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Friday, March 10, 2023

साहित्याकाश पर छाता साहित्योत्सव


आज से 38 वर्ष पहले जब पूरे देश में लिटरेचर फेस्टिवल के बारे में कम ही लोग सोचते और जानते थे। उस समय साहित्य अकादमी ने 1985 में फेस्टिवल आफ लेटर्स का आरंभ किया था। नई दिल्ली के रवीन्द्र भवन परिसर स्थित साहित्य अकादमी भवन की पहली मंजिल के सभागार में प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता था। इस प्रदर्शनी में साहित्य अकादमी की गतिविधियों का प्रदर्शन होता था। मैक्सम्यूलर मार्ग के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अकादमी राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन करती थी। इस फेस्टिवल का आरंभिक स्वरूप कुछ इस तरह का ही था। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, अन्नदा शंकर रे, अमृता प्रतम, कुर्तुलऐन हैदर,निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे दिग्गज लेखकों की भागीदारी इस उत्सव में होती थी। करीब 25 वर्षों तक इस स्वरूप में साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव चलता रहा। साहित्योत्सव के दौरान विभिन्न भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकों को सम्मानित किया जाता था। संवत्सर व्याख्यान का आयोजन होता था। साहित्योत्सव की एक विशेषता और रही है कि इसमें बड़े से बड़ा लेखक सहजता से पाठकों और श्रोताओं के साथ संवाद करते नजर आते हैं। मुझे याद पड़ता है कि अमृता प्रीतम को पहली बार मैंने साहित्य अकादमी के इस उत्सव में ही देखा था। तब दिल्ली विश्वविद्याल के छात्र एक साथ इस उत्सव में पहुंचते थे। अपने पसंदीदा लेखकों के विचारों को सुनते थे। न केवल विचारों को सुनते थे बल्कि छात्रावास लौटकर उनकी स्थापनाओं पर बहस करते थे।

2013 में जब डा के श्रीनिवासराव साहित्य अकादमी के सचिव बने तो उन्होंने इसको व्यापक स्वरूप प्रदान किया। साहित्य अकादमी की प्रदर्शनी को भवन की पहली मंजिल से उतारकर परिसर के लान में लाकर विस्तार दिया गया। संगीत नाटक अकादमी के मेघदूत थिएटर में भी इस साहित्योत्सव की गतिविधियां आरंभ हुईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार अर्पण समारोह को और भव्य बनाया गया। धीरे धीरे ये साहित्योत्सव अखिल भारतीय स्वरूप लेने लगा। इसमें देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों को आमंत्रित करके अलग अलग सत्रों में विचार मंथन होने लगा। प्रतिवर्ष इसमें अलग अलग विषय जैसे बहुभाषी कवि सम्मेलन, बहुभाषी कहानी पाठ, एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मिलन, जैसे कार्यक्रम जोड़े गए। अभी देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आलोक में मातृभाषा की चर्चा हो रही है। इस वर्ष साहित्योत्सव में मातृभाषा पर अलग से चर्चा रखी गई है। जी 20 सम्मेलन के आयोजन को ध्यान में रखते हुए कूटनीति और साहित्य विषय पर सत्र की संरचना की गई है। इसमें राजनयिक-लेखकों के विचार सुनने को मिलेंगे। 38 वर्ष के सफर में साहित्य अकादमी के साहित्योत्सव ने साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ठ पहचान बनाई है। यह एक ऐसा साहित्योत्सव है जो शोर-शराबे से दूर भारतीय भाषाओं के लेखकों के अखिल भारतीय मंच के तौर पर स्थापित हो गया है।    

