मई 2013 के अपने संपादकीय में 'हंस' पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव ने लिखा था, इधर हमारे अशोक वाजपेयी अपने रोजनामचे यानी कभी-कभार (साप्ताहिक स्तंभ) में अक्सर ही बताते रहते हैं कि उन्होंने देश-विदेश की किन गोष्ठियों में भाग लिया और उनकी तुलना में हिंदी कहां कहां और कितनी दरिद्र है। वस्तुत: यह सुनते सुनते मेरे कान पक गए हैं कि हम लोगों में क्या कमी है और हिंदी कहां कहां पिछड़ी हुई है। यह हिंदी वैशिंग मुझे मनोरोग जैसा लगने लगा है। मेरे दफ्तर में आनेवाले ज्यादातर लोग जब हिंदी कविता और कहानियों की कमजोरी और कमियों का रोना रोते हैं तो उसके पीछे भावना यही होती है कि देखिए इन कमियों और कमजोरियों को किस तरह अपनी महान रचनाओं के द्वारा मैं पूरा कर रहा हूं। इस टिप्पणी में उaन्होंने मेरा भी नाम लिया था। राजेंद्र यादव आगे कहते हैं कि यह अशोक और अनंत विजय जैसों की तरह ज्यादा पढ़ने और घूमने से उपजी हुई तकलीफ नहीं, बल्कि एक सुना सुनाया और आत्मप्रचार को सही सिद्ध करने का हथकंडा है। लगता है या तो ये लोग केवल अपने बारे में बोल सकते हैं या हिंदी को लेकर छाती माथा कूटने की लत में लिप्त हैं। कभी-कभी तो मुझे कहना पड़ता है कि हम हिंदुस्तानी या हिंदीवाले का रोदन बंद कीजिए और बताइए कि हमें क्या करना है। लगभग 12 वर्ष पहले यह संपादकीय लिखा गया था। समय का चक्र घूमा, राजेंद्र यादव का निधन हो गया। संजय सहाय हंस के संपादक बने। संपादक बदलने से पसंद नापसंद भी बदले। हंस पत्रिका अलग ही राह पर चल पड़ी। जिस हिंदी वैशिंग को राजेंद्र यादव मनोरोग जैसा मानते थे उसी अशोक वाजपेयी के हिंदी, हिंदी साहित्य और हिंदी समाज के वैशिंग को हंस के जुलाई अंक में छह पृष्ठों में जगह दी गई है। राजेंद्र यादव के निधन के बाद पत्रिका की नीतियों में ये विचलन अलग विमर्श की मांग करता है। इस पर चर्चा फिर कभी। अशोक वाजपेयी के लेख पर विचार करते हैं जिसका शीर्षक है, हिंदी समाज ने आधुनिक हिंदी साहित्य को खारिज कर दिया है? शीर्षक में जो प्रश्नवाचक चिह्न है उसका उत्तर अपने आलेख में खोजने का प्रयत्न किया है। अशोक वाजपेयी का यह लेख सामान्यीकरण और फतवेबाजी का काकटेल बनकर रह गया है। वाजपेयी को अपने द्वारा बनाई चलाई संस्थानों की विफलता और व्यर्थता का तीखा अहसास होता है। अपने इस एहसास में वे हिंदी विश्वविद्यालय को भी शामिल करते हैं जिसके वह पहले कुलपति थे। जिस हिंदी साहित्य की मृत्यु की संभावना अशोक वाजपेयी तलाश रहे हैं, उसी हिंदी साहित्य में एक कहावत है कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे। हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहते हुए उसको दिल्ली से चलाना। मित्रों-परिचितों और उनके बेटे बेटियों को विश्वविद्यालय के विभिन्न पदों पर नियुक्त करना। वर्षों बाद उसकी विफलता और व्यर्थता के अहसास में ऊभ-चूभ करके प्रचार तो हासिल किया जा सकता है, लेकिन इससे पाठकों को विमर्श के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता है। साहित्य की मृत्यु की संभावना की जगह आशंका जताते तो उचित रहता। अशोक वाजपेयी हिंदी समाज की व्यापक समझ पर भी प्रश्न खड़े करते हैं। वह कहते हैं कि हिंदी समाज कितना पारंपरिक रहा, कितना आधुनिक हो पाया है, इस पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है। इसके फौरन बाद अपना निष्कर्ष थोपते हैं कि हमारी व्यापक सामाजिक समझ जितनी आधुनिकता की अधकचरी है, उतनी परंपरा की भी। अब यहां अशोक जी से यह पूछा जाना चाहिए कि वह लंबे समय तक सरकार में रहे, कांग्रेसी मंत्रियों के करीबी रहे, संसाधनों से संपन्न रहे, लेकिन हिंदी समाज की समझ को विकसित करने के लिए क्या किया। दूसरों को कोसने से बेहतर होता है स्वयं का मूल्यांकन करना। यह देखना भी मनोरंजक है कि अशोक वाजपेयी आज के समय में वासुदेवशरण अग्रवाल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे मेधा के लेखक ढूंढ रहे हैं। अशोक जी साहित्य में परंपरा की अंतर्ध्वनि भी सुनना चाहते हैं। लेकिन इसके कारण पर नहीं जाते हैं। हिंदी साहित्य में स्वाधीनता के पहले जो भारतीयता या हिंदू परंपरा थी उसको किस पीढ़ी ने बाधित किया। हिंदू या भारतीय परंपरा को खारिज करनेवाले कौन लोग थे। किन आलोचकों ने साहित्य में भारतीय परंपरा की जगह आयातित विचारों को तरजीह दी। हिंदी समाज से अगर भारतीयता की परंपरा नहीं संभली तो क्या हिंदी के साहित्यकारों ने उस पर उसी समय अंगुली उठाई। तब तो उसको प्रगतिशीलता बताकर जय-जयकार किया