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Saturday, April 26, 2025

सीन के बाद रील आधारित लेखन


पिछले सप्ताह कुछ मित्रों के साथ हिंदी में प्रकाशित नई पुस्तकों पर चर्चा हो रही थी। हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य भी इस चर्चा में आया। साहित्य में जिस तरह का लेखन हो रहा है उसको लेकर एक दो मित्रों की राय नकारात्मक थी। चर्चा में ये बात भी आई कि औसत या खराब तो हर काल में लिखा जाता रहा है। जो रचना अच्छी या स्तरीय होती है वो लंबे समय तक पाठकों की पसंद बनी रहती है। इसी चर्चा में एक दिलचस्प बात निकलकर आई। वो ये कि इन दिनों हिंदी के कई प्रकाशक उन्हीं विषयों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिन विषयों पर बहुतायत में रील्स इंस्टा या एक्स पर प्रसारित हो रहे हैं। इसके लिए प्रकाशक किसी भी भाषा में लिखी पुस्तक के अधिकार खरीदकर उसको हिंदी में प्रकाशित भी कर रहे हैं। आज रील्स की दुनिया में सफल बनने के नुस्खे, पैसे कमाने की विधि, जल्द से जल्द अमीर कैसे बनें, करियर में बेहतर कैसे करें, नौकरी कैसे मिलेगी, शेयर बाजार में निवेश से कैसे बनें करोड़पति, भगवान की aपूजा कैसे करें, किस भगवान की पूजा किस दिन करने से प्रभु प्रसन्न होते हैं आदि आदि विषय पर काफी कंटेंट है। सफलता कैसे प्राप्त करें, नौकरी में कैसे व्यवहार करें, टाइम मैनेजमेंट, शेयर बाजार में निवेश पर दर्जनों किताब हाल के दिनों में मेरी नजर से गुजरी है। एक और विषय इन दिनों हिंदी के प्रकाशकों को लुभा रहा है वो है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस( एआई) यानि कृत्रिम बुद्धिमत्ता। इस वुषय पर भी हिंदी में कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं लेकिन अभी इन पुस्तकों को स्तर प्राप्त करना शेष है। इस विषय की अधिकतर पुस्तकें गूगल बाबा की कृपा से प्रकाशित हुई हैं। 

चर्चा में ही एक बात और निकल कर आई कि इन दिनों कई प्रकाशक नए लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित करने के पहले  जानना चाहते हैं कि उनके इंस्टाग्राम और एक्स या फेसबुक पर कितने फालोवर हैं। पुस्तक प्रकाशन की शर्त पहले बेहतर कृति होती थी लेकिन समय बदला और पुस्तक प्रकाशन के मानक और निर्णय के कारक भी बदलने लगे। इस शताब्दी के आरंभिक वर्षों तक इंटरनेट मीडिया का चलन इतना अधिक नहीं था। डाटा की उपलब्धता भी कम थी। इंटरनेट का देश में घनत्व कम था और डाटा इतना सस्ता भी नहीं था। जैसे जैसे कम मूल्य पर डाटा की उपलब्धता बढ़ी तो लोग इंटरनेट मीडिया का उपयोग करने लगे। 2009 के आसपास फेसबुक और ट्विटर (अब एक्स) पर लोग जुड़ने लगे थे। ये जुड़ाव समय के साथ बढ़ता चला गया। याद है कि 2014-15 के आसपास मेरे कई मित्र कहा करते थे कि फेसबुक समय बर्बादी की जगह है। वे इस माध्यम पर कभी नहीं आएंगे। उन्हीं मित्रों के फेसबुक अकाउंट की हरी बत्ती दिनभर जली देखकर मजा आता है। अब तो अधिकतर साहित्यिक बहसें फेसबुक पर ही होती हैं, कई बार सकारात्मक और बहुधा नकारात्मक। साहित्यकारों के कुंठा प्रदर्शन का भी सार्वजनिक मंच बन गया है फेसबुक। पहलगाम में हिंदुओं के नरसंहार पर कई साहित्यकारों ने ना केवल अपनी अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन किया बल्कि अपनी विचारधारा के पोषण की वफादारी में अपनी जगहंसाई भी करवाई। खैर ये अवांतर प्रसंग है जिसकी चर्चा फिर कभी। 

हम बात कर रहे थे रील प्रेरित लेखन की। दरअसल हुआ ये है कि रील्स की विषयों की लोकप्रियता को देखते हुए कुछ प्रकाशकों ने पुस्तक प्रकाशन में भी उसका प्रयोग किया। पटना और दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेला के अनुभव ये बताते हैं कि युवा पाठक इस तरह की पुस्तकों की ओर आकर्षित हुए। अब भी हो रहे हैं। एक बात तो तय माननी चाहिए कि हिंदी के प्रकाशकों को अगर लाभ नहीं होगा तो वो बहुत दिनों तक किसी भी ट्रेंड को लेकर नहीं चलेंगे। ये कारोबार का आधार भी है। हिंदी में कविता के पाठक कम होने आरंभ हुए तो प्रकाशकों ने कविता संग्रह का प्रकाशन लगभग बंद कर दिया। कुछ दिनों पहले नई वाली हिंदी के कई लेखक आए थे। उनकी पुस्तकें खूब बिकीं । दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की सूची में कईयों को स्थान मिला, अब भी मिल रहा है। नई वाली हिंदी का परचम लेकर चलनेवाले लेखकों में से सत्य व्यास और नीलोत्पल मृणाल के अलावा कम ही लेखकों के यहां विषयों कि विविधता दिखती है। 

