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Saturday, October 12, 2024

शील के साथ सबल राष्ट्र का आह्वान


विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस लंबी यात्रा में संघ ने बहुत उतार चढ़ाव देखे। स्वयंसेवकों की निरंतर तपस्या ने इसको विश्व का सबसे बड़ा संगठन बना दिया। एक ऐसा संगठन जो व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त करने में लगा है। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 100 वर्ष तक की यात्रा पूरी करने में विरोध नहीं झेलना पड़ा। अकादमिक और पत्रकारिता के क्षेत्र में तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम सुनकर ही आगबबूला होनेवाले लोगों की बड़ी संख्या रही है। अकादमिक जगत में सैकड़ों पुस्तकें लिखी गईं जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों को बिना जाने धारणा के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए। अब भी निकाल रहे हैं। अंग्रेजी के कई लेखक जो स्वयं को लिबरल कहते हैं वो सहजता के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मिलिटेंट संगठन लिख रहे हैं। संघ को कट्टरपंथी संगठन और प्रगतिशील नहीं माननेवाले अकादमिक जगत के तथाकथित विद्वानों को विजयादशमी के अवसर पर सरसंघचालक मोहन भागवत का व्याख्यान सुनना और समझना चाहिए। अपने इस व्याख्यान में मोहन भागवत जी ने जिस तरह से भारतीय समाज के यथार्थ को उद्घाटित किया उसके गहरे निहितार्थ हैं। समाज में क्या चल रहा है, किस तरह से भारतीय समाज को बांटने की राजनीति हो रही है, किस तरह से भारत को कमजोर करने के लिए अंतराष्ट्रीय स्तर पर रणनीति बनाई जा रही है, किस तरह से देश के कुछ लोगों और समूहों को प्रभावित करके भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं उन सब पर मोहन भागवत जी ने विस्तार से बोला। समाज को सचेत भी किया।

मोहन भागवत जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की धमक पूरे विश्व में बढ़ी है। देशहित की प्रेरणा से युवा शक्ति, मातृशक्ति, उद्यमी किसान, श्रमिक, जवान, प्रशासन, शासन सभी से प्रतिबद्धतापूर्वक अपने कार्य में डटे रहने से विश्वपटल पर भारत की छवि, शक्ति, कीर्ति व स्थान निरंतर उन्नत हो रहा है। यह कहने के बाद वो समाज को चेताते भी हैं, हम सबके इस कृतनिश्चय की परीक्षा लेने के लिए कुछ मायावी षडयंत्र हमारे सामने उपस्थित हुए हैं जिनको ठीक से समझना आवश्यक है। अगर पूरे देश पर नजर डालें तो चारो तरफ के क्षेत्रों को अशांत व अस्थिर करने के प्रयास गति पकड़ते हुए दिखाई देते हैं। मोहन भागवत के भाषण को अगर समग्रता में विश्लेषित करने की कोशिश करें तो इस चेतावनी के बाद वो उन अदृष्य अंतराष्ट्रीय शक्तियों की भी चर्चा करते हैं जो पूरी दुनिया में अपने स्वार्थ के कारण लोकतंत्र के नाम पर दूसरे देशों में गड़बड़ियां फैलाने का कार्य करते हैं। वो अरब स्प्रिंग से लेकर बांग्लादेश में हिंसक तख्तापलट का उदाहरण देते हुए हिंदू समाज को संगठित और सबल बनने की बात को रेखांकित करते हैं।

डा मोहन भागवत समाज में भारतीय संस्कारों के नष्ट करनेवाली शक्तियों की पहचान करते हुए उनसे सतर्क भी करते हैं। डीप स्टेट, वोकिज्म, कल्चरल मार्क्सिस्ट जैसे शब्दों की चर्चा करते हुए इसको सांस्कृतिक परंपराओं का घोषित शत्रु करार देते हैं। वो बेहद तीखे शब्दों में इनपर आक्रमण करते हैं, सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं तथा जहां जहां जो भी भद्र, मंगल माना जाता है उसका समूल उच्छेद इस समूह की कार्यप्रणाली का अंग है। समाज मन बनाने वाले तंत्र व संस्थानों यथा शिक्षा तंत्र, शिक्षा संस्थान, संवाद माध्यम, बौद्धिक संवाद से अपने प्रभाव में लाना, उनके द्वारा समाज का विचार, संस्कार तथा आस्था को नष्ट करना यह इस कार्यप्रणाली का प्रथम चरण है। इसको हम इस तरह से भी समझ सकते हैं कि हिंदू त्योहारों के समय इस समूह को पर्यावरण की चिंता सताने लगती है। हिंदू धर्म प्रतीकों को पिछड़ेपन की निशानी बताने का अभियान चलाया जाता है। हिंदू समाज की किसी एक घटना से पूरे समाज को प्रश्नांकित किया जाता है। समाज में टकराव की संभावनाओं की निरंतर तलाश की जाती रहती है। जैसे ही कहीं कोई फाल्ट लाइन मिलती है तो ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं कि प्रतीत होता है कि ये समस्या बहुत बड़ी है। प्रत्यक्ष टकराव की जमीन भी तैयार कर दी जाती है। इसको नागरिकता संशोधन कानून के समय, किसान आंदोलन के समय और 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान में देखा जा सकता है। किस तरह से एक छोटी सी घटना को इकोचैंबर में बैठे अकादमिक, लेखन, सिनेमा से जुड़े लोगों ने गुब्बारे की तरह फुला दिया था। मोहन भागवत की राय है कि देश में बिना कारण कट्टरपन को उकसानेवाली घटनाओँ में अचानक वृद्धि हो रही है। परिस्थिति या नीतियों को लेकर मन में असंतुष्टि हो सकती है परंतु उसको व्यक्त करने या विरोध करने के प्रजातांत्रिक मार्ग होने चाहिए। उनका अवलंबन न करते हुए हिंसा पर उतर आना और भय पैदा करने के प्रयास करने को वो बेहद तल्ख शब्दों में गुंडागर्दी कहते हैं। अकारण हिंसा फैलाकर तंत्र को बाधित करने के इन प्रयासों को बाबासाहेब अराजकता का व्याकरण कहते थे।

