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Saturday, November 30, 2024

आरंभिक भारतीय फिल्मों से बदलेगा इतिहास


गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जानेवालों की अपेक्षा होती है कि उनको कुछ बेहतरीन विदेशी फिल्में देखने को मिल जाएं। वहां पहुंचने वाले सिनेमाप्रेमी फेस्टिवल के शेड्यूल में से अपनी पसंद की फिल्में तलाशते और उसपर चर्चा करते नजर आते हैं। हाल ही में गोवा में समाप्त हुए फिल्म फेस्टिवल में सात भारतीय क्लासिक फिल्मों को भी नेशनल फिल्म आर्काइव आफ इंडिया ने रिस्टोर (मूल जैसा बनाया) किया। इन फिल्मों का प्रदर्शन फेस्टिवल के दौरान हुआ। इन फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया लेकिन सबसे अधिक रोमांच तो दादा साहब फाल्के की 1919 में बनाई गई फिल्म कालिया मर्दन को देखते समय हुआ। दादा साहब फाल्के ने 1919 में जब इस फिल्म का निर्माण किया था तो बाल कृष्ण की भूमिका उनकी बेटी मंदाकिनी फाल्के ने की थी। ये मूक फिल्म थी। करीब 50 मिनट की इस फिल्म को लाइव संगीत के साथ प्रदर्शित किया गया। उन 50 मिनट में दर्शक मूक फिल्मों के दौर में चले गए थे। जहां पर्दे पर पात्र अपने हाव भाव से दृष्य को जीवंत करते थे और पर्दे के नीचे या साथ बैठे साजिंदे अपने वाद्ययंत्रों से संगीत देकर उन दृष्यों में रोचकता पैदा करते थे। कालिया मर्दन फिल्म में जब नदी में खेल रहे बाल कृष्ण को महिलाएं गोद में लेकर ऊपर उठातीं तो हाल में बैठे आर्केस्ट्रा से निकलने वाला संगीत गजब का प्रभाव पैदा करता था। पर्दे पर जब बाल कृष्ण बांसुरी बजाते तो हाल में बैठा बांसुरी वादक वैसे ही धुन निकालता। 

एक बेहद ही मजेदार दृष्य है इस फिल्म है। कृष्ण और उनके बाल सखा को गांव की एक महिला अपमानित करती है। उन शरारती बच्चों पर पानी फेंक देती है। इससे कृष्ण जी क्षुब्ध हो जाते हैं। अपने साथियों के साथ उस महिला के घर में घुसकर माखन चोरी कर लेते हैं। माखन चोरी से क्रोधित वो महिला कृष्ण के साथियों को पीट देती है। अपमानित बालकों ने महिला से बदला देने की ठानी। एक रात कृष्ण जी उनके घर में घुस जाते हैं। महिला अपने पति के साथ सो रही होती है। नटखट कृष्ण ने सोते हुए पुरुष की दाढ़ी और महिला के बाल आपस में बांध दिए। बाद में जब वो उस कमरे से निकलने का प्रयास करते हैं तो असफल हो जाते हैं। बाल कृष्ण की बदमाशियों को दादा साहब फाल्के ने जिस खूबसूरती के साथ दिखाया है कि आज भी दर्शक आनंदित हो उठते हैं। उनको ये याद ही नहीं रहता है कि इस लंबे दृष्य में किसी तरह का कोई संवाद नहीं है। है तो सिर्फ पार्श्व संगीत। फेस्टिवल के समापन समारोह में रमेश सिप्पी ने इस बात को रेखांकित किया कि आज से 105 वर्ष पहले बनी फिल्म कितनी सुंदर थी और किस तरह से उसमें कहानी को आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने फिल्म के कैमरा वर्क की प्रशंसा भी की। यह अनायस नहीं है कि दादा साहब फाल्के को भारतीय फिल्म जगत का पितामह कहा जाता है। इसके अलावा राज कपूर की मास्टरपीस फिल्म आवारा, देवानंद कि हम दोनों, तपन सिन्हा की हारमोनियम, ए नागेश्वर राव की तेलुगु फिल्म देवदासु और सत्यजित राय की सीमाबद्ध और ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिन्दुस्तानी को भी रिस्टोर करके दिखाया गया। नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के अंतर्गत इन फिल्मों पर काम हुआ। यह कार्य महत्वपूर्ण है। 

