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Saturday, October 6, 2018

विवाद से उठते बड़े सवाल


हिंदी साहित्य को लेकर फेसबुक पर बहुधा ऐसे विवाद उठते रहते हैं जिनका लक्ष्य किसी लेखक को नीचा दिखाना होता है। फेसबुकिया विवादों से साहित्यिक सवाल कम ही उठते रहे हैं। हिंदी साहित्य में वाद-विवाद का इतिहास काफी पुराना है। अगर हम विवादों के इतिहास पर नजर डालें तो पहले के विवादों और अब के विवादों में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है। पहले रचनात्मक बहसें हुआ करती थीं। किसी खास रचना को लेकर, किसी स्थापना को लेकर विवाद हुआ करता था।  हिंदी में स्वस्थ साहित्यिक विवादों की परंपरा रही है, हलांकि उन्नीस सौ नब्बे के बाद के दौर को याद करें तो यह पाते हैं कि उस दौर में साहित्यिक विवादों का स्तर गिरने लगा था और साहित्यिक सवाल गौण होने लगे थे। व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप प्रमुख होते चले गए। उस वक्त जो प्रमुख विवाद उठे उसमें कवि उपेन्द्र कुमार की कहानी ‘झूठ का मूठ’ को लेकर उठा विवाद था। उसी दौर में ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन ने एक पुस्तिका छापी थी उसको लेकर भी खूब विवाद हुआ था। पहल पर लगे आरोपों पर ज्ञानरंजन ने जो सफाई दी थी उसकी भाषा देखिए, ‘प्रोफेसर कॉलोनी भोपाल में शराब पीकर एक रमणी के घर के पास कार भिड़ा देने की खबरें भी अखबारों में हैं, पर हमको इसको पीली पत्रकारिता का हिस्सा मानते हैं।...एक कुलपति अपार राशि सालों तक केवल पत्रिकाएं निकालने, गोष्ठियां करने, अपना व्याख्यान जगह जगह करवाने, स्वागत करने में खरच् करता रहा। अपनी साहित्यिक हवस को पूरा करने में लगाता रहा। अपने कुनबे के लोगों को यहां वहां विभिन्न प्रकार के लाभ देने में लगाता रहा, वह अपने क़लम में सार्वजनिक कोषों का प्रगतिशील वामपंथी संगठनों या पत्रिकाओं द्वारा उपयोग की बात लिखते शरमाता भी नहीं।‘ स्पष्ट है कि ये टिप्पणी अशोक वाजपेयी पर थी। जो अगले हिस्से में ज्ञानरंजन ने स्पष्ट भी कर दिया था। उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव पर मुलायम सिंह यादव से विज्ञापन और लालू यादव से पुरस्कार लेने की बात को रेखांकित किया था। लब्बोलुआब ज्ञानरंजन ये कहना चाहते थे कि यादव होने का फायदा राजेन्द्र जी ने बखूबी उठाया। ज्ञानरंजन ने उस वक्त प्रभाष जोशी पर भा हमला बोला था। उन्होंने लिखा था कि ‘प्रभाष जोशी वही हिंदू हैं जिन्होंने देवराला सती कांड का प्रबल समर्थन करनेवाला संपादकीय लिखा था। जिन्होंने सती कांड को महिमामंडित किया और कभी उसको रिग्रेट नहीं किया। थकान और वृद्धत्व की वजह से ये लोग इस सचाई को शायद भूल गए। इसका विरोध लगभग एक सैकड़ा लेखकों ने किया, इसकी निंदा भी की थी। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि प्रभाष जोशी आर एस एस हेडक्वार्टर महाल नागपुर के सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति थे और वहां दिन रात उनके लिए दरवाजे खुले रहते थे। वहां प्रभाष जोशी की सत्ता थी। लेकिन राज्यसभा में जाने में मदद न करने की वजह से वे आखिरकार नाराज हुए, दूर हुए। रातोरात कोई परिवर्तन नहीं हो गया। मित्रों आपको शायद पता कि प्रभाष जी ही हरिशंकर परसाईं के घोर विरोधी थे।‘ ज्ञानरंजन यहीं नहीं रुके थे उन्होंने नामवर जी पर भी हमला बोला था ‘सारे प्रघानमंत्रियों से मैत्री के बावजूद वे न तो दूतावासों में जा सके, न राज्यपाल बन सके, न राज्यसभा में प्रवेश पा सके। साहित्य अकादमी अलग निकल गई। अब नोचे जाने के लिए हमलोग बचे हैं।‘ अंत में उनकी टिप्पणी थी ‘नामवर जी का ठंडा कसाईपन, मुद्रा राक्षस की कालिखी उमंग और राजेन्द्र यादव की जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा वाली धमकी हमारे लिए संघर्ष की नई राह खोलती है।‘ इस तरह के शब्दों में व्यक्तिगत हमले शुरू हो गए थे। बकायदा पुस्तिका छाप कर क्योंकि तब फेसबुक जमाना नहीं था।
