । पचास पार के लेखक अबतक खुद को युवा कहलवाना चाहते हैं । इस चाहत का असर ये होता है कि वो साठ-पैसठ तक आते आते भी लेखन में बौआ जी बने रहते हैं । हिंदी के इस तरह के कथित युवा लेखकों की स्थिति बिहार के जमींदार परिवार के बौआ जी जैसी होती है । बिहार के जमींदार परिवारों में अक्सर देखा जाता है कि जमींदार साहब के घर जब बेटा पैदा होता है तो उसको प्यार से उनके घरवाले और जमींदारी के सारे लोग बौआजी कहकर बुलाते हैं । तरुणाई खत्म होते होते बौआ जी की शादी कर दी जाती है और साल दो साल में बौआजी पिता भी बन जाते हैं । बौआजी की उम्र बढ़ती जाती है लेकिन पिता के जीवित रहने की वजह से उनको जमींदारी के काम-काज को करने का मौका नहीं मिल पाता है । वक्त बीतने के साथ साथ बौआ जी का पुत्र बड़ा होने लगता है और उसके दादा जी प्यार प्यार में उसको धीरे-धीरे जमींदारी के गुर सिखाने लग जाते हैं । इन सबसे बेखबर बौआजी तो बौआजी ही बने रहते हैं वो भी सोचते हैं कि चलो अच्छा है बेटा काम-काज सीख रहा है । इस चक्कर में जमींदार साहब के निधन या उनके बहुत बुजुर्ग होने की वजह से उनके पोते को जमींदारी की कमान मिल जाती है और बौआजी बेचारे पिता और पुत्र के बीच के सत्ता हस्तांतरण के गवाह बनकर रह जाते हैं क्योंकि वो अधेड़ हो चुके होते हैं । हिंदी की इस वक्त की कथित युवा पीढ़ी भी बौआजी सिन्ड्रोम से गुजर रहा है । पिछली पीढ़ी अब  तक जीवित और सृजनरत है और अगली पीढ़ी तैयार हो चुकी है यानि कई कथित युवा लेखक बौआजी ही बने रह गए हैं । मतलब ये कि पचास पचपन के अधेड़ होने के बावजूद वो युवा ही बने हैं या बने रहना चाहते हैं, जिसका नतीजा सबके सामने है ।
हिंदी साहित्य में युवा लेखक की कोई उम्र सीमा तय नहीं है । पचास तक तो युवा ही माना जाता है । पिछले दिनों एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में गया था तो वहां जिस लेखिका की किताब का विमोचन हो रहा था उनके बेटी दामाद भी मौजूद थे लेकिन संचालनकर्ता बार-बार उनको युवा लेखिका कह रहा था । जब जब संचालनकर्ता उनके नाम के पहले युवा शब्द का उद्घोष करता तो लेखिका महोदय के चेहरा दमकने लगता । इस तरह के कई वाकए आपको साहित्य से जुड़े आयोजनों में जाने पर देखने को मिल सकते हैं । हिंदी के इन अधेड़ लेखकों को युवा कहलवाने की क्या जरूरत है यह बात आजतक मेरे समझ से बाहर की रही है । इन अधेड़ लेखकों की इस चाहत को समझते हुए युवाओं को मंच देनेवाले कई संस्था साहित्य में सक्रिय हैं । वो खुद को युवाओं का माल बेचने वाले दुकानदार के तौर पर पेश करते हैं । तीस के आसापास के उम्र के लेखकों की रचनाओं के साथ साथ इन बुढ़ाते लेखकों की रचनाएं आदि छापकर उनकी युवा बने रहने की आकांक्षा को तृप्त करते रहते हैं । यहां वो भी राजेन्द्र यादव की राह पर चलते हुए लेखिकाओं और लेखकों की उन तस्वीरों को तवज्जो देते हैं जिनमें बालों की सफेदी ना दिखाई दे । वैसे भी हिंदी साहित्य में बालों की सफेदी को छुपाने का जबरदस्त रिवाज है । इसका फायदा यह होता है कि दूर-दराज के जो पाठक इन मंचों पर पहुंचते हैं और इन कथित युवा लेखकों या लेखिकाओं से मिले नहीं होते हैं वो उनको युवा मान लेते हैं और रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते वक्त भी युवा छवि को ध्यान में रखते हैं । इन अधेड़ लेखकों को युवा बनाए रखने में पाठकों की प्रतिक्रियाएं संजीवनी का काम करती हैं । रही सही कसर फेसबुक पूरी कर देती है जहां युवा की परिभाषा किसी चौहद्दी में नहीं बांधी जा सकती है । बस आपके चार छह लेखकनुमा फेसबुकिया गुंडे आपके साथ खड़े हों जो सच कहनेवालों के खिलाफ अंटशंट लिखकर उनको अपमानित कर सकें । इनके दम पर आप जबतक चाहें युवा बने रह सकते हैं । दरअसल एक और बड़ी बिडंवना इनके साथ है ये खुद को मौके बे मौके वरिष्ठ कहलवाना भी पसंद करते हैं और युवाओं के संग युवा होने का मौका भी नहीं गंवाते हैं । इस वक्त पूरे देश में साहित्य से लेकर राजनीति तक में राग युवा बजाया जा रहा है तो हिंदी के अधेड़ साहित्यकार भी इस राग में शामिल होना चाहते हैं ।

इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि हिंदी के युवा लेखक की अधिकतम उम्र कितनी होनी चाहिए । क्या आज हिंदी के किसी लेखक में ये साहस है कि वो नागार्जुन की तरह युवाओं के नाम पर होनेवाले अखिल भारतीय आयोजन में जाने से इंकार कर दे । फिलहाल तो ऐसा कोई लेखक या लेखिका दिखाई नहीं देता है । युवा की अगर शब्दकोश की परिभाषा को छोड़ भी दें तो एक सीमा तो होनी चाहिए । हिंदी के मृतप्राय लेखक संगठनों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वो इस तरह की कोई पहल करेंगे । पहल तो खुद साहित्यकारों को ही करनी होगी और युवा कहलवाने के लाभ लोभ को त्यागना होगा । 

Tuesday, September 8, 2015

'हंस' के तेवर को क्या हुआ

पिछले हफ्ते 28 अगस्त को हिंदी की बहुपठित और प्रतिष्ठित पत्रिका हंस के संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव का जन्मदिन था । आज अगर यादव जी जीवित होते तो वो छियासी साल के होते । करीब दो साल पहले जब उनका निधन हुआ था तब ये सवाल उठा था कि उनके संपादन में निकलनेवाली पत्रिका हंस का क्या होगा । उनकी मृत्यु के बाद कथाकार और रंगकर्मी संजय सहाय को हंस के संपादन की कमान सौंपी गई । राजेन्द्र जी के निधन के बाद जो अंक निकला था उसमें यादव जी की पत्नी और वरिष्ठ कथाकार मन्नू भंडारी ने पाठकों को आश्वस्त किया था कि हंस लगातार निकलता रहेगा । उस संदेश में यह भी अंतर्निहित था कि यादव जी की परंपरा पर ही हंस आगे बढ़ेगा । हंस की आवर्तिता बरकरार है लेकिन यादव जी की कमी को साफ तौर पर खटक रही है । राजेन्द्र यादव के संपादन में जब हंस निकलता था तो उसकी अपनी एक अलग पहचान और अलग तेवर था । दरअसल राजेन्द्र जी में हर अंक में कुछ नया करने की ललक होती थी । इसके लिए वो महीने भर लगातार लेखकों और पाठकों से संवाद करते थे । बातीचत में वो हमेशा ये कहा करते थे कि एक संपादक को लगातार संवाद करते रहना चाहिए था । नतीजा सबके सामने था । मेरा मानना है कि वो जितने बेहतर कहानीकार थे उतने ही बेहतर संपादक भी थे, थोड़े बेहतर भी कह सकते हैं । उनके संपादन में हंस ने जिस वैचारिक ताप से हिंदी साहित्य को झकझोरा था वो ठंडा पड़ता नजर आ रहा है । हंस के संपादकीय के लिए हमारे जैसे पाठक पूरे महीने इंतजार करते थे । यादव जी एक स्टैंड लेते थे और फिर उसपर बहस ही नहीं करते थे बल्कि टिके भी रहते थे, तमाम विरोध और आक्रमणों के बावजूद ।
यादव जी के बाद हंस को निकलते लंबा वक्त हो गया । अबतक नए संपादक की छाप उसपर दिखने लगनी चाहिए थी । लेकिन हंस अब एक आम साहित्यक पत्रिका की भीड़ में शामिल हो गया है । जिसमें कुछ नियमित स्तंभ होते हैं, चंद कहानियां होती हैं और कुछ कविताएं । राजेन्द्र जी हमेशा कहा करते थे कि छोटे लेख लिखा करो । उनकी भाषा में – ज्यादा ज्ञान मत पेलो यार । पाठकों पर रहम करो । अब ये देखकर हैरानी होती है कि हंस में अकादमिक किस्म के, लंबे-लंबे बोरियत से भरपूर लेख प्रकाशित होते हैं । हंस को हंस बनाने के लिए यादव जी जितने सक्रिय या सजग रहते थे उसका अभाव दिखता है । यादव जी की एक खास बात और थी कि वो पूरे विश्व में साहित्य जगत में नया क्या हो रहा है इसको जानने के लिए उत्सुक ही नहीं रहते थे, हंस के पाठकों तक उसको पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील भी रहते थे । लिहाजा उनसे विश्व साहित्य पर बात करके बहुत मजा आता था । कई बार वो ये भी कहते थे कि अमुक तरह की रचना तो पचास के दशक में फलां लेखक ने लिखी थी । यादव जी खुद ही नया से नया पढ़ते थे और उसमें से अगर उनको कुछ पाठकों के लिए जंचता था तो फौरन उसको छापते थे । हंस से जुड़े लोग इस बात की तस्दीक कर सकते हैं । हलांकि यादव जी को सौ फीसदी जानने और समझने का दावा कोई नहीं कर सकता है । उन्होंने खुद एक साक्षात्कार में मुझसे कहा था कि वो खुद अपने को नहीं समझ पाए तो और कोई क्या उनको समझ पाएगा । यादव जी के जाने के बाद हिंदी जहत में जो सन्नाटा पैदा हुआ है वो उनके निधन के लगभग दो साल बाद भी थोड़ा भी भरा नहीं जा सका है । हंस से जो अपेक्षा थी वो अबतक अपेक्षा ही है ।