विजयादशमी पर डा मोहन भागवत के भाषण को दो हिस्सों में बांटकर देखा जाना चाहिए। पहला हिस्सा जिसमें वो सबल राष्ट्र की बात करते हैं। वो हिंदुओं के संगठित होने की अपेक्षा करते हैं। कहते हैं कि इस देश को एकात्म, सुख शांतिमय, समृद्ध और बल संपन्न बनाना यह सबकी इच्छा है और सबका कर्तव्य भी है। इसमें हिंदू समाज की जिम्मेवारी अधिक है। यहां वो बहुत अच्छा उदाहरण देते हैं, समाज स्वयं जगता है, अपने भाग्य को अपने पुरुषार्थ से लिखता है तब महापुरुष, संगठन, संस्थाएं, शासन, प्रशासन आदि सब सहायक होते हैं। शरीर की स्वस्थ अवस्था में क्षरण पहले आता है बाद में रोग उसको घेरते हैं। वो जब सबलता की बात करते हैं तो एक सुभाषित के माध्यम से कहते हैं कि दुर्बलों की परवाह तो देव भी नहीं करते। अपने भाषण के दूसरे हिस्से में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में संगठन की कार्ययोजना प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक समरसता, पर्यावरण, संस्कार जागरण, नागरिक अनुशासन और स्व गौरव आदि की बात करते हैं। वो इस बात की अपेक्षा भी जताते हैं कि संवाद माध्यमों का उपयोग करनेवालों को इनका उपयोग समाज को जोड़ने के लिए करना चाहिए ना कि तोड़ने के लिए, सुसंस्कृत बनाने के लिए हो ना कि अपसंस्कृति फैलाने के लिए। अपने व्याख्यान में उन्होंने ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री की गुणवत्ता को लेकर चिंता प्रकट की। ओटीटी पर आनेवाली सामग्री पर कानून के नियंत्रण पर भी बल दिया। यह सरकार के लिए भी एक संदेश है। जब संस्कारों और उसके क्षरण की बातें होंगी या जब सरकार के विरुद्ध जन के मानस में गलत छवि आरोपित करने की बात होगी तो ओटीटी प्लेटफार्म्स पर परोसी जानेवाली मनोरंजन सामग्री पर विचार करना ही होगा। समाज को संगठित करते हुए सबल बनाने की बात करते हुए मोहन भागवत ने ये भी स्पष्ट किया कि सबलता शील के साथ आनी चाहिए। विश्व मंगल की अवधारणा पर आधारित व्यवस्था में भारत को एक सबल राष्ट्र के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रत्येक भारतवासी को कार्य करना चाहिए। उन तत्वों की पहचान करके उनको परास्त करना होगा जो भारत के सिस्टम में रहते हुए भारत को कमजोर करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं।

 

Saturday, June 11, 2022

सत्य को भी चाहिए शक्ति का आधार


शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों में जिस तरह से उपद्रव और बवाल हुआ उसके बाद हिंदुओं और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। न्यूज चैनलों और इंटरनेट मीडिया पर पर कई स्वयंभू विचारक नए नए सिद्धांत पेश कर रहे हैं। कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हाल में संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए उनके वक्तव्य को उद्धृत कर रहे हैं। कुछ उत्साही विश्लेषक मोहन भागवत के वक्तव्य के उस अंश को उद्धृत करते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं जहां उन्होंने ज्ञानवापी के संदर्भ में अपनी बात रखी। वो लगातार चीख रहे थे कि संघ ने मुसलमानों को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है और अब संघ अपनी मुस्लिम विरोध की छवि में सुधार करना चाहता है। इंटरनेट मीडिया पर हिंदुत्व की ध्वजा लेकर विचरण करनेवाले कई विद्वान तो मोहन भागवत के इस बयान की तुलना लालकृष्ण आडवाणी के जिन्ना के मजार पर लिखी टिप्पणी से कर बैठे। उनकी इन बचकानी टिप्पणियों पर बात करने से पहले जरा देख लेते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा क्या था। 