ये वही दौर था जब राजेन्द्र यादव के लेख होना/सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ को लेकर भी साहित्य जगत में जमकर वाद विवाद हुए थे। यहां यह बताना जरूरी है कि जब साहित्य अकादमी के चुनाव में महाश्वेता देवी और गोपीचंद नारंग के बीच मुकाबला हुआ था तो उस वक्त हिंदी जगत ने एक बेहद अप्रिय विवाद देखा था। गोपीचंद नारंग पर जिस तरह के आरोप लगाए गए थे वो बेहद घटिया थे। कहा गया था कि अगर नारंग अध्यक्ष बन गए तो साहित्य अकादमी संस्कार भारती की सैटेलाइट बन जाएगी। उस वक्त अपने सारे मतभेदों को भुलाकर नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव एक हो गए थे। गोपीचंद नारंग के खिलाफ साहित्यिक महागठबंधन बना था। महागठबंधन बना तो जरूर था लेकिन उसका फायदा महाश्वेता देवी को नहीं हो सका था और नारंग पर तमाम घटिया आरोपों के बावजूद उनकी जीत हुई थी और साहित्यिक महागठबंधन हार गया था।  इस तरह के कई विवादास्पद किस्से हैं। और अभी हाल मे जिस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी प्रकरण में साहित्यिक गरिमा तार तार हुई वो सबसे सामने है।
ताजा विवाद उठा हिंदी की वरिठ लेखिका उषाकिरण खान की एक टिप्पणी से जो उन्होंने उपन्यासकार रजनी गुप्त के हाल में प्रकाशित उपन्यास ‘किशोरी बिन्नू’ का ब्लर्ब लगा कर लिखी। ऊषा किरण खान ने लिखा- ‘मैत्रेयी पुष्पा जी ने सच कहा कि किशोरी बिन्नू बुंदेलखंड के हर गाँव में मिलेगी। मैं कहती हूँ भारत के सभी गांव में रहती है ऐसी स्त्री।‘ यहां तक तो सब सामान्य था लेकिन इस पोस्ट पर मैत्रेयी की टिप्पणी से विवाद की ज्वाला भड़क गई। मैत्रेयी ने लिखा- ‘किशोरी बिन्नू’ नामक रजनी गुप्त के उपन्यास का फ्लैप मैंने नहीं लिखा है। यह इस उपन्यास की लेखिका की धोखाधड़ी है। मेरे नाम का इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है। ऐसी लेखिकाएं ही आज के लेखन को संदेहास्पद बनाती हैं।‘ मैत्रेयी पुष्पा की इस टिप्पणी पर रजनी गुप्त ने सफाई दते हुए मैत्रेयी को संबोधित टिप्पणी की। उसमें लिखा- ‘यह उपन्यास ‘किशोरी का आसमां’ के नाम से पहले छपा था जिसकी भूमिका आपने ही लिखी थी।‘ रजनी गुप्त ने फिर कई टिप्पणियां की जिसमें वो लगातार ये जताने की कोशिश करती रही कि ये वही पुराना उपन्यास है सिर्फ शीर्षक बदला है। कुछ बचकानी दलीलें भी दीं कि ये दूसरा संस्करण है, सिर्फ शीर्षक ही तो बदला है। जब उनपर ये आरोप लगा कि ये पाठकों के साथ छल है तो उन्होंने कहा कि नए उपन्यास में पहले पृष्ठ पर ये साफ तौर पर लिखा है कि ये उपन्यास पहले फलां नाम से छप चुका है। विवाद इतना बढ़ा कि मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा कि ‘रजनी गुप्त झूठ और धोखेबाजी की मास्टर हैं।‘ फिर क्या था अन्य लोग भी इसमें कूद पड़े । कुछ रजनी के पक्ष में मैत्रेयी को कोसने लगे तो कुछ ने रजनी को नसीहत दी कि आपको मैत्रेयी को बताना चाहिए थे। मारने पीटने तक की अमर्यादित बातें हुईं। कुछ लोगों ने मजे लिए तो कुछ ने गंभीरता से सवाल उठाए। इस पूरे प्रकरण में सबसे अच्छी भूमिका प्रकाशक की रही, प्रकाशन ने फौरन खेद प्रकट किया, मैत्रेयी जी से माफी मांगी और फ्लैप को बाजर से वापस लेने का एलान कर दिया।
इस पूरे प्रकरण को देखने समझने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। पहली बात तो ये कि जो उपन्यास एक दशक पहले किसी अन्य प्रकाशन से छपा हो उसको नए प्रकाशक से दूसरे नाम से छपवाने का औचित्य क्या है। अगर छपवाना ही था तो नाम क्यों बदला गया? नाम बदला गया तो पुराने फ्लैप लेखक को सूचित क्यों नहीं किया गया। नए उपन्यास ‘किशोरी बिन्नू’ में फ्लैप पर जो छपा है उसको देखने पर लगता है कि पूर्व में लिखे से छेड़छाड़ की गई। नए फ्लैप में लिखा है ‘साहित्य जगत में लेखिका का नाम नया नहीं है, लेकिन प्रस्तुत उपन्यास का तेवर नया है, जिसका नाम है किशोरी बिन्नू।‘ अब सवाल यही है कि अगर मैत्रेयी ने ‘किशोरी का आसमां’ का फ्लैप लिखा था तो उसमें जाहिर सी बात है ‘किशोरी का आसमां’ लिखा होगा, वो यहां वो ‘किशोरी बिन्नू’ कैसे हो गया। इस बात का उत्तर तो रजनी गुप्त को देना चाहिए। अगर उन्होंने इसको बदला है तो इस बात की सूचना मैत्रेयी पुष्पा को दिया जाना चाहिए था। जो कि इस केस में नहीं हुआ प्रतीत होता है। यह क्या है इसको परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल हिंदी में प्रोफेशनलिज्म का घोर अभाव है और कोई किसी का नाम कहीं भी इस्तेमाल करते वक्त ये भूल जाता है कि आने वाले दिनों में ये समस्या हो सकती है। इस समस्या से जो विवाद उठता है वो इतना विद्रूप होता है जो साहित्य जगत को शर्मिंदा करने के लिए काफी होता है। इस पूरे प्रकरण में भी यही हुआ। झूठ, फरेब, मक्कारी से लेकर बीहड़ में ले जाकर मारने पीटने जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ, शर्मसार तो हिंदी साहित्य ही हुआ। पता नहीं कब हिंदी में प्रोफेशनलिज्म आ पाएगा?


