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Saturday, August 8, 2026

संप्रुभता को डिजीटल चुनौती


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फेसबुक पर की गई पोस्ट को थोड़े समय के लिए हटाने के लिए फेसबुक चलानेवाली कंपनी मेटा ने भारत सरकार से माफी मांग ली है लेकिन इससे पूरा प्रकरण समाप्त नहीं हो जाता। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले प्लेटफार्म्स के बारे में गंभीरता से विचार ही करने और एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। जंतर-मंचर पर छात्रों के नाम पर जो आंदोलन हुआ और उसमें इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका रही उसपर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की व्यंग्यात्मक टिप्पणी के बाद अमेरिका में बैठा एक व्यक्ति काकरोच जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम हैंडल बनाता है। 78 घंटे में इस हैंडल को तीस लाख फालेवर्स मिल जाते हैं। कुछ और समय में ये संख्या दो करोड़ बीस लाख तक पहुंच जाती है। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या आर्गेनिक रूप से इतने फालोवर्स इतने कम समय में किसी भी हैंडल को मिल सकते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों के अनुसार भारत में इंस्टाग्राम पर करीब 55 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं। इस समूह में सबसे बड़ी संख्या 25-34 आयुवर्ग के उपभोक्ताओं की है और उसके बाद 18-24 वर्ष के यूजर्स है। इलके अलावा भारत में फेसबुक के करीब 70 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप का प्रयोग करनेवाले 85 करोड़ लोग हैं। ये तीनों प्लेटफार्म मेटा कंपनी के अंतर्गत आते हैं। मेटा अमेरिका की कंपनी है। 

इस पृष्ठभूमि में जंतर मंतर पर जुलाई में हुए काकरोच जनता पार्टी के धरने को देखते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना आरंभ होता है। बहुत समर्थन नहीं मिलता है। काकरोच जनता पार्टी के लोग पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर मंतर पर लाते हैं। उनके अनशन पर बैठने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा होती है। काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है लेकिन अपेक्षित नहीं। इंटरनेट मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन को लेकर रील आदि दिखने लगते हैं। काकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा करती है। अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रीलों की संख्या बढ़ने लगती है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा देती है। सुबह हुए पुलिस एक्शन की खूब सारी रीलें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हैं। उन अकाउंट्स पर भी ये रीलें दिखने लगती हैं जो कभी इस तरह की रील नहीं देखते थे। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो सिर्फ फिल्मों और पर्यटन से जुड़ी रीलें देखते थे लेकिन उन दिनों उनके वाल पर जंतर मंतर की ही रीलें दिखती थीं। आमतौर पर ये माना जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक अल्गोरिथम से काम करता है और आप जिस तरह का वीडियो देकते हैं उसी तरह के वीडियो आपको दिखाता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद उन अकाउंट्स पर भी जंतर मंतर से संबंधित वीडियो दिखने लगे थे जिनकी रुचि इनमें नहीं थी। रीलों  के माध्यम से माहौल बनाया जाने लगा। इसके बाद ही जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी। ये कसेंट मैनुफैक्चरिंग का उदाहरण है। इंटरनेट मीडिया के माध्यम से आंदोलन को गति दिया जाने लगा। 

इंटरनेट मीडिया के माध्यम से साइकोलाजिकल टेकओवर आफ पालिटिकल कंज्यूमर का खेल आरंभ हो चुका था। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किसी के भाषण का अंश, सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का विजुअल, किशोर छात्रों का सरकार के विरुद्ध बयान रील के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगे थे। भारत में यह एक नए तरह का प्रयोग था। इसके पहले विश्व के कई देशों में इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं। बंग्लादेश और नेपाल में तो हाल ही में ऐसा हुआ था। योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले कोई मुद्दा उठाया जाता है। इस बार पेपर लीक को मुद्दा बनाया गया। पेपर लीक ऐसा मुद्दा है जिससे युवा वर्ग सीधे जुड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाने लगा। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया गया। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। सारा खेल लोकतंत्र को बचाने की आड़ में खेला जाता है। 

नेपाल और बंगलादेश के अलावा 2010 में मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ था। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए दुर्वव्यवहार पर विरोध का स्वर उठा। पूरे देश में ये इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। भारत में भी बार-बार वो शक्तियां इस तरह का षडयंत्रकारी खेल रचती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती और संविधान बदलने जैसे विमर्श केंद्र में आए। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय नहीं हुई हैं। निरंतर सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का और तथाकथित सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 

इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका की चर्चा 2020 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी हुई थी। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़े और हारे थे। चुनाव के दरान ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को कुछ समय के लिए सस्पेंड किया गया था। चुनाव परिणाम के बाद ट्विटर (अब एक्स) ने डोनाल्ड ट्रंप के हैंडल पर बैन लगा दिया था। ट्रंप ने अपना प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल लांच किया था। बाद में उनके समर्थक एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया था और ट्रंप के अकाउंट से बैन हटाया था। ट्विटर नाम एक्स हुआ। ये अनायास नहीं है कि चीन इस तरह के प्लेटफार्म्स को अपने देश में घुसने नहीं देता। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स के बढ़ते दायरे के कारण भारत में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है। उनके पास उपभोक्ताओं की सारी जानकारी है। वो जब चाहें जिसको चाहें अपना मनचाहा कंटेंट दे सकते हैं। ये विशेष आयुवर्ग के लोगों को लक्षित कर दिया जा सकता है, विशेष भौगोलिक क्षेत्र को लक्षित कर दिया जा सकता है। यह एक नए तरह का उपनिवेशवाद है जो किसी भी देश की संप्रभुता पर आक्रमण करता है। इसके लिए राजनीतिक दल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है अपना कारोबारी हित। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि इस तकनीकी नवउपनिवेशवाद से राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा की जा सके। 


Saturday, June 20, 2026

सफल राजनय का फार्मूला मोदीनामिक्स


विश्व के सात उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 7 की बैठक फ्रांस के शहर एवियन में हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सम्मेलन में भाग लेने का समाचार आया तो सबकी निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की वहां होनेवाली मुलाकात पर टिक गई। सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भेंट हुई। मोदी विरोधियों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कुछ ऐसा घटित होगा जिससे कि मोदी को घेरा जा सकेगा। हुआ इसके ठीक विपरीत। प्रधानमंत्री जब सम्मेलन कक्ष में पहुंचे तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कुर्सी से उठकर उनसे गर्मजोशी से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद साझा प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रशंसा पर व्यापक चर्चा हो चुकी है इस कारण दुहराने का अर्थ नहीं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत में मोदी विरोधियों की आशाओं पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उठाया। मजबूती के साथ अपनी बात रखी। इस पूरी प्रेस कांफ्रेस में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सहज दिखे।

इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की। जब उनसे महान नेता की परिभाषा पूछी गई तो उन्होंने कहा प्रधानमंत्री मोदी जो 12 वर्ष से प्रधानमंत्री हैं और बहुत सालिड हैं। वो काम बहुत शांति से करते हैं लेकिन बहुत सख्त हैं। ये मैं बहुत अच्छे से जानता हूं। वो 150 करोड़ आबादी वाले देश के नेता है और निरंतर बने हुए है। जब ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए शांत लेकिन सख्त शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो इसका विश्लेषण करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 भारतीयों की धर्म पूछकर हत्या की थी। उस आतंकी वारदात के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए आपरेशन सिंदूर आरंभ किया। पाकिस्तान ने भारत पर ही हमला कर दिया जिसका बारतीय सेना ने मुंहतोड़ जबाव दिया। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। तब से कई महीनों तक जब भी राष्ट्रपति ट्रंप को अवसर मिलता वो इस बात को कहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम उन्होंने ही करवाया। इस बात को उन्होंने पचास से अधिक बार दुहराया। जब भी डोनाल्ड ट्रंप ये बात कहते तो यहां विपक्षी दलों के नेता प्रधानमंत्री को घेरने का प्रयत्न करते। उनकी विदेश नीति को लेकर प्रश्न खड़े करने लगते। उसी समय अमेरिका ने एकतरफा टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। उस दौर में राष्ट्रपति ट्रंप भारत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी नहीं करते थे। एक बार तो उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के डेड (मृत) होने की बात तक कह डाली थी। उनके बयानों पर यहां मोदी विरोधी सक्रिय हो जाते। ये सिलसिला कई महीनों तक चला। इस बीच प्रधानमंत्री कनाडा के दौरे पर गए थे। उनकी और ट्रंप की फोन पर बातचीत हुई। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से वाशिंगटन होते हुए भारत लौटने का निमंत्रण दिया। राष्ट्रपति ट्रंप के उस अनुरोध को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया था। इसको अंतराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। ट्रंप की बयानबाजियों का मोदी ने कोई नोटिस ही नहीं लिया। कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। मोदी की इस उदासीनता के भाव ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दे दिया।

खाड़ी संकट के दौरान हार्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने पर जब कच्चे तेल का संकट हुआ तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखा। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध लगाया था पर भारत-रूस संबंध पर उसका असर नहीं पड़ा। अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाया था और अपनी तरफ से ही एक महीने की छूट दी। वो छूट भी खत्म हो गई लेकिन उसके बारे में फिर कोई बयान नहीं आया। इस वर्ष जून में जिस मात्रा में भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है वो एक नया कीर्तिमान बनने की ओर बढ़ रहा है। शिप ट्रैकिंग डाटा के अनुसार भारत अपनी जरूरतों के 50 प्रतिशत से अधिक तेल रूस से आयात कर रहा है। बिना किसी शोर शराबे के और बयानबाजी के ये काम निर्बाध गति से चलता रहा। ये प्रधानमंत्री मोदी का अपना इकोनामिक्स है जिसको अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदीनामिक्स कहा जाने लगा है। दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप मोदी को टफ निगोशिएटर कहते हैं तो उसके पीछे मोदी की खामोश पर दृढ़ निर्णयों की पृष्ठभूमि है। राहुल गांधी भले ही प्रधानमंत्री मोदी को कंप्रोमाइज्ड प्राइम मिनिस्टर कहें लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री की जो स्थिति है वो इस बयान को बचकाना बयान साबित करता है। फ्रांस में जी 7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जितने भी वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं वो सब इस बात की गवाही देने के लिए पर्याप्त है कि मोदोनामिक्स कैसे काम कर रहा है। आज अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदी ने वैश्विक नेताओं के साथ जिस तरह का रैपो बनाया है या कहें कि जिस तरह के व्यक्तिगत संबंध बनाए हैं उसका लाभ देश को हो रहा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भले ही मजाक में कहा हो कि वो और मोदी वायरल कपल हैं लेकिन इससे दोनों देशों के संबंधों में एक निकटता झलकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने जिस तरह से हिंदी में बोलकर प्रधानमंत्री का स्वागत किया और भारत-फांस मैत्री के अमर रहने की बात की वो दोनों देशों की निकटता को दर्शाता है।

इतना ही नहीं खाड़ी संकट के दौरान प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया वो भी अंतराष्ट्रीय राजनय में एक मिसाल है। इतने लंबे संघर्ष के दौरान उन देशों में रहनेवाले भारतीयों की सुरक्षा को अहम स्थान मिला। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के बाजार की ताकत को ना केवल पहचानते हैं बल्कि अपनी इस ताकत का उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनय में बहुत बेहतर तरीके से करते हैं। बगैर आक्रामक दिखे दृढता से देशहित के लिए कदम उठाते रहते हैं।  150 करोड़ भारतवासियों की ताकत और राजनय में प्रधानमंत्री का गांभीर्य मोदीनामिक्स को विशिष्टता प्रदान करता है। यह अनायास नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति कहता है कि अगर भारत पर संकट आया तो वो साथ खड़ा रहेगा। अगली ही पंक्ति में ये भी कह देता है कि जबतक मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अगर खाड़ी संकट नहीं आता और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर नहीं पड़ता तो भारत ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी थी वो कायम रहती। खाड़ी संकट के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत ने जिस तरह की रणनीति अपनाई उसके कारण ही जनता पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ा। जिस तरह से ऊर्जा चुनौतियों का सामना भारत ने किया और नई जगहों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया वो एक केस स्टडी है। आनेवाले समय में प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में जब उपलब्धियों और चुनौतियों पर शोधादि होंगे तो मोदीनामिक्स उसके केंद्र में होगा।   


Saturday, April 25, 2026

भाषाओं के वैश्विक पहचान की पहल


लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में इस क्षेत्र के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में से एक का आयोजन होता है। इस वर्ष 21 अप्रैल से 4 मई तक इसका आयोजन हो रहा है। बोगोटा इंटरनेशनल पुस्तक मेला (फिल्बो) में इस वर्ष भारत को ‘कंट्री आफ आनर’ के रूप में आमंत्रित किया गया है। 21 अप्रैल को पुस्तक मेला का और उसके तुरंत बाद भारत मंडप का उद्घाटन हुआ। भारत मंडप का उद्घाटन कोलंबिया की संस्कृति, कला और ज्ञान मंत्री यानोई कदामनी फोनरोडोना ने किया। भारत मंडप के शुभारंभ समारोह के दौरान चार मिनट की एक छोटी सी डाक्यूमेंट्री दिखाई गई। इसमें भारत मंडप के बारे में बताया गया। डाक्यूमेंट्री की भाषा हिंदी और सबटाइटल स्पेनिश भाषा में था। जब ये डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही थी तो कोलंबिया की संस्कृति मंत्री यानोई कदामनी फोनरोडोना ने बगल में बैठे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष प्रोफेसर मिलिंद सुधाकर मराठे से पूछा कि डाक्यूमेंट्री की भाषा तो हिंदी है न? प्रोफेसर मराठे के हां कहते ही मंत्री ने तुरंत बताया कि उनको सुनकर ऐसा ही लगा। बातचीत के क्रम में मंत्री ने कहा कि वो कुछ समय चेन्नई में रही हैं इसलिए सुनते ही हिंदी पहचान गईं। इस बातचीत के बाद जब वो मंच पर अपने उद्बोधन के लिए पहुंची तो आरंभ ही डाक्यूमेंट्री की भाषा से किया। उन्होंने भारत ने मंडप के परिचय के लिए हिंदी भाषा के चयन की सराहना की। साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात भी कही। संस्कृति मंत्री फोनरोडोना ने कहा कि सभी को अपनी भाषा के साथ ही मंचों पर उपस्थित होना चाहिए क्योंकि भाषा से ही पहचान होती है। कभी भी अपनी भाषा को नहीं छोड़ना चाहिए। वो धड़ल्ले से स्पैनिश बोल रही थीं और सभागार में बैठे स्पेनिश नहीं समझनेवाले लोग इंटरप्रेटर हेडफोन के माध्यम से उनका भाषण सुन और समझ रहे थे। 

