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Saturday, February 28, 2026

वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप पर सवाल


बंकिमचंद चटर्जी लिखित गीत वंदे मातरम् को पूरा गाने का निर्णय भारत सरकार ने लागू कर दिया है। अब खंडित वंदे मातरम् की जगह पूरा गीत गाया जा सकेगा। कुछ समय पहले इस स्तंभ में भारतीय सभ्यतागत चेतना और मूल्यों के पुनर्स्थापना की बात की गई थी। वंदे मातरम् गीत को पूर्ण स्वरूप में गाया जाना भी उसी दिशा में बढ़ा एक कदम है। 150 वर्ष पहले रचित वंदे मातरम् एक ऐसा गीत है जो पुस्तकों और पत्रिकाओं से निकलकर लोक में व्याप्त हो गया। जो रचनाएं लोक में व्याप्त हो जाती हैं वो अमर हो जाती हैं। कालखंड या समय की सीमाओं से परे जाकर कालजयी हो जाती हैं। वंदे मातरम् ऐसा ही गीत है। खंडित होने के बावजूद बंकिम का ये गीत आजतक जनमानस पर अंकित है। आज जब भारत अपनी सभ्यतागत चेतना को रिक्लेम कर रहा है तो इस गीत को उसके मूल स्वरूप में लाना बहुत आवश्यक था। इस गीत का कई भारतीय भाषाओं में न केवल अनुवाद हुआ है बल्कि असंख्य धुनों पर इसको गाया भी जा चुका है। हिंदी में महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर सुमित्रानंदन पं तक ने इस गीत का भावानुवाद किया। द्विवेदी जी का भावानुवाद सरस्वती पत्रिता में प्रकाशित हुआ था। इस बात के प्रमाण अनेक पुस्तकों में मिलते हैं कि वंदे मातरम की रचना 1875 में अक्षय नवमी के दिन हुई थी। अक्षय यानि जिसका क्षय न हो। बंगाल में अक्षय नवमी के दिन जगत जननी माता जगद्धात्री की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि मुर्शिदाबाद के लालगोला,जहां बंकिम पदस्थापित थे, के एक मंदिर में मां काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखकर बंकिम ने उस चित्र को एक रूपक के तौर पर उठाया और इस गीत की रचना की।

बंकिम रचित वंदे मातरम् को लेकर राजनीति 1920 से लेकर 1940 तक होती है। उसके पहले किसी को भी संपूर्ण वंदे मातरम् के पाठ से परेशानी नहीं थी। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में तो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पूरा वंदे मातरम् गाया था। 1905 में कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर सरला देवी चौधरानी ने इस गीत को गाया।  लेकिन उस वक्त की सांप्रदायिक राजनीति ने एक साहित्यिक रचना को अपना औजार बनाया । जिस साहित्यिक रचना ने पूरे देश को एक राष्ट्रीय पहचान दी उसको राजनीति ने सांप्रदायिक रंग दे दिया। 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने नेहरू को वंदे मातरम के विरोध में एक पत्र लिखा। इसके पहले सिंध के नेता अहमद यार दौलताना ने इसका विरोध किया था। मुस्लिम लीग की तरफ से वंदे मातरम का विरोध बढ़ने लगा था। 16 अक्तूबर 1937 को विश्व भारती न्यूज में कृष्ण कृपलानी ने वंदे मातरम् के विभाजनकारी स्वरूप पर एक विध्वसंक लेख लिखा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस लेख को पढ़कर बेहद आहत हुए थे। उन्होंने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक पत्र लिखकर जानना चाहा था कि पत्रिका में प्रकाशित लेख में विचार लेखक के हैं या पत्रिका भी उन विचारों से सहमत है। नेताजी ने तब जवाहरलाल नेहरू से लेकर गांधी जी और माडर्न रिव्यू के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को भी अपनी भावनाओं से अवगत करवाया था। वंदे मातरम् के अविभाजित स्वरूप पर विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस के नेता दबाव में आ गए। तय किया गा कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से इसपर राय ली जाए। 

रवीन्द्रनाथ ठाकुर को वंदे मातरम् के पहले दो पैराग्राफ पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने तब कहा था कि कविता के बाकी हिस्से के बगैर भी उसकी आत्मा कायम रह सकती है। उन्होंने इस कविता को आनंदमठ से जोड़कर देखा और कहा कि गीत को उपन्यास के साथ मिलाकर इसको देखने से इसपर मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है। गुरुदेव ने इस कविता के खंडित स्वरूप की विवेचना करते हुए कहा था कि इसके पहले दो पैरा की स्वतंत्र पहचान हो सकती है और उन दो को पढ़कर भी इसकी भावना बची रहती है। कांग्रेस कार्यसमिति ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत को आधार बनाकर वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप को मान्यता दे दी। मजेदार बात ये 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के कुछ ही दिन पहले नेहरू ने पहली बार आनंदमठ पढ़ा था। पढ़ने के बाद 20 अक्तूबर 1937 को लिखा कि मैंने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा ताकि वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि जान सकूं। नेहरू ने ये भी स्वीकार किया था कि आनंदमठ की भाषा बहुत कठिन है। बहुत स्थान पर उल्लिखित शब्द उनको समझ में नहीं आए। जब उपन्यास ही समझ नहीं आया तो उसमे वर्णित वंदे मातरम् को खंडित करने का समर्थन क्यों किया गया ये समझ से परे था।    

गुरुदेव के पत्र को ही कांग्रेस ने वंदे मातरम् को खंडित करने का आधार बनाया था। इस कारण गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत की बंगाल के बौद्धिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उनके मित्र रामानंद चटर्जी ने भी ठाकुर की आलोचना की। उन्होंने माडर्न रिव्यू में गुरुदेव के मत के विरुद्ध संपादकीय लिखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ना तो वंदे मातरम् सांप्रदायिक है और ना ही मुसलमानों के खिलाफ। अन्यय समाचारपत्रों र पत्रिकाओं में भी गुरुदेव के मत के विरुद्ध लेख आदि छपे। तब नेहरू ने ठाकुर के मत के समर्थन में लेख लिखा। बावजूद इसके इन सारी बातों का जिन्ना पर कोई असर नहीं हुआ। वो इस बात पर अड़ा रहा कि वंदे मातरम को नहीं गाया जा सकता है। गांधी भी वंदे मातरम् को लेकर हो रहे विवाद पर क्षुब्ध थे। जुलाई 1939 के हरिजन में लिखे एक लेख में उन्होंने माना कि उनको ये कभी नहीं लगा कि ये (वंद मातरम्) हिंदू टेक्सट है। हम ऐसे समय में हैं जहां सोना भी लोहा लगने लगा है। राजा जी ने भी कहा था कि इससे (गीत को खंडित करने से) कोई लाभ नहीं होगा बल्कि ये भविष्य के विभाजन की नींव बनेगा। राजा जी की आशंका सच साबित हुई। वंदे मातरम् को खंडित करने के करीब 10 वर्षों के अंदर भारत का विभाजन हो गया। 