Sunday, April 5, 2015

स्त्री विमर्श का अछूता प्रदेश

त्रिया चरित्रम पुरसस्य भाग्यम । दैवो ना जानि कुतो मुनष्यम । रजनी गुप्त के नए उपन्यास कठघरे को पढ़ते हुए संस्कृत का ये श्लोक शिद्दत से याद आया । इस उपन्यास की नायिका रत्ना का जो चरित्र रजनी गुप्त ने गढ़ा है वो बेहद जटिल है । उसकी आकांक्षाएं, उसके सपने, उसके इरादे और उसको पूरा करने के लिए उसके फैसले सब बेहद जटिल चरित्र को उबारते हैं । अपने सपनों को पूरा करने के लिए सब कुछ जानते हुए लगातार अपने मन की करती चलती है । स्त्री चेतना का यह एक ऐसा प्रदेश है जिसपर स्त्री विमर्श के नाम पर झंडा डंडा लेकर निकलनेवाली लेखिकाएं जरा कम ही प्रवेश करती हैं । वो नारी स्वातंत्र्य के नाम पर साहित्यक नारेबाजी और लेखों का जुलूस निकालती हैं लेकिन लेकिन स्त्री मन की सचाइयों को उन शोर शराबे में छुपा जाती हैं । रजनी गुप्त ने अपने उपन्यास में बहुत बेबाकी से स्त्री के उस चरित्र को उघाड़ कर रख दिया है । उपन्यास की नायिका रत्ना एक गरीब परिवार से है । सब कुछ जानते बूझते उसने मानसिक रूप से चैलेंज्ड युवक से विवाह करना स्वीकार कर लिया । अब उस स्वीकार के फैसले के पीछे की तात्कालिक वजह अपनी होनेवाली सास की गाड़ी में घूमना, उनका फर्राटेदार अंग्रजी बोलना आदि है लेकिन मूल वजह यह है कि वो अपनी पढ़ाई पूरी कर अच्छी नौकरी करना चाहती है । पढ़ाई और नौकरी का ये सपना उसको अपने परिवार में रहते हुए पूरा होता नहीं दिखता है, लिहाजा यह जानते हुए कि लडका मंदबुद्धि है रत्ना उससे विवाह की हामी भर देती है । जबकि उसकी होनेवाली सास उसको विवाह के प्रस्ताव के बाद भी कहती है- ‘रत्ना खूब अच्छे से सोच समझकर जब भीमन करे अपने मन से फैसला लेना किसी के दबाव में कतई मत आना । किसी की जोर जबरदस्ती से कोई निर्णय कभी भूलकर भी मत लेना वरना जीवन भर पछताती रहेगी । देख, तू मेरे घर की बहू बने, न बने, कोई बात नहींमगर मेरी बेटी तो बन ही सकती है ।‘ इसके आगे भी जोर देकर कहती है – ‘हमेशा अपने दिल की आवाज सुनना । घर वालों की, बाहर वालों की या किसी के दबाव में कभी मत आना ।‘ इतनी साफगोई के बाद भी रत्ना उनके लड़के से शादी करने पर राजी हो जाती है।  बीच में लेखिका ने एक ज्योतिषनुमा मास्साब के चरित्र के बहाने से रत्ना की चाहत को बल देने की कोशिश की है । अंतत:  रत्ना सोचती है कि – अपने फटेहाल घर में रहने से तो बेहतर विकल्प यही है कि उनकी सुविधाओं के बीच रहते हुए वह अपना करियर बनाए । वैसे भी उस पति नामक जीव से ज्यादा लेना-देना तो रहेगा नहीं । समय पर खाना पीना दे दो, बस और क्या ? हम तो अपना कैरियर बनाएंगें और अपनी मर्जी से अपना जीवन जिएंगे । यही सब सोचते सोचते उसने उस मंदबुद्धि परंतु अमीर लड़के से शादी करने की हामी भर दी थी । हलांकि शादी के बाद वो अपनी स्थितियों को लेकर सशंकित भी रहती थी । वो सोचती है बिना आगा-पीछा सोचे जब उसने खुद अपने लिए ऐसा जीवन चुना है तोफिर किससे गिला शिकवा कर पाएगी वह और क्यों ?  अपनी सास को लेकर वह पहले ही दिन से सशंकित भी रहती है । पर यह बात समझ से परे है कि जिस लड़की ने अपने करियर के लिए मानसिकरूप से चैलेंज्ड लड़के से शादी करना स्वीकार कर लिया हो वो सालभर के अंदर ही मां बन गईं । क्या सुख सुविधाओं तले उसके करियर का सपना दब गया या कुछ और । इस तरह के कई सवाल ये उपन्यास उठाती है ।