सत्य व्यास ने अपने उपन्यासों में लिखने की प्रविधि में बदलाव किया। कथा के प्रवाह के साथ नहीं बहे बल्कि इन्होंने शिल्प में बदलाव किया। सत्य ने अपने उपन्यासों में सीन लिखना आरंभ किया। लंबे लंबे सीन जिसका उपयोग या तो फिल्म में या फिर वेब सीरीज में किया जा सकता हो। सत्य के एक उपन्यास पर बेव सीरीज भी बनी, एकाध पर और बनने की खबर है। सत्य की सफलता से उत्साहित होकर कई नए लेखकों ने अपनी कहानियों के शिल्प में बदलाव करके सीन को अपनाया। छोटी कहानियां और छोटो उपन्यासों में सीन लेखन आसान भी है। अगर आप 600 पन्ने का कोई उपन्यास लिखेंगे तो आपको सीन की निरंतरता को बरकार रखने में पसीने छूट जाएंगे। क्रमभंग का खतरा भी उपस्थित हो सकता है। इस कारण से भी उपन्यास 150-200 पृष्ठों के आने लगे। इसको पाठकों ने भी पसंद किया। पुरानी प्रविधि से लिखे जा रहे कथा साहित्य को अपेक्षाकृत कम पाठक मिल रहे हैं। पहले इस तरह के सीन लिखने का प्रयोग सुरेन्द्र मोहन पाठक से लेकर वेद प्रकाश शर्मा, और इस जानर के ही अन्य उपन्यासकार करते थे। उन सबकी लोकप्रियता का एक कारण ये भी था। 

अब हिंदी के पाठक सीन को तो पसंद कर ही रहे हैं लेकिन सीन के बाद अब रील वाले विषयों को भी पसंद करने लगे हैं। हिंदी लेखन में आए इस बदलाव को या इस नए ट्रेंड को समझना आवश्यक है। आज के इस भौतिकवादी युग में हर कोई सफल और अमीर बनना चाहता है। इंटरनेट और मीडिया के प्रसार ने भारत की अधिकांश जनता को भैतिक सुख सुविधाओं से परिचित करवा दिया। हमारे देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, साक्षरता भी। जाहिर है सपने भी बड़े होते जा रहे हैं। इन सपनों और आकांक्षाओं को पुरानी प्रविधि से लेखन करनेवाले पकड़ नहीं पा रहे हैं। वे अब भी खेत-खलिहान, गरीब-अमीर, शोषण-शोषित, जात-पात जैसे विषयों में उलझे हैं। हमारा समाज काफी आगे बढ़ गया है। जो युवा लेखक नए विषयों को लेकर आगे बढ़े और कहानी का ट्रीटमेंट अलग तरीके से किया उनकी  पुस्तकें बिक रही हैं। प्रकाशक भी उनको छापने के लिए पलक पांवड़े बिछाए हैं। इस बात का सामने आना शेष है कि जिन लेखकों के फेसबुक या इंस्टाग्राम के फालोवर्स अधिक हैं उनकी पुस्तकें उसी अनुपात में बिक पाती हैं या नहीं। बिकने की बात हिंदी में जरा मुश्किल से पता चलती हैं। पर इतना तय है कि जिनके इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर फालोवर्स की संख्या अधिक है उनको अपनी पुस्तकों के प्रचार प्रसार में सहूलियत होती है। अगर ढंग से प्रचार हो जाए तो पुस्तकों के बारे में आनलाइन और आफलाइन प्लेटफार्म पर एक प्रकार की जिज्ञासा देखी जाती है। कई बार ये जिज्ञासा बिक्री तक पहुंचती है। 


Saturday, March 11, 2023

युवाओं में पुस्तकों का आकर्षण कायम


हाल ही में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला समाप्त हुआ। पुस्तक मेला में युवाओं की उमड़ी भीड़ आश्वस्तिकारक है। यह उस दुष्प्रचार का भी निषेध करती है कि युवा पुस्तकों से विमुख हो रहे हैं। वो आनलाइन माध्यम को अधिक पसंद कर रहे हैं। वो किंडल और ई बुक में अपेक्षाकृत अधिक रुचि ले रहे हैं।कोरोना महामारी के कारण दो वर्ष तक विश्व पुस्तक मेला का आयोजन नहीं हो सका था। इस वर्ष जब पुस्तक मेला का आयोजन हुआ तो दिल्ली के प्रगति मैदान के गेट के बाहर पुस्तक प्रेमियों की लंबी कतार इस बात की गवाही दे रही थी कि पुस्तकों के पाठक हैं। यह ठीक है कि तकनीक ने पाठकों के सामने कई विकल्प दिए हैं। लेकिन छपे हुए शब्दों की महत्ता और पुस्तक को हाथ में लेकर पढने का रोमांच कम नहीं हुआ है। हिंदी के कई प्रकाशकों की तरफ से ये कहा जाता है कि हिंदी में पुस्तकें नहीं बिकतीं, हिंदी में पाठक कम हो रहे हैं। पुस्तक मेलों में पाठकों की संख्या और बिक्री के अनुमानित आंकडें कुछ अलग ही कहानी कहती हैं। अगर पुस्तकें नहीं बिकती हैं तो इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन क्यों और किसके लिए होता है। निरंतर नए नए प्रकाशन गृह क्यों खुल रहे हैं। पुराने प्रकाशन गृहों के अलग अलग प्रकल्प पुस्तकों का प्रकाशन क्यों करते हैं। स्वाधीनता के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक चार सौ से अधिक प्रकाशक साहित्यिक कृतियां छाप रहे हैं। प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यिक किताबें छपती हैं। क्या साहित्य सेवा के लिए पुस्तकों का प्रकाशन होता है। अगर पुस्तक प्रकाशन व्यवसाय में घाटा हो रहा है तो नए प्रकाशन गृह कैसे विकसित हो रहे हैं। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका उत्तर हिंदी का लेखक खोजना भी नहीं चाहता है।  

दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में तमाम बाधाओं के बीच पुस्तक प्रेमियों का पहुंचना कुछ तो संकेत कर रहा है। मैं पुस्तक मेले में गया था। प्रगति मैदान के गेट नंबर चार पर बहुत लंबी कतार लगी हुई थी। तीन-चार युवक बार-बार आनलाइन पेमेंट करके प्रवेश टिकट खरीदने का प्रयास कर रहे थे। दो बार जब उनका ट्रांजेक्शन फेल हो गया।उन्होंने गेट पर खड़े गार्ड से अपनी समस्या बताई। उनको अपना मोबाइल दिखाकर टिकट खरीद में आने की समस्या बताई। गार्ड ने उनके मोबाइल को देखा और कहा कि अंदर जाओ। दूसरे गार्ड ने उन लड़कों को रोकने का प्रयास किया तो पहले वाले गार्ड ने कहा कि जाने दो यार किताब ही तो खरीदने जा रहा है, कोई सर्कस देखने तो नहीं जा रहा है। यह है पुस्तकों के लिए हमारे मन में प्यार। उसके बाद उस गार्ड ने कई अन्य लड़कों को भी बगैर प्रवेश टिकट प्रगति मैदान में प्रवेश की अनुमति दी। मेला के अंदर हाल में तिल रखने की जगह नहीं थी। लगभग सभी प्रकाशकों के स्टाल पर पुस्तक प्रेमी पुस्तकें पलट रहे थे, खरीद रहे थे। हिंदी के बड़े प्रकाशकों के स्टाल पर स्थिति बेहतर थी। उनके यहां बिलिंग काउंटर पर ग्राहकों की कतार लगी थी। बिल बनानेवाले कम पड़ रहे थे। इंटरनेट नहीं चल पाने या धीमा चलने की वजह से आनलाइन पेमेंट में दिक्कत आ रही थी। ग्राहक धैर्यपूर्वक बिलिंग की प्रतीक्षा कर रहे थे। मेले में हर दिन दर्जनों पुस्तकों का विमोचन हो रहा था। इंटरनेट मीडिया पर इन विमोचन कार्यक्रमों की तस्वीरें प्रचलित हो रही थीं। अगर पाठक नहीं हैं तो ये पुस्तकें किनके लिए प्रकाशित हो रही हैं। 

गीता प्रेस के स्टाल पर तो हर वर्ष खरीदारों की भीड़ रहती ही है इस वर्ष भी उनके स्टाल पर जमकर खरीदारी हो रही थी। गीता प्रेस के स्टाल के एक कर्मचारी ने बताया कि इस वर्ष सबसे अधिक बिक्री श्रीरामचरितमानस और कल्याण के पुराने अंकों की हुई, जो अब पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अंग्रेजी के हाल में जो स्टाल थे उनपर भी बहुत भीड़ थी। पेंगुइन प्रकाशन पर तो कई कई बार पाठकों के प्रवेश को रोकना पड़ रहा था। उनके स्टाल के बाहर लंबी कतार लगी हुई थी। जब स्टाल के अंदर गए पाठक पुस्तक खरीदकर बाहर निकलते थे तब बाहर खड़े लोगों को अंदर जाने दिया जा रहा था। यह दृष्य संतोष देनेवाला था। आनलाइन प्लेटफार्म पर पुस्तकें बेचनेवाली कंपनियों के प्रतिनिधि भी मेले में घूम रहे थे। वो ये समझने का प्रयास कर रहे थे कि इतनी बड़ी संख्या में पाठक मेले में पुस्तकें क्यों खरीद रहे हैं, जबकि उनके प्लाटफार्म पर तो पुस्तकों की खरीद पर काफी छूट भी मिलती है। घर पर डिलीवरी का भी प्रविधान होता है। दरअसल पुस्तक मेलों में पाठकों को पुस्तकें तो मिलती ही हैं उनके लेखकों से मिलने का अवसर भी प्राप्त होता है। लेखकों से बात करने और उनकी रचना प्रक्रिया को सुनने समझने का अवसर भी मिलता है। यह सुविधा आनलाइन पुस्तक खरीद में नहीं होती है, छूट भले ही मिल जाए। 