हम वापस लौटते हैं फिल्म कालिया मर्दन की ओर। आज से 105 वर्ष पहले बनी इस फिल्म के केंद्र में श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप है। उस दौर में जितनी भी फिल्में बन रही थीं सभी भारतीय पौराणिक कथाओं और पात्रों पर आधारित थीं। दादा साहब फाल्के की पत्नी ने उनको कृष्ण के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए उनकी पत्नी ने अपने गहने गिरवी रखे। उससे मिले पैसे को लेकर फाल्के लंदन गए और वहां से सिनेमैटोग्राफी सीखकर वापस लौटे। अब उनके सामने अपने सपने को साकार करने की चुनौती थी। उन्होंने पहले कृष्ण और फिर राम पर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन संसाधन के अभाव में उसको छोड़ना पड़ा। फिर राजा हरिश्चंद्र की कहानी पर काम आरंभ किया। विज्ञापन के बावजूद कोई महिला इस फिल्म में अभिनय के लिए तैयार नहीं हो रही थी। निराशा बढ़ती जा रही थी। पास की दुकान में चाय पीने गए। वहां चायवाले लड़के, सालुंके, पर उनकी नजर पड़ी और उस लड़के को तारामती के रोल के लिए तैयार किया गया। इस तरह भारतीय फिल्म में एक पुरुष ने पहली अभिनेत्री का रोल किया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म बन गई। 3 मई 1913 को बांबे के कोरोनेशन हॉल में उसका प्रदर्शन हुआ। फिल्म लगातार 12 दिन चली। 1914 में लंदन में प्रदर्शित हुई। इनकी दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में नाटकों में काम करनेवाली कमलाबाई गोखले ने अभिनय किया। कमला बाई को फिल्म में अभिनय के लिए उस वक्त फाल्के साहब ने आठ तोला सोना, दो हजार रुपए और चार साड़ियां दी थीं। इसके बाद इन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ बनाई। कहते हैं कि इस फिल्म ने इतनी कमाई की कि टिकटों की बिक्री से जमा होनेवाले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था। सफलता के बाद इनको फाइनेंसर मिल गया। उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। इसी फिल्म कंपनी से दादा साहब फाल्के ने कालिया मर्दन फिल्म का निर्माण किया। फाल्के साहब ने अपने जीवन काल में करीब 900 लघु फिल्में और 20 फीचर फिल्में बनाईं। भारतीय सिनेमा के शोधार्थियों को इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि दादा साहब फाल्के भारतीय पौऱाणिक पात्रो को लेकर ही फिल्में क्यों बनाते रहे। 

जिस तरह से नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के अंतर्गत पुरानी भारतीय फिल्मों को रिस्टोर करने का कार्य हो रहा है, उसको और बढ़ाने और भारतीय दर्शकों तक पहुंचाने की आवश्यकता है। स्वाधीनता के बाद फिल्मी दुनिया में कई ऐसे निर्माता निर्देशक आए जिन्होंने जो वामपंथी विचार के प्रभाव वाले थे। स्वाधीनता के बाद तत्कालीन भारत सरकार फिल्मी जगत के लोगों को सोवियत रूस भेजकर उनके प्रभाव में आने का रास्ता खोल रही थी। अनके पुस्तकों और दस्तावेजों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि किस तरह से सोवियत रूस ने अपने विचारों को भारत में फैलाने के लिए फिल्म और साहित्य जगत का उपयोग किया और सफलता भी प्राप्त की। रूस को सफलता इस कारण मिली क्योंकि उस समय भारत सरकार का सहयोग उनको प्राप्त था। गीतों से लेकर संवाद में पूंजी और पूंजीपतियों पर परोक्ष रूप से हमले शुरु हो गए थे। जमींदारों से लेकर पैसेवालों को बुरा आदमी दिखाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी थी। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास हुआ। कहा जाता है कि उस समय से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी परोक्ष समर्थन इस कार्य के लिए था। अगर नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन अपने काम में तेजी लाती है, इसको सरकार की तरफ से उचित संसाधन उपलब्ध होता है तो संभव है कि आनेवाले दिनों में भारतीय फिल्मों के इतिहास को फिर से लिखने की आवश्यकता पड़े। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में भारतीय फिल्मों की प्रवृत्तियों पर जो कार्य हो रहे हैं उनकी भी दिशा बदल सकती है।    


