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Saturday, August 8, 2026

सफेद सागर में शौर्य की अग्नि


नई दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदलोन और उसके बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में दी जानेवाली गालियों को लेकर चर्चा हो रही है। इसके पहले जी-5 पर फिल्म सतलुज के प्रदर्शित होने और उसको हटाने के बाद ओटीटी पर अंकुश लगाने के पक्ष और विपक्ष में तर्क रखे जा रहे हैं। उधर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि ओटीटी के विनियमन के लिए एक विस्तृत संवैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। ये भी जोड़ा गया कि विनियमन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है ताकि किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता बाधित ना हो। इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात कही गई है। वो ये सरकार ओटीटी प्लेटफार्म पर किसी वेबसीरीज या फिल्म के रिलीज होने के बाद विशेषज्ञों के पैनल से समीक्षा पर विचार कर रही है। अगर सीरीज या फिल्म में किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हो तो उसको हटाने का उपक्रम किया जा सके। जानबूझकर मैंने इस संभावना को दिलचस्प कहा। अगर कोई फिल्म या वेबसीरीज रिलीज हो गई तो उसको भारत में तो हटवाया जा सकता है लेकिन क्या भारत के बाहर के दर्शकों के लिए हटवाया जा सकता है। तकनीक के विस्तार से ये लगभग मुमकिन नहीं है। फिल्म सतलुज के केस में हमने ये देखा कि जी 5 से फिल्म को हटवा देने के बाद भी वो इंटरनेट पर उपलब्ध रही। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि ओटीटी प्लेटफार्म ने मनोरंजन की दुनिया में पारंपरिक मनोरंजन के साधन यथा सिनेमा को पीछे छोड़ दिया है। फिल्मों में तो प्रदर्शन के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था है लेकिन ओटीटी मुख्यतया स्वनियमन के फार्मूले पर कार्य करती है। इसमें दर्शकों की उम्र को चेक करने का कोई मैकनिज्म भी नहीं है जिससे बहुधा कम उम्र के बच्चे भी सेक्सुअल कटेंट या गाली गलौच वाले संवादों से भरी सीरीज देखते हैं। इसका प्रभाव भी उनपर पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो इस तरह के कटेंट सामने आते हैं जो समाज में वैमनस्यता परोसते हैं। दो समुदायों के बीच में कटुता बढ़ाते हैं। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय पोस्ट रिलीज पैनल के माध्यम से इसको विनयमित करना चाहती है। जब भी किसी वेबसीरीज या फिल्म को लेकर दर्शकों की शिकायत आएगी तो ये पैनल उसको देखेगी। अपने सुझावों से मंत्रालय को अवगत कराएगी। 

अभी भी लगभग इसी तरह की व्यवस्था है। स्वनियमन की त्रिस्तरीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर मंत्रालय की समिति विचार करती ही है। उसके बाद निर्णय करती है। इस तरह के कई उदाहरण है। 2024 में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजवन होनेवाले था। उससे एक महीने पहले नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी, द गाडेस आफ फूड रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको बताया गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना सीखना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्यों को लेकर मुकदमा हुआ। केस होने के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। एक तो इसके प्रदर्शन के टाइमिंग पर विचार करना चाहिए। पहले ही फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी थी। दर्शक इसको नकार चुके थे। लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के कुछ दिनों पूर्व इसको ओटीटी पर रिलीज करने के पीछे की मंशा क्या थी। इस तरह की स्थितियों में पोस्ट रिलीज पैनल की क्या भूमिका होगी। क्या मुकदमा होने के बाद वो फिल्म देखेगी। क्या दर्शकों की आपत्ति या शिकायत के बाद फिल्म देखेगी। सरकारी प्रक्रिया में जबतक पैनल देखेगी तबतक कितना समय बीत चुका होगा। किसी भी वैधानिक फ्रेमवर्क को बनाने के पहले इन बातों और पहलुओं पर विचार करना चाहिए। 

ओटीटी पर लेकर हो रही तमाम चर्चाओं के बीच एक ऐसी सिरीज आई जिसको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद संभव नहीं है। नाम है आपरेशन सफेद सागर। 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना के आपरेशन पर आधारित छह एपिसोड की इस सीरीज में निर्देशक ओनी सेन ने अपने क्राफ्ट, संवाद और परिस्थितियों की रचना इस प्रकार से की है कि दर्शक बंधा रहता है। इस सीरीज में सिर्फ काकपिट और युद्ध की कहानी ही नहीं है। शांति के समय पायलटों और उनके परिवारों की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी है। युवा और अनुभवी पायलटों के जीवन को इस तरह से दिखाया गया है जो लगभग वास्तविक जैसा है। एक युवा पायलट की प्रेमिका जब अपने घर से भागकर एयरफोर्स स्टेशन पहुंचती है तो उसके बाद के दृष्य एकदम वास्तविक प्रतीत होते हैं। लड़की को बगैर मेकअप या गहरे मेकअप के पेश करने का जोखिम निर्देशक ने उठाया है। इसी तरह से इस सीरीज के केंद्रीय पात्रों में से एक स्कावड्रन लीडर अजय आहूजा, जिसका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया, ने बहुत ही स्वाभिवक ढंग से निभाया गया है। उनकी पत्नी अलका आहूजा का किरदार अमृता बागची ने निभाया है। कैसे सीनियर पायलट का परिवार भी जूनियर पायलट के परिवार को बातों बातों में ट्रेनिंग देते हैं। इसको स्वाभाविक तरीके से संवाद के माध्यम से चित्रित किया गया है। युवा पायलट की प्रेमिका अजय आहूजा के घर में रहती है। एक दिन बातों बातों में अलका आहूजा उससे कहती है कि जब भी उसके पति जहाज लेकर जाते हैं उस दिन वो झगड़ा नहीं करती। लेकिन शिकायतों की सूची बनाते रहती हैं। जब उनके पति को जहाज नहीं उड़ाना होता है उसदिन वो सारा हिसाब बराबर कर लेती हैं। वेबसीरीज आपरेशन सफेद सागर एयरफोर्स से जुड़े पायलटों की जीवन की तमाम बारीकियों को छूती है। रिश्तों की संवेदना को इस तरह से उकेरती है कि कई बार दर्शकों की आंखें भर आती हैं। बेहद सधा हुआ संवाद। कोई पात्र अकारण लाउड नहीं होता है। कई बार तो पात्रों के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।  

इस वेब सीरीज के पहले भी माधुरी दीक्षित अभिनीत क्राइम थ्रिलर मिसेज देशपांडे आई थी। वो भी सलीके से बनाई गई थी। दरअसल जिन निर्देशकों को अपने हुनर और कहानी पर भरोसा होता है वो अकारण यौनिकता, हिंसा, गाली गलौच नहीं दिखाते। जिनको अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता और जो कला में वैचारिकी की मिलावट करते हैं। राजनीति करते हैं। उससे सफलता का रसायन तैयार करना चाहते हैं। उससे ही विवाद खड़े होते हैं। ओटीटी को लेकर अगर सरकार को विनियमिन की व्यवस्था करनी है तो पोस्ट रिलीज पैनल के स्थान पर प्री रिलीज पैनल बनाने पर विचार करना होगा। ताकि अकारण नग्नता और अश्लीलता परोसने पर तो लगाम लगे ही सीरीज के बहाने राजनीति करनेवालों की पहचान भी हो सके। उनके मंसूबों को नाकाम किया जा सके। इससे ना केवल विवाद कम होंगे बल्कि अकारण सरकारी कामकाज भी नहीं बढ़ेगा।


Saturday, July 18, 2026

संवाद नहीं कठोर निर्णय का समय


कुछ दिनों पूर्व ये समाचार प्रकाशित हुआ कि ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्मों पर फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रमाणन के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जा रहा है। बताया गया कि संभवत: सरकार ओटीटी  पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करने पर मंथन कर रही है। उसी समाचार में ये भी कहा गया कि सरकार इसके लिए आईटी नियम 2021 में भी संशोधन कर सकती है। इस तरह की खबरें नियमित अंतराल पर प्रकाशित होती रही हैं। जब भी किसी फिल्म या वेबसीरीज को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं तो इस तरह की बात सामने आती ही है। पिछले सात-आठ वर्षों में ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री पर जब-जब बवाल होता है तब इस तरह की खबरें आती हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत सख्ती से कंटेंट के आकलन पर विचार कर रहा है। पूर्व में भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों से कई दौर की बातचीत की थी। मनोरंजन जगत के प्रतिनिधियों को इस तरह की बैठकों में सरकार की तरफ से सख्त संदेश दिया गया था। पहले स्वनियमन की बात हुई। फिर त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी। लेकिन ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। कंटेंट और संवाद में अराजकता जारी है। गाहे बगाहे कुछ सीरीज और कुछ फिल्में इस तरह की आ जाती हैं जो बगैर किसी विवाद के निकल जाती हैं। लेकिन कुछ ऐसे निर्माता हैं जो अपनी फिल्मों में और वेबसीरीज में यौनिकता, नग्नता, जुगुप्साजनक दृष्य, हिंसा या गाली गलौच भरे संवाद से बाज नहीं आते हैं। वेबसीरीज निर्माताओं को लगता है कि नग्नता और हिंसा के साथ गाली गलौच की छौंक सीरीज की सफलता की गारंटी है। मनोरंजन की दुनिया में भेड़चाल है। एक सफल फार्मूला मिला नहीं कि सब उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं और दौड़ते ही रहते हैं। 

ताजा विवाद फिल्म सतलुज को लेकर उठा है। इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पिछले चार वर्षों से सर्टिफिकेट नहीं मिला था। निर्माता और बोर्ड के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस बीच जी 5 ने सतलुज को दिखाना आरंभ कर दिया। जबतक सरकार जागी तबतक दो दिन बीच चुके थे। जिनको देखना था वो देख चुके थे। बताया जा रहा है कि भारत में वैधानिक रूप से भले ही इस फिल्म को दिखाने पर प्रतिबंध है लेकिन पंजाब के कई शहरों में इस फिल्म का सार्वजनिक प्रसारण हो चुका है या हो रहा है। यह तो और भी गंभीर बात है। बगैर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र के किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 का उल्लंघन है। इस एक्ट के मुताबिक हर फिल्म को, अगर वो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, तो पहले फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ये देखता है कि फिल्म सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य है या नहीं। उस फिल्म से देश की अखंडता  और संप्रभुता पर तो कोई कतरा नहीं पैदा हो सकता है। इसके अलावा भी अन्य कई बिंदु हैं जिसकी पड़ताल करके प्रमाणन बोर्ड फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की श्रेणी तय करते है। फिर प्रमाणपत्र के रूप में फिल्म के प्रदर्सन की अनुमति दी जाती है। फिल्म सतलुज का बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के सार्वजनिक प्रदर्शन कानून सम्मत नहीं है। पंजाब पुलिस को या प्रशासन को इसके प्रदर्शन को रोकना चाहिए था। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जी 5 ने अपने प्लेटफार्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए कैसे और क्यों अनुमति दी। क्या उनको ये पता नहीं था कि फिल्म सतलुज को लेकर निर्माता और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद चल रहा है। अगर पता नहीं था तो आश्चर्य की बात है और अगर पता होते हुए ऐसा किया गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसपर ध्यान देना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि इस तरह का विवाद पहली बार सामने या है। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारतीय वायुसेना और कश्मीर के हालात पर पहले भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आपत्तिजनक संवाद और दृष्य दिखाए गए थे। विरोध के बाद उसको हटाया गया था। परंतु वो फिल्में नहीं थी। उनका सार्वजनिक प्रदर्सन नहीं हुआ था। सतलुज के इंटरनेट मीडिया और मैसेजिंग एप्स पर उपलब्ध होने की बात कही जाती है उससे तो सरकार का प्रतिबंध बेमानी हो गया। देश ये भी जानना चाहता है कि सरकार ने जी 5 पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी लेकिन उसके बाद क्या किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उसके बाद क्या कदम उठाए। कानून तोड़नेवालों की पहचान करने और उनको दंडित करने के लिए क्या पंजाब सरकार ने कोई कदम उठाया। ये बहुत ही चिंता की बात है कि संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की बात करनेवालों को भी ये प्रकरण नहीं दिखा या देखकर भी अनजान बने रहे। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत गंभीरता के साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर ठोस निर्णय ले। कड़े कदम उठाए जाएंगे, किसी को बख्शा नहीं जाएगा आदि के आगे जाकर निर्णय लेने का वक्त है। सरकार ने मनोरंजन जगत को बहुत समय दे दिया। स्वनियमन को लेकर व्यवस्था बनाई वो चली नहीं, त्रिस्तरीय व्यवस्था भी ठीक साबित नहीं हुई। लिहाजा सरकार को अब प्रसारित होनेवाली सामग्री के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

ओटीटी प्लेटफार्म पर जारी होनेवाले सामग्री के प्रमाणन की व्यवस्था करना बहुत आसान नहीं होगा। इसके लिए मानव संसाधन के अलावा संस्थागत ढांचा भी तैयार करना होगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस प्रकरण को या इस प्रकल्प को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा। जिस तरह से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड बरसों से बगैर सदस्यों के चल रहा है उसपर भी ध्यान देकर सदस्यों की नियुक्ति करनी होगी। बगैर सदस्यों के काम तो चल सकता है लेकिन उससे कई प्रकार की दिक्कतें पैदा होती हैं। अस्थायी विशेषज्ञों के भरोसे काम चलाया जाता है पर इसमें जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। सदस्यों के नहीं होने से बोर्ड के दफ्तरों में काम करने वाले बाबुओं का दखल बढ़ता है। वहीं से भ्रष्ट व्यवस्था के जन्म लेने की जमीन तैयार होती है। पूर्व में इ तरह के मामले आए हैं। प्रमाणन बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी संसाधन देना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर फिल्म प्रीव्यू करनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। ओटीटी की सामग्री को फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में लाने से काम बढ़ेगा। अब यह करना इस कारण आवश्यक हो गया है कि ओटीटी पर चलनेवाली बेवसीरीज और फिल्मों का उपयोग मनोरंजन की आड़ में राजनीति करने में होने लगा है। राजनीतिक मैसेजिंग या किसी व्यक्ति या विचारधारा को बदनाम करने का औजार बनने लगा है। कोई भी प्लेटफार्म जब अपनी मूल प्रकृत्ति को छोड़ने लगे तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसको संविधानसम्मत तरीके से रेगुलेट करना पड़ता है। कानून को लागू करना होता है। ओटीटी प्लेटफार्म को लेकर अब यही स्थिति बन रही है। संवाद का समय समाप्त हो गया है और समय है उचित और कठोर निर्णय का।  