गया। परंपरा के अधकचरेपन को अशोक वाजपेयी हिंदुत्व के अधकचरेपन से भी जोड़ते हैं। यहां यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि कैसे हिंदी समाज का मानस अधकचरेपन को स्वीकार करने के लिए तैयार किया गया। कैसे भारतेंदु से लेकर जयशंकर प्रसाद तक, कैसे मैथिलीशरण गुप्त से लेकर धर्मवीर भारती तक और कैसे दिनकर से लेकर शिवपूजन सहाय तक के भारतीय विचारों को हाशिए पर डालने का षड्यंत्र रचा गया। योजनाबद्ध तरीके से भारतीय विचारों पर मार्क्सवादी विचार लादे गए। आज अशोक वाजपेयी को हिंदी विभागों में विमर्श की चिंता सताती है, लेकिन जब वह कुलपति थे तो एक दो पत्रिका के प्रकाशन के अलावा हिंदी विभागों को उन्नत करने के लिए क्या किया? ये बताते तो उनकी साख बढ़ती, अन्यथा सारी बातें बुढ़भस सी प्रतीत हो रही हैं। अशोक स्वयं मानते हैं कि डेढ़ दो सदियों पहले उत्तर भारत में उच्च कोटि की सर्जनात्मकता थी। उसका श्रेष्ठ भारत का श्रेष्ठ था। वह साहित्य, चित्रकला, स्थापत्य, संगीत आदि में उत्कृष्टता अर्जित कर सका। यहां भी कारण पर नहीं जाते हैं और ऐसा लगता है कि उनकी अपनी कुंठा इस लेख पर हावी हो गई है। दिनकर बच्चन, पंत, प्रसाद, निराला की तरह अशोक वाजपेयी की कविता किसी भी पाठक को याद है। नहीं है। अशोक वाजपेयी को हिंदुत्व की विचारधारा से तकलीफ है। वह हिंदुत्व की विचाधारा को हिंदू धर्म चिंतन और अध्यात्म से अलग मानते हैं। दरअसल यहां भी वह इसी दोष के शिकार हो जाते हैं। अपने मन के भावों को लच्छेदार भाषा में पाठकों को भरमाते हैं। तर्क और तथ्य हों या न हों। पत्रकारिता को भी वह चालू मुहावरे में परिभाषित करने का प्रयास करते हैं। घिसे पिटे शब्द उठाकर लाते हैं। वह साहित्य के प्रतिपक्ष होने की कल्पना करते तो हैं, लेकिन अपने सक्रिय साहित्यिक जीवन को बिसरा देते हैं। संस्कृति मंत्रालय में रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार लेना कौन सा प्रतिपक्ष रच रहा था। दरअसल अशोक वाजपेयी जिस हिंदी समाज के पतन को लेकर चिंतित हैं, कमोबेश उन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। उनकी आलोचना करने के लिए उन्होंने साहित्य का मैदान चुना। राहुल गांधी की पैदल यात्रा में शामिल होकर वह अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक कर ही चुके हैं। इसलिए अशोक वाजपेयी के इस लेख की आलोचनाओं को उसी आईने में सिर्फ देखा ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसका मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। इस पूरे लेख को पढ़ने के बाद अशोक वाजपेयी के ही दशकों पूर्व अज्ञेय और पंत को निशाना बनाकर लिखे एक लेख का शीर्षक याद आ रहा है, बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाये। उस लेख में वाजपेयी ने लिखा था कम से कम हिंदी में तो कवि के बुजुर्ग होने का सीधा मतलब अकसर अप्रसांगिक होना है।
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Saturday, July 26, 2025
बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए
मई 2013 के अपने संपादकीय में 'हंस' पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव ने लिखा था, इधर हमारे अशोक वाजपेयी अपने रोजनामचे यानी कभी-कभार (साप्ताहिक स्तंभ) में अक्सर ही बताते रहते हैं कि उन्होंने देश-विदेश की किन गोष्ठियों में भाग लिया और उनकी तुलना में हिंदी कहां कहां और कितनी दरिद्र है। वस्तुत: यह सुनते सुनते मेरे कान पक गए हैं कि हम लोगों में क्या कमी है और हिंदी कहां कहां पिछड़ी हुई है। यह हिंदी वैशिंग मुझे मनोरोग जैसा लगने लगा है। मेरे दफ्तर में आनेवाले ज्यादातर लोग जब हिंदी कविता और कहानियों की कमजोरी और कमियों का रोना रोते हैं तो उसके पीछे भावना यही होती है कि देखिए इन कमियों और कमजोरियों को किस तरह अपनी महान रचनाओं के द्वारा मैं पूरा कर रहा हूं। इस टिप्पणी में उaन्होंने मेरा भी नाम लिया था। राजेंद्र यादव आगे कहते हैं कि यह अशोक और अनंत विजय जैसों की तरह ज्यादा पढ़ने और घूमने से उपजी हुई तकलीफ नहीं, बल्कि एक सुना सुनाया और आत्मप्रचार को सही सिद्ध करने का हथकंडा है। लगता है या तो ये लोग केवल अपने बारे में बोल सकते हैं या हिंदी को लेकर छाती माथा कूटने की लत में लिप्त हैं। कभी-कभी तो मुझे कहना पड़ता है कि हम हिंदुस्तानी या हिंदीवाले का रोदन बंद कीजिए और बताइए कि हमें क्या करना है। लगभग 12 वर्ष पहले यह संपादकीय लिखा गया था। समय का चक्र घूमा, राजेंद्र यादव का निधन हो गया। संजय सहाय हंस के संपादक