Saturday, March 9, 2024

आलम आरा ने बदली दिशा


भारतीय फिल्मों की सफलताओं का स्वर्णिम इतिहास रहा है। दादा साहब फाल्के ने जब पहली हिंदी फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई थी वो जबरदस्त सफल रही थी। कहा जाता है कि टिकटों की बिक्री की कमाई इतनी होती थी कि सिक्कों को बोरियों में भर कर रखना होता था। कुछ इसी तरह की कहानी दादा साहब फाल्के की एक और फिल्म से जुड़ी हुई है। 1917 में दादा साहब ने एक फिल्म बनाई  थी जिसका नाम था लंका दहन। नाम से ही स्पष्ट है कि फिल्म रामकथा पर आधारित है। 1917 में बनी इस फिल्म को पूरे देश में दर्शकों का खूब प्यार मिला था। कहा जाता है कि ये फिल्म मद्रास (अब चेन्नई) में इतनी हिट रही थी कि इसकी कमाई के सिक्कों को बोरियों में भरकर बैलगाड़ी पर लादकर ले जाया जीता था। फिल्मों को लेकर ये दीवानगी मूक फिल्मों के दौर में चल ही रही थी लेकिन उस दौर में फिल्मों को देखने के लिए घंटों पहले से सिनेमा हाल के बाहर जमा होने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। 14 मार्च 1931 को जब पहली बोलती फिल्म आलम आरा बांबे (अब मुंबई) के मैजेस्टिक सिनेमा हाल में रिलीज होने की खबर आम हुई तो लोग सूरज उगने के पहले अंधेरे में ही सिनेमा हाल के बाहर जमा होने लगे थे। मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक बालीवुड में इसका विस्तार से उल्लेख किया है। इस फिल्म के निर्देशक अर्देशिर इरानी के बिजनेस पार्टनर के हवाले से लिखा गया है कि मैजेस्टिक सिनेमा के बाहर सुबह से ही इतनी भीड़ जमा हो गई कि हाल के कर्माचरियों को अंदर जाने में परेशानी हो रही थी। किसी तरह से वो अंदर जा पाए उस समय पंक्तिबद्ध होकर किसी काम को करने की अवधारणा नहीं थी इस कारण अफरातफरी मची थी। लोगों की भीड़ धीरे धीरे जब अराजक होने लगी तो सिनेमाघर के प्रबंधकों को पुलिस बुलानी पड़ी थी । तब जाकर फिल्म का प्रदर्शन हो सका था। कहा जाता है कि उस समय फिल्म के टिकट की कीमत चार आना थी जो ब्लैक में चार से पांच रुपए में बिकी थी। एक रुपए में चार आना होता था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आलम आरा को लेकर कितनी दीवानगी थी। 

ये दीवानगी फिल्म को लेकर तो थी ही, दीवानगी का एक कारण अपनी भाषा में नायक और नायिका को बोलते सुनने का रोमांचकारी अनुभव भी था। आलम आरा पहली बोलती फिल्म तो थी ही लेकिन इसने हिंदी फिल्मों की दिशा बदल दी। इस फिल्म में तीस गाने थे। आलम आरा के बाद बनने वाली फिल्मों को अगर देखें तो सबमें खूब गाने होते थे। फिल्मकारों को लगता था कि जितना संगीत होगा फिल्म उतनी लोकप्रिय होगी। आलम आरा के बाद बनने वाली फिल्मों में 10 से 15 गाने तो होते ही थे। फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि आलम आरा के पहले जब मूक फिल्मों का दौर था तब भारत में बनने वाली फिल्मों का ट्रीटमेंट वैसा ही होता था जैसे कि पूरी दुनिया में उस जानर की फिल्मों का होता था। जैसे ही बोलती फिल्मों का चलन आरंभ हुआ तो भारतीय फिल्में कथावाचन की अपने पारंपरिक शैली को अपनाने लगी। रंगमंच को लेकर जो अवधारणा थी वो पर्दे पर साकार होने लगी थी। इस लिहाज से देखा जाए तो आलम आरा को सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाना चाहिए कि उसने भारतीय फिल्मों के पात्रों को वाणी दी। इस फिल्म ने निर्माण की शैली को भी प्रभावित किया। गानों को फिल्म का अभिन्न अंग बनाने का आरंभ यहीं से होता है। गानों की परंपरा भारतीय रंगमंच में पहले से मौजूद थी। इस तरह से अगर हम विचार करें तो आलम आरा ने हिंदी फिल्मों को भारतीय कला के करीब लाने का कार्य भी किया। 1938 में प्रकाशित इंडियन सिनेमैटोग्राफ ईयरबुक में इस प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया था। उसमें कहा गया था कि बोलती फिल्मों में गीत और संगीत के माध्यम से भारतीय चलचित्र जगत ने अपनी रचनात्मकता साबित की थी।  जो लोग तकनीक को कला का दुश्मन मानते हैं उनको यह सोचना चाहिए कि बहुधा तकनीक रचनात्मकता को बढ़ावा देती है । आज आर्टिफिशियल इंटेलिंजेंस (एआई) को लेकर भी फिल्म जगत से जुड़े कई लोग सशंकित हैं लेकिन जिस तरह से एआई ने किसी भाषा में बनी फिल्म को अन्य भाषाओं में जब करने की सहूलियत दी है वो भी रेखांकित की जानी चाहिए।    


