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Friday, June 7, 2019

यादों में व्यंजनों के शहंशाह


आज से करीब पच्चीस साल पहले की बात है। एक मित्र की शादी के सिलसिले में पटना गया था। बारात पटना के मेनका होटल में रुकी थी। शादी संपन्न होने के बाद  के बाद बारात वापस घर लौट रही थी। बारात के साथ ही दूल्हा दुल्हन भी लौट रहे थे। दूल्हा-दुल्हन के साथ एक व्यक्ति गाड़ी में होता है जिसका दायित्व रास्ते भर उन दोनों का ख्याल रखना होता है। चूंकि दुल्हा मेरा मित्र था इस वजह से ये दायित्व मुझे सौंप दिया गया। पटना से जब हम जमालपुर के लिए चले तो अम्बेसडर कार में पीछे की सीट पर बैठे दुल्हा-दुल्हन बातें कर रहे थे। आगे की सीट पर बैठा मैं विकल्पहीनता की स्थिति में उनकी बातें सुन रहा था। घर परिवार, नाते-रिश्तेदार से होती हुई बातचीत खाने पर पहुंच गई। दूल्हे ने दुल्हन से पूछा कि तुम्हें खाना बनाना आता है ? वो कुछ बोलती इसके पहले उसने कहा कि मेरी भाभी और मां दोनों बहुत अच्छा खाना बनाती है, तुम्हारा मुकाबला उनसे ही होगा। दुल्हन हां-हूं कर रही थी। बना लूंगी, कर लूंगी, बहुत तो नहीं आता आदि-आदि। दूल्हा को लगा कि उसके हाथ एक ऐसा मसला आ गया है जिससे वो अपनी नई नवेली पत्नी पर रौब झाड़ सकता है। वो लगातार अपनी भाभी और मां के खाने और खाने की डिशेज की तारीफ कर रहा था। दुल्हन चुपचाप सुन रही थी। ये क्रम पंद्रह-बीस मिनट तक चला तो अचानक दुल्हन ने कहा कि सबकुछ तो ठीक है पर आपकी भाभी और मां जो खाना बनाती हैं वो तो कोई भी बना सकता है। वो पारपंरिक खाना बनाती हैं। व्यंजनों के साथ कोई प्रयोग नहीं करती हैं। मैं आप लोगों को ऐसा खाना बनाकर खिलाऊंगी कि सब भूल जाएंगें। अब दुल्हन आक्रामक होकर अपनी बात रख रही थी। उसने पाक-कला पर धारा प्रवाह बोलना शुरू किया। पहली बार गाड़ी में दुल्हन के मुंह से ही मैंने जिग्स कालरा का नाम सुना। उसने कहा कि मैंने जिग्स कालरा की किताबें पढ़ रखी हैं। दूरदर्शन पर उनके शो ‘दावत’ को देखती हूं और जिस तरह से वो मसालों, सूखे मेवों और सब्जियों को अलग अलग तरीके से मिलाकर नए तरह का खाना बनाते हैं वो आपके यहां किसी ने सुना भी नहीं होगा। वो इतने पर ही चुप नहीं हुई। उसने कहा कि जिग्स कालरा ऐसे खाना बनाते हैं जैसे कोई विज्ञान की प्रयोगशाला में अलग अलग केमिकल्स को उसकी प्रकृति को समझते हुए एक दूसरे से मिलाकर एक नए तरह का केमिकल तैयार करता है। दुल्हन ऐसे-ऐसे शब्द प्रयोग कर रही थी जिसको हमने भी पहली बार सुना था। मेरे दोस्त की हालत खराब थी, वो बार-बार टॉपिक बदलने की कोशिश करता था, लेकिन दुल्हन अपने पाक कला के ज्ञान से उसको लगातार आतंकित कर रही थी। बार-बार जिग्स कालरा का उदाहरण भी दे रही थी। उसने ये भी बताया कि अपने मायके से जो सामान लाई है उसमें जिग्स की लिखी किताबें और लेखों की कटिंग भी है।
अभी जब जिग्स कालरा के निधन की खबर मिली तो अचानक मेरे दिमाग में पच्चीस साल पहले की ये घटना कौंध गई। ये बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि कोई लेखक या कोई कलाकार अगर अपनी लेखनी के माध्यम से देश के अलग अलग परिवारों में अपना स्थान बना लेता है। ये उसकी कला की ताकत है। जिग्स कालरा की कुकिंग को देखकर जिस तरह से मेरे दोस्त की पत्नी पाककला में निपुण हो गईं उसी तरह से देशभर में हजारों महिलाएं हुई होंगी। दरअसल अगर देखा जाए तो भारत में पाककला पर नियोजित तरीके से लेखन