Saturday, October 22, 2022

विकास और विचार से लौटेगा वैभव

 श्रीनगर के डल झील का किनारा, किनारे स्थित शेर-ए-कश्मीर क्नवेंशन सेंटर का विशाल परिसर, परिसर के लान में एक तरफ सजा मंच और सामने बैठे देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक, साहित्यकार, फिल्मकार और कलाकार। ये सब मिलकर एक ऐसे वातावरण की निर्मिति कर रहे थे जो आज से तीन साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था। कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल ने दो दिनों तक कश्मीर संस्करण का आयोजन करके एक ऐतिहासिक पहल की है। श्रीनगर में लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन और श्रीनगर और शोपियां में सिनेमा हाल का खुलना कश्मीर के सांस्कृतिक वैभव की पुनर्वापसी की ओर उठाया कदम कहा जा सकता है। पिछले कई दशकों से श्रीनगर में गोली-बारूद की गंध और निर्दोष नागरिकों की हत्या से आतंक का वातावरण बना था। इस वातावरण ने कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नेपथ्य में धकेल दिया था। कभी इसकी बात नहीं होती थी कि कश्मीर का शारदा पीठ, पूरी दुनिया में ज्ञान का ऐसा केंद्र था जिसके समांतर किसी और केंद्र का इतिहास में उल्लेख नहीं मिलता है।
साहित्योत्सव के दौरान प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने शारदा पीठ का न केवल उल्लेख किया बल्कि जोर देकर कहा कि शारदा पीठ दुनिया का पहला विश्वविद्यालय भी था। बिबेक देवराय की इस बात पर चर्चा होनी चाहिए और विद्वानों को इसपर अपना अपना मत रखना चाहिए। कश्मीर के शारदा पीठ की अपने समय में बड़ी प्रतिष्ठा थी। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि पूरे देश के विद्वान जब किसी ग्रंथ की रचना करते थे तो वो उसकी स्तरीयता की परख के लिए शारदा पीठ आते थे। वहां के विद्वान उस ग्रंथ पर चर्चा करते थे और अगर उसमें मौलिक स्थापना होती थी तो उसको अपने तरीके से प्रमाणित करते थे। दुर्भाग्य से शारदा पीठ इस वक्त गुलाम कश्मीर का हिस्सा है।  

शारदा पीठ सिर्फ ज्ञान का केंद्र ही नहीं था बल्कि इस पीठ के नाम से एक लिपि भी उस दौर में प्रचलन में थी, जिसको शारदा लिपि के नाम से जानते हैं। ये माना जाता है कि शारदा लिपि का आरंभ दसवीं शताब्दी में हुआ था। कश्मीरी विद्वानों ने शारदा लिपि में विपुल लेखन किया था। शारदा लिपि में बहुत अधिक लिखा गया था और वहां के विद्वान लेखक अपनी रचनाओं को लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में विमर्श के लिए गए भी थे। इसके अलावा देशभर के अलग अलग हिस्सों के विद्वान भी शारदा पीठ जाकर शारदा लिपि सीखकर अपने अपने क्षेत्रों में लौटते थे। फिर वो अपनी रचनाएं शारदा लिपि में लिखते थे। देशभर में कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां आज भी शारदा लिपि में लिखे गए ग्रंथ सहेजकर रखे हुए हैं। कश्मीर में सिर्फ शारदा लिपि ही नहीं बल्कि संस्कृत भाषा और उसमें रचना करनेवाले विद्वानों की लंबी सूची है। नीलमत पुराण में विस्तार इसकी चर्चा है कि कैसे कश्मीर में वहां की जनता उत्सवों के माध्यम से अपनी पंरपराओं को और अपनी ज्ञान परंपरा को जीवंत बनाए रखती थी। काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मट भी कश्मीर की धरती के ही सपूत थे। काव्यप्रकाश एक ऐसा ग्रंथ है जो अब भी साहित्य के अध्येताओं के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। अबतक इस पुस्तक की असंख्य टीकाएं लिखी जा चुकी हैं लेकिन अब भी कई विद्वान इसमें वर्णित उल्लास और कारिकाओं की व्याख्या करने में लगे रहते हैं। बिबेक देवराय ने एक ऐसे मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया जिसके बारे में लगातार चर्चा होती है। संस्कृत के आलोचकों का कहना है कि इस भाषा में व्यंग्य साहित्य की कमी है। संस्कृत की इस कथित कमी को आलोचक इस भाषा के रचनात्मक लेखन की कमजोरी के तौर पर रेखांकित करते हैं। बिबेक ने इस संबंध में कश्मीर के ही एक लेखक क्षेमेन्द्र का नाम लिया और कहा कि उनकी रचनाओं में पर्याप्त मात्रा में व्यंग्य उपस्थित है। 

