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Saturday, January 24, 2026

साख और विश्वास पर जोखिम भरे निर्णय


भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष ने कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत पार्टी के दिग्गज नेताओं की उपस्थिति में 45 वर्ष के नितिन नवीन ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाल लिया। कहीं से किसी प्रकार का विरोध या विद्रोह के स्वर सुनाई नहीं दिए। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन को उनकी कुर्सी पर बिठा रहे थे तो अचानक मेरे ध्यान में 2013 में गोवा में भारतीय जनता पार्टी कार्यकारिणी की बैठक का स्मरण हो आया। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाना चाहती थी तो कितना बवाल हुआ था। पार्टी के कई नेता पीढ़ीगत बदलाव चाहते थे। पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी की जगह नेतृत्व की कमान नरेन्द्र मोदी को देने की चर्चा थी। पार्टी के एक धड़े ने तय कर लिया था कि मोदी को कमान सौंपनी है लेकिन आडवाणी और उनके खेमे को ये मंजूर नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मोदी के नाम पर सहमति थी। गोवा में दो दिनों तक हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। आडवाणी जी की उम्र उस समय 85 वर्ष थी और नरेन्द्र मोदी 63 वर्ष के थे। पार्टी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार हो रही थी पर आडवाणी और उनके समर्थक तैयार नहीं हो पा रहे थे। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में पहले दिन आडवाणी नहीं आए। दूसरे तक उनके आने की चर्चा होती रही लेकिन आखिरकार वो नहीं आए। उनके समर्थक और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वो नरेन्द्र मोदी के कारण नहीं आ रहे हैं। उन्होंने तब कहा भी था कि उनको नमोनिया नहीं हुआ है इस कारण वो गोवा नहीं जा रहे हैं। जसवंत सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता भी किसी बहाने से गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए थे। 

नरेन्द्र मोदी के बढ़ते समर्थन को देखकर लालकृष्ण आडवाणी गोवा नहीं गए थे। कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन तक ये चर्चा चलती रही थी कि दिल्ली विमानतल पर विशेष विमान खड़ा है जो आडवाणी को लकर गोवा आएगा। आडवाणी नहीं आए और उनकी अनुपस्थिति में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। आडवाणी जी की नाराजगी बनी रही। घोषणा के अगले ही दिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देने की बात की। अपने पत्र में लालकृष्ण आडवाणी ने ये भी लिखा था कि पार्टी अपनी विचारधारा से हटती नजर आ रही है। इसके अधिकतर नेता अपना व्यक्तिगत एजेंडा चला रहे हैं। उस समय मीडिया के एक खास वर्ग ने इस विवाद को खूब हवा दी थी। गोवा प्रसंग की चर्चा सिर्फ इस कारण से ताकि पार्टी में नेतृत्व का कंट्रास्ट दिखाया जा सके। एक तरफ आडवाणी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार नहीं थे और उसको रोकने के तमाम प्रयास कर रहे थे। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही 49 वर्ष के अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने। अब 45 वर्ष के नितिन नवीन पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए हैं। भारतीय राजनीति में हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि मजबूत नेता किसी अन्य नेता को पनपने नहीं देता है। मजबूत नेता चाहता है कि  उसके बाद नेतृत्व शून्यता की स्थिति बने। इस संबंध में इंदिरा गांधी का उदाहरण दिया जाता रहा है कि जब भी कोई कांग्रेसी मजबूत होते दिखता था तो उसके पर कतर दिए जाते थे। ये बात उस तरह के मजबूत नेता पर लागू होती है जिसको अपनी जनप्रियता या साख पर भरोसा नहीं होता है। जिस भी नेता को अपनी काबिलियत पर, जनता के बीच अपनी साख पर भरोसा होगा वो अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयत्न करता है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में जीत का कीर्तिमान बनाया है। नोटबंदी से लेकर कोरोना काल में जिस प्रकार से जनता ने मोदी के निर्णयों का समर्थन किया उसको भी देखा जाना चाहिए। विरोधी दलों के नेताओं का और उनके समर्थक विश्लेषकों का आकलन था कि नोटबंदी के बाद के चुनाव में मोदी को पराजय का सामना करना पड़ेगा। ये भी कहा गया कि पूरी दुनिया में जिस भी नेता ने नोटबंदी लागू की उसको जनता ने अगले चुनाव में नकार दिया। मोदी के मामले में इसके उलट हुआ। मोदी और ताकतवर बनकर उभरे। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां भारतीय पार्टी को 282 सीटें मिली थीं वहीं नोटबंदी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 300 से अधिक सीटें जीकने में कामयाब रही। लोकतंत्र में जिसको जनता पसंद करती है वही सर्वमान्य नेता माना जाता है। 

एक बात और जो नितिन नवीन के चयन से स्पष्ट हुआ है वो ये कि भारतीय जनता पार्टी जात-पात की राजनीति का निषेध करने का प्रयास कर रही है। लंबे समय तक इस देश ने जाति आधारित राजनीति और उसपर ही आधारित चयन का दौर देखा है। किसी नेता को शीर्ष पद पर चुनने या मनोनयन के पहले उसकी जाति या उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि देखी जाती रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा भी कई राज्यों की राजनीतिक नियुक्तियों में जातिगत संतुलन का ध्यान रखा जाता रहा है। नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी से इसकी शुरुआत की है। नितिन नवीन कायस्थ जाति के हैं जिनके वोट उनके गृह प्रदेश में भी बहुत कम हैं। बावजूद इसके उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना देना, जातिगत राजनीति के निषेध की ओर बढ़ाए गए कदम की तरह देखा जा सकता है। सिर्फ नितिन नवीन ही क्यों बिहार में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को बनाया गया है। संजय सरावगी मारवाड़ी/वैश्य हैं और बिहार में मतदाता के लिहाज से मारवाड़ियों की संख्या बहुत नहीं है। बिहार में राजनीतिक नियुक्तियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि अमुक व्यक्ति यादव हैं या राजपूत हैं या कुर्मी हैं तो इनको महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। ताकि उश समुदाय के वोटरों को आकर्षित किया जा सके। ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं बल्कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में देखा जाता रहा है। 

कहना ना होगा कि मोदी युग में जिस तरह की राजनीति हो रही है वो स्वाधीन भारत की पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर है। इस युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीति विज्ञान के पुराने औजार से काम नहीं चलनेवाला है। जो पुराने राजनीतिकक सिद्धांत थे उसके आधार पर आकलन बहुधा गलत परिणाम देने लगे हैं। मोदी युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक विश्लेषकों को अब नए तरीके से सोचना होगा, नए आधार पर आकलन करना होगा। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी अपने निर्णयों से चौंकाते रहे हैं और कई बार जोखिम भरे निर्णय भी लेते हैं, इससे ये प्रतीत होता है कि उनको अपने मतदाताओं पर भरोसा है और मतदाताओं को भी उनपर विश्वास है कि उनके निर्णय देश और जनहित में ही होंगे।      


Saturday, August 30, 2025

ध्वस्त होता झूठा नैरेटिव

समाचार चैनलों पर चलवनेवाली डिबेट में कई लोग डंके की चोट पर ये पूछते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वाधीनता आंदोलन से क्या संबंध था। फिर स्वयं ही निर्णयात्मक उत्तर देते हैं कि संघ का स्वाधीनता आंदोलन में ना तो कोई योगदान था ना ही संबंध। ये नैरेटिव वर्षों से चलाया जा रहा है। हर कालखंड में कई लोग इसको गाढ़ा करने के उपक्रम में जुटे रहते हैं। अब भी हैं। लेख आदि में भी इस बात का उल्लेख प्रमुखता से किया जाता है कि संघ का देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान रहा ही नहीं है। ऐसा करके वो जनमानस में भ्रामक अवधारणा का रोपण करते चलते हैं। जब तटस्थ विश्लेषक तथ्य रखने लगते हैं तो उनको दबाने का प्रयास किया जाता है। अर्धसत्य को सामने रखकर उनको चुप कराने का प्रयास किया जाता है। कहा भी गया है कि अगर एक झूठ को बार-बार कहेंगे तो उसको सच नहीं तो सच के करीब तो मान ही लिया जाएगा। तब ऐसा और भी संभव हो जाता है जब कहे हुए को पुस्तकों के माध्यम से पुष्ट किया जाता रहा हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वाधीनता आंदोलन के संबंध में ऐसा ही होता आ रहा है। ऐसा कहनेवाले कुछ तथ्यों को दबा देते हैं। वो ये नहीं बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी और देश 1947 में आजाद हो गया। उस समय संघ की ताकत कितनी रही होगी, एक संगठन के तौर पर संघ का कितना विस्तार रहा होगा, संघ से कितने कार्यकर्ता जुड़े होंगे, इसको बगैर बताए निर्णय हो जाता है। जैसे-जैसे संघ का विस्तार होता गया ये नैरेटिव जोर-शोर से चलाया जाने लगा। संघ शताब्दी वर्ष में इस विमर्श को और गाढ़ा करने का उपक्रम हो रहा है बल्कि कह सकते हैं कि संगठित होकर किया जा रहा है।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा मोहन भागवत को दो अवसरों पर सुना। एक पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम था। दूसरा संघ शताब्दी वर्ष पर दिल्ली में तीन दिनों का व्याख्यानमाला। सरसंघचालक ने पहले कार्यक्रम में बताया कि अंग्रेज अफसर नागपुर और उसके आसपास चलनेवाली शाखाओं की ना सिर्फ निगरानी करते थे बल्कि हर शाखा से संबंधित जानकारी को जमा कर उसका विश्लेषण भी करते थे। वो आशंकित रहते थे कि अगर शाखाओं का विस्तार हो गया तो अंग्रेजों के लिए दिक्कत खड़ी हो सकती है। व्याख्यानमाला में डा भागवत ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक डा हेडगेवार स्वाधीनता आंदोलन में बाल्यकाल से सक्रिय थे। नागपुर के स्कूलों में 1905-06 में वंदेमातरम आंदोलन हुआ था। इसमें शामिल छात्र हेडगेवार ने अंग्रेजों से माफी मांगने से इंकार कर दिया था। उनको स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था। बाद में हेडगेवार डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता (अब कोलकाता) गए। पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन हजार रु मासिक वेतन वाली नौकरी को ठुकराकर डा हेडगेवार ने देशसेवा की ठानी। वो अनुशीलन समिति में भी शामिल हुए थे। 1920 में उनपर देशद्रोह का मुकदमा चला। कोर्ट में अपने बचाव में उन्होंने स्वयं दलील पेश की थी। उद्देश्य था कि पत्रकार आदि केस सुनने आएंगे तो उनके विचार जनता तक पहुंच पाएंगे। न्यायालय का जब निर्णय आया तो जज ने लिखा, जिन भाषणों के कारण इन पर यह आरोप लगा है, इनका बचाव का भाषण उन भाषणों से अधिक ‘सेडिशियस’ है। उनको एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। जेल से बाहर निकलने के बाद डा हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। 1930 में जंगल सत्याग्रह आरंभ हुआ तो उन्होने सरसंघचालक का दायित्व छोड़ दिया। आंदोलन में शामिल हुए। उनको फिर से एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। सजा काटकर वापस आने पर सरसंघचालक का कार्यभार संभाला। इस दौरान वो सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के संपर्क में भी आए। राजगुरु को तो उन्होंने महाराष्ट्र में अंडरग्राउंड रखने में मदद की।  नागपुर में भी रखा। बाद में उनको अकोला भेजने की भी व्यवस्था की। इलके अलावा भी संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की एक लंबी सूची है जो स्वाधीनता आंदोलन में जेल गए थे। पर विचारधारा विशेष के लोगों ने इन तथ्यों को आम जनता से दूर रखा। भ्रामक बातें करते रहे।  

