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Saturday, July 23, 2022

दक्षिण में लहराया स्वदेशी का झंडा


भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोगों ने एकजुट होकर भाग लिया और योगदान दिया। यह इतिहासकारों की समस्या रही कि उन्होंने स्वाधीनता का इतिहास लिखते समय स्वतंत्रता संग्राम के कई ऐसे नायकों को या तो भुला दिया या उनके महत्व का आकलन सही तरीके नहीं किया गया। दक्षिण भारत के स्वाधीनता सेनानियों की तो ब्रिटिश इतिहासकारों ने उपेक्षा ही की। सुनील खिलनानी ने अपनी पुस्तक इनकारनेशंस में इतिहासकार डेविड वाशब्रुक को उद्धृत किया है। उनके मुताबिक ‘1895 से 1916 के बीच मद्रास (अब चेन्नई) की सड़कों पर कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता शायद ही भौंका होगा। तूतीकोरन अपवाद था।‘ जब डेविड वाशब्रुक तूतीकोरन को अपवाद मान रहे थे तो उसकी वजह थे, वी ओ चिंदबरम पिल्लै। चिंदबरम पिल्लै ने न केवल ब्रिटिश कंपनियों को चुनौती दी बल्कि उन्होंने स्वदेशी के नारे को साकार भी किया। उन्होंने समंदर में ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। इसकी भी बेहद दिलचस्प कहानी है। चिदंबरम पिल्लै का जन्म 1872 में हुआ था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वकालत करने के लिए तूतीकोरन पहुंचे थे। यहां वो शैव सभा के संपर्क में आए और उनका रुझान साहित्य और संस्कृति की ओर हुआ। शैव सभा में सक्रिय चिदंबरम पिल्लै का लेखकों से संपर्क बढ़ा और एक दिन उनके किसी साथी ने उनको बाल गंगाधर तिलक के लेख आदि पढने को दिए। चिंबरम पिल्लै पर तिलक के लेखन का जबरदस्त प्रभाव पड़ा और उनका युवा मन देश को गुलामी की बेड़ियों के आजाद करवाने के लिए तड़पने लगा। 

इस बीच अंग्रेजों ने बंगाल के विभाजन का निर्णय लिया जिसकी देशभर में कठोर प्रतिक्रिया हुई। देशभर में अंग्रजी वस्तुओं का बहिष्कार आरंभ हुआ। युवा पिल्लै ने भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ साथ अंग्रेजों के स्कूलों और अन्य संस्थाओं के बहिष्कार की भी अपील की। अब वो सक्रिय राजनीति में आ चुके थे। पिल्लै ने विदेशी वस्तुओं और संस्थाओं के बहिष्कार के लिए अपने इलाके के लोगों को शपथ दिलानी शुरू की। पिल्लै ने लोगों को पानी में खड़े होकर मां काली की शपथ दिलाई थी कि वो विदेशी सामान और संस्थाओं का बहिष्कार करेंगे। इसका जबरदस्त असर तूतीकोरन और आसपास के इलाके में हुआ। इस दौरान ही चिदंबरम पिल्लै ब्रिटिश पुलिस की नजरों में आ गए थे। इतने से पिल्लै का मन नहीं भरा था और वो कुछ बड़ा करके ब्रिटिश राज को चुनौती देना चाहते थे। वो जिस इलाके में रहते थे वो व्यापार का बड़ा केंद्र था। वहां के समुद्री तट पर ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कंपनी के जहाजों का कब्जा था। इनके माध्यम से ब्रिटिश कंपनियां भारतीय उत्पाद एक जगह से दूसरे जगह ले जाकर बेचती और मुनाफा कमाती थी। पिल्लै के मन में ये विचार पनप रहा था कि एक देसी जहाज कंपनी होनी चाहिए ताकि यहां के व्यापारियों को लाभ मिल सके। उन्होंने 1906 के अप्रैल में एक योजना बनाई और उसपर अमल आरंभ कर दिया। दिसंबर 1906 में पिल्लै ने अपनी कंपनी स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी बनाई और इस कंपनी का एक जहाज समंदर में उतार दिया। इनकी कंपनी का रेट कम होने की वजह से इनको अधिक यात्री और कारोबारी मिलने लगे। इससे बौखलाई ब्रिटिश कंपनी ने पुलिस और प्रशासन का सहारा लिया। स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी को कानूनी अड़चनें लगाकर बाधित करने का प्रयास किया जाने लगा लेकिन चिदंबरम ने हार नहीं मानी। उन्होंने पैसे जुटाकर दो और जहाज खरीद लिए। ये दोनों जहाज पहलेवाले से बड़े थे। इन दोनों जहाजों पर पिल्लै ने हरा, पीला और लाल झंडा पेंट करवाकर बड़े बड़े अक्षरों में वंदे मातरम लिखवा दिया था। उनका ये प्रयोग बहुत सफल रहा था और लोग उनको स्वदेशी पिल्लै कहने लगे थे। 

