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Saturday, February 25, 2017

लिपस्टिक अंडर माई बुर्का पर कैंची !

लीक से हटकर बनने वाली फिल्म को लेकर फिल्म निर्माताओं को लंबे समय से सेंसर बोर्ड से जूझना पड़ता है । संस्कारी सेंसर बोर्ड इस तरह की तकरीबन हर फिल्म में अडंगा डालता ही है । जब से पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अद्यक्ष बने हैं तब से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड खुद को सेंसर बोर्ड बनाने में लगा हुआ है । अब एक बार फिर से प्रकाश झा की फिल्म लिपस्टिक अंडर माई बुर्का को लेकर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जता दी है । लिपस्टिक अंडर माई बुर्का को अलंकृता श्रीवास्तव ने निर्देशित किया है । सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को देखने के बाद प्रकाश झा को यह संदेश दिया है कि इसको सर्टिफिकेट नहीं दिया जा सकता है क्योंकि इसमें महिलाओं की फैंटेसी और इंटीमेट सेक्सुअल सींस हैं । इसके अलावा सेंसर बोर्ड के इस फिल्म को लेकर यह भीआपत्ति है कि चूंकि यह महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई है लिहाजा इसमें गाली गलौच की भाषा नहीं होनी चाहिए । आपत्ति तो यह भी है कि इस फिल्म में ऑडियो पोर्नोग्राफी भी है और यह समाज के एक वर्ग विशेष को संवेदनहीनता के साथ चित्रित करता है । सेंसर बोर्ड ने अपनी कई धाराओं को गिनाते हुए इस फिल्म को सर्टिफिकेट देने से इंकार कर दिया है । यह फिल्म एक छोटे से शहर की महिलाओं की कहानी है जिसमें कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, आहना और प्लाबिता ने उनकी आकांक्षाओं को परदे पर अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है । ये चारों महिलाएं अनी जिंदगी में आजादी को तलाशती हैं और उसी तलाश के साथ फिल्म आगे बढ़ती है । स्त्रियों के आकांक्षा का मानचित्र खींचती इस फिल्म में पात्र अपनीबोली-वाणी में बात करते हैं जिसपर सेंसर बोर्ड को आपत्ति है । फिल्म की निर्देश अलंकृता का दावा है कि उनकी फिल्म देश के पितृसत्तात्मक समाज को खुली चुनौती देता है इस वजह से सेंसर बोर्ड को इसको प्रमाणित करने की राह में रोड़ा अटका रहा है । प्रकाश झा ने भी साफ किया है कि वो अपनी इस फिल्म को लेकर अंत तक लड़ेंगे ताकि फिल्मकार की कल्पनाशीलता और समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार किया जा सके और उसको कोई रोक ना सके । प्रकाश झा ने सेंसर बोर्ड के इस कदम को अभिव्यक्ति की आजादी से भी जोड़ा है ।
दरअसल प्रकाश झा की फिल्म को लेकर पहले भी सेंसर बोर्ड ने कई आपत्तियां उठाई थीं । प्रकाश झा की फिल्म जय गंगाजल को लेकर भी विवाद उठा था । तब प्रकाश झा ने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पर आरोप लगाया है कि वो बेवजह उनकी फिल्म से ‘साला’ और ‘घंटा’ शब्द हटवाना चाहते हैं । सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष का तर्क था कि साला गाली है और इतनी बार इस गाली को फिल्म में बोलने-दिखाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है जबकि प्रकाश झा का तर्क है कि साला अब आम बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होता है और वो गाली नहीं रह गया है । संस्कारी सेंसर बोर्ड सी बिनाह पर जय गंगाजल को एडल्ट फिल्म का स्रटिफिरेट देना चाहता था लेकिन प्रकाश झा के मुताबिक वो यू यानि अनरेस्ट्रिक्टेड पब्लिक एक्जीबिशन या फिर यू ए की श्रेणी की फिल्म थी । बाद में प्रकाश झा की अपील पर फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्राइब्यूनल ने बैगर किसी कट के जय गंगाजल को यू ए सर्टिफिकेट दे दिया था ।
