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Saturday, March 1, 2025

भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता


शिवरात्रि के साथ ही प्रयागराज महाकुंभ का समापन हो गया। प्रयागराज में डेढ़ महीने तक चले महाकुंभ के दौरान करोड़ों आस्थावान हिंदुओं ने पवित्र संगम में डुबकी लगाई। तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करके भी देश के कोने कोने से श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे। प्रयागराज और दिल्ली में भगदड़ से हुई मौत ने भी आस्था के इस समागम पर कोई प्रभाव डाला हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। दो दुर्घटनाओं में जो मौत हुईं वो बेहद तकलीफदेह है। बावजूद इसके अगर महाकुंभ में शिवरात्रि के दिन तक गंगा में स्नान करनेवालों की संख्या में कमी नहीं आई तो इसके पीछे कुछ न कुछ कारण तो होगा। कई विरोधी दल के नेताओं ने कुंभ को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां कीं उसने भी जनता के मनोबल पर कोई विपरीत असर नहीं डाला। 

कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो यहां तक कह दिया कि कुंभ में डुबकी लगाने से नौकरी नहीं मिलती, पेट नहीं भरता आदि आदि। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव निरंतर कुंभ को लेकर टीका टिप्पणी करते रहे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो महाकुंभ को मृत्युकंभ तक कह दिया। विपक्षी नेताओं के इतना सब कहने के बाद भी महाकुंभ के दौरान पवित्र स्नान करनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या का कीर्तिमान बना। एक अनुमान के मुताबिक इस महाकुंभ में बड़ी संख्या में युवाओं ने भी आस्था की डुबकी लगाई। इसको युवाओं के सनातन की ओर बढ़ते झुकाव या फिर अपनी जड़ों की ओर लौटने की तरह देखा जा रहा है। विपक्षी नेता भले ही वोटबैंक के लोभ-लालच में सनातन के इस विशेष आयोजन को लेकर उलजलूल टिप्पणियां कर रहे थे लेकिन भारत के जन का मन कहीं और रमा था। 

इस वातावरण को देखकर प्रेमचंद के एक लेख का स्मरण हो रहा है। प्रेमचंद का एक निबंध है, स्वराज्य के फायदे। इस निबंध में प्रेमचंद ने स्वाधीनता के फायदे गिनाए हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा फायदा बताया है वो इस प्रकार है। प्रेमचंद कहते हैं, स्वराज्य से देश को सबसे बड़ा फायदा जो होगा वह भारतीय जीवन का पुनरुद्धार है। प्रत्येक जाति के जीवन में कोई प्रधान गुण होता है। अंग्रेज जाति का प्रधान गुण पराक्रम है, फ्रांसिसियों का प्रधान गुण स्वतंत्र प्रेम है, उसी भांति भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है। हमारे जीवन का मुख्य आधार धर्म था। हमारा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ था। लेकिन पश्चिमी विचारों के असर से हमारे धर्म का सर्वनाश हुआ जाता है, हमारा वर्तमान धर्म मिटता जाता है, हम अपनी विद्या को भूलते जाते हैं। अपने रहन-सहन, रीति-रिवाज से विमुख होते जाते हैं। हमारा अद्वितीय सामाजिक संगठन छिन्न-भिन्न हुआ जाता है। पश्चिम की देखादेखी हम धनोपार्जन को ही जीवन का लक्ष्य मानने लगे हैं। संपत्ति को ही सर्वापरि समझने लगे हैं। यही हमारा धर्म हो गया है। 

ज्ञान का, संतोष का, कर्तव्यपालन का , त्याग का महत्व हमारी निगाहों में उठता जाता है। हम विद्या को धर्म समझ कर सीखते और सिखाते थे, चाहे वो गान विद्या हो, धनुर्विद्या हो या कोई अन्य विद्या हो। अब हम उसे धनोपार्जन के लिए सीखते और सिखाते हैं। हममें परस्पर प्रेम नहीं रहा, सहानुभूति नहीं रही। हमारी मैत्री, हमारा प्रेम, हमारी सदिच्छाएं, हमारे ह्रदय की उच्च वृत्तियां, सभी धन इच्छा के नीचे दबती जाती हैं। सारांश यह है कि हम अपनी आत्मा को भूलते जाते हैं। स्वराज्य पाकर हम अपनी आत्मा को पा जाएंगे। हमारे धर्म का उत्थान हो जाएगा। अधर्म का अंधकार मिट जाएगा और ज्ञान भास्कर का उदय होगा।...हम किसी जाति के पिछलग्गू न बनकर संसार सभा में उचित स्थान पर बैठेंगे। हमारी गणना दीन हीन परवश जातियों में न होकर उन जातियों में होने लगेगी जिनके हाथों में संसार की बागडोर है।...हम उन्नत और बलवान जातियों के सम्मुख बैठने के अधिकारी हो जाएंगे। 

प्रेमचंद की उपर्युक्त टिप्पणी में दो महत्वपूर्ण बात है। एक तो जब वो कहते हैं कि भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है और हमारा पूरा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ है। उनके इस वाक्य से समझा जा सकता है कि भारतीय समाज जीवन में धर्म का कितना महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। जब वो पश्चिमी विचार की बात करते हैं तो उनके दिमाग में क्या रहा होगा ये कहना कठिन है। अनुमान लगाया जा सकता है कि वो उन विचारों की चर्चा कर रहे होंगे जिसने भारत के मूल विचार पर प्रहार किया। प्रश्न उठ सकता है कि क्या वो मार्क्स और उनके विचारों की ओर इशारा कर रहे थे? प्रेमचंद ने इस निबंध के आरंभ में भी स्वराज्य के फायदे को गिनने को ईश्वर के गुणों को गिनने जैसा बताया है। सिर्फ इस निबंध में ही नहीं बल्कि प्रेमचंद ने अपने लेखन में अन्यत्र भी ईश्वर और भगवान का स्मरण किया है। प्रेमचंद सनातनी थे। सनातन और भारत में उनकी पूर्ण आस्था थी। बावजूद इसके अकादमिक जगत के वामपंथी विचार के शिक्षकों ने उनको जबरदस्ती वामपंथी घोषित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दूसरी बात ये देखी जानी चाहिए कि प्रेमचंद ने जाति शब्द का उपयोग किन अर्थों में किया है। वो अंग्रेजों को फ्रांसीसियों को भारतीयों को एक जाति के तौर पर देखते हैं। उनके लिए जाति का मतलब एक तरीके से राष्ट्रीयता है। बाद में पता नहीं किन परिस्थियों में जाति को समूह विशेष के साथ जोड़ दिया गया। यह पूरा मसला एक अलग अध्ययन की मांग करता है। 