कुछ दिनों पूर्व महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की वंदे मातरम् पर आयोजित दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। वहां भी इस गीत को खंडित करने पर चर्चा हुई। मेरे मन में भी कई प्रश्न उठे। क्या किसी कवि को दूसरे लेखक की रचना को विभाजित करने या विभाजित करने के पक्ष में अपना मत देने का अधिकार है। जब हम साहित्यिक रचनात्मकता को परखते हैं तो रचनात्मक या लेखकीय संवेदना की बात भी आती है। क्या बौद्धिक स्वतंत्रता हमें इस बात की अनुमति देता है कि किसी लेखक की मृत्यु के बाद कोई दूसरा लेखक उसकी कृति में काट-छांट के पक्ष में अपना मत दे सकता है। क्या इसपर राष्ट्रव्यापी बहस नहीं होनी चाहिए थी। क्या अकादमिक जगत को वंदे मातरम् के खंडित किए जाने पर नए सिरे से विचार नहीं करना चाहिए। जो कृति स्वाधीनता का मंत्र था उसको खंडित करने का अधिकार राजनीतिक दल को था क्या। क्या मुसलमानों को या मुस्लिम नेताओं को खुश करने के लिए वंदे मातरम् का विभाजन किया गया था। क्या इसको तुष्टीकरण न माना जाए। क्या स्वाधीन भारत में राजनीतिशास्त्र के दिग्गजों ने वंदे मातरम् के विभाजन को तुष्टीकरण के तौर पर देखा। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना में लगे हैं तब ये प्रश्न अकादमिक और बौद्धिक जगत के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। इस चुनौती से मुठभेड़ करना ही होगा ताकि इतिहास की गलतियों पर चर्चा करके देश की नई पीढ़ी को ये बताया जाए कि किस तरह से राजनीतिक लाभ-लोभ के लिए रचनात्मकता और सृजनात्मकता से खिलवाड़ किया गया।            


Saturday, December 6, 2025

जवाहरलाल नेहरू का बाबर प्रेम


रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पिछले दिनों दिए एक बयान पर विवाद हो गया। रक्षा मंत्री ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि, सरदार वल्लभ भाई पटेल उदार व्यक्ति थे। वे सच्चे अर्थों में सेकुलर थे, पंथनिरपेक्ष थे। वे तुष्टीकरण में विश्वास नहीं करते थे। जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर सरकारी खजाने के पैसे से बाबरी मस्जिद बनवाने की बात कही थी तो उसका भी विरोध अगर किसी ने किया था तो वो गुजराती मां की कोख से पैदा हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया था। उस समय उन्होंने सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद नहीं बनने दी। इसपर नेहरू जी ने सोमनाथ मंदि के पुनर्निमाण का सवाल उठाया तो बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में सरदार पटेल ने स्पष्ट किया कि सोमनाथ मंदिर का मामला अलग है, वहां 30 लाख रुपए जनता ने दान दिए हैं और एक ट्रस्ट बनाया गया है। इस काम में सरकार का एक कौड़ी भी खर्च नहीं हुआ है। राजनाथ सिंह ने आगे कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण में ऐसा ही हुआ। अयोध्या में भी जनता के पैसे से ही श्रीराममंदिर का निर्माण हुआ। यही पंथ निरपेक्षता की सच्ची परिभाषा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान के बाद आनन-फानन में कांग्रेस के नेता ने इसे झूठ करार दिया और कहा कि इन बातों का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है। कांग्रेस के नेता माणिकराम टैगोर ने एक्स पर लिखा कि राजनाथ जी का बयान इतिहास नहीं बल्कि राजनीति है और ये वर्तमान को बांटने के लिए भूतकाल का पुनर्लेखन है। कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी राजनाथ सिंह के इस बयान पर कठोर प्रतिक्रिया दी। जो लोग रक्षा मंत्री के बयान का आधार और दस्तावेजी सबूत मांग रहे थे उनको भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल की पुस्तक पढ़ने की सलाह दी। वैसे भी ये समझा जाना चाहिए था कि राजनाथ सिंह सार्वजनिक जीवन में कोई हल्की बात नहीं करते हैं।

ये पूरा प्रसंग मणिबेन पटेल की पुस्तक ‘इनसाइड स्टोरी आफ सरदार पटेल’ में पृष्ठ संख्या चौबीस पर है। वो लिखती हैं कि नेहरू ने बाबरी मस्जिद का प्रश्न भी उठाया था लेकिन सरदार पटेल ने साफ कर दिया था कि सरकार एक भी पैसा किसी मस्जिद को बनवाने पर खर्च नहीं करेगी। उन्होंने नेहरू को स्पष्ट किया था कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण का मसला अलग है। वहां एक ट्रस्ट बनाया गया था और उस ट्रस्ट ने जनता से तीस लाख रुपए जमा किए थे। सरदार पटेल ने नेहरू को बताया कि इस ट्रस्ट के चेयरमैन जामसाहब हैं और मुंशी इसके सदस्य हैं। इसमें सरकार का कोई पैसा नहीं दिया गया है जो मंदिर निर्माण के लिए खर्च किया जाए। इतना सुनकर नेहरू चुप हो गए थे। सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल की पुस्तक के अनुसार ये पूरा प्रसंग 20 सितंबबर 1950 को घटित हुआ था। इस प्रसंग को पढ़ते हुए यही लगता है कि नेहरू और पटेल के बीच बाबरी मस्जिद पुनर्निमाण पर बा हुई थी जिसमें नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के फिर से बनाए जाने का उदाहरण दिया था। जो कांग्रेस के नेता या समर्थक राजनाथ सिंह के बयान के बारे में प्रमाण मांग रहे हैं उनके लिए मणिबेन की पुस्तक उपयोगी हो सकती है। पुस्तक में उल्लिखित उपरोक्त प्रसंग से स्पष्ट है कि नेहरू जी सरकारी धन से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे जिसको सरदार पटेल ने रुकवा दिया था। दरअसल बाबर को लेकर नेहरू के मन में आदर का भाव हमेशा से था। उनके हिसाब से वो पुनर्जागरण के दूत जैसे थे। नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया (शताब्दी संस्करण, आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 1989) में लिखा है कि बाबर एक आकर्षक व्यक्ति था, पुनर्जागरण का साहसी और दबंग राजकुमार जिसकी कला और साहित्य में रुचि थी और शानदार जीवन जीना चाहता था। यहां यह प्रश्न तो उठता ही है कि बाबर ने भारत में किस तरह से पुनर्जागरण किया जिसके कारण नेहरू को उनमें पुनर्जागरण के राजकुमार की छवि दिखाई देती थी। इस पूरी पुस्तक में नेहरू ने बहुधा बाबर को आदर के साथ याद किया है। बाबर ही क्यों नेहरू मुगल राजवंश के अनेक शासकों के प्रति उदार दिखाई पड़ते हैं। अकबर को तो वो बाबर से अधिक आकर्षक और साहसी बताते हैं। मुगलों के भारतीयकरण के वामपंथी इतिहासकारों के प्रयास को गति देते भी दिखते हैं। इसलिए अगर डिस्कवरी आफ इंडिया में बाबर के प्रति नेहरू के व्यक्त आदर को मणिबेन पटेल की पुस्तक में वर्णित प्रसंग से जोड़कर देखा जाए तो किसी प्रकार की शंका शेष नहीं बचती है कि बाबर के नाम से बनी मस्जिद को वो सरकारी पैसे से बनवाना चाहते थे। 