कोलंबिया की संस्कृति मंत्री का भाषण सुनते समय ही उनकी एक बात दिमाग में धंस गई। सभी को अपनी भाषा के साथ ही मंचों पर उपस्थित होना चाहिए। भाषा ही तो पहचान है। बार-बार ये बात दिमाग में आ रही थी कि हमारा देश तो बहुभाषी है लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर बहुधा हिंदी को भारत की भाषा के तौर पर पहचान मिलने लगी है। याद आया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल का अमेरिका दौरा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने निवास पर उनके सम्मान में एक भोज का आयोजन का था। अमेरिका के महत्वपूर्ण लोगों की उपस्थिति उसमें थी। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदी में भाषण दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी पत्नी कान में इंटरप्रेटर मशीन लगाकर सुन रही थीं। वहां उपस्थित तमाम देशों के राजनयिक भी प्रधानमंत्री के हिंदी के भाषण को सुन रहे थे। कुछ वर्षों पूर्व तक ये कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि भारत का प्रधानमंत्री व्हाइट हाउस में भारतीय भाषा में बात करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के पहले के अधिकतर प्रधानमंत्री विदेश में अंग्रेजी में बोलते थे। अठल बिहारी वाजपेयी ने जब विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था तो अनेक वर्षों तक यह समान्य ज्ञान का प्रश्न होता था। अनेक परीक्षा में ये पूछा जाता था कि भारत के किस विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था। किसी भी भाषा को ताकत तब मिलती है जब उस देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग उसका प्रयोग करते हैं। प्रधानमंत्री नरन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का हिंदी में बातचीत और काम करना औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के एक प्रयत्न के तौर पर भी रेखांकित किया जाना चाहिए। किया भी जा रहा है। 

जब अपनी भाषा अपनी पहचान के बारे में विचार करते हैं तो सबसे अधिक तकलीफ हिंदी के अंग्रेजीदां लोगों को देख-सुनकर होती है। हिंदी आती भी है तो भी रौब गांठने के चक्कर में अंग्रेजी बोलना आरंभ कर देते हैं। अंग्रेजी में बोलकर अपनी विद्वता दिखाने का छद्म प्रयास करनेवाले ये कहते हुए मिल जाएंगे कि मेरी हिंदी अच्छी नहीं है। इसका असर समाज के उन तबकों पर भी पड़ता है जिनको मध्यमवर्ग या निम्न मध्यमवर्ग कहते हैं। आप इन वर्ग के अधिकतर लोगों को अपने मुहल्ले की दुकान पर खरीदारी करते समय हिंदी में बात करते देखंगे। जैसे ही वो किसी बड़े शापिंग माल की चमकती दमकती दुकान में घुसते हैं तो एक्सक्यूज मी पर आ जाते हैं। एक दो वाक्य किसी तरह से अंग्रेजी में बोलकर हिंदी पर आ जाते हैं। ये औपनिवेशिक मानसिकता है। इस मानसिकता वाले लोग पिछले एक दशक में कम हुए हैं लेकिन अब भी हैं। अब तो पेजथ्री पार्टियों में भी हिंदी बोली जाने लगी है। मैं तो इसको सत्ता की भाषा होने से जोड़कर देखता हूं। पर ऐसा कहना गलत होगा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को विस्थापित कर दिया है। इस दिशा में पहल आरंभ हुई है। इस औपनिवेशिक मानसिकता से उबरने में दशकों लगेंगे। भारत से हजारों किलोमीटर दूर बोगोटा के अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला में भी भारत और भारतीय भाषाओं के प्रति रुझान दिखा। बोगोटा में अंग्रेजी समझने और बोलनेवाले लोग कम हैं। लोगों से बगैर दुभाषिए के बात करना कठिन है। भारत मंडप में घुसते ही भारतीय लेखकों की तस्वीर के साथ उनका परिचय है। प्रेमचंद से आरंभ होकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के प्रमुख लेखकों को भी स्थान दिया गया है। 

आज वैश्विक स्तर पर भारत की संस्कृति और भाषा के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है। हम भारतीयों को इस नए बने माहौल का लाभ उठाने के बारे में विचार करने का अवसर है। बोगोटा इंटरनेश्नल पुस्तक मेला में आयोजित सत्रों में हिंदी में बोलने का अवसर मिला। सभागार में बैठे लोगों ने दुभाषिए के जरिए हिंदी को समझा और चर्चा सत्र में हिस्सा लिया। जब स्पेनिश कलाकार ने राजस्थानी गीत और संगीत पर पारंपरिक राजस्थानी नृत्य प्रस्तुत किया तो खचाखच भरे सभागार में तालियां रुक ही नहीं रही थीं। भारतीय भाषाओं के लेखन को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने स्पेनिश में अनुवाद करवा कर इस पुस्तक मेले में प्रस्तुत किया। इन पुस्तकों में पाठकों ने काफी रुचि दिखाई। भारतीय लेखकों को विश्व की अन्य भाषाओं में अनुदित करवाकर नियमित रूप से अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में भेजा जाना चाहिए। भारतीय भाषा के लेखकों को स्वाधीनता के बाद अगर नोबेल नहीं मिला है तो उसके पीछे प्रमुख कारण भारतीय लेखन का दुनिया की अन्य भाषाओं में अनुवाद नहीं या कम होना है। अनुवाद के कारण ही भारत की दो लेखिकाओं को हाल ही में बुकर पुरस्कार मिला। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के प्रकाशक अपने लेखकों की पुस्तकों का दुनिया भर की भाषाओं में अनुवाद करवाएं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास इन पुस्तकों को अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में पेश करें ताकि दुनिया का ध्यान भारतीय लेखन की ओर जाए। इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार एक समग्र संस्कृति नीति बनाए। एक ऐसी नीति जिसमें भारत के सृजनात्मक लेकन को वैश्विक मंचों पर पहुंचने में मदद मिल सके। डगर कठिन है पर अभी माहौल अनुकूलल है जिसका लाभ लेना चाहिए।  


Saturday, February 14, 2026

सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए प्रधानमंत्री कार्यालय का शुभारंभ किया। इसका नाम रखा गया सेवा तीर्थ। सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने गणेश पूजा करके कार्यालय में विधिवत प्रवेश किया। भारत में कार्यारंभ के समय भगवान श्रीगणेश की पूजा की परंपरा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय परंपरा का ध्यान रखा। प्रधानमंत्री मोदी भारतीय परंपराओं और विधियों का ना केवल ध्यान रखते हैं बल्कि उसको निजी और सार्वजनिक रूप से बरतते भी हैं। इसको भारत की पारंपरिक और आध्यात्मिक चेतना को वापस लाने का प्रयत्न के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री जब किसी कार्य का आरंभ करते हैं, किसी मंदिर या धर्मस्थल पर जाते हैं तो वहां विधि-विधान के साथ पारंपरिक अर्चना से परहेज नहीं करते हैं। उनके इन कदमों पर कांग्रेस समेत कई अन्य दलों के नेता टीका टिप्पणी करते रहते हैं। उनका आरोप रहता है कि प्रधानमंत्री मोदी हिंदुओं को लुभाने के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। इन आरोपों पर कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि हिंदुओं को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री ने कभी भी वस्त्र के ऊपर जनेऊ नहीं पहना। कभी भी दिखावे के लिए ना तो पूजा-अर्चना की ना ही दिखावे के लिए श्रद्धावनत हुए। दरअसल मोदी के विरोधी इस बात को नहीं समझते हैं कि प्रधानमंत्री अपने इन कदमों को सभ्यतागत संघर्ष में एक टूल की तरह उपयोग करते हैं। पिछले बारह वर्षों में मोदी ने सभ्यतागत चेतना को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की। आज स्वाधीन भारत के इतिहास में वो ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर दिखाई देते हैं जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पुनर्स्थापित करने का ना केवल प्रयत्न किया बल्कि उसमें बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त की।। सभ्यतागत संघर्ष में आनेवाली बाधाओं का अनुमान जनता बहुत देर से लग पाता है। पर बाधाएं होती बहुत भीषण हैं। धर्म और आध्यामिकता को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जो कदम उठाए वो रेखांकित करने योग्य हैं। आज हमारी सभ्यता और उसकी विरासत राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। आलोचकों को लगता है कि ये धर्म और राजनीति का घालमेल है लेकिन ये घालमेल नहीं बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटना है। 

भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय शोध विधि, भारतीय न्याय संहिता...ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। ये सभी आज देश में केंद्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी 2047 में विकसित भारत की बात करते हुए आध्यत्मिकता की बात करते हैं तो हमें स्मरण होता है कि यही काम तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपने देश में कर रहे हैं। वहां भी धर्म की वापसी को लेकर ना केवल प्रयत्न किए जा रहे हैं बल्कि ईसाई धर्म की ओर युवाओं का लाने के लिए कई तरह के कदमों की घोषणा की जा रही है। कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने 17 मई को देशव्यापी प्रेयर डे मनाने के लिए अमेरिकी जनता का आह्वान किया। प्रेयर डे के आयोजन की घोषणा क्यों की गई उसका भी जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप ने किया। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों में चर्च जानेवालों की संख्या बढ़ी है। इस खुशनुमा नवीनीकरण को ध्यान में रखते हुए 17 मई को सभी अमरीकियों को नेशनल माल में प्रार्थना के लिए आमंत्रित कर रहा हूं। उस दिन हमलोग फिर से अपने राष्ट्र अमेरिका को ईश्वर की सत्ता के अधीन करनेवाले हैं। अमेरिका में ईसाई धर्म को लेकर पिछले कुछ वर्षों में आकर्षण बढ़ा है। वहां जिस तरह से नास्तिकता के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर, स्वाधीनता के नम पर अराजकता जैसी स्थिति हो गई थी वो भी सभ्यतागत लड़ाई का ही नतीजा था। आज से कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में थर्ड जेंडर और उनके अधिकारों की बात होती थी लेकिन आज वहां स्पष्ट तौर पर कहा जाता है कि दो ही लिंग होते हैं महिला और पुरुष। पुरुष के मां बनने की बात का उपहास सार्वजनिक रूप से वहां के नीतिनियंता उड़ाते रहते हैं। वहां फिर से ईश्वर में विश्वास वापसी, आस्तिकता और परिवार प्रबंधन में दो से अधिक बच्चे पैदा करने की बातें होने लगी हैं। यह अनायास नहीं है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में पिछले सौ वर्षों में सबसे अधिक संख्या में बाइबिल की बिक्री हुई है। हमारे यहां भी तो पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने परिवार में तीन बच्चों को शास्त्रसम्मत और विज्ञान सम्मत बताया था। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में डाक्टरों, मनोविज्ञानियों और जनसंख्या विशेषज्ञों का हवाला देते हुए तीन बच्चों को परिवार के लिए उचित बताया। बच्चों की परवरिश के लिए भी। भागवत ने अमेरिका में प्रकाशित पुस्तक चीपर बाय द डिजायन का संदर्भ दिया था। 

अमेरिका के सेक्रेट्री आफ वार ने कहा कि अमेरिका ईसाई राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ और वैसा ही बना रहेगा। अमेरिका स्वयं को एक बार फिर से 17 मई को ईश्वर को समर्पित करेगा। भारत में भी जब हिंदू राष्ट्र की बात होती है तो उसको पता नहीं किस किस तरीके से परिभाषित किया जाता है। वेबसीरीज और फिल्मों में हिंदू राष्ट्र की एक गंदी छवि प्रस्तुत की जाती है। पर सरसंघचालक समेत तमाम बड़े हिंदूवादी नेताओं ने ये स्पष्ट किया है कि भारत तो पहले से हिंदू राष्ट्र है और उनके अपने तर्क हैं। यहां हिंदू राष्ट्र में किसी का विरोध नहीं है बल्कि भारत में रहनेवाले सभी को हिंदू मानने की अपेक्षा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि हिंदू एक जीवन शैली है। मोहन भागवत भी कई बार कह चुके हैं कि पूजा या उपासना पद्धतियां अलग हो सकती है और उससे किसी का भी किसी तरह का विरोध नहीं है। अमेरिका में तो खुलेआम वहां के कांग्रेसजन कह रहे हैं कि शरिया कानून का अमेरिकी मूल्यों के साथ तालमेल नहीं हो सकता है और इसके लिए वहां कोई जगह नहीं है। कांग्रेसमैन ब्रैंडन गिल ने तो सके बाद  स्पष्ट किया कि उनको गर्व है कि वो शरिया मुक्त अमेरिकी काकस का हिस्सा बन गए हैं। 

आज सिर्फ भारत या अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में अपनी जड़ों की ओर लौटने की व्याकुलता देखी जा सकती है। दुनिया के वो देश जो मानवाधिकार से लेकर जेंडर मुक्त बातों की वकालत करते थे आज इनसे दूर होते दिख रहे हैं क्योंकि स्वाधीनता और स्वायत्ता के नाम पर कथित आधुनिक विचारधारा ने पूरी दुनिया में जो अराजकता फैलाई उसका दुष्परिणाम लंबे समय बात सामने आ रहा है। आज भारत की जनता भी इस बात को समझ चुकी है कि उनके यहां भी स्वाधीनता के बाद आधुनिकता के नाम पर जिस तरह से विदेशी विचारों और मूल्यों को सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने थोपा उससे उनका हित नहीं हो सका। राष्ट्र को आधुनिक बनाने के नाम पर जिस तरह के विचारों का पोषण किया गया उसने राष्ट्र को परोक्ष रूप से आंतरिक तौर पर कमजोर और विभाजित किया। चाहे वो भाषा के नाम पर हो, शोध प्रविधि और अध्ययन -अध्यापन के नाम पर हो। अपने पौराणिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धातों और प्रविधियों को नजरअंदाज कर विदेशी सिद्धातों को अपनाकर भारतीय विचारों को कुंद किया गया। यही कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में भी हुआ था लेकिन अब वहां भी अपनी जड़ों की ओर लौटने की ललक दिख रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी उसी विचार के हैं। हमारे देश में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाने की दिशा में बहुत काम हो चुका है लेकिन गाहे बगाहे अब भी स्वयं को प्रगतिशील कहनेवाले इन कदमों का उपहास करते रहते हैं पर अब उनका ना तो बहुत नोटिस लिया जाता है और ना ही बातों को महत्व मिलता है। 


Saturday, January 24, 2026

साख और विश्वास पर जोखिम भरे निर्णय


भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष ने कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत पार्टी के दिग्गज नेताओं की उपस्थिति में 45 वर्ष के नितिन नवीन ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाल लिया। कहीं से किसी प्रकार का विरोध या विद्रोह के स्वर सुनाई नहीं दिए। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन को उनकी कुर्सी पर बिठा रहे थे तो अचानक मेरे ध्यान में 2013 में गोवा में भारतीय जनता पार्टी कार्यकारिणी की बैठक का स्मरण हो आया। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाना चाहती थी तो कितना बवाल हुआ था। पार्टी के कई नेता पीढ़ीगत बदलाव चाहते थे। पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी की जगह नेतृत्व की कमान नरेन्द्र मोदी को देने की चर्चा थी। पार्टी के एक धड़े ने तय कर लिया था कि मोदी को कमान सौंपनी है लेकिन आडवाणी और उनके खेमे को ये मंजूर नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मोदी के नाम पर सहमति थी। गोवा में दो दिनों तक हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। आडवाणी जी की उम्र उस समय 85 वर्ष थी और नरेन्द्र मोदी 63 वर्ष के थे। पार्टी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार हो रही थी पर आडवाणी और उनके समर्थक तैयार नहीं हो पा रहे थे। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में पहले दिन आडवाणी नहीं आए। दूसरे तक उनके आने की चर्चा होती रही लेकिन आखिरकार वो नहीं आए। उनके समर्थक और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वो नरेन्द्र मोदी के कारण नहीं आ रहे हैं। उन्होंने तब कहा भी था कि उनको नमोनिया नहीं हुआ है इस कारण वो गोवा नहीं जा रहे हैं। जसवंत सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता भी किसी बहाने से गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए थे। 