कश्मीर के इतिहास और उसकी परंपराओं पर पुस्तक लिखनेवाले निर्मलेंदु कुमार ने लिखा है कि भारत के प्रांतो में एकमात्र कश्मीर ही है जिसका मध्यकाल का पूरा प्रामाणिक इतिहास वहीं के विद्वानों द्वारा लिखा हुआ मिलता है। भारतवर्ष के अन्य प्रदेशवासियों की अपेक्षा कश्मीरियों में विशेष इतिहास-प्रेम रहा, जिससे उन्होंने अपने देश का शृंखलाबद्ध इतिहास लिख रखा है। कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की और उसके बाद जोनराज ने राजतरंगिणी का दूसरा खंड लिखा। आगे भी दो खंड लिखे गए। इस तरह से हम देखते हैं कि कश्मीर का साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव अपने जमाने में शिखर पर था। भारत के स्वतंत्रता के कुछ समय पहले से और उसके कुछ दिनों के बाद से कश्मीर में जिस तरह की राजनीति की गई उसने भी यहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की विकास यात्रा को अवरुद्ध कर दिया। स्वाधीन भारत में कश्मीर एक ऐसा मुद्दा बना रहा जिसपर हमेशा से राजनीति होती रही। राजनीति भी ऐसी जिसको न तो प्रदेश की विकास की फिक्र थी और न ही विचारों के निर्बाध प्रवाह की। विकास और विचार दोनों बाधित हुए। विकास और विचार को बाधित करने के बाद वहां आतंक को केंद्र में लाने का कुत्सित प्रयास हुआ। आतंकवाद ने लंबे कालखंड तक न केवल कश्मीर की जनता को परेशान किया बल्कि उसको देश दुनिया से काटकर रखा। एक समय तो ऐसा भी आ गया था जब लगने लगा था कि कश्मीर हाथ से निकलने वाला है। वहां के हालात बेकाबू थे। कश्मीरी हिंदुओं की हत्या और उनके पलायन ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। जो धरती कभी शैव मत के दर्शन को शक्ति प्रदान करनेवाली रही, वो धरती जहां के लोग शिव और विष्णु के उपासक थे उसी धरती से हिंदू धर्म को माननेवालों को या तो मार डाला गया या उनको उस धरती को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। इस तरह से कश्मीर की जनता को धर्म के आधार पर विभाजित करने का जो खेल स्वाधीनता के बाद से आरंभ हुआ था वो कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के साथ अपने चरम पर पहुंचा। 

अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद से कश्मीर में जिस तरह से विकास के साथ साथ विचार का प्रवाह भी आरंभ हुआ है उसने एक उम्मीद जगाई है। कश्मीर में आयोजित कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान स्थानीय कश्मीरी छात्रों की भागीदारी या स्थानीय लेखकों की उपस्थिति और सत्रों में हिस्सेदारी संतोषजनक रही। छात्रों में इस बात को जानने की उत्सुकता थी कि अन्य भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है। अन्य प्रदेशों में किन बिंदुओं पर विमर्श होते हैं और उन विमर्शों से क्या निकलकर आता है। उनके अंदर सिनेमा की बारीकियों और उनसे जुड़े किस्सों को सुनने की भी ललक दिखाई पड़ रही थी। जब राज कपूर के सहायक निर्देशक रहे और बाद में ‘बेताब’ और ‘लव स्टोरी’ जैसी फिल्में बनाने वाले राहुल रवैल के सत्र में कश्मीरी युवकों की प्रश्नाकुलता देखते ही बनती थी। वो ये जानना चाहते थे कि जिस फिल्म के नाम पर कश्मीर में बेताब वैली है उसके निर्माता के उस वक्त के अनुभव क्या थे। जब राहुल रवैल ने बताया कि ‘बाबी’ फिल्म का कुछ हिस्सा डल झील के किनारे शूट हुआ था तो युवकों की जिज्ञासा और बढ़ गई। राहुल रवैल साहब ने भी विस्तार से अपनी बात रखकर उपस्थित श्रोताओं की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश की। कश्मीर में इस तरह के आयोजनों से न केवल वहां के युवाओं के मन में उठ रहे प्रश्नों का शमन होगा बल्कि उनकी रचनात्मकता को विस्तार मिलेगा। भारत सरकार और कश्मीर प्रशासन दोनों को ये सोचना चाहिए कि विकास के साथ विचार का भी अगर प्रवाह होगा तो वो लोगों के मन मस्तिष्क को खोलेगा जो किसी समस्या के हल के लिए आवश्यक अवयव है। 