प्रेमचंद भारत में जिस धर्मपरायणता की बात कर रहे हैं वो भारतीयों का मूल जीवन दर्शन है। प्रगतिशीलता के दावे करनेवालों के मन में कहीं न कहीं धर्म और उसकी परायणता को लेकर एक लगाव दिखता है। कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि धर्म और आस्था बहुत ही व्यक्तिगत चीज है, ऐसे लोग भी धर्म को लेकर भ्रमित होते हैं। वो धर्म को कर्मकांड समझ लेते हैं और उसके ही आधार पर धर्म की व्याख्या कर उसके फायदे और नुकसान गिनाने लगते हैं। धर्म ना तो फायदा देखता है और ना ही नुकसान। उसका उद्देश्य तो मानव कल्याण है। धर्म को अफीम बतानेवाली विचारधारा के अनुयायी इस बात को समझ नहीं पाते हैं। अपने एजेंडे के अनुसार समाज में शोर मचाते हैं। धर्म के विरोध में वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं। प्रेमचंद ने पराधीनता के कालखंड में ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि अगर भारत की जनता धर्म की ओर उन्मुख होती है तो संसार सभा में हमारे देश को उचित स्थान मिल सकेगा। आज वैश्विक स्तर पर भारत की जो स्थिति है उसको प्रेमचंद के इस अनुमान के साथ मिलाकर देखने के स्पष्ट तस्वीर बनती है। वैश्विक परिदृष्य में आज भारत ना तो किसी जाति का पिछलग्गू है और ना ही कोई अन्य देश हमारी उपेक्षा करने के बारे में सोच भी सकता है। आज भारत को दीन-हीन परवश जाति बताने का साहस दुनिया का शक्तिशाली और विकसित देश भी नहीं कर सकते हैं। आज कोई भी इतिहासकार भारत के बारे में लिखते हुए इसको संपेरों का देश कहने का साहस नहीं कर पाएगा। यह भारतीय जनता की धर्मपरायणता का ही प्रतिफल है। सनातन का जितना उत्थान होगा भारत उतना सबल और शक्तिशाली होगा। धर्मो रक्षति रक्षित:। 


Saturday, November 2, 2024

हिंदुओं की वैश्विक व्याप्ति और समाज


महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा के लिए चुनाव में प्रचार चरम पर है। इन दोनों राज्यों में चुनाव प्रचार के बीच उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर होनेवाले उपचुनाव को लेकर भी राजनीतिक सरगर्मी तेज है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बंटेंगे तो कटेंगे वाले बयान की काट ढूंढने में विपक्ष परेशान प्रतीत हो रहा है। कभी जीतेंगे तो पिटेंगे जैसा बयान आते हैं तो कभी जुड़ेंगे तो जीतेंगे जैसे नारे होर्डिंग पर लगते हैं। पूरे चुनाव प्रचार में हिंदू और सनातन की ही चर्चा हो रही है। योगी आदित्यनाथ ने तो रामभक्त ही राष्ट्रभक्त का नारा भी दे दिया है। इसपर पलटवार करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि उनका नारा निराशा और नाकामी का प्रतीक है। अखिलेश यादव ने आदर्श राज्य की कल्पना की बात की। यहां वो राम राज्य कहने से बच गए, लेकिन पूरे पोस्ट से भाव यही निकल रहा है। उनके दल के प्रवक्ता भी श्रीरामचरितमानस की चौपाइयां सुना रहे हैं। हिंदू विमर्श और पौराणिक चरित्र विधानसभा चुनाव प्रचार का केंद्रीय विमर्श है। कुछ लोगों को हिंदू और श्रीराम नाम लेने में कष्ट होता है। वो इशारों में अपनी बात कहते हैं। हिंदुओं की एकजुटता और हिंदू वोटरों को अपने पाले में करने के लिए सभी राजनीतिक दल बेचैन हैं। कोई जाति कार्ड खेल रहा है तो कोई जाति जनगणना की बात को हवा दे रहा है। 

हिंदुओं की चिंता सिर्फ विधानसभा चुनावों में नहीं हो रही है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इसको लेकर चर्चा हो रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार में भी हिंदुओं को लेकर दोनों दल सतर्क हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने तो हिंदुओं पर बंगलादेश में हो रहे अत्याचार पर एक लंबी पोस्ट ही लिख डाली। ट्रंप ने लिखा कि वो बंगलादेश में हिंदुओं, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यों पर होने वाले बर्बर हिंसा की निंदा करते हैं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी कमला हैरिस और अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर आरोप लगाया कि दोनों ने मिलकर अमेरिका और पूरे विश्व में हिंदुओं की अनदेखी की। ट्रंप ने स्पष्ट रूप से ये घोषणा की है कि धर्म के विरुद्ध रैडिकल लेफ्ट के एजेंडा से अमेरिकन हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए वो प्रतिबद्ध हैं। हिंदुओं की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करेंगे। भारत और अपने मित्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बेहतर समन्वय बनाकर चलेंगे। इसके बाद उन्होंने हिंदुओं को दीवाली की शुभकामनाएं दी और कहा कि ये ये पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। उधर डेमोक्रैट पार्टी की उम्मीदवार और अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी दीवाली मनाई। दीवाली मनाते हुए उनका वीडियो उनकी टीम ने इंटरनेट मीडिया पर साझा किया। जो बाइडेन ने भी व्हाइट हाउस में अपने परिवार के साथ दीवाली मनाई। जिस तरह से अमेरिका के चुनाव में हिंदुओं की बात हो रही है उतना खुलकर तो यहां भी हिंदुओं और हिंदू धर्म की चर्चा नहीं होती है। पिछले दिनों जब ब्रिटेन में चुनाव हुआ था तो वहां भी प्रधानमंत्री पद के दोनों उम्मीदवारों ने मंदिरों में जाकर पूजा आदि की थी। ऋषि सुनक ने तो खुलकर हिंदू देवी देवताओं के बारे में श्रद्धापूर्वक बात की थी। 

एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बंगलादेश में हिंदुओं पर होनेवाले अत्याचार पर खुलकर बोल और लिख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में कई दलों के नेता इस मुद्दे पर खामोशी ओढे हुए हैं। जब भी बंगलादेश में हिंदुओं पर होनेवाले अत्याचार की चर्चा होती है और इन दलों के नेताओं या प्रवक्ताओं से इस बाबत प्रश्न पूछा जाता है तो वो अपने उत्तर के साथ साथ फिलस्तीन का मुद्दा भी उठा देते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने इजरायल में घुसकर ना केवल नरसंहार किया बल्कि सैकड़ों बच्चों और महिलाओं को बंधक भी बना लिया था। इस क्रिया की प्रतिक्रिया में फिलस्तीन पर इजरायल हमले कर रहा है। इससे उलट बंगलादेश में तो हिंदुओं ने किसी प्रकार की कोई हिंसा नहीं की। उनपर तो वहां के बहुसंख्यकों ने अकारण हमले किए। हिंदुओं की हत्या की गई। मंदिरों को तोड़ा गया। जब भारत के सभी राजनीतिक दलों को इस हमले के खिलाफ एक स्वर में बोलना चाहिए था उस वक्त ये किंतु परंतु में अटके रहे। अब भी हैं। इसका कारण क्या हो सकता है। एक वजह है वोटबैंक की राजनीति। जो दल अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों की राजनीति करते हैं उनको लगता है कि बंगलादेश में हिदुओं पर हो रहे हमलों का विरोध करने से उनका वोटबैंक दरक सकता है। इस कारण वो हिंदुओं पर होनेवाले हमले को लेकर तटस्थ हो जाते हैं। धर्म और राजनीति के घालमेल की आड़ लेते हैं। तर्क होता है कि धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए। इस तर्क को इकोचैंबर में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवी हवा देते हैं। ऐसा माहौल बनाते हैं कि राजनीति से धर्म को अलग रखना चाहिए। दरअसल इकोचैंबर वाले बुद्धिजीवी ये नहीं समझ पाते कि मार्क्स ने जिस धर्म की बात की थी और जो भारत का धर्म है वो दोनों बिल्कुल अलग हैं। 

आज पूरी दुनिया हिंदुओं की ओर देख रही है। वो सनातन धर्म को समझना चाहती है। हिंदुओं की उस जीवन शैली को समझना चाहती है जिसकी इकाई परिवार है। एकल परिवार से ऊब चुकी दुनिया भारतीय परिवारों और उनके बीच के लगाव को समझना चाहती है। संस्कारों के बारे में जानने को उत्सुक है। हिंदू धर्म और अध्यात्म को लेकर वैश्विक स्तर पर एक रुझान देखा जा रहा है। ऐसे में अपने देश में हिंदुओं और उनके ग्रंथों को लेकर और सनातन पर अपमानजनक टिप्पणियां करनेवालों को पुनर्विचार करना चाहिए। जब पूरी दुनिया हिंदुओं की ओर देख रही है ऐसे में अपने ही देश में हिंदुओं को लेकर घृणा भाव बहुत दिनों तक चलनेवाला नहीं है। हिंदू धर्म में जो भी कुरीतियां हों उसको दूर करने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। ऐसा पहले होता भी रहा है। हिंदू समाज के अंदर से ही कोई ना कोई सुधारक आता है जो कुरीतियों पर प्रहार करता है और वृहत्तर हिंदू समाज उसको स्वीकार करता है। कुरीतियों और रूढ़ियों के आधार पर हिंदू समाज को बांटने का जो षडयंत्र चल रहा है उसका निषेध हिंदू समाज ही करेगा। अगर कोई सोचता है कि हिंदू समाज को अपमानित करके अपने वोटबैंक को मजबूत कर लेगा तो वो गलतफहमी में है। हिंदू एकता पर पहले भी बातें होती रही हैं, साहित्य में भी इसके उदाहरण मिलते हैं और इतिहास में भी। रामचंद्र शुक्ल से लेकर शिवपूजन सहाय और रामवृक्ष बेनीपुरी के लेखन में हिंदुओं को संगठित होने की अपेक्षा की गई है। यह अकारण नहीं है कि आज प्रबुद्ध हिंदू समाज भी इस ओर सोचने लगा है। सहिष्णुता हिंदुओं का एक दुर्लभ गुण है लेकिन सहिष्णुता को अगर निरंतर छेड़ा या कोंचा जाएगा तो एक दिन उसकी प्रतिक्रिया तो होगी ही। स्वाधीनता के बाद से ही विचारधारा विशेष के लोगों ने हिंदुओं को अपमानित करने का योजनाबद्ध तरीके से लेकिन परोक्ष रूप से उपक्रम चलाया। ऐसा करनेवाले अब परिधि पर हैं और हिंदू केंद्र में। 