नरेन्द्र मोदी के बढ़ते समर्थन को देखकर लालकृष्ण आडवाणी गोवा नहीं गए थे। कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन तक ये चर्चा चलती रही थी कि दिल्ली विमानतल पर विशेष विमान खड़ा है जो आडवाणी को लकर गोवा आएगा। आडवाणी नहीं आए और उनकी अनुपस्थिति में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। आडवाणी जी की नाराजगी बनी रही। घोषणा के अगले ही दिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देने की बात की। अपने पत्र में लालकृष्ण आडवाणी ने ये भी लिखा था कि पार्टी अपनी विचारधारा से हटती नजर आ रही है। इसके अधिकतर नेता अपना व्यक्तिगत एजेंडा चला रहे हैं। उस समय मीडिया के एक खास वर्ग ने इस विवाद को खूब हवा दी थी। गोवा प्रसंग की चर्चा सिर्फ इस कारण से ताकि पार्टी में नेतृत्व का कंट्रास्ट दिखाया जा सके। एक तरफ आडवाणी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार नहीं थे और उसको रोकने के तमाम प्रयास कर रहे थे। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही 49 वर्ष के अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने। अब 45 वर्ष के नितिन नवीन पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए हैं। भारतीय राजनीति में हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि मजबूत नेता किसी अन्य नेता को पनपने नहीं देता है। मजबूत नेता चाहता है कि  उसके बाद नेतृत्व शून्यता की स्थिति बने। इस संबंध में इंदिरा गांधी का उदाहरण दिया जाता रहा है कि जब भी कोई कांग्रेसी मजबूत होते दिखता था तो उसके पर कतर दिए जाते थे। ये बात उस तरह के मजबूत नेता पर लागू होती है जिसको अपनी जनप्रियता या साख पर भरोसा नहीं होता है। जिस भी नेता को अपनी काबिलियत पर, जनता के बीच अपनी साख पर भरोसा होगा वो अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयत्न करता है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में जीत का कीर्तिमान बनाया है। नोटबंदी से लेकर कोरोना काल में जिस प्रकार से जनता ने मोदी के निर्णयों का समर्थन किया उसको भी देखा जाना चाहिए। विरोधी दलों के नेताओं का और उनके समर्थक विश्लेषकों का आकलन था कि नोटबंदी के बाद के चुनाव में मोदी को पराजय का सामना करना पड़ेगा। ये भी कहा गया कि पूरी दुनिया में जिस भी नेता ने नोटबंदी लागू की उसको जनता ने अगले चुनाव में नकार दिया। मोदी के मामले में इसके उलट हुआ। मोदी और ताकतवर बनकर उभरे। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां भारतीय पार्टी को 282 सीटें मिली थीं वहीं नोटबंदी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 300 से अधिक सीटें जीकने में कामयाब रही। लोकतंत्र में जिसको जनता पसंद करती है वही सर्वमान्य नेता माना जाता है। 

एक बात और जो नितिन नवीन के चयन से स्पष्ट हुआ है वो ये कि भारतीय जनता पार्टी जात-पात की राजनीति का निषेध करने का प्रयास कर रही है। लंबे समय तक इस देश ने जाति आधारित राजनीति और उसपर ही आधारित चयन का दौर देखा है। किसी नेता को शीर्ष पद पर चुनने या मनोनयन के पहले उसकी जाति या उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि देखी जाती रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा भी कई राज्यों की राजनीतिक नियुक्तियों में जातिगत संतुलन का ध्यान रखा जाता रहा है। नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी से इसकी शुरुआत की है। नितिन नवीन कायस्थ जाति के हैं जिनके वोट उनके गृह प्रदेश में भी बहुत कम हैं। बावजूद इसके उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना देना, जातिगत राजनीति के निषेध की ओर बढ़ाए गए कदम की तरह देखा जा सकता है। सिर्फ नितिन नवीन ही क्यों बिहार में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को बनाया गया है। संजय सरावगी मारवाड़ी/वैश्य हैं और बिहार में मतदाता के लिहाज से मारवाड़ियों की संख्या बहुत नहीं है। बिहार में राजनीतिक नियुक्तियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि अमुक व्यक्ति यादव हैं या राजपूत हैं या कुर्मी हैं तो इनको महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। ताकि उश समुदाय के वोटरों को आकर्षित किया जा सके। ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं बल्कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में देखा जाता रहा है। 

कहना ना होगा कि मोदी युग में जिस तरह की राजनीति हो रही है वो स्वाधीन भारत की पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर है। इस युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीति विज्ञान के पुराने औजार से काम नहीं चलनेवाला है। जो पुराने राजनीतिकक सिद्धांत थे उसके आधार पर आकलन बहुधा गलत परिणाम देने लगे हैं। मोदी युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक विश्लेषकों को अब नए तरीके से सोचना होगा, नए आधार पर आकलन करना होगा। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी अपने निर्णयों से चौंकाते रहे हैं और कई बार जोखिम भरे निर्णय भी लेते हैं, इससे ये प्रतीत होता है कि उनको अपने मतदाताओं पर भरोसा है और मतदाताओं को भी उनपर विश्वास है कि उनके निर्णय देश और जनहित में ही होंगे।      


Saturday, December 27, 2025

धर्म-परंपराओ को अपनाना आवश्यक


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब भी हिंदू धर्म या हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो विपक्षी दल विशेषकर वामपंथी और उनका इकोसिस्टम उछलने लगता है। वो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करने लग जाते हैं। इसी तरह से जब प्रधानमंत्री मोदी हिंदू धर्म की बात करते हैं या हिंदू या सनातन धर्म के प्रतीकों को रेखांकित करते हैं तो कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल के नेता इसको धर्म और राजनीति का घालमेल बताने लग जाते हैं। संविधान और उसके अनुच्छेदों को उद्धृत करने लगते हैं। दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने में प्राणपन से जुट जाते हैं। जहां तक मुझे स्मरण है कि कुछ वर्षों पूर्व जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो एक रिपोर्ट आई थी जिसमें भारत में धार्मिक असहिष्णुता की बात की गई थी। अब तो अमेरिका में भी बदलाव की बयार देखने को मिल रही है। वहां खुल कर ईसाई धर्म की और उसकी रक्षा की विस्तार से बातें की जा रही है। पिछले दिनों अमेरिका में चार्ली किर्क की फ्रीडम टी शर्ट पहनने वाली एक महिला जेनी को जब सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया गया तो पूरे अमेरिका में उसके समर्थन की लहर दौड़ गई। देखते देखते जेनी के समर्थन में ढाई लाख डालर से अधिक की क्राउड फंडिंग हो गई। उनका अमेरिका फेस्ट के मंच पर अभिनंदन किया गया। चार्ली किर्क अमेरिका का दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता था जो अमेरिकी समाज की परंपराओं  को लेकर निरंतर मुखर रहता था। इस वर्ष उनकी हत्या कर दी गई थी। अमेरिका में चार्ली किर्क को परंपरावादी माना जाता था। राष्ट्रपति ट्रंप से उनके करीबी रिश्ते थे।

अभी क्रिसमस बीता है। क्रिसमस के पहले अमेरिका में कमला हैरिस का एक वक्तव्य खूब वायरल हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी रैली में कमला ने कहा था ‘हाउ डेयर यू विश क्रिसमस’। करीब 15 दिनों तक कमला हैरिस के इस वीडियो को चलाकर उनकी आलोचना की गई। प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य कमला हैरिस और उनकी पार्टी को धर्म विरोधी बताने का था। ऐसा इसलिए भी लगता है कि व्हाइट हाउस ने क्रिसमस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट किया, वी आर सेइंग मेरी क्रिसमस अगेन। इसके बाद क्रिसमस ट्री की फोटो और अमेरिका का झंडा लगया गया है। इस पोस्ट में क्रिसमस ट्री के आगे डोनाल्ड ट्रंप की फोटो थी और उनके आफिशियल हैंडल को टैग किया गया। इस पोस्ट को कमला हैरिस के लिए संदेश के तौर पर देखा गया। इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक्स हैंडल से जो पोस्ट किया वो और भी मारक है- ‘सभी को मेरी क्रिसमस। उन नीच रैडिकल लेफ्ट को भी जो अमेरिका को ध्वस्त करने के हर संभव प्रयास से जुड़े हुए हैं लेकिन बुरी तरह असफल हो रहे हैं। अब हमारी कोई सीमा खुली हुई नहीं है, पुरुष महिलाओं के वस्त्र में नहीं हैं और कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां कमजोर नहीं हैं। हमारा स्टाक मार्केट रिकार्ड स्तर पर है। महंगाई नहीं है। बीते कल हमारी जीडीपी 4.3 पर थी जो उम्मीद से दो प्वाइंट अधिक है। टैरिफ से खरबों डालर मिले जिससे हम समृद्ध हुए। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा उच्चतम स्तर पर है। पूरी दुनिया में हमारा सम्मान बढ़ा है। भगवान! अमेरिका पर कृपा बनाए रखें।‘ ट्रंप का ये एक्स पोस्ट पूरी तौर पर राजनीतिक है और क्रिसमस और भगवान को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कल्पना कीजिए अगर हमारे देश में प्रधानमंत्री मोदी या राष्ट्रपति इस तरह की पोस्ट लिख दें तो कैसा बवाल मचता। 

धर्म के नाम पर अमेरिका में इतना ही नहीं हो रहा है। व्हाइट हाउस ने 26 दिसंबर को राष्ट्रपति ट्रंप का एक वक्तव्य जारी किया जिसमें लिखा है कि आज रात को कमांडर इन चीफ के तौर पर मेरे निर्देश पर संयुक्त राज्य ने आई एस आई एस के नीच आतंकवादियों पर पूरी ताकत के साथ मारक हमला किया। ये वही आतंकवादी हैं जो पिछले कई दिनों से निर्दोष ईसाइयों पर हमला कर रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं। इस संदेश से ये स्पष्ट है कि पूरी दुनिया में अगर ईसाइयों पर कहीं हमला होगा तो अमेरिका उसमें प्रभावी हस्तक्षेप करेगा। इसकी एक पृष्ठभूमि है। दो नवंबर को ट्रंप ने नाइजीरिया सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर वहां की सरकार इस्लामिक आतंकवादियों को ईसाई जनता को मारने से नहीं रोकेगी तो हर तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ट्रंप ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था। अगर नाइजीरिया सरकार अपने देश में निर्दोष और मासूम ईसाइयों की हत्या नहीं रोकती है तो हमलावरों पर उससे अधिक त्वरा से हमला होगा जैसे आतंकवादी वारदात को अंजाम देते हैं। ये वही दौर था जब ईसाई समुदाय के लोगों ने ट्रंप से नाइजीरिया में ईसाइयों की हत्या को रोकने की मांग की थी। अमेरिका के इस कदम को अगर कूटनीतिक स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से बंग्लादेश में हिंदूओं पर हमले हो रहे हैं वैसे में भारत को हिंदुओं की रक्षा का अधिकार मिलता है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में कुटुंब प्रबोधन की बात कर रहा है। परिवार को जोड़ने और और परिवार की महत्ता पर बल देने का उपक्रम जारी है। इस कार्यक्रम से संघ विरोधियों के पेट में दर्द हो रहा है। कुछ लोग इसको आधुनिक सोच के विपरीत बताने में जुटे हैं। वो व्यक्तिगत अधिकारों और अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने के अधिकारों की बात करते हुए संविधान को बीच में लाते हैं। जबकि संविधान कहीं से भी कुटुंब का विरोधी नहीं है। कुछ दिनों पहले सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू दंपति को तीन बच्चा पैदा करने की सलाह दी थी। उस समय इसको लेकर खूब हंगामा हुआ । खुद को प्रगतिशील समझने और घोषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषकों ने मोहन भागवत की आलोचना की थी। अनेक प्रकार के तर्क दिए गए थे जबकि मोहन भागवत ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर कहा था कि जिस समुदाय में जन्म दर तीन से कम होते हैं वो विलुप्त हो जाते हैं। प्रगतिशील और आधुनिकता का दंभ भरनेवालों को अमेरिका को देखना चाहिए। वहां परिवार, शादी, बच्चे की महत्ता पर खूब चर्चा हो रही है। एलान मस्क और अमेरिका के उफराष्ट्रपति जे डी वांस अपने बच्चों के साथ ओवल आफिस में देखे जाते हैं। गर्व से वो परिवार की बात करते हैं। प्रेस सेक्रेट्री कैरोलिन लेविट जब गर्भवती होती है तो इसकी घोषणा होती है। वहां समलैंगिक अधिकारों या लिवइन का हो हल्ला अब नहीं मच रहा है। अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात हो रही है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं से तीन बच्चा पैदा करने की अपेक्षा कर रहा है तो न तो ये पुरातन सोच है और ना ही आधुनिकता विरोधी। आज वैश्विक स्तर पर अपनी परंपराओं और धर्म से जुड़ने का आग्रह बढ़ा है। इसको जो नहीं समझ पा रहे हैं वो हाशिए पर जा रहे हैं।    


Saturday, January 25, 2025

धर्म ध्वजा के वैश्विक वाहक राजनेता


अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में कई बातें अलक्षित रह गईं। शपथ ग्रहण के पहले एक्जूक्यिटिव आर्डर्स की इतनी चर्चा हो गई कि कुछ बातें नेपथ्य में चली गईं। दूसरा कारण ये रहा कि हमारे देश में खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों ने वर्षों से उन मुद्दों को चर्चा के लायक नहीं समझे जाने का जन मानस बनाने का काम किया। ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह को देखें तो पता चलता है कि वहां धर्म का कितना उपयोग था। दुनिया का सबसे विकसित और आधुनिक राष्ट्र अमेरिका में धर्म की कितनी महत्ता है। ट्रंप को शपथ दिलवाने के पहले ईश्वर की प्रार्थना की गई। ट्रंप ने शपथ के दौरान दो बाइबल का उपयोग किया और कहा कि ईश्वर मेरी मदद करें (सो हेल्प मी गाड)। शपथ ग्रहण के ओपनिंग इनवोकेशन के लिए न्यूयार्क के आर्क बिशप और प्रमुख कैथोलिक नेता टिमोथी डोलन ने बुक आफ विजडम से प्रार्थना की। बाइबिल और ईसा में आस्था रखने वाले ईवैनजैलिकल लीडर फ्रैंकलिन ग्राहम ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इतना ही नहीं समारोह में बैनेडिक्शन (आशीर्वाद) के लिए भी तीन प्रमुख धर्मगुरु वहां उपस्थित थे। न्यूयार्क के रब्बी अरि बमन ने अपनी प्रार्थना में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की बात की। डेट्रोएट के 180 चर्चों के वरिष्ठ पेस्टर लारेंजो सीवैल और ब्रुकलिन के कैथोलिक पुजारी भी वहां थे। सीवैले ने तो ट्रंप के कैंपेन के दौरान कैथोलिक मतदाताओं को उनकी प्राथमिकताओं के बारे में बताया भी था। 