ये सब चल ही रहा था कि पिल्लै ने एक और युवा साथी शिवम के साथ मिलकर तूतीकोरन में मिल मजदूरों का आंदोलन आरंभ कर दिया। अधिक सुविधा और वेतन की मांग करते हुए कोरल मिल में हड़ताल हो गई। ये हड़ताल इतनी सफल रही कि अंग्रेजों ने मजदूरों से समझौता करना पड़ा। इसके बाद पूरे इलाके में चिदंबरम पिल्लै की लोकप्रियता और बढ़ गई और इससे बढा उनका हौसला भी। लेकिन अंग्रेजों ने चिदंबरम को फंसाने की योजना बना ली थी और उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में तूतीकोरन में भयंकर हिंसा और आगजनी हुई थी। अंग्रेज सरकार ने आनन-फानन में पिल्ले को डबल उम्रकैद की सजा सुनाकर जेल भेज दिया। जेल में उको आम कैदी की तरह रखा गया और हाड़तोड़ मेहनत करवाई जाती थी। चिंदबरम पिल्लै ने हाईकोर्ट में अपील की और फिर उनका केस प्रीवी काउंसिल तक गया। उनकी सजा कम हुई और चार साल के बाद उनको रिहा कर दिया गया। इन चार सालों में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी लगभग बंद हो चुकी थी और जहाज बिक गए थे। उनका वकालत का लाइसेंस रद कर दिया गया था। बाद में गांधी से मतभेद के चलते पिल्लै ने 1920 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। फिर बैंक मैनेजर की नौकरी की। इससे ऊबकर उन्होंने वकालत का लाइसेंस वापस करने की अपील की जिसको न्यायालय ने मान लिया। वो फिर से वकालत भी करने लगे और कांग्रेस पार्टी भी ज्वाइन कर ली। धीरे धीरे वो गुमनामी में चले गए और 1936 में तूतीकोरन के कांग्रेस के कार्यलय में अंतिम सांसे लीं। स्वदेशी का झंडा बुलेंद करनेवाले इस स्वाधीनता सेनानी ने शिपिंग में जिस तरह के स्वावलंबन की राह दिखाई थी उसपर आगे चलकर भारतीय कंपनियों ने काम किया। 