Saturday, February 25, 2017

मर्यादाहीन बयानों से शर्मसार लोकतंत्र

चाहे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव जब भी चुनाव का दौर लंबा चलता है तो नेताओं की जुबान थकने लगती है । जब जुबान थकती है तो वो फिसलने भी लगती है । जब जुबान फिसलती है तो मर्यादा तार-तार होती है । जब मर्यादा तार-तार होती है तो फिर एक बार दौर शुरू होता है उस चर्चा का जिसमें राजनीतिज्ञों के भाषा के गिरते स्तर पर बात होती है । इन सबके बीच चुनाव खत्म हो जाता है और फिर नेताओं की जुबान लगभग काबू में आ जाती है । जिसके पक्ष में जनादेश होता है और वो जश्न में डूब जाते हैं और जिसको जनता ठुकरा देती है वो आत्ममंथन आदि की बात करते हुए नेपथ्य में चले जाते हैं । चुनाव के दौरान जिस तरह से बदजुबानी का बवंडर उठता है वो भी थम सा जाता है । पाठकों को याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान या दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हुआ था वो अब लगभग वोटरों के मानस पटल से लगभग विस्मृत हो गया है । रामजादे के साथ जिस एक अन्य जादे का प्रयोग हुआ था वह बेहद आपत्ति जनक था । लेकिन यह टीवी का दौर है और नेताओं को लगता है कि टीवी पर उनके भाषणों का वही हिस्सा दिखाया जाएगा जो विवादस्पद होगा । स्वस्थ आलोचना कभी भी भाषा की मर्यादा को नहीं तोड़ती और यह सच है कि जब भाषा की मर्यादा नहीं टूटती तो न्यूज चैनलों में स्पंदन नहीं होता । सारे दिन चलनेवाले न्यूज चैनलों के इस दौर में नेताओं के विवादित या बिगड़े बोल हमेशा प्राथमिकता पाते हैं । बार बार उन्हीं बयानों को दिखाया जाता है । टीवी और सोशल मीडिया के दौर में भाषा अपनी सीमा रेखा का बार बार अतिक्रमण करती है ।  

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे जैसे चरणबद्ध तरीके से खत्म होने की ओर बढ़ रहा है नेताओं की जुबान फिसलने लगी है । अखिलेश यादव ने जिस तरह से गुजराती गधों का जिक किया उससे साफ था कि उनका इशारा किस ओर था ।  अखिलेश यादव ने सदी के महानायक यानि अमिताभ बच्चन से अपील की वो गुजरात के गधों का विज्ञापन नहीं करें । गधों वाली सियासत यहीं नहीं रुकी और बीजेपी के नेताओं ने अखिलेश पर निशाना साधा और कहा कि दरअसल यूपी के लोग बताएंगे कि गुजरात के जंगली गधों और सामान्य गधों में क्या फर्क है, तब अखिलेश को समझ आएगा । यहां भी इशारा साफ था । अब आप ही इस बात का अंदाजा लगाइए कि हमारी सियासत किस तरह से गधे के प्रतीकों के सहारे मजबूती पा रही है । जब नेता गधों की सियासत में करे तो उस पार्टी के अन्य लोगों के हौसले बुलंद हो जाते हैं और अपने नेता से एक कदमआगे बढ़कर अपनी भी उपयोगिता साबित करने में लग जाता है । उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ समाजवादी पार्टी के नेता राजेन्द्र चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह को आतंकवादी बता दिया । उन्होंने बहुत चतुराई से अपना यह बयान एक एजेंसी के कैमरे पर दिया ताकि सभी चैनलों तक एक साथ उनका बयान पहुंच जाए । आजम खान ने तो प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिए बगैर उनको रावण तक कह डाला ।  ऐसा नहीं है कि सिर्फ समाजवादी पार्टी के नेताओं की तरफ से ही बदजुबानी की गई हो । बीजेपी के नेताओं ने भी कई बार सियासी लक्ष्मण रेखा लांघी । केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने तो मुलायम सिंह यादव के मरने की बात तक कह जाली । संजीव बालियान ने कहा कि मुलायम सिंह यादव हमेशा से सांप्रदायिक राजनीति करते रहे हैं और मैं उनसे कहना चाहूंगा कि अब उनके मरने का वक्त आ गया है । यह कैसी सियासत है जहां नेता एक दूसरे नेता के मरने के वक्त की घोषणा करते नजर आ रहे हैं । संजीव बालियान पहले भी विवादित बयान देते रहे हैं । विनय कटियार ने प्रियंका गांधी की खूबसूरती पर तंज कसते हुए कहा था कि उनसे ज्यादा खूबसूरत नेता हमारे स्टार प्रचारक हैं । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बीएसपी की नेता मायावती पर जोरदार हमला बोला और उनकी पार्टी को बहनजी संपत्ति पार्टी कह डाला । नरेन्द्र मोदी अपनी चुनावी सभा में इस तरह के बयान पहले भी देते रहे हैं । पिछले चुनाव में उन्होंने शरद पवार की पार्टी एनसीपी को नैचुरली करप्ट पार्टी कहा था । कुछ लोगों का आरोप है कि चुनावी रैलियों के दौरान नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद की मर्यादा और गरिमा भूल जाते हैं । बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने भाषणों में कहा था कि एक शहजादे से मां तो दूसरे से पिता परेशान हैं. और दो शहजादे प्रदेश लूटने आए हैं । राजनीति की इस काली कोठरी में जिस तरह से बयानों के तीर चलते हैं उसकी कालिख से सबका दामन दागदार होता है और दागदार होता है हमारा लोकतंत्र भी । नेताओं के बीच पहले भी भाषा की मर्यादा टूटती रही है । नेहरू जी के शासन काल से लेकर इंदिरा गांधी के दौर तक भी चुनाव के दौरान या उसके बाद भी नेताओं ने एक दूसरे पर कीचड़ उछाले थे । गली गली में शोर है इंदिरा गांधी चोर है जैसे नारे भी इस देश में लगे थे । राजनारायण अपने निम्नतम स्तर के भाषणों और बयानों के लिए के लिए कुख्यात रहे हैं । उनके चुनावी भाषणों में तो कई बार गाली गलौच तक का इस्तेमाल होता था । लेकिन उस दौर में कम लोग भाषा के निम्नतम स्तर पर जाते थे लेकिन अब तो बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा नेता भी अपने बयानों से लोकतंत्र को शर्मसार करता है । यह लोकतंत्र के लिए बहुत बुरा और अफसोस का वक्त है । वक्त तो संभलने का भी है क्योंकि अगर जनता के नुमाइंदे ही भाषाई गरिमा को गिराएंगे तो फिर जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है ।  