Saturday, October 15, 2022

कला को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश


महाराष्ट्र के एक नेता हैं, नाम है शरद पवार। पहले कांग्रेस में थे। कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। पराजित हुए थे। सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से अलग हो गए थे। अपनी पार्टी बनाई। फिर कांग्रेस के साथ हो लिए। महाराष्ट्र में दोनों पार्टियों ने मिलकर शासन किया। शिवसेना का विरोध करते रहे लेकिन शिवसेना के साथ भी सत्ता में साझेदारी की। शरद पवार की चर्चा का कारण है उनका हाल में दिया गया एक बयान। अपने इस बयान में शरद पवार ने कहा कि अगर हम कला, कविता और लेखन के बारे में बात करें तो अल्पसंख्यकों में इन क्षेत्रों में योगदान देने की अपार क्षमता है। उन्होंने ये कहने के बाद प्रश्न उठाया कि बालीवुड में सबसे अधिक योगदान किसका है। फिर उसका उत्तर दिया कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने सबसे अधिक योगदान किया, हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। शरद पवार का ये बयान बेहद गंभीर और समाज को बांटनेवाला है। अबतक इस देश में कला और साहित्य को धर्म के आधार पर बांटने का प्रयास नहीं हुआ है लेकिन शरद पवार के इस बयान में ये दिखता है। 

शरद पवार दावा कर रहे हैं कि बालीवुड मे सबसे अधिक योगदान मुस्लिम अल्पसंख्यकों का है। देश का इतना बड़ा नेता जब इस तरह का बयान देते हैं तो उसके परिणाम की कल्पना की जा सकती है। इसलिए शरद पवार को ये बताना आवश्यक है कि बालीवुड में मुस्लिमों के सबसे अधिक योगदान का उनका जो दावा है वो न केवल प्रतिभा बल्कि आंकड़ों के हिसाब से भी हवाई है। ऐसा कहकर वो महाराष्ट्र के उन फिल्मकारों का भी अपमान कर रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन होम करके फिल्म विधा को भारत में स्थापित और समृद्ध किया। शरद पवार शायद ये भूल गए कि दादा साहब फाल्के भी महाराष्ट्र के ही थे। उन्होंने जब फिल्म बनाया तो अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखे और फिल्म बनाने के दौरान उनकी आंखों पर बहुत बुरा असर पड़ा था। दादा साहेब फाल्के के बाद महाराष्ट्र के ही बाबूराव पेंटर ने सैरंध्री नामक फिल्म बनाई जिसको उस समय खूब सराहना मिली थी। भीम और कीचक की भूमिका में बाबूराव ने दो पेशेवर पहलवान, सरदार बाला साहब यादव और झुंझार राव पवार को लिया था। बाबू राव पेंटर को भारतीय फिल्मों की पहली मौलिक प्रतिभा के तौर पर फिल्म इतिहासकार देखते हैं। इस तथ्य को भी रेखांकित किया जाता रहा है कि बाबूराव पेंटर के साथ रहकर ही शांताराम, विनायक राव, भालजी पेंढरकर और विष्णुपंत गोविंद दामले ने फिल्म कला की बारीकियां सीखी थीं। शरद पवार की टिप्पणी कि बालीवुड में मुस्लिमों का सबसे अधिक योगदान है को अगर इन महानुभावों के योगदान के सामने रखकर देखेंगे तो शरद पवार की अज्ञानता साफ तौर पर नजर आती है। भारतीय फिल्मों के परिदृष्य पर नजर डालते हैं को वहां भी देवकी बोस, नितिन बोस प्रथमेश बरुआ, फणी मजूमदार, रायचंद्र बोराल, दुर्गा खोटे, देविका रानी, हिमांशु राय जैसे अनगिनत नाम हमारी स्मृतियों में आते हैं। हिमांशु राय ने भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्वरूप प्रदान किया। अब अगर उस दौर से आगे बढ़ते हैं और स्वाधीनता के बाद के दौर के हिंदी फिल्मों को देखते हैं तो भी मुस्लिमों का सबसे अधिक योगदान नजर नहीं आता है। हिमांशु राय की फिल्म कर्मा लंदन और बर्मिंघम के सिनेमाघरों में 1933 में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म का निर्माण भारत, ब्रिटेन और जर्मनी के निर्माताओं ने संयुक्त रूप से किया था। इसमें हिमांशु राय और देविका रानी थी। इस फिल्म के बारे में लंदन के समाचारपत्रों में कई प्रशंसात्मक लेख छपे थे। लेकिन शरद पवार अपनी टिप्पणी करते समय इन सबके योगदान को क्यों नहीं देख पाते हैं।