नैरेटिव के खेल को इस तरह से समझा जा सकता है। कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता आंदोलन का विरोध किया, अंग्रेजों का साथ दिया, सुभाष बाबू को जापान और जर्मनी के हाथों की कठपुतली बताते हुए धोखेबाज तक कहा। इसकी चर्चा नहीं होती है। बल्कि इस तथ्य को दबा दिया जाता है। इस खेल में ट्विस्ट तब आया जब हिटलर ने सोवियत रूस पर आक्रमण कर दिया। कम्युनिस्ट पहले जिस युद्ध को साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध कहते थे उसको ही हिटलर के रूस पर हमले के बाद जनयुद्ध कहने लगे। इसके बाद वो अंग्रेजों के साथ हो गए और उनके हाथ मजबूत करने लगे। जब गांधी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया तो कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन को दबाने में अंग्रेजों का साथ दिया। फिल्म इतिहासकार मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि सुभाष बाबू के विश्वस्त कम्युनिस्ट साथी भगत राम तलवार ने अंग्रेजों के लिए जासूसी की थी। विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग की तरह पाकिस्तान बनाने का समर्थन किया था। 1946 में तेलांगना में सशस्त्र विद्रोह आरंभ किया। पहले ये निजाम के खिलाफ था लेकिन स्वाधीनता के बाद ये भारत सरकार के खिलाफ हो गया क्योंकि वो स्वाधीनता के बाद बनी सरकार को राष्ट्रीय धोखा कहते थे। वो तो भला हो स्टालिन का कि 1950 में उन्होंने भारत के कम्युनिस्ट नेताओं को मास्को बुलाकर बात की। उस बातचीत के बाद भारत के कम्युनिस्टों ने सशस्त्र विद्रोह खत्म किया। देश के विरुद्ध सशस्त्र आंदोलन के बावजूद भी नेहरू ने कम्युनिस्टों पर पाबंदी नहीं लगाई। स्टालिन के साथ मीटिंग के बाद कम्युनिस्टों ने 1952 के पहले आमचुनाव में हिस्सा भी लिया था। दरअसल कम्युनिस्टों की आस्था राष्ट्र से अधिक विचार और विचारधारा में रही है। उनके लिए विचारधारा सर्वप्रथम है जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए राष्ट्र सर्वप्रथम है। यही बुनियादी अंतर है।

कालांतर में कम्युनिस्टों और कांग्रेस के बीच एक अंडरस्टैंडिंग बनी। जब स्वाधीन भारत में स्वाधीनता का इतिहास लेखन आरंभ हुआ तो उपरोक्त तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया। स्कूल में पढ़ाई जानेवाली पुस्तकों में भी इन बातों को छोड़ दिया गया। परिणाम ये हुआ कि कम्युनिस्टों पर स्वाधीनता आंदोलन में उनकी भागीदारी को लेकर प्रश्न नहीं उठे। एक ऐसा नैरेटिव खड़ा किया जिसमें संघ तो निशाने पर रहा लेकिन कम्युनिस्टों के कारगुजारियों पर चर्चा नहीं हुई। 1925 में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी और 1925 में ही कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ था। दोनों संगठनों की स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। एक विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनकर निरंतर मजबूत हो रहा है और कम्युनिस्ट पार्टी अपने अतित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कहा जा सकता है कि भारत का जनमानस जैसे जैसे परिपक्व हो रहा है वैसे वैसे जनता राष्ट्रहित सोचनेवालों के साथ होती जा रही है।

Saturday, August 16, 2025

सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न संबोधन


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया उसमें देशवासियों की भावनाओं का प्रकटीकरण और उनका अपना सोच था। अपनी समृद्ध संस्कृति और वौचारिकी का समावेश तो था ही। हम उन विचारों पर नजर डालेंगे लेकिन पहले प्रधानमंत्री के संबोधन के कुछ अंश देखते हैं। अपने भाषण का आरंभ प्रधानमंत्री ने संविधान निर्माताओं के स्मरण से किया। इसके बाद उन्होंने डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद किया।  

अंश- हम आज डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती भी मना रहे हैं। डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत के संविधान के लिए बलिदान देनेवाले देश के पहले महापुरुष थे। संविधान के लिए बलिदान। अनुच्छेद 370 की दीवार को गिराकर एक देश एक संविधान के मंत्र को जब हमने साकार किया तो हमने डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी।

अंश- आज मैं बहुत गर्व के साथ एक बात का जिक्र करना चाहता हूं। आज से 100 साल पहले एक संगठन का जन्म हुआ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। सौ साल की राष्ट्र की सेवा एक ही बहुत ही गौरवपूर्ण स्वर्णिम पृष्ठ है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के इस संकल्प को लेकर के सौ साल तक मां भारती के कल्याण का लक्ष्य लेकर लाखों स्वंसेवकों ने मातृभूमि के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया । सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन जिसकी पहचान रही है, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है एक प्रकार से। सौ साल का उसका समर्पण का इतिहास है। आज लालकिले की प्राचीर से सौ साल की इस राष्ट्रसेवा की यात्रा में योगदान करनेवाले सभी स्वयंसेवकों का आदरपूर्वक स्मरण करता हूं। देश गर्व करता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस सौ साल की भव्य समर्पित यात्रा को जो हमें प्रेरणा देता रहेगा।

अंश- जब युद्ध के मैदान में तकनीक का विस्तार हो रहा है, तकनीक हावी हो रही है, तब राष्ट्र की रक्षा के लिए, देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए हमने जो महारथ पाई है उसको और विस्तार करने की जरूरत है।... मैंने एक संकल्प लिया है, उसके लिए आपका आशीर्वाद चाहिए। समृद्धि कितनी भी हो अगर सुरक्षा के प्रति उदासीनता बरतते हैं तो समृद्धि भी किसी काम की नहीं रहती। मैं लाल किले की प्राचीर से कह रहा हूं कि आनेवाले 10 साल में 2035 तक राष्ट्र के सभी महत्वपूर्ण स्थलों, जिनमें सामरिक के साथ साथ सिविलियन क्षेत्र भी शामिल है, अस्पताल हो, रेलवे हो,आस्था के केंद्र हो, को तकनीक के नए प्लेटफार्म द्वारा पूरी तरह सुरक्षा का कवच दिया जाएगा। इस सुरक्षा कवच का लगातार विस्तार होता जाए, देश का हर नागरिक सुरक्षित महसूस करे। किसी भी तरह का टेक्नोलाजी हम पर वार करने आ जाए हमारी तकनीक उससे बेहतर सिद्ध हो। इसलिए आनेवाले दस साल 2035 तक मैं राष्ट्रीय सुरक्षा कवच का विस्तार करना चाहता हूं।... भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरणा पाकर हमने श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की राह को चुना है। आपमें से बहुत लोगों को याद होगा कि जब महाभारत की लड़ाई चल रही थी तो श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से सूर्य के प्रकाश को रोक दिया था। दिन में ही अंधेरा कर दिया था। सूर्य प्रकाश को जब रोक दिया था तब अर्जुन ने जयद्रथ का वध की प्रतिज्ञा पूरी की थी। ये सुदर्शन चक्र की रणनीति का परिणाम था। अब देश सुदर्शन चक्र मिशन लांच करेगा। ये सुदर्शन चक्र मिशन मिशन दुश्मनों के हमले को न्यीट्रलाइज तो करेगा ही पर कई गुणा अधिक शक्ति से दुश्मन को हिट भी करेगा। 

अगर हम उपरोक्त तीन अंशों को देखें तो प्रधानमंत्री के भाषण में वैचारिकी का एक साझा सूत्र दिखाई देता है। जिस विचार को लेकर वो चल रहे हैं या जिस विचार में वो दीक्षित हुए हैं उसपर ही कायम हैं। सबसे पहले उन्होंने अपने संगठन के वैचारिक योद्धा डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान को याद किया। उनके कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण एकीकरण के स्वप्न को पूरा करने की बात की। प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से देश का बताया कि किस तरह से श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संविधान को भारत भूमि पर पूरी तरह से लागू करवाने में सर्वोच्च बलिदान दिया। इसके बाद वो अन्य बातों पर गए लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चर्चा करके एक बार फिर से उन्होंने अपनी वैचारिकी को देश के सामने रखा। पूरी दुनिया को पता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक रहे हैं। संघ के वैचारिक पथ पर चलते हुए ही वो राजनीति में आए और राष्ट्र सर्वप्रथम के सिद्धांत को अपनाया। यह अनायस नहीं था कि लाल किले पर जो सज्जा की गई थी उसमें एक फ्लावर वाल पर लिखा था – राष्ट्र प्रथम। पिछले दिनों संघ और प्रधानमंत्री के संबंधों को लेकर दिल्ली में खूब चर्चा रही। लोग तरह तरह के कयास लगाने में जुटे हुए हैं कि संघ और प्रधानमंत्री मोदी के रिश्ते समान्य नहीं हैं। ऐसा करनेवाले ना तो संघ को जानते हैं और ना ही संघ के स्वयंसेवकों को। राष्ट्रीय स्वययंसेवक संघ और उनसे जुड़े व्यक्ति का आकलन उस प्रविधि से नहीं किया जा सकता है जिससे कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दलों के नेता और उनके कार्यकर्ताओं के संबंधों का आकलन किया जाता रहा है। 

तीसरे अंश में प्रधानमंत्री ने सुरक्षा को लेकर जिस तरह से महाभारत, श्रीकृष्ण और उनके सुदर्शन चक्र को देश के सामने रखा उससे एक बार फिर सिद्ध होता है कि प्रधानमंत्री की भारत की समृद्ध संस्कृति में कितना गहरा विश्वास है। पहलगाम के आतंकियों को मार गिराने के लिए सुरक्षा बलों ने आपरेशन महादेव चलाया था। इस नाम को लेकर भी विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। उसको भी धर्म से जोड़कर देखा गया था। एक बार फिर प्रधानमंत्री ने पूरे देश को बताया कि सुरक्षा कवच देने के मिशन का नाम भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के नाम पर होगा। भारतीय संस्कृति से जुड़े इस नाम को लेकर विपक्षी दलों की क्या प्रतिक्रिया होगी ये देखना होगा।सुरक्षा कवच में आस्था के केंद्रों को शामिल करके प्रधानमंत्री ने भारतीयों के मन को छूने का प्रयास किया है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने घुसपैठियों और डेमोग्राफी बदलने की समस्या पर जो बातें रखी उससे ये संकेत निकलता है कि ये सिर्फ अवैध तरीके से देश में घुसने का मसला नहीं है बल्कि ये सांस्कृतिक हमला है। डेमोग्राफी बदलने से भारतीय संस्कृति प्रभावित हो रही है। जिसपर देशवासियों को विचार करना चाहिए। इस सांस्कृतिक हमले या संकट को सिर्फ भारत ही नहीं झेल रहा है बल्कि फ्रांस, इंगलैंड, जर्मनी जैसे कई देश डेमोग्राफी के बदलने से अपनी संस्कृति के बदल जाने का खतरा महसूस कर रहे हैं। इन देशों में भी घुसपैठ की समस्या को लेकर सरकार और वहां के मूल निवासी अपनी चिंता प्रकट करते रहते हैं। प्रकटीकरण का तरीका अलग अलग हो सकता है। हम प्रधानमंत्री के भाषण का विश्लेषण करें तो लगता है कि ये एक ऐसे स्टेट्समैन का भाषण है जो विचार समृद्ध तो है ही अपनी संस्कृति के प्रति समर्पित भी है। 

Saturday, June 15, 2024

अहंकार के छद्म विमर्श से राजनीति


अहंकार। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद इस शब्द पर काफी चर्चा हो रही है लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान एरोगेंट शब्द की चर्चा थी। केंद्र सरकार के मंत्रियों की बात हो या फिर भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की। आसानी से उनके स्वभाव के साथ एरोगेंट शब्द चिपका दिया जाता था। एरोगेंट से अगली कड़ी के रूप में अहंकार आया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को अहंकारी कहा गया। अमेठी में स्मृति इरानी की चुनावी हार को उनके अहंकार से जोड़ा गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब संसद में एक अकेला सब पर भारी बोला था तभी से उनके साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का अभियान विपक्षी दलों और उनके इकोसिस्टम ने चलाया। एक प्रधानमंत्री के तौर पर जब वो अपने विकास कार्यों को गिनाते थे, अपने संबोधन में मैं का प्रयोग करते थे तो इस मैं को भी एरोगेंट के कोष्ठक में डाल दिया जाता था। इकोसिस्टम से जुड़े विश्लेषकों ने मोदी के भाषणों के चुनिंदा अंश को उठाकर उनके व्यक्तित्व के साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल खेला। यह अभियान लंबे समय से चल रहा था। चुनाव के दौरान इसमें तेजी आई। इसी तरह स्मृति इरानी के व्यक्तित्व के साथ भी एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल चला। कभी किसी सरकारी अधिकारी को जनता के पक्ष में काम करने को लेकर उनके संवाद के अंश काटकर तो कभी किसी पत्रकार को उनके उत्तर को एरोगेंट कहा गया। चुनाव में जब अमेठी गया था तो वहां पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या हो गई थी। उस इलाके के प्रभावशाली लोग हत्या के आरोपी को बचाने में लगे थे। स्मृति इरानी को जब पता चला तो वो पीड़ित के पक्ष में खड़ी हो गईं। हत्यारोपी के विरुद्ध कानून सम्मत कार्य करने के लिए पुलिस को कहा। तब उस इलाके के प्रभावशाली लोगों ने कहा कि स्मृति एरोगेंट हो गई है और किसी की नहीं सुनती। इसको इकोसिस्टम ने आगे बढ़ाया।