Monday, December 12, 2016

दागियों पर समाजवादी दांव

जिस दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक कार्यक्रम में ये ऐलान कर रहे थे कि सूबे के चुनाव में धर्म और जाति की सियासत पर विकास भारी पड़ेगा उसी दिन शाम को उनके चाचा और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए तेइस प्रत्याशियों की सूची जारी कर मुख्यमंत्री के दावों की ना सिर्फ हवा निकाल दी बल्कि आगे क्या होने वाला है इसके संकेत भी दे दिए । अखिलेश यादव जहां पिछले पांच सालों में किए गए अपने विकास के कामों पर और अपनी स्वच्छ छवि पर भरोसा है वहीं शिवपाल सिंह यादव उत्तर प्रदेश में पारंपरिक समाजवादी राजनीति करना चाहते हैं जिसमें ना तो अपराधियों से कोई परहेज है और ना ही जाति की राजनीति से । शिवपाल यादव ने जो सूची जारी की है उसमें अतीक अहमद जैसे अपराधी हैं जिनपर बीएसपी विधायक राजू पाल की हत्या समेत चालीस मुकदमे चल रहे हैं । अतीक अहमद पूर्व में सांसद रह चुके हैं और इस बार पार्टी ने उनको कानपुर की एक सीट से समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया है ।
इसके अलावा जेल में बंद माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के भाई सिबगतुल्लाह अंसारी को गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद से उम्मीदवार बनाया गया है । गौरतलब है कि मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय को लेकर चाचा-भतीजे में तलवारें खिंच गईं थी । चाचा शिवपाल ने पहले विलय का ऐलान कर दिया फिर भतीजे अखिलेश ने उसको रुकवा दिया और अब फिर चाचा ने उस विलय को ना केवल बहाल करवा दिया बल्कि मुख्तार अंसारी के भाई को भी समाजवादी पार्टी से विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बना दिया ।  ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव अपनी विकास की राजनीति के बूते पर आगामी विधानसभा चुनाव में उतरना चाहते हैं जबकि उनके चाचा शिवपाल दागियों और अपराधियों की फौज के साथ चुनाव लड़ना चाहते हैं ।यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि पिछले विधानसभा चुनाव के ऐन पहले जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबलि डी पी यादव को पार्टी में शामिल किया गया था तब इस वक्त के समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव इसके विरोध में खड़े हो गए थे जिसके बाद पार्टी को अपना फैलसा बदलना पड़ा था । इसका सूबे में बहुत अच्छा संदेश गया था और अखिलेश की छवि और चमक गई थी । अब वो मुख्यमंत्री हैं और उनके चाचा प्रदेश अध्यक्ष, तो फैसले अलग तरीके से हो रहे हैं । अपनी छवि को लेकर खासे सतर्क रहनेवाले अखिलेश यादव के लिए ये दागी उम्मीदावर एक चुनौती की तरह खड़े हैं । अभी अतीक अहमद ने एक बयान देकर मामले को और पेचीदा बना दिया है । अतीक अहमद ने कहा है कि सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की हरी झंडी के बाद ही उनको समाजवादी पार्टी ने अपना इम्मीदवार बनाया है । अतीक अहमद ने दावा किया है कि उनकी मुख्यमंत्री से कई मुलाकातें हुई हैं और उन्होंने और मुलायम सिंह यादव ने ही उनको कानपुर से चुनाव लड़ने को कहा है । उनका दावा है कि मुख्यमंत्री की रजामंदी के बाद ही उनको टिकट मिला है और अगर उनकी रजामंदी नहीं होती तो वो टिकट लेते भी नहीं । अखिलेश खेमे से प्रतक्रिया आनी बाकी है ।
मामला सिर्फ अतीक अहमद और सिबगतुल्लाह अंसारी का ही नहीं है । जेल में बंद अमरमणि त्रिपाठी के बेट अमनमणि त्रिपाठी का टिकट भी समाजवादी पार्टी ने अबतक वापस नहीं लिया है जबकि उसको सीबीआई ने पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया हुआ है । इसी तरह से अगर देखें तो जिस मंत्री राजकिशोर सिंह को अखिलेश ने बर्खास्त किया उसके ही भाई बृजकिशोर सिंह को शिवपाल ने पार्टी का उम्मीदवार बना दिया । जिस मोहम्मदाबाद सीट से शिवपाल ने सिबगतुल्लाह अंसारी को टिकट दिया है वहां अखिलेश की पहल पर पहले राजेश कुशवाहा को टिकट मिला था । इसी तरह से जिस बृजकिशोर सिंह का एमएलसी के चुनाव में अखिलेश ने टिकट काटा था अब शिवपाल ने उसको एमएलए का टिकट दे दिया। शिवपाल और अखिलेश के बीच जो शांति दिख रही थी वो अब संघर्ष में बदलती दिखाई दे रही है । विधानसभा चुनाव के नजदीक आने से ये संघर्ष और तेज होगा । अखिलेश ने भी कुछ दिन पहले जावेद आब्दी को सिंचाई विभाग में सलाहकार बनाकर मंत्री का दर्जा दे दिया था ये वही जावेद हैं जिनको समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह में शिवपाल सिंह यादव ने सरेआम मंच पर धक्का देकर भाषण देने से मना कर दिया था ।