एक और महत्वपूर्ण बात है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए, हिंदी समाज में अब भी पुस्तकों की भूख है। जरूरत इस बात की है कि पाठकों तक पुस्तकों को पहुंचाने का उपक्रम किया जाए। पुस्तकों को लेकर पाठकों तक पहुंचने का उपक्रम प्रकाशकों ने सामूहिक रूप से कभी किया नहीं। सभी प्रकाशकों को चाहिए कि वो साथ मिलकर पाठकों तक पुस्तकें पहुंचाने का एक तंत्र विकसित करें। अधिक से अधिक पुस्तकों की दुकानें खोलने का प्रयास किया जाना चाहिए। अभी हो ये रहा है कि कई प्रकाशक अलग अलग शहरों में अपनी पुस्तकों की दुकानें खोलते हैं। उनमें दूसरे प्रकाशकों की पुस्तकें नहीं रखते हैं। उनके बीच इस तरह का समन्वय होना चाहिए कि अगर एक प्राकशक ने एक शहर में पुस्तक विक्रय केंद्र खोला तो उसको सभी प्रकाशकों की पुस्तकें रखनी चाहिए। इससे उनकी लागत भी कम होगी और पाठकों को एक ही स्थान पर सभी पुस्तकें मिल जाएंगी। इसमें ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता होगी। 

ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता तो प्रकाशकों को लेखकों के साथ के संबंध में भी दिखाना चाहिए। आज कोई भी पुस्तक कितनी बिकी इसको जांचने का कोई तंत्र कम से कम हिंदी प्रकाशन जगत में तो उपलब्ध नहीं है। प्रकाशक जितना बता देता है उसपर ही विश्वास करना पड़ता है। अविश्वास की कोई वजह होनी भी नहीं चाहिए। संदेह तब पैदा होता है जब ये देखा जाता है कि अंग्रेजी के प्रकाशक कोई हिंदी की पुस्तक प्रकाशित करते हैं तो उनके यहां से वो पुस्तकें अपेक्षाकृत अधिक बिकती हैं । इस संदेह का निवारण होना पुस्तक व्यवसाय के लिए काफी आवश्यक है। पारदर्शिता और ईमानदारी के लिए किसी सरकार या सरकारी एजेंसी की आवश्यकता भी नहीं है, आवश्यक है परस्पर विश्वास की। हिंदी में पुस्तकों के संस्करणों को लेकर भी पारदर्शी व्यवस्था नहीं है। कई पुस्तकें बगैर दूसरे संस्करण के प्रकाशित होकर बाजार में बिकती रहती हैं। इसका पता तब चलता है जब एक ही संस्करण की प्रतियां अलग अलग प्रेस से छपकर बाजार में पहुंचती हैं। कई बार लेखक इस बात को प्रकाशक के संज्ञान में लेकर आता भी तो उसको इसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता है। मैं हिंदी के कुछ प्रकाशकों को जानता हूं कि वो कुछ लेखकों को उनके उपन्यास या पुस्तक के लिए 15-20 लाख तक का अग्रिम भुगतान भी करते हैं। अगर पुस्तकें बिकती नहीं हैं तो ये साहस प्रकाशक कैसे कर लेते हैं। ये सभी इस बात को स्थापित करते हैं कि हिंदी में पुस्तकों के पाठक हैं और ये कहना कि पाठक लगातार कम हो रहे हैं, उचित नहीं है।  