चुनाव परिणाम में जब भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सबसे बड़े दल और चुनाव पूर्व गठबंधन के तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत मिला और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बन गई। मंत्रिमंडल का गठन हो गया। मंत्रिमंडल गठन के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कार्यकर्ता विकास वर्ग के अपने संबोधन में अपनी बातें रखीं। उसमें भी अहंकार शब्द का प्रयोग किया गया। फिर क्या था इकोसिस्टम को मसाला मिल गया। उसको नरेन्द्र मोदी को नसीहत के तौर पर पेश किया जाने लगा। पृष्ठभूमि बनाई ही जा चुकी थी। सरसंघचालक के बयान से निकलनेवाले संदेश को समझना है तो उसको समग्रता में देखना होगा। पहले बात कर लेते हैं अहंकार की। सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कहा, जो सेवा करता है, जो वास्तविक सेवक है, जिसको वास्तविक सेवक कहा जा सकता है उसको कोई मर्यादा रहती है यानी वो मर्यादा से चलता है। काम सब लोग करते हैं, लेकिन कार्य करते समय मर्यादा का पालन करना। जैसा कि तथागत ने कहा है—कुशलस्य उपसंपदा, यानी अपनी आजीविका पेट भरने का काम सबको लगा ही है, करना ही चाहिए। अपने शरीर को भूखा नहीं रखना है, लेकिन कौशल पूर्वक जीविका कमानी है और कार्य करते समय दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। ये मर्यादा भी उसमें निहित है। ऐसी मर्यादा रखकर हम लोग काम करते हैं। काम करने वाला उस मर्यादा का ध्यान रखता है। वो मर्यादा ही अपना धर्म है, संस्कृति है। जो पूज्य महंत गुरुवर्य महंत रामगिरी जी महाराज जी ने अभी बहुत मार्मिक कथाओं से थोड़े में बताई, उस मर्यादा का पालन करके जो चलता है, कर्म करता है, कर्मों में लिप्त नहीं होता, उसमें अहंकार नहीं आता। वही सेवक कहलाने का अधिकारी रहता है।

उपर्युक्त वक्तव्य में से अगर सिर्फ अंतिम वाक्य को निकालकर उसको नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार के मंत्रियों के क्रियाकलापों और व्यवहार से जोड़ दिया गया। सरसंघचालक ने अपने वक्तव्य के इस हिस्से में सेवा और मर्यादा की बात की। इसके लिए उन्होंने तथागत और महंत रामगिरी जी को उद्धृत किया। इसमें राजनीति की बात तो कहीं है नहीं, समाज सेवा की बात है जो वो संघ शिक्षा वर्ग के प्रतिभागियों को समझा रहे हैं। इसी तरह से मणिपुर को लेकर उनकी चिंता भी समाज की चिंता है। जब वो कहते हैं कि समाज में जगह-जगह कलह नहीं चलता। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल शांत रहा। ऐसा लगा कि पुराना ‘गन कल्चर’ समाप्त हो गया। परन्तु अचानक जो कलह वहां पर उपज गई या उपजाई गई, उसकी आग में वह अभी तक जल रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है। कौन उस पर ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना हमारा कर्तव्य है। इकोसिस्टम के लोग इस अंश को लेकर भी मोदी पर हमलावर होने का प्रयास करते नजर आ हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह जा रहे हैं कि संघ प्रमुख ने पहली बार मणिपुर की स्थिति पर अपनी बात रखी है। दरअसल ऐसे लोगों को संघ की कार्य करने की पद्धति का अल्पज्ञान है। मोहन भागवत ने 2023 के विजयदशमी के अपने भाषण में भी मणिपुर के हालात पर चिंता प्रकट की थी। इसके बाद संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने मणिपुर पर बयान जारी किया था। संघ निरंतरता में मणिपुर की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट कर रहा है। इसको मोदी की आलोचना करार देना इकोसिस्टम की राजनीतिक चाल है।

संघ प्रमुख के बयान को आंशिक रूप से उद्धृत कर संघ और भाजपा में काल्पनिक टकराव बतानेवाले विश्लेषक यह भूल जा रहे हैं कि मोहन भागवत ने अपने भाषण में मोदी सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वो कहते हैं कि पिछले दस वर्षों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। आधुनिक दुनिया जिन मानकों को मानती है, जिनके आधार पर आर्थिक की स्थिति का मापन किया जाता है उनके अनुसार भी हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो रही है। हमारी सामरिक स्थिति निश्चित रूप से पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इतनी स्पष्टता के बावजूद अगर विपक्ष को उस बयान पर राजनीति ही करनी है तो उनको मोहन भागवत के भाषण का वो अंश देखना चाहिए जहां तकनीक के सहारे असत्य परोसने की बात उन्होंने कही और प्रश्न उठाया कि क्या शास्त्र का, विज्ञान का, विद्या का यह उपयोग है? इसके बाद अपना मत प्रकट किया कि सज्जन विद्या का ये उपयोग नहीं करते। दरअसल विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम चुनाव में अपनी हार की खीझ मिटाने के लिए वाराणसी, अमेठी और फैजाबाद लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों पर केंद्रित हो गया है। अमेठी में भारतीय जनता पार्टी की हार के अनेक कारण हैं जबकि स्मृति इरानी के अहंकार को एकमात्र कारण बताया जा रहा है। लोगों के साथ खड़े होने और शक्तिशाली लोगों के सामने निर्बल को प्राथमिकता देने को अहंकार कहकर प्रचारित किया गया। वाऱाणसी में भाजपा की जीत का अंतर कम होने को मोदी के अहंकार से जोड़ दिया गया। फैजाबाद की हार को प्रभु श्रीराम से जोड़ दिया गया। गजब है राजनीति का खेल और गजब है (कु) तर्क गढ़ने का हुनर।    

Saturday, May 25, 2024

नैरेटिव गढ़ने का खोखला प्रयास


लोकसभा चुनाव के छह चरण संपन्न हो चुके हैं। एक चरण का मतदान शेष है। पिछले छह चरणों के चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न तरीकों का उपयोग किया। नेताओं के भाषणों और रोड शो के अलावा इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर तकनीक का उपयोग करते हुए चुनाव प्रचार किया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस) का दुरुपयोग भी हुआ। डीप फेक वीडियो को इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित किया गया। इसको लेकर केस भी हुआ और गिरफ्तारी भी। मतदाताओं के बीच नैरेटिव बनाने का प्रयास भी हुआ। नैरेटिव बनाने में अकादमिक जगत से जुड़े लोग भी सक्रिय दिखे। अकादमिक जगत में नैरेटिव बनाने के लिए चुनाव के पहले से योजनाएं बनने लगी थीं। फलस्वरूप चुनाव के दौरान पुस्तकें आईं। उसपर चर्चा हुई। चुनाव के दौरान नैरेटिव बनाने का ये वैश्विक तरीका है। अमेरिका में जब राष्ट्रपति का चुनाव होता है तो उस दौरान उम्मीदवारों या उनकी पार्टी या विचारधारा को केंद्र में रखकर पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में भी इस प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है। हिंदी प्रकाशन जगत इस मामले में थोड़ा पीछे है पर अंग्रेजी में ये प्रवृत्ति हर चुनाव में देखी जा सकती है। विधानसभा के चुनावों में भी पुस्तकों के माध्यम से नैरेटिव गढ़ने का प्रयत्न होता रहा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केंद्र में रखकर एक लेख को विस्तारित रूप देकर प्रकाशित करवाया गया था। उस पुस्तिका को अंग्रेजी के अलावा कन्नड़ में भी प्रकाशित करवाया गया था। उस पुस्तक में रामचंद्र गुहा और योगेन्द्र यादव की भी टिप्पणी प्रकाशित थी। पुस्तक का नाम था आरएसएस, द लांग एंड शार्ट आफ इट। इसके लेखक हैं देवारुण महादेव। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तथ्यहीन आलोचना है।

लोकसभा चुनाव के समय भी एक पुस्तक आई है, इंडियन फिलासफी, इंडियन रिवोल्यूशन आन कास्ट एंड पालिटिक्स। इस पुस्तक के लेखक हैं, दिव्या द्विवेदी और शाज मोहन। दिव्या द्विवेदी इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (आईआईटी) दिल्ली में दर्शनशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। सह-लेखक के परिचय में उनको दार्शनिक बताया गया है। पुस्तक लेखों का संग्रह है जो 2016 से 2023 के बीच लिखे गए हैं। पुस्तक का परिचय यह कहकर दिया गया है कि इन सात वर्षों में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रकृति को विकृत किया गया। जाति आधारित व्यवस्था गाढ़ी हुई। परिचय को पढ़ने क बाद इस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ी। लेखकों का मानना है कि भारत में हिंदु राष्ट्रवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकवाद के बीच राजनीति नहीं हो रही है। इस देश की राजनीति को उन्होंने जाति के आधार पर व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। इस प्रयास में उन्होंने कई जगह जानबूझकर तथ्यों की ना केवल अनदेखी की बल्कि कुछ तथ्यों को गढ़ने का प्रयास भी किया। अपनी धारणा को अवधारणा बनाकर प्रस्तुत करने का बचकाना प्रयास दिखा। अपने तर्कों को तथ्य बनाने के चक्कर में उन्होंने समकालीन भारतीय राजनीति के उन उदाहरणों को लिया जिसका प्रयोग विपक्षी दल के नेता चुनावी नारे के तौर पर कर रहे हैं। एक जगह कहा गया कि आज के दौर में भारत पर हिंदू राष्ट्रवादियों का शासन है जो देश के सेक्यूलर संविधान को बदलने और इसको हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। राहुल गांधी लगातार ये बात कर रहे हैं। दार्शनिक होने का दावा करनेवाले लेखक ये भूल गए कि संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द कैसे जोड़ा गया था। कई बार ये इतिहास में गए हैं लेकिन जब सेक्यूलर शब्द और संविधान पर अपनी धारणा थोपते हैं तो अतीत में जाने से बचते हैं। 

एक और मनोरंजनक और तथ्यहीन व्याख्या जिसका आधार जुवेनाइल तर्क हैं। लेखकद्वय का मानना है कि इंडिया तो हाल का नाम है। इसको वो इंडस या सिंधु नदी के बिगाड़ से उपजे शब्द तौर पर रेखांकित करते हैं। उससे ही हिंदू बनाते हैं। फिर उस आधार पर हिंदू धर्म को अपेक्षाकृत नया धर्म करार देते हैं। दोनों लेखक बेहद चतुराई से इंडस और इंडिया का सहारा लेते हुए हिंदू तक पहुंचते हैं लेकिन भारत पर नहीं जाते हैं। लेखकगण अगर भारत नाम पर जाते तो इनको ऋगवेद और विष्णु पुराण तक जाना पड़ता। फिर इस पुस्तक के लेख आधार खत्म हो जाता। अगर ये भारतीय दर्शन के अध्येता हैं तो इनको ये तो पता होना चाहिए कि विष्णु पुराण में एक श्लोक है, उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:। समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो भूमि स्थित है उसको भारत भूमि कहते हैं और इस पवित्र भारत भूमि पर निवास करनेवाले सभी को भारतीय कहते हैं। इस एक श्लोक को ही अगर द्विया द्विवेदी और मोहन समझ लेते तो इस दोषपूर्ण निष्कर्ष का शिकार नहीं होते। लेकिन वो तो भारत को, यहां की संस्कृति को अंतराष्ट्रीय विद्वान (?) वेंडि डोनिगर और शेल्डन पालक के लेखन से समझते हैं। विष्णु पुराण और ऋगवेद की बात की जाए तो संभव है कि लेखक गइ इन दोनों को ब्राह्मणवाद की उपज बताकर खारिज कर दें। 

एक बेहद हास्यास्पद अध्याय इस पुस्तक में है जिसका नाम है ‘द मीनिंग आफ क्राइम्स अगेंस्ट मुस्लिम्स इन इंडिया’। इस अध्याय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी का पैरेंट आर्गेनाइजेन बताया गया है। यहां तक तो चलिए किसी हद तक स्वीकार बी किया जा सकता है लेकिन आगे वो संघ को अर्धसैनिक संगठन (पैरामिलिट्री) कहकर संबोधित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इनको न तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पता है और न ही अर्धसैनिक संगठन की प्रकृति के बारे में। अन्यथा वो इस तरह की बातें नहीं करते। अगर वो संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषणों का ही अध्ययन कर लेते तो उनके ज्ञानचक्षु खुल सकते थे। एक और दोषपूर्ण धारणा इस पुस्तक में देखने को मिली जिसमें भारतीय समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था को यहां के निवासियों की त्वचा के रंग के आधार पर देखा गया है। अंग्रेजी के शब्द अपार्थाइड का उपयोग वर्ण व्यवस्था को समझाने के लिए किया गया है। यह ठीक है कि भारतीय समाज में पहले वर्ण व्यवस्था थी जो आगे चलकर जातियों में विभक्त हो गई। वर्ण व्यवस्था को समझने के लिए अगर ये भारत रत्न पी वी काणे को ही पढ़ लेते तो कम से कम सही बात तो कर सकते थे।