ये बताना आवश्यक है कि मिशिगन के कर्बला इस्लामिक एडुकेशन सेंटर से जुड़े इमाम हुसैन अल-हुसैनी का नाम ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह के आमंत्रितों की सूची में था। वो समारोह में नहीं थे। उनकी अनुपस्थिति के जमकर कयास लगे क्योंकि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप का समर्थन किया था। शपथ ग्रहण के बाद ट्रंप ने जोरदार भाषण दिया। उस भाषण में ट्रंप ने दर्जन भर से अधिक बार भगवान (गाड) को ना सिर्फ याद किया बल्कि नियमित अंतराल पर ईश्वर से काम करने की शक्ति भी मांगी। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति का धर्म और ईश्वर के नाम पर काम करने की मंशा सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करना। आप पूरे अमेरिकी चुनाव को याद करिए जब खुलेआम चर्च और जीजस को याद किया जाता रहा। पराजित उम्मीदवार कमला हैरिस ने जब अपनी एक रैली में जीजस इज किंग का नारा लगानेवाले को कहा था कि आप गलत रैली में आ गए हैं। उनके इस बयान के मतदाताओं पर नकारात्मक प्रभाव की काफी चर्चा हुई थी। अगर ट्रंप के भाषण को विश्लेषित करें तो उन्होंने साफ तौर पर अमेरिका फर्स्ट का ना सिर्फ उद्घोष किया बल्कि उसके आधार पर ही नीतियां बनाने की घोषणा की। अब जरा हम अपने देश लौटते हैं। नरेन्द्र मोदी जब चुनाव प्रचार के दौरान प्रसून जोशी के लिखे गीत देश नहीं झुकने दूंगा की बात करते थे तो उनके आलोचक इसको भावना का ज्वार उभारनेवाले नारे के तौर पर देखते थे। ट्रंप ने तो खुलेआम राष्ट्रपति बनने के बाद संदेश दिया कि वो अमेरिका को किसी हाल में झुकने नहीं देंगे। 

याद करिए कि जब पिछले वर्ष जनवरी में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में नरेन्द्र मोदी परंपरागत हिंदू वेशभूषा में पूजा की थाल लेकर मंदिर में प्रवेश कर रहे थे तो कई विश्लेषक इसको चुनाव जीतने का उपक्रम करार दे रहे थे। राजनीति में धर्म के उपयोग को लेकर उनकी तीखी आलोचना हो रही थी। जो लोग मोदी की तब आलोचना कर रहे थे उनको अब ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में धर्म का उफयोग नहीं दिखाई दे रहा है। उनके मुंह सिले हुए हैं। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र सर्वप्रथम की बात करता है तो लोग संघ की इस सोच का आलोचना करते हैं । कई राजनीतिक दल तो यहां तक कहते हैं कि उनके लिए संविधान सर्वप्रथम है। ऐसा कहनेवाले ये भूल जाते हैं कि जब देश रहेगा तभी संविधान रहेगा। राष्ट्र को मजबूत करने के लिए संविधान बनाया गया है जहां सबको साथ लेकर समान अधिकार की बात की गई है। नरेन्द्र मोदी अगर किसी मंदिर में चले जाते हैं तो ये कहकर शोर मचाया जाता है कि वो हिंदू वोटरों को लुभाने या प्रभावित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अमेरिका में तो खुलेआम राष्ट्रपति पद के उम्मीदावर चर्चों में जाते हैं, प्रमुख धर्मगुरुओं का समर्थन लेने का प्रयास करते हैं। धर्म को राजनीति से अलग करने का जो विचार है वो दोषपूर्ण है। धर्म को अफीम कहकर प्रचारित करना और लोकतंत्र को धर्म विहीन बनाने की चेष्टा करना भी अनुचित है। अगर ऐसा उचित होता तो हमारे संविधान के निर्माताओं ने संविधान की मूल प्रति में धार्मिक प्रतीकों के अंकन की अनुमति नहीं देते। संविधान सभा के विद्वान सदस्य धर्म की महत्ता को समझते थे। इस कारण कई संवैधानिक संस्थाओं के ध्येय वाक्य भी धर्म से जुड़े हुए हैं। 

स्वाधीनता मिलने के बाद जवाहरलाल नेहरू के संरक्षण में धर्मविहीन राजनीति या धर्म को अफीम कहनेवाली विचारधारा ने जोर पकड़ा। धर्म की गलत व्याख्या करके जनता के मन में संदेह का बीजारोपण किया गया। जो अब वृक्ष बन चुका है। स्वाधीनता के संघर्ष के दौरान ऐसी स्थिति नहीं थी। तब धर्म और राजनीति को लेकर नेताओं के मन में किसी तरह का संशय नहीं था। अरविंदो घोष ने 1908 में लिखा था, राष्ट्रवाद एक ऐसा धर्म है जो सीधे ईश्वर से आया है। अगर आप राष्ट्रवादी बनने जा रहे हैं, राष्ट्रवादी विचार को स्वीकार करते हैं तो आपको इसके धार्मिक स्वरूप को ही अंगीकार करना होगा। आपको ये याद रखना होगा कि आप ईश्वर के कार्य करने का माध्यम हैं। वो इतने पर ही नहीं रुके थे। 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा के अपने प्रसिद्ध उद्बोधन में अरविंदो ने कहा था कि, मैं ये नहीं कहता कि राष्ट्रवाद एक धर्म है, एक विश्वास है, बल्कि मैं तो ये कहता हूं कि सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रवाद है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी राजनीति में हिंदू धर्म प्रतीकों के उपयोग को सही करार दिया था। बंकिम ने भी अपने लेखों में हिंदू धर्म की बात की। लाला लाजपत राय से लेकप बिपिन चंद्र पाल ने भी धर्म को राजनीति से अलग करके नहीं देखा। अरविंदो घोष से लेकर पाल तक ने अपने भाषण और लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों का उल्लेख करके भारत की जनता को एकजुट होने का संदेश दिया था। इतिहासकार बिपान चंद्र ने अपनी पुस्तक कम्युनिलज्म इन मार्डन इंडिया में देश के स्वाधीनता सेनानियों के बारे में लिखा है, ‘आरंभिक दिनों में क्रांतिकारी उग्रवादी गीता और काली की शपथ लेते थे और हिंदू विचार को क्रांतिकारी समझते थे।‘ ये पुस्तक लंबे समय से रेफरेंस पुस्तक के तौर पर पढ़ी जा रही है। इसको पढकर छात्र प्रशासनिक अफसर बन रहे हैं।  बिपान चंद्रा ये नहीं बता पाए कि इसमें गलत क्या था। इंटलैक्चुअल रोहिंग्याओं को ये भी बताना चाहिए कि इसमें गलत क्या है कि प्रधानमंत्री मोदी धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़कर देखते हैं। इस पर तो देशव्यापी बहस होनी चाहिए। ट्रंप के शपथ ग्रहण ने तो इस बहस का आधार भी दे दिया है। 


Saturday, January 11, 2025

पांडुलिपि मिशन को मिले जीवनदान


महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने पांच भारतीय भाषाओं को क्लासिकल भाषा की श्रेणी में लाने का निर्णय लिया था। ये पांच भाषाएं हैं मराठी, बंगाली, पालि, प्राकृत और असमिया। इन भाषाओं में हमारे देश में प्रचुर मात्रा में ज्ञान संपदा उपलब्ध है। पालि और प्राकृत में तो हमारे इतिहास की अनेक अलक्षित अध्याय भी हैं जिनका सामने आना शेष है। हमारे देश की ऐतिहासिक ज्ञान संपदा कई मठों और बौद्ध विहारों के अलावा जैन मतावलंबियों के मंदिरों में रखी हैं। इनमें से अधिकतर पांडुलिपियां पालि और प्राकृत में हैं। प्रधानमंत्री मोदी इन भाषाओं को क्लासिकल भाषा की घोषणा से आगे जाकर पांडुलिपियों में दर्ज ज्ञान संपदा को आम जनता तक पहुंचाना चाहते हैं। बुद्ध के बारे में तो प्रधानमंत्री राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर निरंतर बोलते रहते हैं। हाल ही में प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुद्ध और उनके सिद्धातों के बारे में चर्चा की थी। भगवान बुद्ध ने जो ज्ञान दिया है उसको वैश्विक स्तर पर पहुंचाने का कार्य होना शेष है। प्रधानमंत्री के निर्णय के बाद पालि को लेकर थिंक टैंक श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन ने सक्रियता दिखाई और देश के कई हिस्से में गोष्ठियां आदि करके उसको मुख्यधारा में लाने की पहल आरंभ की है। इन गोष्ठियों में भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की भागीदारी ये स्पष्ट है कि इस कार्य में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सहमति और स्वीकृति दोनों है।  प्रधानमंत्री की अपने देश की ज्ञान संपदा को आमजन तक पहुंचाने के लिए सबसे कारगर तरीका तो यही लगता है कि राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को फिर से सक्रिय किया जाए।

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का आरंभ अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्रित्व काल में 2003 में किया गया। मिशन के गठन के करीब सालभर बाद अटल जी की सरकार चली गई। केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बनी। मिशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ‘इस परियोजना के माध्यम से मिशन का उद्देश्य भारत की विशाल पाण्डुलिपीय सम्पदा को अनावृत करना और उसको संरक्षित करना है। भारत लगभग पचास लाख पाण्डुलिपियों से समृद्ध है जो संभवत: विश्व का सबसे बड़ा संकलन है| इसमें सम्मिलित हैं अनेक विषय, पाठ संरचनाएं और कलात्मक बोध, लिपियां, भाषाएं, हस्तलिपियां, प्रकाशन और उद्बोधन| संयुक्त रूप से ये भारत के इतिहास, विरासत और विचार की ‘स्मृति’ हैं। ये पाण्डुलिपियां अनेक संस्थानों तथा निजी संकलनों में प्राय: उपेक्षित और अप्रलेखित स्थिति में देशभर में और उसके बाहर भी बिखरी हुई हैं| राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन का उद्देश्य अतीत को भविष्य से जोड़ने तथा इस देश की स्मृति को उसकी आकांक्षाओं से मिलाने के लिए इन पाण्डुलिपियों का पता लगाना, उनका प्रलेखन करना, उनका संरक्षण करना और उन्हें उपलब्ध कराना है|’  इस मिशन की वेबसाइट पर ही इसके कार्यों का लेखाजोखा भी उपलब्ध है। उसको देखकर सहज ही ये अनुमान लगाया जा सकता है कि मिशन बस चलता रहा है। कोई उल्लेखनीय कार्य हुआ हो ये ज्ञात नहीं हो सका है। अभी कुछ वर्षों पहले तो सांस्कृतिक जगत में ये चर्चा थी संस्कृति मंत्रालय इस मिशन को बंद करना चाहती है। पता नहीं किन कारणों से इस मिशन को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से जोड़ने का निर्णय हुआ। जब मिशन को कला केंद्र से जोड़ा गया तो माना गया था कि वहां इसके उद्देश्यों को पूरा करने को गति मिलेगी। कला केंद्र के पुस्तकालय में भी पांडुलिपियों का खजाना है। देशभर के 52 पुस्तकालयों से इन पांडुलिपियों की माइक्रो फिल्म बनाकर यहां रखा गया है। इन पांडुलिपियों में गणित, अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र शामिल हैं। इसके अलावा कला केंद्र की लाइब्रेरी में एक लाख के करीब स्लाइड्स हैं जिसपर देश की विविध परंपराओं की झलक देखी जा सकती हैं। देश भर के स्मारकों या ऐतिहासिक इमारतों की तस्वीरें भी यहां हैं। कलानिधि संदर्भ पुस्तकालय अपने आप में अनोखा है। यहां किताबें तो हैं ही एक सांस्कृतिक आर्काइव भी है। पर यहां से जुड़ने के बाद भी मिशन गतिमान नहीं हो सका। बताया जाता है कि संस्कृति मंत्रालय ने मिशन को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से जोड़ तो दिया पर उसको गतिमान करने के लिए जो आर्थिक संसाधन नहीं दिए। परिणाम वही हुआ जो बिना अर्थ के किसी संस्था का होता है। 

अब प्रधानमंत्री की रुचि को देखते हुए एक बार फिर से राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को सक्रिय करने का प्रयास संस्कृति मंत्रालय कर रहा है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अकाउंट्स को अस्थायी रूप से साहित्य अकादमी को दिया गया है। साहित्य अकादमी को निर्देश दिया गया है कि वो राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के खर्चों का हिसाब किताब रखे। बिलों का भुगतान आदि करे। इस निर्णय के पीछे की मंशा क्या हो सकती है पता नहीं। साहित्य अकादमी को पूरा देश सृजनात्मकता के केंद्र के रूप में जानता है, संस्कृति मंत्रालय इसको लेखा विभाग के लिए भी उपयुक्त समझता है। इन दिनों संस्कृति मंत्रालय अपने अजब-गजब फैसले के लिए भी जाना जाने लगा है। कभी अपने से संबद्ध संस्थाओं के चेयरमैन के स्तर को लेकर जारी फरमान तो कभी राजा राममोहन राय मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में एक अस्थायी अफसर को हटाकर दूसरे अस्थायी अफसर को दायित्व देने को लेकर । मंत्रालय को जो ठोस कार्य करने चाहिए उस ओर वहां कार्यरत अफसरों का ध्यान ही नहीं जा पा रहा है। राजा राममोहन राय मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में नियमित महानिदेशक की नियुक्ति, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में नियमित चेयरमैन की नियुक्ति जैसे कार्यों पर ध्यान है कि नहीं, पता नहीं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंडिया गेट के पास अमृत वाटिका की बात की थी। इस वाटिका में मेरी माटी, मेरा देश के दौरान जमा की गई मिट्टी को रखा जाना था। देशभर से कलश में मिट्टी लेकर लोग दिल्ली में जुटे थे। भव्य कार्यक्रम हुआ था। तब इस तरह की खबर आई थी गृहमंत्री अमित शाह ने अमृत वाटिका के लिए जगह देखने के लिए उस इलाके का दौरा भी किया था। अब पता नहीं कहां हैं वो मिट्टी भरे कलश और कहां बन रही है अमृत वाटिका। संस्कृति मंत्रालय को इस बारे में बताना चाहिए। 

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को अगर संस्कृति मंत्रालय के वर्तमान अधिकारियों के भरोसे छोड़ा गया तो उसका परिणाम क्या होगा इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। जो अफसर संस्कृति और संस्कृति से जुड़े मुद्दों की संवेदना को नहीं समझ सकते वो पांडुलिपियों में संचित ज्ञान को लेकर संवेदनशील होंगे इसपर संदेह है। दूसरी जो चिंता योग्य बात ये है कि जब मंत्रालय के अफसर प्रधानमंत्री की रुचि वाली योजनाओं को लेकर बेफिक्र रहते हैं तो वो किसकी सुनते होंगे, कहा नहीं जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को मिशन की तरह चलाया जाए और उसको किसी योग्य व्यक्ति के हाथों में सौंपा जाए। संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत अपने स्तर पर इस कार्य. को पटरी पर लाने में विशेष रुचि लें ताकि भारत का जो इतिहास वर्षों से सामने नहीं आ पाया है वो सामने आ सके और लोग उसपर गर्व कर सकें। प्रधानमंत्री मोदी के पंच-प्रण की पूर्ति की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।   