Saturday, June 25, 2016

किताबों को सहारे की जरूरत

इन दिनों देशभर में सेल का मौसम चल रहा है और हर अखबार सेल-सेल-सेल के तरह तरह के विज्ञापनों से अटा पड़ा है । विक्रेता तरह तरह से क्रेता को लुभाने में लगे हैं, कोई पचास फीसदी कम मूल्य पर तो कोई अमुक प्रोडक्ट के साथ अमुक चीज मुफ्त देना के वादे के ऑफर दिए जा रहे हैं । कपड़ों से लेकर हवाई जहाज के टिकटों तक की सेल चल रही है । इन प्रोडक्ट्स के जबरदस्त विज्ञापनों के कोलाहल के बीच एक अलग तरह के सेल की खबर दब सी गई । चौबीस पचीस जून को दो दिनों के लिए अंग्रेजी के प्रकाशक हॉर्पर कालिंस ने फरीदाबाद के अपने गोदाम में किताबों की सेल लगाई थी । इस सेल का ना तो किसी अखबार में बड़ा-बड़ा विज्ञापन दिया गया था ना ही टीवी पर, लेकिन खरीदारों की भीड़ ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए । लोग सेल शुरू होने के वक्त से पहले फरीदाबाद के गोदाम के बाहर लाइन लगाकर खड़े हो गए थे । भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि प्रकाशक को गेट बंद करना पड़ा और ट्विटर पर ये जानकारी देनी पड़ी कि स्टॉक खत्म हो गए हैं । सेल लगाने वाले प्रकाशक ने दिल्ली वालों का धन्यवाद भी अदा किया । दरअसल हॉर्पर कॉलिंस ने सोशल मीडिया आदि पर एलान किया था कि दो दिनों के लिए वो अपनी किताबों की सेल लगा रहे हैं जहां कि पच्चीस रुपए से लेकर सौ रुपए तक में किताबें मिलेंगी । इसके अलावा एक दो अखबारों में सेल के बारे में छोटी सी खबर छपी थी । प्रकाशक ने पुस्तक प्रेमियों को अपने गोदाम पर आने का न्यौता दिया था, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकाशक को इस बात का अंदाज नहीं रहा होगा कि इतनी बड़ी संख्या में और इतनी भयंकर गर्मी में पुस्तक प्रेमी वहां तक पहुंच जाएंगे । खैर काफी मशक्कत के बाद कुछ लोगों को किताबें मिली तो कइयों को निराश होकर खाली हाथ वापस लौटना पड़ा । जो लोग निराश होकर लौटे उन्होंने अपनी निराशा ट्विटर के जरिए जाहिर की । हॉर्पर कॉलिंस हैशटैग के साथ ट्वीटर पर लोगों ने अपनी नाराजगी जतानी शुरू कर दी । कई लोगों ने तो लिखा कि वो सुबह से गोदाम के खुलने की प्रतीक्षा करते रहे लेकिन जब उनका नंबर आया तो प्रकाशक ने गेट बंद कर दिया । इस तरह के दर्जनों ट्वीट्स दो दिनों के दौरान देखे गए । दिल्ली के गुस्से में होने की वजह से कुछ समय के लिए हॉर्पर कॉलिंस ट्विटर पर ट्रेंड भी करने लगा था ।
अब इस पूरी घटना से पुस्तकों की बिक्री को लेकर कई मिथक टूटते हैं । हमारे देश में खासकर हिंदी में पुस्तकों की बिक्री को लेकर प्रकाशकों और लेखकों दोनों में कोई उत्साह देखने को नहीं मिलता है । एकाध प्रकाशक को छोड़ दें तो पाठकों तक पहुंचने की योजना और उसका कार्यान्वयन दिखाई नहीं देता है । पुस्तक मेलों को छोड़ दें तो किसी भी हिंदी के प्रकाशक ने कभी पुस्तकों की सेल लगाई हो ऐसा याद नहीं पड़ता है । पुस्तकों की सेल तो एक उदाहरण है । इस तरह के कई उपक्रम किए जा सकते हैं ताकि पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाया जा सके । इसके लिए प्रकाशकों को पहल करनी चाहिए और लेखकों को उनका सहयोग और सपोर्ट दोनों करना चाहिए । हॉर्पर कालिंस की बुक सेल ने ये तो साबित कर ही दिया कि पुस्तकों की खरीद के लिए पुस्तक प्रेमी अपना वक्त और धन दोनों खर्च करने के लिए तैयार हैं बशर्ते कि किताबें कम मूल्य पर मिले और निश्चित स्थान पर उपलब्ध हों । हिंदी में किताबों की उपलब्धता सबसे बड़ी समस्या है । आज दिल्ली का ही उदाहरण लें और सर्वे करें तो हम इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि इस महानगर में दर्जन भर से ज्यादा किताबों की दुकानें नहीं होगीं । हिंदी की साहित्यक पत्रिकाएं तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय स्थित पुस्तक केंद्र पर ही मिल पाती हैं । इसी तरह से लखनऊ और पटना में भी देखें तो तीन चार ही किताबों की दुकानें मिलेंगी । कई छोटे शहरों में तो वहां के रेलवे स्टेशन पर मौजूद एच एच व्हीलर के स्टॉल ही उस शहर के साहित्यप्रेमियों का अड्डा हुआ करता है । अफसोस कि वहां भी स्टॉल मालिक के व्यक्तिगत प्रयास से साहित्यक पत्र-पत्रिकाएं तो उपलब्ध हो जाती हैं लेकिन साहित्यक कृतियां मसलन कहानी संग्रह और उपन्यास आदि तो नहीं ही मिल पाती हैं ।
हिंदी पट्टी में आयोजित होनेवाले पुस्तक मेलों में उमड़ी भीड़ भी हमेशा ये संदेश देती है कि किताबों के पाठक हैं । उनको सहजता से उपलब्ध करवाने की जरूरत है । इस साल नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में हिंदी के हॉल के बाहर पुस्तक प्रेमी कतार लगाकर किताबें खरीदने के लिए जा रहे थे । इसी तरह से पटना और लखनऊ के पुस्तक मेलों में भी पाठकों की उमड़ी भीड़ बेहद उत्साहजनक संकेत देते हैं । अब तो छोटे-छोटे शहरों में पुस्तक मेले लगने लगे हैं और आयोजकों समेत प्रकाशकों की उसमें हिस्सेदारी होती है । मैं यह नहीं कह सकता हूं कि प्रकाशकों को इन छोटे पुस्तक मेलों में मुनाफा होता है या नहीं लेकिन उनकी लगातार उपस्थिति से इतना तो कहा जा सकता है कि प्रकाशकों को घाटा नहीं होता है । तो फिर क्यों नहीं इस काम को सुनियोजित तरीके से किया जाता है । प्रकाशकों के कई संगठन हैं उनको इस काम में आगे आना चाहिए लेकिन प्रकाशकों के संगठनों का हाल भी लेखक संगठनों से बेहतर नहीं है । सबके अपने अपने राम हैं ।