हाल के दिनों में सेंसर बोर्ड के कारनामों को लेकर उसके खुद के सदस्य भी खफा नजर आए है । उनका आरोप है कि अध्यक्ष उनकी नहीं सुनते हैं और मनमानी करते हैं । सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद कंफ्यूजन है । इन दोनों श्रेणियों के बीच बंटवारे को लेकर खासी मनमानी करने की गुंजाइश होती है जिसका लाभ सेंसर बोर्ड उठाता रहा है । बदलाव की आवश्यकता के मद्देनजर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया था जिसने अपनी रिपोर्ट भी दे दी है । कई बदलाव भी अपेक्षित हैं लेकिन पता नहीं कहां सरकारी फाइलों में ये रिपोर्ट गुम हो गई है । फिल्मकारों को उम्मीद थी इन सुझावों को लागू कर देने से उनकी सृजनशीलता पर कैंची नहीं चलेगी ।
फिल्मों को सर्टिफिकेट देने और उलपर विवाद का हमारे देश में लंबा इतिहास रहा है । सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया । इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया । एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने आखिरी गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही अबतक काम चल रहा है । इक्यानवे के बाद से हमारा समाज काफी बदल गया । आर्थिक सुधारों की बयार और हाल के दिनों में इंटरनेट के फैलाव ने हमारे समाज में भी बहुत खुलापन ला दिया है । एक जमाना था जब फिल्मों में नायक नायिका के मिलन को दो हिलते हुए फूलों के माध्यम से दिखाया जाता था । छिपकली के कीड़े को खा जाने के दृश्य से रेप को प्रतिबंबित किया जाता था । समय बदला और फिल्मों के सीन भी बदलते चले गए । राजकपूर की फिल्म संगम में जब वैजयंतीमाला ने जब पहली बार बिकिनी पहनी थी तब भी जमकर हंगामा और विरोध आदि हुआ था लेकिन अब वो फिल्मों के लिए सामान्य बात है । फिल्मों में जब खुलेपन की बयार बहने लगी तो एक बार फिर सेंसर बोर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और ये दलील दी गई थी कि फिल्मों के प्रमाणन को खत्म कर दिया जाना चाहिए । लेकिन उन्नीस सौ नवासी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया था कि भारत जैसे समाज में फिल्मों के प्रमाणन की जरूरत है । कोर्ट ने कहा था कि ध्वनि और दृश्यों के माध्यम से कही गई बातें दर्शकों के मन पर गहरा असर छोड़ती है । सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद उन्नीस सौ इक्यानवे में एक गाइडलाइन जारी की गई जिसमें भी इस बात पर जोर दिया गया था कि फिल्मों में सामाजिक मूल्यों के स्तर को बरकरार रखा जाए । उस गाइडलाइंस में यह भी कहा गया था कि फिल्मों में हिंसा को गौरवान्वित करनेवाले दृश्यों को मंजूरी ना दी जाए । इस गाइडलाइंस की बिनाह पर ही पहलाज निहलानी प्रमाणन बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बना चुके हैं । अब इंतजार श्यामबेनेगल कमेटी की सिफारिशों को लागू करने का है