बेटे ईशान के पैदा होने के  बाद रत्ना के जीवन में कई तरह के बदलाव आने शुरू हो जाते हैं । उसे अपनी सास के उस इरादे का पता चल जाता है कि वो अपना वंश चलाने के लिए उसको अपने घर की बहू बनाकर लाई थी । ईशान के पैदा होने के बाद उसकी दादी अपने पोते को लेकर पजेसिव हो जाती है और ये बहुधा सास-बहू के बीच विवाद की वजह भी बनती है । परिवार में विवाद बढ़ता है तो उसकी परिणति रत्ना के लिए घर में बुटीक खोलने में होती है । रत्ना की मेहनत से बुटीक का कामकाज चल पड़ता है और ग्राहकों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर वहां कर्माचारियों की जरूरत होती है । यहां एक बार फिर से कहानी में जबरदस्त नाटकीय मोड़ आता है । रत्ना जब अपने मां-बांप के घर में रहती थी तो उसका पुराना प्रेमी रामकिशन बूटिक में नौकरी के लिए नमूदार होता है । उसके पुराने प्रेमी होने का संकेत मुफलिसी के दौर में तोहफे में घड़ी देने के प्रसंग से मिलता है । फिर साथ काम करने के दौरान प्रेम का अंकुर फिर से फूटने लगता है । अपने नौकर के साथ प्रेम को लेकर रत्ना का अपने सास ससुर से झगड़ा शुरू हो जाता है । इन विवादों के बीच रत्ना के विवाहेत्तर संबंध को जायज ठहराने के लिए अचानक से वो अपने पति की अप्राकृतिक यौनाकांक्षा के बारे में सोचकर सिहरने लगती है । इन तमाम विवादों के बीच रत्ना के मंदबुद्धि पति की अनुपस्थिति भी लगातार महसूस की जाती है । जब रत्ना विवाहेत्तर संबंध में आगे बढ़ती है और प्रेम देह में प्रवेश करता है तो पति की अप्राकृतिक यौन रुचि के संकेत के वक्त उसका उल्लेख मात्र होता है । यह स्त्री विमर्श का एक ऐसा चेहरा है जिसपर आनेवाले दिनों में जमकर विमर्श की गुंजाइश नजर आती है । वो अपने पुराने प्रेमी के साथ खुल्लमखुल्ला प्यार करती है, लांग ड्राइव पर जाती है, घंटों फोन पर बतियाती है, देह संबंध बनाती है । इससे आजिज आकर उसके सास ससुर अखबार में इश्तेहार देकर रत्ना से अपने को अलग कर लेते हैं । एक दिन अचानक रत्ना की सास की हत्या हो जाती है । उसका प्रेमी आपसी बातचीत में बुढिया को रास्ते से हटाने की बात कई बार कह चुका था । हत्या के बाद मौका ए वारदात पर उसका तौलिया मिलता है । उसको वहां से भागते उसका मासूम बेटा ईशान देख लेता है । लेकिन वो अपने बेटे को चुप रहने की नसीहत देती है । अपने प्रेमी को बचाने के लिए पति के मां की हत्या की बात को दबा देना ।
रत्ना नाम की इस स्त्री की कहानी के बहाने रजनी गुप्त भारत के जेलों में रह रही महिलाओं की बुरी स्थितियों पर भी साथ साथ बात करते चलती हैं । उपन्यास का शीर्षक भी है कितने कठघरे । उपन्यास को पढ़ने के बाद शीर्षक इस मायने में सार्थक लगता है कि वो स्त्रियों के समाजिक कठघरे की बात करता है । जेल और जेल में बंद महिलाओं की दुर्दशा को भी उन्होंने रत्ना की कहानी से ही जोड़ा है । वांछा नाम की एक लड़की रत्ना को आजादी दिलाना चाहती है जो संयोग से उसके बेटे ईशान की मंगेतर है । वांछा जेल में उससे मिलती है और फिर कहानी धीरे धीरे खुलती जाती है । और जब कहानी खुलती है तो जेल जीवन की मार्मिक दास्तां भी सामने आती है । हिंदी उपन्यासों से हमेशा से ये शिकायत रहती है कि लेखक डिटेलिंग में नहीं जाते हैं लेकिन रजनी गुप्त ने अपने इस उपन्यास में उस धारणा को निगेट किया है । रजनी ने बहुत सूक्ष्मता के साथ और आंकड़ों के आधार पर जेल जीवन की भयावह तस्वीर पेश की है । ऊपर से देखने पर यह उपन्यास जेल जीवन का आख्यान लगता है लेकिन दरअसल यह उपन्यास जेल जीवन के बहाने स्त्री विमर्श का एक ऐसा छोर पकड़ता है जिसका सिरा अब तक इस विमर्श के पैरोकारों से छूटता रहा है । हो सकता है आने वाले दिनों में रजनी गुप्त के इस उपन्यास के बहाने स्त्री विमर्श के इस अबतक छूटे प्रदेश पर चर्चा हो ।