इसी तरह से नेशनल बुक ट्रस्ट पर भी देशभर में पुस्तक संस्कृति को विकसित करने और परोक्ष रूप से किताबों को उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी है । इस बात का आंकलन किया जाना चाहिए कि क्या नेशनल बुक ट्रस्ट अपनीइन जिम्मेदारियों को निभा पा रही है । अभी पिछले साल तो एक ऐसा उदाहरण देखने को मिला जिसमें नेशनल बुक ट्रस्ट पटना पुस्तक मेले के आयोजकों से होड़ लेता नजर आया । दशकों से पटना पुस्तक मेला आयोजित होता है और तमाम झंझावातों को झेलते हुए उसने बिहार और देश के साहित्यक कैलेंडर में अपना स्थान बनाया । पटना पुस्तक मेले के आयोजन के ठीक पहले नेशनल बुक ट्रस्ट ने भी पटना के गांधी मैदान में ही पुस्तक मेला आयोजित कर दिया । ट्रस्ट की मंशा का तो पता नहीं लेकिन एक ही वक्त और एक ही स्थान पर आयोजित होने से पाठकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी रहती है । नेशनल बुक ट्रस्ट को देश के उन हिस्सों में पुस्तक मेले आयोजित करने चाहिए जहां तक पहुंचना मुश्किल हैं । हवाई रूट से जुड़े शहरों में नेशनल बुक ट्रस्ट के मेलों में उनके अफसरों को जाने में सहूलियतें होती हैं लेकिन इससे पुस्तक संस्कृति का अपेक्षित विस्तार हो पाता है, इसमें संदेह है । नेशनल बुक ट्रस्ट को किताबों को छापने से ज्यादा ध्यान किताबों की उपलब्धता पर लगाना चाहिए । उनको प्रकाशकों के साथ साझेदारी कर किताबें छपवानी चाहिए और मूल्य और गुणवत्ता निर्धारण के मानदंड तैयार करना चाहिए । जैसे ही वो किताबें छापते हैं तो वो अन्य प्रकाशकों से होड़ लेने लगते हैं । ट्रस्ट के पास चूंकि सरकारी पैसा है लिहाजा वो प्रकाशकों की निजी पूंजी पर भारी पड़ते हैं और परोक्ष रूप से पुस्तक संस्कृति के विकास को नुकसान पहुंचाते हैं । इसी तरह से साहित्य अकादमी को भी किताबों के प्रकाशन पर अपनी ऊर्जा और धन खर्च करने से ज्यादा जरूरी है कि वो किताबों के प्रचार प्रसार के लिए काम करे । बेहतर लेखकों का चयन करे और उनकी किताबों को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध करवाने के लिए प्रकाशकों के साथ साझेदारी करे । स्तरीय अनुवाद करवाकर प्रकाशकों को उपलब्ध करवाए । जब वो खुद इस काम में लगते हैं तो देर भी होती है जैसे भारत भारद्वाज ने डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स का अकादमी के लिए अनुवाद किया था लेकिन उसका प्रकाशन छह सात साल बाद हो पाया । यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुई लेकिन संभव है कि ऐसे ढेरों उदाहरण मौजूद हों । सरकारी पूंजी से किताबों का प्रकाशन करने वाली संस्थाओं को लागत की फिक्र नहीं होती है । इस तरह की अड़चनों की अगर चूलें कस दी जाएं तो पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ सकती है और पाठकों की मौजूदगी से इस इंडस्ट्री को मुनाफा हो सकता है । किसी भी सेक्टर के विकास के उसमें मुनाफा होना आवश्यक है । इसके अलावा अगर लेखक भी अपनी किताब की उपलब्धता को लेकर प्रकाशक के कंधे से कंधा मिलाकर काम करें तो स्थिति और बेहतर हो सकती है । सामूहिक प्रयास से ही बेहतर पुस्तक संस्कृति का विकास संभव है । 

Sunday, May 29, 2016

प्रकाशन जगत में पारदर्शिता कब ?

पिछले दिनों युवा कथाकार पंकज सुबीर ने फेसबुक पर ये सूचना साझा कि उनके उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ का दूसरा संस्करण प्रकाशित हो गया । वो इस बात को लेकर भावुक हो रहे थे कि इस साल जनवरी में प्रकाशित उनके उपन्यास का मई आते आते यानि पांच महीने में ही दूसरा संस्करण प्रकाशित हो गया । परंतु पंकज ने अपनी उक्त सूचना में प्रथम संस्करण की प्रतियों का जिक्र नहीं किया अगर वो पहले संस्करण की बिकी हुई प्रतियों का जिक्र कर देते तो हिंदी प्रेमियों को संतोष होता । हिंदी प्रेमियों को संतोष तो इस बात से भी होगा कि पांच महीने में उपन्यास का दूसरा संस्करण छप कर आ गया । हिंदी प्रकाशन जगत में अब संस्करणों की संख्या तीन सौ से लेकर पांच सौ तक की होने लगी है । इसकी बड़ी वजह तकनीक की सहूलियत और गोदामों में रखने की जगह की किल्लत भी हो सकती है । इस लेख का विषय पंकज सुबीर के उपन्यास के संस्करणों की संख्या को विश्लेषित करना नहीं है बल्कि उसके माध्यम से इस बात पर चर्चा करना है कि हिंदी में साहित्यक कृतियों के संस्करणों की संख्या कम क्यों होती जा रही है । अगर हम कविता संग्रहों पर बात करें तो अस्सी फीसदी से ज्यादा कविता संग्रह लेखकों के खुद के प्रयास से छप रहे हैं । प्रकाशक अपना ब्रांड भर देते हैं और बाकी लेखक का होता है । कहानी और उपन्यासों की स्थिति कविता से थोड़ी बेहतर है परंतु बड़े दावे करनेवाले प्रकाशक भी इस बात को जानते हैं कि पांच संस्करण या दस संस्करण का मतलब डेढ दो हजार प्रतियां ही है । यही भी चिंता की बात है कि अंग्रेजी के जो प्रकाशक हिंदी प्रकाशन के क्षेत्र में उतरे हैं वो कविता की किताबें इतनी कम क्यों छाप रहे हैं ।  