Thursday, August 27, 2015

साहित्यक स्पांरशिप के विरोधी

आज अगर समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य में एक अजीब तरह का ठंडापन और वैचारिक सन्नाटा जैसा नजर आता है तो हंस पत्रिका के संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव की कमी शिद्दत से महसूस की जाती है । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजेन्द्र यादव हिंदी के संभवत आखिरी सार्वजनिक बुद्धिजीवी थी । साहित्य के अलावा सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर उनकी स्पष्ट राय होती थी जो वो प्रकट भी करते थे । इस बात की परवाह किए बगैर कि उसका अंजाम क्या होगा । अपनी टिप्पणियों की वजह से उनको कई रातें पुलिस सुरक्षा में गुजारनी पड़ी थी । दूसरी बात जिसकी कमी आज महसूस होती है वो है एक सक्रिय साहित्यक संपादक की । राजेन्द्र जी के वक्त हंस पत्रिका में एक धार और उसका तेवर साफ तौर पर दिखता है जो उनके निधन के बाद निस्तेज हो गया है । इसकी भी वजह थी । राजेन्द्र यादव लगातार लेखकों के संपर्क में रहते थे, नए और पुराने । ना सिर्फ संपर्क में रहते थे बल्कि उनको उकसाते भी रहते थे । उकसाते थे लेखन के लिए, उकसाते थे साहित्य सवालों से मुठभेड़ करने के लिए । बहुधा इसके लिए उनके विरोधी और प्रसंसक दोनों उनको विवादाचार्य कहा करते थे । इन विशेषणों से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था । कहना ना होगा कि यह उनके लगातार संवाद का नतीजा था कि हंस पत्रिका को वो इतने लंबे समय तक निकालने और पाठकों का पहला पयार बनाने में सफल रहे । राजेन्द्र जी के अलावा ये गुण रवीन्द्र कालिया में भी है । वो भी लेखकों से लगातार संवाद बनाए रखते थे और उसका नतीजा उनके संपादन में निकले ज्ञानोदय के अंकों में दिखता भी था । खासकर साहित्य के संपादकों के लिए यह जरूरी है कि वो अपने लेखकों के संपर्क में रहें और किस लेखक से क्या लिखवाना है इस बारे में उनका विजन साफ रहे । राजेन्द्र यादव के निधन के बाद इसका अभाव साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता है ।
राजेन्द्र यादव एक और बात कहा करते थे – साहित्य स्पांटेनियटि ( स्वत:स्फूर्त ) का गेम है स्पांसरशिप का नहीं । राजेन्द्र जी के हंस संपादक रहते वहां भी स्पांटेनियटि और स्पांसरशिप का गेम दिखता था, लेकिन उसका अनुपात दाल में नमक की तरह होता था । इन दिनों तो स्पांटेनियटि पर पूरी तरह से स्पांसरशिप साहित्य जगत पर हावी हो गई है, नमक में दाल की तरह । लेखकों पर मोटे मोटे अंक प्रकाशित हो रहे हैं जो लगभग अभिनंदन ग्रंथ की तरह हैं, भक्तिभाव से सराबोर । आप हमें पुरस्कार दो हम आपको सम्मानित करेंगे । आप सेमिनार में हमें बुलाओ, हम गोष्ठियों में आपको आमंत्रित करेंगे, आदि आदि । सभी जानते हैं कि ये खेल तल रहा है लेकिन कोई भी लेखक इनसब पर कुछ लिखता नहीं है ।  राजेन्द्र यादव होते तो कम से कम अपने संपादकीय में इसका विरोध अवश्य करते । इन दिनों वरिष्ठ साहित्यकारों ने जिस तरह से साहित्यक और सामाजिक मु्दों पर खामोशी अख्तियार कर ली है वो पूरे साहित्य जगत के लिए ना तो अच्छा संकेत दे रही है और ना ही इससे अच्छा संकेत निकल रहा है । यादव जी के संपादकत्व के दौर की पत्रिका हंस को याद करते हुए इस वक्त के हंस को देखते हुए दुख होता है । यादव जी हमेशा आलोचनानुमा बोझिल लेखों के खिलाफ थे । वो अपने खिलंदड़े अंदाज में कहा करते थे कि यार ! बहुत ज्ञान पेल दिया है, इतना बरदाश्त नहीं हो रहा है । यादव जी की एक और खासियत यह थी कि वो खुद तो नए से नए किताबों के बारे में जानने को उत्सुक रहते ही थे, हिंदी के पाठकों तक उस जानकारी को पहुंचाने के लिए सजग और प्रयत्नशील रहा करते थे । किसी नई किताब की चर्चा करने पर एकदम बच्चे की चरह जिद पर उतारू हो जाते थे कि आज ही भेजो, आज ही मंगवाता हूं आदि आदि । आज अगर यादव जी जीवित होते तो छियासी साल के होते । उनकी स्मृति को नमन ।