Monday, May 19, 2014

राजनीति, महिला और विद्रूपता

राजेन्द्र यादव को अपने जीवन काल में इस बात का अफसोस था कि राजनीतिक हत्या पर हिंदी में कोई उपन्यास नहीं लिखा गया । वो हमेशा कहते थे कि हिंदी के उपन्यास लेखक राजनीति की बजबजाती दुनिया पर तो लिख लेते हैं लेकिन राजनेताओं के हत्या के इर्दगिर्द रचना करने का साहस उनमें नहीं है । उन्होंने एक बार कहा था कि वेद प्रकाश शर्मा इकलौते हिंदी के लेखक हैं जिन्होंने वर्दी वाला गुंडा नामक उपन्यास लिखा जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या पर आधारित है । लेखक ने प्लॉट अवश्य वहां से उठाया है लेकिन उसमें कल्पना के आधार पर काफी घटनाओं और स्थितियों का समावेश किया है । राजेन्द्र यादव की इस बात से असहमति का कोई आधार नहीं है साथ ही इस बात से भी अलग राय नहीं हो सकती है कि राजनीति को केंद्र में रखकर कई उपन्यास लिखे गए । श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी से लेकर विभूति नारायण राय के तबादला तक भारतीय समाज में राजनीति के खेल पर से पर्दा हटाने की कोशिश की गई है । प्रेमचंद के जमाने में गांव के लोग अपनी सारी बदमाशियों के बावजूद कुछ मूल्यों पर डटे रहते थे लेकिन वही गांव जब श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी में चित्रित होता है तो उसका स्वरूप बदल चुका होता है ।  राजनीति की गंदगी गांव के जिंदगी में इस तरह से रच बस गई कि पंचायतों और ग्रामसभाओं के चुनाव में उस तरह के तमाम हथकंडे और दंद-फंद अपनाए जाने लगे जो प्रदेश और देश की राजनीति में अपनाए जाते थे । उससे आगे बढ़ते हुए विभूति नारायण राय के उपन्यास तबादला में तो वो राजनीति और घिनौने रूप में उपस्थित होती है । यह उपन्यास मूलत उत्तर प्रदेश के सर्वजनिक निर्माण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी है जिसमें तबादला तंत्र को प्रभावित करनेवाले राजनेताओं अफसरों और दलालों की साठगांठ का वर्णन है । सरकारी तंत्र के विद्रूप के अलावा इस उपन्यास में स्त्री शोषण का भी एक आयाम है । यही आयाम अब रजनी गुप्त के नए उपन्यास ये आम रास्ता नहीं है के केंद्र में है । रजनी गुप्त के इस उपन्यास में शीर्षक के नीचे कोष्ठक में लिखा है – राजनीति के चक्रव्यूह में स्त्री । इससे पाठकों को इस बात का अंदाज हो जाता है कि उपन्यास की कहानी क्या कहती है ।

इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र मृदु है जो पिछड़े वर्ग से आती है और अपने पति और दो बच्चों के साथ खुशी-खुशी पारिवारिक जीवन बिता रही होती है । उसकी जिंदगी में बेहद अहम मोड़ तब आता है जब वो एक दिन एक व्यूटी कांटेस्ट में चुन ली जाती है । घरेलू महिला होने के बावजूद मृदु के जीने का सलीका अन्य महिलाओं से अलहदा है । वो बिंदास है, वो खूबसूरत है, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है और समाज के लिए कुछ करना भी चाहती है । इस उपन्यास में लेखिका ने साफ तौर पर इस बात को उकेरा है कि राजनीति के दलदल में महिलाओं के लिए खुद को बचा लेना लगभग असंभव सा है । इस उपन्यास से यह ध्वनित होता है महिलाओं को अगर राजनीति में ऊपर चढ़ना है तो उन्हें अपने शरीर को पायदान की तरह इस्तेमाल करना होगा । यह बात पात्रों के बीच होनेवाली बातचीत और स्थितियों से कई बार स्पष्ट होती है । एक अंग्रेजी पत्रिका में हिंदी की मशहूर लेखिका रमणिका गुप्ता, जो कि खुद लंबे समय तक राजनीति में रही हैं, ने माना था कि किस तरह से राजनेता महिलाओं के साथ व्यवहार करते हैं । किस तरह से खूबसूरत महिलाओं को अपने आपको बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है जो ज्यादातर नाकाम रहती है । अपने इस उपन्यास में रजनी गुप्त ने राजनीति की इस विद्रूपता को उजागर तो किया ही है लेकिन इसके साथ एक महात्वाकांक्षी पति के नापाक इरादों को भी उघाड़ कर रख दिया है । मृदु का पति अपनी तरक्की के लिए अपनी खूबसूरत पत्नी का इस्तेमाल करना चाहता है । वो अच्छी पोस्टिंग के लिए उसे मंत्री और आला अधिकारियों के पास भेजता है लेकिन मृदु अपने दृढ स्वभाव और दबंगई की वजह से बच कर निकल आती है । अपने पति की इस नीच हरकत से वो प्रतिक्रयावादी हो जाती है और पति की नाराजगी मोल लेकर राजनीति की ओर कदम बढ़ा देती है । वहां उसे एक नेता मिलता है जिसके साथ लांग ड्राइव पर जाना और उसकी नजदीकी उसे अच्छी लगती है । लेकिन नियति का चक्र कुछ ऐसा चलता है कि वो सबकुछ छोड़छाड़ कर पीड़ित लड़कियों के आश्रम में पहुंच जाती है । डेढ सौ पन्ने के इस छोटे से उपन्यास में कई कथाएं एक साथ चलती हैं । राजनीति के अलावा यह उपन्यास उसके दोनों बेटों के मनोभावों और पिता के बहकावे में आकर मां के साथ बदतमीजियों की दास्तान भी कहता है । मां के लिए अपने संतान की तड़प स्वाभाविक है लेकिन पिता अपनी चालों से इसको और बढ़ाता रहता है । इस उपन्यास में कई ऐसे विषय हैं जिसको पाठक हाल की घटनाओं से जोड़कर देख सकते हैं । लेकिन एक लेखक के लिए यही तो सफलता है कि वो किस तरह से अपने आसपास घट रही घटनाओं को अपनी रचना का विषय बनाकर समाज को झकझोरता है । रजनी गुप्च के इस उपन्यास में राजनीति के अलावा किशोर मन के मनोविज्ञान का भी चतित्रण है । किशोर मन का यह मनोविज्ञान रजनी के पिछले उपन्यास कुल जमा बीस का विषय भी रहा है । कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि रजनी गुप्त का यह नया उपन्यास इस विषय को स्पर्श करने का एक सार्थक प्रयास है । 