समाजवादी पार्टी में सत्ता संघर्ष अपने चरम पर है । चंद दिनों पहले मुलायम सिंह यादव ने अमर सिंह को समाजवादी पार्टी के संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया था और अब इस बात की चर्चा हो रही है कि अमर सिंह पार्टी के स्टार प्रचारक भी होंगे । ये वही अमर सिंह हैं जिनको अखिलेश यादव बिल्कुल ही पसंद नहीं करते हैं । इस पूरे मसले में मुलायम सिंह यादव भी ‘खेलते’ हुए नजर आ रहे हैं । राजनीति के अखाड़े का ये पुराना पहलवान अपने भाई को भी नाराज नहीं करना चाहता है लेकिन साथ ही ये भी चाहता है कि उनका बेटा भी सियासत की जमीन पर मजबूती से जमा रहे । मुलायम सिंह यादव की ये चाहत ही इस संघर्ष को हवा दे रही है । वो अमर सिंह को भी नहीं छोड़ना चाहते हैं और अपने विश्वस्त प्रोफेसर रामगोपाल यादव को भी पार्टी से निकालकर चंद दिनों में ही वापस ले लेते हैं । पार्टी के मुख्य महासचिव होने की वजह से संसदीय बोर्ड में रामगोपाल यादव की भी चलेगी तो क्या ये माना जाए कि समाजवादी पार्टी के टिकटों का एलान अस्थायी है और चुनाव के पहले इसमें कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं ।    

Monday, October 24, 2016

सास- बहू और संग्राम

देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पिछले दो तीन दिनो से जिस तरह का सियासी ड्रामा चला उसने तो मनोरंजन चैनलों पर चलनेवाले महिला प्रधान सीरियल को भी पीछे छोड़ दिया । मनोरंजन चैनलों पर चलनेवाले उन सीरियल्स की ही तरह इसमें सस्पेंस भी था, ड्रामा भी था, इमोशन भी था, साजिशें भी थीं, झगड़े भी थे, मान-ममुहार का दौर भी था और अंत में कुछ नहीं हासिल होने का क्लाइमेक्स भी था । पूरे देश ने समाजवादी परिवार में चले इस ड्रामे को बड़े चाव से देखा लेकिन जिस तरह से सीरियल्स को देखकर अंत में निराशा होती है उसी तरह से समाजवादी पारिवार के इस ड्रामे के क्लाइमेक्स ने निराश किया । अब जरा इस बात पर नजर डाल लेते हैं कि इस पारिवारिक सियासी ड्रामे में किसको क्या मिला । परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर से सार्वजनिक रूप से अपने पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को फटकार लगाई और अपने भाई को पुचकारा । मुलायम ने अखिलेश को साफ कह दिया कि सत्ता मिलने के बाद उनका दिमाग हवा में उड़ने लगा है । बावजूद इस फटकार के अखिलेश यादव के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करके मुलायम सिंह यादव ने ये संदेश भी दे दिया कि वो अपने बेटे अखिलेश के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं करने जा रहे हैं । शिवपाल सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से मुलायम सिंह यादव से मांग की कि वो खुद सूबे के मुख्यमंत्री की कमान संभालें लेकिन मुलायम ने शिवपाल की इस बात का नोटिस, ही नहीं लिया । अपने पूरे भाषण के दौरान मुलायम सिंह यादव अपने छोटे भाई शिवपाल यादव के योगदान को, उनके संघर्षों को याद करते रहे लेकिन बात उनकी कोई नहीं मानी । इस बात के संकेत भी नहीं हैं कि शिवपाल सिंह यादव और उनके साथ बर्खास्त किए गए अन्य मंत्रियों को अखिलेश अपने मंत्रिमंडल में वापस लेंगे । इस पूरे विवाद के बीच अगर हम सूक्ष्मता से विश्लेषण करें तो अखिलेश यादव का कद बहुत बढ़ गया है । वो जनता को एक बार फिर से ये संदेश देने में कामयाब हो गए हैं कि उनके साथ दलाल और गुंडे किस्म के लोग नहीं रहेंगे । दूसरी बात जो अखिलेश ने साबित की वो ये विधायकों का बहमत उनके साथ है । विधायकों के बहुमत के अखिलेश के साथ होने की वजह से शिवपाल यादव अपने भाई मुलायम पर कोई दबाब नही बना पाए । सार्वजनिक रूप से अखिलेश ने मुलायम सिंह को ये भी बता दिया कि ज्यादातर फैसले उनके कहने पर ही लिए जा रहे हैं । गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से निकालने और दीपक सिंघल को मुख्य सचिव के पद से हटाने के पहले भी अखिलेश ने मुलायम सिंह यादव से स्वीकृति ली थी । दरअसल अगर हम देखें तो अखिलेश ने चाचा के साथ साथ अपने पिता को भी ये बता दिया कि अब वो टीपू नहीं रहे बल्कि सुल्तान बन चुके हैं और सियासी दंगल में किसी को भी पटखनी देने के दांव-पेंच से भली भांति परिचित हो चुके हैं ।
ये तो वो बातें हैं जो सतह पर दिखाई दे रही हैं लेकिन परिवार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कई सालों से अखिलेश यादव के अंकल और उनके चाचा मिलकर मुख्यमंत्री के खिलाफ साजिश रच रहे थे । इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि अंकल अमर सिंह जब पार्टी से बाहर थे तो सरिस्का के एक रिसॉर्ट में उनकी चाचा शिवपाल यादव से लगातार मुलाकातें होती थीं । अखिलेश यादव के नजदीकियों का दावा है कि इन मुलाकातों में अंकल की वापसी की रूपरेखा तो बनती ही थी, शिवपाल को सूबे का कमान दिलाने की योजना पर भी काम होता था । इसकी भनक भी अखिलेश यादव को थी और वो लगातार इन मुलाकातों पर नजर रखे हुए थे । इस बीच खबर ये भी आई कि मिर्जापुर के पास अखिलेश यादव के चाचा के करीबी धर्मगुरू ने तांत्रिक अनुष्ठान करवाया । इसका राज तब खुला जब उस धर्मगुरू ने तांत्रिक अनुष्ठान के लिए ट्रकों में भरकर नारियल मंगवाए । तांत्रिकों से जब पूछताछ हुई तो सारे राज खुल गए जिससे अखिलेश और उनकी पत्नी डिंपल यादव बहुत नाराज हो गईं । यहीं से रिश्तों में कड़वाहट की शुरुआत हुई ।

