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Saturday, September 22, 2018

मृत्यु पर मौन क्यों ‘सरकार’ ?


दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हिंदी के वामपंथी कवि-आलोचक विष्णु खरे का निधन हो गया। विष्णु खरे को चंद महीने पहले ही केजरीवाल सरकार ने, मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल खत्म होने के बाद, हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके निधन के बाद दिल्ली  के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शोक जताते हुए कोई ट्वीट नहीं किया जबकि मुख्यमंत्री हिंदी अकादमी का अध्यक्ष भी होता हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जगह उनके उप ने ट्वीट कर विष्णु खरे के निधन पर शोक जताया। मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया ‘हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष, साहित्य पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्ती और हम सबके प्रेरणास्त्रोत श्री विष्णु खरे जी का देहावसान हो गया है। उनके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। इस दुखद क्षण में हम सब उनके परिवार के साथ हैं।‘ अरविंद केजरीवाल के ट्वीट नहीं करने पर सोशल मीडिया पर सवाल खडे होने लगे हैं। किसी को ये संवेदनहीनता नजर आ रही है तो कोई ये कह रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के दबाव में विष्णु खरे को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया था लिहाजा वो शुरू से खरे साहब को लेकर उदासीन थे। वजह चाहे जो हो पर एक संस्थान के उपाध्यक्ष के निधन पर उसी संस्थान के अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से शोक प्रकट नहीं करना खेदजनक और असंवेदनशील है। हिंदी अकादमी को नजदीक से जानने वाले लोग इसकी एक अलग ही वजह बताते हैं। दिल्ली के साहित्यिक हलके में इस बात की चर्चा है कि अरविंद केजरीवाल चाहते थे कि मैत्रेयी पुष्पा को एक और कार्यकाल मिले, आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडे भी इसी मत के थे लेकिन मनीष सिसोदिया, मैत्रेयी जी की जगह पर किसी और को लाना चाहते थे। मनीष सिसोदिया ने इसके लिए अपने एक पत्रकार मित्र की सलाह पर विष्णु खरे का नाम आगे बढाया और फिर उसको अनुमोदन भी करवा लिया। जब विष्णु खरे जी को दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तब भी ये सवाल उठा था कि दिल्ली-एनसीआर के लेखक को छोड़कर विष्णु खरे जी को मुंबई से क्यों लाया गया। लेकिन सरकार के अपने फैसले होते हैं जिनकी आलोचना समय के साथ दबती चली जाती है।  अब खरे साहब के निधन के बाद तो ये बातें बिल्कुल ही अर्थहीन हो गई हैं।  अब केजरीवाल के पक्ष के लोग इस बात को लेकर शोरगुल कर रहे हैं कि साहित्य और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए। मुझे इस संदर्भ में साहित्य और राजनीति के संबंधों पर लिखा विजयदेव नारायण साही का एक लेख याद आ रहा है। अपने उस लेख में विजयदेव नारायण साही ने उस वक्त कहा था ‘ जिस तरह से आज राजनीति से साहित्य को अलग रखने का नारा लगानेवाले मध्यवर्गीय कलाकार प्रतिक्रियावादी हैं, उसी तरह से राजनीति की तानाशाही में कैद करके समस्त साहित्य को पार्टी का अस्त्र मात्र घोषित करनेवाले कला के दुश्मन हैं।‘ साहित्य और राजनीति का इस तरह से घालमेल किया गया कि वो अलग हो ही नहीं सकती, कम से कम जबतक साहित्य पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। यह मैं इस वजह से कह रहा हूं क्योंकि लेनिन के प्रसिद्ध लेख ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’ का असर भारत के लेखकों, खासतौर पर हिंदी के लेखकों पर बड़ा गहरा पड़ा था। लेनिन के उस लेख में कहा गया था कि ‘साहित्य को सर्वहारा के साझा उद्देश्य का अंग होना चाहिए और उसे पार्टी यंत्र का दांता और पेंच बन जाना चाहिए।