नेहरू सत्ता में बने रहने के लिए कोई भी उपक्रम करने को तैयार रहते थे। जो ये कहते हैं कि नेहरू के समय में सरकार के समर्थन से धार्मिक कार्य नहीं किए जा सकते थे उनको भी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित और दबा दिए गए तथ्यों को देखना चाहिए। एक पुस्तक है ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’। उसमें 14 अगस्त 1947 का एक प्रसंग है जब शाम को डा राजेन्द्र प्रसाद के दिल्ली के घर पर पूजा और हवन का आयोजन किया गया। हवन के लिए पुरोहितों को बुलाया गया था। भारत की नदियों का पवित्र जल मंगवाया गया था। राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे थे। उपस्थित महिलाओं ने दोनों के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन पूजन किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने कहा था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। उसके फौरन बाद नेहरू तैयार हो गए। नेहरू के बाद तुष्टीकरण की ये नीति कांग्रेस की नीति बन गई। दिरा से लेकर राजीव गांधी और मनमोन सिंह तक सभी इसी पर चलते रहे। प्रणब मुखर्जी ने सक्रियय राजनीति से अलग होने के बाद तीन पुस्तकें लिखीं जो उनके अनुभवों पर आधारित है। अपनी तीसरी पुस्तक द कोएलीशन इयर्स में उन्होंने कांची के शंकराचार्य की गिरफ्तारी के प्रसंग पर कैबिनेट की चर्चा का वर्णन किया है। लिखा कि ‘कैबिनेट की बैठक में शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की गिरफ्तारी की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए मैं गुस्सा हो गया और पूछा कि इस देश में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ हिंदुओं के लिए ही है, किसी की हिम्मत है कि वो ईद के समय किसी मुस्लिम धर्मगुरू को गिरफ्तार कर ले? ये वो समय था जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और प्रणब मुखर्जी उनके कैबिनेट के सदस्य थे। सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद बनवाने की कोशिश और सोमनाथ मंदिर के भव्य स्वरूप को बनाने को लेकर हिचक। जनता से पैसे से सोमनाथ मंदिर जब बनकर तैयार हुआ तो राष्ट्रपति को वहां जाने से रोकने का प्रयास नेहरू ने किया। नेहरू की नीतियों पर चलनेवाली कांग्रेस ने अयोध्या में प्रभु श्रीराम के नव्य और भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आमंत्रण यूं ही नहीं ठुकराया ।      

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Saturday, June 10, 2023

कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पर राजनीति


नई संसद के उद्घाटन को करीब एक पखवाड़ा होने को आया लेकिन सेंगोल पर प्रश्न अब भी उठ रहे हैं। स्वाधीनता के समय सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर सेंगोल को लार्ड मांउटबैटन को सौंपा गया था।फिर उनसे लेकर समारोहपूर्वक जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। सरकार का तर्क है कि सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर बनाया गया था। विपक्ष इसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। कांग्रेस इस प्रसंग को कालपनिक बता रही है। 14 अगस्त 1947 का एक चित्र भी उपलब्ध है जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में सेंगोल है और उनके साथ थिरूवावडुथुरई अधीनम के कुमारस्वामी तम्बीरमन खड़े हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर सेंगोल तैयार करने का दायित्व थिरूवावडुथुरई अधीनम को अनुरोधपूर्वक सौंपा गया था। जिस जूलर ने सेंगोल बनया था उसने भी इसको प्रमाणित कर दिया। अभी थिरूवावडुथुरई अधीनम की तरफ से एक लिखित बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वो 1947 के सेंगोल समारोह का हिस्सा रहे हैं। सरकार के आमंत्रण पर थिरूवावडुथुरई अधीनम से संतों का एक समूह सेंगोल लेकर दिल्ली गया था। वहां सबसे पहले सेंगोल को लार्ड मनाउंटबेटन को सौंपा गया। माउंटबेटन से वापस लेकर सेंगोल का गंगाजल से अभिषेक करवाया गया। अभिषेक के बाद सेंगोल को जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। 

थिरूवावडुथुरई अधीनम के मुताबिक हाल ही में अधीनम का इतिहास प्रकाशित हुआ है। उस पुस्तक में सेंगोल सिरापु नाम से एक अध्याय है जिसमें भी इस बात का उल्लेख है कि सेंगोल को पहले लार्ड माउंटबेटन को सौंपा गया और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू को। थिरूवावडुथुरई अधीनम से जुड़े मसीलामणि पिल्लै इस पूरे घटनाक्रम को अपनी आंखों से देख चुके हैं। वो इस वक्त 96 वर्ष के हैं और इस पूरे घटनाक्रम को सही बता रहे हैं। पिल्लै ने ये भी बताया कि सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण का पूरा कार्य चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर हुआ था। इस बात के भी प्रमाण हैं कि 1947 में मद्रास के कलेक्टर थिरूवावडुथुरई अधीनम आए थे और उन्होंने सेंगोल की व्यवस्था के कार्य को परखा था। कुछ लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि अगर माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था तो उसकी कोई तस्वीर क्यों नहीं है। अधीनम ने उसका भी उत्तर दिया है कि माउंटबेटन से मिलने संतों का जो समूह गया था उसमें कोई कैमरामैन नहीं था। सवाल ये उठता है कि थिरूवावडुथुरई अधीनम के दावों पर प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं। जब उस पूरी घटना के दो जीवित गवाह हैं जो ये कह रहे हैं कि माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था उसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। उनके बयान के बाद संदेह की गुंजाइश बचती कहां है। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण की परंपरा चोल राजवंश में थी उसको स्वतंत्र भारत में सनातन से जोड़कर अपनाया गया। समाज के उस हिस्से को सेंगोल बनाने और सत्ता हस्तांतरण समारोह की जिम्मेदारी दी गई जो गैर ब्राह्मण थे, लेकिन शिव और सनातन में उनकी आस्था थी। थिरूवावडुथुरई अधीनम तमिलनाडू के शिवभक्तों का एक बड़ा और प्रभावशाली समूह है। इस समुदाय को स्वाधीन देश से जोड़ने का चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का सोच था जिसको माउंटबेटन से लेकर नेहरू तक ने माना था।   