उधर अमर सिंह और शिवपाल यादव ने अंत:पुर की राजनीति को हवा दी और मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी और अखिलेश की सौतेली मां साधना ने अपने बेटे प्रतीक और बहू अपर्णा के लिए सियासी हिस्सा मांगते हुए मुलायम पर दबाव बनाना शुरू कर दिया । एक मां अपने बेटे के लिए राजपाट की मांग करने लगी तो जाहिर तौर पर पूरा परिवार दो खेमों में बंटने लगा । महलों की सियासत की तरह यहां भी दांव-पेंच चले जाने लगे । बताया जाता है कि इस पूरे खेल में सास-बहू के बीच जमकर कहासुनी भी हुई । ये मामला बढ़ता ही चला गया और जब परिवार में इस तरह की सियासतें और साजिशें शुरू होती हैं तो बाहरवालों को तो मौका मिलता है अपनी गोटी फिट करने का और वही हुआ । इस बात के पर्याप्त संकेत अखिलेश यादव के करीबी और समाजवादी पार्टी के विधायक उदयवीर सिंह ने अपने पत्र में दिए । इस पारिवारिक झगड़े की बिसात पर इस वक्त अखिलेश यादव मजबूक दिखाई दे रहे हैं । अब असली खेल शुरू होगा विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद और टिकट बंटवारे वे वक्त । 
(नारद न्यूज- 25.10.2016)