इस पुस्तक के लेखों को अंतराष्ट्रीय पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें उन घटनाओं और वक्तव्यों को उद्धृत किया गया है जो लेखकों की धारणा का पुष्ट करती हैं। जाति और वर्ण का घालमेल, हिंदू शब्द की उत्पत्ति, हिंदू- मुसलमान संघर्ष, दलितों और मुस्लिमों पर अत्याचार, हिंदू राष्ट्र, धर्मनिरपेक्षता, संविधान बदलने का प्रयास, लोकतांत्रिक संस्थाओं का हनन जैसे शब्दों का उपयोग इस पुस्तक की मंशा को संदिग्ध करती है। अगर लेखक सही मायने में लेखकगण दार्शनिक हैं तो इनको भारत को भारतीय ग्रंथों के आधार पर समझने का प्रयास करना चाहिए था। पौराणिक ग्रंथों के निहितार्थों को समझना होता। संस्कृत में लिखी मूल अवधारणाओं को समझने के लिए अगर आपको अंग्रेजी अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है तो ये निश्चित मानिए कि आपके सामने निष्कर्ण दोषपूर्ण होंगे। संभव है कि विदेश में उनकी इन अवधारणाओं के पाठक हों, हमारे देश में रहनेवाले चंद लोगों को उनकी यह पुस्तक पसंद आए लेकिन भारतीय मानस इतना परिपक्व हो चुका है कि वो इस तरह की बातों को गंभीरता से नहीं लेगा। चुनाव के समय इस तरह की पुस्तक का आना जिसमें परोक्ष रूप से जातिभेद को गाढा करने का प्रयास हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये एक विचारधारा विशेष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। 


Saturday, March 18, 2023

संघ पर आधारहीन आरोप


कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी को जब भी अवसर मिलता है वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमलावर रहते हैं। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को लेकर, कभी हिंदुत्व को लेकर, कभी वीर सावरकर को लेकर तो कभी सांप्रदायिकता को लेकर। वो भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी जब घेरने का प्रयास करते हैं तो सायास उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आ जाते हैं। अभी हाल में विदेश में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। राहुल गांधी का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में सभी संस्थाओं पर कबजा कर लिया है। इससे संवाद की प्रक्रिया बाधित हुई है बल्कि आयडिया आफ इंडिया को नुकसान पहुंचा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था तहस नहस हो गई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत में वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भी संकट में है। उनको लगता है कि एक संगठन इस मजबूत भारतीय मूल्य को हानि पहुंचाने में सक्षम है। राहुल गांधी राजनेता हैं। राजनीति ही उनका कर्म है। उनके इस बयान पर हलांकि संघ ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राहुल गांधी अपना राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं और हमारी उनसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। लेकिन साथ ही उन्होंने राहुल गांधी से और जिम्मेदार होने की अपेक्षा भी जताई। राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के नेता और पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी जो इन दिनों कांग्रेस में अपना भविष्य तलाश रहे हैं वो भी निरंतर संघ की आलोचना करते हैं। उनकी आलोचना का आधार होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के सभी सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया। इस कब्ज ने देश में संवाद को बाधित किया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। 

लगभग दो वर्ष पहले की बात है। दिल्ली में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत की बैठक थी। दिनभर चली इस बैठक में भोजनावकाश के समय औपचारिक बातें हो रही थी। मोहन भागवत जिस टेबल पर भोजन कर रहे थे वहां एक वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे। उन्होंने उनसे किसी नियुक्ति को लेकर बात आरंभ कर दी। संघ प्रमुख भोजन करते रहे। जब वरिष्ठ पत्रकार महोदय लगातार उसी विषय़ पर बोलते रहे तो मोहन जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी नियुक्तियों आदि में न तो हस्तक्षेप करता है और न ही सरकार को अपनी पसंद बताता है। संघ का काम है देश हित में जनमानस को तैयार करना। जब समाज का मानस तैयार हो जाता है तो सरकारें स्वत: उसका संज्ञान लेती हैं और उसके अनुकूल कार्य करती हैं। नियुक्ति आदि का काम सरकार का होता है वही इसको देखे तो व्यवस्था बनी रहती है। फिर कुछ हास-परिहास हुआ और बात खत्म हो गई। यहां हंसते हुए मोहन भागवत ने जो बात कही वो बेहद महत्वपूर्ण थी। उसको समझे जाने की जरूरत है। अब जरा वास्तविकता पर भी दृष्टि डाल लेते हैं कि देश में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं का हाल क्या है। अगर संघ ने सचमुच हर जगह कब्जा कर लिया है तो इन संस्थाओं के प्रमुखों के पद पर तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग ही पदस्थापित होंगे। 

शिक्षा से आरंभ करते हैं। एक बेहद दिलचस्प उदाहरण है बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की। दो फरवरी 2021 को मोतिहारी के केंद्रीय विश्वविद्याल के कुलपति का कार्यकाल समाप्त हो गया। दो साल से अधिक समय बीत चुका है। दो बार वहां के कुलपति की नियुक्ति लिए चयन प्रक्रिया हो चुकी है। बावजूद इसके अबतक वहां किसी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो सकी है। विश्वविद्यालय कार्यवाहक कुलपति के भरोसे चल रहा है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने में लगा होता तो अबतक तो यहां कुलपति की नियुक्ति करवा चुका होता। ये नया विश्वविद्यालय है और यहां अपने संगठन और विचार के लोगों को भरने की संभावनाएं भी हैं, दो साल से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति ना होना इस आरोप का निषेध करता है कि संघ योजनाबद्ध तरीके से संस्थाओं पर कब्जा कर रहा है। अब शिक्षकों की नियुक्ति की बात करते हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बुधवार को संसद में जानकारी दी कि शैक्षणिक संस्थानों में 11050 शिक्षकों के पद खाली हैं। जिनमें से 6028 पद  केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, 4526 पद भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थानों में और 496 पद भारतीय प्रबंध संस्थान में रिक्त हैं। अगर संस्थाओं पर कब्जा होता तो इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली क्यों होते। संघ प्रयासपूर्वक नियुक्तियां करवा रहा होता। शिक्षा मंत्रालय से ही जुड़ी दो और संस्था का उदाहरण सामने है। एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय जो पिछले कई वर्षों से निदेशक की बाट जोह रहा है। इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा को भी पिछले ढाई साल से प्रभारी निदेशक चला रही हैं। शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में भी नियमित निदेशक की प्रतीक्षा है।    

अब जरा कला और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं को देख लेते हैं। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पिछले कई वर्षों से निदेशक का पद खाली है। वहां कई शिक्षकों के पद भी खाली हैं। यहां की स्थिति तो और भी दिलचस्प है। विद्यालय में दो कार्यवाहक निदेशक पद संभालकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन दिनों नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रोफेसर रमेश गौड़ नाट्य विद्यालय के निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। यहां भी निदेशक के पद के लिए दूसरी बार साक्षात्कार हो चुका है लेकिन अबतक नियुक्ति नहीं हो पाई है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थाओं पर कब्जा करने में लगा होता तो इस प्रतिष्ठित नाट्य संस्था पर अपनी पसंद का निदेशक तो चयनित करवा चुका होता। निदेशक की नियुक्ति की बात छोड़ भी दें तो विद्यालय परिसर में करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उपहास करते हुए पोस्टर लगाया गया था। संस्थाओं पर अगर कब्जा होता तो क्या ये संभव था कि वहां प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाया जाता। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही ललित कला अकादमी है, जहां नियमित सचिव का पद खाली है। कला संस्कृति से जुड़े संस्थानों में खाली पदों की सूची लंबी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सलाहकारों ने ठीक से होमवर्क करके उनको जानकारी नहीं दी । अगर वो होमवर्क करते तो उनको पता चलता कि शिक्षा-संस्कृति के संस्थानों की वास्तविक स्थिति क्या है।

2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने और कांग्रेस के निरंतर कमजोर होते जाने से वामपंथियों को चुनौतियां मिलने लगीं। इन चुनौतियों से जब वो पार नहीं पा सकते हैं तो दुष्प्रचार आरंभ कर देते हैं। दरअसल जो पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी कांग्रेस में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं वो ही इस तरह की बातें फैलाते रहते हैं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही कांग्रेस ने शिक्षा और संस्कृति का क्षेत्र वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया था। विश्वविद्यालयों से लेकर अकादमियों तक में वामपंथियों का बोलबाला था। कुलपति से लेकर अकादमी के चेयरमैन और संस्थानों के निदेशक सभी पदों पर वामपंथी अपने पसंद के लोगों को बिठाते थे। ज्योति बसु की जीवनीकार को कुलपति बना दिया गया था। कांग्रेस और वामदलों के राजनीतिक रूप से कमजोर होने के बाद इन परजीवी किस्म के कथित बुद्धिजीवियों को सत्ता की मलाई मिलने में मुश्किल हो रही है तो वो अनर्गल प्रलाप में जुटे रहते हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इर्द-गिर्द भी इस विचारधारा के लोगों ने अपना घेरा मजबूत कर लिया है और राहुल गांधी को आगे करके वो अपनी स्वार्थसिद्धि के उपक्रम में जुटे रहते हैं। वो ये नहीं समझा पा रहे कि आरोप अगर तथ्यहीन होते हैं तो प्रभाव नहीं छोड़ते।  

Saturday, January 28, 2023

संघ बहाना, मोदी निशाना


इन दिनों पूरे देश में प्रमुख रूप से दो चर्चा हो रही है। एक बीबीसी की डाक्यूमेंट्री इंडिया, द मोदी क्वेश्चन की और दूसरी शाह रुख खान की फिल्म पठान की। वामपंथी छात्र संगठन बीबीसी की डाक्यूमेंट्री का सार्वजनिक प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। इसपर विवाद हो रहे हैं। फिल्म पठान को सफल बताकर उसी ईकोसिस्टम के लोग भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। बीबीसी की डाक्यूमेंट्री की आड़ में वो दल भी हमलावर हैं जिनके नेता ऐश्वर्या राय से लेकर क्रिकेट की अधिक चर्चा होने पर पर मीडिया को घेरते रहे हैं। अगर डाक्यूमेंट्री की ही चर्चा करनी थी तो ‘आल दैट ब्रीथ्स’ और ‘द एलिफेंट व्हिस्पर्स’ की चर्चा करते। उनका सार्वजनिक प्रर्दर्शन करते। ये दोनों आस्कर अवार्ड के लिए शार्टलिस्टेड हैं। इसकी चर्चा नहीं करके वामदलों का ईकोसिस्टम एक ऐसी डाक्यूमेंट्री की चर्चा करने में लगा है जिसका रिसर्च तो दोषपूर्ण है ही उसकी मंशा पर भी प्रश्नचिन्ह है। द मोदी क्वेश्चन में गुजरात हिंसा के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जा रहा जिसपर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आ चुका है। 

बीबीसी की डाक्यूमेंट्री अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का एक प्रयास है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का प्रयास पहली बार हुआ है। पिछले महीने ‘द इकोनामिस्ट’ में एक लेख प्रकाशित हुआ था, द मिथ आफ अ होली काउ। इस लेख में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गाय और हिंदू राष्ट्र को जोड़कर देखा गया। इस लेख के लेखक ने गिनकर ये बताया कि ऋगवेद में 700 जगहों पर गाय का उल्लेख है लेकिन गोमांस नहीं खाने की बात कहीं नहीं है। ग्रंथों से खोज-खोजकर बताया गया है कि प्राचीन काल में गोमांस खाने का उल्लेख मिलता है। लेख में आर्य समाज को हिंदू फंडामेंटलिस्ट समूह बताया गया है। आर्यसमाजियों ने भारत की हिंदू पहचान को फिर से स्थापित करने के लिए गोरक्षा को औजार बनाया था। वो हिंदू पहचान जो मुस्लिम आक्रांताओं की वजह से धूमिल पड़ गया था। लेख में देश की स्वतंत्रता के लिए भी गोरक्षा के उपयोग का तर्क दिया गया है।  इस संदर्भ में गांधी को उद्धृत किया गया है। गांधी गोरक्षा को विश्व को हिदुत्व का तोहफा मानते थे और कहते थे कि हिंदुत्व तबतक रहेगा जबतक गाय की रक्षा करनेवाले हिंदू रहेंगे। कहना न होगा कि लेखक ने गोरक्षा को हिदुंत्व से जोड़कर उसपर राजनीति करनेवालों और घटनाओं को गिनाया। फिर उसको मोदी और मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से जोड़ा। यहां लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दक्षिण पंथी अर्धसैनिक संगठन तक बता दिया। ये तो एक उदाहरण मात्र है जबकि ऐसे कई लेख ‘द इकोनामिस्ट’ जैसी पत्रिकाएं में प्रकाशित होते रहे हैं। इस तरह के लेखों को आधार बनाकर वामपंथी ईकोसिस्टम छाती कूटने लगता है। 