सेंगोल की कहनी पर प्रश्न उठ रहे हैं तो पंडित नेहरू से जुड़ा एक और प्रसंग याद आ रहा है। उस प्रसंग को बताने के पहले नेहरू के बारे में आधुनिक भारत के इतिहासकारों की राय देखते हैं। लगभग सभी इतिहासकारों ने इस बात पर बल दिया है कि नेहरू धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे। उनकी छवि भी इसी प्रकार से गढ़ी गई कि वो सरकारी कामों से धर्म को अलग रखना चाहते थे। इतिहासकारों से इस आकलन में चूक हुई। नेहरू सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह का कार्य किया करते थे। जब उनको लगता था कि सत्ता के लिए या राजनीति के लिए धर्म का उपयोग आवश्यक है तो वो बिल्कुल नहीं हिचकते थे। अब उस प्रसंग पर आते हैं जिससे ये बात साफ भी हो जाएगी। तिथि 14 अगस्त 1947। शाम के समय डा राजेन्द्र प्रसाद के घर पूजा और हवन आदि का आयोजन किया गया। हिंदू पुरोहितों को बुलाया गया था कि वो हवन आदि करवाएं। भारत की नदियों से पवित्र जल मंगवाए गए थे। डा राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे थे और वहां उपस्थित महिलाओं ने दोनों के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। फिर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन आदि किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने सार्वजनिक रूप से ये स्टैंड लिया था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। नेहरू इस हिंदू तरीके को अपनाने को तैयार हो गए। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। कई अन्य जगहों पर भी। बावजूद इसके आधुनिक भारत के अधिकतर इतिहासकारों ने नेहरू के व्यक्तित्व को धर्म से निरपेक्ष व्यक्तित्व के तौर पर गढ़ा। 

नेहरू से जुड़ा एक और किस्सा है। 1952 में लोकसभा का चुनाव चल रहा था। नेहरू उत्तर प्रदेश के फूलपुर में एक स्थान पर चुनावी सभा कर रहे थे। तभी उसी रास्ते से स्थानीय राजा अपने हाथी पर सवार होकर निकले। नेहरू की सभा के कारण राजा और उनके हाथी को रोक दिया गया। राजा नाराज हो गए। मंच पर बैठे नेहरू को जब इस बात का पता चला तो वो वहां से उतरकर राजा के पास पहुंचे। वहां पहुंचकर नेहरू ने महाराज की जय हो कहकर उनका अभिवादन किया। राजा खुश हो गए। हाथी से उतरकर नेहरू के साथ मंच पर गए और सभा में उपस्थित जनता से नेहरू को वोट देने की अपील कर दी। उसके बाद राजा वहां से चले गए। राजा के जाने के बाद नेहरू ने उस अधिकारी को समझाया कि राजा को जयकारे की जरूरत थी और और मुझको वोट की। मैंने राजा की इच्छा पूरी की और उन्होंने मेरी। इसी तरह से लेनार्ड मोस्ले की 1961 में प्रकाशित पुस्तक द लास्ट डेज आफ ब्रिटिश राज में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नेहरू रेडक्लिफ को भारत पाकिस्तान के सीमा निर्धारण के लिए अधिक समय देने के पक्ष में नहीं थे। उनको लगता था कि जल्द से जल्द भारत की स्वाधीन सरकार बने। सीमा निर्धारण बाद में दोनों देश आपसी सहमति से कर लेंगे। परिणाम सबके सामने है। 

सेंगोल प्रकरण में प्रश्न तो ये उठाया जाना चाहिए कि भारत के इतिहास का इतना महत्वपूर्ण अध्याय क्यों दब या दबा दिया गया। सेंगोल जैसा महत्वपूर्ण प्रतीक राष्ट्रीय संग्रहालय में न होकर प्रयागराज के संग्रहालय में क्यों और कैसे पहुंचा। सनातन को मानने वाले समाज के पिछड़े वर्ग के समूह अधीनम को प्रतिनिधित्व देने के राजा जी की इंक्लूसिव सलाह को इतिहास के पन्नों में गुम करने का षडयंत्र किसने रचा। देश इन प्रश्नों का उत्तर चाहता है। कहानियों में उलझाने से बेहतर है कि इन प्रश्नों पर बात हो। 

Saturday, March 5, 2022

प्रामाणिक लेखन से छंटेगा कोहरा


सरस्वती नदी को केंद्र में रखकर संपादित पुस्तक ‘द्विरूपा सरस्वती’ के लोकार्पण समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने वक्तव्य में भारतीय इतिहास और उसकी सत्यता पर पूर्व में उठाए गए सवालों पर कटाक्ष किया। उन्होंने अंग्रेजों की मंशा को रेखांकित करते हुए बताया ‘अंग्रेजों ने बताया कि भारत का न तो कोई रणगौरव है और न ही धनगौरव । वेद पुराण सब भांग के नशे में गाए गए गीत हैं। भारतीय इतिहास कपोल कल्पित है।‘ ये बताते हुए मोहन भागवत ने इस बात पर बल दिया कि भारतवर्ष की प्राचीनता और सनातनता के सातत्य को स्थापित करना होगा। इसके लिए विद्वानों और नई पीढ़ी को प्रमाण देना होगा क्योंकि इतिहास के प्रमाण बदल दिए गए, भाषा बदल दी गई और गुलामी के कालखंड में बदले हुए प्रमाण और भाषा को ही प्राथमिकता दी गई। सरसंघचालक ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कई सूत्र दिए। नई पीढ़ी को प्रमाण देने की बात बेहद अहम है। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा की हमारी वर्तमान प्रणाली में प्राथमिक स्तर से सुधार हो। प्राचीनता और सनातनता के सातत्य को स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि ऐसी पुस्तकें तैयार की जाएं जो प्रमाणिक तरीके से विदेशी इतिहासकारों के मतों का निषेध करे और भारतीय मत और सिद्धांत को स्थापित करे। यह रास्ता बहुत कठिन है लेकिन भारत और भारतीयता से प्रेम करनेवाले और उसके गौरव को स्थापित करने के उद्देश्य से लेखन करनेवालों को इस कठिन राह पर आगे बढना ही होगा।