Saturday, December 7, 2024

सरकार तुम्हारी सिस्टम हमारा का सच


पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुस्तकालयों की महत्ता को रेखांकित किया था। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि माना जाता है कि पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। इस दोस्ती को मजबूत करने के लिए सबसे अच्छी जगह पुस्तकालय है। इस क्रम में उन्होंने चेन्नई से लेकर देश के अन्य हिस्सों में स्थापित पुस्तकालयों का ना केवल उल्लेख किया बल्कि उसको रचनात्मकता के केंद्र के रुप में विकसित करने पर बल भी दिया। इसी क्रम में प्रधानमंत्री ने बिहार के गोपालगंज के प्रयोग पुस्तकालय की भी चर्चा की। इस पुस्तकालय की चर्चा से आसपास के जिलों में उत्सुकता का वातावरण बना है। प्रयोग पुस्तकालय जिले के 12 गावों के युवाओं को पढ़ने की सुविधा उपलब्ध करवा रहा है। प्रधानमंत्री ने पुस्तकालयों को ज्ञान के केंद्र में रूप में भी रेखांकित किया और लोगों को पुस्तकों से दोस्ती करने का आह्वान भी किया। उनका मानना है कि पुस्तकों से दोस्ती करने पर आपकी जिंदगी बदल सकती है। इसके पहले अपने गुजरात के अपने लोकसभा चुनाव क्षेत्र गांधीनगर के एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने भी पुस्तकालयों को समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने पुस्तकालयों के प्रभारियों के साथ एक बैठक भी की। अमित शाह ने कहा कि देश के भविष्य को संवारने में पुस्तकालयों की बड़ी भूमिका है। गृहमंत्री ने अपने लोकसभा क्षेत्र के सभी पुस्तकालों को दो -दो लाख रुपए देने की भी घोषणा की। उन्होंने पुस्तकालयों को आधुनिक बनाने पर बल देते हुए कहा कि तकनीक के उपयोग को बढ़ाकर व्यक्तिगत रुचियों के आधार पर पुस्तकें उपलब्ध करवाई जा सकती हैं। अमित शाह ने प्राचीन ग्रंथों को आनलाइन उपलब्ध करवाने का भी आग्रह किया। इसके पहले राष्ट्रपति ने भी पुस्तकालयों को लेकर अपनी अपेक्षा जाहिर की थी। 

प्रधानमंत्री ने 24 नवंबर 2024 को मन की बात कार्यक्रम में पुस्तकालयों पर अपनी राय रखी और अगले ही दिन यानि 25 नवंबर को संस्कृति मंत्रालय ने अपने एक आदेश के जरिए कोलकाता स्थित राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में एक प्रभारी को मुक्त करके दूसरे प्रभारी की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया। नेशनल लाइब्रेरी के महानिदेशक ए पी सिंह को राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का छह महीने या नियमित नियुक्ति जो भी पहले हो, तक प्रभार दे दिया गया। ये आदेश संस्कृति मंत्री के अनुमोदन के बाद जारी किया गया। 24 नवंबर को प्रधानमंत्री का लाइब्रेरी पर बोलना और 25 नवंबर को राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक के प्रबार संबंधित आदेश जारी होना एक संयोग हो सकता है, लेकिन संयोग सुखद है। फिर वही प्रश्न कि प्रभारियों के जरिए सांस्कृतिक संस्थाओं का काम कब तक चलता रहेगा। पता नहीं कब से राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक पर नियमित अधिकारी नहीं हैं। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन देश में पुस्तकालयों की नोडल संस्था है। उसका ये हाल है तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की पुस्तकालयों को लेकर देखे जा रहे स्वप्न का क्या होगा इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है। प्रभारी तो बस संस्था को चलायमान रख सकते हैं। उनसे किसी नवाचार, किसी नए प्रकल्प की आशा व्यर्थ है। उनका प्राथमिक दायित्व तो अपनी मूल संस्था के प्रति होता है। पुस्तकालयों की नोडल संस्था में नियमित महानिदेशक का नहीं होना संस्कृति मंत्रालय के क्रियाकलापों पर बड़े प्रश्न खड़े करता है। 

राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को लेकर संस्कृति मंत्रालय कितनी गंभीर है इसको इस घटना से भी समझा जा सकता है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के सदस्यों की एक बैठक करीब दो वर्ष बाद 25 सितंबर 2024 को हुई। नवनियुक्त सदस्यों की ये पहली बैठक थी। इस बैठक में पिछले वर्ष के निर्णयों का अनुमोदन होना था। फाउंडेशन पुस्तकों की खरीद भी करता है। इस बैठक में पुस्तकों की सूची अनुमोदन के लिए आई तो कुछ सदस्यों ने उसपर आपत्ति जताई। संस्कृति मंत्री इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने इस मसले को देखने का आश्वासन दिया। आश्वासन तो इस बात का भी दिया गया था कि पुस्तकों की सरकारी खरीद के नियमों को पारदर्शी बनाया जाए। मजे की बात ये रही कि बैठक को दो महीने से अधिक समय बीत गया लेकिन इसका मिनट्स अबतक सदस्यों के पास नहीं पहुंचा है। जब मिनट्स ही नहीं बना तो बैठक में लिए गए निर्णयों का क्या हुआ होगा, इसकी जानकारी की अपेक्षा तो व्यर्थ ही है। दरअसल फिल्म द कश्मीर फाइल्स का वो संवाद बेहद सटीक है, सरकार भले ही तुम्हारी है लेकिन सिस्टम तो हमारा ही चलता है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार भले ही 11 वर्षों से चल रही है लेकिन सिस्टम में बहुत बदलाव आ गया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। 

सिस्टम के नहीं बदलने का ही एक और उदाहरण है। कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के नियमों में सख्ती। बताया जा रहा है कि सख्ती के बाद कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम सीएसआर के अंतर्गत नहीं आ सकता। अगर कोई शास्त्रीय गायन या नृत्य के कार्यक्रम का आयोजन करता है तो उसको सीएसआर के अंतर्गत नहीं माना जाएगा। पहले साहित्य, कला और संस्कृति के आयोजन इस योजना के अंतर्गत आते थे। अब साहित्य को लेकर नियम इतने कड़े कर दिए गए हैं कि किसी कार्यक्रम में पुस्तकों का वितरण बेहद कठिन हो गया है। कल्पना कीजिए कि समाज के पढ़े लिखे लोगों के बीच एक पुस्तक चर्चा रखी गई। लेखक से पुस्तक पर चर्चा करने के बाद आमंत्रित सदस्यों को उनकी पुस्तक भेंट की जाती थी। पहले ये पूरा कार्यक्रम सीएसआर के अंतर्गत आता था और खर्चे की औपचारिकताएं बिल आदि जमा कर पूरी कर ली जाती थीं। अब ये कर दिया गया है कि जो भी किसी वस्तु का एंड यूजर होगा यानि कि जिसको भी आयोजक संस्था की ओर पुस्तक भेंट की जाएगी उसका नाम और फोन नंबर आयोजक को संबंधित सरकारी विभाग के पास जमा करना होगा। सायकिल वितरण में तो इस तरह का प्रविधान उचित है लेकिन साहित्यिक कार्यक्रमों में पुस्तक वितरण में ये बाधा है। स्कूलों में पुस्तक वितरण में तो ये दायित्व स्कूल उठा लेते हैं। ये सहजता के साथ संपन्न हो जाता है, लेकिन आयोजनों में एक किताब गिफ्ट देने पर फार्म भरवाना कठिन सा होता है। ये व्यावहारिक दिक्कतें हैं। पिछले 10 वर्षों में अधिक पुस्तकें तो भारतीय विचार और विचारधारा की प्रकाशित हो रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके कार्यों पर प्रकाशित हो रही हैं। प्रश्न ये उठता है कि क्या ईकोसिस्टम भारतीय विचार के पुस्तकों के पाठकों तक पहुंच में नियमों के जरिए बाधा खड़ी कर रहा है। सीएसआर के नियमों में पुस्तकों को लेकर उदारता बरतनी चाहिए। नियम बनाने वालों को इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सोच को और विजन को अमली जामा पहनाया जा सके। लोगों और पुस्तकालयों तक पुस्तकें पहुंचे इसके लिए आवश्यक है कि संस्कृति मंत्रालय पुस्तकालयों की नोडल संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को सक्रिय करे। प्रतिवर्ष नए और उच्च स्तर की पुस्तकें खरीद कर पुस्तकालयों में भेजी जाएं। संस्थाओं को प्रभारियों से मुक्त करके नियमित नियुक्ति की जाए ताकि जो भी व्यक्ति वहां नियुक्त हो उसकी प्राथमिकता में पुस्तकालयों की बेहतरी हो। 

Saturday, November 9, 2024

अनौपचारिक चर्चा में उठते गंभीर प्रश्न


वर्षों बाद मित्रों से मिलने दिल्ली विश्वविद्यालय जाना हुआ। विश्वविद्यालय के पास विजयनगर की चाय दुकान पर मिलना तय हुआ। ये वही ठीहा है जहां छात्र जीवन में मित्रों के साथ बैठकी होती थी। पुराने दिनों को याद करने और कालेज के जमाने के मित्रों से मिलने का अवसर था। उत्साहित होकर हम सब विजयनगर वाली चाय दुकान पर जुटे। हम छह मित्र थे। वहीं फुटपाथ पर बैठकर छात्र जीवन को याद करने लगे। हमने तय किया था कि राजनीति पर बात नहीं करेंगे। ऐसा संभव नहीं हो सका। आधे पौने घंटे तक दिल्ली विश्वविद्यालय की बातें होती रहीं। इसके बाद बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति तक पहुंच गई। मैंने कहा कि ये मोदी सरकार का शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल सुधार करने का बड़ा और ऐतिहासिक कदम है। 1986 के बाद शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया था। हमारी शिक्षा व्यवस्था विदेशी भाषा और विदेशी शैक्षणिक तौर तरीकों में उलझी हुई थी। अब अकादमिक जगत के चर्चा के केंद्र में भारतीय ज्ञान परंपरा है। कोई भी सेमिनार या गोष्ठी ऐसी नहीं जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा की बात न हो। स्वाधीनता के बाद पहली बार शिक्षा का भारतीयकरण हो रहा है। मेरे दो मित्र ने सहमति जताई। उसमें से एक ने मेरी बातों में ये जोड़ा कि शिक्षा का ना केवल भारतीयकरण हो रहा है बल्कि विद्यार्थियों और शिक्षकों के मानस में भी परिवर्तन हो रहा है। वो अभी ये बातें कह ही रहा था कि एक मित्र ने हस्तक्षेप किया। उसने कहा कि शिक्षा नीति तो ठीक है, ऐतिहासिक भी है, इससे भारतीयकरण भी हो रहा है, चर्चा भी हो रही है लेकिन इसका क्रियान्वयन बहुत धीरे हो रहा है। मेरा तर्क था कि संभव है कि क्रियान्वयन धीमा हो पर बदलाव में समय तो लगता है। ये कोई सामान नहीं है कि एक को हटाकर उसकी जगह दूसरा रख दिया जाए। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति कि चर्चा में अब राजनीति भी आ गई। एक मित्र, जो शिक्षक संगठन में सक्रिय हैं, अबतक ब्रेड पकौड़ा खा रहे थे। पकौड़े से फारिग होते ही हमारी चर्चा में घुसे और आक्रामक तरीके से बोले कि चार वर्ष बीत गए अबतक पाठ्यक्रम तो बना नहीं पाए। लागू कैसे करेंगे। उनके पास काफी जानकारी थी। उन्होंने कहा कि अभी दिल्ली में शिक्षाविदों की दो दिन की बैठक हुई है जिसमें पाठ्यक्रम बनाने को लेकर चर्चा हुई। उस बैठक में भी इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि पाठ्यक्रम कब तक तैयार हो पाएगा। पुस्तकों की बात तो बाद की है। कांग्रेस तो 2004 में सत्ता में आई थी और 2006 तक सारे पुस्तकों में बदलाव करके अपने अनुकूल सामग्री लागू कर दी थी। यहां तो चार साल में चले ढाई कोस वाली बात है। इसका प्रतिरोध एक अन्य मित्र ने जोरदार तरीके से किया। उसका कहना था कि कांग्रेस के पास एक ईकोसिस्टम था जिसने सबकुछ आनन फानन में कर दिया। इसपर पहले वाले मित्र ने कहा कि दस वर्ष से अधिक हो गए ईकोसिस्टम नहीं बना पाए भाजपा वाले। मेरा तर्क था कि दस और साठ वर्ष में अंतर होता है, इसको समझना होगा। मेरी इस बात पर वो चुप तो हो गया लेकिन बड़बड़ाता रहा कि जब गलत लोगों का चयन करोगो, अपने लोगों पर भरोसा नहीं करोगे, काम नहीं दोगे तो सिस्टम बनेगा कैसे। खैर बातचीत खत्म हो गई। हम सबने फिर से चाय पीने का मन बनाया। चाय आ गई। 

मित्रगण एक दूसरे से मजे भी ले रहे थे। इसमें से दो मित्र बाहर से आए थे। वो दोनों प्रोफेसर हैं। अचानक से विश्वविद्यालय की बात आरंभ हुई। इस बात पर चर्चा होने लगी कि आजकल शिक्षकों के मजे हैं। शिक्षकों के लिए सुविधाएं बहुत हो गई हैं। वो दोनों सहमत थे। ये भी बताया गया कि शिक्षा के क्षेत्र में अब संसाधनों की कमी नहीं है। क्लासरूम बेहतरीन हो गए हैं। चर्चा चल ही रही थी कि एक मित्र ने चुटकी ले ली। सुविधाएं तो अपार हैं समय भी खूब है। क्लास तो लेनी नहीं है। इसपर दोनों भड़क गए। कहने लगे कि हमें जितना काम करना पड़ता है उसकी कल्पना भी बाहर वालों को नहीं है। फिर वो लोग आपस में वर्कलोड आदि की बातें करने लगे। इतने में पहले वाले मित्र जो शिक्षक राजनीति में सक्रिय हैं फिर से टपक पड़े। बोले शिक्षकों के मजे तो होंगे ही। जब 56 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों में कुलपति नहीं होंगे तो मजे को कौन रोक सकता है। कामचलाऊ व्यवस्था में तो हर कोई मजे लूटता है। उसकी बात काटते हुए मैंने कहा कि कुलपति चयन की प्रक्रिया में समय तो लगता है। हो जाएगा। हमारे देश में चुनाव भी तो चलते रहते हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान जी चुनाव प्रबंधन के माहिर हैं। पार्टी उनका उपयोग करती है। कुछ विलंब हो गया होगा। इसको इस तरह से पेश करना गलत है। उसने पलटकर विश्वविद्यालयों के नाम गिनाने शुरू कर दिए। वर्धा का हिंदी विश्वविद्यालय, लखनऊ का अंबेडकर विश्वविद्ययालय, गढ़वाल का केंद्रीय विश्वविद्यालय, बंगाल का विश्वभारती विश्वविद्यालय, सिक्किम, अरुणाचल, पुडेचेरी आदि के केंद्रीय विश्वविद्यालय बगैर कुलपति के चल रहे हैं। धमकाने के अंदाज में बोला कि सूची लंबी है कहो तो पूरी गिनाऊं। कुछ विश्वविद्ययालयों के कुलपति का कार्यकाल अभी से लेकर जनवरी तक समाप्त हो जाएगा। बात आगे ना बढ़े इसलिए उसको बदलने का प्रयास करते हुए कहा कि यार तुम तो प्रक्रियागत देरी पर राजनीति करने लग गए। वो माना नहीं कहा कि शिमला के उच्च अध्ययन संस्थान में 2021 से नियमित निदेशक नहीं है। मैं इसका तुरंत उत्तर नहीं दे पाया। 