Saturday, March 7, 2026

सिनेमा पर बचकानी समझ


लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का केरल में कालेज के छात्रों के साथ संवाद की खबर समाचारपत्रों में प्रकाशित है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि फिल्म, टीवी और मीडिया का हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। केरल के कुट्टिक्कनम् में कालेज छात्रों से बातचीत के दौरान जब एक छात्र ने राहुल गांधी से जानना चाहा कि फिल्मों का उपयोग हथियार के रूप में कैसे हो रहा है तो उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखी। प्रतिपक्ष के नेता ने फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2, गोज बियान्ड’ का उदाहरण दिया और बताया कि ये अच्छी बात है कि लोगों ने दे केरला स्टोरी 2 को नहीं देखा और सिनेमा हाल खाली रहे। राहुल के अनुसार इस तरह की फिल्में लोगों को बदनाम करने, उन्हें समाप्त करने और समाज में विभाजन पैदा करने जैसे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है ताकि कुछ लोगों को इससे लाभ हो और दूसरों को नुकसान। राहुल गांधी ने आगे कहा कि भारत इस तरह का बन गया। अब राहुल गांधी जब ये कहते हैं कि फिल्मों का उपयोग हथियार के तौर पर किया जा रहा है और भारत इस तरह का बन गया है तो इससे ये ध्वनित होता है कि ये नई परिघटना है। प्रश्न उठता है कि क्या फिल्मों और वेब सीरीज का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में नया ट्रेंड है। क्या जब देश केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार या उसकी अगुवाई वाली सरकार थी तो फिल्मों का राजनीतिक हथियार के तौर पर उपयोग नहीं किया जाता था। क्या जब से ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली वेब सीरीज बनने लगी हैं तब से उसमें राजनीतिक स्टेटमेंट नहीं होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वेब सीरीज में नियमित अंतराल पर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार की आलोचना के स्वरों को लक्षित किया जा सकता है। कहना ना होगा कि वेब सीरीज को लेकर किसी प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण से वहां इस तरह के कंटेंट अधिक दिखाई देते हैं।

राहुल गांधी जब फिल्मों को हथियार के तौर पर उपयोग करने और समाज के विभाजन के उसके उद्देश्य पर बोलते हैं तो कई ऐसी फिल्में याद आती हैं जो कांग्रेस के शासन काल में बनीं और प्रदर्शित हुईं। तब क्या किसी ने कहा था कि वो फिल्में समाज में विभाजन पैदा करने के लिए बनाई जा रही हैं या उसका राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है। स्वाधीनता के पहले और स्वाधीनता के बाद कई ऐसी फिल्में बनी जो सत्ता में बैठे लोगों के विचार को या सत्ता का समर्थन कर रही विचारधारा का समर्थन करती थी। नया दौर और मदर इंडिया में किस तरह से फिल्म कला की आड़ में वैचारिकी परोसी गई वो अब किसी से छुपी नहीं है। नया दौर में तो महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और नेहरू की औद्योगिकीकरण की नीति के टकराव को चित्रित किया गया था। जिसका विश्लेषण बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने किया। ख्वाजा अहमद अब्बास तो घोषित रूप से वामपंथी थे। वामपंथी विचारधारा को पोषित और पल्लवित करनेवाली कहानियां लिखते और बनाते थे। नक्सवाद के कथित संघर्ष को चित्रित करती फिल्म द नक्सलाइट्स बनाई। उसका उद्देश्य क्या था? आमिर खान अभिनीत फिल्म फना आई थी जिसमें कश्मीर में जनमत संगह की बात की गई थी। भारत की जनता को अब भी याद है कि स्वाधीन भारत में किस भारतीय नेता ने सबसे पहले कश्मीर में जनमत संग्रह की बात की थी। अगर हम इतिहास में ना भी जाएं और इस शताब्दी में बनी फिल्मों पर ही नजर डालें तो एक विवादास्पद फिल्म का नाम स्मरण होता है - परजानियां। इस फिल्म को 2002 के गुजरात दंगे की सत्यकथा से प्रेरित बताकर पेश किया गया था। क्या उसमें समाज को बांटने की बातें नहीं थीं। क्या उसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा करके नहीं दिखाया गया था। इस फिल्म के प्रदर्शन के समय तक तो राहुल गांधी राजनीति में आ चुके थे। फिल्म परजानियां को लेकर राहुल गांधी ने कभी इस तरह का बयान दिया हो, जैसा वो द केरला स्टोरी को लेकर दे रहे हैं, याद नहीं पड़ता है। परजानियां की रिलीज के समय कितना विवाद हुआ था ये अब भी फिल्मों में रुचि रखनेवाले लोगों को याद है। सिर्फ इतना ही क्यों आनंद पटवर्धन की फिल्मों को ही देख लीजिए अनुमान हो जाएगा कि वो किसके विरुद्ध ‘हथियार’ का उपयोग कर रहे थे। उनकी फिल्मों का मुख्य स्वर हिंदू विरोध होता था। ये पूरा का पूरा कांग्रेस का इकोसिस्टम का हिस्सा था।

राहुल गांधी ने टीवी और मीडिया को भी अपने बयान के लपेटे में लिया है। आज भी अगर वेबसीरीज को देखा जाए तो कई ऐसी सीरीज हैं जिनमें समाज को बांटनेवाले दृश्य या हिंदू मुसलमान के बीच नफरत के संवाद होते हैं। कई बार तो सिस्टम को भी मुसलमानों के विरुद्ध बता दिया जाता है। पाताललोक नाम के वेबसीरीज को देखिए किस तरह से पुलिस को मुस्लिम विरोधी चित्रित किया गया है। इस कारण से जब राहुल गांधी इस तरह की बातें करते हैं तो वो खोखले लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वो सिनेमा और मनोरंजन की दुनिया में चलनेवाली राजनीति से अनजान हैं। आज भी कम से कम हिंदी फिल्मों में तो कांग्रेस इकोसिस्टम का ही बोलबाला है। मुक्काबाज जैसी फिल्म में बगैर किसी प्रसंग के संवाद होता है कि वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए चले जाएंगे। संकेत स्पष्ट है कि फिल्मकार किस विचार को कठघरे में खड़ा कर रहा है। आज भी आईसी 814 कांधार हाईजैक जैसी वेबसीरीज बनती है जो पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को लगभग आरोप मुक्त करती है। राहुल गांधी जब फिल्म. टीवी और मीडिया की बात करते हैं तो उनको ये देखना चाहिए कि किस विचार ने कला के लिए कला के सिद्धांत को आगे बढ़ाया और किस विचारधारा ने कला में मैसेज होने की बात आरंभ की। चाहे वो चित्र हो, चलचित्र हो या फिर साहित्य ही क्यों न हो हर जगह सृजन में मैसेज की वकालत की गई थी। जब मैसेज होगा तो किसी न किसी के पक्ष में होगा या किसी के विरोध में। मैसेज तो सामाजिक भी हो सकता है और राजनीतिक भी।

आज राहुल गांधी को द केरला स्टोरी या द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों में विभाजनकारी मैसेज दिखता है क्योंकि वो उनकी राजनीति के अनुकूल नहीं है। उनकी और उनकी पार्टी की राजनीति परजानियां और फना जैसी फिल्मों के आधार पर चलती है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची को अगर देखा जाए तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। ये तो भला हो कि राहुल गांधी को धुरंधर की याद नहीं आई अन्यथा वो इसको भी नहीं छोड़ते। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से हिंदू धर्म प्रतीकों को बदनाम करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत काम किया जाता रहा है, आज भी कुछ लोग कर ही रहे हैं लेकिन चूंकि वो हिंदू विरोधी हैं इस कारण से राहुल गांधी को वो ‘हथियार’ नहीं लगता है. आज फिल्मों के दर्शक बहुत समझदार हो चुके हैं और वो किसी भी भाषा में अगर उनकी धर्म और संस्कृति के खिलाफ कोई बात आती है तो उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। अयोध्या में भव्य रामलला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय तमिल में अन्नपूर्णी फिल्म आई थी। उसमें हिंदू विरोधी कहानी थी। दर्शकों ने उसका विरोध किया था। नेटफ्लिक्स को उस फिल्म को अपने प्लेटफार्म से हटाना पड़ा था। जिस दिन राहुल गांधी फिल्मों, टीवी और मीडिया को समग्रता में देखना आरंभ करेंगे वो इसको राजनीति के ‘हथियार’ के तौर पर उपयोग करना बंद कर देंगे।  

Saturday, February 7, 2026

जातिसूचक फिल्म शीर्षक पर बवाल


इस सप्ताह मनोज वाजयेपी अभिनीत फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर उठा विवाद उठा। ये फिल्म ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स पर रिलीज होनेवाली थी। उसका ट्रेलर सामने आते ही इसके नाम को लेकर विवाद आरंभ हो गया। कई शहरों में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। लखनऊ में केस दर्ज होने और भारत सरकार के दखल के बाद फिल्म के निर्माताओँ ने ना सिर्फ ट्रेलर बल्कि इंटरनेट मीडिया पर मौजूद सभी प्रकार की प्रचार सामग्री हटा ली। फिल्म के निर्देशक ने एक लिखित बयान जारी किया जिसमें अपनी सफाई दी। कहा कि फिल्म का टाइटल एक कालपनिक चरित्र को ध्यान में रखकर तय किया गया था। फिल्म के शीर्षक किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के इरादे नहीं रखा गया था। अपने लंबे बयान में नीरज ने अपने पूर्व के कामों को भी याद किया। ये भी स्वीकार किया कि इस फिल्म के शीर्षक से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। वो लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए फिल्म से जुड़ी सभी प्रचारात्मक सामग्री हटा रहे हैं। जल्द ही फिल्म को दर्शकों के सामने पेश करने का भरोसा भी दिया। अपने बयान में नीरज ने कंटेंट के इंटेट की बात भी की। प्रश्न ये उठता है कि बार-बार हिंदुओं को ही क्यों लक्षित किया जाता है। नीरज पांडे को ऐसी कहानी कैसे मिली कि उसमें पंडत को ही घूसखोर दिखाया गया। क्या नीरज पांडे कभी ऐसी कहानी पर काम कर पाएंगें या ऐसी फिल्म बनाने का साहस कर पाएंगे जिसका शीर्षक घूसखोर मौलाना या भ्रष्ट पादरी होगा। उत्तर नकारात्मक ही होगा।

नीरज पांडे की इस फिल्म ने एक बार फिर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मंशा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर से ओटीटी प्लेटफार्म के नियमन को लेकर चर्चा होने लगी है। क्या ओटीटी के लिए भी किसी प्रकार के प्रमाणन या नियमन की आवश्यकता है। ये पहली बार नहीं हो रहा है कि ओटीटी प्लेटपार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर जनता का गुस्सा फूटा हो। इसके पहले भी याद करिए जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होनेवाला था तो उसके कुछ दिनों पूर्व नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको कहा गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर मुकदमा हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर हुआ लेकिन 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले इस तरह के कंटेंट का आना इंटेंट पर प्रश्न तो खड़े करता ही है। सिर्फ नेटफ्लिक्स ही क्यों प्राइम वीडियो पर जब वेबसीरीज तांडव रिलीज हो रही थी तब उसको लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। लखनऊ में केस दर्ज हुआ था। प्राइम वीडियो से जुड़ी अपर्णा पुरोहित से लखनऊ पुलिस ने पूछताछ भी की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। पिछले कई सालों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री और फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। हिंदू धर्म प्रतीकों के गलत चित्रण के आरोप लगते रहे हैं। दरअसल स्वनियमन या त्रिस्तरीय नियमन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें बहुत सारे झोल हैं। उन्हीं झोल का फायदा ये प्लेटफार्म्स उठाते रहे हैं। यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर समाज का एक वर्ग उद्वेलित था। ऐसे वातावरण में घूसखोर पंडत की घोषणा ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

एक दूसरा समाचार जो दिल्ली पुलिस के हवाले से सामने आया। समाचार था दिल्ली से गायब होनेवाली लड़कियों और महिलाओं को लेकर। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इस खबर ने जोर पकड़ा कि दिल्ली से भारी संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। रिपोर्ट को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि अमुक अवधि में अमुक संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। सामने आए आंकड़े डरानेवाले थे। रिपोर्ट आधारित समाचार में गुमशुदा लोगों की बरामदगी का उल्लेख नहीं था। बाद में इन आंकड़ों पर विमर्श बढ़ा। देश की राजधानी में जब ये विमर्श बढ़ा तो दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया कि चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये स्पष्ट तो नहीं है कि कौन इस तरह का वातावरण बनाकर लाभ कमाना चाहता है। संयोग है कि इसी समय फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी। इस फिल्म की कहानी भी गुमशुदा लड़कियों और उनकी बरामदगी की है जिसमें रानी मुखर्जी लीड रोल में है। कैसे लड़कियां गायब होती हैं और किन-किन गैंगों का इसमें हाथ रहता है। यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है कि मर्दानी फिल्म को लाभ पहुंचाने के लिए ही दिल्ली में लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट पर चर्चा हुई। अगर दिल्ली पुलिस कह रही है कि उस रिपोर्ट को प्रचारित करना पेड प्रमोशन का हिस्सा है तो उसको इसकी जांच तो करनी ही चाहिए। पेड प्रमोशन में हिस्सा लेकर लाभ कमाने की कोशिश करनेवालों को दिल्ली पुलिस को सामने लाना चाहिए।

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि प्रचार के लिए घूसखोर पंडत नाम रख दिया गया। इस तरह के तर्क के बाद दर्शक ये सोचने को विवश हो जाता है कि क्या फिल्मकारों को अब अपनी कला पर भरोसा नहीं रहा। क्या उनको अपनी स्टोरीटेलिंग पर विश्वास नहीं रहा और वो प्रचार के विभिन्न हथकंडों को अपनाने लगा। फिल्म धुरंधर ने 1000 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया लेकिन फिल्म को सफल बनाने के लिए निर्देशक आदित्य धर ने किसी प्रकार के सनसनी फैलाने वाले हथकंडे का उपयोग नहीं किया। आदित्य धर कहानी कहने के अपने हुनर और फिल्म की कहानी पर भरोसा था। दर्शकों ने उस भरोसे को सही साबित किया। धुरंधर को लेकर भी कुछ लोगों ने नकारात्मक प्रचार करने की कोशिश की लेकिन उसको दर्शकों ने नकार दिया। हिंदी फिल्मों में जब से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े लोग कहानी और गाने लिखने लगे तब से ही सनातन धर्म प्रतीकों का उपहास बढ़ा। इस स्तंभ में पिछले दिनों जावेद अख्तर से पूछे गए प्रश्न की चर्चा की थी। वो प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या लेखक का मजहब उसकी कृति को प्रभावित करती है। अब उस प्रश्न का दायरा और बढ़ा देता हूं कि क्या लेखक की विचारधारा कहानी में जबरदस्ती अपने विचार ठूंसती है।