अब एक नई तरह की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है । एक नया प्रकाशक बाजार में पांव जमाने की कोशिश कर रहा है नाम है जगरनॉट । ये पहले किताबों को ई बुक्स में सामने लाने की योजना पर अमल कर रहा है और उसके बाद उसको पुस्तक के तौर पर बाजार में पेश करेगा । पिछले दिनों इसकी शुरुआत मशहूर फिल्म अभिनेत्री सनी लियोनी की कहानियों से हुई थी । जगरनॉट हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए लेखकों से संपर्क कर रहा है । लेखकों को उनकी कृतियों के लिए अग्रिम धनराशि भी दे रहा है और मनपसंद विषय पर किताबें लिखवा भी रहा है । सनी लियोनी से शुरुआत करने वाले इस प्रकाशक की सोच है कि हल्की फुल्की किताबें प्रकाशित की जाएं । इस सोच से ये संकेत मिलता है कि ऑनलाइन पाठकों की रुचियों पर उन्होंने कोई सर्वे किया होगा जिसमें उनको पता चला होगा कि पाठक हल्के फुल्के रोमांटिक विषयों को पसंद कर रहा है लिहाजा उनका जोर इस तरह के विषयों के इर्द गिर्द ही दिखाई दे रहा है । हिंदी के कई लेखकों को भी जगरनॉट ने अग्रिम भुगतान का प्रस्ताव देकर मनसपंद विषय पर पुस्तकें लिखने का प्रस्ताव दिया है । अब यह प्रयोग कितना सफल हो पाता है यह देखनेवाली बात होगी । दरअसल हिंदी पाठकों के मन मिजाज को समझने के लिए गहन मेहनत की आवश्यकता है । हिंदी के पाठकों को याद होगा कि चंद सालों पहले रेनबो के नाम से एक प्रकाशक ने हिंदी के लेखकों को जमकर लुभाया था और कई बड़े नामों को अपने यहां से छापा था लेकिन आज रेनबो का हिंदी प्रकाशन जगत में कोई नामलेवा भी नहीं है । इसी तरह से अंग्रेजी के कुछ प्रकाशकों ने भी हिंदी में साहित्यक कृतियों को छापने का उपक्रम किया था लेकिन उनके सलाहकारों ने ऐसे ऐसे लेखकों की कृतियां छपना दीं कि वो योजना परवान नहीं चढ़ सकीं । सवाल फिर वहीं है कि हिंदी प्रकाशन जगत में पारदर्शिता के लिए क्या किया जाना चाहिए ? 