Saturday, August 3, 2013

विचारों का वामपंथी फासीवाद

प्रेमचंद की जयंती के मौके पर हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका हंस की सालाना गोष्ठी राजधानी दिल्ली के साहित्यप्रेमियों के लिए एक उत्सव की तरह होता है । जून आते आते लोगों में इस बात की उत्सुकता जागृत हो जाती है कि इस बार हंस की गोष्ठी के लिए उसके संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव किस विषय का चुनाव करते हैं । इस उत्सुकता के पीछे पिछले अट्ठाइस साल से इस गोष्ठी में होने वाला गहन चिंतन और मंथन करनेवाले प्रतिष्ठित वक्ताओं के विचार रहे हैं । पिछले तीन चार सालों से इस गोष्ठी पर विवाद का साया मंडराने लगा है । कई लोगों का कहना है कि राजेन्द्र यादव जानबूझकर विषय और वक्ता का चुनाव इस तरह से करते हैं ताकि विवाद को एक जमीन मिल सके । हो सकता है ऐसा सोचनेवालों के पास कोई ठोस और तार्किक आधार हो, लेकिन इतना तय है कि इस आयोजन में बड़ी संख्या में राजधानी के बौद्धिकों की सहभागिता होती है । पूर्व में हंस पत्रिका की संगोष्ठी में हुए विमर्श की गरमाहट राजधानी के बौद्धिक समाज के अलावा देशभर के संवेदनशील लोगों ने महसूस की । लेकिन इस वर्ष की हंस की संगोष्ठी साहित्य से जुड़े एक ऐसे विषय से जुड़ा है जिसपर साहित्य जगत को गंभीरता से सोचने की आवश्कता है । इस बार की संगोष्ठी ने खुद को हिंदी समाज का प्रगतिशील और जनवादी बौद्धिक तबका करार देने वालों के पाखंड को उजागर कर दिया ।
दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा । प्रेमचंद की जयंती इकतीस जुलाई को होने वाले इस सालाना जलसे का विषय था- अभिव्यक्ति और प्रतिबंध – और वक्ता के तौर पर हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दीक्षित और पूर्व भारतीय जनता पार्टी नेता गोविंदाचार्य, अंतराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका और नक्सलियों की हमदर्द अरुंधति राय, नक्सलियों के एक और समर्थक और कवि वरवरा राव को आमंत्रित किया गया था । वरवरा राव की कविताओं से हिंदी जगत परिचित हो या ना हो लेकिन उनकी ऐसी क्रांतिकारी छवि गढ़ी गई है जो उनको वैधता और प्रतिष्ठा दोनों प्रदान करती है । माओवाद के रोमांटिसिज्म और मार्क्सवाद की यूटोपिया की सीढ़ी पर चढ़कर वो प्रतिष्ठित भी हैं । कार्यक्रम की शुरुआत शाम पांच बजे होनी थी। अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य तो समय पर पहुंच गए । अरुंधति राय और वरवरा राव का घंटे भर से ज्यादा इंतजार के बाद कार्यक्रम शुरु हुआ । पहले तो बताया गया कि वरवरा राव दिल्ली पहुंच रहे हैं और कुछ ही वक्त में सभास्थल पर पहुंच रहे हैं । नहीं पहुंचे । कार्यक्रम के खत्म होने के बाद से सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर चर्चा शुरु हो गई । किसी ने लिखा कि जनपक्षधर कवि वरवरा राव ने हंस के कार्यक्रम का बहिष्कार किया क्योंकि उन्हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था । किसी ने अरुंधति की बगैर मर्जी के कार्ड पर नाम छाप देने को लेकर राजेन्द्र जी पर हमला बोला ।  
यह सब चल ही रहा थी कि सोशल मीडिया पर ही वरवरा राव का एक खुला पत्र तैरने लगा । उस पत्र की वैधता ज्ञात नहीं है लेकिन कई दिनों के बाद भी जब वरवरा राव की तरफ से कोई खंडन नहीं आया तो उस खत को उनका ही मान लिया गया है । उस पत्र में वरवरा राव ने गोष्ठी में नहीं पहुंचने की बेहद बचकानी और हास्यास्पद वजहें बताईं । अपने पत्र में वरवरा राव ने लिखा- मुझे हंस की ओर से ग्यारह जुलाई को लिखा निमंत्रण पत्र लगभग दस दिन बाद मिला । इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेन्द्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण पत्र में डाल देने की घोषणा कर रखी थी । बहरहाल मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन और क्यों और किस मंशा से बुला रहा है । मेरे साथ इस मंच पर मेरा साथ बोलनेवाले कौन हैं । वरवरा राव के इस भोलेपन पर विश्वास करने का यकीन तो नहीं होता लेकिन अविश्वास की कोई वजह नहीं है । भोलापन इतना कि किसी ने बुलाया और आप विषय देखकर चले गए । वरवरा राव ने आगे लिखा कि दिल्ली पहुंचने पर उनको यह जानकर हैरानी हुई कि उनके साथ मंच पर गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी हैं । राव के मुताबिक अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट से जुड़ाव सर्वविदित है । राव यहीं तक नहीं रुकते हैं और अशोक वाजपेयी की प्रेमचंद की समझ को लेकर भी उनको कठघरे में खड़ा कर देते हैं । इसके