 

Saturday, October 28, 2023

मनोरंजन का कारोबार या एजेंडा सेटिंग


कुछ दिनों पूर्व दो वेबसीरीज आई जिसको लेकर काफी चर्चा रही। एक है बंबई मेरी जान और दूसरी है मुंबई डायरीज सीजन टू। दोनों वेबसीरीज मुंबई शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है। बंबई मेरी जान में 1960 के दशक में उस शहर के अपराध की दुनिया को दिखाया गया है। उस दौर में हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहम, हसीना पार्कर, वरदराजन मुदलियार, करीम लाला जैसे गैंगस्टरों की कारस्तानियों और बांबे (अब मुंबई) पर कब्जे की लड़ाई को चित्रित किया गया है। मुंबई डायरीज के दूसरे संस्करण में मायानगरी में आई 2006 में आई भयानक बाढ के दौरान अस्पताल में डाक्टरों की कठिन जिंदगी को दिखाया गया है। इस सीरीज में न्यूज चैनलों के कामकाज पर भी कटाक्ष किया गया है। इस आलेख का मंतव्य सीरीज की समीक्षा नहीं बल्कि इनके माध्यम से दिए जानेवाले परोक्ष संदेश को रेखांकित करना है। मनोरंजन के माध्यमों का उपयोग करके किसी व्यक्तित्व, घटना या विचारधारा को पुष्ट किया जाता है, वो यहां स्पष्ट दृष्टिगोटर होता है। पहले बात करते हैं बंबई मेरी जान की। इस वेब सीरीज को रीतेश सिधवानी और फरहान अख्तर ने प्रोड्यूस किया है। दस एपिसोड का ये सीरीज एस हुसैन जैदी की पुस्तक डोंगरी टू दुबई, सिक्स डीकेड्स आफ द मुंबई माफिया पर आधारित है। इस सीरीज में विस्तार से हाजी मस्तान के आपराधिक साम्राज्य, उसकी कार्यशैली और फिर दाऊद इब्राहिम के अपराध की दुनिया में आने और छा जाने की परिस्थितियों को दिखाया गया है।

बंबई मेरी जान में के के मेनन ने दाऊद इब्राहिम के पिता इब्राहिम कासकर की भूमिका निभाई है। इस्लाइल कादरी नाम का ये शख्स पुलिस में होता है और उसको हाजी मस्तान, करीम लाला और वरदराजन मुदलियार के आपराधिक सांठगांठ को तोड़ने का काम सौंपा गया है। उसको एक बेहद ईमानदार पुलिस अधिकारी के तौर पर दिखाया गया है जो विषम परिस्थितियों में भी टूटने को तैयार नहीं होता है। नौकरी चली जाती है, गरीबी में पूरा परिवार बिखरने लगता है, बच्चे की पढ़ाई छूट जाती है, त्योहार पर घर में खाने या पकवान के लिए पैसे नहीं होते हैं। ऐसे माहौल में उसका बेटा दारा, जिसका चरित्र दाऊद इब्राइम पर आधारित है, बकरीद के मौके पर पहला अपराध करता है और बकरा चोरी करता है। यहां विचार करने योग्य बात ये है कि इस चोरी में भी मजहब को डालना क्यों जरूरी था। बकरीद के मौके पर बेचारे बच्चे को कुर्बानी देनी है, मांस खाना है इसलिए वो चोरी करता है। ऐसी परिस्थिति बना दी गई है कि दर्शकों को उसके अपराध के पीछे उसकी बेचारगी नजर आती है। जैसे जैसे दारा का चरित्र आगे बढ़ता है उसके अपराध को अन्य परिस्थितियों से जोड़ दिया जाता है। जब भी उसका पिता उसको अपराध के बाद किसी प्रकार का नसीहत देना चाहता है तो वो अपने पिता को उसकी बेचारगी और परिवार की बदहाली का ताना देकर अपने कुकर्मों को जस्टिफाई करता है। हाजी मस्तान जब इस्माइल कादरी के घर आता है। बच्चों को तोहफा देकर जाने लगता है तो कादरी विरोध करता है लेकिन उसकी पत्नी बच्चों की भूख का हवाला देकर उसके विरोध को कुंद कर देती है। 

पूरी कहानी इस तरह से बुनी गई है कि दाऊद जैसे अपराधी को लेकर दया का भाव उभरता है। उसको अच्छे बाप का बुरा बेटा दिखाया जाता है। चरित्र भले ही बुरा हो लेकिन बुराई में नायकत्व को उभारा गया है। वो हफ्ता भी वसूलता है तो मस्जिद के मरम्मत के नाम पर। एक बार फिर अपराध को जस्टिफाई करने के लिए मजहब की आड़ ली जाती है। कहीं भी कहानी में कहानीकार या सीरीज में निर्देशक ने उसके नायकत्व को गढ़ने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। ऐसा नायक जिसके परिवार के पीछे दूसरे गैंगस्टर पड़े हैं, उसके परिवार पर अस्पताल में हमला होता है। परिवार की जान बचाने के लिए एक भाई गोली खाकर जख्मी होता है तो बहन गोली चलाने को मजबूर हो जाती है। यहां ऐसा माहौल बनाया गया है जैसे आत्मरक्षा में हत्या की जा रही हो। अपराधी  मनोरंजन की आड़ में छवि निर्माण की कोशिश या खूंखार छवि को अपेक्षाकृत माइल्ड करने का प्रयास दिखता है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि कैसे वेब सीरीज निर्माताओं, निर्देशकों और कहानीकारों के एजेंडा का संवाहक बनता जा रहा है। वेबसरीज को लेकर जिस भी प्रकार का स्वनियमन हो लेकिन उसका प्रभाव कहीं दिखता नहीं है। फिक्शन की आड़ में कई तरह के खेल होते नजर आते हैं।

बंबई मेरी जान की तुलना में मुंबई डायरीज का दूसरा सीजन बेहतर है। इसमें न्यूज चैनल की एक एंकर को अपने शो की रेटिंग बढ़ाने के लिए शहीद की पत्नी की भावनाओं से खेलते हुए दिखाया गया है। ये घटना काल्पनिक हो सकती है लेकिन पीड़ितों को स्टूडियो में बैठाकर उनके आरोपों को प्रसारित होते तो हमारे देश ने देखा है। जब दिल्ली में निर्भया कांड हुआ तो पीड़ित लड़की के साथ बस में उसका जो दोस्त था उसको टीवी स्टूडियो में बिठाने की होड़ लगी थी। न्यूज चैनलों में जिस प्रकार का मीडिया ट्रायल होता है उसका चित्रण मुंबई डायरीज में है। डाक्टर किन परिस्थितयों में काम कर रहे होते हैं उसको जाने बगैर उनपर आरोपों की बौछार करना। असाधारण परिस्थिति में उनसे सामान्य परिस्थितियों की तरह व्यवहार की अपेक्षा कर दोषी ठहरा देने की प्रवृत्ति पर भी प्रहार किया गया है। लेकिन इस वेब सीरीज में भी यथार्थ चित्रण के नाम पर जिस तरह के दृष्य दिखाए गए हैं वो इस सैक्टर में नियमन या प्रमाणन की आवश्यकता को पुष्ट करते हैं। बाढ में फंसी गर्भवती महिला की स्थिति जब बिगड़ती है तो उसकी शल्यक्रिया का पूरा दृष्य दिखाना जुगुप्साजनक है। कैमरे पर आपरेशन के दौरान पेट को चीरने का दृश्य, खून से लथपथ बच्चे को माता के उदर से बाहर निकालने आदि से बचा जा सकता था। कोई भी संवेदनशील दर्शक ऐसे दृश्यों को नहीं देखना चाहता है। इस तरह के दृश्यों को दिखाकर निर्माता निर्देशक पता नहीं क्या हासिल करना चाहते हैं। 

ओवर द टाप (ओटीटी) पर एक फिल्म आई खुफिया उसमें एक संवाद है, जबतक दुनिया देश और धर्म में बंटी है तब तक खूनखराबा होता रहेगा।इस संवाद में भी एक एजेंडा है जहां परोक्ष रूप से राष्ट्र की अवधारणा का निषेध किया जा रहा है। एक विचारधारा विशेष में वर्षों से देशों की भौगोलिक सीमाओं को खत्म करने की पैरोकारी करता रहा है। उनका मानना है कि इससे युद्ध से लेकर समुदायों के बीच की घृणा समाप्त होगी। यहां तक तो ठीक है लेकिन जब उसको धर्म से जोड़ दिया जाता है तो मंशा स्पष्ट होने लगती है। प्रमाणन के बावजूद इस तरह के संवाद फिल्मों में दिख जाते हैं, पता नहीं क्यों और कैसे। फिल्म ब्रह्मास्त्र में मंदिरों के शहरों की बात होती है तो एक संवाद आता है, इस शहर में हर कोई कुछ न कुछ छुपाने आता है, कोई अपनी परछाईं छुपाता है तो कोई अपने पाप। आखिर धर्म से बड़ा मुखौटा और क्या हो सकता है। यहां जिस तरह से मंदिर, धर्म और मुखौटा का प्रयोग किया गया है उससे निर्माता निर्देशक की मंशा साफ हो जाती है। प्रमाणन वाली फिल्मों में इस तरह के संवाद अपेक्षाकृत कम होते है लेकिन ओटीटी पर प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों में और वेब सीरीज में तो ये आम है। ओटीटी इंडस्ट्री के स्वनियमन का असर नहीं दिख रहा है, सरकार को इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ओटीटी प्लेटफार्म्स को काफी अवसर दिए गए लेकिन वहां की अराजकता जस की तस है।   

  


Saturday, July 22, 2023

प्रभावी नीति की आवश्यकता


ओवर द टाप ( ओटीटी) प्लटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री के विनियमन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था बनाई गई थी, उसके परिणाम संतोषजनक नहीं दिखाई दे रहे हैं। न  तो अश्लीलता रुक रही है और न ही विवादित प्रसंग। सरकार की तरफ से लगातार ओटीटी प्लेटफार्म्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनको सरकारी समारोहों में भागीदार बनाया जा रहा था। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव से लेकर गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल तक में उनकी भागीदारी के रास्ते खोले जा रहे थे। इस वर्ष तो फिल्म फेस्टिवल में ओटीटी के लिए पुरस्कार की भी घोषणा की गई है। दूसरी तरफ इन प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर शिकायतें भी बढ़ती जा रही थीं। ओटीटी प्लेटफार्म्स की सामग्रियों के प्रमाणन को लेकर एक संस्था बनाने पर भी निरंतर चर्चा हो रही है। लोगों को लगता है कि भारत जैसे देश में ओटीटी प्लेटफार्म्स पर किसी तरह का रेगुलेशन नहीं होने से अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है। इन चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों पहले सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिनमें इन सब बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इस चर्चा में सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया। अनुराग ठाकुर ने नसीहत दी कि ओटीटी प्लेयर्स को कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता दिखाने से बचना चाहिए। मंत्री ने इन प्लेटफार्म्स को सलाह दी कि वो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और विविधताओं को लेकर सतर्क भी रहें और संवेदनशील भी। बताया जाता है कि इस बैठक में लस्ट स्टोरीज और राना नायडू जैसे सीरीज की सामग्री को लेकर चर्चा हुई। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है वो भारतीय समाज के लिए कितना उचित है। चर्चा तो इस बात पर भी हुई कि कि ओटीटी प्लेटफार्म्स के रेगुलेशन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें एक स्तर और जोड़ा जाए। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री की स्क्रिप्ट को शूटिंग के पहले एक कमेटी देखे। ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों को 15 दिनों का समय दिया गया है ताकि वो इसको लेकर कोई व्यवस्था बनाएं और सरकार को सुझाएं। हलांकि ये व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी ये देखनेवाली बात होगी।

ओटीटी प्लेटफार्म्स  पर दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा हो रही है। सामग्री के पक्ष और प्रतिपक्ष में कई प्रकार के तर्क सामने आते रहते हैं। कई बार यहां दिखाई जानेवली वेब सीरीज को लेकर हंगामा तक हो चुका है। मामला पुलिस से लकर अदालतों तक में गया है। वेब सीरीज में गालियों की भरमार, यौनिकता और नग्नता का प्रदर्शन, जबरदस्त हिंसा और खून खराबा, अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां, कई बार सेना और सैनिकों की छवि खराब करने जैसे प्रसंग भी सामने आते रहे हैं। कोरोना काल के पहले जब ओटीटी प्लेटफार्म्स और वेब सीरीज हमारे देश में लोकप्रिय हो रहे थे तब कई निर्माताओं ने सेक्स और गाली गलौच के जरिए लोकप्रिय होने का रास्ता चुना था। कई विदेशी वेब सीरीज में तो नग्नता आम बात थी। ओटीटी को लेकर किसी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने के कारण नग्न दृश्यों के प्रदर्शन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं था। अब भी नहीं है। कोरोना काल में ओटीटी बेहद लोकप्रिय हो गया। नेटफ्लिक्स ने दिसंबर 2021 में ग्राहकों को कम मूल्य पर अपनी सेवाएं उपलब्ध करवाना आरंभ किया। नेटफ्लिक्स ने दो तरह की रणनीति अपनाई थी। एक तो ग्राहकों को जो शुल्क देना पड़ता था उसको कम किया और अपने प्लेटफार्म पर भारतीय फिल्में और भारतीय कहानियों पर बनीं वेब सीरीज को प्राथमिकता देना आरंभ कर दिया। इंडस्ट्री को जानकारों का मानना है कि नेटफ्लिक्स को इसका काफी लाभ हुआ। इसी तरह से प्राइम वीडियो, हाटस्टार आदि ने भी भारतीय कहानियों को केंद्र में रखकर कहानियां पेश करनी शुरु कर दी। उनको भी इसका लाभ हुआ। कहना न होगा कि कोरोना के बाद जिस तरह से ओटीटी प्लेटफार्म्स ने स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा दिया और ग्राहकों के शुल्क को युक्तिसंगत बनाया उससे इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी।