Friday, November 25, 2016

नियोजित विवाद का हासिल क्या ?

त्योहार के उत्सव बाद पूरे देश में इस वक्त साहित्य के उत्सव चल रहे हैं । सुदूर तमिलनाडू से लेकर दिल्ली तक और पश्चिम में मुंबई और अहमदाबाद तक में कुछ आयोजन हो चुके हैं और कइयों की तारीखों का एलान होकर अब वक्ताओं के विज्ञापन हो रहे हैं । अभी हाल ही में मुंबई के एक लिटरेचर फेस्टिवल में पूर्व वित्त मंत्री पी चिंदबरम ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिराए जाने को लेकर उस वक्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव को कठघरे में खड़ा कर दिया। लिटरेचर फेस्टिवल में नरसिम्हाराव : द फॉरगॉटन हीरो वाले सत्र में चिदंबरम ने कहा कि उस वक्त विवादित ढांचे को केंद्र के अधीन नहीं लेना घातक राजनीतिक भूल थी । अब इस तरह के डिस्कोर्स का साहित्य के उत्सव में क्या काम । इसी तरह से इन दिनों दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार भी साहित्य उत्सवों में स्थाई नाम बन गए हैं । इसके अलावा विवादित राजनेताओं को साहित्य उत्सवों में बुलाने का भी चलन चल पड़ा है । दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा का साहित्य में योगदान अबतक साहित्यक पाठकों को ज्ञात नहीं है लेकिन वो भी साहित्य उस्तवों में बुलाए जाते हैं । कन्हैया के भी साहित्यक योगदान से साहित्य जगत अब तक अनजान है । पिछले दिनों कसौली में हुए खुशवंत सिंह लिटरेरी फेस्टिवल में कन्हैया कुमार को एक सत्र में बतौर वक्ता आमंत्रित किया गया था । कन्हैया कुमार ने वहां राष्ट्रवाद की अवधारणा को खिचड़ी बताकर विवाद खड़ा करने की कोशिश में अपनी अज्ञानता का परिचय दे गए । कन्हैया ने साहित्य संवाद के बीच अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकि को रामलीला में भाग लेने से रोकने की घटना के आधार पर राष्ट्रवाद की नई स्थापना देने की कोशिश की । उन्होंने कहा कि देश में पहचान के आधार पर घृणा फैलाने की कोशिश की जा रही है । कन्हैया के भाषण के बीच में ही श्रोताओं ने उनकी हूटिंग शुरू कर दी और उनसे मांग शुरू हो गई कि सेना को बलात्कारी कहने के अपने बयान पर माफी मांगे । कन्हैया ने सफाई देने की कोशिश की कि उसने सेना को बलात्कारी नहीं कहा था । साथी वक्ताओं के हस्तक्षेप के बाद मामला किसी तरह से शांत हो सका । अब इस साल जयपुर में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल के आखिरी दिन के वाकए पर गौर फर्माते हैं । अभिव्यक्ति की आजादी पर एक सत्र था जिसमें अनुपम खेर, सलिल त्रिपाठी, पवन वर्मा, मधु त्रेहान के अलावा कपिल मिश्रा भी थे । इस सत्र में भाषा के साथ साथ संवाद की मर्यादा तार-तार हो गई । कपिल मिश्रा ने प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक बातें कह डालीं जिसका श्रोताओं ने जबरदस्त प्रतिवाद किया। कपिल मिश्रा और अनुपम खेर के बीच काफी देर तक तू-तू मैं-मैं होता रहा जो कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसे प्रतिष्ठित साहित्यक उत्सव के मंच की मर्यादा के अनुकूल नहीं था । इस तरह के वाकयों से कई सवाल खड़े होते हैं जिनमें से पहला तो ये कि कन्हैया और कपिल मिश्रा जैसे लोगों का साहित्यक जमावड़े में क्या काम है ?  क्या सिर्फ विवाद बढ़ाकर चर्चा बटोरने के लिए साहित्य उत्सवों के आयोजक इनको बुलाते हैं । ठीक उसी तरह से जैसे लाइव शो के दौरान एक महिला के साथ मारपीट करनेवाले ओम जी महाराज को बिग बॉस के घर में रहने के लिए बुला लिया गया । लेकिन क्या गंभीर साहित्यक चर्चा या गंभीर सामाजिक विषयों पर मंथन करने का दावा करनेवाले इन लिटरेचर फेस्टिवल भी विवादों की वैसाखी के सहारे लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं । क्या लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजक भी टीवी सीरियल्स की तरह विवादित प्रतिभागियों का चयन करने लगे हैं । गंभीर साहित्यक विमर्श भी क्या मनोरंजन का मंच बनने की जुगत में लग गया है ।