Saturday, April 30, 2016

सेंसर बोर्ड में सुधार की बयार ·

जब से पहलाज निहलानी को केंदीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है तब से सेंसर बोर्ड को लेकर, उसके नियमों को लेकर, सेंसर बोर्ड के अधिकारों को लेकर कई बार बहस हुई है । पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि सोशल मीडिया पर सेंसर बोर्ड को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा । सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । तब पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । देश में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस हुई थी । सेंसर बोर्ड के सदस्य अशोक पंडित ने भी इसका विरोध किया था लेकिन पहलाज निहलानी ने किसी की नहीं सुनी थी और फिल्मों को नैतिकता की कसौटी पर कसकर खुद को फिल्मों में नैकिकता के नए झंडाबरदार के तौर पर पेश कर दिया । उन्होंने नैतिकता की अपनी परिभाषा गढ़ी । दरअसल पहलाज निहलानी को ताकत मिली थी सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) से जहां शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित करने की छूट है । इसपर गौर करते हैं- किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । संभव भी है ।
चंद सालों पहले तक बॉलीवुड की फिल्मों में चुंबन दृश्यों को दिखाने पर रोक थी उसको दिखाने के लिए फिल्म निर्देशक दो फूलों को हिलते और फिर मिलते हुए दिखा देते थे लेकिन कालांतर में वक्त बदलने के साथ साथ आधुनिकता के नाम पर चुंबन दृष्यों को मंजूरी मिलनी शुरू हो गई । कम कपड़ों में या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं के चित्रण को कहानी की मांग बताकर निर्देशक सेंसर बोर्ड से छूट लेने लगे थे । राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली में बड़े गले के या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं को दिखाने की छूट सेंसर बोर्ड से हासिल कर ली थी । उस वक्त भी इस तरह के दृश्यों को लेकर खासी बहस हुई थी । तब एक पक्ष का तर्क था कि निर्देशकों ने इस तरह के दृश्य को दिखाकर दर्शकों में उद्दीपन पैदा करने की कोशिश की है ।
इसके पहले उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श ने गुप्त ज्ञान नाम की फिल्म बनाई थी तो सेंसर बोर्ड के सामने सिनेमेटोग्राफी एक्ट की उपरोक्त धारा के आधार पर फैसला लेना का संकट पैदा हो गया था । उस फिल्म में कई दृश्य ऐसे थे जिनको लेकर निर्माताओॆ की दलील थी कि वो यौनिकता को लेकर जनता को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म में डाली गई हैं । उस वक्त के बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने की एक चाल है । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसमें फिल्माए अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । एक बार फिर से सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने इसको देखा और जमकर कैंची चलाई । इस पूरी प्रक्रिया में ढाई साल लग गए थे ।  
उन्नीस सौ चौरानवे में फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म फायर से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में सेंसर बोर्ड के सीईओ पर सत्तर हजार की घूसखोरी का आरोप लगा था और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार भी किया था तब हैरानी दूर हो गई थी और अलग अलग फिल्मों के लिए अलग मानदंड की बात समझ में आने लगी थी । सीईओ साहब की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था ।
सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । यही हर तरह की गड़बड़ियों की जमीन तैयार करता है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है और वो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर या फिर अपनी विचारधारा के आधार पर कमेटी में जगह पाते हैं और उसी आधार पर  फिल्मों को देखते और टिप्पणी करते हैं । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ओमकारा में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में साला शब्द पर आपत्ति जताता है और उसको फिल्म से निकालने को कहता है ।
इन सारे गड़बड़झालों की पृष्ठभूमि में सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसने पिछले दिनों सीबीएफसी में सुधारों को लेकर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है । इस कमेटी ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की है । बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। लेकिन इसमें भी एक पेंच दिखाई दे रहा है । अबतक इस समिति की जो सिफारिशें सार्वजनिक की गई हैं उसमें कहा गया है कि प्रमाणन के दौरान कमेटी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखेगी और ये ध्यान देगी कि उसका उल्लंघन तो नहीं हो रहा है । सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है । नैतिकता और मर्यादा दो ऐसे आधार हैं जिनकी सुविधानुसार व्याख्या की जा सकती है । बेनेगल कमेटी ने इन दो शब्दों की व्याख्या से निबटने की क्या सिफारिश की है ये जानना दिलचस्प होगा ।
अन्य सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । सभी क्षेत्रों से बोर्ड में एक सदस्य रखने की सिफारिश भी की गई है । तो इस तरह से बोर्ड में चेयरमैन के अलावा नौ सदस्यों की सिफारिश की गई है । इसके अलावा भी कमेटी ने कई छोटी मोटी सिफारिशें की है । फिल्मों में पशुओं पर अत्याचार और स्मोकिंग दृश्यों पर अपनी सिफारिश कमेटी जून तक प्रस्तुत कर देगी । तो यह माना जाना चाहिए कि जून के बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय इसपर कोई ठोस फैसला लेगी ताकि फिल्म प्रमाणन बोर्ड को फिल्मों पर कम से कम कैंची चलाने का हक मिल सके ।


Sunday, January 10, 2016

संस्कारी सेंसर बोर्ड बनेगा संवेदनशील ?