सरसंघचालक ने कहा था कि ज्ञानवापी का अपना एक इतिहास है जिसको हम बदल नहीं सकते हैं। इसको न आज के हिंदू ने बनाया न आज के मुसलमानों ने बनाया। ये उस समय घटा। इस्लाम बाहर से आया, आक्रामकों के साथ आया। उस आक्रमण में भारत की स्वतंत्रता चाहनेवाले व्यक्तियों का मनोधैर्य खर्च करने के लिए देवस्थान तोड़े गए, जिनकी संख्या हजारों में है। उनमें से कइयों का हिंदुओं की आस्था में विशेष स्थान है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदुओं को लगता है कि पुनर्उत्थान का कार्य करना चाहिए। राममंदिर का एक आंदोलन हुआ अब उस तरह का आंदोलन नहीं करना है। लेकिन इश्यू जो मन में हैं वो उठते तो हैं। वो किसी के विरुद्ध नहीं हैं। ...आपस में मिल बैठकर सहमति से रास्ता निकालना चाहिए। हर बार सहमति से रास्ता नहीं निकलता तो संविधान सम्मत न्याय व्यवस्था को मानना चाहिए और उसपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए। इसी क्रम में वो कहते हैं कि ज्ञानवापी में हिंदुओं की श्रद्धा है लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना। उसके आगे भी उनका वक्तव्य चलता है जिसमें वो बाहर से आई पूजा पद्धति को अपनाने वालों को भी भारतीय बताते हैं। उनके और हिंदुओं के पूर्वजों के एक होने की बात करते हैं। लेकिन उनका पूरा जोर शक्ति पर होता है। 

अपने वक्तव्य के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बहुत स्पष्टता के साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात रखी। विस्तार से धर्म और स्व को परिभाषित किया। समन्वय, संतुलन, सबको साथ लेकर चलने, सबकी उन्नति करना ही स्व है और उसके आधार पर ही देश के तंत्र को स्थापित करने की बात होती है। धर्म के संरक्षण के लिए मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वो दो प्रकार से होता है। एक तो जब धर्म पर आक्रमण होता है तो उसको आक्रमण से बचाना होता है, बलिदान देना होता है। लड़ाई भी करनी पड़ती है। इसके अलावा धर्माचरण के माध्यम से धर्म की अभिवृद्धि की बात भी उन्होंने की। संघ प्रमुख ने जो बात रखी वो कोई नई बात नहीं कही है। नए विचारकों के लिए ये नई बात हो सकती है लेकिन मुसलमानों को लेकर संघ का ये विचार वर्षों से रहा है। हिंदुत्व और आक्रामक हिंदुत्व को परिभाषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषक गुरुजी गोलवलकर का नाम लेना नहीं भूलते हैं और ना ही भूलते हैं उनकी पुस्तक ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ को। इस पुस्तक के आधार पर वो मुसलमानों के प्रति संघ की सोच को व्याख्यायित करते हैं। लेकिन हिंदुत्व को या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सोच को विश्लेषित करनेवाले नए विचारक इस तथ्य से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर उसको जानबूझकर उजागर नहीं करते कि जिस वक्त गुरु गोलवलकर ने ये पुस्तक लिखी थी वो न तो संघ के पदाधिकारी थे और न ही सरसंघचालक। मुसलमानों को लेकर संघ का क्या सोच रहा है इसको जानने के लिए गुरू गोलवलकर और पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी की 30 जनवरी 1970 की बातचीत देखनी चाहिए। ये बातचीत नरेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण में संकलित है। इसमें जब सैफउद्दीन साहब ने मुसलमानों को लेकर उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा तो गुरुजी का कहना था कि हमें ये बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं। हम सब उनके वंशज हैं। आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें परंतु राष्ट्र के मामले में हम सबको एक रहना चाहिए। राष्ट्रहित के लिए बाधक सिद्ध होनेवाले अधिकारों और सहूलियतों की मांग बंद होनी चाहिए। हम हिंदू हैं, इसलिए हम विशेष सहूलियतों या अधिकारों की कभी बात नहीं करते। इसी बातचीत में गुरूजी एक जगह कहते हैं कि भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो नहीं है। तो अगर गुरू गोलवलकर की बातों को ध्यान से देखें तो यही लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत उन्हीं बातों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ा रहे हैं। संघ अपनी नीति पर कायम है, न तो कोई स्टैंड बदला है और न ही राष्ट्रविरोधियों को लेकर साफ्ट हुआ है। 