दरअसल अगर हम देखें तो देशभर में जितने भी लिटरेचर फेस्टिवल होते हैं सभी के सामने कमोबेश जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता का मॉडल रहता है । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता और लोकप्रियता बढ़ाने में वहां उठे बड़े विवाद काफी प्रभावी रहे हैं चाहे वो दो हजार बारह में सैटेनिक वर्सेस जैसा विवादित उपन्यास लिखने वाले सलमान रश्दी के फेस्टिवल में शामिल होने को लेकर उठा विवाद हो या फिर पूर्व पत्रकार और अब आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष और समाजशास्त्री आशीष नंदी के बायनों से उठा विवाद हो । सलमान रश्दी के जयपुर आने पर रोक की वजह उस वक्त उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी बनी थी । मुसिम मतदाताओं पर नजर रखकर तमाम सियासी दलों ने सलमान रश्दी के जयपुर आने का विरोध किया था । जमकर धरना प्रदर्शन और मीडिया में इसकी चर्चा हुई थी । बाद में ये बात फैली कि सलमान का वीडियो लिंक होगा लेकिन विरोध के मद्देनजर वो भी नहीं हो पाया । सलमान रश्दी के साथ दिखने के लिए जीत थाइल, और कुछ अन्य लेखकों ने अपने सत्र में सलमान रश्दी की किताब के अंश पढ़ डाले । जीत पर जयपुर और अजमेर समेत कई जगहों पर आधे दर्जन से ज्यादा केस दर्ज हुए । विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को नेताओं के बयान से लेकर कोर्ट कचहरी की दहलीज तक पहुंचा दिया था, प्राइम टाइम न्यूज डिबेट का विषय तो कई दिन तक बना ही रहा था । अब चिदंबरम का नपसिंह राव को कठघरे में खड़ा करनेवाला बयान भी य़ूपी चुनाव के मद्द्नजर दिया गया प्रतीत होता है ।
इस विवाद के बाद अगले साल आशुतोष और आशीष नंदी के बीच एक सत्र में हुई बहस ने भी भारी विवाद का रूप ले लिया था । दरअसल भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए आशीष नंदी ने कहा था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग ज्यादा भ्रष्ट होते हैं । इस पर आशुतोष ने कड़ी आपत्ति जताई थी । बात जंगल में आग की तरह फैली और आयोजन स्थल के बाहर दलितों और पिछड़ों ने प्रदर्शन करना शुरू कर दिया । चौबीस घंटे चलनेवाले न्यूज चैनलों को भी मसाला मिला और वो भी इस मसले पर पिल पड़े । सबके केंद्र में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल । बाद में ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था । इन दोनों विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को साहित्यकारों की दुनिया से निकालकर लोगों के बीच पहुंचा दिया ।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उठे विवाद सायास नहीं थे, स्थितियों और बहसों ने विवाद को जन्म दिया । कहना ना होगा कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता को मॉडल मानने वाले अन्य लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों ने विवाद पैदा करने के लिए कन्हैया कुमार और कपिल मिश्रा जैसे लोगों को आमंत्रित करना शुरू कर दिया । साहित्यक बहसों से निकलनेवाले विवादों और नियोजित विवादों के बीच का अंतर खत्म हो गया । ये स्थिति साहित्यक आयोजनों के लिए भविष्य में घातक हो सकती है ।