की शुरुआत जसपाल इंदर सिंह कालरा उर्फ जिग्स कालरा ने की। जिग्स कालरा ने भारतीय कुजीन को विदेशी मंचों पर ना केवल प्रतिष्ठा दिलाई बल्कि अपने प्रयोगों से विदेशियों को चौंकाया भी। जिसने भी कालरा के दूरदर्शन पर चलनेवाले शो को देखा होगा उनको याद होगा कि किस तरह के प्रयोग वो किया करते थे। रविवार को दूरदर्शन पर आनेवाले ‘दावत’ नाम के उस कार्यक्रम में पुष्पेश पंत उनके साथ होते थे। उस कार्यक्रम में समोसा और कोरमा पर तो बात होती ही थी, मशरूम चाय और उसके बनाने के तरीके पर भी दिलचस्प बातें होती थीं। भारतीय मसालों का प्रयोग भी वो अद्भुत तरीके से करते थे। तंदूरी और मिंट चटनी के कांबिनेशन का उनका प्रयोग भी काफी चर्चित रहा था।जिग्स कालरा ने बाद के दिनों में और भी प्रयोग करने शुरू कर दिए थे। उन्होंने भारतीय व्यंजनों के साथ एशियाई देशों में बनने वाले खाना बनाने की विधि को मिलाकर प्रयोग करने शुरू किए। जिग्स कालरा के खाने के देश-विदेश में कई नामचीन लोग मुरीद थे। अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ वो उनके विदेश दौरों में जाया करते थे और अटल जी को मनपसंद खाना खिलाया करते थे। इंगलैंड के शाही घराने की डायना और प्रिंस चार्ल्स, अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन और उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन के अलावा पाकिस्तान के तानाशाह परवेज मुशरर्फ भी जिग्स के खाने के दीवाने थे। लगभग पचास सालों तक जिग्स कालरा ने भारतीय खान-पान की विरासत को जिस तरह से वैश्विक व्याप्ति दी वो अप्रतिम है। चार जून को उनके निधन ने कुजीन की दुनिया को विपन्न कर दिया।  

Saturday, November 3, 2018

सांस्कृतिक मंच से सियासत


हाल ही में भारतीय जन नाट्य संघ यानि इप्टा का प्लैटिनम जुबली समारोह पटना में मनाया गया। हर संस्था अपनी स्थापना के महत्वपूर्ण पड़ावों पर समारोहों का आयोजन करती है। भारतीय जन नाट्य संघ ने भी किया। आजादी के पहले स्थापित इस संस्था का उद्देश्य नाटकों के माध्यम से सांस्कृतिक जागरण फैलाना था। ये संस्था शुरू से ही वामपंथी विचारकों द्वारा स्थापित थी और कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक ईकाई के रूप में काम करती रही है। इसी स्थापना के संकेत प्रगतिशील लेखक संघ की 1936 में हुई बैठक में ही मिलने लगे थे और सात साल बाद स्थापना हो गई। आजादी मिलने के बाद भारतीय जन नाट्य संघ ने अपने नाटकों के माध्यम से जमकर वामपंथी विचारधारा का प्रचार किया, लेखन और मंचन दोनों में। वामपंथी और कांग्रेसी सरकारों की छत्रछाया में ये संगठऩ खूब फले फूले भी, लेकिन जब वामपंथी विचारधारा धीरे-धीरे एक्सपोज होने लगी तो इस तरह के संगठनों की ताकत भी कम होती चली गई। ये संगठन अपने मातृ संगठनों के लिए काम करते रहे। प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे संगठन किसी भी फैसले के लिए अपने राजनीतिक आका का मुंह जोहते रहे। उनके निर्देशों के पालन में साहित्य और संस्कृति को ढाल बनाकर राजनीति करते रहे। इस तरह के सैकड़ों वाकए हैं जब इन संगठनों ने साहित्य कला और संस्कृति को ढाल बनाकर राजनीति की। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद असहिष्णुता की मुहिम हो या पुरस्कार वापसी का अभियान हो, इन सबके पीछे यही मानसिकता काम करती रही। ये उस सुविधापरक राजनीति का अंग है कि जिसके तहत वो लेखक जो अशोक वाजपेयी को कल्चरल माफिया और भारत भवन को अजायबघर कहते नहीं थकते थे वो सभी आज अशोक वाजपेयी और रजा फाउंडेशन के झंडे तले एकजुट नजर आते हैं। यह उसी सुविधाजनक राजनीति का हिस्सा है जो एम एफ हुसैन पर हमले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखता है और दूसरी तरफ तस्लीमा नसरीन पर हमला होता है तो खामोशी छा जाती है। इस तरह के इतने उदाहरण हैं कि एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। संस्कृति के नाम पर राजनीति करना कोई इनसे सीखे।