हिंदू धर्म और संघ की नीतियों के नए विश्लेषकों को मोहन भागवत जी के हाल के भाषण को फिर से सुनना समझना चाहिए। इस भाषण में मोहन भागवत ने एकाधिक स्थान पर शक्ति की महत्ता को रेखांकित किया है। वो तो यहां तक कहते हैं कि सत्य को भी शक्ति का आधार चाहिए होता है। बिना शक्ति के दुनिया नहीं मानती। उनके वक्तव्य की बारीकियों को समझे बिना किसी तरह का विश्लेषण अधूरा लगता है। वो हिंदू समाज को शक्ति देने की बात कर रहे हैं। बार बार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बगैर शक्ति के दुनिया आपकी बात मानना तो दूर सुनेगी भी नहीं। आज अगर भारत में हिंदुओं की बात सुनी जा रही है तो उसके पीछे समाज की शक्ति है। वो स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि दुनिया में दुष्ट लोग हैं जो हमको जीतना चाहेंगे इसलिए शक्ति की आराधना करनी चाहिए। उनके लगभग इकतीस मिनट के भाषण में हिंदू समाज को शक्ति देने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार आती है। मोहन भागवत की आलोचना करनेवाले व्याख्याकारों और टीकाकारों को उनके वक्तव्य को समग्रता में देखना चाहिए। संघ प्रमुख ने न तो संघ का कोई स्टैंड बदला है न ही वो मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी बात कर रहे हैं। संघ हमेशा से भारतीय मुलमानों को यहां का मानता है। उनको आक्रमणकारियों के साथ जोड़कर नहीं देखता है और यही अपेक्षा करता है कि इतिहासकार और भारतीय मुसलमान भी अपने को भारतीय मानें और आक्रांताओं के साथ खुद को जोड़कर नहीं देखें। नए नए संघ विचारक बने टीवी चैनलों की खिड़कियों पर रात दिन टंगे रहनेवाले स्वयंभू विद्वान किसी भी चीज को समग्रता में नहीं देख पाते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी वक्तव्य के एक छोटे हिस्से के आधार पर उसका मूल्यांकन करके निर्णय देने लग जाते हैं और दोष के शिकार हो जाते हैं। हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने का जो बयान है उसके पहले भी काफी देर तक हिंदू समाज को शक्ति देने की, धर्म की, स्व की, धर्माचरण के बारे में कहा गया लेकिन न तो उसको सुनने की किसी को फुर्सत है और न ही उसकी बारीकियों को विश्लेषित करने की कला। इसका नुकसान ये होता है कि समाज में गलत संदेश जाता है और भ्रम की स्थिति बनती है। इससे बचा जाना चाहिए।  


Saturday, October 17, 2020

अपनी जड़ों की ओर लौटता भारत


एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि ‘किसान क्षेत्र के हित के लिए करनेवाला हमारा संगठन सर्वमान्य संगठन बन गया है, और ऐसे हमारे संगठन को अनुकूलता भी प्राप्त हो गई है। क्योंकि जो हमारा विचार है, विज्ञान ने ही ऐसी करवट ले ली है कि हमने जिन तत्वों का उद्घोष अपनी स्थापना के समय से हम करते आए, विरोधों के बावजूद, उनको मान्यता देने के बजाए दूसरा कोई पर्याय रहा नहीं अब दुनिया के पास। कृषि के क्षेत्र में और जो कॉलेज में से पढ़ा है ऐसा कोई व्यक्ति आपकी सराहना करे ऐसे दिन नहीं थे। आज हमारे महापात्र साहब भी आपके कार्यक्रम में आकर जैविक खेती का गुणगान करते हैं। जैविक खाद के बारे में पचास साल पहले विदर्भ के नैड़प काका बड़ी अच्छी स्कीम लेकर केंद्र सरकार के पास गए थे। ये स्कीम अपने भारत की है, भारत के दिमाग से उपजी है, केवल मात्र इसके लिए उसको कचड़े में डाला गया। आज ऐसा नहीं है। पिछले छह महीने से जो मार पड़ रही है कोरोना की, उसके कारण भी सारी दुनिया विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधनेवाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है, आशा से देख रही है।‘ मोहन भागवत के भाषण के इस छोटे से अंश में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनकी ओर उन्होंने संकेत  किया है। पहली बात तो ये कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को मान्यता मिलने लगी है। मोहन भागवत ने ठीक ही इस बात को रेखांकित किया कि पूरी दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है।