इतिहास लेखन बेहद श्रमसाध्य कार्य है। इसमें तथ्यों की प्रधानता होनी चाहिए। उसके बाद व्याख्या को महत्व देना चाहिए। तथ्यों की अनदेखी करने से इतिहास का स्वरूप बदलता है। व्याख्या में भाषा का स्थान बेहद महत्वपूर्ण होता है । इतिहासकार जब शब्दों का चयन करता है तो उसी मंशा स्पष्ट हो जाती है। अगर हम प्राचीन भारतीय इतिहास को लिख रहे होते हैं और वर्ण के स्थान पर अगर जाति का प्रयोग कर देते हैं तो अर्थ ही बदल जाता है। प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में जब सबाल्टर्न को केंद्र में रखकर लेखन किया गया तो इस तरह के शब्दों के प्रयोग ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया। यही गलती सामंती व्यवस्था को व्याख्यायित करते समय भी हुई। विदेशी इतिहासकार ने यूरोपीय सिद्धांतों के आधार पर भारत के समाज को समझने की कोशिश की। डेमोक्रेसी या लोकतंत्र को विदेशी अवधारणा मानने और प्रचारित करने के चक्कर में इतिहासकारों ने भारत की जनपद व्यवस्था या वैशाली में प्रचलित गणतंत्रीय व्यवस्था को जानबूझकर ओझल कर दिया । मध्यकाल में जब धर्म की व्याख्या की गई तो वहां भी इतिहासकारों ने यूरोपीय अर्थ के आधार पर इस शब्द की व्याख्या की और अर्थ का अनर्थ कर दिया। ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आधुनिक भारत का इतिहास लिखने के क्रम में भी तथ्यों को ओझल कर दिया गया। छवि निर्माण के लिए गलत  व्याख्या की गई। स्वाधीनता आंदोलन और उसके बाद के भारत के इतिहास में भी इस तरह की कई गड़बड़ियां दिखाई देती हैं। ऊपरी तौर पर इस कालखंड का विवेचन वैज्ञानिक तरीके किया प्रतीत होता है लेकिन अगर हम उसकी तह में जाते हैं और घटनाओं और व्यक्तियों का सूक्ष्मता से आकलन करते हैं तो समग्र तस्वीर नहीं दिखती। 

अगर स्वाधीनता के ठीक पहले और उसके बाद की घटनाओं पर नजर डालें तो इतिहास लेखकों ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसंग में बहुधा उन तथ्यों की अनदेखी कि जिससे नेहरू की प्रचलित छवि खंडित होती है। इसको कई उदाहरणों से समझा जा सकता है। 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना में भारत विभाजन को सैद्धांतिक स्वीकृति दी गई थी। भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे और सीमा निर्धारण के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ को चुना गया था। वो कभी भारत नहीं आए थे और इसको ही आधार बनाकर उनकी निष्पक्षता को प्रचारित किया गया। रेडक्लिफ को अंतराष्ट्रीय सीमा निर्धारण का कोई अनुभव नहीं था। वो कानूनी विशेषज्ञ थे। रेडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को भारत पहुंचे तब उनको पता चला कि उनको पांच सप्ताह में सीमा निर्धारण का काम पूरा करना है। यहां तक तो ठीक था।  लेकिन उसके बाद इस बात की चर्चा कम ही मिलती है कि नेहरू बंटवारे को लेकर जल्दबाजी में थे।  वो चाहते थे कि बंटवारे और सीमा निर्धारण का काम जल्द से जल्द हो जाए। वो तो इसके लिए भी तैयार थे कि अस्थायी सीमा निर्धारण करके बंटवारे के काम को अंजाम दे दिया जाए। नेहरू का मत था कि नये देश बाद में आपसी सहमति के आधार पर सीमाओं को ठीक कर लेंगे। इन तथ्यों का उल्लेख पत्रकार और इतिहासकार लेनार्ड मोस्ले की 1961 में प्रकाशित पुस्तक द लास्ट डेज आफ ब्रिटिश राज में मिलता है। ये पुस्तक जवाहरलाल नेहरू के जीवन काल में ही प्रकाशित हो गई थी। इसमें उल्लिखित तथ्यों का कोई खंडन हुआ हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। नेहरू की इस जल्दबाजी को इतिहासकारों ने ओझल कर दिया और उनकी एक दूसरी तरह की छवि निर्मित की गई। 

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण के समय नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच मतभेद हुआ। नेहरू के बारे में इस तरह की बातें लिखी गईं कि वो धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे आदि आदि। उनके पत्रों को इसका आधार बनाया गया लेकिन नेहरू की मानसिकता को समझने के लिए इतिहासकारों ने पर्याप्त शोध नहीं किया। जो पत्र सामने आए उसके आधार पर नेहरू की छवि बना दी गई। नेहरू का सोमनाथ मंदिर को लेकर जो स्टैंड था उसके पीछे मंशा कुछ और थी। इसको समझने के लिए 14 अगस्त 1947 की एक घटना का विवरण देखना होगा। शाम को संविधान सभा के अध्यक्ष डा राजेन्द्र प्रसाद के घर एक समारोह का आयोजन किया गया था। तंजावुर के हिंदू पुरोहितों ने पूजा पाठ और हवन का जिम्मा संभाला था। वो पवित्र जल लेकर भी आए थे। राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे और महिलाओं ने उनके माथे पर तिलक लगाया। नेहरू ने भी तिलक लगाया और हवन भी किया क्योंकि उनके मित्रों ने उनको समझाया था कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। 

ऐसी ही एक घटना 1952 के लोकसभा चुनाव के समय की है। फूलपुर में नेहरू की सभा थी। सभास्थल के रास्ते एक स्थानीय राजा अपने हाथी से निकलना चाहता था। अफसर उनको निकलने नहीं दे रहे थे। हो हल्ला होने लगा। नेहरू को जब पता चला तो वो राजा के पास पहुंचे और ‘महाराज की जय हो’ के नारे लगाए। राजा खुश हो गए और जनता से नेहरू को वोट देने की अपील कर डाली। बाद में नेहरू ने युवा अफसर को समझाया कि ‘राजा को जय-जयकार की जरूरत थी और मुझे वोट की। मैंने राजा को उनका चाहा दिया और उन्होंने मुझे।‘  ऐसी कई अन्य घटनाएँ हैं जिससे नेहरू की छवि सत्ता के लिए हड़बड़ी में रहे एक नेता की बनती है। लेकिन आधुनिक भारत के इतिहास की पुस्तकों में ये छवि नदारद है। उदाहरण के लिए नेहरू से जुड़े प्रसंगों को गिनाया लेकिन अगर इसी तरह से वामपंथियों की स्वाधीनता आंदोलन में भूमिका पर समग्रता में विचार हो तो प्रचलित मान्यताओं से अलग ही तस्वीर निकलकर आएगी। मोहन भागवत जब प्रमाण के साथ इतिहास लेखन की बात करते हैं तो वो तथ्यों के साथ समग्रता की अपेक्षा करते हैं। इस कार्य में देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों को नेतृत्व करना होगा। देश में 50 से अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। सालभर में एक विश्वविद्यालय से एक भी प्रमाणिक पुस्तक का प्रकाशन इतिहास लेखन की कमियों को दूर कर सकता है।  