‘ लेनिन के उस लेख की व्याख्या इस तरह के की गई जिसमें प्रतिबद्धता को पार्टी की सदस्यता से जोड़ दिया गया। सालों तक इस प्रतिबद्धता को कायम रखा गया, कमोबेश अब भी है। तो जब हम साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात करते हैं तो वो सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करनेवाली बात लगती है। साहित्य और राजनीति का हमारे समाज में गहरा संबंध रहा है। लेकिन राजनीतिज्ञों में साहित्य या साहित्यकारों को लेकर जिस तरह की उदासीनता इस वक्त है वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला है। राजनीति को साहित्य के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। किसी वरिष्ठ लेखक की मृत्यु पर ‘सरकार’ का मौन सवालों के घेरे में है।  
सिर्फ राजनीति और राजनेता ही संवेदनहीन हुए हों ऐसा नहीं है। विष्णु खरे जी जब जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, तो हिंदी अकादमी में उनकी पूर्ववर्ती उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की एक टिप्पणी भी विवादास्पद हो गई है। मैत्रेयी पुष्पा ने पहले अपनी वॉल पर युवा कवि शायक आलोक का एक पत्र लगाया जो कि उऩको ही संबोधित था। पत्र में लिखा था ‘आभारी हूं कि हम दिल्ली में बसे कुछ युवा जो संघर्षरत हैं, और साहित्यिक वैचारिक रचनात्मकता से जुड़े हैं, उन्हें आपने समय समय पर हिन्दी अकादमी मंच पर आमंत्रित किया और कुछ आर्थिक लाभ भी दिया ताकि हमारा हौसला न टूटे. युवा कवि प्रकाश ने अपने संघर्ष से तंग आकर आत्महत्या कर ली. उसके बाद श्री वाजपेयी ने वार्षिक युवा संगम का आयोजन शुरू किया और माह दूमाह पर युवा कवियों से कविताएं पढ़ा उन्हें कुछ आर्थिक लाभ देते हैं. उन्होंने प्रकाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास भी किया है जहां युवा कवियों के प्रथम संग्रह छाप वे अपनी ग्लानि धो रहे. क्या हम भी आत्महत्या कर लें ताकि आचार्य विष्णु खरे की हिन्दी अकादमी जो मृतकों व मृत्यु-उत्सुक कवियों के ही आयोजन में लगी है वह शायक-वृत्ति या अविनाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास कर शेष रह जाते युवा कवियों का कुछ कल्याण कर सके?’ इसके उत्तर में मैत्रेयी ने जो लिखा उसको लेकर उनपर हमले शुरू हो गए हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने शायक के पत्र का उत्तर भी फेसबुक पर ही दिया और लिखा- तुम्हारी चिट्ठी का क्या जवाब दूं? मैंने युवा कलमकारों और कलाकारों के लिए जो संकल्प लिये थे और कार्यान्वित किये, मेरे वो इरादे पुरानी पीढ़ी को घातक लगे, जैसे उनकी सत्ता छिन रही हो। परिणाम तुम युवकों युवतियों के सामने है। हिंदी अकादमी....। मैत्रेयी पुष्पा के इस उत्तर को विष्णु खरे की परोक्ष आलोचना माना गया। पुरानी पीढ़ी और बूढ़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी उनके लिए लिए ही किया गया जान पड़ा। चर्चा तो ये भी चली कि मैत्रेयी ने ही शायक को कहकर वो खत लिखवाया फिर उसका उत्तर दिया। क्योंकि शायक का खत मैत्रेयी जी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लगाया और दस मिनट बाद ही उसका उत्तर भी पोस्ट कर दिया। इस पूरे प्रकरण के पीछे हिंदी अकादमी की पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का नया अंक और हिंदी अकादमी के आयोजनों में एक खास विचारधारा के लोगों को बुलाना है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का कहानी विशेषांक तैयार किया था और पूर्व की घोषणा के