Saturday, February 20, 2021

पूर्वज नायकों के सम्मान का सही समय


हाल ही में महाराज सुहेलदेव पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इतिहास लेखन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी उस टिप्पणी में भारतीय इतिहास लेखन को लेकर भी टिप्पणी की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘देश का इतिहास वो नहीं जो भारत को गुलाम बनाने वालों और गुलाम मानसिकता वालों ने लिखा। इतिहास वो है जो लोककथाओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है।‘ नरेन्द्र मोदी ने इस ओर भी स्पष्ट तौर पर संकेत किया भारत में हमने कई महापुरुषों को अपनी इतिहास की पुस्तकों में भुला दिया। उन्होंने कई उदाहरण भी दिए। भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में देखें तो अबतक तो यही दिखाई देता है कि हमारे देश का ज्यादातर इतिहास गुलाम बनाने वालों ने या गुलाम मानसिकता वालों ने ही लिखा। मार्क्सवादियों ने जिस प्रकार से इतिहास लेखन किया उसको देखने के लिए ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना के उद्देश्यों की पड़ताल कर ली जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। जब 1972 में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना की गई थी तब इसका प्रमुख उद्देश्य था ‘वस्तुपरक और वैज्ञानिक इतिहास लेखन को बढ़ावा देना, जिससे देश की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विरासत की समझ बढ़े व सही मूल्यांकन भी हो सके।‘  अपने स्थापना काल से ही भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, मार्क्सवादी इतिहासकारों के कब्जे में चला गया। परिणाम यह हुआ कि भारतीय इतिहास लेखन में छल की प्रविधि का उपयोग होने लगा। यह अनायास नहीं है कि प्राचीन भारत के इतिहास से लेकर मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत के इतिहास में भारतीय नायकों को परिधि पर रखने की एक कोशिश दिखाई देती है। इतिहास लेखन के लिए औपनिवेशिक और मार्क्सवादी पद्धति अपनाई गई। वही पद्धति जिसने रूस के लेनिन-त्रॉतस्की शासन को लेनिन-स्तालिन शासन बना दिया। रूस के इतिहास से त्रॉतस्की को प्रयासपूर्वक ओझल कर दिया गया। इस पद्धति के अलावा ब्रिटिश इतिहासकारों के लिखे को भी आधार बनाकर लेखन किया गया। लेकिन ब्रिटिश इतिहासकार किस तरह से सोचते हैं इसका एक उदाहरण डेविड वॉशब्रुक की आधुनिक भारत के संबंध में की गई एक टिप्पणी है। इस टिप्पणी से भारत को लेकर उनकी दृष्टि और मानसिकता का संकेत मिलता है। आधुनिक भारत का इतिहास लिखते वक्त वो एक जगह टिप्पणी करते हैं कि ‘1895 और 1916 के बीच मद्रास की सड़क पर शायद ही कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता भौंका हो।‘ 

अब जब हमारा देश अपनी स्वतंत्रता के पचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है तो भारत के वस्तुनिष्ठ इतिहास का प्रश्न एक बार फिर से हमारे सबके सामने चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि हम अपने नायकों को याद करें, उनको पुनर्स्थापित करें और आनेवाली पीढ़ियों को उनके बारे में बताएं। आज आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है, उस दिशा में गंभीर काम भी हो रहे हैं। एक बार फिर से स्वदेशी बनाने और उसको अपनाने पर जोर दिया जा रहा है लेकिन क्या हम आधुनिक भारत में स्वदेशी को लेकर अपना पूरा जीवन होम करनेवाले नायकों को याद कर पा रहे हैं। अंग्रेजों को चुनौती देनेवाले चिदंबरम पिल्लई, जिनको ‘स्वदेशी पिल्लई’ कहा जाता है, को याद करते हैं?  चिंदबरम पिल्लई हमारी धरती का ऐसा साहसी सपूत है जिसने अंग्रेजों को स्वदेशी के नाम पर खुली चुनौती दी थी। तूतीकोरन में 1872 में जन्मे चिदंबरम पिल्लई की कहानी बेहद प्रेरणादायक है, लेकिन मार्क्सवादी इतिहासकारों ने उनको हाशिए पर रखा। चिदंबरम पिल्लई पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने दक्षिण में स्वदेशी का आंदोलन चलाया। उन्होंने ‘ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन शिपिंग कंपनी’ के मुकाबले अपनी शिपिंग कंपनी बनाकर उनको चुनौती दी थी। उनकी कंपनी का नाम ही ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ था और उनके जहाज पर स्वदेशी लिखा होता था। उनकी कंपनी की इतनी लोकप्रियता थी ब्रिटिश कंपनी के लोग अपनी जहाज पर यात्रा करनेवालों को कम किराए का प्रलोभन तो देते ही थे, यात्रा करने वालों को मुफ्त में छाता आदि भी देते थे। बावजूद इसके पिल्लई की कंपनी का मुनाफा इतना बढ़ा कि उन्होंने दो और जहाज आयात किए। ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ के बढ़ते कारोबार से अंग्रेज इतना घबरा गए थे कि उन्होंने ब्रिटिश इंडिया नेविगेशन कंपनी के जहाजों पर भी ‘स्वदेशी’ लिखकर यात्रियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश की थी। इसी समय से दक्षिण भारत में चिदंबरम पिल्लई को लोग ‘स्वदेशी पिल्लई’ कहने लगे थे। ये समय 1905 के आसपास का था। 