Monday, November 12, 2018

किताबों से राजनीति की प्रवृत्ति


शशि थरूर, समकालीन राजनीति का एक ऐसा नेता जिनका विवाद के साथ चोली दामन का साथ है।कई बार विवाद हो जाता है,जबकि बहुधा वो विवादों को आमंत्रित करते हैं। पिछले दिनों उनकी किताब ‘द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’ आई थी जो नरेन्द्र मोदी पर केंद्रित है। पैराडॉक्सिकल का शाब्दिक अर्थ तो मिथ्याभासी होता है परंतु इस पुस्तक में पैराडॉक्सिकल को परोक्ष रूप से एक विशेषण की तरह केंद्र में रखा गया है जिसका अर्थ होता है लोक-विरुद्ध। इस विशेषण को व्याख्यायित और स्थापित करने के लिए शशि ने तर्क जुटाए और उसको किताब की शक्ल दे दी। अपनी इस किताब में थरूर ने अंग्रेजी के इस शब्द को इस तरह से इस्तेमाल किया जिससे कि ये पुस्तक और उसका शीर्षक दोनों उनकी और उनकी पार्टी कांग्रेस की राजनीति के लिए फायदेमंद हो और पार्टी में उनका भी कद बढ़े। इस पुस्तक के विमोचन पर जिस तरह से नेताओं का जमावड़ा लगा था वो भी इस बात को पुष्ट भी करता है। विमोचन के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर पूर्व केंद्री मंत्री चिदंबरम, अरुण शौरी ने प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा किया था। जमकर राजनीतिक बयानबाजी हुई थी। शशि का अंग्रेजी भाषा ज्ञान बहुत जबरदस्त है और वो अपनी इस प्रतिभा का उपयोग बहुधा ट्वीटर पर करते भी रहते हैं। उस भाषा ज्ञान का दर्शन यहां भी पाठकों को होता है।
किताब से सियासत की बात इस वजह से भी पुष्ट होती है कि थरूर अब नेहरू पर लिखी अपनी पुरानी किताब को भी राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमान करने जा रहे हैं। डेढ़ दशक पहले 2003 में थरूर ने जवाहरलाल नेहरू पर एक किताब लिखी थी, ‘नेहरू, द इंवेन्शन ऑफ इंडिया’। अब इस पुस्तक के नए संस्करण का विमोचन कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी 13 नवंबर को करेंगी। स्टैच्यू ऑफ यूनिटि को लेकर सरदार पटेल और उनके योगदान की पूरे देश में जमकर चर्चा हो रही है। ऐसे माहौल में नेहरू पर पंद्रह वर्ष पूर्व लिखी और प्रकाशित पुस्तक का विमोचन समारोह करना और उसमें सोनिया गांधी का आना साफ तौर पर एक राजनीति का संकेत कर रहा है। पुस्तक प्रकाशन जगत में इस तरह की कोई परंपरा नहीं रही है कि किसी किताब के नए संस्करण को समारोहपूर्वक जारी किया जाए। जिस तरह से शशि की किताब ‘द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’ में नेताओं का जमावड़ा लगा था उससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि नेहरू वाली किताब के विमोचन में भी विपक्षी दलों के नेताओं का जुटान होगा। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के बीच यहां राजनीतिक भाषण से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह की राजनीति अमेरिका में जमकर होती रही है, वहां चुनाव के पहले नेताओं को केंद्र में रखकर पुस्तकें लिखी जाती रही हैं और फिर उसके आधार पर पक्ष और विपक्ष में माहौल बनाया जाता है। हमारे देश के लिए यह एक नई प्रवृत्ति है जिसमें ये देखना दिलचस्प होगा कि इसका असर चुनावी राजनीति पर कितना गहरा होता है।   