चर्चा वहीं पहुंच गई जिसको लेकर हम सभी आरंभ से आशंकित थे। अब बारी हमारे दो शिक्षक मित्रों की थी। वो इन तर्कों से सहमत नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की तरह बीजेपी अपने लोगों को भरने की जगह प्रतिभा को प्राथमिकता देती है। कांग्रेस की तरह भाई-भतीजावाद से पद भरने में इस सरकार की रुचि नहीं है। जब से प्रधानमंत्री मोदी ने पद संभाला है उन्होंने इस बात पर सबसे अधिक बल दिया है कि प्रतिभा को किसी भी तरह से हाशिए पर ना रखा जाए। योग्य व्यक्ति को पद मिले। चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो या विज्ञान का या कला का। कांग्रेस के ईकोसिस्टम को जब भी चुनौती मिलती है तो वो इसी तरह से बिलबिलाने लगते हैं। धर्मेन्द्र प्रधान और उनके पहले के शिक्षा मंत्रियों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर बहुत मेहनत की है। उसको समावेशी बनाने के लिए हजारों लोगों की राय ली गई थी। दिनकर का नाम तो सुना होगा। संस्कृति के चार अध्याय में उन्होंने कहा है कि विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है। जब शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक बदलाव की बात हो रही है तो उसमें विलंब तो होगा ही। दोनों मित्रों की आक्रामकता देखकर आलोचना करनेवाला मित्र चुप तो हो गया लेकिन फिर धीरे से बोला अगर विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान नेतृत्वविहीन रहेंगी तो बदलाव में संदेह है। इतनी गर्मागर्मी हो गई कि अगली बार मिलने की तिथि नियत न हो सकी। हम घर की ओर चल पड़े।        


Saturday, June 15, 2024

अहंकार के छद्म विमर्श से राजनीति


अहंकार। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद इस शब्द पर काफी चर्चा हो रही है लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान एरोगेंट शब्द की चर्चा थी। केंद्र सरकार के मंत्रियों की बात हो या फिर भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की। आसानी से उनके स्वभाव के साथ एरोगेंट शब्द चिपका दिया जाता था। एरोगेंट से अगली कड़ी के रूप में अहंकार आया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को अहंकारी कहा गया। अमेठी में स्मृति इरानी की चुनावी हार को उनके अहंकार से जोड़ा गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब संसद में एक अकेला सब पर भारी बोला था तभी से उनके साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का अभियान विपक्षी दलों और उनके इकोसिस्टम ने चलाया। एक प्रधानमंत्री के तौर पर जब वो अपने विकास कार्यों को गिनाते थे, अपने संबोधन में मैं का प्रयोग करते थे तो इस मैं को भी एरोगेंट के कोष्ठक में डाल दिया जाता था। इकोसिस्टम से जुड़े विश्लेषकों ने मोदी के भाषणों के चुनिंदा अंश को उठाकर उनके व्यक्तित्व के साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल खेला। यह अभियान लंबे समय से चल रहा था। चुनाव के दौरान इसमें तेजी आई। इसी तरह स्मृति इरानी के व्यक्तित्व के साथ भी एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल चला। कभी किसी सरकारी अधिकारी को जनता के पक्ष में काम करने को लेकर उनके संवाद के अंश काटकर तो कभी किसी पत्रकार को उनके उत्तर को एरोगेंट कहा गया। चुनाव में जब अमेठी गया था तो वहां पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या हो गई थी। उस इलाके के प्रभावशाली लोग हत्या के आरोपी को बचाने में लगे थे। स्मृति इरानी को जब पता चला तो वो पीड़ित के पक्ष में खड़ी हो गईं। हत्यारोपी के विरुद्ध कानून सम्मत कार्य करने के लिए पुलिस को कहा। तब उस इलाके के प्रभावशाली लोगों ने कहा कि स्मृति एरोगेंट हो गई है और किसी की नहीं सुनती। इसको इकोसिस्टम ने आगे बढ़ाया।

चुनाव परिणाम में जब भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सबसे बड़े दल और चुनाव पूर्व गठबंधन के तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत मिला और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बन गई। मंत्रिमंडल का गठन हो गया। मंत्रिमंडल गठन के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कार्यकर्ता विकास वर्ग के अपने संबोधन में अपनी बातें रखीं। उसमें भी अहंकार शब्द का प्रयोग किया गया। फिर क्या था इकोसिस्टम को मसाला मिल गया। उसको नरेन्द्र मोदी को नसीहत के तौर पर पेश किया जाने लगा। पृष्ठभूमि बनाई ही जा चुकी थी। सरसंघचालक के बयान से निकलनेवाले संदेश को समझना है तो उसको समग्रता में देखना होगा। पहले बात कर लेते हैं अहंकार की। सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कहा, जो सेवा करता है, जो वास्तविक सेवक है, जिसको वास्तविक सेवक कहा जा सकता है उसको कोई मर्यादा रहती है यानी वो मर्यादा से चलता है। काम सब लोग करते हैं, लेकिन कार्य करते समय मर्यादा का पालन करना। जैसा कि तथागत ने कहा है—कुशलस्य उपसंपदा, यानी अपनी आजीविका पेट भरने का काम सबको लगा ही है, करना ही चाहिए। अपने शरीर को भूखा नहीं रखना है, लेकिन कौशल पूर्वक जीविका कमानी है और कार्य करते समय दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। ये मर्यादा भी उसमें निहित है। ऐसी मर्यादा रखकर हम लोग काम करते हैं। काम करने वाला उस मर्यादा का ध्यान रखता है। वो मर्यादा ही अपना धर्म है, संस्कृति है। जो पूज्य महंत गुरुवर्य महंत रामगिरी जी महाराज जी ने अभी बहुत मार्मिक कथाओं से थोड़े में बताई, उस मर्यादा का पालन करके जो चलता है, कर्म करता है, कर्मों में लिप्त नहीं होता, उसमें अहंकार नहीं आता। वही सेवक कहलाने का अधिकारी रहता है।

उपर्युक्त वक्तव्य में से अगर सिर्फ अंतिम वाक्य को निकालकर उसको नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार के मंत्रियों के क्रियाकलापों और व्यवहार से जोड़ दिया गया। सरसंघचालक ने अपने वक्तव्य के इस हिस्से में सेवा और मर्यादा की बात की। इसके लिए उन्होंने तथागत और महंत रामगिरी जी को उद्धृत किया। इसमें राजनीति की बात तो कहीं है नहीं, समाज सेवा की बात है जो वो संघ शिक्षा वर्ग के प्रतिभागियों को समझा रहे हैं। इसी तरह से मणिपुर को लेकर उनकी चिंता भी समाज की चिंता है। जब वो कहते हैं कि समाज में जगह-जगह कलह नहीं चलता। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल शांत रहा। ऐसा लगा कि पुराना ‘गन कल्चर’ समाप्त हो गया। परन्तु अचानक जो कलह वहां पर उपज गई या उपजाई गई, उसकी आग में वह अभी तक जल रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है। कौन उस पर ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना हमारा कर्तव्य है। इकोसिस्टम के लोग इस अंश को लेकर भी मोदी पर हमलावर होने का प्रयास करते नजर आ हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह जा रहे हैं कि संघ प्रमुख ने पहली बार मणिपुर की स्थिति पर अपनी बात रखी है। दरअसल ऐसे लोगों को संघ की कार्य करने की पद्धति का अल्पज्ञान है। मोहन भागवत ने 2023 के विजयदशमी के अपने भाषण में भी मणिपुर के हालात पर चिंता प्रकट की थी। इसके बाद संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने मणिपुर पर बयान जारी किया था। संघ निरंतरता में मणिपुर की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट कर रहा है। इसको मोदी की आलोचना करार देना इकोसिस्टम की राजनीतिक चाल है।

संघ प्रमुख के बयान को आंशिक रूप से उद्धृत कर संघ और भाजपा में काल्पनिक टकराव बतानेवाले विश्लेषक यह भूल जा रहे हैं कि मोहन भागवत ने अपने भाषण में मोदी सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वो कहते हैं कि पिछले दस वर्षों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। आधुनिक दुनिया जिन मानकों को मानती है, जिनके आधार पर आर्थिक की स्थिति का मापन किया जाता है उनके अनुसार भी हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो रही है। हमारी सामरिक स्थिति निश्चित रूप से पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इतनी स्पष्टता के बावजूद अगर विपक्ष को उस बयान पर राजनीति ही करनी है तो उनको मोहन भागवत के भाषण का वो अंश देखना चाहिए जहां तकनीक के सहारे असत्य परोसने की बात उन्होंने कही और प्रश्न उठाया कि क्या शास्त्र का, विज्ञान का, विद्या का यह उपयोग है? इसके बाद अपना मत प्रकट किया कि सज्जन विद्या का ये उपयोग नहीं करते। दरअसल विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम चुनाव में अपनी हार की खीझ मिटाने के लिए वाराणसी, अमेठी और फैजाबाद लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों पर केंद्रित हो गया है। अमेठी में भारतीय जनता पार्टी की हार के अनेक कारण हैं जबकि स्मृति इरानी के अहंकार को एकमात्र कारण बताया जा रहा है। लोगों के साथ खड़े होने और शक्तिशाली लोगों के सामने निर्बल को प्राथमिकता देने को अहंकार कहकर प्रचारित किया गया। वाऱाणसी में भाजपा की जीत का अंतर कम होने को मोदी के अहंकार से जोड़ दिया गया। फैजाबाद की हार को प्रभु श्रीराम से जोड़ दिया गया। गजब है राजनीति का खेल और गजब है (कु) तर्क गढ़ने का हुनर।    

Saturday, June 1, 2024

फिल्मों पर प्रधानमंत्री की मन की बात


लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव लोकसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो चुका है। सबकी निगाहें चार जून को होनेवाली मतगणना पर टिकी है। चुनावी शोरगुल के बीच कुछ ऐसी बातें अलक्षित रह गईं जिनको रेखांकित करना आवश्यक है। समाचार एजेंसी आईएएनएस के साथ अपने साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिल्म इंडस्ट्री को लेकर ऐसी बात कही जिसका गहरा और दूरगामी असर हो सकता है। भारतीय स्टार्टअप्स और अन्य क्षेत्रों के बारे में बात करते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के मुताबिक जब 2014 में वो देश के प्रधानमंत्री निर्वचित हुए, तब उन्होंने हर क्षेत्र के लोगों के साथ बैठकें कीं। उन्होंने कहा कि ‘मैं 2014 में आया और 2015-16 के भीतर-भीतर मैंने जो स्टार्टअप की दुनिया शुरु हुई थी उनकी मैंने एक वर्कशाप ली। कभी मैंने स्पोर्ट्सपर्सन्स की ली, कभी कोचेज के साथ बैठा, इतना ही नहीं मैंने फिल्म दुनिया वालों के साथ ऐसी ही एक मीटिंग की। मैं जानता हूं कि वो बिरादरी हमारे विचारों से काफी दूर है, मेरी सरकार से भी दूर है। लेकिन मेरा काम था कि उनकी समस्याओं को समझूं क्योंकि बालीवुड अगर मुझे ग्लोबल मार्केट में उपयोगी होता है, अगर मेरी तेलुगू फिल्में दुनिया में पापुलर हो सकती हैं, मेरी तमिल फिल्में पूरी दुनिया में पापुलर हो सकती हैं तो मुझे तो ग्लोबल मार्केट लेना है। मेरे देश की हर चीज को आगे बढ़ाना है।‘ राजनीतिक बातों के बीच प्रधानमंत्री का ये बयान काफी गंभीर है। ऐसा जानते हुए कि फिल्म वालों की बिरादरी उनके विचारों से दूर है उन्होंने उसके वैश्विक बाजार के लिए प्रयत्न किया। ये प्रयत्न उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में ही किया। 

आपको याद दिलाता चलूं कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही पुरस्कार वापसी का अभियान चला था। जिसमें असहिष्णुता का बहाना बनाकर साहित्यकारों और लेखकों के साथ कई फिल्मकारों ने अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा करके सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया था। इतना ही नहीं एक तरफ प्रधानमंत्री फिल्म उद्योग की बेहतरी के लिए कार्य करने की ओर बढ़ रहे थे तो दूसरी ओर कुछ फिल्मकार गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल को विवादित करने में लगे थे। फिल्म एस दुर्गा और न्यूड को इंडियन पैनोरमा से बाहर करने के खिलाफ जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया था। कुछ फिल्मकारों और फिल्म से जुड़े लोगों ने राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण समारोह का बहिष्कार करके सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया था। इसके अलावा कुछ फिल्म निर्देशक निरंतर इंटरनेट मीडिया पर सरकार और प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ टिप्पणियां करते रहते हैं। लोकतंत्र में ऐसा करने का उनको अधिकार है लेकिन जब टिप्पणियां व्यक्तिगत हो जाती हैं तो उनकी मंशा पर संदेह होता है। इतना ही नहीं वो अपनी फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक एजेंडा चलाने का प्रयत्न करते हैं। फिल्मों के दृश्य, उसके संवाद और उसकी कहानी को ऐसे मोड़ दे दिया जाता है जिससे मोदी, उनकी सरकार या उनकी विचारधारा पर कटाक्ष किया जा सके। इस संबंध में फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण देना काफी होगा। इस फिल्म में बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है, वो आएंगे, पीट-पीट कर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाकर चले जाएंगे। फिल्मकार क्या संकेत करना चाह रहे थे ये स्पष्ट है। मनोरंजन जगत में कथित प्रगतिशीलता इतनी हावी है कि वहां भारतीयता और हिंदूत्व की बात करनेवालों को फिल्म समाज से अलग करने की प्रवृत्ति काम करती है। विवेक अग्निहोत्री, सुदीप्तो सेन और विपुल शाह इसके उदाहरण हैं। इन तीनों का साहस और पुरुषार्थ है कि बालीलुड की लीक से अलग हटकर फिल्म बनाकर, तमाम तरह के अघोषित बहिष्कार को झेलते हुए भी अपनी राह पर डटे हुए हैं। 