स्वाधीनता के बाद के दौर को भी देखें तो फिल्मों में मुसलमानों का योदगान सबसे अधिक नहीं दिखाई देता है। अशोक कुमार, राज कपूर, देवानंद, गुरु दत्त जैसे लोगों को शरद पवार बहुत आसानी से भूल जाते हैं। गुरु दत्त ने भारतीय सिनेमा को जो ऊंचाई प्रदान की उसको फिल्म के बारे में जानने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं भुला सकता है। प्यासा, कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम जैसी फिल्में बनानेवाले गुरु दत्त के बारे में कहा जाता है कि वो रूपहले पर्द पर पात्रों के माध्यम से कविता करते थे। बालीवुड में योगदान कि जब बात आती है तो क्या लता मंगेशकर को भुलाया जा सकता है या उनके किसी भी गायक की तुलना की जा सकती है। मराठा शरद पवार को लता मंगेशकर भी याद नहीं आई और उन्होंने एक बचकाना बयान दे दिया। याद तो शरद पवार को अमिताभ बच्चन भी नहीं आए जिनको सदी का महानायक कहा जाता है। जो पिछले पचास से अधिक वर्षों से फिल्मी दुनिया में न केवल सक्रिय हैं बल्कि फिल्म. टीवी और ओटीटी(ओवर द टाप) पर भी उनकी लोकप्रियता बरकरार है। जितेन्द्र से लेकर धर्मेन्द्र तक और अनिल कपूर से लेकर कार्तिक आर्यन तक की याद भी शरद पवार को नहीं आई। अभिनेत्रियों की भी लंबी सूची है जिसके बारे में बोलने के पहले शरद पवार ने विचार नहीं किया। 

अब जरा आंकड़ों पर गौर कर लेते हैं। 1967 से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिए जाने लगे इसके पहले इसको स्टेट अवार्ड फार फिल्म्स कहते थे। 1969 से भारतीय फिल्मों में विशिष्ट योगदान के लिए दादा साहब फाल्के सम्मान का आरंभ हुआ। 1969 में पहला दादा साहब फाल्के अवार्ड अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया। तब से लेकर अबतक 52 कलाकारों को दादा साहब फाल्के अवार्ड दिया जा चुका है इनमें से तीन, संगीतकार नौशाद, अभिनेता दिलीप कुमार और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ही मुस्लिम समुदाय से आते हैं। कला का यह बंटवारा उचित नहीं है लेकिन चूंकि शरद पवार ने यह बात उठाई है तो उनको यह बताना आवश्यक है कि सबसे अधिक योगदान का अर्थ क्या होता है। कम से 52 में से तीन तो नहीं ही होता है। कुछ लोग ये कह सकते हैं कि मदर इंडिया और मुगल ए आजम बनाकर महबूब खान और के आसिफ ने भारतीय सिनेमा का समृद्ध किया। यहां भी एक दिलचस्प तथ्य है। 1957 में मदर इंडिया सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी। उस वर्ष के स्टेट अवार्ड फार फिल्म्स की सूची पर नजर डालते हैं तो उस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड फिल्म दो आंखें बारह हाथ के लिए व्ही शांताराम को मिला था जबकि महबूब खान की मदर इंडिया को सिर्फ प्रशंसा पत्र प्रदान किया गया था। अब जरा राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड की सूची पर भी नजर डाल लेते हैं। अबतक राष्ट्रीय फिल्म में 54 बार सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता को पुरस्कृत किया गया है। कई बार संयुक्त रूप से भी दिया गया है। इन 54 में से सिर्फ तीन मुस्लिम अभिनेताओं नसीरुद्दीन शाह, सैफ अली खान और इरफान खान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। बाकी 51 अभिनेता किस समुदाय से आते हैं  कहने की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह से अबतक सिर्फ चार मुस्लिम अभिनेत्रियों नर्गिस, रेहाना, वहीदा रहमान और शबाना आजमी को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया गया है। 