Thursday, August 29, 2013

बीस की कहानी

समकालीन साहित्यक परिदृश्य में स्त्री विमर्श के नाम पर लेखिकाओं की एक ऐसी फौज खड़ी हो गई है जो प्रसद्धि के लिए तमाम तरह के दंद फंद से भी नहीं हिचक रही है। उन्हें हर कीमत पर सिर्फ और सिर्फ प्रसिद्धि चाहिए और वो भी इंस्टेंट । पुरुष मानसिकता, पितृसत्तात्मक समाज, महिलाओं के हालात, उनके हर तरह के शोषण, पुरुषों से आजादी, बंधनों से मुक्ति, सेक्स संबंधों की स्वतंत्रता, शादी नाम के संस्था से बगावत आदि आदि ऐसे कई जुमले हैं जो समकालीन क्रांतिकारी महिला लेखन में आग के गोले की तरह से धधकते हैं । लेखन ऐसा कि पढ़ने वाला झुलस जाए और अगर बच गया तो आग की तपिश लंबे समय तक महसूसता घूमता रहेगा । महिला लेखन की इस आग की लालसा समाज के सारे पुरुषों को जला कर राख कर देने की है । जिस तरह से आग अगर लगती है तो वह किसी को नहीं छोड़ती या कह सकते हैं कि वह झुलसाने में कोई भेद भाव नहीं बरतती, उसी तरह से पुरुष विरोध की आग में हो रहा लेखन किसी को भी बख्शने को तौयार नहीं है । महिला लेखन की इस आग के पीछे बहुधा समाज में स्त्रियों की दशा बदलने की मंशा कम, प्रचार पाने की चाहत ज्यादा है । उनको लगता है कि सेक्स प्रसंगों के बारे में खुलकर बात करने, उससे आजादी की बात करने से देश में क्रांति हो जाएगी । महिलाओं को आजादी मिल जाएगी, उनका हर तरह का शोषण खत्म हो जाएगा ।  देह मुक्ति का नारा लगाते लगाते महिला लेखन कब विरोध की आग में झुलसकर बदसूरत हो गया है उसका पता ना तो लेखिकाओं को चल पाया और ना ही स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों को । कई लेखिकाओं को लगता है कि गाली गलौच वाले लेखन से उनको प्रसिद्धि मिल जाएगी । कईयों को मिली भी, लेकिन यह प्रसिद्धि लंबे वक्त तक कायम नहीं रह सकती है ।  यह तथ्य है कि भारतीय समाज प्राचीन काल से ही पुरषों के पक्ष में झुका रहा है । इससे किसी को भी इंकार भी नहीं है । महिलाओं पर बहुत अत्याचार हुए । उनका दैहिक और मानसिक दोनों तरह का शोषण किया गया और कई जगहों पर अब भी यह बदस्तूर जारी है ।  लेकिन यह भी तथ्य है कि पिछले कई दशकों में हालात बहुत बदले हैं । हर क्षेत्र में महिलाएं आगे आने लगीं । पुरुषों ने भी महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर जतन किए । इसलिए एक ही लाठी से सबको हांकने की महिला लेखन की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है और वो उसको किसी मुकाम तक ले जा पाएगी इसमें मुझे संदेह है ।
मैं हमेशा से यह बात कहता रहा हूं कि कुछ स्त्रीवादी लेखिकाएं हाथ में ए के 47 लेकर घूम रही हैं और वो अपने लेखन रूपी अस्त्र से सबको ध्वस्त करने की ख्वाहिश भी पाले बैठी हैं । लेकिन सपने बहुधा सच नहीं होते और खासकर तब तो बिल्कुल भी नहीं जबकि सपनों के पीछे की मंशा संदेह के घेरे में हो या फिर मंशा लक्ष्य हासिल करना ना हो बल्कि खुद को आगे बढ़ाने की हो  । स्त्री विमर्श के कोलाहल के बीच कई लेखिकाएं ऐसी भी हैं जो इन दंद फंद से दूर रहकर गंभीर लेखन कर रही हैं,। नए नए विषयों को छूने का साहस जुटा कर साहित्य को समृद्ध करने में लगी हैं । देह मुक्ति के छद्म आंदोलन से अलग रहकर, बगैर प्रसिद्धि की चाहत में गंभीर रचनाकर्म में लगी हैं । इस बात का खतरा उठाते हुए भी कि महिला लेखन की महंथाइनें उन्हें हाशिए पर डालने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगीं । समकालीन साहित्यक परिदृश्य में रजनी गुप्त एक ऐसी ही लेखिका हैं । रजनी गुप्त के तीन उपन्यास- कहीं कुछ और, किशोरी का आसमां