मोहन भागवत के इस वक्तव्य के उस अंश पर विचार करने की जरूरत है जिसमें वो कह रहे हैं कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। दरअसल हमारे देश में हुआ ये कि मार्कसवाद के रोमांटिसिज्म में पर्यावरण की लंबे समय तक अनदेखी की गई। आजादी के बाद जब नेहरू से मोहभंग शुरू हुआ या यों भी कह सकते हैं कि नेहरू युग के दौरान ही मार्क्सवाद औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए उकसाने वाला विचार लेकर आया। औद्योगिकीकरण में तो विकास पर ही जोर दिया जाता है और कहा भी जाता है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। अगर विकास नहीं होगा तो औद्योगिकीकण संभव नहीं हो पाएगा।लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया। औद्योगिकीकरण का समर्थन करनेवाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव है। ये उपेक्षा इस हद तक है कि मार्क्स ने ‘मास्टरी ओवर नेचर’ की बात की है यानि प्रकृत्ति पर प्रभुत्व। सृष्टि के इस महत्वपूर्ण अंग, प्रकृति पर प्रभुत्व की कल्पना मात्र से ही इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत में बुनियादी दोष है। क्या ये मनुष्य के लिए संभव है कि वो प्रकृत्ति पर प्रभुत्व कायम कर सके। लेकिन मार्क्स ऐसा चाहते थे। उनके प्रकृत्ति को लेकर इस प्रभुत्ववादी नजरिए को उनके अनुयायियों ने जमकर बढ़ाया। इस बात का उल्लेख यहां आवश्यक है कि स्टालिन ने सोवियत रूस की सत्ता संभालने के बाद संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट किया। औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। नतीजा क्या हुआ ये सबके सामने है। बाद में इस गलती को सुधारने की कोशिश हुई लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका था। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। अभी तो इसके उल्लेख सिर्फ ये बताने के लिए किया गया कि साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद प्रकृति को लेकर बेहद उदासीन और प्रभुत्ववादी रही है। इसके विपरीत अगर हम विचार करें तो भारतीय विचार परंपरा में प्रकृत्ति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। इस पंचतत्व का निषेध या उससे आगे जाकर कुछ और नया खोज वैज्ञानिक अभी तक कर नहीं पाए हैं सिवा इसके कि वो इन पंच तत्वों के अंदर के अवयवों को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं। हमारी परंपरा में तो नदी पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। कभी भी आप देख लें किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृत्ति को भी याद किया जाता है। 

मोहन भागवत ने इस ओर भी इशारा किया है कि कोरोना के बाद स्थितियां बहुत बदल गई हैं। सचमुच बहुत बदली हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती हैं आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। हमारे जो वामपंथी प्रगतिशील मित्र आयुर्वेद का मजाक उड़ाया करते थे उनको सुबह शाम काढ़ा पीते या फिर गिलोई चबाते देखा जा सकता है। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। हमारे यहां तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए सूर्यास्त और और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है। आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। स परंपरा को अंग्रेजी के आभिजात्य मानसिकता और वामपंथ के विदेशी ज्ञान ने पिछले कई दशकों से नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की। सफल भी हुए। मोहन भागवत जी ने विदर्भ के एक किसान का जो उदाहरण दिया वो बेहद सटीक है। किसी भी प्रस्ताव को इस वजह से रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा कि वो भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित होती थी। अब देश एक बार फिर से अपनी जड़ों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरास की ओर लौटता नजर आ रहा है। 

अगर इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम ह पाते हैं कि हमारे देश में कथित तौर पर प्रगतिशील विचारों के शक्तिशाली होने की वजह से आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण शुरू हो गया। भारतीय विचारों को, भारतीय चिकिस्ता पद्धति को, भारतीय दर्शन को, भारतीय पौराणिक लेखन को सायास पीछे किया गया। उसको दकियानूसी, पुरानतनपंथी या परंपरावादी आदि कहकर उपहास किया गया। पश्चिमी आधुनिकता के आख्यान का गुणगान या उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय जीवन शैली और भारतीय पद्धति को प्रभावित करना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में एक ऐसा समाज बनने लगा था जो पूरी तरह से न तो भारतीयता में यकीन करता था और न ही पूरी तरह से पश्चिमी रीति-रिवाज को आत्मसात कर पा रहा था। पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के इस द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया। कोरोना की वजह से और देश में बदले राजनीति हालात ने एक अवसर प्रदान किया है जिसकी वजह से एक बार फिर से देश अपनी जड़ों की ओर लौटता दिख रहा है।   