शरद पवार तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे और उनके मुख्यमंत्रित्व काल में सिर्फ एक मुस्लिम कलाकार दिलीप कुमार को दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया। तब शरद पवार ने तो कोई प्रश्न नहीं खड़ा किया। वो 2004 से 2014 तक केंद्र में मंत्री रहे। इस दौरान किसी भी मुस्लिम का दादा साहब फाल्के अवार्ड नहीं मिला। तब भी उन्होंने इस बात पर सार्वजनिक चिंता नहीं की। शरद पवार जैसे नेता जब कला और कलाकार के बारे में बोलते हैं तो उनको बहुत सोचविचार कर बोलना चाहिए। कला को हिंदू मुसलमान में बांटने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 


Monday, February 15, 2021

राजा हरिश्चंद्र नहीं कृष्ण थे पहली पसंद


महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्रयंबकेश्वर के एक पुजारी परिवार में 30 अप्रैल 1870 को एक लड़के का जन्म हुआ। उसके पिता अपने बेटे को संस्कृत पढ़ाकर पंडित बनाना चाहते थे। इस बालक का नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के था। जब उसके पिता की मुंबई (तब बांबे) में नौकरी लगी तो वो अपने पिता के साथ नासिक से वहां आ गया। सरकारी नौकरी मिल गई। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव में नौकरी छोड़ दी और फोटोग्राफी करने लगा। उसकी रुचि को देखकर कुछ मित्रों ने उसको फोटोग्राफी सीखने के लिए जर्मनी भेज दिया। वहां से 1909 में वापस लौटा तो बीमारी की वजह से भले ही आंखों की रोशनी चली गई लेकिन सपने आकार लेने लगे थे। सालभर के इलाज के बाद जब आंखों की रोशनी लौटी तो वो एक फिल्म देखने गए जिसका नाम था ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ । इस फिल्म को देख तो रहे थे लेकिन उनके दिमाग में राम और कृष्ण की कथा चल रही थी। अगले दिन वो अपनी पत्नी के साथ इसी फिल्म को देखने पहुंचे। पत्नी ने उनको कृष्ण के चरित्र पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया। पत्नी ने अपने गहने गिरवी रखे और उससे मिले पैसे को लेकर फाल्के लंदन गए। वहां से सिनेमैटोग्राफी सीखकर वापस लौटे। 

अब अपने सपने को साकार करने का समय था। पहले कृष्ण और फिर राम पर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन संसाधन के अभाव में इसको छोड़ कर राजा हरिश्चंद्र की कहानी पर काम शुरू कर दिया। महिला कलाकार मिलने में मुश्किल हो रही थी। विज्ञापन के बावजूद कोई महिला अभिनय के लिए तैयार नहीं हो रही थी। निराशा बढ़ती जा रही थी। पास की दुकान में चाय पीने गए। वहां चायवाले लड़के, सालुंके, पर उनकी नजर पड़ी को आंखें चमक उठी। उस लड़के को तारामती के रोल के लिए तैयार कर लिया। इस तरह भारतीय फिल्म में एक पुरुष ने पहली अभिनेत्री का रोल किया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म बन गई। 3 मई 1913 को बांबे के कोरोनेशन हॉल में उसका प्रदर्शन हुआ। फिल्म लगातार बारह दिन चली। 1914 में लंदन में प्रदर्शित हुई। इनकी दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में नाटकों में काम करनेवाली कमलाबाई गोखले ने अभिनय किया। कमला बाई को फिल्म में अभिनय के लिए उस वक्त फाल्के साहब ने आठ तोला सोना, दो हजार रुपए और चार साड़ियां दी थीं। इसके बाद इन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ बनाई। कहते हैं कि इस फिल्म ने इतनी कमाई की कि टिकटों की बिक्री से जमा होनेवाले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था। सफलता के बाद इनको फाइनेंसर मिल गया और उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। लेकिन पार्टनर ने निभी नहीं तो सब कामकाज छोड़कर बनारस जाकर नाट्य लेखन में जुट गए। फिर नासिक लौटे और ‘सेतुबंध’ नाम की फिल्म बनाई। इस बात का उल्लेख मिलता है कि फाल्के साहब ने अपने जीवन काल में करीब नौ सौ लघु फिल्में और बीस फीचर फिल्में बनाईं। 16 फरवरी 1944 को नासिक में भारतीय फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के का देहावसान हो गया। 