Friday, November 8, 2013

अपने अपने पटेल

पहले नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ये बयान दिया कि सरदार पटेल भारत के प्रधानमंत्री होते को देश की तस्वीर कुछ अलग होती । अब लालकृष्ण आडवाणी ने एक किताब के हवाले से अपने ब्लॉग में लिखा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल को सांप्रदायिक कहा था । आडवाणी ने एक किताब के हवाले से लिखा है – ‘हैदराबाद का निजाम पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था । इस बाबत उसने अपने एक प्रतिनिधि को पाकिस्तान भी भेजा था, साथ में काफी धन भी । पटेल ने इन बातों का जिक्र कैबिनेट की बैठक में किया और मंत्रिमंडल के सामने सुझाव रखा कि हैदराबाद के शासन को भारत के अधीन करने के लिए वहां सेना भेजी जानी चाहिए । पटेल के इस प्रस्ताव पर नेहरू ने उनसे कहा कि आप पूरी तरह से सांप्रदायिक हैं और मैं आपकी सिफारिश कभी नहीं मानूंगा ।‘  दरअसल हम अगर मोदी के बयान और आडवाणी के ब्लॉग को देखें तो एक महीन रेखा उभर कर सामने आती है । वो रेखा यह है कि नेहरू के बरक्श पटेल को खड़ा करने की कोशिश । सरदार पटेल आजाद भारत के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे । भारत को एक करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई । लेकिन नेहरू को नीचा दिखाकर पटेल को ऊंचा दिखाने की जो राजनीति चल रही है दरअसल वो तथ्यों से परे है । इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश है । अब अगर हम बिना संदर्भ जाने किसी भी पत्र के कुछ चुनिंदा हिस्सों को पेश कर उसके आधार पर राय बनाते हैं तो हम तार्किक दोष के शिकार हो जाते हैं । आडवाणी भी उसी फैलेसी के शिकार हो गए लगते हैं । आडवाणी जिस किताब के प्रसंग का हवाला दे रहे हैं उसमें ये प्रसंग 1949 का है । उसी साल नेहरू पर एक किताब में पटेल ने उनको देश की जनता के आदर्श, जननेता और जननायक जैसे विशेषणों से नवाजा था । पटेल ने लिखा कि उनसे बेहतर नेहरू को कोई समझ नहीं सकता । उनके मुताबिक वो ही जानते हैं कि आजादी के बाद के दो सालों में नेहरू ने देश को कठिन परिस्थितियों से ऊबारने के लिए कितनी मेहनत की और .ह नेहरू की दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि भारत हर क्षेत्र में एक देश के तौर पर अपनी पहचान बनाने लगा था । पटेल के मुताबिक इन दबाबों का असर नेहरू की उम्र पर दिखाई देने लगा है । पटेल ने लिखा कि उम्र में बड़े होने की वजह से वो हमेशा नेहरू को अहम मसलों पर राय देते हैं । कई बार उनकी राय से वो असहमत भी होते हैं लेकिन ध्यानपूर्वक सुनते हैं और अपने तर्कों से सामनेवाले को राजी करने की कोशिश करते हैं । मतलब यह है कि पटेल यह कहना चाहते हैं कि नेहरू बेहद लोकतांत्रिक थे और विचारों में मतभेद को डिस्कोर्स में जगह देते थे । अगर हम उस वक्त के नेहरू के मंत्रिमंडल को देखें तो पता चल जाएगा कि किस तरह से नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल में सभी विचारों को प्रतिनिधित्व दिया था ।  
पटेल और नेहरू में तमाम मुद्दों पर मतभेद थे, कई मसले पर दोनों की राह एकदम जुदा थी । लेकिन दोनों इस बात से इत्तफाक रखते थे कि उनकी जोड़ी  इस देश के बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक है । गांधी जी की हत्या के बाद पटेल बेहद क्षुब्ध थे और उनके मन के कोने अंतरे में यह बात घर करने लगी थी कि देश के गृहमंत्री होने के नाते गांधी को नहीं बचा पाने की जिम्मेदारी उनकी भी बनती है । इस मनस्थिति में पटेल गृहमंत्री का पद छोड़ने के बारे में विचार भी करने लगे थे । पटेल की मनोदशा को भांपते हुए जवाहरलाल नेहरू ने गांधी जी की हत्या के चार दिन बाद चार फरवरी 1948 को उनको पत्र लिखा । पत्र में नेहरू ने लिखा कि -पिछले 25 सालों के दौरान हम दोनों ने कई झंझावातों को साथ झेला है । उन मुश्किल भरे दौर में आपकी सूझबूझ ने मेरे मन में आपकी इज्जत बढ़ाई है और कोई भी और कुछ भी इसको कम नहीं करा सकता । गांधी जी की मौत के बाद हमें एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्धता और आपसी विश्वास को उसी स्तर पर मजबूत बनाए रखना होगा । मेरा अब भी आपमें गहरा विश्वास है । नेहरू के उत्तर में पटेल ने जो लिखा वो सारी शंकाओं को दूर करने के लिए काफी है । पटेल ने लिखा- हम दोनों लंबे समय से साथी हैं । हमारे बीच तमाम मतभेदों के बावजूद देशहित सर्वोपरि रहा है । बापू की इच्छा भी हम दोनों के लिए मायने रखती है लिहाजा इन बातों के आलोक में मैं अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करूंगा । दोनों के बीच के इस पत्र व्यवहार के बाद इनके संबंधों की कोई भी व्याख्या बेमानी होगी ।  
दरअसल अगर हम पूरे मसले को समग्रता में देखें तो कांग्रेस की अपने नायकों की उपेक्षा ने बीजेपी को उन्हें भुनाने का अवसर दे दिया है । नेहरू-गांधी परिवार के महिमामंडन में कांग्रेस ने अपने नायकों को दरकिनार कर दिया चाहे वो सरदार पटेल हों, डॉ राजेन्द्र प्रसाद हों या फिर मौलाना आजाद या रफी अहमद किदवई ही क्यों ना हों । यह इसी देश में संभव है कि संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के दो बार राष्ट्रपति रह चुके डॉ राजेन्द्र प्रसाद को संसद भवन परिसर में उचित स्थान ना मिले । आजादी मिलने के बाद ज्यादातर वक्त तक देश पर कांग्रेस का शासन रहा लेकिन इस दौरान कांग्रेस ने पटेल की विरासत को आगे बढ़ाने का काम तो नहीं ही किया उसको भुलाने का काम जरूर किया । कांग्रेस की इसी अनदेखी ने पटेल और नेहरू के बीच मतभेदों की खबरों को एक खास वर्ग के लोगों ने इस तरह से प्रचारित कर दिया कि देश की तमाम ऐतिहासिक समस्याओं के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं । जैसे कि कश्मीर और भारत बंटवारे के मुद्दे पर । यह धारणा बना दी गई कि अगर पटेल होते तो कश्मीर समस्या इस तरह से देश के सामने नहीं होती । जबकि सचाई यह है कि कश्मीर को पटेल देश के लिए सरदर्द मानते थे और उससे छुटकारा पाना चाहते थे । उसी तरह यह भी भ्रम भी फैलाया गया कि भारत पाकिस्तान विभाजन के लिए नेहरू-गांधी जिम्मेदार हैं । पटेल होते तो विभाजन नहीं  होता । जबकि तथ्य इससे उलट है । तथ्य यह है कि पटेल तो विभाजन के लिए नेहरू और मौलाना आजाद से पहले तैयार हो गए थे और उन्होंने ही नेहरू और कांग्रेस कार्यसमिति के अन्यसदस्यों को इसके लिए राजी किया  । बाद में पटेल और नेहरू के दबाव में गांधी जी भी विभाजन के लिए तैयार हुए । हलांकि यह भी तथ्य है कि मुस्लिम लीग के व्यवहार से निराश होने के बाद ही पटेल ने विभाजन के लिए हामी भरी थी । खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा भी था कि अगर अगर पटेल ने थोड़ा सा और दबाव डाला होता तो पाकिस्तान बनता ही नहीं । लेकिन इन बातों के आधार पर पटेल को विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है । निर्णयों को हमेशा काल और परिस्थियों की कसौटी पर कसा जाना चाहिए । होता यह है कि हम निर्णयों को उस वक्त के हालात के आलोक में नहीं देखते हैं बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में उसका विश्लेषण करने लग जाते हैं । इस वजह से इतिहास की सूरत बिगड़ने लग जाती । कुछ लोग या संस्था सायास ऐसा करते हैं और कुछ अज्ञानतावश ऐसा करते हैं । दोनों ही परिस्थियां खतरनाक हैं । इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही मूल्यांकन होना चाहिए । राजनीति लाभ लोभ के लिए इतिहास के साथ खिलवाड़ दरअसल देश के महापुरुषों का अपमान भी है, इतिहास तो छल है ही ।