अलावा गोविंदाचार्य को हिंदूवादी राजनीति करनेवाला करार देते हैं। गोविंदाचार्च के बारे में उनकी राय सही हो सकती है लेकिन अशोक वाजपेयी के कॉरपोरेट से संबंधों की बात वरवरा राव की अज्ञानता की तरफ ही इशारा करती है । वरवरा राव को अशोक वाजपेयी का सांप्रदायिक राजनीति से विरोध ज्ञात नहीं है । शायद हिंदी के चेले चपाटों ने उन्हें बताया नहीं । खैर अशोक वाजपेयी वरवरा राव से कमतर ना तो साहित्यकार हैं और ना ही उनसे कम उनके सामाजिक सरोकार हैं । अशोक वाजपेयी को राव के सर्टिफिकेट की भी जरूरत नहीं है  । अरुंधति की तरफ से समारोहा में उनके ना आने की वजह का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया । लेकिन साहित्यक हलके में यही चर्चा है कि उनको भी गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था । अरुंधति हंस के कार्यक्रम में पहले भी ऐसा कर चुकी हैं जब उनको और छत्तीसगढ़ के डीजी रहे विश्वरंजन को एक मंच पर आमंत्रित किया गया था । उस वक्त भी वो नहीं आई थी ।  
दरअसल हंस की गोष्ठी के दौरान हुआ यह ड्रामा वामपंथी फासीवाद का बेहतरीन नमूना है । वरवरा राव ने अपने खुले पत्र में खुद की लाल विचारधारा का भी परचम लहराया है । राजसत्ता द्वारा अपनी अपनी प्रताड़ना का छाती कूट कूट कर प्रदर्शन किया है ।  राजेन्द्र यादव भी खुद को वामपंथी रचनाकार कहते रहे हैं लेकिन इस मसले पर वामपंथियों के इस फासीवाद के बचाव में उनके तरकश में कोई तीर है नहीं, बातें चाहे वो जितनी कर लें। राजनीति की किताबों में फासीवाद की परिभाषा अलग है लेकिन लेनिन के परवर्तियों ने फासीवाद की अलग परिभाषा गढ़ी । उसके मुताबिक फासीवाद अन्य लोकतांत्रिक दलों का खात्मा कर पूरे समाज को एक सत्ता में बांधने का प्रयास करता है । फासीवाद के उनके इस सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण रूस और चीन हैं जहां लाखों लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता की विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी । सैकड़ों नहीं, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया । वामपंथी राजनीति का दुर्गुण ही यही है कि जिसे वो फासीवाद मानते हैं वास्तविकता में उसी को अपनाते हैं । हंस की गोष्ठी में वरवरा राव और अरुंधति का गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ शामिल नहीं होना यही दर्शाता है । दरअसल यह विचारों का फासीवाद तो है ही एक तरह से विचारों को लेकर अस्पृश्यता भी है । क्या वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों के पास इतनी तर्कशक्ति नहीं बची कि वो दूसरी विचारधारा का सामना कर सकें । क्या वाम विचारधारा के अंदर इतना साहस नहीं बचा कि वो दूसरी विचारधारा के हमलों को बेअसर कर सकें । अगर मैं ऑरवेल के डबल थिंक और डबल टॉक शब्द उधार लूं तो कह सकता हूं कि हिंदी समाज के वामपंथी विचारधारा को माननेवाले लोग इस दोमुंहे बीमारी के शिकार हैं । दरअसल सोवियत संघ के विघटन के बाद भी हमारे देश के मार्क्सवादियों ने यह सवाल नहीं खड़ा किया कि इस विचारधारा में या उसके प्रतिपादन में क्या कमी रह गई थी । दरअसल सवाल पूछने की जगह भारत के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने मार्कसवाद की अपने तरीके से रंगाई पुताई की और उसकी बिनाह पर अपनी राजनीति चमकाते रहे । रूस में राजसत्ता का कहर झेलनेवाले मशहूर लेखक सोल्झेनित्सिन ने भी लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है ।‘ भारत में इस तरह के उदाहरण लगातार कई बार और बार बार मिलते रहे हैं । एक विचारधारा के तौर पर मार्क्सवाद पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं लेकिन उसको एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता है । लेकिन इस विचारधारा के वरवरा राव जैसे अनुयायी उसको फासीवादी बाना पहनाने पर आमादा हैं । राव और अरुंधति को गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ अभिव्यक्ति और प्रतिबंध विषय पर अपने विचार रखने चाहिए थे । अपने तर्कों से दोनों को खारिज करते । लेकिन हमारे समाज में वरवरा राव जैसे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अब भी मौजूद हैं जो विचारधारा की कारागार में सीखचों के पीछे रहकर प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं । इस बार जिस तरह से हंस की गोष्ठी में राव और राय के नहीं आने को लेकर सोशल मीडिया और अखबारों में संवाद शुरू हुआ है उससे तो यही कहा जा सकता है कि हंस की गोष्ठी अब शुरू हुई है और वो विचारों के कारागार से मुक्त है ।
 