अनुसार कहानीकारों की कहानियां तय कर दी गई थीं। इस बीच उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और विष्णु खरे ने कार्यकाल संभालते ही उसमें काफी बदलाव कर दिए। साहित्य जगत को इसकी जानकारी भी मैत्रेयी पुष्पा के फेसबुक वॉल पर उनकी पोस्ट से ही हुई थी। अब शायक आलोक के पत्र के माध्यम से मैत्रेयी ने जिस प्रकार से विष्णु खरे और आयोजनों में बुलाए जानेवाले बुजुर्ग लेखकों पर निशाना साधा उसकी टाइमिंग गलत हो गई। मैत्रेयी के पोस्ट के सात-आठ घंटे के बाद ही विष्णु खरे जी का निधन हो गया। उसके बाद विवाद और बढ़ गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि अब मैत्रेयी जी फेसबुक पर विवाद खड़ा कर उसका आनंद उठाने लगी हैं। जैसे राजेन्द्र जी किया करते थे, वो भी पहले विवाद उठाते थे और फिर किनारे बैठकर उसका मजा लिया करते थे। पिछले एक साल में मैत्रेयी ने कई विवादास्पद पोस्ट लिखी, छठ के दौरान नाक तक सिंदूर लगाने को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी भी उसमें शामिल है। फेसबुक पर जिस रफ्तार से विवाद वायरल होते हैं, उसका दायरा फैलता है, पक्ष और विपक्ष में दलीलें आती हैं वो विवाद उठानेवाले को आनंद से भर देने के लिए काफी होते हैं। हिंदी अकादमी और विष्णु खरे को लेकर भले ही विवाद खडा करने की कोशिश की जा रही हो लेकिन हमारे भारतीय संस्कार में किसी की मृत्यु के बाद उनके बारे में आलोचनात्मक नहीं लिखने की परंपरा रही है। अपशब्द का इस्तेमाल तो वर्जित ही होता है। विष्णु खरे जी के निधन के बाद भले ही केजरीवाल मौन रहे हों, उनकी मृत्य के पहले मैत्रेयी पुष्पा की टिप्पणी आपत्तिजनक हो लेकिन उनकी मृत्यु के फौरन बाद तो हम सबको मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना चाहिए, विवाद को हवा देकर भारतीय परंपरा की मर्यादा को ना तोड़ें। अगर बात करनी ही है, तो विष्णु खरे की कविताओं पर बात हो, उनकी रचनात्मकता को कसौटी पर कसा जाए।

Saturday, August 11, 2018

भाषा अकादमियों के जरिए राजनीति


हाल ही में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने कैबिनेट की बैठक में 15 भाषा अकादमियों के गठन को मंजूरी दी। उन भाषाओं की अकादमियां भी दिल्ली में होंगी जिनके बोलने लिखनेवाले लोग राजधानी दिल्ली में रहते हैं। भारतीय भाषाओं की पैरोकारी करनेवाले सभी लोगों को ये पहल अच्छी लग सकती है, लेकिन दिल्ली में पहले से चल रही भाषाई अकादमियों के हाल देखकर आगामी दिनों में बनने वाली इन 15 अकादमियों को लेकर बहुत उम्मीद नहीं जग रही है। बल्कि ये आशंका और बलवती हो रही है कि करदाताओं के पैसे का अपव्यय ना हो। दरअसल हमारे देश में भाषा बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है और आजादी के बाद से सभी राजनीतिक दल इसको भुनाने की जुगत में रहते हैं। केजरीवाल सरकार को भी इसमें राजनीति की संभावनाएं नजर आईं होंगी तभी एक साथ 15 भाषा अकादमियों के गठन को कैबिनेट की मंजूरी दी गई है। दिल्ली की दो भाषा अकादमी ऐसी रही हैं जिनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया जाता रहा है। पहली तो हिंदी अकादमी और दूसरी मैथिली-भोजपुरी अकादमी। उर्दू अकादमी भी अपने आयोजनों को लेकर विवादित रही हैं।  