Tuesday, September 24, 2019

पीढ़ियों को अभिनय से प्रभावित किया


अमिताभ की अदाकारी ने भारतीय फिल्म जगत को गहरे तक प्रभावित किया। पहले तो कहानीकारों ने उनकी फिल्मी छवि को ध्यान में रखकर कहानियां लिखीं। उनके बोलने के अंदाज को ध्यान में रखकर डॉयलॉग लिखे गए। वर्ष 1980 तक आते आते अमिताभ बच्चन की छाप हिंदी सिनेमा पर इतनी गहरी हो गई कि उनके उनके बाद की पीढ़ी के अभिनेताओं ने उनकी अदाकारी के प्रमुख आयाम- एंग्री यंगमैन, को अपने अभिनय का अभिन्न अंग बना लिया। संभव है कि ये निर्देशकों की या कहानी लिखने वालों की सोच रही हो लेकिन एक पूरी पीढ़ी पर अमिताभ के अंदाज, फिल्मों में उनके प्रदर्शन, उनकी फिल्मी छवि का असर दिखा और हिंदी फिल्मों ने उसको शिद्दत से अपनाया। किसी भी फिल्म अभिनेता के लिए यह बहुत बड़ी बात है। अमिताभ बच्चने के बाद के दौर के अभिनेताओं ने अपनी अलग छवि बनाने की जरूर कोशिश की लेकिन उसमें अमिताभ की झलक लगातार दिखती रही।
मिथुन चक्रवर्ती भले ही डिस्को डांसर के तौर पर लोकप्रिय हुए लेकिन अपनी ज्यादातर फिल्मों में वो डांसर के साथ-साथ एंग्री यंगमैन भी होते थे। डांसर के साथ-साथ गुस्सा और मार-धाड़ अवश्य होता था। मिथुन के बाद अगर हम अनिल कपूर की अदाकारी को देखे तो उसमें भी एंग्री यंगमैन की छवि साफ तौर पर दिखती है। फिल्म मशाल में अनिल कपूर के अभिनय के कई भाव को अमिताभ की अभिनय की छाप और छाया के तौर पर लक्षित किया जा सकता है। हलांकि बाद की फिल्मों में अनिल कपूर ने एंग्री यंगमैन की छवि के साथ एक खिलंदड़ापन जोड़ा लेकिन उसमें भी अमिताभ के अभिनय के कई शेडस दिखते हैं। अगर आप याद करें फिल्म शोले में अमिताभ का किरदार, जब वो तांगे पर पीछे बैठे होते हैं और धर्मेन्द्र आगे हेमा मालिनी के साथ । तांगे पर जिस तरह का संवाद होता है वैसा ही संवाद फिल्म रामलखन में अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के बीच देखा जा सकता है। सिर्फ ये दो ही नहीं बल्कि संजय दत्त की फिल्मी छवि भी प्रयत्नपूर्वक एंग्री यंगमैन की बनाई गई। उस छवि को अलग दिखाऩे के लिए उसको थोड़ा संवेदनशील दिखाया गया। जैकी श्राफ ने तो पूरी तरह से एंग्री यंगमैन की छवि को अपनाया और सफल भी रहे। अमिताभ के चलने तक का स्टाइल आप जैकी की चाल में देख सकते हैं। इस छाप को अब के नायकों पर भी देख सकते हैं। अमिताभ ने अपने अभिनय में जितने प्रयोग किए उतना कम ही अभिनेताओं ने किया ज्यादातर तो अपनी सफल फिल्मी छवि की गिरफ्त में ही जकड़ कर रह गए।