Friday, August 12, 2011

...किसी से हो नहीं सकता


हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद खास दिन होता है । इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है । लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो यह ज्ञात नहीं है । प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी टाइप के कार्यक्रम हो जाते हैं जिसमें मंत्री वगैरा भाषण आदि देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं । इस बार भी वहां कुछ वैसा ही हुआ । लेकिन तकरीबन पिछले पच्चीस साल से हंस पत्रिका प्रेमचंद के जन्मदिन पर दिल्ली में एक विचार गोष्ठी का आयोजन करती रही है । इस बार भी किया । राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलते हुए इस पत्रिका के पच्चीस साल हो गए हैं, लिहाजा मौका खास था । हंस की रजत जयंती वर्ष और प्रेमचंद की जयंती । दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब के हॉल में हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था । हर साल की तरह इस वर्ष भी साहित्यक जमात का ठीक-ठाक जमावड़ा लगा था । हर तबके के लेखक वहां मौजूद थे। दो तीन पीढ़ी के लेखक तो थे ही । मैं जब पहुंचा तो उसके कुछ देर बाद बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तस्लीमा नसरीन भी वहां आईं । तसलीमा के साथ एक सुरक्षाकर्मी भी था । लेकिन मैं ये देखकर हैरान रह गया कि तसलीमा को काफी देर तक खड़ा रहकर इधर उधर देखना पड़ा । उनको लेकर वहां मौजूद लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखा । लेकिन कुछ देर जब वो अकेली खड़ी रहीं तो फिर किसी ने उन्हें हॉल का रास्ता दिखाया । ये वही तसलीमा थी जो तकरीबन दस साल पहले वाणी प्रकाशन के एक कार्यक्रम में दिल्ली आई थी तो लगा था कि राजधानी में कोई घटना घटी हो । दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हॉल में तिल रखने की जगह नहीं थी । देशी-विदेशी मीडिया के दर्जनों कैमरे और पत्रकार तो वहां मौजूद थे ही, हिंदी का बड़ा से बड़ा लेखक भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को बेताब था । तस्लीमा की एक झलक पाने के लिए लोग उतावले हो रहे थे, तस्लीमा के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लोग सिफारिश कर रहे थे । हमारे मित्र अरुण महेश्वरी से । लेकिन उस वक्त अपने आयोजन की सफलता से गदगद अरुण जी ने लोगों को छोड़ दिया और तसलीमा के साथ अशोक वाजपेयी और कुंवर नारायण को लेकर लंच के लिए चले गए । जबतक तसलीमा वहां रही कैमरे का फ्लैश बंद होने का नाम नहीं ले रहा था । जींस और टी शर्ट पहने छरहरी काया की तस्लीमा अपने स्वागत से भाव विभोर थी । लेकिन सिर्फ दस साल में माहौल कितना बदल गया । तस्लीमा दिल्ली की उसी साहित्यिक जमात के बीच खड़ी थी लेकिन उनका कोई नोटिस नहीं ले रहा था । वजह चाहे जो भी हो । खैर ये एक अलग बात है जो प्रसंगवश मैं कह गया ।
हम बात कर रहे थे हंस के 25 साल पूरे होने की ।राजेन्द्र यादव जी ने कार्यक्रम की शुरूआत की और हंस के शुरुआती दिनों के अपने दोस्तो- लालानी जी और गौतम नवलखा आदि को शिद्दत से याद किया । छोटा सा भाषण भी दिया और टॉलस्टॉय की एक कहानी भी सुनाई । मैं लंबे समय से राजेन्द्र जी को सुनते आ रहा हूं उस दिन पहली बार लगा कि पाइप और सिगरेट के कश ने उनको काफी कमजोर कर दिया है । हिंदी साहित्य का अस्सी साल का ये जवान शारीरिक रूप से भले ही कमजोर लग रहा हो लेकिन हौसले अब भी बुलंद नजर आ रहे थे । राजेन्द्र यादव ने अपना भाषण समाप्त कर हिंदी के दलित लेखक अजय नावरिया को मंच संचालन के लिए बुला लिया । यहीं से समारोह की गरिमा के खत्म होने की शुरूआत हो गई । अजय नावरिया