Sunday, May 27, 2012

इंदिरा गांधी के बहाने

भारतीय राजनेताओं में महात्मा गांधी के बाद इंदिरा गांधी लेखकों और राजनीति टिप्पणीकारों की पसंद हैं । उनपर प्रचुर मात्रा में लिखा गया और अब भी लिखा जा रहा है । महात्मा गांधी अपने विचारों को लेकर लेखकों को चुनौती देते हैं वहीं इंदिरा गांधी अपनी राजनीति और अपने निर्णयों और उसके पीछे की वजह सें लेखकों के लिए अब भी चुनौती बनी हुई है । इंदिरा गांधी पर एक अनुमान के मुताबिक सौ के करीब किताबें लिखी जा चुकी हैं जिनमें कैथरीन फ्रैंक, इंदर मल्होत्रा और पुपुल जयकर आदि प्रमुख हैं । मशहूर पत्रकार और लंबे समय तक न्यूजवीक और न्यूयॉर्क टाइम से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रणय गुप्ते ने इंदिरा गांधी की राजनीतिक जीवनी लिखी है- मदर इंडिया, अ पॉलिटिकल बॉयोग्राफी ऑफ इंदिरा गांधी । तकरीबन छह सौ पन्नों में लिखी गई इस किताब में आजाद भारत की सबसे जटिल राजनीतिक शख्सियत इंदिरा गांधी के दर्द गिर्द भारतीय राजनीति का भी द्स्तावेजीकरण किया गया है । इंदिरा गांधी की इस किताब के बारे में लेखक का मानना है कि यह सामान्य पाठकों के लिए है खासकर उन विदेशी फाठकों के बारे में जो समकालीन भारतीय इतिहास में रुचि रखते हैं । इसमें इंदिरा गांधी का जीवन तो है ही साथ ही साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन और बढ़ती जनसंख्या जैसी समस्या पर भी लेखक ने विस्तार से लिखा गया है । ये दोनों विषय़ इंदिरा गांधी के लिए बेहद अगम थे । जब पूरे विश्व में शीत युद्ध चल रहा था तो उस वक्त इंदिरा गांधी ने बेहद संतुलन और राजनैतिक कौशल के साथ अमेरिका और रूस के खेमों से अलग हटकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूती देकर विश्व नेता के तौर पर अपनी छवि मजबूत की । इस किताब में जनसंख्या नियंत्रण पर इंदिरा गांधी की नीतियों को प्रणय ने कसौटी पर कसा है और बहुधा आलोचनात्मक दृष्ठि के साथ ।

इमरजेंसी इंदिरा गांधी के जीवन का काला दाग है । 1975 में जब इंदिरागांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद देश में लोकतंत्र को खत्म करने की ठानी तो पूरा देश उनके खिलाफ एक जुट हो गया । ट्रांसफॉरमिंग डेमेक्रेसी नाम के अध्याय में प्रणय गुप्ते ने मिनट दर मिनट का हवाला देते हुए पूरे घटनाक्रम को परखा है । इंदिरा गांधी ने किन परिस्थितियों में इमरजेंसी लगाने का फैसला लिया और कौन कौन से सलाहकार थे जिनकी सलाह पर लोकतंत्र पर हमले की साजिश रची गई । इमरजेंसी में हुए ज्यादतियों के अलावा उस दौर में किस तरह से जयप्रकाश नारायण ने संघर्ष का ताना बाना बुना, उसका भी दस्तावेजीकरण है इस किताब में । 1936 में जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस की नीतियों से मतभेद होने के बाद पार्टी से इस्तीफा दे दिया था लेकिन करीब 40 साल के बाद फिर जब जयप्रकाश नारायण को लगा कि देश का लोकतंत्र खतरे में है  तो उन्होने मोरारजी देसाई के साथ मिलकर जनता मोर्चा बनाया और संघर्ष का बिगुल फूंक दिया। इस किताब में प्रणय गुप्ते ने बेहद बारीकी से उस दौर की राजनीति को पकड़ते हुए उसका विश्लेषण किया है ।

इस किताब में इंदिरा गांधी के विचारों को उनके दोस्तों के हवाले से, उनको लिखे पत्रों के हवाले से और उपलब्ध सामग्री के आधार सामने रखा गया है । लेखक खुद मानते हैं कि यह किताब दूसरों के शोध पर आधारित है । लेकिन उन्नीस सौ चौरासी में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में जो वातावरण बना था उसके गवाह लेखक खुद बने हैं । उस वक्त उन्होंने देशभर में दौरा किया, पंजाब में लंबा वक्त बिताया और सिखों के मनोविज्ञान को समझा और फिर उन अनुभवों के आधार पर संकट के उन क्षणों को याद किया है । मोटो तौर पर लेखक ने इंदिरा गांधी की इस जीवनी को पांच भागों में बांटा है । शुरुआत उनकी हत्या और बाद के हालातों से की गई है । दूसरे भाग में उनके किशोरावस्था से लेकर फिरोज गांधी से उनके प्रेम विवाह और फिर उनसे अलगाव की गाथा है । तीसरे भाग में इंदिरा गांधी की राजनीति शिक्षा से लेकर पार्टी में उनके ताकतवर होकर उभरने के कालखंड को परखा गया है । इन अध्यायों में प्रणय गुप्ते ने इस दौर के नेताओं के बयानों और बाद के लेखकों को उद्धृत करके इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को सामने लाया है । चौथे भाग में इंदिरा गांधी के शक्तिशाली नेताओं से टकराव और उनकी जीत के बाद खुद को देश की राजनीति की केंद्रीय धुरी बनने की कहानी है । इसी अध्याय में इंदिरा गांधी की राजनीति के काले चेहरे इमरजेंसी के बारे में विस्तार से वर्णन है कि किन परिस्थितियों में वो इमरजेंसी तोपने पर मजबूर हुई और फिर किन हालातों में उनको लोकतंत्र के सामने मजबूर होकर हथियार डालना पड़ा ।

प्रणय गुप्ते की इस किताब में इंदिरा गांधी के बारे में नया कुछ भी नहीं है लेकिन जिस तरह से इंदर मल्होत्रा से अपनी किताब में तथ्यों को प्रधानता दी है और कैथरीन फ्रैंक ने अपनी किताब को सनसनीखेज बनाया था उससे अलग हटकर प्रणय गुप्ते ने वस्तुनिष्ठता के साथ घटनाओं, तथ्यों और उपल्बध सामग्री को एक जगह इकट्ठा कर अपने सामान्य पाठकों के लिए किताब के लिखने के उद्देश्य में सफलता पाई है । इस किताब में घटनाओं औप प्रसंगों के दुहराव को रोकने के लिए सख्त संपादन की जरूरत है ।