Saturday, July 18, 2020

विकलांग मानसिकता से उपजा हास्य

हरिशंकर परसाईं का एक बेहद मशहूर व्यंग्य है, राजनीतिक पुंगी। उसमें वो लिखते हैं, ‘आदमी और पुंगी में क्या फर्क है? आदमी खुद बोलता है और पुंगी बजायी जाती है। पुंगी में सिर्फ खाली पोल होती है, उसमें स्वर नहीं होता। पुंगी का स्वर उसी आदमी का स्वर होता है, जिसके हाथ में वो है और जो उसको फूंक रहा है। पिछले कुछ सालों में इस देश के स्टैंडअप कॉमेडियनों ने यह सिद्ध कर दिया कि वो स्टैंडअप कॉमेडियन नहीं हैं, मेले में मिलनेवाली दो टके की पुंगी हैं।‘ हमने नेता की जगह स्टैंडअप कॉमेडियन कर दिया है। हरिशंकर परसाईं की याद इस वजह से आई कि पिछले दिनों हास्य के नाम पर सार्वजनिक मंचों पर बजनेवाली ये पुंगियां अज्ञान की वजह से बेसुरी हो गई हैं। इन सबसे निकलनेवाले स्वर समाज के बहुसंख्यक समुदाय को आहत भी करने लगा हैं और उनके अंदर गुस्से का बीज भी बोने लगे हैं। हास्य की ये पुंगियां जब बजती हैं तो संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेने की कोशिश करती हैं, लेकिन जब पुंगी सड़ने लगती है तो उससे स्वर की सुंदरता की अपेक्षा करना और उसके स्वर के अनुशासन के दायरे में रहने की कल्पना करना व्यर्थ है। लिहाजा हास्य की ये पुंगियां बहुधा संविधान के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करती हैं और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत कर देती हैं। ये पुंगियां अपने संवैधानिक अधिकारों को तो याद रखती हैं लेकिन लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में शायद ये भूल जाती हैं कि जो संविधान उनको अभिव्यक्ति की आजादी देता है वही संविधान अन्य नागरिकों को भी अन्य कई तरह के अधिकार देता है। जिसमें उनकी भावनाएं आहत न हों इसका भी ख्याल रखा गया है।
अब जरा इस बात पर विचार कर लें कि हास्य के इन पुंगियों यानि स्टैंडअप कॉमेडियंस किस तरह से हिंदू धर्म, हिंदू परंपरा, हिंदू भगवान, हिंदू अनुष्ठान, हिंदू रीति-रिवाज और हिंदू धार्मिक संस्कारों का उपहास करते हैं। कभी गणेश जी की सूंढ़ को लेकर प्लास्टिक सर्जरी के सौंदर्य की बातें करते-करते मर्यादा की सभी सीमा लांघ जाते हैं। उन्हें यह याद नहीं रहता कि गणेश जी को हिंदू, भगवान के तौर पर पूजते हैं और उनका मजाक उड़ाना कुछ लोगों की भावनाओं को बुरी तरह आहत कर सकता है। स्टेज पर खडे होकर फूहड़ बातें करके जनता को हंसाने की कोशिश करनेवाले इन स्टैंडअप कॉमेडियंस को इसकी परवाह कहां। अभी पिछले दिनों एक वीडियो सुन रहा था जिसमें एक स्टैंडअप कॉमेडियन कहता है कि वो इस वजह से नास्तिक बन गया क्योंकि अगर वो नास्तिक नहीं बनता तो उसको ब्राह्मण कहलाना पड़ता। फिर अपनी मुद्राओं से लोगों को हंसाने की कोशिश करता है और बोलने के क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आईएसआईएस को एक ही कोष्ठक में रखते हुए आगे निकल जाता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहां हिंदू प्रतीकों और देवताओं का मजाक उड़ाते नजर आते हैं। 
स्टैंडअप कॉमेडियंस की जो फौज इन दिनों यूट्यूब पर है उसमें से ज्यादातर ये मानते हैं कि विवादित बातें करके ही लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया जा सकता है। विवादप्रियता की वजह से ये लोग हिंदू देवी-देवताओं के बारे में उलजलूल बोलते हैं। उनको ये बात भी अच्छी तरह से मालूम है कि हिंदू समाज सहिष्णु है और वो बहुत जल्दी इस तरह की किसी बात पर उत्तेजित नहीं होता है। ये सब इसी सहिष्णुता का फायदा उठाकर हिंदू देवी-देवताओं के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी तक कर जाते हैं। एक कॉमेडियन तो भगवान शिव