Sunday, June 5, 2011

प्रकाशकों को चुनौती

हिंदी में इस बात को लेकर हाल के दिनों में लागतार चिंता प्रकट की जा रही है कि इंटरनेट और सूचना क्रांति के विस्फोट में छपी हुई किताबों की महत्ता या यों कहें उनका वर्तमान स्वरूप खत्म हो जाएगा । इस चिंता ने हिंदी में एक नई बहस को जन्म दिया था कि क्या हिंदी से छपी हुई किताबें खत्म हो जाएंगी। इसके पक्ष और विपक्ष में कई तरह के विचार आए हैं और इसपर पत्रिकाओं, अखबारों और खुद इंटरनेट और ब्लॉग पर जोरदार बहस जारी है। लेकिन अभी अमेरिका से आई एक खबर ने हिंदी साहित्य की चिंता और बढ़ा दी है और छपी हुई किताबों के पक्ष में बात करने वालों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं और विरोधियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। इंटरनेट के जरिए किताबों का कारोबार करनेवाली कंपनी अमेजन ने ऐलान किया है कि उसकी बेवसाइट पर छपी हुई किताबों को ई बुक्स ने बिक्री के लिहाज से मात दे दी है । अमेजन के मुताबिक अगर छपी हुई सौ किताबें बिक रही हैं तो ई बुक्स एक सौ पांच की संख्या में बिक रही हैं। ई बुक्स पढ़ने की सबसे मशहूर और लोकप्रिय डिवाइस किंडल बुक्स की छपी पुस्तकों की बिक्री को पीछे छोड़ना एक ऐतिहासिक घटना के तौर पर रेखांकित की जा रही है । दरअसल चार साल पहले ही अमेजन ने अपने बेवसाइट पर किंडल के जरिए ई बुक्स की बिक्री का अनूठा प्रयोग शुरू किया था । चार महीने पहले ही किंडल एडिशन ने पेपरबैक किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया था और अब समग्रता में उसने यह सफलता हासिल की है । अमेरिकी बेवसाइट अमेजन के मुताबिक यह हालत तो तब है जबकि कई पुस्तकों के किंडल संस्करण बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हैं । अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस को भी पाठकों की रुचि में इस तरह के बदलाब की अपेक्षा तो थी पर यह इतनी जल्दी घटित हो जाएगा इसका अमुमान उन्हें नहीं था । दरअसल टेबलेट कंप्यूटर आने की वजह से लोगों के बीच ई बुक्स की लोकप्रियता काफी बढ़ी हैं और अब तो एप्पल के आई पैड की वजह से भी इसकी बिक्री को पंख लग सकते हैं ।
सवाल यह उठता है कि क्या आनेवाले दिनों में छपी हुई किताबों का भविष्य खत्म हो जाएगा । छपी किताबों का कारोबार करनेवाले प्रकाशकों पर संकट आनेवाला है। क्या अबतक कंप्यूटर पर लिखनेवाले लेखक भी ई बुक्स के ही जरिए पाठकों के बीच जाएंगे । कई उत्साही लोग तो इन सारे प्रश्नों के सकारात्मक जबाव दे रहे हैं । संभव है कि पश्चिम के विकसित देशों में यह बात आंशिक रूप से सच भी हो । आंशिक इस वजह से कि पश्चिमी देशों में सूचना के संजाल के तमाम विकास के बावजूद अब भी लाखों में किताबें बिक रही हैं । चाहे वो जोनाथन फ्रेंजन की फ्रीडम हो या टोनी ब्लेयर की आत्मकथा- अ जर्नी । इन सबने किताबों की बिक्री के पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया । अमेजन ने भले ही यह ऐलान किया है कि ई बुक्स ने किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया है लेकिन उसने बिक्री का कोई ठोस आंकड़ा पेश नहीं किया, उसने सिर्फ तुलनात्मक आंकड़ों के आधार पर ई बुक्स को ज्यादा लोकप्रिय बताया है । ना ही अमेजन ने इस बात का ऐलान किया कि बिक्री का यह आंकड़ा किस और कितनी अवधि का है । दूसरा अहम प्रश्न जो अमेजन की इस घोषणा के बाद मन में उठता है वह यह है कि अमेजन तक कितने लोगों की पहुंच है । अमेजन पर खरीद बिक्री वही लोग कर सकते हैं जिनते पास इंटरनेट हो या फिर जिन्हें इंटरनेट का एक्सेस हो । बेवसाइट के जरिए होनेवाले कारोबार में ग्राहकों की संख्या अवश्य बढ़ी है लेकिन अभी उस माध्यम के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी । जल्दबाजी इस वजह से क्योंकि यह पूरे ग्राहक वर्ग के मूड और स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है । इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि ई बुक्स बिक्री और लोकप्रियता में किताबों को पटखनी दे देगा ।
लेकिन इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव और पहुंच को लेकर कुछ लोग साहित्य पर भी संकट देखने लगे हैं । उनका तर्क है सूचना संजाल के विस्तार से साहित्य नष्ट हो जाएगा । ऐसा नहीं है कि इस तरह के तर्क देनेवाले लोग नए हैं । इस तरह के लोग हर युग और काल में पाए जाते हैं । कुछ दशक पहले भारत में जब सिनेमा काफी लोकप्रिय होने लगा और पूरे देश में आम लोगों की जुबान पर इसकी चर्चा हुई तो उसमें भी साहित्य का दुश्मन माना गया और उसके खिलाफ मुकम्मल अभियान भी चला। उसके बाद भारत में टेलीविजन का अभ्युदय हुआ तो उसमें भी साहित्य के अंत का दु:स्वपन देखा गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्यकारों की एक पूरी जमात टेलीविजन के खिलाफ खड़ी हो गई और जबरदस्त तरीके से उसको खारिज करने की कोशिश की गई । टेलीविजन कैमरा का विकास हुआ तो यथार्थवादी रचनाकारों को यह लगने लगा कि उनका भोगा हुआ यथार्थ जिन्हें वो अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के सामने लाते हैं उसे कैमरा सीधे पाठकों को दिखा देगा । उसी खतरे को भांपते हुए और बगैर माध्यम को समझे कैमरे का विरोध शुरू हो गया । लेकिन उस विरोध का कोई असर नहीं दिखा और टेलीविजन की लोकप्रियता और विस्तार इतना हुआ कि आज घर घर में टेलीविजन लगे हैं । टेलीविजन के बाद जब कंप्यूटर आया तो बकायदा उसके खिलाफ वैचारिक आंदेलन शुरू किया गया । कई कवियों ने अपनी कविता में कंप्यूटर को दानव कहते हुए उसका मजाक उड़ाया । लेकिन अब वही कवि और लेखक कंप्यूटर पर काम करते हुए अपने को सहज महसूस करते हैं । उन्हें अब ना तो उस माध्यम से कोई परहेज हैं और ना ही विरोध । दरअसल चाहे वो सिनेमा हो,टेलीविजन हो या फिर कंप्यूटर हो या फिर कोई अन्य तकनीकी या वैज्ञानिक अविष्कार, उनका मूल उद्देश्य मानव समाज की बेहतरी ही होता है। किसी भी बेहतर तकनीक का मुकाबला बेहतरीन तकनीक से ही किया जा सकता है ना कि पुरातन और समय के पीछे रह गए तकनीक से । जो लोग भी नई और बेहतर तकनीक का मुकाबला पुरानी तकनीक से करना चाहते हैं, इतिहास गवाह है कि वो हमेशा मुंह की ही खाते रहे हैं ।
किताबों के बरक्श ई बुक्स को खड़ा करनेवाले लोग चाहे अनचाहे किताबों की अंतरवस्तु को हाशिए पर धकेलते हैं।दोनों माध्यमों के बीच संघर्ष को रेखांकित करनेवाले लोग दरअसल यह भूल जाते हैं कि दोनों की अपनी अलग महत्ता है और अंतत वह महत्ता उसके अंतर्वस्तु को लेकर है उसके माध्यम को लेकर नहीं । किताबों में जो लेख, कहानी, उपन्यास या फिर कविता है, लोकप्रियता उसकी होती है । फिर चाहें वो कागज पर छपी हो या फिर वो कंप्यूटर पर मौजूद हो है तो वो रचना ही।