एक तरफ ओटीटी प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता बढ़ रही थी लेकिन साथ ही साथ वहां दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे थे। सरकार की नजर भी इनपर थी। इंडस्ट्री को लोगों को लेकर लंबे समय तक चले विचार विमर्श के बाद फरवरी 2021 में इंटरनेट मीडिया को लेकर केंद्र सरकार ने एक गाइडलाइन जारी की थी। उसके अंतर्गत ही ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक त्रिस्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई गई थी। तब ओटीटी प्लेटफार्म्स से जुड़े लोगों ने इसका स्वागत किया था। उस व्यवस्था का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला। वेब सीरीज और ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद जारी रहे। शिकायतें भी आती रहीं उसका निबटारा भी होता रहा लेकिन विवाद फिर भी जारी रहे। बाद के दिनों में एक खास प्रकार की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी कि इन ओटीटी प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री में कभी प्रत्यक्ष तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक विचारों को उठाने और गिराने का खेल चलने लगा। संवाद से लेकर दृश्यों तक में। अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता और यथार्थ  की आड़ में नग्नता और गाली गलौच दिखाने का चलन कम नहीं हुआ। इस वर्ष अप्रैल में संसदीय समिति ने ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली अश्लीलता पर चिंता प्रकट की थी। समिति के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि जिस प्रकार की अश्लीलता इन सीरीज में दिखाई जाती है वो भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ता है। सरकार और समाज के स्तर पर भी इसको लेकर निरंतर मंथन हो रहा है।ओटीटी प्लेटफार्म्स भी अपने ग्राहकों की संख्या को बढ़ाने, उसको कायम रखने के लिए लगातार कंटेंट में प्रयोग करते रहे। अब भी कर भी रहे हैं। यह एक अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी।

प्रश्न ये उठता है कि जब इस देश में फिल्मों को लेकर एक प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था है तो फिर् ओटीटी को लेकर क्यों नहीं इस तरह की व्यवस्था बन सकती है। ओटीटी का आकार इतना व्यापक होता जा रहा है कि अगर इसके लिए किसी प्रमाणन की व्यवस्था तय होती है तो उसके लिए काफी संसाधन की आवश्यकता होगी। अगर प्रोडक्शन के पहले स्क्रिप्ट देखने की व्यवस्था बनाई जाती है तो इसके लिए भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर समितियों का गठन करना होगा। अगर इसके अलावा किसी तरह की कोई व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके भी व्यावहारिक पक्ष को देखने की आवश्यकता होगी। इस स्तंभ में पहले भी कई बार ओटीटी की सामग्रियों के प्रमाणन या फिर किसी अलग प्रकार के मैकेनिज्म की चर्चा हो चुकी है। आज जिस प्रकार से इन प्लेटफार्मस पर वेब सीरीज के माध्यम से राजनीति की जा रही है या जिस प्रकार से हिंदुत्व और उसके प्रतीक चिन्हों पर टिप्पणियां की जाती हैं उसको ध्यान में रखना चाहिए। धर्म विशेष या समुदाय विशेष को बदनाम करने वाले कंटेंट का इंटेंट देखा जाना चाहिए। आलोचना हो लेकिन आलोचना के पीछे राजनीतिक उद्देश्य न हो। आलोचना के पीछे किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने की मंशा न हो। क्योंकि जब मनोरंजन राजनीति का औजार बनता है तो कई बार समाज का बड़ा वर्ग उसको समझ नहीं पाता है और वो परोक्ष रूप से लोकतंत्र को कमजोर करता है। ओटीटी आज एकक ऐसे सेक्टर के तौर पर उभरा है जहां अनेक प्रकार की संभावनाएं हैं। उन संभावनाओं को बाधित किए बगैर ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक प्रभावी नियमन होना चाहिए। विमर्श काफी लंबे समय से चल रहा है अब वक्त है कि सरकार एक नीति बनाकर उसको लागू कर दे।  

Saturday, July 9, 2022

ओटीटी प्लेटफार्म्स की चुनौतियां


कोरोना काल में जब लाकडाउन की वजह से सिनेमा हाल बंद हुए और लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे, ऐसे में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स काफी लोकप्रिय हुए थे। घर बैठे उनके सामने मनोरंजन का एक ऐसा विकल्प था जहां देश विदेश की असंख्य सामग्री उपलब्ध थी। सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी इन ओटीटी प्लेटफार्म को डाउनलोड करके लोगों ने मनोरंजन के इस नए विकल्प को अपनाया था। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान इन प्लेटफार्म्स पर बड़े सितारों की फिल्में भी रिलीज हुईंन थीं। उस समय दुनिया में ये आकलन किया गया था कि भारत ओटीटी प्लेटफार्म्स का या वीडियो आन डिमांड स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। अनुमान ये भी लगाया गया था कि इस वर्ष के अंत तक देश में स्मार्ट फोन या इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं की संख्या 80 करोड़ पहुंच जाएगी। इस संख्या को ध्यान में रखते हुए ओटीटी प्लेटफार्म्स ने भारतीय बाजार को लेकर अपनी रणनीति बनाई और यहां निवेश किया। वैश्विक स्तर पर भी कोरोना के दौर में इस माध्यम को दर्शकों ने अपनाया था। आपदा में मिले इस अवसर की वजह से इन प्लेटफार्म्स को चलानेवाली कंपनियों को दो साल में काफी मुनाफा हुआ। कोरोना का भय कम होने की वजह से अब इन कंपनियों के सामने अपनी उस सफलता को बनाए रखने की चुनौती है। चुनौती तो ग्राहकों की संख्या को बरकरार रखने की भी है। 

कनाडा की मार्केटिंग विशेषज्ञ रेबेका आल्टर ने अपने एक लेख में लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स की वैश्विक चुनौतियों के बारे में लिखा है। रेबेका के मुताबिक इस वर्ष की पहली तिमाही में नेटफ्लिक्स ने दो लाख ग्राहक खो दिए और विशेषज्ञों का अनुमान है कि दूसरी तिमाही में करीब बीस लाख ग्राहक इस प्लेटफार्म को छोड़ सकते हैं। रेबेका इसके लिए यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस में अपनी सेवाएं बंद करने के नेटफ्लिक्स के फैसले को तो जिम्मेदार मानती ही है, साथ ही ग्राहक शुल्क में बढ़ोतरी को भी एक कारण माना है। वैश्विक बाजार की बात छोड़ भी दें तो अपने देश में भी नेटफ्लिक्स की सेवाएं अन्य सभी ओटीटी प्लेटफार्म्स से महंगी हैं। नेटफ्लिक्स मोबाइल पर देखने की सुविधा देने के एवज में प्रतिमाह 149 रु लेता है जो कि एक वर्ष का 1788 रु बनता है। अन्य लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म वार्षिक शुल्क के तौर पर हजार रुपए तक लेती हैं। अमेजन प्राइम, डिजनी हाटस्टार और सोनी लिव आदि का वार्षिक शुल्क एक हजार रु से कम ही है। लेकिन इन सभी प्लेटफार्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने ग्राहकों को जोड़े रखने की। कोरोना महामारी के दौरान जितने ग्राहक जुड़े थे उनको बनाए रखना इनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2020 के अप्रैल से लेकर जुलाई तक विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म्स से करीब तीन करोड़ नए ग्राहक जुड़े थे। जो अब लगातार कम होते जा रहे हैं। इन प्लेटफार्म्स को नजदीक से जाननेवाले और इनकी गतिविधियों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि कोरोना काल में जितने ग्राहक इन प्लेटफार्म्स से जुड़े थे उनमें से करीब आधे ग्राहकों ने सब्सक्रिप्शन का नवीनीकरण नहीं करवाया। वैश्विक स्तर पर भी लगभग यही स्थिति है। सबसे बड़ा कारण कोरोना का भय खत्म होने लगा है और सिनेमा हाल खुल गए हैं। 

ओटीटी प्लेटफार्म्स से दर्शक क्यों जुड़े रहें, अगर इसका उत्तर ढूंढे तो सबसे पहले तो इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री की गुणवत्ता की बात होगी। दूसरी वजह इनको देखने का शुल्क। इसके अलावा हमारे देश में इन प्लेटफार्म्स को विवादों के कारण भी काफी फायदा मिला था। ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध कंटेंट को लेकर जब विवाद होता है और उसकी चर्चा होती है तो इन प्लेटफार्म्स को नए ग्राहक मिलते हैं। लोग उस सामग्री को देखना चाहते हैं। ग्राहकों की यही चाहत उनसे इन प्लेटफार्म्स को डाउनलोड करवाती है। अब अगर इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि वहां बहुत अधिक दुहराव होने लगा है। पहले कुछ सामग्री चौंकाती थी और दर्शकों को अपने साथ रोकती थी। अब लगातार एक ही तरह की सामग्री उपलब्ध होने लगी तो दर्शकों के लिए वो सामान्य बात हो गई। नेटफ्लकिस पर पहले ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज आई जिसमें नग्नता और भयंकर हिंसा थी। इन प्लेटफार्म्स पर किसी प्रकार की प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है इस वजह वो सेंसर बोर्ड की कैंची से मुक्त होकर खुले आम नग्नता और यौनिकता परोस रहे थे। हिंसा के नाम पर शरीर के अंगों को इस तरह से काटकर दिखा रहे थे कि कुछ दर्शकों को झटका लगता था। भाषा के स्तर भी सारी मर्यादा तोड़कर भरपूर गाली गलौच भरे संवाद भी दर्शकों को चौंका रहे थे। इन सबसे होनेवाली चर्चा से ग्राहक बढ़ रहे थे। धीरे धीर इनकी नवीनता खत्म हो गई।  

इसके अलावा भारतीय संस्कृति को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां या दृश्य दिखाने पर भी जमकर विवाद हुए। लैला जैसी सीरीज भी आई जिसने हिंदू मानस को झकझोरा था। नेटफ्लिक्स पर ही एक सीरीज आई थी ‘द सूटेबल बाय’। इसमें मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य पर जमकर बवाल हुआ था। केस मुकदमे भी हुए। प्लटफैर्म को अपेक्षित प्रचार मिला और परिणामस्वरूप उसके ग्राहक भी बढ़े। इसी तरह से अगर देखें तो सभी ओटीटी प्लेटफार्म ने अलग अलग तरीके से दर्शकों की जेब से पैसे निकलवाने का उपक्रम किया। जो ओटीटी प्लेटफार्म मुफ्त में कंटेंट दिखा रहा था उसने वेब सीरीज के बीच में विज्ञापन दिखाना आरंभ कर दिया। इतनी बार विज्ञापन आता है कि दर्शक परेशान हो जाते हैं। तभी स्क्रीन पर एक फ्लैश आता है कि अगर आप बगैर विज्ञापन या बिना अवरोध के वेब सीरीज देखना चाहते हैं तो अमुक राशि देकर वार्षिक ग्राहक बनें। इसके अलावा कई प्लेटफार्म्स ने तय ग्राहक शुल्क पर एक ही डिवाइस पर देखने की सुविधा दी। मोबाइल की अलग दर और मोबाइल और टीवी पर देखने के लिए अलग दर। इन सब झंझटों से भी ग्राहक इनसे दूर हुए। एक और बात जिसको रेखांकित करना आवश्यक है वो ये कि इन प्लेटफार्म्स ने हिंदी फिल्मों के बड़े सितारों को भारी भरकम रकम देकर उके साथ कंटेंट के लिए समझौता किया। सामग्री अर्जित करने के लिए निवेश किया गया लेकिन उसको अपेक्षित दर्शक नहीं मिले। डिजनी हाटस्टार पर अजय देवगन की एक वेब सीरीज आई जिसका नाम था रुद्रा, द एज आप डार्कनेस। अजय देवगन की वजह से प्लेटफार्म ने इसपर भारी भरकम रकम खर्च की लेकिन ये सीरीज अपेक्षित सफलता अर्जित नहीं कर सकी। जानकारों का मानना है कि इससे भारी नुकसान हुआ। इसी तरह कुछ फिल्में भी खरीदी गईं जिनको सफलता नहीं मिली। 

इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है लगातार कटेंट में इस तरह का बदलाव जिससे दर्शकों को अपनी ओर खींचने और फिर उनको रोके रखने में सफलता मिल सके। विवाद की गुंजाइश अब लगभग खत्म सी हो गई है क्योंकि सभी निर्माता अब इसकी परिणति से बचना चाहते हैं। वो सतर्क होकर सीरीज बनाने लगे हैं। तीसरे अगर भारतीय बाजार में उनको बने रहना है और लंबे समय तक मुनाफे का कारोबार करना है तो ये आवश्यक है कि वो अपने शुल्क निर्धारण पर काम करें। भारत में इंटरनेट की लोकप्रियता की एक वजह उसका सस्ता होना भी है। अगर ये सस्ते पैकेज पर अपना कंटेंट उपलब्ध करवाने के बारे में सोच सकते हैं तो इनकी ग्राहक संख्या बढ़ सकती है। कस्बों और गांवों तक पहुंचना है तो उनको अपना ग्राहक शुल्क कम रखना ही होगा। आधार बढ़ाकर भी मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।  


Saturday, August 7, 2021

अश्लीलता और मुनाफे का खेल


अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा इन दिनों अश्लील फिल्मों के बवंडर में घिरे हैं। थाना,पुलिस,कचहरी और जेल के चक्कर लगा रहे हैं। उनपर आरोप है कि वो एक एप के जरिए अश्लील फिल्मों का कारोबार करते हैं। यह पहली बार हो रहा है कि एक टॉप की अभिनेत्री के पति अश्लील फिल्मों के कारोबार में फंसे हैं। लेकिन ये पहली बार नहीं है कि शिल्पा के पति विवाद में आए हैं। राज कुंद्रा जब राजस्थान रॉयल्स के मालिकों में से एक थे तब उनपर मैच फिक्सिंग का आरोप लगे थे। उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी और वो जेल भी गए थे। उनकी टीम राजस्थान रायल्स के खलने पर प्रतिबंध भी लगा था। उसके पहले जब राज कुंद्रा ने शिल्पा शेट्टी से शादी की थी तो उनकी पहली पत्नी और उनके बहनोई के रिश्तों को लेकर भी आरोप प्रत्यारोप का दौर चला था। इस बार राज कुंद्रा पहले के आरोपों से ज्यादा संगीन इल्जाम में फंसे हैं। उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी से भी पूछताछ की जा चुकी है। शिल्पा शेट्टी ने अपनी निजता को लेकर अपील भी की है, उनकी निजता का सम्मान होना चाहिए लेकिन अगर कहीं कानून तोड़ा गया है तो उसकी चर्चा तो स्वाभाविक है। उसमें निजता आदि की बात बेमानी हो जाती है। दरअसल अश्लील फिल्मों का कारोबार पिछले दस साल में कई गुणा बढ़ा है। तकनीक के फैलाव और इंटरनेट के घनत्व के बढ़ते जाने से अश्लीलता के कोष्ठक में रखी जानेवाली सामग्री का चलन काफी बढ़ गया है। अगर गहराई से इसपर विचार करें तो पाते हैं कि राज कुंद्रा पर जो दो आरोप लगे उन दोनों कारोबार में लागत कम और मुनाफा बहुत अधिक है। मैच फिक्सिंग और अश्लील फिल्मों के कारोबार में बहुत अधिक पैसा कमाया जा सकता है। धंधे में इसको ईजी मनी कहते हैं। अश्लील फिल्मों का कारोबार करना हमारे देश के कई कानून के अंतर्गत अपराध माना जाता है और आरोप सिद्ध होने पर दंड का भी प्राविधान है। 

राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध अश्लील सामग्रियों को लेकर देशव्यापी बहस होनी चाहिए। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री को रोक पाना लगभग असंभव है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में अश्लीलता के खिलाफ कानून है। कई देशों में दिशा निर्देश है कि मनोरंजन या यथार्थ के नाम पर आप कितना दिखा सकते हैं और कितना छिपा सकते हैं। अमेरिका में फिल्मों में इतना खुलापन है कि वहां स्त्री-पुरुष के बीच के अंतरंग दृश्यों को दिखाया जाता है और उसपर कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है। इसी तरह से कई यूरोपीय देशों में खुलापन है लेकिन जापान समेत कई देश फिल्मों में इस तरह के दृश्यों को लेकर सचेत हैं और वहां उन दृश्यों में अंगों को छिपाने का दिशा निर्देश है। हमारे देश में इस तरह से कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है और ये अदालत या जांच एजेंसी के विवेक पर निर्भर करता है। कामुकता और अश्लीलता के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा है। उसको परिभाषित करने की अपनी अपनी दृष्टि है। आज फेसबुक से लेकर कई अन्य इंटरनेट मीडिया माध्यमों पर इस तरह की सामग्रियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर भी अश्लील सामग्रियों की भरमार है। ओटीटी को लेकर नियमन जारी हो गया, संभव है कि उसको लेकर कार्यवाही भी आरंभ हो गई होगी लेकिन यहां उपलब्ध अश्लील सामग्री पर किसी तरह की रोक दिखाई नहीं देती। जितनी जुगुप्साजनक सामग्री पहले उपलब्ध थी वो अब भी है, बल्कि वो बढ़ ही रही है। 

अश्लील फिल्में या सामग्री दिखानेवाले निर्माता या प्लेटफॉर्म अधिक मुनाफा की चाहत में ऐसा करते हैं। पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में नायिका को टापलेस दिखाया गया, ‘लस्ट स्टोरीज’ में उससे एक कदम आगे बढ़ गए। बाद में आई वेब सीरीज में रति प्रसंगों को दिखाया जाने लगा। वेब सीरीज को लेकर किसी तरह की कोई पाबंदी या दिशा निर्देश नहीं होने की वजह से इन निर्माताओं का हौसला बढ़ता चला गया। अश्लीलता को दिखाने का एक अलग ही पैटर्न है। और कई फिल्म निर्माता इस पैटर्न को अपनाते हैं। पहली बार जितना दिखाया जाता है अगली बार उससे अधिक या आगे दिखाने की प्रवृत्ति काम करती है। ये प्रवृत्ति संक्रामक होती है जो दूसरे फिल्म निर्माताओं को भी अपनी चपेट में ले लेती है। अगर हम भारतीय फिल्मों के उदाहरण से इसको समझें तो ये पैटर्न साफ दिखता है। 1970 के बाद ही फिल्मों को लें तो बलात्कार जैसे दृश्यों को दिखाने के लिए पहले फूलों को मसलने से लेकर गिरगिट के फतंगे को खाने के दृष्य को प्रतीक के तौर पर उपयोग में लाया जाता था। फिर जब ये स्थापित हो गया तो निर्माता थोड़ा और आगे बढ़े और नायिका को जबरन पकड़ने और साड़ी आदि खींचने के दृश्य आ गए। अब तो ये प्रवृत्ति नग्नता तक चली गई है। इसका आधुनिकता और समाज के खुलेपन आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि ये अश्लीलता का व्याकरण है जो इस नियम का पालन करता है जिसमें थोड़ा और, थोड़ा और करते हुए आगे बढ़ते हैं। 

चतुर निर्माता पहले थोड़ा दिखाते हैं और उन दृश्यों को दर्शकों की स्वीकार्यता की प्रतीक्षा करते हैं। उसको बोल्ड, खुलापन आदि कहकर एक सुंदर सा आवरण चढ़ाते हैं। अगर आप हिंदी फिल्मों में किसिंग सीन के विकास क्रम को देखें या नायिकाओं के बिकिनी या कम कपड़े पहनने के चलन के बारे में विचार करें तो निर्माताओं की चतुराई की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। ‘संगम’ फिल्म में वैजयंतीमाला के बिकिनी पहनने से फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में मंदाकिनी के झरने में झीनी साड़ी में स्नान-दृश्य से लेकर फिल्म ‘जिस्म’ तक के दृश्यों में इसको रेखांकित किया जा सकता है। ये सब कहानी की मांग की आड़ में होता है। नायिकाओं के खुलेपन को दिखाने का भी एक कौशल होता है। राज कपूर की फिल्मों में ये कौशल दृष्टिगोचर होता है। वहां खुलेपन में भी एक कलात्मकता होती है या कह सकते हैं कि उस खुलेपन का एक सौंदर्यशास्त्र होता है। कालांतर में ये कलात्मकता गौण होती चली गई और उसका स्थान नग्नता ने ले लिया। यही हाल हिंसा का भी है। अगर आप 1970 के पहले की फिल्में देखें तो उसमें जिस तरह की हिंसा होती थी अपेक्षाकृत उसके बाद हिंसा बढ़ती चली गई। अब तो हालात ये है कि किसी की हत्या के बाद उसके शरीर को इस बुरी तरह के काटा जाता है कि आप चंद सेकेंड उस दृश्य को नहीं देख सकते। पहले पेट में चाकू मारकर हत्या की जाती थी, फिर गोलियों से भूना जाने लगा अब फाइट सीन के बाद खलनायक को नुकीली चीज पर टांग दिया जाता है या फिर धारदार हथियार से मारकर अंतड़ियां तक निकाल दी जाती हैं। परिवार के साथ बैठकर न तो खुलापन देख सकते हैं न ही हिंसा के दृश्य।  

कुछ निर्माताओं या निर्देशकों के बारे में कहा जाता है कि कई बार वो अपनी फिल्मों में निजी कुंठा का प्रदर्शन करते हैं। आप ओटीटी पर चलनेवाले कुछ वेब सीरीज के निर्माता या निर्देशक का नाम देखेंगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे तो ये और भी स्पष्ट हो जाएगा। मानसिक रूप से बीमार या कुंठित कुछ निर्माता यौनिकता के चित्रण में आनंद प्रात करते हैं। उनको जब दर्शक भी मिल जाते हैं तो उनका ये आनंद बढ़ जाता है। अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर से मनोरंजन के नाम पर अश्लील सामग्री परोसने की या अश्लील फिल्मों के निर्माण को लेकर सख्त नियम बनाने की बात शुरू हो सकती है। इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध नग्नता को काबू में करने की बात और मांग संभव है।   

Saturday, June 26, 2021

कहानियों के बदलते तेवर और कलेवर


एक कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स की वजह से फिल्मों का लोकतांत्रीकरण हुआ है। प्रियंका चोपड़ा के अलावा अमेजन प्राइम से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित ने भी ओटीटी को लेकर एक अहम बात कही। उनके अनुसार ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए कहानियों के चयन में उसकी प्रमाणिकता के साथ-साथ कहानी में स्थानीयता पर भी जोर रहता है। गाहे बगाहे ओटीटी पर रिलीज होनेवाली फिल्मों और वेब सीरीज की कहानियों और उसके स्वरूप पर बात होती रही है। पिछले दिनों इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। प्रियंका चोपड़ा जब फिल्मों के लोकतांत्रिकरण की बात करती हैं तो उसके कई आयाम सामने आ जाते हैं। कहांनी के स्तर पर अगर हम देखें तो बॉलीवुड में उस तरह की कहानियों को निर्माता मिलने लगे हैं जिनको पहले कोई हाथ भी नहीं लगाता था। पहले फिल्मों में एक नायक होता था, एक नायिका होती थी, चार पांच बेहद दिलकश गाने होते थे, कुछ फाइट सीन होते थे और फिर फिल्म का सुखांत हो जाता था। उसके भी पीछे जाएं तो हिंदी फिल्मों में धार्मिक कहानियों को प्राथमिकता मिलती थी और उन कहानियों को दर्शक भी खूब मिलते थे। बाद में पश्चिमी देशों में बनने वाली फिल्मों के प्रभाव में हिंदी फिल्मों में हिंसा और मारपीट का जोर बढ़ा। एक्शन मूवी का विशेषण ही आरंभ हो गया था। इसी दौर में हिंदी फिल्मों ने स्टारडम भी देखा, सुपरस्टार से लेकर मेगास्टार तक हुए, जिनकी उपस्थिति फिल्म के हिट होने की गारंटी मानी जाती थी। निर्माता उनको मुंहमांगी रकम देने को तौयार रहते थे। बीच में कुछ निर्माताओं ने यथार्थवादी फिल्में भी बनाई और उसको एक विचारधारा विशेष से जोड़कर समांतर सिनेमा से लेकर कला फिल्मों तक का नाम दिया। उनमें यथार्थ तो होता था पर फिल्में लोकप्रिय नहीं होती थी। इन कथित यथार्थवादी फिल्मों के बनाने वाले अपनी फिल्मों की लोकप्रियता को लेकर अधिक चिंता भी नहीं करते थे वो तो विचार को आगे बढ़ाने की फिराक में रहते थे। ये अलग से शोध का विषय है कि कला फिल्मों के निर्माता नुकसान कैसे झेलते थे, क्या उस समय सरकार फिल्म बनाने के लिए पैसे देती थी, जिसके बल पर उनको दर्शकों की फिक्र नहीं होती थी। खैर ये अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी और चर्चा होगी। 

प्रियंका चोपड़ा जब फिल्मों के लोकतांत्रीकरण की बात करती हैं तो मुझे लगता है कि वो बहुत हद तक सही कह रही हैं और फिल्मी दुनिया के ट्रेंड की ओर इशारा कर रही हैं। ओटीटी पर जो सीरीज आ रहे हैं उनमें कहानी प्रमुख हो गई है। ये आवश्यक नहीं है कि सीरीज को हिट कराने के लिए बड़े स्टार की मौजूदगी आवश्यक हो। अभी पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म ऑल्ट बालाजी पर एक वेबसीरीज आई थी जिसका नाम था ‘बिच्छू का खेल’। बिच्छू का खेल अमित खान के उपन्यास पर आधारित है जिसकी कहानी बनारस की है। इस वेब सीरीज के डॉयलॉग लिखे हैं युवा लेखक क्षितिज राय ने। क्षितिज राय के संवादों ने सीरीज में बनारस और बनारसीपने को जीवंत कर दिया है। ‘वक्त अच्छा हो तो कुत्ता भी कोक पीता है’ जैसे कई संवाद इसमें हैं। बनारस की बोली से लिए गए शब्दों का भी क्षितिज ने संवाद में ठीक-ठाक उपयोग कर लिया है। इस सीरीज के हीरो हैं दिव्येन्दु शर्मा। ना कोई बड़ा नाम, न कोई सुपर स्टार का तमगा लेकिन अपनी अदायगी के बल पर पूरी वेब सीरीज में दर्शकों को बांधने में कामयाब रहते हैं। एक और वेब सीरीज आई ‘काठमांडू कनेक्शन’। कहानी और उसके किरदार लखनऊ, मुंबई, दिल्ली से लेकर काठमांडू तक में घूमते हैं। न्यूज चैनल भी इसमें आता है, इस वेब सीरीज के लेखक सिद्धार्थ मिश्रा न्यूज चैनलों से जुड़ी कई घटनाओं को भी बेहद खूबसूरती के साथ कहानी में पिरो देते हैं। ये छोटी घटनाएँ होती हैं लेकिन होती दिलचस्प है। कहानी 1993 के मुंबई धमाकों की जांच से आरंभ होती है लेकिन फिर परत दर परत खुलती है और उसके कई आयाम दर्शकों के सामने आते हैं। इसमें अमित सियाल, गोपाल दत्त जैसे कलाकार हैं पर इसको देखते हुए कभी भी ये नहीं लगता है कि आप अमित सियाल को देख रहे हैं या गोपाल दत्त को देख रहे हैं। कहानी के पात्रों की रचना इतनी मजबूती से की जाती है कि दर्शक नायक को भूलकर पात्र के नाम के साथ जुड़ जाता है। इसमें डीसीपी समर्थ कौशिक या सनी को ही लोग याद रखते हैं। इस लिहाज से देखें तो प्रियंका चोपड़ा ठीक कह रही है कि फिल्मों का लोकतांत्रिकरण हुआ है। बल्कि यहां तक कहा जा सकता है कि फिल्मों में जो वर्ण व्यवस्था थी उसको ओटीटी प्लेटफॉर्म ने तोड़ा है। वर्ण व्यवस्था यानि ये ए लिस्टर हैं, ये बी लिस्टर हैं आदि आदि। यहां अब कोई सुपर स्टार नहीं है, कहानी ही स्टार है। यहां कोई ऐसा स्टार नहीं है कि उसकी उपस्थिति मात्र सफलता की गारंटी है। यहां तो कहानियों के किरदार हैं जिसको दर्शक पसंद करते हैं या नापसंद करते हैं । सैफ अली खान ने भी कुछ वेब सीरीज में काम किया लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि उसको देखने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की बड़ी संख्या पहुंची और ‘बिच्छू का खेल’ या ‘काठमांडू कनेक्शन’ को देखने के लिए कम। थोडा बहुत का अंतर हो सकता है। लेकिन जितना ‘घोउल’ को देखा होगा उससे कम लोगों ने ‘बिच्छू का खेल’ नहीं देखा होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। इस मसले पर प्रियंका चोपड़ा का ही उदाहरण दिया जा सकता है। प्रियंका चोपड़ा बेहद सफल अभिनेत्री हैं। हिंदी फिल्मों की सबसे महंगी नायिका के तौर पर उनका नाम लिया जाता था, वॉलीवुड में भी काम रही हैं। पिछले दिनों उनकी फिल्म ‘व्हाइट टाइगर’ ओटीटी पर रिलीज हुई । ये फिल्म अरविंद अडिगा के अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित थी। लेकिन इसको अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 