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे हम सब लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं पिछले कई सालों से विवादों में है । दो हजार चौदह में सेंसर बोर्ड के सीईओ पर सत्तर हजार की घूसखोरी का आरोप लगा था और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार भी किया था । तब यह बात सामने आई थी कि सेंसर बोर्ड में भ्रष्टाचार की जड़ें बेहद गहरी हैं और ये भी कहा गया था कि फिल्मों के दृश्यों को पास करवाने के लिए सेंसर बोर्ड के सीईओ को खुश करना पड़ता था । सीईओ साहब की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देनी पड़ती है । दो हजार चौदह में केंद्र में सत्ता बदली तो सेंसर बोर्ड का भी पुनर्गठन हुआ और पहलाज निहलानी को उसका अध्यक्ष बनाया गया । पहलाज निहलानी के पद संभालने के बाद सेंसर बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बनाने की कवायद शुरू कप दी । सबसे बड़ा विवाद हुआ जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट के आदेश के बाद । बांड की ताजा फिल्म स्पेक्टअ फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । तब पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और किसिंग सीन में पटास फीसदी कटौती कर दी गई थी । बांड अपनी फिल्मों में गैजेट, गन और महिलाओं के साथ अपने संबंधों का मास्टर माना जाता है लेकिन भारत में हालिया रिलीज फिल्म में सेंसर बोर्ड की बदौलत बांड के दो ही रूप दर्शकों को देखने को मिल सके । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । उस वक्त ये आरोप भी लगा था कि निहलानी प्रधानमंत्री मोदी को खुश करने के लिए इस तरह के कदम उठा रहे हैं । उनके कदम को प्रधानमंत्री से इस वजह से जोड़ा गया था कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर एक शॉर्ट फिल्म डायरेक्ट की थी । बांड की फिल्म में कट लगाने का विरोध सेंसर बोर्ड के एक और सदस्य अशोक पंडित ने किया था लेकिन उनकी एक नहीं चली थी । उसके बाद से पहलाज निहलानी के हौसले बुलंद हो गए और वो फिल्मों में नैकिकता के नए झंडाबरदार के तौर पर उभर कर सामने आए । 
अब पहलाज निहलानी फिल्मों में हिंसा और गाली गलौच को भी कम करवाने पर तुले हुए लगते हैं । अभी हाल ही में मशहूर फिल्मकार प्रकाश झा ने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पर आरोप लगाया है कि वो बेवजह उनकी फिल्म से साला शब्द हटवाना चाहते हैं । प्रकाश झा की फिल्म जय गंगाजल में कई सीन में साला शब्द का इस्तेमाल किया गया है । सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष का तर्क है साला गाली है और इतनी बार इस गाली को फिल्म में बोलने-दिखाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है जबकि प्रकाश झा का तर्क है कि साला अब आम बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होता है और वो गाली नहीं रह गया है । संस्कारी सेंसर बोर्ड के मुताबिक प्रकाश झा की फिल्म एडल्ट फिल्म की श्रेणी में आती है और बोर्ड उसको ए सर्टिफिकेट देने को तैयार है । उधर प्रकाश झा के मुताबिक वो यू यानि अनरेस्ट्रिक्टेड पब्लिक एक्जीबिशन या फिर यू ए की श्रेणी की फिल्म है लिहाजा उसको इस श्रेणी के तहत ही सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए । प्रकाश झा का आरोप है कि पहलाज निहलानी उनकी फिल्म से जो सीन और शब्द हटवाना चाहते हैं उससे फिल्म की कहानी खत्म हो जाएगी या फिर बेहद कमजोर हो जाएगी । अब इस बात का फैसला अदालत से होने के संकेत मिल रहे हैं । हलांकि फिल्मों में गालियां अब आम बात है ओमकारा से लेकर हाल की फिल्मों तक में गालियां मिल जाती हैं ।
हाल के दिनों में सेंसर बोर्ड के कारनामों को लेकर उसके खुद के सदस्य भी खफा है । उनका आरोप है कि अध्यक्ष उनकी नहीं सुनते हैं और मनमानी करते हैं । सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद कंफ्यूजन है । इन दोनों श्रेणियों के बीच बंटवारे को लेकर खासी मनमानी करने की गुंजाइश होती है जिसका लाभ सेंसर बोर्ड उठाता रहा है । अब इस बात की मांग उठने लगी है कि फिल्मों की ग्रेडिंग की जो प्रक्रिया है उसमें बदलाव की जरूरत है । इलस बदलाव की आवश्यकता को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भी समझा मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया ।श्याम बेनेगल की अध्यक्षता वाली कमेटी के गठन के बाद बॉलीवुड के फिल्मकारों को उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है । फिल्मकारों को अब इस बात की उम्मीद है कि उनकी सृजनशीलता पर कैंची नहीं चलेगी । सूचना प्रसारण मंत्रालय की गठित इस कमेटी में इक्यासी साल के बेनेगल हैं तो अपेक्षाकृत कम उम्र के राकेश ओमप्रकाश मेहरा और विज्ञापन की दुनिया की बड़ी हस्तियों में से एक पीयूष पांडे को भी रखा गया है । ये कमेटी सरकार को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया की समीक्षा करेगी और जहां आवश्यक होगा वहां सरकार को इसमें बदलाव करने की सिफारिश करेगी ।