बने। संपादक बदलने से पसंद नापसंद भी बदले। हंस पत्रिका अलग ही राह पर चल पड़ी। जिस हिंदी वैशिंग को राजेंद्र यादव मनोरोग जैसा मानते थे उसी अशोक वाजपेयी के हिंदी, हिंदी साहित्य और हिंदी समाज के वैशिंग को हंस के जुलाई अंक में छह पृष्ठों में जगह दी गई है। राजेंद्र यादव के निधन के बाद पत्रिका की नीतियों में ये विचलन अलग विमर्श की मांग करता है। इस पर चर्चा फिर कभी। अशोक वाजपेयी के लेख पर विचार करते हैं जिसका शीर्षक है, हिंदी समाज ने आधुनिक हिंदी साहित्य को खारिज कर दिया है? शीर्षक में जो प्रश्नवाचक चिह्न है उसका उत्तर अपने आलेख में खोजने का प्रयत्न किया है। अशोक वाजपेयी का यह लेख सामान्यीकरण और फतवेबाजी का काकटेल बनकर रह गया है। वाजपेयी को अपने द्वारा बनाई चलाई संस्थानों की विफलता और व्यर्थता का तीखा अहसास होता है। अपने इस एहसास में वे हिंदी विश्वविद्यालय को भी शामिल करते हैं जिसके वह पहले कुलपति थे। जिस हिंदी साहित्य की मृत्यु की संभावना अशोक वाजपेयी तलाश रहे हैं, उसी हिंदी साहित्य में एक कहावत है कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे। हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहते हुए उसको दिल्ली से चलाना। मित्रों-परिचितों और उनके बेटे बेटियों को विश्वविद्यालय के विभिन्न पदों पर नियुक्त करना। वर्षों बाद उसकी विफलता और व्यर्थता के अहसास में ऊभ-चूभ करके प्रचार तो हासिल किया जा सकता है, लेकिन इससे पाठकों को विमर्श के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता है। साहित्य की मृत्यु की संभावना की जगह आशंका जताते तो उचित रहता। अशोक वाजपेयी हिंदी समाज की व्यापक समझ पर भी प्रश्न खड़े करते हैं। वह कहते हैं कि हिंदी समाज कितना पारंपरिक रहा, कितना आधुनिक हो पाया है, इस पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है। इसके फौरन बाद अपना निष्कर्ष थोपते हैं कि हमारी व्यापक सामाजिक समझ जितनी आधुनिकता की अधकचरी है, उतनी परंपरा की भी। अब यहां अशोक जी से यह पूछा जाना चाहिए कि वह लंबे समय तक सरकार में रहे, कांग्रेसी मंत्रियों के करीबी रहे, संसाधनों से संपन्न रहे, लेकिन हिंदी समाज की समझ को विकसित करने के लिए क्या किया। दूसरों को कोसने से बेहतर होता है स्वयं का मूल्यांकन करना। यह देखना भी मनोरंजक है कि अशोक वाजपेयी आज के समय में वासुदेवशरण अग्रवाल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे मेधा के लेखक ढूंढ रहे हैं। अशोक जी साहित्य में परंपरा की अंतर्ध्वनि भी सुनना चाहते हैं। लेकिन इसके कारण पर नहीं जाते हैं। हिंदी साहित्य में स्वाधीनता के पहले जो भारतीयता या हिंदू परंपरा थी उसको किस पीढ़ी ने बाधित किया। हिंदू या भारतीय परंपरा को खारिज करनेवाले कौन लोग थे। किन आलोचकों ने साहित्य में भारतीय परंपरा की जगह आयातित विचारों को तरजीह दी। हिंदी समाज से अगर भारतीयता की परंपरा नहीं संभली तो क्या हिंदी के साहित्यकारों ने उस पर उसी समय अंगुली उठाई। तब तो उसको प्रगतिशीलता बताकर जय-जयकार किया गया। परंपरा के अधकचरेपन को अशोक वाजपेयी हिंदुत्व के अधकचरेपन से भी जोड़ते हैं। यहां यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि कैसे हिंदी समाज का मानस अधकचरेपन को स्वीकार करने के लिए तैयार किया गया। कैसे भारतेंदु से लेकर जयशंकर प्रसाद तक, कैसे मैथिलीशरण गुप्त से लेकर धर्मवीर भारती तक और कैसे दिनकर से लेकर शिवपूजन सहाय तक के भारतीय विचारों को हाशिए पर डालने का षड्यंत्र रचा गया। योजनाबद्ध तरीके से भारतीय विचारों पर मार्क्सवादी विचार लादे गए। आज अशोक वाजपेयी को हिंदी विभागों में विमर्श की चिंता सताती है, लेकिन जब वह कुलपति थे तो एक दो पत्रिका के प्रकाशन के अलावा हिंदी विभागों को उन्नत करने के लिए क्या किया? ये बताते तो उनकी साख बढ़ती, अन्यथा सारी बातें बुढ़भस सी प्रतीत हो रही हैं। अशोक स्वयं मानते हैं कि डेढ़ दो सदियों पहले उत्तर भारत में उच्च कोटि की सर्जनात्मकता थी। उसका श्रेष्ठ भारत का श्रेष्ठ था। वह साहित्य, चित्रकला, स्थापत्य, संगीत आदि में उत्कृष्टता अर्जित कर सका। यहां भी कारण पर नहीं जाते हैं और ऐसा लगता है कि उनकी अपनी कुंठा इस लेख पर हावी हो गई है। दिनकर बच्चन, पंत, प्रसाद, निराला की तरह अशोक वाजपेयी की कविता किसी भी पाठक को याद है। नहीं है। अशोक वाजपेयी को हिंदुत्व की विचारधारा से तकलीफ है। वह हिंदुत्व की विचाधारा को हिंदू धर्म चिंतन और अध्यात्म से अलग मानते हैं। दरअसल यहां भी वह इसी दोष के