अब अगर हम पिल्लई की विकास यात्रा को देखते हैं तो उसमें तमिलनाडू में चलनेवाले ‘शैव सभाओं’ का बड़ा योगदान रहा है। इन सभाओं में जब पिल्लई सक्रिय हुए थे तब उनके संपर्क का दायरा बढ़ा था और इलाके के बुद्धिजीवियों से उनका संवाद आरंभ हुआ था। इन्हीं सभाओं के सदस्यों के मार्फत उनका परिचय लोकमान्य तिलक के लेखन और कार्य ये हुआ। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को अपना गुरू मान लिया था। वर्षों बाद 1907 में सूरत में आयोजित कांग्रेस की वार्षिक बैठक में पिल्लै अपने गुरू बाल गंगाधर तिलक से मिले थे। 1907 का ये अधिवेशन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा था। इस बैठक में ही कांग्रेस उदारवादी और अतिवादी समूह में विभाजित हुई थी। इस बैठक के बाद ही पिल्लई के काम को कांग्रेस ने मान्यता दी और उनको दक्षिण भारत का प्रभार सौंपा। उसके बाद उनकी सक्रियता बहुत बढ़ गई थी। इस बात के भी उल्लेख मिलते हैं कि जब 1911 में उनकी गिरफ्तारी हुई थी तब उनके एक समर्थक ने उस अंग्रेज अफसर की हत्या कर दी थी जिन्होंने इनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे। इन आरोपों के मद्देनजर पिल्लई को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी लेकिन जनता के गुस्से को देखते हुए सजा को छह साल की कैद में बदल दिया गया था। अब अगर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर पिल्लई के संघर्षों का आकलन किया जाता तो वो एक राष्ट्रीय नायक के तौर पर बाद की पीढ़ियों में जाने जाते। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उनपर 1961 में तमिल भाषा में एक फिल्म जरूर बनी लेकिन उनके लेखन को, उनके योगदान को, उनके संघर्षों को वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी हैं। 

स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष में प्रवेश को एक अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों के काम को सामने लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अलावा अन्य अकादमियों को भी इस काम में आगे आकर पहल करनी चाहिए। इन स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन को सामने लाने के लिए साहित्य अकादमी से लेकर देश के विश्वविद्यालयों को भी पहल करनी चाहिए। उनको इतिहास और राजनीति में रुचि रखनेवाले विद्वानों और शोधार्थियों को चिन्हित करके प्राथमिकता के आधार पर ये काम सौंपा जाना चाहिए। शोधार्थियों और विद्वानों के सामने एक समय सीमा हो जिसके अंदर इस तरह के प्रोजेक्ट पूरे किए जाएं। जब पूरा राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाए तो इन पुस्तकों का प्रधानमंत्री के हाथों विमोचन हो और उसका खूब प्रचार प्रसार किया जाए। इन सकारात्मक प्रयासों को अलावा जो गलत इतिहास लेखन हुआ है उसको भी चिन्हित करके उसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। जैसे ब्रिटिश सरकार के उस ट्रांसफर ऑफ पॉवर नाम के उस दस्तावेज का प्रतिकार आवश्यक है जिसमें उन्होंने ये मान्यता दी है कि वो भारत को गुलाम बनाने नहीं आए थे बल्कि सभ्य बनाने आए थे। वो भारत का विभाजन नहीं चाहते थे आदि आदि। ये तभी संभव है जब सरकार के स्तर पर इन कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध करवाया जाए और इसको पूरा करने की इच्छाशक्ति हो।