दरअसल अब अगर हम विचार करें तो ये पाते हैं कि मनोरंजन की दुनिया पूरी तरह से बदलती जा रही है। उसकी कहानियां बदल गई हैं। उसको कहने का अंदाज भी बदल गया है। अब ज्यादा यथार्थवादी कहानियों पर फिल्म या वेब सीरीज बन रही हैं। इस तरह की कहानियों से दर्शक खुद का जुड़ाव महसूस करते हैं, उनको लगता है कि वो इन कहानियों से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। जब यथार्थ के नाम पर जब कहानी को अनावश्यक विस्तार दिया जाता है तो दर्शक फौरन उससे दूर चले जाते हैं। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी ‘स्कैम 1992’। ये शेयर दलाल हर्षद मेहता और उसके मार्फत 1992 के शेयर बाजार घोटाले की कहानी कहती है। वेब सीरीज देवाशीष बसु और सुचेता दलाल की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘द स्कैम, हू वन, हू लास्ट, हू गाट अवे’ पर आधारित है। इसके संवाद कई लोगों ने मिलकर लिखे हैं लेकिन दस एपिसोड में कहानी कहने के चक्कर में सीरीज बोझिल और उबाऊ हो गया है। कहना न होगा कि यथार्थवादी कहानियों या सत्य घटनाओं पर वेब सीरीज या फिल्म बनाते वक्त फिल्म निर्माण की बुनियादी बातों का तो ध्यान रखना ही होगा। ओटीटी ने न सिर्फ फिल्मों या वेब सीरीज का लोकतांत्रिकरण किया है बल्कि उसने दर्शकों को भी पहले से ज्यादा मुखर बना दिया है। अब वो अपनी पसंद और नापसंद खुलकर व्यक्त करने लगे हैं। उनके पास इंटरनेट मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म भी हैं जो उनको ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से मुखरित होने का मंच और अवसर दोनों देते हैं। सिनेमा का ये बदलता स्वरूप दर्शकों को भा भी रहा है।

Saturday, May 22, 2021

नए विकल्प की ओर फिल्मी दुनिया




सलमान खान की कोई फिल्म आनेवाली होती है तो दर्शकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बन जाता है। दर्शक प्रतीक्षा करने लग जाते हैं। हाल ही में रिलीज हुई सलमान खान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ को लेकर ऐसा ही माहौल बना। सिनेमा हॉल के लगभग बंद होने की स्थिति में सलमान की फिल्म को लेकर सप्ताहांत में जो माहौल बनता है वो तो इस बार नहीं बन पाया। सिनेमा हॉल के बंद होने की वजह से सलमान की फिल्म के निर्माताओं ने इस फिल्म को ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म जी-5 पर रिलीज किया। ओटीटी के साथ ही फिल्म डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) सेवा देनेवाली कंपनियों, टाटा स्काई, डिश टीवी और एयरटेल डिजीटल, पर भी रिलीज की गई। फिल्मों की रिलीज में ये एक नया प्रयोग था। दर्शकों को जी 5 पर फिल्म देखने के लिए अलग से पैसे देने पड़े। आमतौर पर ये होता है कि किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म की अगर आपने सदस्यता ली हुई है तो वो आप वहां उपलब्ध ज्यादातर सामग्री देख सकते हैं। कुछ समाग्री को देखने के लिए अलग से पैसे देने पड़ते हैं। सलमान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ को देखने के लिए अलग से दो सौ उनचास रुपए देने पड़ रहे हैं। इस वक्त जब फिल्म इंडस्ट्री पर कोरोना का संकट छाया हुआ है, नई फिल्में बन नहीं पा रही हैं, शूटिंग रुकी हुई हैं, कई फिल्में तैयार हैं लेकिन सिनेमा हॉल बंद होने की वजह से उनकी रिलीज टलती जा रही है, ऐसे में ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ की रिलीज से एक नए रास्ते का संकेत मिलता है। एक ऐसा रास्ता जिसपर चलना अगर सफल रहा तो फिल्म उद्योग को बड़ी राहत मिल सकती है।

नए रास्ते का संकेत इस वजह से कह रहा हूं कि सलमान खान की फिल्म जब रिलीज हुई, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म के मुताबिक, पहले दिन बयालीस लाख दर्शक मिले। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक सभी प्लेटफॉर्म को मिलाकर अगर विचार किया जाए तो पहले दिन मिले दर्शकों की संख्या संतोषजनक कही जा सकती है। पहले दिन तो जी 5 पर इतने दर्शक पहुंचे कि वो प्लेटफॉर्म थोड़ी देर तक दर्शकों का बोझ ही नहीं उठा सका और हैंग हो गया। इस संख्या के हिसाब के फिल्म के बिजनेस पर नजर डालते हैं। हर दर्शक को फिल्म देखने के लिए 249 रु देने पड़ रहे थे। अगर दर्शकों की संख्या और एक बार फिल्म देखने के पैसे पर विचार करें तो तो पहले ही दिन फिल्म ने सौ करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस कर लिया। ये किसी भी फिल्म के लिए ऐसी ओपनिंग है जो स्वप्न सरीखी है। कुछ लोगों का कहना है कि जो बयालीस लाख दर्शकों का आंकड़ा है वो सभी पैसे देनेवाले दर्शक न हैं। उनका तर्क है कि एक परिवार के चार लोगों ने बैठ कर देखा होगा तो दर्शकों का वास्तविक आंकड़ा तो करीब साढे दस लाख का ही होता है। पर इस तरह के अनुमान का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है, सिर्फ अटकल ही लगाई जा सकती है। अगर कोई कंपनी अपनी किसी फिल्म के दर्शकों का आंकड़ा जारी करती है तो ये माना जाता है कि आकलन का आधार भुगतान होता है । क्योंकि पे पर व्यू (एक बार देखने का भुगतान) तो दर्शकों को एक ही बार फिल्म देखने की अनुमति देता है। ये भी सिनेमा हॉल के टिकट की तरह है कि अगर आपने एक शो का टिकट लिया है तो आप तय शो में ही फिल्म देख सकते हैं और वो भी एक ही बार। ओटीटी पर भी अगर कोई फिल्म पे पर व्यू है तो वहां भी दर्शक एक बार ही देख सकते हैं। सलमान खान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ के बारे में फिल्म के कारोबार पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि इस फिल्म को पहले चार दिन में सत्तर लाख दर्शक मिले। अगर ये अनुमान सही है तो पहले चार दिन में इस फिल्म ने करीब पौने दो सौ करोड़ रुपए का बिजनेस कर लिया है। यानि कि गुरूवार से लेकर रविवार तक इस फिल्म को जमकर दर्शक मिले। ये तो तब हो रहा था जब ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’, पूरी फिल्म व्हाट्सएप और अन्य इंटरनेट मीडिया के माध्यमों पर सर्कुलेट हो रहा है। फिल्म के निर्माताओं ने इसको लेकर मुंबई पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई और जांच चल रही है। 

कोरोना संकट की वजह से ये आशंका है कि निकट भविष्य में शायद ही सिनेमा हॉल खुल सके। कम से कम इस वर्ष अगस्त-सितंबर तक तो सिनेमा हॉल के खुलने की उम्मीद बहुत ही कम है, ऐसे में बड़ी बजट और बड़े सितारों की फिल्मों के रिलीज होने का एक नया मॉडल या विकल्प अपनाने से फिल्म उद्योग पर छाए संकट को कम किया जा सकता है। पे पर व्यू के हिसाब से ओटीटी और डायरेक्ट टू होम सेवा प्रदताओं के प्लेटफॉर्म पर पर फिल्म रिलीज करने का विकल्प। अगर ऐसा हो पाता है तो ये बिल्कुल नई शुरुआत होगी और नया ट्रेंड आरंभ होगा। सलमान खान की फिल्म की सफलता से बड़ी बजट की फिल्मों के निर्माताओं का हौसला बढ़ेगा। दरअसल बड़ी बजट की फिल्मों में निर्माताओं का पैसा लग चुका है और वो ज्यादा दिनों तक अपने निवेश को रोककर रखने की बजाए उससे मुनाफा कमाने के बारे में सोच सकते हैं। हो सकता है ओटीटी और डायरेक्ट टू होम पर फिल्मों को रिलीज करने से अपेक्षाकृत कम मुनाफा हो लेकिन रुका हुआ पैसा वापस आने से नए प्रोजेक्ट शुरू होंगे। लोगों को काम मिलेगा और इससे लगभग ठप पड़े फिल्म उद्योग में जान आ सकती है।

अगर फिल्मों के डिजीटल रिलीज को फिल्म निर्माता अपनाते हैं तो एक बेहद महत्वपूर्ण मसले पर ध्यान देना होगा। वो मसला है पायरेसी का। जिस तरह से सलमान खान की फिल्म का पायरेटेड वर्जन रिलीज वाले दिन ही इंटरनेट मीडिया पर घूमने लगा था, उसने इस फिल्म के निर्माताओं को चिंता में डाल दिया था। पायरेसी को रोकने के लिए इन प्लेटफॉर्म्स को ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा कि वहां से कोई उसकी कॉपी न कर सके। अगर कोई कॉपी करने की कोशिश करे या कॉपी करने में सफल हो जाए तो संबंधित प्लेटफॉर्म के जरिए उस व्यक्ति तक पहुंचा जा सके जिसके डिवाइस से फिल्म की क़ॉपी की गई हो। आज तकनीक के इस दौर में ऐसा करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। फिल्म उद्योग को बचाने के लिए कानून का पालन करवानेवाली एजेंसियों को भी कठोर कदम उठाने होंगे। पायरेसी करते हुए पकड़े जाने पर कठोर सजा का प्राविधान हो, इसके लिए फिल्म उद्योग के लोगों को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। फिल्म उद्योग में कई ऐसा लोग हैं जो बयानवीर हैं, ट्वीटरवीर हैं लेकिन अपनी इंडस्ट्री और उससे जुड़े लोगों की समस्या का स्थायी हल ढूंढने में उनकी रुचि दिखाई नहीं देती है। इन वीरों को उनके हाल पर छोड़कर संजीदा निर्माताओं को सरकार के नुमाइदों से बात करने की पहल करनी होगी। कोरोना संकट के लंबा चलने की आशंकाओं के बीच हर क्षेत्र के लोगों को वैकल्पिक रास्ते पर विचार करना होगा, अगर कोई रास्ता सूझता है तो उसको अपनाने के लिए प्रयास करना होगा। इस तरह के प्रयासों से ही संबंधित क्षेत्र को राहत मिल सकती है, फिल्म जगत के सामने भी इसी तरह का विकल्प है कि वो अपने को बचाने के लिए नए रास्ते तलाशे। सलमान की फिल्म की रिलीज ने फिल्म उद्योग जगत को ऐसा ही एक रास्ता दिखाया है । 

Saturday, March 20, 2021

लोककलाओं के नाम पर मुनाफे का खेल


कुछ दिनों पहले बिहार पुलिस ने अश्लील भोजपुरी गाने की रचना करने और उसको प्रचारित प्रसारित करने के आरोप में गायक अजीत बिहारी के खिलाफ केस दर्ज करके उनको गिरफ्तार किया। इसके पहले बिहार सरकार ने गानों के माध्यम से अश्लीलता फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया था। दरअसल इंटरनेट मीडिया के फैलाव के बाद कला के नाम पर अराजकता बहुत अधिक बढ़ गई है। ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर भी इस तरह की बातें सामने आ रही थीं। काफी दिनों तक चले विमर्श और हाल के दिनों में मचे बवाल के बाद सरकार ने वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले कार्यक्रमों को लेकर दिशा निर्देश जारी किए थे। इन दिशा निर्देशों को सर्वोच्च न्यायालय ने नख-दंत विहीन बताया था और उसको और अधिक प्रभावी बनाने की अपेक्षा की थी। इस पर कार्य चल रहा है। अब जब बिहार सरकार ने इंटरनेट मीडिया पर अश्लील सामग्री को लेकर कार्रवाई की है तो इस बात पर बहस होनी चाहिए कि कला के नाम पर इंटरनेट पर चल रहे विभिन्न प्लेटफॉर्म पर किस हद तक छूट मिलनी चाहिए। सिनेमा और गानों के नाम पर इन माध्यमों पर अश्लीलता परोसने को लेकर सरकार को नए सिरे से दिशा निर्देश जारी करने की भी जरूरत है। विचार इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर लोड किए जानेवाले वीडियो में इसके निर्माता किस हद तक जा सकते हैं। असीमित आजादी बहुधा अराजकता को जन्म देती है। 

विचार भोजपुरी फिल्मों और गानों से जुड़े लोगों को भी करना चाहिए कि आज भोजपुरी सिनेमा किस राह पर चल रही है। भोजपुरी सिनेमा का एक समृद्ध इतिहास रहा है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने एक जलसे के दौरान भोजपुरी में फिल्म निर्माण की बात की थी। नकी प्रेरणा से ही भोजपुरी में पहली फिल्म बनी थी जिसका नाम था गंगा ‘मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’। इस फिल्म में भोजपुरी की संस्कृति जीवंत हो उठी थी। इस फिल्म का निर्माण नाजिर हुसैन ने विश्वनाथ शाहाबादी के साथ मिलकर किया था। ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ में लोक संस्कृति के विविध आयाम दिखाई देते हैं।कालांतर में भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता का पर्याय बन कर रह गई। भोजपुरी फिल्मों में लोक संस्कृति को इतना विकृत कर दिया गया कि कई बार गैर-भोजपुरी लोग ये सवाल पूछने लगे कि भोजपुरी की संस्कृति में इस तरह की बातें होती हैं क्या? लोक संस्कृति के नाम पर भद्दे और द्विअर्थी संवाद लिखे जाने लगे, गानों में भी इसी तरह की प्रविधि अपनाई गई। संबंधों की गरिमा को भी भोजपुरी फिल्मों में तार-तार कर दिया गया। भाभी और देवर का संबंध इतना पवित्र होता है कि लोक में भाभी को मां समान दर्जा प्राप्त है। भाभी और देवर के बीच मजाक या हंसी-ठट्ठा के प्रसंग लोकगाथाओं में मिलते हैं लेकिन उसको अश्लीलता की छौंक लगाकर बदनाम कर दिया गया। आज भी बिहार की लोक संस्कृति में गाली का रिवाज है। विवाह के अवसर पर ‘गारी’ गाई जाती है, लेकिन जब ‘गारी’ यानि गालियों से भरे गीत गाए जाते हैं तो उससे अश्लीलता का एहसास नहीं होता। जब इन्हीं गालियों को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए और मुनाफा कमाने के लिए अश्लील दृश्यों के साथ पेश किया जाता है तो लोक संस्कृति विकृत रूप में सामने आती है। 