प्रधानमंत्री अगर ये कहते हैं कि फिल्म बिरादरी उनके विचारों से दूर है तो ये फिल्मों से लेकर ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री में परिलक्षित होता है। कई सारी डाक्यूमेंट्री ऐसी बनाई जाती है जिसमें सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना होती है। सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना हो लेकिन जब किसी विशेष एजेंडा के आधार पर नीतियों की आलोचना होती है तो फिल्मकार राजनीति का हिस्सा बन जाता है। फिल्मों का तो लंबा इतिहास रहा है जहां हिंदू धर्म प्रतीकों को गलत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाता रहा है। हिंदू धर्म के देवी देवताओं के नाम पर खलनायकों और खलनायिकाओं के नाम रखे गए। नायक को ईश्वर के सामने खड़े होकर भड़ास निकालते हुए दिखाया गया। जबकि अन्य धर्मों को बहुत इज्जत बख्शी गई। अब एक नया चलन आरंभ हुआ है। यह चलन है डाक्यूमेंट्री के सहारे राजनीति चमकाने की। एक उदाहरण आप सबके सामने रखता हूं। आपको समझ आ जाएगा कि किस तरह से मनोरंजन के माध्यम को राजनीतिक एजेंडा के लिए उपयोग में लाया जाता है। एक डाक्यूमेंट्री है आल दैट ब्रीद्स। जब इसको कान फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत किया गया तो इलकी काफी चर्चा हुई। प्रचारित किया गया कि इसमें घायल पक्षियों की देखभाल करनेवाले दिल्ली के दो भाइयों के संघर्ष की कहानी है। वो भी है पर उसके अलावा इस डाक्यूमेंट्री में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) पर भी सियासी टिप्पणियां है। फारेन कंट्रीव्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के बारे में तथ्यहीन बातें हैं। डाक्यूमेंट्री में दिल्ली दंगों की कहानी के समय पृष्ठभूमि से लेके रहेंगे आजादी जैसे नारे भी लगते रहते हैं। इतना ही नहीं एक पत्रकार की आवाज भी गूंजती है जिसमें वो बताता है सीएए के पास होने पर पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को वहां प्रताड़ित होने की दशा में भारत में नागरिकता नहीं मिलेगी जबकि अन्य धर्म के लोगों को मिलेगी। दरअसल ये ऐसी बातें हैं जिसका पक्षियों की देखभाल से कोई लेना देना नहीं है। परोक्ष रूप से मुसलमानों की कथित प्रताड़ना को रेखांकित किया करना ही उद्देश्य है। 

मनोरंजन के अपेक्षाकृत नए माध्यम ओटीटी के बारे में तो कहना ही क्या। वहां तो किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं है। स्वनियम की व्यवस्था अवश्य है लेकिन बावजूद इसके जिस तरह की सामग्री दिखा दी जाती है उससे तो यही प्रतीत होता है कि व्यवस्था में झोल है। याद करिए जब अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह होनेवाला था तो उसके पहले एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी का प्रदर्शन हुआ था। इसके संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया । एक दृश्य में शेफ बनने की चाहत रखनेवाली ब्राह्मण लड़की को बिरयानी बनाने के पहले नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया था। विरोध के बाद नेटफ्लिक्स पर इसका प्रदर्शन रोका गया था। अब इस बारे में फिल्म जगत के लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश का प्रधानमंत्री फिल्मों के लिए वैश्विक बाजार की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं, वो भारतीय भाषाओं की फिल्मों को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने की चिंता कर रहे हैं वहीं अधिकतर फिल्मकार, कथाकार, संवाद लेखक फिल्मों के माध्यम से अपनी राजनीति चमकाने की चेष्टा कर रहे हैं। सुधीर मिश्रा जैसे फिल्मकार तो दर्शकों को भी विचारधारा के आधार पर बांटने की बात कर चुके हैं। फिल्मकारों को खुले मन से सरकार के साथ मिलकर भारतीय फिल्मों को वैश्विक बनाने का प्रयास करना चाहिए। 


Saturday, May 11, 2024

संविधान बदलने का भ्रामक नैरेटिव


लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और आईएनडीआईए के घटक दल संविधान को बदलने का नैरेटिव गढ़ने का प्रयत्न रही है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अपने चुनावी भाषणों में भारतीय जनता पार्टी पर संविधान बदलने की मंशा का आरोप लगा रहे हैं। जनता को ये बताकर भयभीत करने का प्रयत्न भी कर रहे हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी की सरकार बनती है तो वो संविधान को बदल देंगे। राहुल गांधी तो चुनावी सभाओं में संविधान हाथ में लेकर निरंतर इस बात पर बल दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह बहुत स्पष्ट रूप से ये कह चुके हैं कि वो संविधान उनके लिए सबसे पवित्र है और उनकी पार्टी संविधान को बदलने के बारे में सोच भी नहीं सकती है। बावजूद इसके आईएनडीआईए में शामिल क्षेत्रीय दलों के नेता भी संविधान बदलने के नैरेटिव को मजबूती देने के लिए प्रयत्नशील हैं। कोई एक हाथ में संविधान की प्रति लेकर वीडियो बना रहे है तो कोई इसको आरक्षण से जोड़ रहे हैं। कोई इस नैरेटिव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे माधव सदाशिवराव गोलवलकर से जोड़कर नई व्याख्या कर रहे हैं। कुछ लोग इस नैरेटिव को मजबूती देने के लिए गोलवलकर की पुस्तक बंच आफ थाट्स का हवाला दे रहे हैं। कुल मिलाकर संविधान बदलने के नैरेटिव के जरिए वंचित समाज के मतदाताओं के मन में ये बात डालने की कोशिश हो रही है कि अगर मोदी सरकार तीसरी बार आएगी तो  आरक्षण खत्म कर देगी। ये पिछले कई चुनावों से होता आया है। जब भी देश में कोई महत्वपूर्ण चुनाव आता है तो विपक्ष, भारतीय जनता पार्टी पर आरक्षण खत्म करने की कोशिश करने का आरोप लगाते हैं। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध किसी अधिकारी की बात को तोड़-मरोड़ कर तो कभी किसी पुरानी पुस्तक की पंक्तियों को उठाकर तो कभी डीप फेक वीडियो बनाकर ये भ्रम फैलाने की कोशिश होती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, प्रधानमंत्री मोदी तक इस बारे में कई बार ये बात कह चुके हैं कि आरक्षण खत्म करने जैसी कोई बात ही नहीं है। बाबा साहब के बनाए संवैधानिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। लेकिन चुनाव के समय विपक्ष बार-बार ये राग बजाता ही रहता है।   

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को संविधान बदलने के इस नैरेटिव को गढ़ते और रैलियों में संविधान की प्रति लहराते देखकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जेल डायरी में 13 अप्रैल 1976 को लिखी एक टिप्पणी याद आ गई। चंद्रशेखर ने लिखा था, आज कांग्रेस कार्यसमिति ने संविधान में किए जानेवाले संशोधन के संबंध में स्वर्ण सिंह समिति की रिपोर्ट पर विचार किया। जो सुझाव दिए गए हैं, उनके अनुसार संविधान में व्यापक संशोधन होगा। उच्च न्यायालयों के अधिकारों में भारी कटौती होगी। उच्चतम न्यायालय पर भी बहुत कुछ प्रतिबंध लग जाएगा। संविधान संशोधनों को चुनौती नहीं दी जा सकेगी और अन्य विधेयकों की वैधता की जांच के बारे में भी उच्चतम न्यायालय के सात न्यायाधीशों की पीठ ही सुनवाई कर सकेगी। वह भी निर्णय दो तिहाई बहुमत से होना चाहिए। चुनाव के मुकदमे न्यायालयों की परिधि से बाहर होंगे। उनका निर्णय एक समिति द्वारा होगा जिसमें संसद के प्रतिनिधि और राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होंगे। इस प्रकार यह समिति पूरी तरह बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल के पक्ष में होगी। सरकारी सेवा संबंधी मामलों का निर्णय इसके लिए नियुक्त ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाएगा। मौलिक अधिकारों के बारे में प्रत्यक्षीकरण की याचिका सुनने का अधिकार उच्च न्यायालयों को होगा, किंतु आपातकालिन स्थिति में इसे भी समाप्त कर दिया गया है। इन सुझावों में, कुछ ऐसे हैं, जो आवश्यक हैं, किंतु जिस प्रकार न्यायालयों के अधिकारो को सीमित करने का प्रयास हो रहा है और जिस वृत्ति का परिचय थोड़े दिनों में संसद ने दिया है उससे अनेक भयंकर संभावनाओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। चुनावों में धांधली पर कोई अंकुश नहीं रह जाएगा। ऐसी स्थिति में सारी लोकशाही को ही खतरा पैदा हो सकता है। कानून-व्यवस्था, शिक्षा और कृषि में अब केंद्र को सामान्य रूप से हस्तक्षेप करने का अधिकार हो जाएगा। इस प्रकार राज्यों द्वारा अधिकार और सत्ता प्राप्त करने की मांग को ठेस लगेगी। इन सुझावों के पीछे उद्देश्य कितने भी उच्च हों, केंद्र को अधिक से अधिक अधिकार देकर सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बात को पीछे धकेला जा सकता है। यह स्वस्थ विकास नहीं है।

चंद्रशेखर की इस टिप्पणी के बाद जब कांग्रेस पार्टी किसी अन्य दल पर संविधान बदलने की मंशा का आरोप लगाती है तो आरोप खोखले लगते हैं। कांग्रेस की उस समय की कार्यसमिति में कितनी खतरनाक बातें हुई थीं। स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों में संविधान को बदलने का जो मंसूबा था वो पूरा हो पाया नहीं ये अलग बात है। महत्वपूर्ण ये है कि कांग्रेस पार्टी का सोच कैसा था। किस तरह के प्रस्तावों पर उनकी कार्यसमिति में चर्चा होती थी। उच्चतम न्यायालयों के अधिकारों की कटौती की चर्चा भी कार्यसमिति में हो चुकी है। चुनावी मुकदमों की सुनवाई का फैसला न्यायालयों की परिधि से बाहर रखने पर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने मंथन किया था। इसकी तो पृष्ठभूमि भी थी, इंदिरा गांधी के चुनाव को कोर्ट ने रद कर दिया था। बाद में उच्चतम न्यायालय में क्या हुआ उसको दोहराने का अर्थ नहीं है। कांग्रेस की लोकतंत्र को लेकर मंशा को समझने के लिए इंदिरा गांधी और बीजू पटनायक के एक संवाद का हवाला दिया जा सकता है। बीजू पटनायक का दावा था कि इंदिरा गांधी ने 1970-71 के आसपास कभी उनसे कहा था कि राजनीति में नैतिकता कुछ नहीं होती। सफलता ही सबकुछ है। उसे किसी भी प्रकार प्राप्त करना चाहिए। इंदिरा जी चुनावों को इतना महंगा बना देना चाहती थीं कि कोई भी विरोधी पार्टी उस दौड़ में शामिल ही न हो पाए। बकौल बीजू पटनायक इंदिरा गांधी वैसा ही अधिकार चाहती थीं जैसा टीटो और नासिर के पास थे। 1975 में देश में इमरजेंसी लगाकर इंदिरा गांधी ने ये प्रयास भी किया। चंद्रशेखर इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को लेकर चिंतित रहा करते थे।

हमारे देश के संविधान में सौ से अधिक संशोधन हो चुके हैं लेकिन उन बदलावों को देखा जाना चाहिए जिसने व्यापक वर्ग को प्रभावित किया। यह काम किन प्रधानमंत्रियों ने किया, इसको भी देखे जाने की आवश्यकता है। पहला संविधान संशोधन जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया गया वो नेहरू के कार्यकाल में हुआ। मूल संविधान की प्रस्तावना से छेड़छाड़ करके उसमें समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को जोड़ा जाना इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुआ। राजीव गांधी ने तो शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदलने के लिए संविधान में ही बदलाव कर दिया। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते टीवी चैनलों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव आया था। अगर पिछले 10 वर्षों में देखें तो मुस्लिम महिलाओँ की जिंदगी बेहतर करने के लिए तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म किया गया। अनुच्छेद 370 को खत्म करने के लिए संविधान में संशोधन किया गया। आज जो दल नरेन्द्र मोदी पर संविधान बदलने की मंशा का आरोप लगा रहे हैं उनको ये समझना चाहिए कि अगर संविधान में बदलाव करना होता तो पिछले 10 साल में इसकी कोशिश दिखाई देती। जब अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने जैसा साहसिक कदम उठा लिया गया तो अगर अन्य बदलाव करने का भी उद्देश्य होता तो उसको भी किया जा सकता था। राहुल गांधी और उनके कामरेड भले ही संविधान बदलने का नैरेटिव बनाने का प्रयास करें लेकिन कांग्रेस पर अतीत के निर्णयों और चर्चाओं का जो बोझ है वो इस नैरेटिव को प्रमाणिकता दे पाएगी, इसमें संदेह है। संदेह तो इस नैरेटिव के जनस्वीकृति में भी है।  

Saturday, February 24, 2024

महाआख्यान से बनता सत्ता विमर्श


दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने देश को सामूहिक हीन भावना से बाहर निकालने का काम किया। नरेन्द्र मोदी जी ने पहली बार इस देश में को गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति दिलाने का आह्वान लाल किले की प्राचीर से किया था। आगे उन्होंने जो कहा उसका अर्थ ये था कि मोदी के शासन काल में देश को उग्रवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद से लगभग मुक्ति मिली। इसके अलावा भी अमित शाह ने अपने भाषण में नरेन्द्र मोदी को कई समस्याओं से मुक्ति दिलानेवाले नेता के तौर पर रेखांकित किया। जब मुक्ति की बात होती है और उसके साथ कार्यों का लेखा जोखा दिया जाता है तो वो कोई साधारण बात नहीं होती है। राजनीतिक वक्तव्य नहीं होता है। उस वक्तव्य के पीछे एक सुचिंतित रणनीति होती है। अमित शाह के नेता नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों के माध्यम से एक पाठ (टेक्सट) का निर्माण करते चलते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में मुक्ति का चाहत तो होती ही है, देश के उज्जवल भविष्य का स्वपन भी होता है। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी के भाषणों और क्रियाकलापों को देखें तो वो इसके माध्यम से जो आख्यान रचते हैं उसमें इन सबकी झलक दिखाई देती है। नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय जो पंच प्रण की घोषणा की थी वो इसी आख्यान का एक भाग प्रतीत होता है। उसमें भी उन्होंने मुक्ति का स्वप्न देखा था। उसके बाद वो निरंतर विकसित भारत की बात कर रहे हैं। 2047 तक भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न। जब नरेन्द्र मोदी विकसित भारत का आख्यान रचते हैं तो उसके साथ भारतीय अस्मिता को भी जोड़ते चलते हैं। अगर मोदी की इस अस्मितामूलक आख्यान को देखें और उसको स्टीफन ग्रीनब्लाट जैसे चिंतक की अवधारणों पर कसें तो स्थिति और स्पष्ट होती है। स्टीफन ग्रीनब्लाट कहते हैं कि हर अस्मिता एक कहानी है। कहानी के बार बार कहने से ही अस्मिता का निर्माण होता है। हमें यहां ये समझना होगा कि बार बार कहना क्या है। ये जो बार बार कहना होता है यही तो जनता के मानस पटल पर अंकित होकर एक ऐसे पाठ का निर्माण करते हैं जिससे एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में वातावरण का निर्माण होता है, जिसकी परिणति सत्तामूलक विमर्श में होती है। 