दिल्ली की हिंदी अकादमी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दिल्ली में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के संवर्द्धन, प्रचार-प्रसार और विकास के उद्‌देश्य से 1981 में तत्कालीन दिल्ली प्रशासन ने स्वायत्तशासी संस्था के रूप में हिन्दी अकादमी की स्थापना की। इस अकादमी के अध्यक्ष दिल्ली के मुख्यमंत्री होते हैं। अकादमी के कार्यक्रमों तथा गतिविधियों के क्रियान्वयन और नियोजन में निर्णय एवं परामर्श के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री दो वर्ष की अवधि के लिए संचालन-समिति गठित करते हैं। घोषित तौर पर इसमें 25 जाने-माने साहित्यकार, लेखक, विशेषज्ञ, पत्रकार आदि नामित किए जाते हैं। इसके अलावा अकादमी में समय-समय पर विभिन्न कार्यों के निष्पादन/निर्णय के लिए अलग-अलग समितियां बनायी जाती है जो उपयुक्त दिशा-निर्देशन के साथ-साथ यह सुनिश्चित करती हैं कि योजनाओं के अंतर्गत लाभ उठाने वालों के चयन में निष्पक्षता बरती जाए। इसके अलावा इसके इसके करीब दर्जन भर घोषित उद्देश्य भी हैं जिसमें हिंदी को लेकर बड़े बड़े दावे किए गए हैं।
अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने क बाद से हिंदी अकादमी भी किसी ना किसी विवाद में पड़ती रही, पहले अपने संचालन समिति के गठन को लेकर तो फिर भाषा सम्मान में अंतिम समय में जोड़े गए नामों को लेकर। मैत्रेयी पुष्पा जब हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष रहीं तब भी इसके मंच पर नेता आए, उनको लाखों का भुगतान भी किया गया। सवाल भी उठे लेकिन ये पता नहीं चल सका कि ऑडिट में उस खर्चे को किस तरह से समायोजित किया गया। कलांतार में मैत्रेयी पुष्पा ने अकादमी को लगभग विवाद मुक्त कर दिया था और अकादमी में ठोस काम-काज भी होने लगे थे, पत्रिका भी मासिक होकर अच्छी निकल रही थी। यह अलहदा मुद्दा है कि मैत्रेयी पुष्पा के इर्द-गिर्द भी कुछ लोग जमा होकर लाभ उठा रहे थे। ये तो सत्ता और समाज का चरित्र भी है। मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल के खत्म होने के बाद अब जो उपाध्यक्ष बने हैं वो तो सीधे तौर पर राजनीति पर उतर आए हैं। मैत्रेयी के बाद दिल्ली सरकार ने हिंदी अकादमी की कमान मुंबई में रहनेवाले मशहूर और बुजुर्ग मार्क्सवादी कवि लेखक विष्णु खरे को सौंपी। विष्णु खरे की नियुक्ति पर यह भी सवाल उठता है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष मुंबई में रहनेवाले व्यक्ति को क्यों बनाया गया? क्या दिल्ली की धरती साहित्यकार विहीन हो गई थी। या दिल्ली में विष्णु खरे से योग्य को व्यक्ति था नहीं? अकादमी में अबतक ये परिपाटी रही है कि इसका उपाध्यक्ष दिल्ली का रहनेवाले होता है या वो व्यक्ति होता है जो काम करने के लिए दिल्ली आता हो। यह इस वजह से भी कह रहा हूं कि मुंबई के व्यक्ति को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने से वित्तीय बोझ बढ़ता है। अगर उपाध्यक्ष हर सप्ताह अपने घर मुंबई जाना चाहे तो उसको अकादमी की तरफ से मुंबई आने जाने का हवाई किराया देना पड़ेगा। वो दिल्ली में रहेगा तो उसके रहने खाने का इंतजाम करना होगा। इसका प्रावधान दिल्ली की हिंदी अकादमी में नहीं है। अगर उपाध्यक्ष दिल्ली सरकार से अपने आवास की व्यवस्था का अनुरोध कर दें तो एक और समस्या खड़ी हो सकती है। दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के लिए कोई वेतन तय नहीं है बल्कि उनको हर महीने पांच हजार रुपए यात्रा व्यय के लिए दिए जाने का प्रावधान है। तो उपाध्यक्ष पर अगर इसके अलावा किसी प्रकार का खर्च होता है तो उसको कैसे जायज ठहराया जाएगा, ये देखना दिलचस्प होगा। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष को अकादमी के कार्यक्रमों में शामिल होने के एवज में कोई धन देने का प्रावधान भी नहीं है इस वजह से अबतक निमंत्रण पत्रों पर उपाध्यक्ष का सानिध्य छपता रहा है। अगर अकादमी का उपाध्यक्ष किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता करता है या उसमें वक्ता के तौर पर शामिल होता है तो वो धन ले सकता है लेकिन वो धन लेना कितना नैतिक होता है यह तो उपाध्यक्ष ही बता सकता है, या फिर हिंदी अकादमी के अध्यक्ष होने के नाते दिल्ली की जनता को अरविंद केजरीवाल से ये जानने का हक है।