अगले वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अभी जिस तरह का माहौल है और चुनावी सर्वे और चुनावी पंडित जो संकेत दे रहे हैं उससे लगता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाएगी। एक तरफ विपक्षी दल यात्राओं आदि के माध्यम से सरकार पर हमलावर हैं तो दूसरी तरफ ईकोसिस्टम को काम पर लगाया गया है। पिछले दिनों कन्नड के लेखक देवनूरु महादेवा की एक पुस्तिका पर नजर पड़ी। इस पुस्तिका का नाम है आरएसएस, द लांग एंड द शार्ट आफ इट। पुस्तिका मूल रूप से कन्नड में लिखी गई है। पुस्तक के बारे में बात करने के पहले जान लेते हैं कि देवनूरु महादेवा कौन हैं। पुस्तिका में ही लिखा है कि इन्होंने 2015 में पुरस्कार वापसी अभियान के दौरान साहित्य अकादमी और पद्मश्री पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी। ये भी बताया गया है कि छात्र जीवन में देवानूरु महादेवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव में थे। बाद में उनका कई कारणों से मोहभंग हो गया। छोटी सी पुस्तिका की भूमिका रामचंद्र गुहा ने लिखी है और अंत में योगेन्द्र यादव की एक लंबी टिप्पणी भी है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक लंबे लेख को पुस्तिका की शक्ल दी गई। कई भाषाओं में इसको अनुदित कर प्रकाशित करवाया गया। 

अपनी इस पुस्तिका में देवानूरु महादेवा की स्थापना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मनुस्मृति के चातुर्वण के आधार पर समाज को बांटकर रखना चाहता है। इस्लाम और ईसाई धर्म का विरोध संघ इस वजह से करता है क्योंकि इन दोनों धर्मों में चतुर्वण का निषेध है। संघ को ये निषेध स्वीकार नहीं । संघ चहता है कि समाज में जाति व्यवस्था बनी रहे। देवानूरु महादेवा अपनी इस स्थापना के लिए गुरुजी गोलवलकर और वीर सावरकर के लेखों और पुस्तकों को उद्धृत करते हैं। उनका दावा है कि झूठ संघ का कुलदेवता है। एक जगह वो सुरुचि प्रकाशन से 1997 में प्रकाशित पुस्तक ‘परम वैभव के पथ पर’ को उद्धृत करते हुए बताते हैं कि उसमें संघ से जुड़े 40 संगठनों का उल्लेख है। फिर कहते हैं कि उस समय ये स्थिति थी तो अब न जाने कितने संगठन इसकी छत्रछाया में पल रहे होंगे। जब किसी चीज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना होता है तो तथ्यों के साथ इसी तरह से छेड़छाड़ की जाती है। डा सदानंद दामोदर सप्रे की इस पुस्तक में 31 संगठनों का विवरण है जिसको देवानूरु महादेवा 40 बता रहे हैं। यहां तक कि वो धर्म संसद को भी संघ की संस्था के तौर पर उल्लिखित करते हैं। एक जगह लेखक विरोधी दल के नेता की तरह हर भारतीय को 15 लाख के वादे और करोड़ों को नौकरी आदि का प्रश्न उठाते हैं। लेखक या गुहा और यादव जैसे उनके समर्थकों को ये बताना चाहिए कि उनकी पालिटिक्स क्या है।  

अपनी इस पुस्तिका में लेखक चतुर्वण को लेकर भी भ्रमित हैं। वो व्यवसाय आधारित जाति व्यवस्था और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का घालमेल करते हुए दोषपूर्ण निष्कर्ष देते हैं। भारत रत्न से सम्मानित लेखक डा पांडुरंग वामन काणे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास के पहले खंड में विस्तार से वर्ण पर विचार किया है। काणे ने एक जगह कहा है कि ‘जन्म और व्यवसाय पर आधारित जाति व्यवस्था प्राचीन काल में फारस रोम और जापान में भी प्रचलित थी। किंतु जैसी परंपराएं भारत में चलीं और उनके व्यावहारिक रूप जिस प्रकार भारत में खिले, वे अन्यत्र दुर्लभ थे और यही कारण था कि अन्य देशों में पाई जानावेली व्यवस्था खुल-खिल न सकी और समय के प्रवाह में पड़कर समाप्त हो गई।‘ पता नहीं देवानूरु महादेवा ने कौन सी मनुस्मृति और कौन सा अनुवाद पढ़ा । अगर इसका उल्लेख कर देते तो स्पष्ट होता। मनुस्मृति के कई अंग्रेजी अनुवाद हुए। डा बुहलर के अनुवाद को बेहतर माना जाता है। काणे बुहलर की उस स्थापना का भी निषेध करते हैं जिसमें वो कहते हैं कि मनुस्मृति, मानवधर्मसूत्र का रूपांतर था। काणे मानवधर्मसूत्र को कोरी कल्पना कहते हैं। संभव है कि देवानूरु ने कोई ऐसा ही भ्रामक अनुवाद पढ़कर अपनी राय बना ली हो। 

दरअसल अगले वर्ष लोकसभा चुनाव तक कई ऐसी पुस्तकें और पर्चे छपेंगे जिनमें इसी तरह की भ्रामक बातों की ओट में राजनीति की जाएगी। कुछ फिल्में भी आएंगी जिनमें इस तरह के संवाद होंगे जो वर्तमान परिस्थिति में परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेन्द्र मोदी की नीतियों के खिलाफ होंगे। जैसे अभी एक फिल्म आई मिशन मजनू। इसमें एक लंबा संवाद है जिसमें नायक कहता है कि हम इंडिया हैं, नफरत पर नहीं प्यार पर पलते हैं। इसको सुनकर राहुल गांधी की यात्रा के दौरान के उनके बयान याद आते हैं। दरअसल ईकोसिस्टम प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमला दिखता है लेकिन असली निशाना नरेन्द्र मोदी हैं।  


Saturday, September 11, 2021

हिंदुत्व को बदनाम करने का उपक्रम


कुछ दिनों से अकादमिक जगत में एक सम्मेलन की बहुत चर्चा हो रही है, जिसका नाम है डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व। इस तथाकथित सम्मेलन के आयोजकों का अता-पता नहीं है। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इसकी घोषणा होती है।  इसकी एक वेबसाइट बना दी जाती है जिसपर तीन दिन के आनलाइन सम्मेलन की घोषणा की जाती है। उसपर अमेरिकी विश्वविद्लायों के नाम जुड़ते और हटते रहते हैं। ट्वीटर पर एक हैंडल बनाया जाता है और उससे इस सम्मेलन की गतिविधियां पोस्ट की जाने लगती हैं। दावा किया जाता है कि अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों के विभागों का समर्थन इस सम्मेलन को प्राप्त है। तीन दिन के सम्मेलन में घिसे पिटे विषयों को लेकर आनलाइन चर्चा सत्र आयोजित है। इन सत्रों में वही घिसे पिटे वक्ता हैं जिन्होंने अपने देश में अपनी प्रासंगिकता खो दी है।  असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी के प्रपंच में भी इनमें से कइयों का नाम सामने आया था।तब भी वो सब भारतीय जनता पार्टि की सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सामने आए थे। अब एक बार फिर से इस नए शिगूफे से वो अपनी प्रासंगिकता साबित करने की जुगत में लग गए हैं। ऐसे लोगों का  नाम लेकर उनको महत्व देने का कोई अर्थ नहीं है। डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व सम्मेलन को लेकर हमारे देश के भी कुछ विश्वविद्यालय शिक्षक और कार्यकर्ता उत्साहित नजर आ रहे हैं। ये वही शिक्षक हैं जो मानसिक तौर पर गुलाम हैं और उनको हर चीज में व अमेरिका या अन्य देशों में हो रही गतिविधियां पसंद हैं। अपनी परंपरा या अपने पौराणिक ग्रंथों को पढ़ने में शर्म महसूस होती है। ये खुद को वामपंथी विचारधारा की तरफ खड़े दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था में उनको ज्यादा यकीन है।  

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व के गुमनाम आयोजकों को न तो हिंदुत्व का ज्ञान है और न ही इसकी व्याप्ति और उदारता का अंदाज। हिंदुत्व के ध्वंस की कई असफल कोशिशें कई स्तर पर कई बार हो चुकी हैं। पिछले दिनों गांधी दर्शन के अध्येता मनोज राय से बात हो रही थी तो उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों की ओर ध्यान दिलाया। गांधी ने विस्तार से इस विषय पर लिखा है जो गांधी वांगमय के खंड 64 में संकलित है। महात्मा गांधी ने काल्पनिक स्थिति पर लिखा है कि ‘यदि सारे उपनिषद् और हमारे सारे धर्मग्रंथ अचानक नष्ट हो जाएं और ईशोपवनिषद् का पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति मे रहे तो भी हिंदू धर्म सदा जीवित रहेगा।‘ गांधी ने संस्कृत में उस श्लोक को उद्धृत करते हुए उसका अर्थ भी बताया है। श्लोक के पहले हिस्से का अर्थ ये है कि ‘विश्व में हम जो कुछ देखते हैं, सबमें ईश्वर की सत्ता व्याप्त है।‘ दूसरे हिस्से के बारे में गांधी कहते हैं कि ‘इसका त्याग करो और इसका भोग करो।‘ और अंतिम हिस्से का अनुवाद इस तरह से है कि ‘किसी की संपत्ति को लोभ की दृष्टि से मत देखो।‘ गांधी के अनुसार ‘इस उपनिषद के शेष सभी मंत्र इस पहले मंत्र के भाष्य हैं या ये भी कहा जा सकता है कि उनमें इसी का पूरा अर्थ उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है।‘ गांधी यहीं नहीं रुकते हैं और उससे आगे जाकर कहते हैं कि ‘जब मैं इस मंत्र को ध्यान में रखककर गीता का पाठ करता हूं तो मुझे लगता है कि गीता भी इसका ही भाष्य है।‘ और अंत में वो एक बेहद महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि ‘यह मंत्र समाजवादियों, साम्यवादियों, तत्वचिंतकों और अर्थशास्त्रियों सबका समाधान कर देता है। जो लोग हिंदू धर्म के अनुयायी नहीं हैं उनसे मैं ये कहने की धृष्टता करता हूं कि यह उन सबका भी समाधान करता है।‘  डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व में अपने देश के कई वक्ता हैं उनको गांधी जी की इस उक्ति को पढ़ लेना चाहिए तब हिंदुत्व के ध्वंस की बात करनी चाहिए थी। 

हिंदुत्व या हिंदू धर्म कोई भौतिक वस्तु नहीं है कि इसको किसी सम्मेलन से, चंद विश्वविद्यालयों के हिंदू विरोधी मानसिकता वाले शिक्षकों की मदद से या इंटरनेट मीडिया पर अभियान चलाकर ध्वस्त किया जा सके। ये एक ऐसा शब्द है जिसका हमारे जीवन से हर पल वास्ता पड़ता रहता है। इस शब्द पर विचार करें तो ऋगवेद से लेकर हजारों वर्ष के लंबे कालखंड में इसके अर्थ का दायरा इतना व्यापक हुआ है कि उसको डिसमेंटल करने की सोचने वाले की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। वेदव्यास इसको नियम से जोड़ते हैं तो वाल्मीकि इसको चरित्र से जोड़कर व्याख्यित करते हैं। स्वामी विवेकानंद इसको सहिष्णुता से जोड़कर अपना दर्शन देते हैं। हिंदुत्व एक ऐसी अवधारणा है जो अपने धर्म से अपने धर्मगुरुओं से या अपने भगवान को भी प्रश्नों के घेरे में खड़ा करता है और फिर उन प्रश्नों के आधार पर स्वस्थ संवाद करता है। हिंदुत्व के उथले ज्ञान वाले कुछ लोग इसकी गहराई में न जाकर इसकी व्याख्या करने लग जाते हैं। एक विदेशी विद्वान महाभारत की व्याख्या करते हुए कृष्ण को हिंसा के लिए उकसाने का दोषी करार देते हैं और कहते हैं कि अगर वो न होते तो महाभारत का युद्ध टल सकता था। अब इनको कौन समझाए कि महाभारत को और कृष्ण को समझने के लिए समग्र दृष्टि का होना आवश्यक है। अगर अर्जुन युद्ध के लिए तैयार नहीं होते और कौरवों का शासन कायम होता तब क्या होता। कृष्ण को हिंसा के जिम्मेदार ठहरानेवालों को महाभारत के युद्ध का परिणाम भी देखना चाहिए था। लेकिन अच्छी अंग्रेजी में आधे अधूरे ज्ञान के आधार पर भारतीय पौराणिक ग्रंथों की व्याख्या करने से न तो हिंदुत्व की व्याप्ति कम होगी और न ही हिंदुत्व का चरित्र बदलेगा। हिंदुत्व के अंदर ही खुद को सुधार करने की व्यवस्था है। यहां जब भी कुरीतियां बढ़ी हैं तो इसी समाज के अंदर से कोई न कोई सुधारक सामने आया है और उसने कुरीतियों के खिलाफ जंग लड़ी है।  