ने बेहद मसखरेपन के साथ मंच संचालन शुरू किया । मंच संचालन इतना खराब था कि उसकी चर्चा करना समय बर्बाद करना है । लेकिन जिस अपमानजनक तरीके की टिप्पणी अजय ने अपने मंच संचालन के दौरान की उसके लिए उसे कम से कम दुर्गा से तो माफी मांगनी ही चाहिए । दुर्गा प्रसाद राजेन्द्र जी के पुराने सहयोगी हैं । उन्हें भी इस मौके पर सम्मानित किया गया । स्मृति चिन्ह के साथ एक लिफाफा दिया गया । गिफ्ट देते वक्त अजय ने कहा – दुर्गा जी तो दो पैंट शर्ट के कपड़ा दिया जा रहा है जो उनके लिए उपयोगी है । वो इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने सार्वजनिक रूप से दुर्गा की खुराक के बारे में टिप्पणी कर डाली। काफी देर तक साहित्यिक जमात ने अजय तो झेला लेकिन जब लोगों का धैक्य जवाब दे गया तो कुछ उत्साही लोगों ने उसे हूट कर बैठा दिया । भीड़ जबतक इंसाफ कर पाती तबतक अजय नावरिया ने साहित्यिक समारोह की गरिमा को समूल रूप से नष्ट कर दिया था । काफी देर तक चले मसखरेपन के बाद लालानी जी ने बोलना शुरू किया । उन्होंने राजेन्द्र यादव के साथ अपने शुरुआती दिनों को याद किया । बोले तो गौतम नवलखा और अर्चना वर्मा भी । दोनों ने बेहद संक्षिप्त बोला और सिर्फ हंस की तारीफों के पुल बांधे । अर्चना वर्मा ने हंस के साथ के अपने दिनों को बताया कि किस तरह से वो सिर्फ परख देखने के लिए हंस में आई थी और किस तरह से उन्हें कहानी और फिर कम पड़ रहे लेख भी लिखवाया जाने लगा ।
इसके बाद बारी थी हिंदी के हिरामन नामवर सिंह की । नामवर जी को हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर बोलना था लेकिन बोले वो सिर्फ हंस पर । शुरुआत तो उन्होंने – मेरे दुश्मन राजेन्द्र यादव से की लेकिन उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव के हौसले की जबरदस्त तारीफ की । सार्वजनिक रूप से अपनी तारीफ सुनकर मंच पर बैठे यादव जी का चेहरा लाल-लाल हो रहा था । शरमा इस तरह रहे थे जैसे कोई नई नवेली दुल्हन शर्माती है । लेकिन नामवर जी तो अपनी रौ में थे । अपने विरोधियों को अपनी पत्रिका में जगह देने के लिए भी उन्होंने यादव जी की नामवरी अंदाज में सराहना की । उसी नामवरी अंदाज में अशोक वाजपेयी पर हमला भी बोला । नामवर जी ने कहा कि अशोक जब पूर्वग्रह के संपादक थे तो अपने पूर्वग्रहों के साथ उसका संपादन करते थे । उन्होंने कभी राजेन्द्र यादव को पत्रिका में नहीं छापा लेकिन राजेन्द्र ने हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक में अशोक वाजपेयी से ही लिखवाया । बोलते बोलते नामवर सिंह ने अशोक वजपेयी को कायर और यादव जी को बहादुर करार दे दिया । नाम तो रवीन्द्र कालिया और अखिलेश का भी आया है । नामवर सिंह बहुत कम बोले । साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रकाश डालते तो मौजूद श्रोताओं का ज्ञानवर्धन होता । उसके बाद कुछ सवाल जवाब भी हुए । लेकिन नामवर सिंह ने एक जोरदार शेर के साथ अपनी बात खत्म की – जो हो सकता है इससे वो किसी से हो नहीं सकता, मगर देखो तो जो हो सकता है वो आदमी से हो नहीं सकता ।
दिल्ली में हुए इस साहित्यक जलसे से एक बात साफ हो गई कि राजेन्द्र यादव हर उम्र के बीच खासे लोकप्रिय हैं । कार्यक्रम से बाहर निकलते हुए मैं एक बार फिर से सोच रहा था कि अंग्रेजी में अगर किसी लिटरेरी मैगजीन के प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे होते तो क्या इस तरह का ही समारोह मनाया जाता । जवाब मिला नहीं । तो फिर हम हिंदी के लोग क्यों नहीं अपने गौरव का सम्मान कर पाते हैं । क्यों नहीं हमारा मीडिया इस तरह की समारोह को कवरेज देता है । इन सवालों से जूझता हुआ मैं घर लौट आया । सवाल अब भी मेरा पीछा कर रहे हैं ।