अंग्रेजी में एक जुमला बार बार कहा जाता है कि कंटेंट (सामग्री) और उसको पेश करने के इंटेंट (मंशा) को साथ मिलाकर ही किसी कला का मूल्यांकन किया जाता है। जब ऐसा होता है तभी किसी कला की वैसी तस्वीर उभर कर सामने आती है जो समग्र मूल्यांकन का आधार बनती है। यहां इंटेंट मुनाफा कमाना है, कला तो कहीं आती ही नहीं है। लोक में व्याप्त रीति-रिवाजों को विकृत करके मुनाफा कमाना कितना उचित है, इसपर बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए। देशभर में लोक कला और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कई संस्थाएं और संगठन हैं। इनके कर्ताधर्ताओं को इस बात को लेकर उद्वेलित होना चाहिए कि भोजपुरी जैसी महान संस्कृति को भ्रष्ट करने का ये उपक्रम क्यों चल रहा है। कलात्मक आजादी की वकालत करनेवालों ने कला के नाम पर अश्लीलता और फूहड़ता को बढावा देनेवाले इस तरह के गानों और फिल्मों पर कभी चिंता प्रकट की हो, ज्ञात नहीं हो सका। 

फिल्मों के अलावा जब इंटरनेट का विस्तार हुआ और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले चैनलों को हिट्स के हिसाब के पैसे मिलने लगे तो इस अश्लीलता और फूहड़ता को पंख लग गए। यौनिकता को फिल्मी आवरण या अश्लीलता को परंपरा का बाना पहनाकर बेचना आसान हो गया था। चूंकि इस माध्यम पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध या नियम नहीं है लिहाजा ये प्रवृत्ति और बढ़ती चली गई। एक जमाना था जब लता मंगेशकर और रफी जैसे समर्थ गायक भोजपुरी के गाने गाते थे और शैलेन्द्र और मजरूह जैसे गीतकार भोजपुरी के गाने लिखा करते थे।1965 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था ‘भौजी’ । इसका एक गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था जिसके बोल थे, ‘ए चंदा मामा आरे आबा पारे आबा नदिया किनारे आबा’ जिसको स्वर दिया था लता मंगेशकर ने। ये गाना बेहद खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है। लता मंगेशकर ने संगीत निर्देशक चंद्रगुप्त के साथ कई बेहतरीन भोजपुरी गाने गाए हैं। 

हर देश की हर समाज की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं, पहली जिम्मेदारी तो लोगों की होती है कि वो अपनी परंपराओं और विरासत को बचाकर रखें लेकिन अगर ये नहीं हो पाता है तो सरकार की भूमिका शुरू होती है। कानून बनाने की जरूरत तभी होती है जबकि अपराध बढ़ने लगता है। इस माध्यम पर कला के नाम पर फैल रही अश्लीलता को रोकने के लिए फिल्मों और मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोगों को भी आगे आना होगा। अश्लीलता बेचकर मुनाफा कमाने की प्रवृत्तिवाले लोगों की पहचान करके उनको रोकने के लिए उनपर दबाव भी बनाना होगा। अन्यथा फिल्म और गीत संगीत के नाम पर जारी ये खेल लोक संस्कृति को इतना नुकसान पहुंचा देगा कि इसकी भारपाई संभव नहीं हो पाएगी। 

Saturday, February 27, 2021

कलात्मक(?) अराजकता पर अंकुश


हाल के दिनों में दो तीन ऐसी खबरें आईं जो मनोरंजन की दुनिया की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है। एक खबर है कि अमेजन प्राइम वीडियो से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित का पुलिस ने बयान दर्ज करवाया। ये बयान वेब सीरीज ‘तांडव’ में आपत्तिजनक कटेंट को लेकर दर्ज कराए गए केस के संबंध में लिया गया है। साढे तीन घंटे तक अपर्णा पुरोहित से लखनऊ के हरतगंज कोतवाली में पुलिस ने पूछताछ की। इससे ही जुड़ी एक और खबर आई प्रयागराज से। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर्णा पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया। अपर्णा पुरोहित पर वेब सीरीज ‘तांडव’ तो लेकर नोएडा में भी केस दर्ज हुआ था, उस सिलसिले में वो हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत चाहती थीं। पिछले कई सालों से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट, जिसको ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म भी कहते हैं, पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री को लेकर तो कई बार वहां दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। पिछले तीन साल से इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाली सामग्री में हिंसा, यौनाचार, मनोरंजन की आड़ में विचारधारा की पैरोकारी, हिंदू धर्म प्रतीकों का गलत चित्रण से लेकर अन्य कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। जब भी इन बातों को लेकर विवाद उठते थे तो सरकार से ये मांग भी की जाती थी कि ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के संदर्भ में विनियमन नीति लागू की जानी चाहिए। इस स्तंभ में भी लगातार इस बारे में चर्चा जाती रही है कि इस क्षेत्र में बढ़ रही अराजकता पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को दिशा निर्देश या कटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार के स्तर पर विनियमन लागू करने के लिए इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर के  संवाद भी हुए थे, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर 2018 में सख्त टिप्पणी की थी, संसद में भी ये मामला कई बार उठा । इस पृष्ठभूमि में सरकार ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर अब एक दिशा निर्देश जारी कर दिया है।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश में ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए स्वनियमन की बात की गई है। स्वनियमन की बात तो की गई है लेकिन ये नियमन कैसे हो और इसका दायरा क्या हो इसको सरकार ने स्पष्ट कर दिया है। ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी प्लेटऑर्म भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को आघात पहुंचानेवाले दृश्य और संवाद नहीं दिखाएंगें। कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में कोई भी ऐसी सामग्री दिखाने की अनुमति नहीं होगी जो कानून सम्मत नहीं है। लेकिन सरकार ने दिशा निर्देश जारी करते हुए सेवा प्रदताओं को इसका तंत्र विकसित करने को कहा है। अच्छी बात ये है कि सरकार ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें कार्यक्रमों को दिखाने के पहले किसी से अनुमति लेने की बात नहीं है यानि की प्री सेंसरशिप का रास्ता सरकार ने नहीं अपनाया। उन्होंने सबकुछ इन प्लेटफॉर्म पर छोड़ दिया है। नए नियमों के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को खुद अपनी सामग्रियों का वर्गीकरण करना होगा। बच्चों के देखने लायक सामग्री से लेकर अलग अलग उम्र की मनोरंजन सामग्रियों का वर्गीकरण कर दिया गया है। सेवा प्रदाता कंपनियों को इसका पालन करना होगा। अगर किसी को शिकायत होती है या किसी प्रकार से इन नियमों का उल्लंघन होता है तो उससे निबटने के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है। ये व्यवस्था लगभग उसी तर्ज पर है जिस तर्ज पर टेलीविजन के कार्यक्रमों का स्वनियमन होता है। 

सरकार के इस स्वनियम के दिशा निर्देशों को लेकर तमाम तरह की शंकाएं जताई जा रही हैं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ स्वयंभू निर्देशक इस कदम की आलोचना कर रहे हैं और इसको कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करनेवाला कदम बता रहे हैं। दरअसल जब वो कलात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि ये स्वतंत्रता असीमित नहीं है। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इन मनोरंजन के माध्यमों के लिए दिशानिर्देश जारी करनेवाला भारत दुनिया का पहला देश है। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। सिंगापुर में तो बकायदा इसके लिए एक प्राधिकरण है जिसको इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी कहते है। इसकी स्थापना ब्राडकास्टिंग एक्ट के तहत की गई थी। इसमें सभी सेवा प्रदताओं को ब्राडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट प्राधिकरण को अधिकार है कि वो ओटीटी प्लेटऑर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को अगर कानून सम्मत नहीं पाती है तो उसका प्रसारण रोक दे।इसके अलावा नियम विरुद्ध सामग्री दिखाने पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। सिर्फ सिंगापुर ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह के प्लेटऑर्म पर नजर रखने के लिए ई सेफ्टी कमिश्नर हैं। उनका दायित्व है वो डिजीटल मीडिया पर चलनेवाली सामग्रियों पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई सेफ्टी कमिश्नर अगर पाते हैं कि किसी मनोरंजन सामग्री का वर्गीकरण अनुचित है या गलत तरीके से उसको किया गया है तो वो दंड के तौर पर उसको प्रतिबंधित भी कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा निर्देश लागू हैं। हमारे देश में अबतक ओटीटी की सामग्री को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं था। इसका नतीजा यह था कि कई प्लेटफॉर्म पर तो बेहद अश्लील सीरीज भी परोसे जा रहे थे, बिना किसी वर्गीकरण के। कहीं किसी कोने में छोटा सा अठारह प्लस लिख दिया जाता था लेकिन किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं थी। कोई भी उसको देख सकता था।

जहां तक कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करने की बात है उसको लेकर जो लोग प्रश्न खड़े कर रहे हैं वो यह भूल रहे हैं कि हमारे देश में फिल्मों को भी रिलीज के पहले प्रमाणन करवाना होता है। क्या इस प्रमाणन की व्यवस्था से हमारे देश में फिल्मों की कलात्मक स्वतंत्रता बाधित हुई? टीवी चैनलों को लेकर स्वनियमन लागू है क्या टीवी चैनलों पर दिखाई जानेवाली सामग्रियों में कलात्मक स्वतंत्रता बाधित दिखती है? दरअसल इस तरह के नियमनों से अराजकता पर रोक लगती है। ये कौन सी कलात्मक स्वतंत्रता है जिसमें वेब सीरीज की आड़ में राजनीति की जाती हो, भारतीय सेना की छवि को धूमिल किया जाता हो, कश्मीर में सेना के क्रियाकलापों को गलत तरीके से पेश किया जाता हो, हिंसा, गाली गलौच और यौनिकता के दृश्यों को प्रमुखता से दिखाया जाता हो। कोई भी माध्यम समाज सापेक्ष होना चाहिए, समाज से, संस्कृति से, निरपेक्ष होकर कला का विकास नहीं हो सकता है। समाज और संस्कृति को छोड़कर कोई भी कला अपने उच्च शिखर को प्राप्त नहीं कर सकती है। और इस मामले में तो सरकार ने बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा की कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अपनी तरफ से कोई स्वनियमन की नीति बनाकर देंगे लेकिन जब उनके बीच सहमति नहीं बन सकी तो सरकार ने दिशा निर्देश जारी कर दिए। जो लोग इसको बाधा मान रहे हैं उनको ये पता होना चाहिए कि कला भी अनुशासन की मांग करती है। सरकार ने ओटीटी के लिए दिशा निर्देश जारी करने में थोड़ी देरी अवश्य की लेकिन अब जब ये जारी हो गा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ओटीटी पर हम वाक्य में गाली गलौच नहीं होगी और अश्लीलता की सीमाएं भी नहीं टूटेंगीं।  

Saturday, January 23, 2021

राजनीति का औजार बनते वेब सीरीज


वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा हुआ। केस मुकदमा तक बात पहुंची। वेब सीरीज से जुड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। उनके बयान दर्ज हुए। पुलिस की पूछताछ के पहले हो रहे विरोध की वजह से निर्माताओं ने माफी भी मांगी। हर बार की तरह इस बार भी भावनाएं आहत होने की बात उठी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर कलात्मक स्वतंत्रता की बात भी की गई। इन तमाम विवादों और कोलाहल के बीच निर्माताओं ने वेब सीरीज में आपत्तिजनक प्रसंगों को हटाने की बात की और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को उनके समर्थन और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद भी दिया। हो सकता है कि इस वेब सीरीज में से कुछ अंश हटा दिए गए हों। लेकिन ‘तांडव’ पर उठे विवाद से जो प्रश्न उठे हैं वो अभी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों पर कलाकारों को और कला से जुड़े लोगों को खुले दिल से बहस करनी चाहिए। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू धर्म के देवी देवताओं के चित्रण पर आपत्ति उठी थी। धर्मिक भावनाएं आहत होने की बात की गई। जिन अंशों पर आपत्ति की गई थी उनको हटाने और निर्माताओं के माफी मांग लेने से मामला ठंडा पड़ता जा रहा है लेकिन इस औसत कहानी वाली वेब सीरीज में जिस तरह से खुले आम राजनीतिक टिप्पणियां की गईं हैं वो भावनाओं को आहत करने से अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं। इसके आरंभिक एपिसोड में जो कुछ संवाद हैं या दृश्यों से जो कहने की कोशिश की गई है वो ये है कि ‘मुसलमानों को चिन्हित कर मारा’। सलीम और अयूब के संदर्भ में जो संवाद हैं उसमें एक वाक्य है, ‘हमलोगों को मारना बहुत आसान होता है। मेरा नाम भी किसी आतंकवादी संगठन से जोड़ देंगे’। इस तरह के संवाद बेहद गंभीर निहितार्थ लिए हुए होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के संवादों के जरिए देश की एक बड़ी आबादी को भड़काने का उपक्रम किया गया है। इस वेब सीरीज पर तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अनुसार ‘जब कोई व्यक्ति लिखित में या संकेतों में या प्रत्यक्ष प्रस्तुतिकरण या किसी अन्य विधि से भारत सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह करता है।‘ 

वेब सीरीज तांडव के जिस संवाद का जिक्र ऊपर किया गया है उससे साफ तौर पर भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने की कोशिश नजर आती है। व्यवस्था के खिलाफ एक पूरे समुदाय को भड़काने की कोशिश भी नजर आती है। किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाना और किसी समस्या को लेकर जजमेंटल होना दोनों अलग अलग बात हैं। ‘तांडव’ में ही ऐसा हुआ है ये भी नहीं है, इसके पहले के वेब सीरीज में भी और उसके पहले की कुछ फिल्मों में भी इस तरह के संवाद और दृश्य रखे हैं जो मुसलमानों के मन में भारत सरकार के खिलाफ घृणा के बीज बोने जैसे हैं। इसके पहले एक सीरीज आई थी जिसका नाम है ‘पाताल लोक’ । उस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर इसी तरह की बातें की गई थीं। उस सीरीज में पुलिसवालों के बीच की आपसी बातचीत में मुसलमानों के लिए जिस तरह के विश्लेषण गढ़े गए थे वो भी प्रत्यक्ष रूप से पुलिस और परोक्ष रूप से भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने जैसा था। सीबीआई तक को मुसलमानों के खिलाफ चित्रित किया गया था। सिर्फ संवादों में ही नहीं बल्कि काल्पनिकता की आड़ में भी दृश्यों को इस तरह से चित्रित किया गया था कि इस नैरेटिव को मजबूती मिले कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है। इसके पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी दिखाया गया था कि कैसे पुलिस निर्दोष मुस्लिम लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराती है। इसके बाद संवाद के जरिए राजनीतिक बयान दिया जाता है और कहा जाता है कि उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा है और सिस्टम से उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। इसी वेब सीरीज में बाबरी विध्वंस के फुटेज लंबे समय तक दिखाकर बैकग्राउंड से राजनीतिक टिप्पणियां आती रहती हैं। इसके पहले एक फिल्म आई थी ‘मुक्काबाज’, उसमें बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है कि ‘वो आएंगे तुमको मारेंगे और भारत माता की जय कहकर चले जाएंगे’। मंशा स्पष्ट है। किसी चरित्र को पहले की फिल्मों में भी सांप्रदायिक दिखाया जाता रहा है लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही रंग में रंगने का प्रयास इन दिनों ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर पर वेब सीरीज में। 