हम बात कर रहे थे पटना में आयोजित जन नाट्य संघ के समारोह की जिसमें एक बार फिर से जमकर राजनीति हुई। नाटकों की आड़ में राजनीति का ये बेहतर नमूना है। इसके उद्घाटन सत्र में मंच पर बैठे वक्ताओं की सूची से ही पता चल जाता है कि आयोजकों की मंशा क्या रही होगी। शबाना आजामी, एम के रैना. जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी। शबाना आजमी, एम के रैना की बात तो समझ में आती है कि वो रंगकर्म से जुड़े हुए लोग हैं। कन्हैया ने भी ये बताया कि वो बचपन में अपने गांव में इप्टा में सक्रिय थे । उन्होंने स्वीकार किया कि वो अपने गांव में इप्टा में सक्रिय न होते तो उनमें ये चेतना भी न आयी होती। उन्होंने आगे स्वीकार किया वो जो 'आज़ादी ' का गाना गाते हैं वो भी इप्टा  का ही है।  उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस वक्त देश में बहुत सारे ऐसे स्टैंडअप कॉमेडियन हैं जो इप्टा जैसे किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं लेकिन उनके कंटेंट उतने प्रगतिशील हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को साथ जोड़ने की वकालत भी की। वो उस तरह के स्टैंड अप कॉमेडियंस की बात कर रहे थे जो मंच पर खड़े होकर नरेन्द्र मोदी का मजाक उड़ाते हैं। प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही नरेन्द्र मोदी की आलोचना या उनका मजाक उड़ाना है। ये ठीक भी है क्योंकि कन्हैया कुमार तो राजनीति कर रहे हैं और उनके इरादे बिहार के बेगूसराय लोकसभा चुनाव से निर्वाचित होने की भी है। उसके लिए वो तैयारी भी कर रहे हैं। एक चतुर राजनेता की तरह वो इप्टा के मंच का इस्तेमाल भी करते हैं। उनको मालूम है कि सूबे की राजधानी में आयोजन हो और उसमें मौजूदा केंद्रीय हुकूमत पर हमला बोला जाए तो मीडिया में जगह मिलेगी ही।
अगर ये मान भी लिया जाए कि कन्हैया का रंगकर्म से कोई लेना देना है लेकिन यह मानना मुश्किल है कि जिग्नेश मेवाणी का नाटक से कोई लेना देना है। जिग्नेश गुजरात से निर्दलीय विधायक हैं जिनको कांग्रेस का समर्थन है। जिग्नेश ने इप्टा के मंच से राजनीतिक भाषण दिया और कहा कि संगठन को सिर्फ लाल और नीले रंग की चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि सभी रंगों का ख्याल रखना चाहिए। रंगों की बात इस वजह से चली कि शबाना ने अपने भाषण में भी रंग से बात शुरू की थी। शबाना ने कहा था कि जब वो छोटी थी तो अपने पिता कैफ़ी आज़मी साहब उनको मदनपुरा के मज़दूरों के रैली में ले जाते थे। जब दुनिया में आँखे खोलीं तो सबसे पहले   लाल रंग ही देखी। उनका मानना है कि लाल रंग लोगों को जोड़ने के काम आता है। उन्होंने लाल रंग की महत्ता स्थापित करने के बाद कहा कि आज लड़ाई धर्म और मज़हब की नहीं बल्कि विचारधारा की है। उन्होंने बेहद चतुराई के साथ कहा कि वो एक महिला हैं, बेटी हैं, पत्नी हैं, फिल्म अभिनेत्री हैं, सामाजिक कार्यकर्ता हैं, और एक मुस्लिम भी हैं। जोर देकर कहा कि मुस्लिम शब्द आते ही उनकी सारी पहचान गौण हो जाती हैं और सिर्फ मुस्लिम के तौर पर पहचान बच जाती है। अब हमें इश बात पर विचार करना चाहिए कि ये भाषण एक सांस्कृतिक संगठन के मंच से हो रहा था। शबाना आजामी प्रकारांतर से राजनीति कर रही थी जिसको जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता आगे बढ़ा रहे थे।