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व का जो सम्मेलन है उसको हिंदुत्व से कोई लेना देना नहीं है बल्कि अगर सूक्षम्ता से विश्लेषण करें और उनकी वेबसाइट का अध्ययन करें तो ये स्पष्ट होता है कि उनके निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम ठीक से नहीं लिख पानेवाले लोग इस संगठन का फैक्टशीट पेश कर रहे हैं। एक के बाद एक लेख में एक ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों को बदनाम किया जा सके। इनको ये नहीं मालूम कि कोई भी संगठन अपने कार्यक्रमों की वजह से, अपने सिद्धांतों की वजह से समाज में स्वीकार्यता हासिल करता है किसी फैक्टशीट से नहीं। दरअसल इस  तरह के सम्मेलनों के आयोजन और कुछ  विदेशी विश्वविद्यालयों के समर्थन से ये संकेत मिलता है कि अलग अलग शक्तियां भारत के खिलाफ एकजुट होने को बेचैन हैं। इस तरह के लोग माहौल बनाने में भी माहिर होते हैं। इस सम्मेलन के पहले कोरोना प्रबंधन को लेकर विदेशी अखबारों में छपनेवाले लेखों को देखें तो ये गठजोड़ और स्पष्ट होगा। हिंदुत्व की आड़ में भारत को भारतीयता को और वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव को कम करने के इस उपक्रम के बारे में अब सबको पता है। इस तरह की प्रविधि आज से कुछ सालों पहले तक कामयाब हो जाती थी लेकिन अब देश की जनता जागरूक ही नहीं सक्रिय भी हो गई है। उनको इस तरह के सम्मेलनों से बरगलाना संभव नहीं है। हां अंतराष्ट्रीय मंचों पर और देश के कुछ वामपंथी रुझान वाले संगठनों को इस तरह के सम्मेलनों से कुछ आस जग सकती है लेकिन जनता की समझदारी से ये आस स्वप्न भर रह जाएगी। 


Saturday, March 24, 2018

देशव्यापी बहस की दरकार


पिछले दिनों भाषा को लेकर दो बहुत अहम खबर आई जिसपर भारतीय समाज में खासतौर पर हिंदी समाज को चर्चा करने की आवश्यकता है। पहली खबर आई देश के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए हुई परीक्षा के लिए हिंदी विभाग में एमफिल और पीएचडी के लिए सात सौ उनचास परीक्षार्थियों ने आवेदन किया लेकिन जो परिणाम आया वो बेहद चौंकानेवाला था। सात सौ उनचास अवेदनकर्ताओं से सिर्फ चार ने प्रवेश परीक्षा पास की और उऩको साक्षात्कार के लिए बुलाया गया । सात सौ उनचास में से सिर्फ चार यानि कि सफल परीक्षार्थियों का प्रतिशत लगभग आधा है। पूरे देश में जहां हिंदी पढ़ने जानने समझने वालों की संख्या देश की आधी आबादी से ज्यादा है वहां हिंदी को लेकर इस तरह की खबर हिंदी समाज को चिंतित करने के लिए काफी हैं। लेकिन इस पर हिंदी समाज से किसी तरह की चिंता व्यक्त की गई हो ऐसा ज्ञात नहीं हो सका। हमारे देश में हिंदी को लेकर उदासीनता क्यों है, अगर इसकी पड़ताल करते हैं तो जिस सबसे बड़े यथार्थ से मुठभेड़ होता है वह है हिंदी का रोजगार की भाषा नहीं बन पाना। इसपर बहुत बातें होती हैं लेकिन इस दिशा में कोई ठोस काम होता नहीं दिख रहा है। हिंदी के नाम पर खुले विश्वविद्यालयों में जिस तरह से काम हो रहे हैं वो संतोषजनक नहीं हैं या कह सकते हैं कि नाकाफी हैं। हिंदी को रोजगार से जोड़ने और साहित्य के अलावा अन्य विधाओ का सृजन हिंदी में नहीं होने पर भी काफी सालों से बातें हो रही हैं। 1910 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित हुआ था जिसमें भी हिंदी को लेकर चिंता की गई थी और उसको मजबूत करने का रोडमैप पेश किया गया था। कालांतर में साहित्य सम्मेलन के तीसरे अधिवेशन में भी पुरुषोत्तमदास टंडन के प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी जिसमें हिंदी को बढ़ाने के लिए मानविकी, समाज शास्त्र वाणिज्य, विधि तथा विज्ञान और तकनीकी विषयों की पुस्तकों को लिखवाना और प्रकाशित करवाने पर जोर दिया गया था। प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी और सबों की राय समान थी कि हिंदी को विस्तार देने और उसको मजबूती देने के लिए यह कार्य प्रारंभ करना होगा। आजादी के बाद इस दिशा में जो भी प्रयत्न हुए वो नाकाफी रहे। सरकार और संस्थागत स्तर पर अगर इस तरह के काम हुए भी तो बहुत कम थे। अंग्रेजी का दबदबा बना रहा जो आजतक कायम है। नब्बे के दशक में जब हमारे देश में अर्थव्यवस्था खुलने लगी उस वक्त भी अगर हिंदी को लेकर कोशिश की गई होती तो आज स्थिति बेहतर हो सकती थी। शायद बाजार के दबाव में कुछ हो पाता। दरअसल आजादी के बाद कई सालों तक कॉलेज और विश्वविद्यालय खोलने पर जोर रहा। शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर बढ़ाने और हिंदी को उसमें मजबूती से स्थापित करने का उपक्रम गंभीरता से नहीं किया गया। कॉलेज और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को हिंदी में शोध करने,हिंदी में छात्रों से संवाद करने, हिंदी में शोध पत्र प्रस्तुत करने के लिए जितने  प्रोत्साहन की जरूरत थी उतना हो नहीं सका। शिक्षकों ने भी अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि हिंदी को लेकर छात्रों में भी उदासीनता बढ़ती चली गई। हालात इतने बुरे होते चले गए कि कई कॉलेजों में हिंदी के छात्रों की संख्या शिक्षकों से कम रह गई । छात्र आ जाएं तो कक्षा लगती थी वर्ना शिक्षकों के पास कोई काम नहीं होता था। स्थिति बद से बदतर होती चली गई और छात्रों की पीढ़ी दर पीढ़ी हिंदी से विमुख होती गईं। आज अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं तो वो वर्षों की लापरवाही और गलत नीतियों का परिणाम है।
दूसरी खबर आई नागपुर में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक से। 9 से 11 मार्च तक चली इस प्रतिनिधि सभा में भाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किया गया जिसमें भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया गया। सभा का मत था कि ‘भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है। देश में प्रचलित विविध भाषाएं व बोलियां हमारी संस्कृति, उदात्त परंपराओं, उत्कृष्ट ज्ञान एवं विपुल साहित्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के साथ ही वैचारिक नवसृजन हेतु भी परम आवश्यक हैं…आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन व विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गम्भीर चुनौती बन कर उभर रहा है।‘ भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारों, नीति निर्धारकों और स्वयंसेवी संगठनों से प्रयास करने की अपील की गई। अपील में कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा या अन्य भारतीय भाषा हो, सरकारें इस दिशा में उचित नीतियों का निर्माण कर आवश्यक प्रावधान करे। उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य सरकारें आरएसएस की प्रतिनिधि सभा की अपील पर ध्यान देंगी और इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएंगी।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा में तकनीकी और आयुर्विज्ञान सहित उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण सामग्री, पाठ्य सामग्री और परीक्षा का विकल्प भारतीय भाषाओं में सुलभ करवायया जाए। यह एक ऐसा काम है जो सरकारों से गंभीरता की अपेक्षा करती है। इसके लिए एनसीईआरटी से लेकर राज्य सरकारों को भी पहल करनी होगी। अगर ऐसा हो पाता है तो हिंदी को भी इसका लाभ होगा और वो रोजगार से जुड़ने की दिशा में अग्रसर हो सकती है। इसके अलावा इस प्रस्ताव में शासकीय और न्यायिक कार्य में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की कही गई है, अंग्रेजी पर भारतीय भाषा को तरजीह देने की अपेक्षा की गई है। नाटकों,लोककलाओं आदि के प्रोत्साहन की बात कही गई है जो कि अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय भाषाओं को मजबूत करेगी। आखिर में कहा गया है कि – ‘प्रतिनिधि सभा सरकारों, स्वैच्छिक संगठनों, जनसंचार माध्यमों, पंथ-संप्रदायों के संगठनों, शिक्षण संस्थाओं तथा प्रबुद्धवर्ग सहित संपूर्ण समाज से आवाहन करती है कि हमारे दैनन्दिन जीवन में भारतीय भाषाओं के उपयोग एवं उनके व्याकरण, शब्द चयन और लिपि में परिशुद्धता सुनिश्चित करते हुये उनके संवर्द्धन का हर सम्भव प्रयास करें।‘ यह एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव है जिसपर गंभीरता से राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए थी। सरकारों को आगे आकर इस दिशा में काम को आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना था। समाज में इसपर बहस होनी चाहिए।
बौद्धिक वर्ग के एक खास विचारधारा वाले लोगों से प्रतिनिधि सभा के इस प्रस्ताव पर बहुत उत्साह की अपेक्षा मुझे नहीं है क्योंकि ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रस्ताव है । आरएसएस के नाम से ही उनमें एक उदासीनता का भाव व्याप्त हो जाता है । प्रस्ताव चाहे लाख अच्छा हो, उससे समाज और देश का भला हो रहा हो, भाषा मजबूत हो रही हो, लेकिन अगर उसमें आरएसएस का नाम जुड़ गया है तो उसको प्रयासपूर्वक हाशिए पर डालने की कोशिश होती रही है, आगे भी होती रहेगी। लेकिन अगर हम चाहते हैं कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसी स्थिति नहीं आए तो राजनीति और विचारधारा को छोड़कर हमें अपनी भाषा को मजबूत करने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। उसको एक मुहिम के तौर पर चलाना होगा, देश की सभी राज्य सरकारों को आगे बढ़कर भाषा को मजबूती देने का काम करना होगा। इसके अलावा हिंदी के लोगों को उस षड़यंत्रकारी सिद्धांत को भी निगेट करना होगा जिसमें सालों से ये प्रचारित किया जाता रहा है कि हिंदी मजबूत होगी तो वो अन्य भारतीय भाषाओं को कमजोर कर देगी। यह एक दुश्प्रचार है क्योंकि अगर हिंदी मजबूत होती है, उसका विस्तार होता है तो स्वाभाविक रूप से सभी भारतीय भाषाएं मजूबत होंगी। अन्य भाषाओं के साहित्य को हिंदी का विशाल पाठक वर्ग मिलेगा। पिछले दिनों पूर्वोत्तर के कई लेखकों ने इस बात को स्वीकारा कि हिंदी में उनकी कृतियों के अनुवाद होने से उनको लाभ हुआ और उनको अखिल भारतीय पहचान मिली। इस तरह की बातों को लगातार प्रचारित करना होगा, गोष्ठियों सेमिनारों में हिंदी के लोगों को जोर देकर अपना पक्ष रखना होगा। दिनकर ने भी कभी कहा था कि हिंदी को पूरे देश में उसी तरह से लागू किया जाना चाहिए जिस तरह कि अन्य भारतीय भाषा के लोग चाहते हैं। दिनकर की इस राय को ही मूलमंत्र मानते हुए सभी भारतीय भाषाओं को एकजुट होना होगा और इन भाषाओं के उपयोगकर्ताओं को भी सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि हमें हमारी भाषा में काम करने का माहौल दो। लोकतंत्र में लोक का दबाव सर्वापरि होता है, इसको समझना होगा।    