के बारे में इतनी आपत्तिजनक बातें कह गया है कि उसको लिखा भी नहीं जा सकता है। लेकिन जब हिंदू के अलावा किसी और धर्म की बात आती है तो इनकी जुबान तालू से चिपक जाती है। आपको याद होगा कि कुछ साल पहले एआईबी ने क्रिश्चियन समुदाय से बिना शर्त माफी मांगी थी। एक कार्यक्रम में इन लोगों ने कथित तौर पर जीजस और चर्च के खिलाफ कुछ टिप्पणी कर दी थी। उनकी टिप्पणी के सार्वजनिक होने के बाद एआईबी के खिलाफ कुछ क्रिश्चियन संगठनों के बयान आए थे। फौरन बाद एआईबी ने मुंबई के बिशप से मिलकर बिना शर्त लिखित माफी मांगी थी। माफी मांगनेवालों में जो लोग शामिल थे उनमें तन्मय भट्ट, गुरसिमरन, आशीष शाक्य और रोहन जैसे स्टैंडअप कॉमेडियन शामिल थे। बिशप ने इनका माफीनामा सार्वजनिक कर दिया था। इस्लाम को लेकर तो खैर कोई टिप्पणी आती ही नहीं। एंकर अर्णब गोस्वामी से विमान में सवाल पूछने का वीडियो जारी कर प्रचार हासिल करनेवाले कुणाल कामरा के बारे में मुझे किसी ने बताया कि उन्होंने कुछ समय पहले अपने ट्वीटर हैंडल से इस्लाम के बारे में की गई सारी टिप्पणियां हटा दी थीं। ये वही कुणाल कामरा है जो हिंदू धर्म और प्रतीकों के बारे में टिप्पणी करके खुद को परमवीर समझते हैं।    
स्टैंडअप कॉमेडियंस इतने पर ही नहीं रुकते, ये तो इतने संवेदनहीन हैं कि बलात्कार पीड़िता से लेकर एसिड अटैक पीड़िताओं तक का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते। हैरत इस बात पर होती है कि हमारे समाज में वो कौन लोग हैं जो इतने संवेदनशून्य हो चुके हैं कि इन पीड़िताओं के सार्वजनिक मजाक में भी उनको हास्य नजर आता है। पिछले दिनों सौरभ घोष नाम के कॉमेडियन ने छत्रपति शिवाजी का मजाक उड़ाया था, एक महिला कॉमेडियन ने भी। शिवाजी महाराज का मजाक उड़ाने का जब विरोध हुआ तो उस महिला ने एक वीडियो जारी करके माफी मांगी। इसका एक और पहलू भी है जहां से इस तरह की संवेदनहीन और आपत्तिजनक बातें करनेवालों को ताकत मिलती है। हिंदू देवी-देवताओं या प्रतीकों का जब मजाक उड़ाया जाता है और उसका विरोध होता है तो कथित तौर पर खुद को लिबरल कहनेवाली पूरी जमात उनके समर्थन में खड़ी हो जाती है। विरोध करनेवालों को संघी और भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल से जुड़ा बताकर मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश होती है। सोशल मीडिया पर तो इस विरोध को मोदी से जोड़ दिया जाता है और विरोध करनेवालों को भक्त आदि कहकर इस तरह से प्रचारित करने की कोशिश होती है कि हिंदूवादी कितने असहिष्णु हैं। सोशल मीडिया पर ये कथित लिबरल्स एक और खेल खेलते हैं। वो किसी एक ऐसे व्यक्ति को खोजते हैं जिसकी टिप्पणी स्तरहीन होती है और फिर उसको मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर शोर मचाने लगते हैं कि देखो सारे हिंदू ऐसे ही हैं। सवाल इन लिबरल्स का नहीं है, सवाल तो उन स्टैंडअप कॉमेडियंस का है जो हिंदू धर्म और उसके प्रतीकों का मजाक उड़ाते हुए एक बड़ी जनसंख्या की आस्था को अपमानित करते हैं। हुसैन के केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि ‘शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में जो अधिकार मिला है वो हर नागरिक के लिए अमूल्य है। कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिव्यक्त कर सकता है। इन मनोभावों और आइडियाज की अभिव्यक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है।‘ स्टेज पर बजनेवाले पुंगियों के समर्थक लिबरल्स को ये बात कब समझ में आएगी पता नहीं, लेकिन जिस रफ्तार से इंटरनेट पर इस तरह के वीडियो अपलोड हो रहे हैं वो चिंता की बात है। देश को और सरकार को इसपर विचार करना ही चाहिए। 