अगर हम देखें तो इप्टा के प्लैटिनम जुबली समारोह को राजनीति का मंच बना दिया गया। इस आयोजन का जिम्मा भारतीय जन नाट्य संघ की पटना ईकाई के जिम्मे था और इसके मुख्य पदाधिकारी लंबे समय तक राष्ट्रीय जनता दल के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के मुखिया रहे हैं। साफ है कि उनकी प्रतिबद्धता किस ओर है। इप्टा का ये आयोजन विपक्ष की राजनीति को मजबूत करने के लिए किया गया प्रतीत होता है। जिसमें अमूमन सभी वक्ताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। हद तो तब हो गई थी कि जब कांग्रेस के नेता शकील अहमद खान भी मंच पर पहुंचे और उन्होंने वहां से लगभग राजनीतिक भाषण दिया। कुछ लोगों का कहना है कि शकील अहमद खान ने कहा कि अब इस तरह के कार्यक्रम उन जगहों पर करने चाहिए जहां वक्ताओ की ऊंची आवाज को सुनने में दिक्कत ना हो।  दरअसल हुआ ये था कि आयोजन में मंचन और भाषण के दौरान तेज आवाज की वजह से पड़ोसियों को दिक्कत हो रही थी और पुलिस ने हस्तक्षेप की वजह से कार्यक्रम को मैदान से हटाकर हॉल में करना पड़ा था। वाम दलों के अलावा इस जुटान में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के नेता भी पहुंचे थे और मंचासीन भी हुए थे। इप्टा से ज्यादा ये समारोह विपक्षी दलों का सम्मेलन बन गया था।
बिहार की भूमि इस तरह की राजनीति को लेकर हमेशा से उर्वर रही है। पाठकों को याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले भी वामपंथियों ने इसी तरह से असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी का मुद्दा उठाया था। नीतीश कुमार की जीत के बाद उनमें से कइयों को पुरस्कृत भी किया गया। वामपंथियों की नीतीश कुमार से दिल्ली में मुलाकात भी हुई थी जिसमें ये तय किया गया था कि बुद्धिजीवियों के बीच नीतीश की छवि बनाने के लिए काम किया जाएगा। इस काम का टेंडर हो गया था,लेकिन ठेकेदारी शुरू हो पाती इसके पहले नीतीश कुमार ने ही महागठबंधन को छोड़ दिया। इसके बाद इस योजना पर पानी फिर गया। अब एक बार फिर से वामपंथियों ने अपने सांस्कृतिक संगठन के माध्यम से राजनीति की बिसात बिछानी शुरू कर दी है जिससे की लोसकभा चुनाव के पहले मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा सके। वाम दलों का तो कांग्रेस के साथ बने रहने का इतिहास रहा है, उन्होंने तो इमरजेंसी तक का समर्थन किया था। इसका उनको इनाम भी मिला था और इंदिरा गांधी ने देश के कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े सरकारी, गैर सरकारी और स्वयत्त संगठनों की कमान वामपंथियों को सौंप दी थी। पिछले चार साढे चार सालों में ये व्यवस्था बाधित हुई जिसका सबसे बड़ा असर कम्युनिस्टों पर ही पड़ा। लोकसभा चुनाव में उनको संभावना नजर आ रही है कि किसी तरह से भारतीय जनता पार्टी हारे और वो लोग एक बार फिर से सांस्कृतिक सत्ता की मलाई खा सकें। इनको ये नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए जनता का भरोसा जीतना होता है।   

Wednesday, October 8, 2014

अफवाह का अस्त्र !