Wednesday, April 1, 2015

‘बंच ऑफ थॉट्स’ एक

पिछले साल अक्तूबर में लखनऊ में हुई राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक से संदेश निकला था कि संघ की कल्पना को साकार करने का उचित समय आ गया है, अब जरूरत इस बात की है कि संगठन का कार्य तेजी से और विवादास्पद मुद्दों पर सावधानी से चला जाए ताकि केंद्र की मोदी सरकार को किसी तरह की कोई असुविधा ना हो । कुछ इसी तरह की बात पिछले महीने संघ की नागपुर में हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक से भी निकल कर आई । वहां भी कहा गया कि किसानों के मुद्दे पर संघ, भारतीय किसान मंजदूर संगठन की चिंताओं से वाकिफ है, उसपर सरकार से बातचीत होगी । संघ का मानना है कि मोदी सरकार अभी नई है लिहाजा उसको काम करने का कुछ वक्त दिया जाना चाहिए । इन दो बैठकों से जो सूत्र समान्य रूप से निकल कर आते हैं वो ये हैं कि संघ और बीजेपी में कई मुद्दों पर मतभेद हैं लेकिन संघ सावधानी से इन मुद्दों को पीछे रखकर अपने विस्तार पर जोर देने की कोशिशों में लगा है । दरअसल अगर हम देखें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की बुनियादी अवधारणाएं एक हैं । दोनों ही हिंदुत्व से लेकर राष्ट्रवाद तक एक ही विचारधारा के पोषक हैं । फर्क है तो बस उसके अप्रोच में । अगर हम इकोनॉमी की बात करें तो संघ स्वदेशी मॉडल को अपनाना चाहता है, बीजेपी भी कुछ इसी तरह की बात करती रही है । 1992 के नेशनल एक्जीक्यूटिव में बीजेपी ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि उन्हें उदारवादी नीतियां मंजूर हैं लेकिन आत्मनिर्भरता के साथ । संघ बगैर किसी अगर मगर के स्वदेशी की वकालत करता है । इस मसले पर दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ा था कि 1998 में भारतीय किसान मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने वाजपेयी सरकार पर जन विरोधी और स्वदेशी विरोधी होने का आरोप तक लगाया  था । दो हजार एक में तो विवाद इतना बढ़ गया कि बीएमएस के नेता दत्तोपंत ठेगड़ी ने उस वक्त के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को क्रिमिनल तक करार दे दिया था । इन झगड़ों से सबक लेते हुए इस बार संघ ने सावधानी से आगे बढ़ने का फैसला लिया है ताकि झगड़ा सावर्जनिक रूप से उजागर ना हो पाए । मोदी सरकार खुले आम खुली अर्थव्यवस्था की पैरोकारी कर रही है लेकिन स्वदेशी की वकालत करनेवाला संघ खामोश हैं । इंश्योरेंस सेक्टर में 49 फीसदी विदेशी निवेश से लेकर नए भूमि अध्ग्रहण बिल में किसानों की अनदेखी के मुद्दे पर भी संघ को ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही है । इसके मूल में अपने संगठन की विस्तार है और उसकी नजर 2020 में अपने सौ साल पूरे होने तक कमोबेश अपना एजेंडा लागू करने का लक्ष्य है । 
अब अगर धर्मांतरण और घर वापसी जैसे मुद्दों को देखें तो संघ इस मुद्दे पर रैडिकल अप्रोच रखता है लेकिन बीजेपी उसके अप्रोच को एंडोर्स नहीं करती है । बीजेपी को पता है कि भारत का वृहत्तर हिंदू समाज इस तरह की आक्रामकता को पसंद नहीं करती है । संघ अपनी सैद्धांतिकी को लेकर आगे बढ़ना चाहता है और बीजेपी व्यावहारिकता के साथ । सरकार सैद्धांतिकी से नहीं चलती है और संगठन को चलाने के लिए सैद्धांतिकी जरूरी है । लिहाजा यहीं से मतभेद शुरू होता है या फिर दिखाई देने लगता है। घर वापसी और बापू के हत्यारे गोडसे की मूर्ति जैसे मुद्दे पर पीएम मोदी अपनी नाराजगी जताते हैं लेकिन संघ और उसके अनुषांगिक संगठन इस एजेंडे से हिलने को तैयार नहीं हैं । संघ को लगता है कि इन मुद्दों से हटते ही उसके कोर समर्थक उससे छिटकने लगेंगे लिहाजा उसको बनाए रखने के लिए उग्र हिंदुत्व की बयानबाजियां होती रहती हैं । अब अगर भारत में बांग्लादेशी मुसलमानों के मुद्दे को लेकर ही संघ और बीजेपी के स्टैंड को देखें तो यह साफ होता है कि इलस मुद्दे पर दोनों के अप्रोच अलग है । संघ जहां बांग्लादेशी मुसलमानों को देश से निकाल बाहर करने की मांग बेहद आक्रामक तरीके से करता है, वहीं बीजेपी संभलकर आगे बढ़ना चाहती है, बढ़ती भी है । सरकार में आने के बाद उसे पता है कि करीब तीन-चार करोड़ बांग्लादेशी मुसलमानों को एकदम से वापस नहीं भेजा जा सकता है ।

इसी तरह से अगर अनुच्छेद 370 और कॉमन सिविल कोड के मुद्दे पर भी बीजेपी ने लचीला रुख अपनाया तो संघ परोक्ष रूप से उसके साथ है । कश्मीर में मुफ्ती के साथ सरकार बनाने को लेकर संघ के कट्टर समर्थकों में घोर निराशा है । वो कोई भी तर्क सुनने को तैयार नहीं है । इस खतरे को उठाते हुए भी संघ कहता है कि कश्मीर में एक प्रयोग किया गया है और उसके नतीजों का इंतजार करना चाहिए। हां इतना अवश्य है कि संघ इन मुद्दों पर अब इससे आगे बढ़ने का खतरा नहीं उठा सकता है, क्योंकि आम स्वयंसेवकों को लगने लगा है कि बीजेपी ने कश्मीर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत पर समझौता कर लिया है । बीजेपी और संघ में थोडी बहुत मतभेद आदि दिखाई देते रहेंगे लेकिन दोनों के ‘बंच ऑफ थॉट्स’ एक हैं । एक और अहम मुद्दा है शिक्षा का । इस मसले पर भी थोड़ी बहुत खींचतान दिखाई देती है लेकिन कमोबेश एजेंडा संघ का ही चलता है जबतक कि व्यावहारिकता आड़े ना आए । स्कूलों में जर्मन की जगह संस्कृत । आईसीएचआर से लेकर अन्य सरकारी संगठनों में संघ के कार्यकर्ताओं की नियुक्तियां आदि ऐसे मुद्दे हैं जिसपर सरकार उदार है लेकिन इस उदारता के बदले वो सरकारी नीतियों पर अपनी चलाने की छूट चाहते हैं । जो उन्हें हासिल भी है । वाजपेयी के दौर में जिस तरह से संघ और पार्टी आमने सामने आ गई थी उसके आसार इस बार कम हैं क्योंकि संघ को लगता है कि नरेन्द्र मोदी की कट्टर, निर्णायक हिंदुत्ववादी छवि उसके लिए लाभदायक है और थोड़े बहुत समझौते के साथ इसको बरकरार रखा जाना चाहिए । 

Sunday, October 5, 2014

भाषण पर बेवजह विवाद

विजयादशमी के मौके पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख माननीय मोहन भागवत के करीब घंटे भर के भाषण को दूरदर्शन पर दिखाए जाने पर सवाल खड़े होने लगे हैं । विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा कई बुद्धिजीवियों ने भी दूरदर्शन के इस कदम को केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के होने से जोड़कर देखा है । लेफ्ट पार्टियो ने इसको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सरकारी संरक्षण के तौर पर पेश करके दूरदर्शन को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की । मशहूर इतिहासकार और स्तंभकार रामचंद्र गुहा ने भी ट्वीट कर कहा कि बहुमत के इस नंगा-नाच का विरोध किया जाना चाहिए । गुहा के मुताबिक संघ एक हिंदी सांप्रदायिक संगठन है , अगली बार मस्जिदों के इमाम और चर्च के पादरी भी लाइव प्रसारण की मांग कर सकते हैं । उन्होंने इस बात की भी उम्मीद जताई कि कोई ना कोई शख्स अदालत में इसके खिलाफ जनहित याचिका दाखिल करेगा । संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण को दूरदर्शन पर लाइव दिखाए जाने की बढ़ती आलोचना के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भागवत के भाषण की महत्ता बताई तो सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर भी दूरदर्शन के बचाव में उतरे। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि संघ प्रमुख का भाषण खबर थी और खबर की महत्ता के मद्देनजर दूरदर्शन ने इसको लाइव करने का फैसला लिया । फिर क्या था सोशल मीडिया पर दूरदर्शन के इस कदम के पक्ष और विपक्ष में तलवारें खिच गईं । जमकर आरोप प्रत्यारोप का दौर चला । दूरदर्शन के एक एंकर ने तो रामचंद्र गुहा से पूछ लिया कि क्या जब पोप का भाषण लाइव हुआ था तो उन्होंने विरोध जताया था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के भाषण से जो सवाल उठ रहे हैं वो इसलिए कि संघ हमेशा से अपने को राजनीति से अलग सांस्कृतिक संगठन मानता और बताता रहा है । संगठन का दावा होता था कि उसके प्रमुख या संगठन की सरकार में ना तो कोई भूमिका होती है और ना ही भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में दखल । लेकिन यह बीते दिनों की बात हो गई है जब इस तरह के तर्क दिए जाते थे । पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की सफलता में मोदी के करिश्मे के साथ साथ संघ के कार्यकर्तांओं की भी बड़ी भूमिका थी । संघ प्रमुख के भाषण का विरोध करनेवाले यह भूल गए हैं कि मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद मोहन भागवत का यह पहला दशहरा भाषण था । पूरे देश की नजर इस बात पर लगी हुई थी कि संघ मोदी सरकार और उसकी नीतियों के बारे में क्या राय रखता है । संघ प्रमुख के इस भाषण से ही सरकार और संघ के बीच के संबंध के सूत्र निकलते । जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी में बुजुर्ग नेताओं को ससम्मान मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर निर्णय लेने की प्रक्रिया से अलग कर दिया गया वह संघ की मर्जी के बगैर उठाया गया होगा, इस बात में संदेह था । लोग यह जानना चाहते थे कि संघ भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व के बारे में अब क्या सोचता है । इस तरह कि बातें सामने आ रही थी कि उपचुनावों के दौरान संघ ने भारतीय जनता पार्टी को अपने बूते पर चुनाव लड़ने के लिए छोड़ दिया था । नतीजे के बाद यह बात भी फैलाई जा रही थी कि हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में भी संघ के कार्यकर्ता उतने सक्रिय नहीं रहेंगे जितने कि लोकसभा चुनाव के दौरान थे । जिस तरह से अपने दशहरा भाषण में मोहन भागवत ने नरेन्द्र मोदी सरकार की तारीफ की वह यह बताने के लिए काफी था मोदी सरकार को संघ का पूरा समर्थन हासिल है । संघ प्रमुख ने साफ तौर पर कह दिया कि अपनी आशाओं और आकांक्षओं को पूरा करने का वक्त बहुत दिनों बाद आया है । उनका मतलब केंद्र में बहुमत की भारतीय जनता पार्टी सरकार से था । अपनी आशाओं और उम्मीदों को सार्वजनिक करने के बावजूद संघ प्रमुख ने साफ कर दिया था कि केंद्र सरकार के हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है कि सबकुछ पलक झपकते ही हासिल हो जाए । यह प्रधानमंत्री को संघ की तरफ से उनके कार्यों का समर्थन था । दूरदर्शन की आलोचना करनेवालों को यह सोचना चाहिए था कि क्या ये खबर नहीं है और अगर ये खबर नहीं था तो कई अन्य निजी न्यूज चैनलों ने संघ प्रमुख के भाषण को लाइव क्यों दिखाया । क्या करदाताओं के फैसले से चलनेवाले इस सरकारीन्यूज चैनल को खबरों के बारे में पैसला लेने का हक नहीं है । बिल्कुल है । लेकिन सवाल यही है कि खबरों के बारे में फैसला ये संगठन सरकार को देखकर लेता है । संघ प्रमुख के इस बार के दशहरा भाषण का भी उतना ही महत्व था जितना कि पिछले साल के भाषण का था । पिछले साल भी जब पूरे देश में भ्रष्टाचार का घटाटोप अंधेरा था और महंगाई और सांप्रदायिक उन्माद अपने चरम पर था तब संघ प्रमुख के विचार जानने की जिज्ञासा ज्यादा थी। लेकिन उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी और दूरदर्शन हर बड़े फैसले के लिए सरकार का मुंह जोहती रही है । इस बार के फैसले के पीछे भी सरकारी आकाओं को खुश करने की मंशा अधिक खबर दिखाने की मंशा कम थी । रही सही कसर सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दूरदरर्शन का बचाव करके कर दिया । अगर दूरदर्शन स्वायत्त है और उसपर सरकारी नियंत्रण नहीं है तो फिर सरकार के मंत्री उसके फैसलों का बचाव क्यों कर रहे हैं ।
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के भाषण के लाइव प्रसारण पर सवाल खड़े करनेवालों को अपने गिरेबां में झांकना चाहिए । दूरदर्शन के इस हाल के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं वही अब सवाल खड़े कर रहे हैं । दूरदर्शन के सरकारी दुरुपयोग को याद दिलाने के लिए हमें राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में चलना पड़ेगा । राजीव गांधी के वक्त दूरदर्शन को राजीव दर्शन कहा गया था तब कांग्रेस के लोगों को दूरदर्शन बहुत सुहाता था । राजीव गांधी के बाद के दौर की सरकारो ने भी दूरदर्शन को कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने दिया । अंग्रेजी में एक कहावत है कि टू ब्लैक डोंट मेक अ व्हाइट । इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने जो गलत काम किया उसके आधार पर बाद की सरकारों को उस गलत काम को करने की छूट मिल जाती है । हां इतना अवश्य है कि जिन लोगों ने दूरदर्शन का जमकर बेजा इस्तेमाल किया उनके पास दूसरों की आलोचना का नैतिक आधार नहीं है । वैसे राजनेताओं से नैतिकता की अपेक्षा बेमानी ही है ।
दूरदर्शन और आकाशवाणी के सरकारी दुरुपयोग के खिलाफ लंबे समय से बातें हो रही थी । उन्नीस सौ नब्बे में प्रसार भारती एक्ट बना भी । सरकार ने उस एक्ट को 15 सितंबर उन्नीस सौ सत्तानवे को नोटिफाई किया गया और उसी साल तेइस नवंबर से प्रासर भारती अस्तित्व में आया । माना यह गया कि प्रसार भारती के गठन के बाद दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो सरकारी शिकंजे से मुक्त होकर स्वायत्त हो जाएगा । लेकिन ऐसा हो नहीं सका । सभी सरकारों ने अपने मनमाफिक और अपने में आस्था रखनेवालों को प्रसार भारती की कमान सौंपी । नतीजा यह हुआ कि प्रसार भारती के अस्तित्व में रहते हुए भी दूरदर्शन और आकाशवाणी सरकारी कब्जे से मुक्त नहीं हो पाए । मुझे याद है कि जब राजेन्द्र यादव को प्रसार भारती का सदस्य बनाया गया था तो उन्होंने उसकी स्वायत्ता का सवाल उठाते हुए ही वहां से इस्तीफा दे दिया था। प्रसार भारती के चेयरमैन और उसके सदस्यों और सीईओ के बीच भी विवादों का लंबा इतिहास रहा है । प्रासर भारती में भ्रष्टाचार की भी खबरें आती रही हैं । सरकार या यों कहें कि करदाताओं का इतना पैसा दूरदर्शन पर खर्च होता है लेकिन उसकी जवाबदेही किसी की भी नहीं बनती है । सरकारें आती जाती हैं लेकिन दूरदर्शन का सभी सरकारें अपने हक में इस्तेमाल करती रही हैं । लोकसभा चुनाव के पहले बड़े ही तामझाम से दूरदर्शन में बड़े बड़े एंकरों और पत्रकारों को रखा गया था लेकिन तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री से मतभेद के चलते सारा तामझाम धरा का धरा रह गया था । अब भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में आई है और सरकार के गठन के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दूरदर्शन में ही भरोसा भी जताया है । प्रधानमंत्री ने जनता से संवाद करने के लिए आकाशवाणी को भी चुना है । अपने तमाम कार्यक्रमों और दौरों में वो सिर्फ ऑफिसियल मीडिया यानि दूरदर्शन और आकाशवाणी को ही अपने साथ रखते हैं, विदेशी दौरों में भी । ऐसे में इस बात की अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि दूरदर्शन को स्वायत्ता हासिल होगी । इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह भी तय किया है कि अपनी विचारधारा को लेकर बैकफुट पर जाने की जरूरत नहीं है । राष्ट्रवाद की उनकी अवधारणा को जनता के बीच आक्रामकता के साथ पेश करने का फैसला हुआ है । बहुत संभव है कि दूरदर्शन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के भाषण का लाइव प्रसारण इसी आक्रामक योजना का हिस्सा हो । जो भी हो लेकिन दूरदर्शऩ को सरकारी शिकंजे से मुक्त करने के लिए जरूरी है कि उसको प्रोफेशनली चलाया जाए ।