शिकार हो जाते हैं। अपने मन के भावों को लच्छेदार भाषा में पाठकों को भरमाते हैं। तर्क और तथ्य हों या न हों। पत्रकारिता को भी वह चालू मुहावरे में परिभाषित करने का प्रयास करते हैं। घिसे पिटे शब्द उठाकर लाते हैं। वह साहित्य के प्रतिपक्ष होने की कल्पना करते तो हैं, लेकिन अपने सक्रिय साहित्यिक जीवन को बिसरा देते हैं। संस्कृति मंत्रालय में रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार लेना कौन सा प्रतिपक्ष रच रहा था। दरअसल अशोक वाजपेयी जिस हिंदी समाज के पतन को लेकर चिंतित हैं, कमोबेश उन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। उनकी आलोचना करने के लिए उन्होंने साहित्य का मैदान चुना। राहुल गांधी की पैदल यात्रा में शामिल होकर वह अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक कर ही चुके हैं। इसलिए अशोक वाजपेयी के इस लेख की आलोचनाओं को उसी आईने में सिर्फ देखा ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसका मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। इस पूरे लेख को पढ़ने के बाद अशोक वाजपेयी के ही दशकों पूर्व अज्ञेय और पंत को निशाना बनाकर लिखे एक लेख का शीर्षक याद आ रहा है, बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाये। उस लेख में वाजपेयी ने लिखा था कम से कम हिंदी में तो कवि के बुजुर्ग होने का सीधा मतलब अकसर अप्रसांगिक होना है।
Saturday, July 30, 2022
उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन
आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई। जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई।
प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा। साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘ इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे।
हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘ इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘
उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की ।
इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था। उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए।
Saturday, June 13, 2020
साहित्य की नामवरी असावधानी के स्मारक
Friday, March 13, 2020
असमय चला गया प्रतिभाशाली कथाकार
Friday, October 11, 2019
बंद गली का आखिरी मकान
Thursday, July 4, 2019
हिंदी विभागों में रचनात्मक लेखन
Saturday, November 11, 2017
लेखकीय आत्मलज्जा का सवाल
Saturday, June 11, 2016
हिंदी के बुढ़ाते युवा लेखक
Tuesday, September 8, 2015
'हंस' के तेवर को क्या हुआ
Thursday, August 27, 2015
साहित्यक स्पांरशिप के विरोधी
Saturday, August 3, 2013
विचारों का वामपंथी फासीवाद
दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा । प्रेमचंद की जयंती इकतीस जुलाई को होने वाले इस सालाना जलसे का विषय था- अभिव्यक्ति और प्रतिबंध – और वक्ता के तौर पर हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दीक्षित और पूर्व भारतीय जनता पार्टी नेता गोविंदाचार्य, अंतराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका और नक्सलियों की हमदर्द अरुंधति राय, नक्सलियों के एक और समर्थक और कवि वरवरा राव को आमंत्रित किया गया था । वरवरा राव की कविताओं से हिंदी जगत परिचित हो या ना हो लेकिन उनकी ऐसी क्रांतिकारी छवि गढ़ी गई है जो उनको वैधता और प्रतिष्ठा दोनों प्रदान करती है । माओवाद के रोमांटिसिज्म और मार्क्सवाद की यूटोपिया की सीढ़ी पर चढ़कर वो प्रतिष्ठित भी हैं । कार्यक्रम की शुरुआत शाम पांच बजे होनी थी। अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य तो समय पर पहुंच गए । अरुंधति राय और वरवरा राव का घंटे भर से ज्यादा इंतजार के बाद कार्यक्रम शुरु हुआ । पहले तो बताया गया कि वरवरा राव दिल्ली पहुंच रहे हैं और कुछ ही वक्त में सभास्थल पर पहुंच रहे हैं । नहीं पहुंचे । कार्यक्रम के खत्म होने के बाद से सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर चर्चा शुरु हो गई । किसी ने लिखा कि जनपक्षधर कवि वरवरा राव ने हंस के कार्यक्रम का बहिष्कार किया क्योंकि उन्हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था । किसी ने अरुंधति की बगैर मर्जी के कार्ड पर नाम छाप देने को लेकर राजेन्द्र जी पर हमला बोला ।