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में रावण वध के बाद हुए हादसे में चौंतीस लोगों की मौत हुई । मरनेवालों में ज्यादा संख्या में बच्चे और महिलाएं थी । जांच का एलान हुआ । जांच शुरू हो गई । जांच खत्म भी हो जाएगी । जांच रिपोर्ट भी बन जाएगी । कोई कार्रवाई होगी या नहीं ये विश्वास, के साथ नहीं कहा जा सकता । हादसे के बाद पटना के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का तबादला हो गया । नए अफसर पदस्थापित हो गए । धीरे धीरे जीवन सामान्य हो भी जाएगा । पर बड़ा सवाल बना रहेगा । क्या इन हादसों से हम कोई सबक लेंगे । क्या हादसे की जांच में हर बिंदु को शामिल कर सूक्ष्मतासे तफ्तीश की जाएगी । शायद नहीं । पटना में दो साल पहले छठ पूजा के वक्त भी भगदड़ मची थी । शाम के वक्त छठ पूजा के पहले अर्घ्य के वक्त अदालतघाट पर मची भगदड़ में चौदह लोगों की मौत हुई थी । उस वक्त छठ पूजा के दौरान मची भगदड़ के बाद मौके पर पहुंचे न्यूज चैनल के संवाददाताओं को प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि दो लड़कों ने अचानक से अस्थायी पुल गिरने की बात शुरू कर दी । साथ ही दोनों लड़कों ने यह भी कहना शुरू किया कि पुल के पहले बिजली का तार गिर गया है और लोगों की करंट से मौत हो गई है । यह अफवाह जंगल के आग की तरह फैली और अर्ध्य देकर लौट रहे लोगों के बीच अफरातफरी मच गई । जान बचाने के लिए लोग भागने लगे । जाहिर सी बात है भगदड़ मच गई और महिलाएं और बच्चे इसके शिकार बने । पटना के गांधी मैदान में रावण वध के बाद हुए हादसे के बाद भी प्रत्यक्षदर्शियों ने यह बताया कि दो लड़के आए और उन्होंने बिजली का तार गिरने की बात की । दोनों लड़कों ने यह भी बताया कि कई लोग करंट की चपेट में आ गए हैं । यहां भी यह अफवाह उसी तरह से फैली जिसकी परिणति भगदड़ और महिलाओं और बच्चों की मौत में हुई । छठ पूजा और रावण दहन के दौरान मची घटनाओं को अगर हम जोड़कर देखते हैं तो एक सूत्र नजर आता है । यह सूत्र है अफवाह की वजह से भगदड़ । दोनों जगह पर बिजली के तार गिरने की अफवाह । हादसे के दोनों स्थानों पर श्रद्धा का सैलाब । दोनों हादसों की जगह पर महिलाओं और बच्चों की ज्यादा संख्या में उपस्थिति । दोनों स्थानों पर लोगों के निकलने का तंग रास्ता । सवाल यही है कि क्या ये हादसा था या इसे एक सोची समझी रणनीति के तहत अंजाम दिया गया ।
जांचकर्ताओं को अफवाह के इस पैटर्न पर खास तवज्जो देनी होगी । इस बात की पड़ताल करनी होगी कि क्या पटना में अफवाह के अस्त्र से गड़बड़ी फैलाने वाला कोई संगठित गिरोह तो सक्रिय नहीं है । गंभीरता से इस बात की भी जांच करनी होगी कि क्या गड़बड़ी फैलानेवाले लोग पहले इस तरह के आयोजनस्थलों की रेकी करते है । जहां हालात उनके अनुकूल होता है वहां अफवाह फैलाई जाती है । दो हजार बारह के छठ पूजा के दौरान मचे भगदड़ के दौरान अगर अफवाह वाली बात की जांच की जाती और साजिश के कोण पर भी जांचकर्ताओं का ध्यान जाता तो शायद पटना के गांधी मैदान में इस बार चौंतीस लोगों की जान नहीं जाती । उस वक्त पुलिस ने ना तो अफवाह फैलाने वालों का स्केच जारी किया और यह भी ज्ञात नहीं हो सका कि उस जांच का क्या नतीजा निकला । लेकिन इतना अवश्य साफ है कि पुलिस की ढिलाई से गड़बड़ी फैलानेवाले अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं । मासूमों की जान जाने के बाद हमारी एजेंसियों चेतती अवश्य हैं पर सबक नहीं लेतीं ।