Sunday, December 6, 2015

लिटरेचर फेस्टिवल या विवादों का अखाड़ा

हर साल दिसंबर और जनवरी का महीना साहित्यक आयोजनों के लिए सबसे ज्यादा व्यस्त महीना रहता है । इन दो महीनों में पूरे देश में साहित्य उत्सवों का सबसे ज्यादा आयोजन होता है । इसकी कोई खास वजह तो ज्ञात नहीं है लेकिन अंदाजा ये लगाया जा सकता है कि वर्षांत के मौहाल के मद्देनजर ये इन्हीं महीनों में आयोजित किए जाते हैं । हाल में मुंबई से लेकर बेंगलुरू से लेकर दिल्ली और पटना तक इस तरह के आयोजनों की धूम रही है और साहित्यक कैलेंडर के मुताबिक अगले साल फरवरी के शुरुआत तक नियमित अंतराल पर ये आयोजन होते रहेंगे । साहित्यक आयोजनों के बारे में जयपुर लिटरेटर फेस्टविल की निदेशक नमिता गोखले ने कहा था कि ये ऐसा मंच होना चाहिए जहां साहित्य और उसकी समकालीन प्रवृत्तियों पर गंभीरता से विमर्श हो । दुनियाभर के लेखक और विचारकों के बीच साहित्य पर चिंतन हो जिसका फायदा पाठकों को मिल सके । जयपुर लिटरचेर फेस्टिवल के निदेशक की बात इस वजह से कह रहा हूं कि हमारे देश में लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत और सफलता का श्रेय नमिता, विलियम डेलरिंपल और संजोय को ही जाता है । खैऱ इस लेख का विषय जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफल यात्रा नहीं है । हम बात कर रहे हैं देशभर में लिटरेचर फेस्टिवल की बहुलता और उससे उठने वाले विवादों की । हाल के दिनों में ये देखने को मिला है कि हर तरह के साहित्यक आयोजनों में साहित्यक विमर्श की बजाए विवाद पर ज्यादा जोर रहता है । ऐसा प्रतीत होता है कि आयोजक ये मानने लगे हैं कि इस तरह के आयोजनों की सफलता का मंत्र विवाद है । दिल्ली में हाल ही में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल में कई विवाद उठे । मसलन कांग्रेस के नेता पी चिदंबरम का सलमान रुश्दी की किताब पर भारत में लगे बैन पर दिया गया बयान । चिदंबरम ने कहा कि सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेस पर लगाई गई पाबंदी उचित नहीं थी । गौरतलब है कि पी चिदंबरम उस वक्त देश के आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री थे । उस वक्त की राजीव गांधी सरकार ने सैटेनिक वर्सेस पर पाबंदी लगाने का जो फैसला किया था उसके बारे में तथ्य सबको मालूम है कि किस लेखक की संस्तुति पर ऐसा किया गया था । कई किताबों में इसका उल्लेख मिलता है । असहिष्णुता पर देशभर में जारी बहस के बीच चिदंबरम के इस बयान ने एक बार फिर से विवाद को हवा दे दी । उनकी मंशा पर भी सवाल उठे । बहस के दौरान इस बात की तलाश होने लगी कि कांग्रेस के नेता ने ये बयान कहां दिया है । इस तरह से आयोजन को प्रचार मिला । विवाद से प्रचार हासिल करने का लिटरेचर फेस्टविल में चलन हो गया है । इसी तरह से दलित चिंतक और विचारक कांचा इलैया का बयान भी काफी विवादित हो गया । कांचा इलैया ने कह दिया कि अगर सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो भारत भी पाकिस्तान की राह चलता और देश में लोकतंत्र अबतक खत्म हो गया रहता । भारत की स्थिति भी पाकिस्तान जैसी हो गई होती । कांचा इलैया इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने जोर देकर कहा कि सरदार पटेल ये नहीं चाहते थे कि बाबा साहब भीम राव अंबेडकर भारतीय संविधान लिखें । इलैया के मुताबिक पटेल चाहते थे कि कोई व्यक्ति जो मनुस्मृति को मानता हो वही संविधान लिखे । कांचा इलैया के ऐसा कहने का आधार सिर्फ इतना था कि पटेल हिंदू महासभा के करीब थे । इतिहास के बारे में बातें तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए लेकिन कांचा इलैया तथ्यों के बजाए उसके विश्लेषण और अपनी धारणा के आधार पर बात करने लगे । इलैया के उक्त बयान की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव के दौरान कही गई बात थी कि अगर सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री होती तो देश की तस्वीर ही कुछ और होती । सरदार पटेल को लेकर इस वक्त की सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता बेहद संवेदनशील हैं लिहाजा कांचा इलैया के इस बयान पर जमकर बहस हुई । इन विवादों के अलावा इस लिटरेचर फेस्टिवल की चर्चा नहीं हो पाई । दरअसल कल एक मित्र ने कहा कि लिटरेचर फेस्टिवल अब साहित्य के विमर्श का स्थान नहीं बल्कि विवादों का अखाड़ा बन गया है । बेंगलुरू लिटरेचर फेस्टिवल में भी यही हुआ । वह आयोजन भी साहित्येतर कारणों ही चर्चा में रहा । पटना में जारी पुस्तक मेले में हर शाम को जिस तरह से साहित्यक और समसामयिक विषय पर चर्चा होती है वह अपनी तरह का अनूठा है लेकिन वहां भी विवाद खड़े होते रहे हैं । पिछले साल एक लेखक ने कह दिया था कि हिंदी के लेखक तानाशाह होते हैं और उनको पाठकों की फिक्र नहीं होती है । इस वक्तव्य की गूंज साहित्य में साल भर तक सुनाई देती रही थी ।