Saturday, March 23, 2013

पुरस्कार का कारोबार


इन दिनों उत्तर प्रदेश में साहित्यिक पुरस्कारों की बाढ़ आई हुई है । मायावती के शासनकाल के दौरान रुके या रोके गए साहित्यक पुरस्कारों को अर्पित किया जा रहा है । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन पुरस्कार अर्पण समारोह में शिरकत कर रहे हैं और गाजे बाजे के साथ पुरस्कृत साहित्यकारों का सम्मान किया जा रहा है । पुरस्कार समारोह में युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की उपस्थिति से उम्मीद भी जगती है कि अब उत्तर प्रदेश की समृद्ध साहित्यक विरासत को इस शासनकाल में फिर से अहमियत मिलेगी । मुख्यमंत्री ने पिछले शासनकाल में पुरस्कारों के बंद होने को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए अगले साल से सम्मान राशि बढ़ाने का भी ऐलान किया । अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि साहित्य शाश्वत होता है और वो समाज को रास्ता भी दिखाता है । यह सब तो ठीक था, उम्मीद भी जगा गया । लेकिन इन पुरस्कारों से कई सवाल भी खड़े हो गए हैं । इस बार का यश भारती पुरस्कार हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव को दिया गया है और सम्मान स्वरूप उन्हें ग्यारह लाख रुपए भी मिलेंगे । आमतौर पर यादव जी पुरस्कार नहीं लेते लेकिन लखटकिया पुरस्कारों से उन्हें परहेज भी  नहीं है । उनका तर्क होता है कि पुरस्कार राशि को वो हंस में लगा देते हैं और हंस पत्रिका को चलाने के लिए वो कहीं से भी राशि ले सकते हैं । तमाम विरोध के बावजूद बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का गुणगान करनेवाले विज्ञापन तो वो छापते ही रहते हैं । लेकिन यह एक अवांतर प्रसंग हैं । लेकिन यादव जी के अलावा जिन दो लेखकों को यह पुरस्कार दिया गया है, साहित्य जगत अबतक उनसे अपरिचित है । यह उसी तरह से है जब साहित्य अकादमी के जनरल काउंसिल में प्रोफेसरों के कॉकस एक दूसरे को चुनते हैं जिनका साहित्य में कोई योगदान नहीं है ।
बात हिंदी में पुरस्कारों की हो रही थी । हिंदी में पुरस्कारों की महत्ता और प्रतिष्ठा लगातार कम होती जा रही है । हिंदी में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार साहित्य अकादमी सम्मान को माना जाता था लेकिन पिछले एक दशक से जिस तरह से साहित्य अकादमी पुरस्कारों की बंदरबांट हुई है उससे अकादमी पुरस्कारों की साख पर बट्टा लगा है । दो हजार एक से लेकर दो हजार दस तक की साहित्य अकादमी पुरस्कारों के लिए बनाई गई पुस्तकों की आधार सूची पर नजर डालने से यह बात और साफ हो जाती है । दो हजार तीन में जब कमलेश्वर को उनके उपन्यास - कितने पाकिस्तान - पर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था तो उस वक्त की आधार सूची में इकतीस लेखकों के नाम थे जिसे मृदुला गर्ग ने तैयार किया था । इस सूची में तेजिन्दर, गौरीनाथ, हरि भटनागर, संजना कौल और जयनंदन आदि के नाम शामिल थे । तब अकादमी पर यह आरोप लगा था कि कमलेश्वर का नाम पहले से तय था । कई अखबारों ने तो उस वक्त पुरस्कारों के ऐलान के पहले ही उनके नाम का खुलासा कर दिया था । दो हजार चार में तो और भी आरोप लगे थे । पुरस्कार मिला था वरिष्ठ और चर्चित कवि वीरेन डंगवाल को उनके कविता संग्रह दुश्चक्र में स्रष्टा पर। उस वक्त के संयोजक थे उपन्यासकार गिरिराज किशोर और आधार सूची तैयार की थी कहानीकार प्रियंवद ने । हद तो तब हो गई थी जब निर्णायक मंडल के तीन सदस्यों में से दो कमलेश्वर और श्रीलाल शुक्ल बैठक में उपस्थित ही नहीं हो सके थे । अपनी टिप्पणी में निर्णायक मंडल के तीसरे सदस्य से रा यात्री ने लिखा- दुश्चक्र में स्रष्टा- काव्य कृति को हम सभी निर्णायक मंडल के सदस्य एक समान प्रथम वरीयता देते हैं और साहित्य अकादमी के दो हजार चार के पुरस्कार के लिए सहर्ष प्रस्तुत करते हैं । लेकिन संस्तुति पत्र पर सिर्फ उनके ही दस्तखत हैं । उसी जगह हिंदी भाषा के तत्कालीन संयोजक गिरिराज किशोर ने लिखा- श्री श्रीलाल शुक्ल एवं कमलेश्वर जी उपस्थित नहीं हो सके । उन्होंने अपनी लिखित संस्तुति बंद लिफाफे में भेजी है । श्रीलाल जी ने ज्यूरी के उपस्थित सदस्य से रा यात्री से फोन पर लंबी बातकर दुश्चक्र में स्रष्टा को 2004 के पुरस्कार के लिए समर्थन दिया । हलांकि साहित्य अकादमी के दस्तावेजों में श्रीलाल जी की संस्तुति मौजूद नहीं है । कमलेश्वर का बीस दिसंबर खत है जो इक्कीस दिसंबर की बैठक के पहले प्राप्त हो गया था । इस तरह की जल्दबाजी ने सवाल भी खड़े किए । वीरेन डंगवाल की प्रतिष्ठा पर किसी को कोई शक नहीं है । वो साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व भी करते थे लेकिन जिस तरह की अफरातफरी में उन्हें पुरस्कार देने का ऐलान किया गया उससे उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई । कालांतर में अकादमी पुरस्कारों के चयन को लेकर कई गंभीर आरोप लगे । नतीजा यह हुआ कि अकादमी पुरस्कार को हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं रहा जो नब्बे के दशक में हुआ करता था । अब अकादमी में पहली बार हिंदी भाषा के प्रतिनिधि प्रोफेसर विश्वनाथ तिवारी अध्यक्ष बने हैं । उनपर यह महती जिम्मेदारी है कि अकादमी पुरस्कारों की विश्वसनीयता और साख बहाल करें ।
इसके अलावा भी हिंदी में कई पुरस्कार दिए जाते हैं । कुछ पुरस्कार तो ऐसे हैं जो बकायदा लेखकों से एक निश्चित राशि के बैंक ड्राफ्ट के साथ आवेदन मांगते हैं । हिंदी के पुरस्कार पिपासु लेखक बड़ी संख्या में इस तरह के पुरस्कारों के लिए आवेदन भेजते हैं । कहना नहीं होगा कि हिंदी के बहुतायत लेखकों में बगैर काम किए या यों कहे कि हल्का काम करके भी प्रसिद्धि की ललक ऐसे पुरस्कारों को प्राणवायु प्रदान करती है । उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में कई ऐसे पुरस्कार हैं जिनकी धनराशि तो पांच से दस हजार रुपए तक होती है लेकिन उन पुरस्कारों की आड़ में साहित्य का खेल खेला जाता है । जिस पत्रिका की कोई पहचान नहीं बन पाती है या उसके दो एक अंक निकले होते हैं वह भी अपने नाम पर शॉल श्रीफल देकर साहित्याकारों और लेखकों को उपकृत करते हैं और उसके एवज में जाने क्या क्या होता है । लेकिन जो भी होता है वह हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठा को धूमिल करता है । सवाल यह उठता है कि हिंदी के लेखकों में पुरस्कार को लेकर इतनी भूख क्यों है । क्योंकर वो हजार दो हजार के पुरस्कार के लिए सारे दंद फंद और पुरस्कार देनेवालों की चापलूसी पर उतारू है । अगर हम विस्तार से इसकी पड़ताल करते हैं तो जो तस्वीर सामने आती है वह बेहद निराशाजनक है । हिंदी के लेखकों जिस एक प्रवृत्ति का लागातार क्षय हो रहा है वह है मेहनत से दूर भागने का । बगैर व्यापक शोध के और कल्पना के आधार पर यथार्थ लिखने की प्रवृत्ति ने साहित्य का बड़ा नुकसान किया है । विचारधारा वाली साहित्य ने तो नुकसान किया ही । इसके अलावा जो एक और प्रवृत्ति नई पीढ़ी के साहित्यकारों लेखकों में दिख रहा है वह है जल्दबाजी, धैर्य की कमी, कम वक्त में सारा आकाश छेक लेने की तमन्ना और वह भी किसी कीमत पर । इसी मानसिकता का फायदा उठाकर कुछ साहित्य के कारोबारी पुरस्कारों का कारोबार करते हैं और उसमें फंसा कर लेखकों को उलझा देते हैं । नवोदित लेखक तो कोंपल की तरह होता है जिसे बहुत सावधानी से विकसित किया जाता है लेकिन हिंदी के नए लेखक तो शुरू से ही आसमान पर चढ़ने की तमन्ना पाले बैठे रहते हैं । महात्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है।  हर किसी को महात्वाकांक्षी होना चाहिए लेकिन उसमें अति के जुड़ने से जो बेचैनी आ जाती है वह एक खतरनाक संकेत है और पुरस्कार देनेवाले इस प्रवृत्ति को बढ़ाकर खतरा और बढ़ा देते हैं । हिंदी के कर्ता धर्ताओं की यह जिम्मेदारी है कि वो इस वक्त आगे आएं और टुटपुंजिए पुरस्कारों को चिन्हित कर उसके बहिष्कार का विरोध करें ताकि हिंदी से पुरस्कारों के कारोबार पर रोक लगाई जा सके ।