Tuesday, June 11, 2013

मोदी की चुनौतियां


भारतीय जनता पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफे की पेशकश और संसदीय बोर्ड के उसके ठुकराए जाने के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ा है । गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आडवाणी गुट के तमाम नेताओं के बहिष्कार के बावजूद मोदी की राजनीति ने पार्टी को अपने पक्ष में खड़ा होने को मजबूर कर दिया। दो दिन की मशक्कत के बाद जब मोदी को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति की कमान सौंपी गई थी तो किसी को अंदेशा नहीं था कि आडवाणी अपने इस्तीफे का फच्चर फंसा सकते हैं । इस्तीफे के बाद के हालात में संघ बहुत मजबूती के साथ मोदी के पीछे खड़ा है और पार्टी के ज्यादातर नेताओं का समर्थन भी । हलांकि 2002 में गुजरात दंगों के बाद गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी के सामने सवालों का पहाड़ था। कहा जाता है कि उनपर अपने पद से इस्तीफे का भयानक दबाव था । अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि मोदी का इस्तीफा हो लेकिन तब आडवाणी उनके पक्ष में थे । ग्यारह साल बाद उसी गोवा से ही वो विजेता के तौर पर उभरे । इऩ ग्यारह सालों में नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में अपनी छवि विकास पुरुष और मजबूत और निर्णायक नेता की बनाने में कामयाबी हासिल की । अब अपनी ही पार्टी में उन्हें सर्वस्वीकार्यता की जांग लड़नी पड़ रही है । आडवाणी के इस्तीफे को दरकिनार कर भले ही बीजेपी ने मोदी को अपना चेहरा बनाना तय कर लिया है लेकिन आडवाणी को इतनी आसानी से हाशिए पर नहीं डाला जा सकता है । सुषमा स्वराज ने भी कार्यकारिणी की बैठक के बाद की रैली में शामिल नहीं होकर अपनी नाराजगी उजागर कर दी उससे भी आने वाले दिनों के संकेत मिले हैं । पार्टी के कई नेता ओखुलकर आडवाणी के पक्ष में नहीं आ रहे हैं लेकिन खामोश विरोधियों को जोड़ाने की चुनौती मोदी के सामने है । घोषित तौर तो यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, शत्रुध्न सिन्हा, बीसी खंडूरी और भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी सांकेतिक नाराजगी जता ही दी है । इसके अलावा राजनाथ सिंह की खुद के पक्ष की परोक्ष राजनीति से निबटना भी मोदी के लिए आसान नहीं होगा ।  
नरेन्द्र मोदी के भारतीय जनता पार्टी के केंद्र में आने से देश की राजनीति में जबरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है । मोदी की छवि एक कट्टर हिंदूवादी नेता की है।  इस ध्रुवीकरण का असर आगामी चुनावों पर साफ तौर पर देखने को मिलेगा । विरोधियों का दावा है कि दंगों के ग्यारह साल बाद  मोदी ने एक बार भी उसपर अफसोस तक नहीं जताया है, माफी की बात तो दूर । मोदी इसे अपनी ताकत समझते हैं लेकिन  अब जबकि वो गुजरात के बाहर की राजनीति करेंगे तो यह उनकी कमजोरी बनेगी या शक्ति देखना होगा। पश्चिम बंगाल, बिहार. उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश जहां अकलियत की बड़ी आबादी है जो लोकसभा चुनाव में सीटों के नतीजों को तय करते हैं । इस ध्रुवीकरण का 2104 के चुनाव परिणाम पर क्या असर होगा। अभी देश में यूपीए के खिलाफ जो वातावरण बना है उसमें भ्रष्टाचार और महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है लेकिन मोदी के आने के बाद बहुत संभव है कि ये मु्ददे सेक्युलरिज्म के सामने गौण हो जाएं । अपनी तमाम नाकामी छुपाने के लिए कांग्रेस भी यही चाहेगी कि चुनाव धर्मनिरपेक्षता के आधार पर लड़ा जाएगा । अगर ऐसा हो जाता है तो विकास पुरुष की जो छवि मोदी ने पिछले एक दशक में श्रमपूर्वक बनाई है उसके सामने चुनौती बढ़ जाएगी।    
अपनी पार्टी में अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने के अलावा मोदी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के लिए एनडीए का दायरा बढा़ना होगा । 2004 के बाद से लगातार एनडीए का कुनबा बिखरता जा रहा है । सहयोगी दल एक एक कर गठबंधन से अलग होते चले गए । फिलहाल एनडीए में मोटे तौर पर शिवसेना, अकाली दल और जेडीयू ही बीजेपी के साथ हैं । उसमें भी जेडीयू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई बार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मोदी की रहनुमाई को लेकर अपना कड़ा विरोध प्रकट कर चुके हैं । आडवाणी के इस्तीफे के बाद शिवसेना ने भी साफ कर दिया है कि आडवाणी के जाने से एनडीए का नेतृत्व फीका पड़ेगा । इन दोनों को एनडीएण में बनाए रखने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है । इसके अलावा ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे पुराने साथियों की वापसी के फिलहाल तो कोई संकेत नहीं है । मोदी को अपने पुराने साथियों को अपने साथ बनाए रखने के अलावा नए साथियों की तलाश भी करनी होगी । साथियों के अलावा मोदी को पार्टी के खिसकते जनाधार को रोकने और उसको बढ़ाने की भी बड़ी चुनौती है । सालभर के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक में सत्ता गंवाई है। मोदी को इन राज्यों में बीजेपी की जमीन वापस दिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा । पार्टी के क्षत्रपों को अपने पाले में लाकर पार्टी को मजबूत करना होगा ।
मोदी-मोदी और नमो-नमो के कोलाहल के बीच बीजेपी यह भूल गई है कि बिंध्य के पार और पू्र्वोतर राज्यों में पार्टी अपनी पहचान बनाने का संघर्ष कर रही है।  अगर हम लोकसभा सीटों के आधार पर देखें तो आंध्र प्रदेश की 42, पश्चिम बंगाल की 42, तमिलनाडु की 39, उड़ीसा की 21 और केरल की 20 और हरियाणा की 10 यानि कुल 174 सीटों में से बीजेपी की उपस्थिति शून्य है । इसके अलावा असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी पार्टी सिर्फ नाम के लिए मौजूद है । अगर हम गौर करें तो देश के तीन अन्य बड़े राज्य मध्य प्रदेश की 29, कर्नाटक की 28 और झारखंड की 14 सीटों के योग 71 में से बीजेपी को 43 सीटें मिली थी तो क्या मोदी इससे ज्यादा सीटें दिलवा पाएंगे । इसके अलावा बिहार में पार्टी नीतीश की बैसाखी के सहारे चल रही है । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बहुत ही निराशाजनक रहा है । ये सब बेहद अहम और बड़े सवाल हैं । तीन बार केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हो चुकी बीजेपी को अब तक लोकसभा में बहुमत मिलना तो दूर की बात पार्टी दो सौ सीटों से उपर नहीं जा पाई है । 2009 में तो बीजेपी के हिस्से में महज़ 116 सीटें आईं थी जबकि बहुमत के लिए 272 का आंकड़ा चाहिए । इन आंकड़ों के विश्लेषण से नरेन्द्र मोदी की राह बहुत आसान नहीं लगती । उनके पास तकरीबन सालभर का वक्त है और चुनौतियां बहुत ज्यादा है । सूबे की राजनीति और देश की राजनीति अलग होती है । अगर इन चुनौतियों से निबटने में मोदी कामयाब हो जाते हैं तो वो इतिहास पुरुष बन जाएंगे और अगर नाकाम होते हैं तो इतिहास के पन्नों में खो जाने का बड़ा खतरा उनके सामने है ।