अब अगर हम इस बात की पड़ताल करें कि इन साहित्यक आयोजनों में ऐसा क्यों होता है । इससे एक बात जो समझ में आती है वह यह कि इनके आयोजकों को लगता है कि विवाद के बगैर लोकप्रियता मुमकिन नहीं है । उनके सामने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का ही उदाहरण होता है । नमिता गोखले के लाख नहीं चाहने के बावजूद जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल लगातार कई सालों तक विवाद में रहा । चाहे वो सलमान रुश्दी के जयपुर आने को लेकर विरोध से उठा विवाद हो या फिर आशुतोष और आशीष नंदी के बीच एक सत्र में दलितों पर की गई टिप्पणी को लेकर हुआ विवाद हो । हर बार मामला कोर्ट कचहरी से लेकर थाने और धरना प्रदर्शन तक पहुंचा है । आशुतोष और आशीष नंदी का विवाद तो सुप्रीम कोर्ट से निबटा ।  इन विवादों की वजह से ही जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पूरी दुनिया में चर्चित हुआ है । जयपुर लिटरेचर फेस्टविल की आयोजक नमिता इस बात पर अफसोस करती हैं कि गंभीर विमर्श हमेशा से एक दो विवादों के बीच दब जाता है लेकिन शायद उनको इस बात का एहसास नहीं है कि देश में आयोजित और लिटरेचर फेस्टिवल विवादों को अपनी सफलता का मंत्र मानते हैं । हमारा मानना है कि विवादों से कोई आयोजन चर्चित तो हो सकता है लेकिन उसकी प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है कि वहां गंभीर चिंतन और विमर्श हो ।