यह सब चल ही रहा थी कि सोशल मीडिया पर ही वरवरा राव का एक खुला पत्र तैरने लगा । उस पत्र की वैधता ज्ञात नहीं है लेकिन कई दिनों के बाद भी जब वरवरा राव की तरफ से कोई खंडन नहीं आया तो उस खत को उनका ही मान लिया गया है । उस पत्र में वरवरा राव ने गोष्ठी में नहीं पहुंचने की बेहद बचकानी और हास्यास्पद वजहें बताईं । अपने पत्र में वरवरा राव ने लिखा- मुझे हंस की ओर से ग्यारह जुलाई को लिखा निमंत्रण पत्र लगभग दस दिन बाद मिला । इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेन्द्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण पत्र में डाल देने की घोषणा कर रखी थी । बहरहाल मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन और क्यों और किस मंशा से बुला रहा है । मेरे साथ इस मंच पर मेरा साथ बोलनेवाले कौन हैं । वरवरा राव के इस भोलेपन पर विश्वास करने का यकीन तो नहीं होता लेकिन अविश्वास की कोई वजह नहीं है । भोलापन इतना कि किसी ने बुलाया और आप विषय देखकर चले गए । वरवरा राव ने आगे लिखा कि दिल्ली पहुंचने पर उनको यह जानकर हैरानी हुई कि उनके साथ मंच पर गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी हैं । राव के मुताबिक अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट से जुड़ाव सर्वविदित है । राव यहीं तक नहीं रुकते हैं और अशोक वाजपेयी की प्रेमचंद की समझ को लेकर भी उनको कठघरे में खड़ा कर देते हैं । इसके अलावा गोविंदाचार्य को हिंदूवादी राजनीति करनेवाला करार देते हैं। गोविंदाचार्च के बारे में उनकी राय सही हो सकती है लेकिन अशोक वाजपेयी के कॉरपोरेट से संबंधों की बात वरवरा राव की अज्ञानता की तरफ ही इशारा करती है । वरवरा राव को अशोक वाजपेयी का सांप्रदायिक राजनीति से विरोध ज्ञात नहीं है । शायद हिंदी के चेले चपाटों ने उन्हें बताया नहीं । खैर अशोक वाजपेयी वरवरा राव से कमतर ना तो साहित्यकार हैं और ना ही उनसे कम उनके सामाजिक सरोकार हैं । अशोक वाजपेयी को राव के सर्टिफिकेट की भी जरूरत नहीं है । अरुंधति की तरफ से समारोहा में उनके ना आने की वजह का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया । लेकिन साहित्यक हलके में यही चर्चा है कि उनको भी गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था । अरुंधति हंस के कार्यक्रम में पहले भी ऐसा कर चुकी हैं जब उनको और छत्तीसगढ़ के डीजी रहे विश्वरंजन को एक मंच पर आमंत्रित किया गया था । उस वक्त भी वो नहीं आई थी ।
दरअसल हंस की गोष्ठी के दौरान हुआ यह ड्रामा वामपंथी फासीवाद का बेहतरीन नमूना है । वरवरा राव ने अपने खुले पत्र में खुद की लाल विचारधारा का भी परचम लहराया है । राजसत्ता द्वारा अपनी अपनी प्रताड़ना का छाती कूट कूट कर प्रदर्शन किया है । राजेन्द्र यादव भी खुद को वामपंथी रचनाकार कहते रहे हैं लेकिन इस मसले पर वामपंथियों के इस फासीवाद के बचाव में उनके तरकश में कोई तीर है नहीं, बातें चाहे वो जितनी कर लें। राजनीति की किताबों में फासीवाद की परिभाषा अलग है लेकिन लेनिन के परवर्तियों ने फासीवाद की अलग परिभाषा गढ़ी । उसके मुताबिक फासीवाद अन्य लोकतांत्रिक दलों का खात्मा कर पूरे समाज को एक सत्ता में बांधने का प्रयास करता है । फासीवाद के उनके इस सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण रूस और चीन हैं जहां लाखों लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता की विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी । सैकड़ों नहीं, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया । वामपंथी राजनीति का दुर्गुण ही यही है कि जिसे वो फासीवाद मानते हैं वास्तविकता में उसी को अपनाते हैं । हंस की गोष्ठी में वरवरा राव और अरुंधति का गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ शामिल नहीं होना यही दर्शाता है । दरअसल यह विचारों का फासीवाद तो है ही एक तरह से विचारों को लेकर अस्पृश्यता भी है । क्या वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों के पास इतनी तर्कशक्ति नहीं बची कि वो दूसरी विचारधारा का सामना कर सकें । क्या वाम विचारधारा के अंदर इतना साहस नहीं बचा कि वो दूसरी विचारधारा के हमलों को बेअसर कर सकें । अगर मैं ऑरवेल के डबल थिंक और डबल टॉक शब्द उधार लूं तो कह सकता हूं कि हिंदी समाज के वामपंथी विचारधारा को माननेवाले लोग इस दोमुंहे बीमारी के शिकार हैं । दरअसल सोवियत संघ के विघटन के बाद भी हमारे देश के मार्क्सवादियों ने यह सवाल नहीं खड़ा किया कि इस विचारधारा में या उसके प्रतिपादन में क्या कमी रह गई थी । दरअसल सवाल पूछने की जगह भारत के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने मार्कसवाद की अपने तरीके से रंगाई पुताई की और उसकी बिनाह पर अपनी राजनीति चमकाते रहे । रूस में राजसत्ता का कहर झेलनेवाले मशहूर लेखक सोल्झेनित्सिन ने भी लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है ।