वेब सीरीज में इस तरह के प्रसंगों या दृष्यों को देखने के बाद साफ तौर पर एक पैटर्न नजर आता है जिसमें कि सीरीज के निर्माता मनोरंजन के इस माध्यम का उपयोग किसी खास विचारधारा को पुष्ट करने और किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए करते हैं। इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इन वेब सीरीज के निर्माता हिंदू धर्म प्रतीकों को अपमानित क्यों करते हैं? अगर मुसलमानों को लेकर की गई टिप्पणियों और हिंदू धर्म प्रतीकों के अपमान के चित्रण को जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर साफ नजर आती है। ये तस्वीर है राजनीति की, ये तस्वीर है इन वेब सीरीज के राजनीति का औजार बन जाने की। एक तरफ मुसलमानों के मन में मौजूदा सरकार के खिलाफ, उसकी संस्थाओं के खिलाफ जहर भरने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं। जब आप हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमान करते हैं तो मंशा ये हो सकती है कि आप एक समुदाय विशेष के मन में अपनी साख जमाना चाह रहे हों। ये तब और सही प्रतीत होता है जब इन वेब सीरीज को बनानेवाला एक निर्माता शाहीन बाग पहुंचता है और आंदोलन के दौरान मंच पर खढ़े होकर बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाता है। ये बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति की  का संकेत है। इस प्रवृत्ति के लिए ये वेब सीरीज इस वजह से भी सुविधाजनक है क्योंकि वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के लिए या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म को लेकर हमारे देश में किसी प्रकार की कोई आचार संहिता नहीं है। 

देश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को बहुमत की स्वीकृति मिली। वामपंथी विचारधारा या उसकी तरफ झुकी हुई विचारधारा को जनता ने नकार दिया। लगातार दो नकार से वामपंथ के अनुयायी बौखला भी गए हैं और कुंठित भी होते नजर आ रहे हैं। अब जब उनको जनता के मध्य जाकर अपनी लोकप्रियता वापस प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने मनोरंजन के इस अराजक माध्यम को अपनी राजनीति का औजार बनाया है। यह अनायास नहीं है कि ‘तांडव’ जैसी घटिया स्टोरी को बड़े कलाकार और बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें न तो निरंतरता है न ही रोचकता और न ही कहानी लेखक को भारतीय राजनीति की समझ। इस कहानी में सिर्फ एजेंडा भरा गया है और अखबारों से उठाकर घटनाओं का भोंडा कोलाज बनाने का प्रयास किया गया है। इस कहानी पर तो कायदे से चोरी का केस भी दर्ज होना चाहिए। ब्राहमण प्रोफेसर और उसके दलित प्रेमी के बीच का जो संवाद है वो हिंदी के कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी ‘पीली छतरीवाली लड़की’ से जस का तस उठा लिया गया है। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्र सरकार इस बात को समझे कि इन वेब सीरीज के बहाने राजनीति हो रही है। ये वेब सीरीज राजनीति के औजार से राजनीति का हथियार बनें उसके पहले ही एक सम्यक और व्यापक आचार संहिता बने जो इन सब बातों का ख्याल रख सके।   


Friday, November 13, 2020

नियमन से सकारात्मक बदलाव की आस


मेरा बचपन गांव में बीता है। अपने गांव में सुना करता था कि मंदिर के पास की जमीन गैर-मजरुआ है। गैर-मजरुआ का शाब्दिक अर्थ भले ही ये होता है कि जो जमीन जोती न जाती हो या कृषि योग्य न हो। लेकिन गांव में रहते हुए ये समझ आया था कि गैर-मजरुआ जमीन वो होती है जिसपर किसी का मालिकाना हक नहीं होता है। इस जमीन का कोई दस्तावेज किसी के पास नहीं होता था। ये गांव की एक ऐसी जमीन होती है जिसके बारे में किसी को नहीं पता वो किसकी है। जो भी ताकतवर होता था वो उस जमीन पर कब्जा कर लेता था या फिर जिस तरीके से मन होता था उसका उपयोग करता था। इस तरह की जमीन को लेकर गांव में बहुधा झगड़ा-झंझट भी होता रहता था। कई बार मेरे गांव के बड़े बुजुर्ग मिल बैठकर ये तय कर देते थे कि इस जमीन का उपयोग सबलोग करेंगे लेकिन ये समझौता ज्यादा दिन चल नहीं पाता था। फिर से उस जमीन को लेकर मनमानी शुरू हो जाती थी। धीरे धीरे उस जमीन के आसपास रहनेवाले लोग भी उसपर अपनी दावेदारी जताने लगते थे। सरकार को मालगुजारी देकर भी गैर-मजरुआ जमीन पर फर्जी तरीके से मालिकाना हक की बात भी हम बचपन में सुनते थे। किसी भी गैर-मजरुआ जमीन को लेकर जब विवाद बढ़ता था तो जिलाधिकारी या उनका प्रतिनिधि इसका भविष्य तय कर देता था।  

पिछले तीन चार साल से ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स को देखकर हमेशा से ये लगता था कि ये गैर-मजरुआ जमीन की तरह है। वैसे तो हमारे देश में 2008-09 में ही ओटीटी प्लेटफॉर्म की शुरुआत हो गई लेकिन 2015 में जब स्टार इंडिया ने हॉटस्टार लांच किया तो पूरे देश का ध्यान इस माध्यम की ओर गया। इसके बारे में इस वजह से भी ज्यादा चर्चा हुई थी क्योंकि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के प्रसारण का अधिकार स्टार इंडिया के पास था । आईपीएल के मैच को हॉटस्टार पर भी देखा जा सकता था। इसके एक साल बाद नेटफ्लिक्स ने भी हमारे देश में अपने प्लेटफॉर्म को लांच किया। अब तो दर्जनों ओटीटी प्लेटफॉर्म देश के दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं। ज्यादातर ओटीटी प्लेटफॉर्म एक तय शुल्क पर ग्राहकों को अपनी सेवा देते हैं लेकिन कुछ मुफ्त भी उपलब्ध हैं। इन प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले कंटेंट को लेकर पिछले तीन-चार साल से देशभर में बहस चल रही है। इस स्तंभ में भी कई बार ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर लिखा जा चुका है। वापस लौटते हैं इन प्लेटफॉर्म और गैर-मजरुआ जमीन की तुलना वाली बात पर। दरअसल ओटीटी प्लेटफॉर्म पर परोसी जानेवाली सामग्री को देखकर यही भान होता था कि इसकी हालत भी गैर-मजरुआ जमीन जैसी है। किसी को पता नहीं था कि इस तरह के प्लेटफॉर्म किस कानून या किस मंत्रालय के अधीन हैं। चूंकि इन प्लेटफॉर्म्स के प्रशासनिक अधिकार को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं थी। इसपर दिखाए जानेवाले कंटेंट को लेकर किसी प्रकार की कोई कानूनी सीमा नहीं है। इसको रेगुलेट करनेवाली कोई संस्था नहीं है लिहाजा यहां लगभग अराजकता जैसा माहौल है। जिसको जो मन हो रहा है वो दिखाया जा रहा है। धर्म और धार्मिक प्रतीकों को किसी खास एजेंडे के तहत व्याख्यायित किया जा रहा है। हिंदू या सनातन धर्म को लेकर इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है जैसे भारत बस हिंदू राष्ट्र बनने ही जा रहा है। 

2018 में नेटफ्लिक्स पर प्रसारित एक सीरीज ‘लैला’ में तो चालीस साल बाद हिंदुओं की काल्पनिक कट्टरता को उभारने के उपक्रम की कहानी दिखाई गई थी। परोक्ष रूप से एक फेक नैरेटिव खड़ा किया गया था। उस वेब सीरीज में भविष्य के भारत की जो तस्वीर दिखाई गई थी उसमें हिन्दुस्तान नहीं होगा, उसकी जगह आर्यावर्त होगा। वहां राष्ट्रपिता बापू नहीं होंगे बल्कि एक आधुनिक सा दिखने वाला शख्स जोशी उस राष्ट्र का भाग्य-विधाता था। आर्यावर्त के लोगों की पहचान उनके हाथ पर लगे चिप से होती थी। लोग एक दूसरे का अभिवादन ‘जय आर्यावर्त’ कहकर करते थे। आर्यावर्त में दूसरे धर्म के लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी।  कुल मिलाकर एक ऐसी तस्वीर रची गई थी जो ये साफ तौर पर बताती थी कि भविष्य का भारत हिंदू राष्ट्र होगा और तमाम कुरीतियां मौजूद होंगी। ‘आर्यावर्त’ में अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी करती है तो उसके पति की हत्या कर लड़की को आर्यावर्त के ‘शुद्धिकरण केंद्र’ ले जाया जाता है। धर्म के अलावा वहां सामाजिक विद्वेष को बढ़ानेवाला जातिगत भेदभाव को पेश किया गया था। इस सीरीज के अलावा कई अन्य वेब सीरीज में खास राजनीति एजेंडे के तहत विचारधारा विशेष को महिमामंडित और दूसरे का निंदाख्यान पेश किया जाता है। किसी में पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर अनर्गल आरोप की शक्ल में उनका चित्रण किया जा रहा है। कहीं जुगुप्साजनक हिंसा और यौनिकता, अप्राकृतिक यौनाचार का फिल्मांकन किया जा रहा है। एक सीरीज में तो खुलेआम यौन प्रसंगों के लंबे लंबे दृश्य बेहद घटिया तरीके से दिखाया गया। संवादों में निम्नतम स्तर की गालियों का उपयोग तो वेबसीरीज की पहचान ही बन गई है। गालियां भी जबरदस्ती ठूंसे हुए प्रतीत होते हैं। जिन भौगोलिक इलाकों की कहानियां होती हैं, उन इलाकों में चाहे उस तरह की गालियों का प्रयोग हो या न हो, इन वेबसीरीज उस तरह की गालियों की भरमार रहती हैं। ओटीटी पर चलनेवाले एक वेबसीरीज में भारतीय वायुसेना और कश्मीर को लेकर भी देशहित के विपरीत कहानियां गढ़ी गई और उसको इन अराजक प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के सामने पेश किया जाता रहा है।

स्थिति चूंकि स्पष्ट नहीं थी कि ये प्लेटफॉर्म किस मंत्रालय के दायरे में आते हैं तो किसी प्रकार की कोई कार्रवाई हो नहीं पाती थी। वेब सीरीज में आपत्तिजनक मामले के खिलाफ अदालतों में कई मुकदमे हुए। मंत्रालयों को अदालती नोटिस गए। उस समय तक स्थिति साफ नहीं थी कि ओटीटी के लिए संचार और सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय जिम्मेदार है या सूचना और प्रसारण मंत्रालय। अब जाकर केंद्र सरकार ने ये तय कर दिया है कि ओटीटी का मामला सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आएगा। अब जबकि ओटीटी नाम के इस गैर-मजरुआ जमीन का मालिकाना हक तय कर दिया गया है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी है कि वो इसके लिए यथोचित नियम कानून बनाए।

पिछले तीन साल से सूचना और प्रसारण मंत्रालय ओटीटी के लिए निमयन बनाने की दिशा में काम भी कर रहा था। ओटीटी प्रदाता कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के कई दौर भी हुए थे। कई प्रस्ताव भी तैयार हुए लेकिन उसपर सहमति नहीं बन पाई थी। इस वर्ष सितंबर में भी 15 बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म ने स्वनियमन का एक प्रस्ताव तैयार किया था। इसमें कंटेंट का वर्गीकरण करने का प्रयास किया गया था लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इसको खारिज कर दिया था। ओटीटी के बारे में नियमन तय करने के पहले यहां पेश किए जानेवाले कंटेंट पर समग्रता में विचार करना चाहिए। कुछ ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जो भारतीय समाज और यहां की संस्कृति को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए। इस बात का ङी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कंटेंट में हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को उसका मूल आधार न बताया जाए। समाज को बांटने वाली बातें न हो, देश की व्यवस्था के खिलाफ जनता के मन में जहर भरने का परोक्ष उपक्रम न हो। परोक्ष रूप से संवाद में इस तरह की बातें न हों जो किसी विचारधारा विशेष का पोषण करती हों। विदेशी सीरीज को भी हमारे देश में जस का तस दिखाए जाने को लेकर विचार किया जाना चाहिए। वैश्विक श्रृंखला के नाम पर नग्नता और जुगुप्साजनक हिंसा को दिखाए जाने की प्रवृत्ति को सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाना चाहिए। इस बात पर भी विचार हो कि क्या हमारा समाज कुछ पश्चिमी देशों की तरह की नग्नता के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए तैयार है। भारतीय सेना को दिखाते समय इस बात का ध्यान रहे कि राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मंच पर उसकी बदनामी न हो और उनके मनोबल पर इसका असर न पड़े। 

कुछ लोग अभी से आशंकित हैं। ओटीटी के आसन्न नियमन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर इसकी आलोचना के संकेत देने लगे हैं। उनको पता होना चाहिए कि हमारे देश में मनोरंजन सेक्टर को लेकर पहली बार नियमन नहीं होगा। उदारीकरण के दौर में जब देश में निजी टीवी चैनलों का आगमन हुआ था तब भी कई मनोरंजन चैनलों पर अंतराष्ट्रीय कंटेंट या प्रोग्राम दिखाने को लेकर देशव्यापी बहस हुई थी। भारतीय संस्कृति को और समाज को ध्यान में रखते हुए उस वक्त की सरकार ने भी 1995 में केबल टेलीविजन नेटवर्क रेगुलेशन एक्ट बनाया था। अंतराष्ट्रीय चैनलों के हमारे देश में प्रसारण के लिए अनुमति देने के पहले डाउनलिंकिंग लाइसेंसिंग की व्यवस्था की गई थी। उन नियमनों के बाद हमारी संस्कृति और समाज की संवेदनाओं को ध्यान में रखकर स्थानीय स्तर पर ही प्रोग्राम बनने लगे। नतीजा यह हुआ कि आज हमारे देश का टीवी उद्योग बेहद समृद्ध है। अगर समाचार पत्र, न्यूज चैनल, मनोरंजन चैनल या सिनेमा के लिए नियमन है तो फिर ओटीटी को लेकर क्यो नहीं। किसी भी तरह का अनुशासन उस क्षेत्र के विकास में ही सहायक होता है। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सामने चुनौती ये है कि ओटीटी को लेकर वो जो नियमन की व्यवस्था बनाए वो इस क्षेत्र को मजबूत करनेवाला हो बाधित करनेवाला नहीं।