और एक ना एक दिन प्रकाशित हो चुके हैं । इन उपन्यासों ने अपने विषय से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था । उनकी कहानियां भी लागातर प्रकाशित होकर पाठकों को सोचने पर विवश करती रही हैं । उसके अलावा स्त्री विमर्श पर आधारित दो पुस्तकों- आजाद औरत, कितनी आजाद और मुस्कुराती औरतों का भी वो संपादन कर चुकी हैं । अभी अभी उनका नया उपन्यास-कुल जमा बीस- प्रकाशित हुआ है । इस उपन्यास के केंद्र में यौवन की दहलीज पर कदम रख रहा ऐसा किशोर है जो अपने करियर को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है । क्या करे कि ना करे की मानसिकता से ग्रस्त है । उसका बचपन डिस्टर्बड रहा है । उसने पिता की मौत के बाद अपनी मां को परपुरुष की बाहों में देखा है । यह दृश्य उसे बार बार हॉंट करता है । दादी का साथ रहता है । साथियों के साथ मौज मस्ती करता है । दादी उसकी मानसिकता को समझ कर उसकी हर छोटी-बड़ी जायज-नाजायज मांग पूरी करती है । दरअसल इस उपन्यास के पात्र के बहाने रजनी गुप्त ने आज की इंटरनेट पीढ़ी की पूरी मानसिकता को सामने लाने की कोशिश की है । ऐसी पीढ़ी की मानसिकता जिसके लिए रिश्ते कोई मायने नहीं रखते, वर्जनाओं की उन्हें परवाह नहीं, कपड़ों की तरह साथी भी बदलने में उन्हें कोई हिचक नहीं । सबकुछ इंस्टेंट चाहिए – दोस्ती से लेकर शारीरिक संबंध तक । प्यार व्यार क्या होता है ये वो जानते नहीं और उसके चक्कर में पड़ना भी नहीं चाहते । उनके लिए दैहिक रिश्ते सिर्फ अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने भर का जरिया मात्र है । चाहे वो लड़की हो या लड़का । समाज, परिवार, दोस्त, रिश्तेदार सभी को वह इसी मानक पर तौलता है और उसी हिसाब से अपनी जिंदगी के बारे में फैसले लेता है । अपने फैसलों में उसको किसी का दखल भी मंजूर नहीं होता है ।  लेकिन तन्हाई के क्षणों में वो मां के बिछोह में तड़पता भी है और तब उसको उसको महरूम अपने पापा की याद भी आती है । पापा की याद में तड़पता किशोर अपने किसी साथी में सुकून भी तलाशता है । यहीं से चाहत होती है किसी कंधे की जो उसे कहीं और ले जाता है । 
रजनी गुप्त के इस उपन्यास की भाषा उसके पात्रों के हिसाब से गढ़ी गई है । उसमें लेखिका पर्याप्त रूप से सफल भी रही है । हिंदी-अंग्रेजी की मिली जुली जिस तरह की बोली वाणी यह पीढ़ी अपने उपयोग में लाती है वही भाषा रजनी ने अपनाई है । इसमें लेखिका बहुत हद तक कामयाब भी रही है । उस उपन्यास में मुझे कई जगह एक हिचक दिखाई देती है । जैसे जब भी कोई सेक्स प्रसंग आता है तो लेखिका नैतिकता और यथार्थ के द्वंद भी फंसी नजर आती है । जैसे जब आशु अपनी मां को उसके साथी के साथ देखता है तो लेखिका की हिचक वहां दिखाई देती है और लगता है कि वो जल्द इस प्रसंग को खत्म कर आगे बढ़  जाना चाहती है । इस तरह के प्रसंग जब भी जहां आते हैं वहां यह हिचक यह साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । कुल मिलाकर रजनी गुप्त ने एक ऐसे विषय को चुना है जिसपर हिंदी लेखकों का ध्यान कम जा रहा है वो तो यथार्थ की जमीन तोड़ने में लगे हैं । जमाने के रफ्तार के साथ रजनी ने विषय को पकड़ा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि पाठकों को रजनी गुप्त का यह उपन्यास काफी पसंद आएगा । एक बात और कहना चाहूंगा कि रजनी ने जिस तरह से उपन्यास की भाषा को नई पीढ़ी के हिसाब से रखा है वही सतर्कता उनको उपन्यास के शीर्षक में भी बरतनी चाहिए थी । ऐसा करने से युवा पीढ़ी को बेहतर तरीके से उपन्यास की ओर आकृष्ट किया जा सकता था ।