‘ भारत में इस तरह के उदाहरण लगातार कई बार और बार बार मिलते रहे हैं । एक विचारधारा के तौर पर मार्क्सवाद पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं लेकिन उसको एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता है । लेकिन इस विचारधारा के वरवरा राव जैसे अनुयायी उसको फासीवादी बाना पहनाने पर आमादा हैं । राव और अरुंधति को गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ अभिव्यक्ति और प्रतिबंध विषय पर अपने विचार रखने चाहिए थे । अपने तर्कों से दोनों को खारिज करते । लेकिन हमारे समाज में वरवरा राव जैसे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अब भी मौजूद हैं जो विचारधारा की कारागार में सीखचों के पीछे रहकर प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं । इस बार जिस तरह से हंस की गोष्ठी में राव और राय के नहीं आने को लेकर सोशल मीडिया और अखबारों में संवाद शुरू हुआ है उससे तो यही कहा जा सकता है कि हंस की गोष्ठी अब शुरू हुई है और वो विचारों के कारागार से मुक्त है ।
Friday, August 12, 2011
...किसी से हो नहीं सकता
हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद खास दिन होता है । इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है । लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो यह ज्ञात नहीं है । प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी टाइप के कार्यक्रम हो जाते हैं जिसमें मंत्री वगैरा भाषण आदि देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं । इस बार भी वहां कुछ वैसा ही हुआ । लेकिन तकरीबन पिछले पच्चीस साल से हंस पत्रिका प्रेमचंद के जन्मदिन पर दिल्ली में एक विचार गोष्ठी का आयोजन करती रही है । इस बार भी किया । राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलते हुए इस पत्रिका के पच्चीस साल हो गए हैं, लिहाजा मौका खास था । हंस की रजत जयंती वर्ष और प्रेमचंद की जयंती । दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब के हॉल में हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था । हर साल की तरह इस वर्ष भी साहित्यक जमात का ठीक-ठाक जमावड़ा लगा था । हर तबके के लेखक वहां मौजूद थे। दो तीन पीढ़ी के लेखक तो थे ही । मैं जब पहुंचा तो उसके कुछ देर बाद बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तस्लीमा नसरीन भी वहां आईं । तसलीमा के साथ एक सुरक्षाकर्मी भी था । लेकिन मैं ये देखकर हैरान रह गया कि तसलीमा को काफी देर तक खड़ा रहकर इधर उधर देखना पड़ा । उनको लेकर वहां मौजूद लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखा । लेकिन कुछ देर जब वो अकेली खड़ी रहीं तो फिर किसी ने उन्हें हॉल का रास्ता दिखाया । ये वही तसलीमा थी जो तकरीबन दस साल पहले वाणी प्रकाशन के एक कार्यक्रम में दिल्ली आई थी तो लगा था कि राजधानी में कोई घटना घटी हो । दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हॉल में तिल रखने की जगह नहीं थी । देशी-विदेशी मीडिया के दर्जनों कैमरे और पत्रकार तो वहां मौजूद थे ही, हिंदी का बड़ा से बड़ा लेखक भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को बेताब था । तस्लीमा की एक झलक पाने के लिए लोग उतावले हो रहे थे, तस्लीमा के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लोग सिफारिश कर रहे थे । हमारे मित्र अरुण महेश्वरी से । लेकिन उस वक्त अपने आयोजन की सफलता से गदगद अरुण जी ने लोगों को छोड़ दिया और तसलीमा के साथ अशोक वाजपेयी और कुंवर नारायण को लेकर लंच के लिए चले गए । जबतक तसलीमा वहां रही कैमरे का फ्लैश बंद होने का नाम नहीं ले रहा था । जींस और टी शर्ट पहने छरहरी काया की तस्लीमा अपने स्वागत से भाव विभोर थी । लेकिन सिर्फ दस साल में माहौल कितना बदल गया । तस्लीमा दिल्ली की उसी साहित्यिक जमात के बीच खड़ी थी लेकिन उनका कोई नोटिस नहीं ले रहा था । वजह चाहे जो भी हो । खैर ये एक अलग बात है जो प्रसंगवश मैं कह गया ।