Thursday, November 6, 2014

संघ का यूपी-बिहार प्लान

वीर सावरकर ने एक बार खफा होकर लिखा था कि संघ के स्वयंसेवकों की समाधि पर लगे पत्थर पर लिखा होगा – ये पैदा हुआ, इसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ज्वाइन किया और इसकी मृत्यु हो गई । दरअसल वीर सावरकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से इस बात को लेकर खफा थे कि संघ उनकी राजनीतिक गतिविधियों में मदद नहीं कर रहा था । हलांकि काफी वर्षों बाद सावरकर ने ये माना था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का राजनीति में नहीं जाने का फैसला अच्छा और सही था । इसी तरह से इकतीस जनवरी 1934 को कांग्रेस के खजांची और मशहूर उद्योगपति जमनालाल बजाज जब गणपत राव की मार्फत डॉ हेडगवार से मिले और उनसे कांग्रेस की छतरी तले काम करने का अनुरोध किया । डॉ हेडगवार ने जमनालाल जी के प्रस्ताव पर कहा कि वो ऐसे स्वयंसेवक तैयार करना नहीं चाहते जो नेताओं की राजनीति के लिए इस्तेमाल हों । वक्त के साथ हालात बदले और संघ की सोच भी बदलती चली गई । संघ और राजनीति का साथ तो 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ ही शुरू हो गया था लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान तमाम तरह की हिचक भी खत्म हो गई । पहले संघ के लोग कहते थे कि संघ का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है लेकिन अब इस तरह के बयान सुनने में नहीं आ रहे ।  संघ अब भी मूलत: एक सांस्कृतिक संगठन है जो देश के नागरिकों के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन अब वो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सत्ता और शासन का इस्तेमाल भी करने में परहेज नहीं करता है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को करीब से जानने वाले या संगठन के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले यह जानते हैं कि संघ प्रमुख नागपुर के अलावा किसी एक स्थान पर ज्यादा वक्त तक नहीं रुकते हैं । पिछले दिनों लखनऊ में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हफ्ते भर से अधिक वक्त बिताया । क्यों । यह जानना दिलचस्प है । सतह पर जो जानकारी तैर रही थी वो यह थी कि लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बैठक थी लिहाजा संघ प्रमुख वहां थे । यह देखा गया है कि इस तरह की बैठकों के दौरान संघ प्रमुख इतने लंबे वक्त तक उस स्थान पर टिकते नहीं है । लखनऊ में संघ प्रमुख का टिकना वृहत्तर संघ परिवार के मिशन यूपी और अविभाजित बिहार का हिस्सा था । यूपी में लोकसभा चुनाव में बंपर सफलता के बाद संघ और बीजेपी का अगला लक्ष्य सूबे में सरकार बनाना है । यूपी में करीब ढाई साल बाद चुनाव होना है । उस चुनाव की रणनीति बननी शुरू हो गई है । इसके अलावा अगले साल बिहार में और अगले महीने झारखंड में भी चुनाव है । इन राज्यों में संघ के कार्यकर्ता पिछले कई सालों से सक्रिय हैं लेकिन पिछले एक दशक में इस सक्रियता में कमी देखने को मिली । नब्बे के दशक में जब से बिहार और उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय के आंदोलन को मजबूती मिलनी शुरू हुई तो संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों की संख्या में कमी आने लगी ।
अब लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली सफलता से संघ नेतृत्व भी खासा उत्साहित है । इस लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने जात-पात से उपर उठकर वोट दिया। सामाजिक न्याय और दलितों की राजनीति करनेवाली पार्टियां बुरी तरह से परास्त हुई । इन पार्टियों की इसी पराजय में संघ को संभावना नजर आ रही है । इसी संभावना को हकीकत में बदलने के लिए संघ पूरी तौर पर सक्रिय है । इसी कड़ी में यूपी से ताल्लुक रखनेवाले कृष्ण गोपाल को संघ और बीजेपी के बीचत के समन्वय का काम सौंपा गया है । संघ ने 2012 में ही ये भांप लिया था कि बगैर उत्तर प्रदेश और बिहार पर कब्जा किए देश की राजनीति पर पकड़ मजबूत नहीं की जा सकती है । जनवरी 2012 में संगम पर मोहन भागवत ने संघ के दरवाजे सबके लिए खुले होने की बात कहकर सभी जातियों को संकेत दिया था । उसी साल मोहन भागवत ने लखनऊ के प्रबुद्ध वर्ग के लोगों के साथ मुलाकात कर उनकी राय ली थी । जानकारों का कहना है कि दो हजार बारह से संघ ने जो मिशन यूपी शुरू किया था उसका लाभ 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान देखने को मिला । अब एक बार फिर से संघ ने मिशन यूपी पार्ट टू शुरू किया है लेकिन इस बार यूपी के साथ साथ उसके एजेंडे पर बिहार और झारखंड भी है । लखनऊ में केंद्रीय कार्यकारिणी मंडल की बैठक में संघ ने आतंकवाद, धर्मांतरण और सुरक्षा जैसे मुद्दों की बजाए स्वच्छता, पर्यावरण और कम्युनिटी लीविंग जैसे विषयों को अपने एजेंडे में शामिल किया । ये ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे सीधे जनता से जुड़ते हैं । इतिहास गवाह है कि इन मुद्दों को उठानेवाले नेताओं और संगठनों को व्यापक जनस्वीकार्यता मिली है। संघ ने इसी जनस्वीकार्यता को बढ़ाने के लिए दलितों और पिछडो़ं के बीच समरसता बढ़ाने पर भी जोर दिया । मोहन भागवत ने साफ कहा कि जब तक समाज साथ में खड़ा नहीं होगा, नेता, नारा, पार्टी, सरकार और चमत्कार से समाज का भला नहीं हो सकता । इसी वाक्य के मद्देनजर संगठन के विस्तार को मजबूती देने और विवादास्पद मुद्दे को ठंडे बस्ते में रखने का निर्णय लिया । यह अकारण नहीं कि राम मंदिर के मुद्दे को राष्ट्र का मुद्दा बताकर हल्का कर दिया गया और यह तय किया गया कि केंद्र की सरकार के लिए फिलहाल मुसीबत नहीं खड़ा करना है । मिशन यूपी और बिहार की सफलता के लिए एक बार संघ की सक्रियता बीजेपी को सांगठवनिक तौर पर मजबूती दे सकती है । परिणाम तो जनादेश से पता चलेगा ।