Tuesday, August 2, 2011

साहित्यिक “डॉन” का कारनामा

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने के लिए अक्सर मैं दिल्ली के मयूर विहार इलाके में जाता हूं । जहां लोक शॉपिंग सेंटक के पास फुटपाथ पर तीन दुकानें लगती है । बिपिन के बुक स्टॉल पर मैं तकरीबन डेढ दशक से जा रहा हूं । इस बीच वहां पत्र-पत्रिकाओं की तीन दुकानें सजने लगी । जैसे ही मैं उसके पास पहुंचता हूं तो बिपन की दुनकान पर मौजूद शख्स मुझे या तो हंस या कथा देश या फिर पाखी पतड़ा देगा । जबतक मैं मयूर विहार इलाके में रहा तो उसकी दुकान पर नियमित जाता रहा । उसके बाद अब तो हफ्ते में एक बार ही जाना हो पाता है । वो भी इस वजह से कि इंदिरापुरम इलाके में कोई अच्छी दुकान नहीं हैं जहां साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध हो । यह एक बड़ी समस्या है । किस तरह से किसी खास पत्रिका या अखबार खरीदने के लिए दस बारह किलोमीटर जाना और फिर लौटना पड़ता है । खैर अगर मौका मिला तो इस विषय पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा । अभी तो जब मैं मयूर विहार के बुक स्टॉल पर गया तो उसने मुझे हंस शुक्रवार, समेत कई पत्र-पत्रिकाएं पकड़ा दिया । घर लौटकर जब उन पत्र-पत्रिकाओं को उलटना पलटना शुरू किया तो हंस के ताजा अंक पर छब्बीसवें वर्ष का पहला अंक देखकर चौंका । अगस्त दो हजार ग्यारह का अंक का मुखपृष्ठ गर्व से इसकी उद्घोषणा कर रहा था कि हमने अपने प्रकाशन के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं । है भी यह गर्व की ही बात । जब हमारे देश में एक-एक करके सारी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो रही थी तो उस माहौल में हंस ने अपने आपको शान से जिंदा रखा । ना केवल जिंदा रखा बल्कि हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं को सेठाश्रयी पत्रिकाओं की भाषा, कलेवर और तेवर तीनों से मुक्त कर एक नया रास्ता गढ़ा । नए रास्ते पर चलना हमेशा से खतरनाक माना जाता है । राजेन्द्र जी की इस बात के लिए तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हंस के लिए ना केवल नया कास्ता तलाश किया बल्कि निर्भीक होकर, आलोचनाओं के तीर झेलते हुए उसे नए रास्ते पर ही चलाए रखा ।
हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक को देखकर मैं थोड़ा नॉस्टेलिक भी हो गया । मुझे अपने कॉलेज के दिनों और अपने शहर जमालपुर की याद आ गई । हमाके शहर में रेलवे स्टेशन पर ए एच व्हीलर का स्टॉल ही हमारे लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हुआ करता था । अस्सी के दशक के अंत में जमालपुर का व्हीलर स्टॉल इलाहाबाद के पांडे जी का हुआ करता था । वो साहित्यप्रेमी थे इस वजह से उनके स्टॉल पर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी । राजस्थान से निकलनेवाली पत्रिका मधुमती तक उनके पास पहुंचती थी, पहल, वसुधा इंद्रपर्स्थ भारती आदि-आदि तो आती ही थी । मैंने पहली बार हंस वहीं से खरीदा था । महीना और साल ठीक से याद नहीं है । लेकिन फिर तो हंस का हर अंक खरीदने लगा, पढ़ने लगा । मंडल आंदोलन के दौरान और उसके बाद राजेन्द्र यादव के स्टैंड से घनघोर असहमतियां रही लेकिन कभी हंस खरीदना बंद नहीं किया । जमालपुर में हंस की दस प्रतियां आती थी जो महीने ती सात या फिर आठ तारीख को पहुंचती थी । दिल्ली से प्रतियां वी पी पी से आया करती थी । इस पद्धति में डाकघर जाकर वहां पैसे जमा करने के बाद ही बंडल मिलता था । व्हीलर के हमारे पंडित जी के लिए हंस का बंडल भी अन्य किताबों के बंडल की तरह से होता था । जब वक्त मिलता था तो किसी को भेजकर डाकघर से बंडल मंगवा लेते थे । लेकिन होता ये था कि पटना में हंस रेल से आता था जो दो तीन दिन पहले आ जाया करता था । वहां से मित्रों का फोन आना शुरू हो जाता था कि हंस में फलां लेख या फलां कहानीकार की कहानियां देखी । जो हमारी बेचैनी बढ़ा दिया करती थी । मुझे याद है कि कई बार मैं खुद डाकघर जाकर हंस के बंडल छुड़वा कर व्हीलर के स्टॉल पर पहुंचाया करता था । बाद में हमने हमने हंस को जल्दी पाने का एक विकल्प निकाला । हमने डाकिया को पटाया और उससे अनुरोध किया कि वो अपनी साइकिल पर हंस के बंडल डाकघर से उठा लाया करे और व्हीलर के पंडित जी को सौंप दे । फायदा यह हुआ कि हंस जिस दिन हमारे शहर के डाकघर में आता उस दिन ही हमें उपलब्ध हो जाता था । लेकिन फिर भी पटना से लेट ही मिलता था । हंस को खरीदने की यह बेचैनी अबतक बरकरार है । महीने की 23-24 तारीख से ही राजेन्द्र जी के प्राण लेने लग जाता हूं कि हंस जनहित में कब जारी हो रहा है । जनहित का मतलब है कि बिक्री के लिए दिल्ली के स्टॉल्स पर कब पहुंच रहा है । कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि हंस लेने राजेन्द्र जी के दफ्तर या फिर घर तक पहुंच गया ।
हंस ने छब्बीसवें साल में कदम रखते हुए जो पहला अंक निकाला है उसमें हंस और साहित्यिक पत्रिकाओं पर अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी, पंकज बिष्ट, अखिलेश और शैलेन्द्र सागर के लेख छपे हैं । लगभग सभी लेखों का केंद्रीय भाव एक ही है । अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि – इसे भी निसंकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी में नारी विमर्श और दलित विमर्श की आज जो जगह है, लगभग केंद्रीय, उसे वह दिलाने में हंस ने बड़ी भूमिका निभाई है । ऐसा करके उसने ना सिर्फ हिंदी साहित्य में इन दोनों विमर्शों और उनसे जुड़ी और प्रेरित रचनात्मकता को स्थापित किया, पोसा और बढाया । आगे लिखते हैं- यह नोट करना सुखद है कि पच्चीस वर्षों तक चलने के बाद भी हंस एक पठनीय पत्रिका है, वह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है । ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने लिखा है – हंस के अवदान को नजरअंदाज किया ही नहीं जा सकता । हंस दीर्घजीवी ना होता तो आज हिंदी कहानी बुत पिछड़ चुकी होती । हिंदी कहानी को जिंदा रखने और बोल्डनेस को डिफेंड करने में राजेन्द्र जी की अपूर्व भूमिका है । .....राजेन्द्र जी ने यथास्थितिवाद पर लगातार प्रहार किए और दलित तथा नारी विमर्श को सामने लाने और निरंतर उसे गतिशीलता प्रदान करने में अपनी पूरी उर्जा लगा दी । तद्भव के संपादक अखिलेश भी यह मानते हैं कि- कह सकते हैं कि हंस ने हिंदी साहित्य का एजेंडा बदल दिया । दलित,स्त्री, पिछड़ा और अल्पसंख्यक यदि आज समाज और साहित्य के सरोकार बने हैं तो इसके पीछे हंस का भी पसीना है । तो हम यह देख रहे हैं कि हंस के बारे में हिंदी जगक की कमोबेश एक ही राय है । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । इसके अलावा हंस ने कहानीकारों की कई पीढियां भी तैयार कर दी । हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी । कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजिविषा और उनकी दृढ इच्छा शक्ति को सलाम । ईश्वर से प्रार्थना इस बात की कि राजेन्द्र यादव जी को लंबी उम्र मिले और हंस निर्बाध गति से निकलता रहे ।