हिंदी के आलोचक सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक तीसरी परंपरा की खोज में लिखा है कि जिस तरह से इतिहास एक टेक्सट (पाठ) है उसी तरह पद्मावत भी एक टेक्सट है और हर सत्ता समूह उसको अपने तरीके से पढ़ सकता है। उसका अर्थ फिक्सड नहीं तरल होता है उससे राजनीति भी की जा सकती है। वो आगे कहते हैं कि टेक्सट जब मास सर्कुलेशन में होता है तो उसकी मानी की परतें बढ़ती जाती हैं और उसकी एक इकोनामी भी काम करने लगती है।... कोई टेक्सट कभी बंद नहीं होती है, न किसी टेक्सट का समापन होता है। वह नए नए पाठों के लिए हमेशा खुली रहती है और इस तरह इतिहास के पाठों को बदलती रहती है।  अब अगर इस सिद्धांत के आलोक में नरेन्द्र मोदी के रचे आख्यानों को देखें तो वो जिस टेक्सट का सृजन करते हैं उसके मास सर्कुलेशन में होने के कारण व्याप्ति बढ़ती जाती है। प्रधानमंत्री मोदी अपने पाठ (टेक्सट) का समापन नहीं करते हैं बल्कि एक को दूसरे से जोड़कर एक नया टेक्सट जनता के सामने रखते चलते हैं। उदाहरण के तौर पर पहले वो संकल्प से सिद्धि की बात करते हैं। संकल्प और सिद्धि की बात करते करते वो स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय कई प्रकार की मुक्ति का पाठ रचते हैं। इस मुक्ति के बाद वो विकसित भारत के स्वप्न की संरचना करते हैं। इस तरह से प्रधानमंत्री मोदी न केवल नया टेक्सट रचते हैं बल्कि उसको इतिहास के तथ्यों के साथ मिलाकर मौखिक इतिहास (ओरल हिस्ट्री) का सृजन भी करते हैं। सुधीश पचौरी कहते हैं कि मौखिक इतिहास के इतिहासत्व को लेकर अतिरिक्त सजगता की आवश्यकता होती है। मौखिक इतिहास की चुनौतियां भी कई प्रकार की होती हैं। वो वाचक पर निर्भर करते है। कई बार मौखिक इतिहास में एक वाचक नहीं होता है बल्कि वो अलग अलग कालखंड में कई वाचकों के माध्यम से आगे बढ़ता है। प्रधानमंत्री के इस मौखिक पाठ को विश्लेषण करते हैं तो इतिहास के साथ साथ वो एक पावर टेक्सट (सत्तात्मक कृति) का निर्माण भी करते हैं। पाठ में जब मुक्ति और स्वप्न का रसायन मिला दिया जाता है तो वो पावर टेक्सट बनता है। आज अगर नरेन्द्र मोदी की साख और विश्वास है तो उसके पीछे यही पावर टेक्सट है। 

हमारे देश में पावर टेक्सट को समझने का सटीक उदाहरण तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस है। तुलसीदास ने जब मानस की रचना की तो कथा के साथ साथ उन्होंने मुक्ति का लक्ष्य भी रखा। जब तुलसीदास मानस की रचना कर रहे थे उस समय भारत की जनता का मनोबल गिरा हुआ था। हिंदू जनता आक्रांताओं की ज्यादातियों से परेशान थी और वो मुक्ति चाहती थी। तुलसीदास ने इसको समझते हुए एक ऐसे पाठ की रचना की जिसमें राम जैसा नायक था जिसका चरित्र लोगों में उत्साह का संचार करनेवाला था। तीसरी परंपरा की खोज करते करते लेखक कहते हैं कि रामकथा और उसमें राम का विष्णु के अवतार के रूप में आना और विराट हिंदू कथा में बदलना पूर्व लिखित बहुत सी रामकथाओं को विस्थापित कर देता है। भारत में तुलसी के रामकथा की व्याप्ति एक बहुत ही ताकतवर और सघन विमर्श पैदा करती है। इसके मूल में धार्मिक कारणों के अलावा सबसे बड़ा कारण है मानस के प्रतीकों, रूपकों और मुक्ति की कथा के रूप में उसके आदर्शों का सुदीर्घ और सतत संचरण। ये चिन्ह एक तरह से हिंदू जनता की स्मृति में चक्कर मारते रहते हैं। भारत में मानस को मनोरंजन का ग्रंथ नहीं बल्कि मुक्ति का ग्रंथ माना जाता है । एक मेटानेरेटिव ये बनता है कि वो कलियुग के अत्याचारों से मुक्ति देनेवाली एकमात्र कथा है। तुलसी के मानस के साथ विश्वास और आस्था जुड़कर उसको एक पावर टेक्स्ट बनाती है। 

आज नरेन्द्र मोदी जिस तरह पावर टेक्सट का आख्यान रच रहे हैं उससे उनके नेता की छवि के साथ मुक्तिदाता की छवि भी गाढ़ी होती जा रही है। उनके सहयोगी और उनकी पार्टी के लोग इस पावर टेक्सट को लेकर ही आगे बढ़ रहे हैं और जनमानस में इस छवि को गाढा करने के प्रयत्न में जुटे हुए हैं। जनता भी प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के इस पावर टेक्सट से सहमत ही नजर आती है। लोकतंत्र में जनता की सहमति का पैमाना चुनाव होता है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों में मोदी के इस पाव्र टेक्सट को मतदाताओं ने स्वीकार किया। विपक्ष के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती नरेन्द्र मोदी के पावर टेक्सट से पैदा हो रहे मेटानैरेटिव को समझने के साथ साथ उसका काट ढूंढने की है। विपक्षी दल अब भी राजनीति के पुराने औजारों से इसका काट ढूंढने का प्रयत्न कर रहे हैं और निरंतर विफल हो रहे हैं। वो अब भी जाति और धर्म का आधार लेकर मोदी के पावर टेक्सट के समझ अपना पाठ प्रस्तुत कर रहे हैं। लेकिन इन पाठ में न तो मुक्ति की बात है और न ही कोई स्वप्न। इसलिए जनविश्वास अर्जित करने में सफलता नहीं मिल पा रही है। तुलसीदास ने रामकथा को मिथक से प्रतिरोधात्मक कथा में बदला उसी तरह से प्रधानमंत्री मोदी विकसित भारत के संकल्प के नैरेटिव के साथ एक महाआख्यान रचा है। इसके परिणाम मिल रहे है।  

Saturday, December 9, 2023

मोदी विजय रथ को रोक पाएंगे राहुल?


राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के हौसले बुलंद हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में हैट्रिक का विमर्श शुरु कर दिया है। उधर कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों में मायूसी का वातावरण है। तेलांगना के विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार नहीं कर पा रही है। कुछ दिनों पूर्व बने विपक्षी दलों के गठबंधन आईएनडीआईए को लेकर कुछ ठोस सामने नहीं आ रहा है। विशेषज्ञ ऐसा होगा तो ऐसा होगा के तर्कों के सहारे भारतीय जनता पार्टी की कठिनाइयों को गिनाने में लगे हैं। चुनावी विश्लेषक विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों को मिले वोटों की संख्या के आधार पर लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनौती पेश करने का प्रयास कर रहे हैं। यही विश्लेषक ये कहते हुए नहीं थकते थे कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में मतदान का पैटर्न अलग होता है। स्मरणीय है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव हार गई थी लेकिन अगले ही वर्ष 2019 में जब लोकसभा का चुनाव हुआ तो भारतीय जनता पार्टी को 2014 में मिली सीटों से अधिक सीटें प्राप्त हुईं। इसी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बंपर जीत मिली थी लेकिन लोकसभा चुनाव में सातों सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत का परचम लहराया। आंकड़ों से संकेत तो मिल सकते हैं लेकिन उसे परिणाम का सटीक आकलन नहीं लग सकता है। 

लोकसभा के चुनाव में जनता यह तय करती है कि कौन सा नेता ऐसा है जो राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदान कर सकता है। वैश्विक मंच पर राष्ट्रीयय हित को मजबूती से पेश कर सकता है। पूरे देश को साथ लेकर चल सकता है और जिसकी नीतियों से देश का विकास होगा। किस नेतृत्व में स्थायित्व और स्थिरता प्रदान करने की क्षमता है। वर्तमान राजनीति परिदृष्य में नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं और पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व में लड़ेगी। विपक्ष में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और उसकी उपस्थिति हर राज्य मैं है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भले ही मल्लिकार्जुन खड़गे हैं लेकिन अगर प्रधानमंत्री बनने की नौबत आई तो राहुल गांधी ही आगे आएंगे। आईएनडीआईए में भी सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण कांग्रेस का नामित नेता ही उसका नेतृत्व कर सकता है। यहां भी राहुल गांधी का ही नाम आ सकता है। इस बात की संभवाना कम है कि राहुल गांधी किसी अन्य के नेतृत्व में 2024 के लोकसभा चुनाव मैदान में जाएं। राहुल गांधी के कुछ स्वयंभू सलाहकार और गठबंधन के कुछ दल राहुल गांधी के नाम पर असहमति जता सकते हैं लेकिन जिस प्रकार अन्य दलों के नेताओं के नाम पर मतभिन्नता है उसमें राहुल के नाम पर ही मतैक्य हो सकता है। विपक्षी गठबंधन नेतृत्व के प्रश्न को लोकसभा चुनाव के बाद के लिए टालने की घोषणा कर सकते हैं लेकिन उसका कोई लाभ होगा, इसमें संदेह है। स्वाभाविक है कि विपक्षी गठबंधन मजबूरी में ही सही लेकिन राहुल गांधी को नेता चुन सकते हैं। अगर राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का गठबंधन आईएनडीआए चुनाव मैदान में जाता है तो फिर मुकाबला नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच होगा। 

राहुल गांधी के बारे में देश में एक राय है। कांग्रेस पार्टी में भी। सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति और लंबे समय तक कांग्रेस पार्टा के महत्वपूर्ण नेता रहे प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की पुस्तक बाजार में आ रही है। पुस्तक का नाम है प्रणब, माई फादर। इस पुस्तक में सोलह स्थानों पर राहुल गांधी का उल्लेख है और कई स्थानों पर तो प्रणब मुखर्जी के डायरी के अंश भी उद्धृत किए गए हैं। प्रणब मुखर्जी की डायरी के अंश संभवत: पहली बार सार्वजनिक होने जा रहे हैं। प्रसंग 29 जनवरी 2009 के कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का है।  प्रणब मुखर्जी अपनी डायरी में लिखते हैं, राहुल गांधी ने गठबंधन के विरोध में अपनी बात जोशीले अंदाज में रखी। मैंने (प्रणब) उनसे कहा कि जोश तो ठीक है लेकिन अपने आयडिया को विस्तार से कारण समेत व्याख्यायित करें। प्रणब मुखर्जी के इतना कहने पर राहुल गांधी ने उनकी तरफ देखा और कहा कि वो उनसे अलग से बात कर लेंगे। उसके बाद प्रणब मुखर्जी ने राहुल के बारे में अपनी डायरी में लिखा कि वो बेहद शिष्ट हैं और उनके मन में काफी प्रश्न कुलबुलाते रहते हैं जो ये दर्शाते हैं कि वो सीखना चाहते हैं लेकिन अभी राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से परिपक्व होना बाकी है। परिपक्वता के प्रश्न पर ही प्रणब मुखर्जी 27 सितंबर 2013 की एक घटना का उदाहरण देते हैं। उस दिन राहुल गांधी दिल्ली में अजय माकन के एक प्रेस कांफ्रेंस में पहुंच गए थे और उन्होंने एक अध्यादेश की काफी सार्वजनिक रूप से फाड़ दी थी। भन्नाए प्रणब मुखर्जी लिखते हैं कि राहुल गांधी खुद को क्या समझते हैं? वो कैबिनेट के सदस्य नहीं हैं। वो होते कौन हैं जो कैबिनेट के निर्णय को सार्वजनिक रूप से फाड़ डालें। प्रदानमंत्री विदेश में हैं। उनको(राहुल) को इस बात का अनुमान भी है कि उनके इस कदम का परिणाम और प्रधानमंत्री पर क्या असर होगा? राहुल को प्रधानमंत्री को इस तरह अपमानित करने का अधिकार किसने दिया? राहुल में गांधी-नेहरू खानदान से होने अहंकार तो है लेकिन राजनीतिक कौशल नहीं। कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष की इस हरकत को लेकर प्रणब मुखर्जी बेहज नाराज दिखते हैं और कहते हैं कि राहुल का यह कार्य कांग्रेस पार्टी के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। वो प्रश्न उठाते हैं कि लोग कांग्रेस को इसके बाद वोट क्यों देंगे। वो इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को फिर से सक्रिय कर पाएंगे। वो लिखते हैं कि सोनिया जी राहुल को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती हैं लेकिन उनमें (राहुल) करिश्मा और राजनीतिक समझ की कमी के कारण कठिनाई हो रही है। 

राहुल गांधी को लेकर सिर्फ प्रणब मुखर्जी की ही ये राय नहीं है। अपनी पुस्तक अमेठी संग्राम लिखने के दौरान मैंने युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष से बात की थी तो उन्होंने भी कमोबेश इसी तरह की बात कही थी। उन्होंने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही थी वो ये राहुल गांधी अगर किसी नेता से नाराज होते हैं तो वो उसको दंडित नहीं करते हैं और जब खुश होते हैं तो पारितोषिक भी नहीं देते। खफा होने से उससे बातचीत बंद कर देते हैं जिसका नुकसान संगठन को होता है। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी हैं जो दोनों स्थितियों में निर्णय लेते हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव अगर नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी होता है तो आज की स्थिति में मोदी का हैट्रिक तो तय ही है। राहुल गांधी या आईएनडीआईए को अगर नरेन्द्र मोदी को चुनौती देनी है तो उनको एक परिपक्व राजनीतिक चेहरा ढूंढकर उसपर सभी दलों के बीच सहमति बनानी होगी। उस नेता को अपनी  नीतियों और विजन को जनता के सामने रखना होगा। आईएडीआईए ने अबतक दो ढाई दिन ही काम किया है। विपक्षी गठबंधन की तरफ से हाल ही में एक बैठक आहूत करने का समाचार आया था लेकिन अज्ञात कारणों से वो बैठक टाल दी गई। आमचुनाव में छह महीने से भी कम समय बचा है। भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनावी तैयारियां कर चुकी है लेकिन विपक्षी गठबंधन को बहुत कुछ करना शेष है। अगर विपक्ष ने समय का सदुपयोग नहीं किया तो परिणाम हैट्रिक की ओर ही जाता दिख रहा है।