दिल्ली की हिंदी अकादमी के नए नवेले उपाध्यक्ष खरे ने अभी वार्षिक पुरस्कार समारोह में मंच से वहां मौजूद लोगों से राजनीतिक अपील की। उन्होंने मंच से कहा कि नरेन्द्र मोदी को वोट मत देना। यह बात समझ से परे है कि एक साहित्यिक समारोह में सरकारी अकादमी का उपाध्यक्ष उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी में मोदी को वोट नहीं देने की अपील क्यों करता है और उस अपील पर उपमुख्यमंत्री खामोश क्यों रहता है। समारोह में उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा कि हो सकता है कि नए उपाध्यक्ष सूबे की सरकार को खुश करने के लिए अपनी सीमा से बाहर चले गए हों। अपने छोटे से वक्तव्य में उन्होंने साहित्यकारों से कम्युनिस्ट होने की अपेक्षा भी जता दी थी। दरअसल विष्णु खरे साहित्य की जिस पाठशाला से आते हैं वहां साहित्यिक संगठन अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करते हैं, उन्हीं के इशारे पर लेखन करते हैं। अंग्रेजी का एक कहावत है ना कि ल्ड हैबिट डाई हार्ड मतलब कि पुरानी आदतें जल्दी जाती नहीं है। यह तो हिंदी अकादमी की बात हुई लेकिन इसके पहले दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच पर नीतीश कुमार को बुलाकर केजरीवाल की राजनीति चमकाने की कोशिश की गई थी। तब भी उसको लेकर सवाल खड़े हुए थे, लेकिन ना तो सरकार से ना ही अकादमी की तरफ से कोई ठोस उत्तर आया था।
अब अगर हम दिल्ली की भाषा अकादमियों के प्रशासनिक ढांचे पर नजर डालें तो वहां सालों से तदर्श व्यवस्था चल रही है। हिंदी अकादमी की ही बात करें तो वहां कई वर्षों से पूर्णकालिक सचिव नहीं है। अभी संस्कृत अकादमी के सचिव को हिंदी अकादमी का अतिरिक्त प्रभार है। मौथिली भोजपुरी अकादमी में भी तदर्श व्यवस्था लागू है। उर्दू में भी पूर्णकालिक सचिव नहीं है। इन अकादमियों से लंबे समय से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि किसी भी भाषा अकादमी के पास स्थायी सचिव नहीं है ।भाषा अकादमियों को लेकर केजरीवाल सरकार कितनी गंभीर है यह इससे ही पता चलता है कि इन अकादमियों को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी जिस सचिव पर है वही तदर्थ है। हिंदी अकादमी में आखिरी पूर्णकालिक सचिव ज्योतिष जोशी थे उसके बाद से तदर्थ व्यवस्था चल रही है। हिंदी के लेखक भगवानदास मोरवाल का चयन हिंदी अकादमी के सचिव के रूप में हो गया था लेकिन उसाक नोटिफिकेशन नहीं हो पाया। साहित्यिक हलके में चर्चा यह है कि मैत्रेयी पुष्पा नहीं चाहती थीं कि मोरवाल जी उनके कार्यकाल मे सचिव बनें। सचिव के नहीं होने से इन अकादमियों का कामकाज प्रभावित होता है।
भाषा, साहित्य और संस्कृति का मामला ऐसा है जहां कि गंभीरता से काम करने की जरूरत होती है, तदर्थ व्यवस्था से राजनीति तो चमक सकती है, लोगों को लुभाया जा सकता है लेकिन कुछ ठोस हो नहीं पाता है। जैसे अभी हिंदी अकादमी ने जो पुरस्कार दिए हैं उसमें मुंबई के रहनेवाले जावेद अख्तर को श्लाका सम्मान दिया गया। इसपर भी सवाल है। इसी तरह से दिल्ली के बाहर वालों को भी अन्य पुरस्कार दिए गए। दिल्ली के लोगों के बीच काम करने की जिम्मेदारी इन अकादमियों पर थी लेकिन उसको राष्ट्रीय पहचान दिलाने के चक्कर में ना तो दिल्ली में ठीक से काम हो पा रहा है और ना ही राष्ट्रीय पहचान बन पा रही है, इन अकादमियों के कर्ताधर्ताओं को ये समझना होगा कि पुरस्कार दे देना सबसे आसान काम है लेकिन भाषा के लिए जमीन पर काम करना बहुत कठिन है लेकिन जब मंशा ही राजनीति की हो तो फिर उम्मीद क्यों करें ठोस जमीनी काम की।