फिल्मों को सर्टिफिकेट देने का हमारे देश में लंबा इतिहास रहा है ।  हमारा संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी देता है लेकिन वही संविधान उस आजादी को तब रोक देता है जब उससे कोई भी दूसरा शख्स प्रभावित होता है । इसी अभिव्यक्ति ती आजादी की वजह से मीडिया को भी स्वतंत्रता मिली हुई है । फिल्मों को भी एक मीडियम माना गया है और वहां भी फिल्मकारों को रचनात्मक आजादी है । लेकिन फिल्मों के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के मद्देनजर यह माना गया कि उसपर नजर रखने की जरूरत है ताकि कोई भी फिल्मकार अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ ऐसा ना पेश कर दे जो समाज के कुछ वर्ग के लोगों के हित में ना हो । इस लिहाज से सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया । तब भी यह बहस चली थी कि सेंसर बोर्ड क्यों । उसके बाद इसके नाम से सेंसर शब्द हटा दिया गया था । उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया । एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने आखिरी गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही अबतक काम चल रहा है । इक्यानवे के बाद से हमारा समाज काफी बदल गया । आर्थिक सुधारों की बयार और हाल के दिनों में इंटरनेट के फैलाव ने हमारे समाज में भी बहुत खुलापन ला दिया है । बदले माहौल में जब हम करीब तीन दशक पुरानी गाइडलाइंस के आधार पर सर्टिफिकेट देंगे तो दिक्कतें तो पेश आएंगी । एक जमाना था जब फिल्मों में नायक नायिका के मिलन के दो हिलते हुए फूलों के माध्यम से दिखाया जाता था । छिपकली के कीड़े को खा जाने के दृश्य से रेप को प्रतिबंबित किया जाता था । समय बदला और फिल्मों के सीन भी बदलते चले गए । राजकपूर की फिल्म संगम में जब वैजयंतीमाला ने जब पहली बार बिकिनी पहनी थी तब भी जमकर हंगामा और विरोध आदि हुआ था लेकिन अब वो फिल्मों के लिए सामान्य बात है । फिल्मों में जब खुलेपन की बयार बहने लगी तो एक बार फिर सेंसर बोर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और ये दलील दी गई थी कि फिल्मों के प्रमाणन को खत्म कर दिया जाना चाहिए । लेकिन उन्नीस सौ नवासी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया था कि भारत जैसे समाज में फिल्मों के प्रमाणन की जरूरत है । कोर्ट ने कहा था कि ध्वनि और दृश्यों के माध्यम से कही गई बातें दर्शकों के मन पर गहरा असर छोड़ती है । सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद उन्नीस सौ इक्यानवे में एक गाइडलाइन जारी की गई जिसमें भी इस बात पर जोर दिया गया था कि फिल्मों में सामाजिक मूल्यों के स्तर को बरकरार रखा जाए । उस गाइडलाइंस में यह भी कहा गया था कि फिल्मों में हिंसा को गौरवान्वित करनेवाले दृश्यों को मंजूरी ना दी जाए । इस गाइडलाइंस की बिनाह पर ही पहलाज निहलानी प्रमाणन बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बना चुके हैं । अब श्याम बेनेगल की अध्यक्षता वाली कमेटी से ये अपेक्षा है कि वो इसको संस्कारी से संवेधनशील बोर्ज बनाने की पहल करें ।