हम बात कर रहे थे हंस के 25 साल पूरे होने की ।राजेन्द्र यादव जी ने कार्यक्रम की शुरूआत की और हंस के शुरुआती दिनों के अपने दोस्तो- लालानी जी और गौतम नवलखा आदि को शिद्दत से याद किया । छोटा सा भाषण भी दिया और टॉलस्टॉय की एक कहानी भी सुनाई । मैं लंबे समय से राजेन्द्र जी को सुनते आ रहा हूं उस दिन पहली बार लगा कि पाइप और सिगरेट के कश ने उनको काफी कमजोर कर दिया है । हिंदी साहित्य का अस्सी साल का ये जवान शारीरिक रूप से भले ही कमजोर लग रहा हो लेकिन हौसले अब भी बुलंद नजर आ रहे थे । राजेन्द्र यादव ने अपना भाषण समाप्त कर हिंदी के दलित लेखक अजय नावरिया को मंच संचालन के लिए बुला लिया । यहीं से समारोह की गरिमा के खत्म होने की शुरूआत हो गई । अजय नावरिया ने बेहद मसखरेपन के साथ मंच संचालन शुरू किया । मंच संचालन इतना खराब था कि उसकी चर्चा करना समय बर्बाद करना है । लेकिन जिस अपमानजनक तरीके की टिप्पणी अजय ने अपने मंच संचालन के दौरान की उसके लिए उसे कम से कम दुर्गा से तो माफी मांगनी ही चाहिए । दुर्गा प्रसाद राजेन्द्र जी के पुराने सहयोगी हैं । उन्हें भी इस मौके पर सम्मानित किया गया । स्मृति चिन्ह के साथ एक लिफाफा दिया गया । गिफ्ट देते वक्त अजय ने कहा – दुर्गा जी तो दो पैंट शर्ट के कपड़ा दिया जा रहा है जो उनके लिए उपयोगी है । वो इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने सार्वजनिक रूप से दुर्गा की खुराक के बारे में टिप्पणी कर डाली। काफी देर तक साहित्यिक जमात ने अजय तो झेला लेकिन जब लोगों का धैक्य जवाब दे गया तो कुछ उत्साही लोगों ने उसे हूट कर बैठा दिया । भीड़ जबतक इंसाफ कर पाती तबतक अजय नावरिया ने साहित्यिक समारोह की गरिमा को समूल रूप से नष्ट कर दिया था । काफी देर तक चले मसखरेपन के बाद लालानी जी ने बोलना शुरू किया । उन्होंने राजेन्द्र यादव के साथ अपने शुरुआती दिनों को याद किया । बोले तो गौतम नवलखा और अर्चना वर्मा भी । दोनों ने बेहद संक्षिप्त बोला और सिर्फ हंस की तारीफों के पुल बांधे । अर्चना वर्मा ने हंस के साथ के अपने दिनों को बताया कि किस तरह से वो सिर्फ परख देखने के लिए हंस में आई थी और किस तरह से उन्हें कहानी और फिर कम पड़ रहे लेख भी लिखवाया जाने लगा ।
इसके बाद बारी थी हिंदी के हिरामन नामवर सिंह की । नामवर जी को हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर बोलना था लेकिन बोले वो सिर्फ हंस पर । शुरुआत तो उन्होंने – मेरे दुश्मन राजेन्द्र यादव से की लेकिन उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव के हौसले की जबरदस्त तारीफ की । सार्वजनिक रूप से अपनी तारीफ सुनकर मंच पर बैठे यादव जी का चेहरा लाल-लाल हो रहा था । शरमा इस तरह रहे थे जैसे कोई नई नवेली दुल्हन शर्माती है । लेकिन नामवर जी तो अपनी रौ में थे । अपने विरोधियों को अपनी पत्रिका में जगह देने के लिए भी उन्होंने यादव जी की नामवरी अंदाज में सराहना की । उसी नामवरी अंदाज में अशोक वाजपेयी पर हमला भी बोला । नामवर जी ने कहा कि अशोक जब पूर्वग्रह के संपादक थे तो अपने पूर्वग्रहों के साथ उसका संपादन करते थे । उन्होंने कभी राजेन्द्र यादव को पत्रिका में नहीं छापा लेकिन राजेन्द्र ने हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक में अशोक वाजपेयी से ही लिखवाया । बोलते बोलते नामवर सिंह ने अशोक वजपेयी को कायर और यादव जी को बहादुर करार दे दिया । नाम तो रवीन्द्र कालिया और अखिलेश का भी आया है । नामवर सिंह बहुत कम बोले । साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रकाश डालते तो मौजूद श्रोताओं का ज्ञानवर्धन होता । उसके बाद कुछ सवाल जवाब भी हुए । लेकिन नामवर सिंह ने एक जोरदार शेर के साथ अपनी बात खत्म की – जो हो सकता है इससे वो किसी से हो नहीं सकता, मगर देखो तो जो हो सकता है वो आदमी से हो नहीं सकता ।
दिल्ली में हुए इस साहित्यक जलसे से एक बात साफ हो गई कि राजेन्द्र यादव हर उम्र के बीच खासे लोकप्रिय हैं । कार्यक्रम से बाहर निकलते हुए मैं एक बार फिर से सोच रहा था कि अंग्रेजी में अगर किसी लिटरेरी मैगजीन के प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे होते तो क्या इस तरह का ही समारोह मनाया जाता । जवाब मिला नहीं । तो फिर हम हिंदी के लोग क्यों नहीं अपने गौरव का सम्मान कर पाते हैं । क्यों नहीं हमारा मीडिया इस तरह की समारोह को कवरेज देता है । इन सवालों से जूझता हुआ मैं घर लौट आया । सवाल अब भी मेरा पीछा कर रहे हैं ।
Tuesday, August 2, 2011
साहित्यिक “डॉन” का कारनामा
हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक को देखकर मैं थोड़ा नॉस्टेलिक भी हो गया । मुझे अपने कॉलेज के दिनों और अपने शहर जमालपुर की याद आ गई । हमाके शहर में रेलवे स्टेशन पर ए एच व्हीलर का स्टॉल ही हमारे लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हुआ करता था । अस्सी के दशक के अंत में जमालपुर का व्हीलर स्टॉल इलाहाबाद के पांडे जी का हुआ करता था । वो साहित्यप्रेमी थे इस वजह से उनके स्टॉल पर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी । राजस्थान से निकलनेवाली पत्रिका मधुमती तक उनके पास पहुंचती थी, पहल, वसुधा इंद्रपर्स्थ भारती आदि-आदि तो आती ही थी । मैंने पहली बार हंस वहीं से खरीदा था । महीना और साल ठीक से याद नहीं है । लेकिन फिर तो हंस का हर अंक खरीदने लगा, पढ़ने लगा । मंडल आंदोलन के दौरान और उसके बाद राजेन्द्र यादव के स्टैंड से घनघोर असहमतियां रही लेकिन कभी हंस खरीदना बंद नहीं किया । जमालपुर में हंस की दस प्रतियां आती थी जो महीने ती सात या फिर आठ तारीख को पहुंचती थी । दिल्ली से प्रतियां वी पी पी से आया करती थी । इस पद्धति में डाकघर जाकर वहां पैसे जमा करने के बाद ही बंडल मिलता था । व्हीलर के हमारे पंडित जी के लिए हंस का बंडल भी अन्य किताबों के बंडल की तरह से होता था । जब वक्त मिलता था तो किसी को भेजकर डाकघर से बंडल मंगवा लेते थे । लेकिन होता ये था कि पटना में हंस रेल से आता था जो दो तीन दिन पहले आ जाया करता था । वहां से मित्रों का फोन आना शुरू हो जाता था कि हंस में फलां लेख या फलां कहानीकार की कहानियां देखी । जो हमारी बेचैनी बढ़ा दिया करती थी । मुझे याद है कि कई बार मैं खुद डाकघर जाकर हंस के बंडल छुड़वा कर व्हीलर के स्टॉल पर पहुंचाया करता था । बाद में हमने हमने हंस को जल्दी पाने का एक विकल्प निकाला । हमने डाकिया को पटाया और उससे अनुरोध किया कि वो अपनी साइकिल पर हंस के बंडल डाकघर से उठा लाया करे और व्हीलर के पंडित जी को सौंप दे । फायदा यह हुआ कि हंस जिस दिन हमारे शहर के डाकघर में आता उस दिन ही हमें उपलब्ध हो जाता था । लेकिन फिर भी पटना से लेट ही मिलता था । हंस को खरीदने की यह बेचैनी अबतक बरकरार है । महीने की 23-24 तारीख से ही राजेन्द्र जी के प्राण लेने लग जाता हूं कि हंस जनहित में कब जारी हो रहा है । जनहित का मतलब है कि बिक्री के लिए दिल्ली के स्टॉल्स पर कब पहुंच रहा है । कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि हंस लेने राजेन्द्र जी के दफ्तर या फिर घर तक पहुंच गया ।
हंस ने छब्बीसवें साल में कदम रखते हुए जो पहला अंक निकाला है उसमें हंस और साहित्यिक पत्रिकाओं पर अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी, पंकज बिष्ट, अखिलेश और शैलेन्द्र सागर के लेख छपे हैं । लगभग सभी लेखों का केंद्रीय भाव एक ही है । अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि – इसे भी निसंकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी में नारी विमर्श और दलित विमर्श की आज जो जगह है, लगभग केंद्रीय, उसे वह दिलाने में हंस ने बड़ी भूमिका निभाई है । ऐसा करके उसने ना सिर्फ हिंदी साहित्य में इन दोनों विमर्शों और उनसे जुड़ी और प्रेरित रचनात्मकता को स्थापित किया, पोसा और बढाया । आगे लिखते हैं- यह नोट करना सुखद है कि पच्चीस वर्षों तक चलने के बाद भी हंस एक पठनीय पत्रिका है, वह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है । ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने लिखा है – हंस के अवदान को नजरअंदाज किया ही नहीं जा सकता । हंस दीर्घजीवी ना होता तो आज हिंदी कहानी बुत पिछड़ चुकी होती । हिंदी कहानी को जिंदा रखने और बोल्डनेस को डिफेंड करने में राजेन्द्र जी की अपूर्व भूमिका है । .....राजेन्द्र जी ने यथास्थितिवाद पर लगातार प्रहार किए और दलित तथा नारी विमर्श को सामने लाने और निरंतर उसे गतिशीलता प्रदान करने में अपनी पूरी उर्जा लगा दी । तद्भव के संपादक अखिलेश भी यह मानते हैं कि- कह सकते हैं कि हंस ने हिंदी साहित्य का एजेंडा बदल दिया । दलित,स्त्री, पिछड़ा और अल्पसंख्यक यदि आज समाज और साहित्य के सरोकार बने हैं तो इसके पीछे हंस का भी पसीना है । तो हम यह देख रहे हैं कि हंस के बारे में हिंदी जगक की कमोबेश एक ही राय है । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । इसके अलावा हंस ने कहानीकारों की कई पीढियां भी तैयार कर दी । हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी । कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजिविषा और उनकी दृढ इच्छा शक्ति को सलाम । ईश्वर से प्रार्थना इस बात की कि राजेन्द्र यादव जी को लंबी उम्र मिले और हंस निर्बाध गति से निकलता रहे ।