Saturday, August 25, 2012

हिंदी के युवा लेखकों से उम्मीद


हिंदी में सालों से प्रकाशक और लेखक दोनों पाठकों की कमी का रोना रोते रहते हैं । बहुत शोर मचता है कि हिंदी के पाठक कम हो रहे हैं । हिंदी के आलोचकों ने भी कई बार इस बात का ऐलान किया है कि हिंदी में गंभीर लेखन पढ़नेवालों की लगातार कमी होती जा रही है । कई उत्साही आलोचकों ने तो नए पाठकों की अपनी भाषा से विमुखता को भी रेखांकित किया । वर्षों से पाठकों की कमी के कोलाहल के बीच हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ती रही जो लेखकों, प्रकाशकों और आलोचकों की पाठकों की कमी की चिंता के विपरीत था । हिंदी के प्रकाशकों का कारोबार भी लगातार फैलता जा रहा है वह भी इस चिंता के उलट है । एक अनुमान के मुताबिक हिंदी में अलग अलग विधाओं की करीब पच्चीस से तीस हजार किताबें हर साल छापी जाती हैं । सवाल ये है कि अगर बिकती नहीं हैं तो इतनी किताबें छपती क्यों हैं । इन सवालों के बरक्श हम हिंदीवालों को अपने अंदर झांक कर देखने की जरूरत है । किताबें क्यों नहीं बिकती या किताबें पाठकों के बीच क्यों नहीं लोकप्रिय होती है । सामाजशास्त्रीय विश्लेषण करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्कीसवीं सदी के पाठकों की रुचि में सत्तर और अस्सी के दशक के पाठकों की रुचि में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है । सन 1991 को हम इस रुचि का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं । हमारे देश में 1991 से अर्थव्वयस्था को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया और उससे करीब सात साल पहले देश में संचार क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी । हमारे देश के लिए ये दो बहद अहम पड़ाव थे जिसका असर देश की साहित्य संस्कृति पर बेहद गहरा पड़ा । लेकिन वो एक अवांतर प्रसंग है जिसपर चर्चा इस लेख में उपयुक्त नहीं है । संचार क्रांति और उदारीकरण का असर यह हुआ कि देश में पश्चिमी संस्कृति से देश की जनता का परिचय हुआ । जो बातें अबतक सुनी जाती थी वो प्रत्यक्ष रूप से देखी जानी लगी । बाजारवाद और नवउदारवाद के प्रभाव में भारत में आम जनता की और खासकर युवा वर्ग की रुचि में बदलाव तो साफ तौर पर रेखांकित किया जा सकता है ।
युवा वर्ग और उन दशकों में जवान होती पीढ़ी में धैर्य कम होता चला गया और एक तरह से इंस्टैंट का जमाना आ गया चाहे वो काफी हो या अफेयर । यह अधीरता कालांतर में और बढ़ी । यह लगभग वही दौर था जब हमारे देश के आकाश को निजी टेलीविजन के तरंगों के लिए खोल दिया गया । मतलब यह है कि देश में कई देशी विदेशी मनोरंजन और न्यूज चैनलों ने अपना प्रसारण शुरू किया । यह वही वक्त था जब हिंसा प्रधान फिल्मों की जगह बेहतरीन रोमांटिक फिल्मों ने ली । मार-धाड़ वाली फिल्मों की बजाय शाहरुख काजोल की रोमांटिक फिल्मों को जबरदस्त सफलता मिली । लगभग इसी वक्त राष्ट्रीय अखबारों के पन्ने रंगीन होने लगे और फिल्मों के रंगीन परिशिष्ट अखबारों का एक अहम अंग बन गया । यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि नवें दशक में हमारे देश की लोगों की पसंद बदलने लगी । लेकिन इतने बदलाव को हिंदी के लेखक सालों तक नहीं पकड़ पाए और उनके लेखन का अंदाज बदला जरूर लेकिन वो बदलते समय के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाए । नतीजा यह हुआ कि हिंदी का फिक्शन लेखन पाठकों की पसंद में लगातार पिछड़ता चला गया । पहले हिंदी में किसी भी उपन्यास का एक संस्करण हजार प्रतियों का होता था जो बाद में घटकर पांच सौ प्रतियों का होने लगा और अब तो प्रकाशन जगत के जानकारों का दावा है कि ये आंकड़ा तीन सौ का हो गया है । कुछ प्रकाशक तो इतना भी नहीं छाप रहे । जितनी प्रतियों का ऑर्डर मिल जाता है उसको छापकर तैयार कर लेते हैं । आधुनिक तकनीक की वजह से यह मुमकिन भी है । हिंदी के फिक्शन लेखक जब अपनी किताबें नहीं बिक पाने का रोना रोते हैं तो उसके पीछे कम से कम पाठकों की कमी, तो वजह बिल्कुल नहीं है । हिंदी में फिक्शन पढ़नेवाले पाठक हैं लेकिन लेखकों को उनकी रुचि के हिसाब से लेखन शैली बदलनी होगी । लेखकों को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी के प्रकाशकों की सूची से फिक्शन का अनुपात कम क्यों होता जा रहा है । आज प्रकाशकों की रुचि गैर साहित्यक किताबें छापने में ज्यादा हो गई है । प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से लुई एल हे की यू कैन हील योर लाइफ, दीपक चोपड़ा की सफलता और अध्यात्म से जुड़ी किताबें बिक रही हैं तो उसके पीछे पाठकों की बदलती रुचि है । हिंदी में इन दिनों आत्मकथा और जीवनियों की भी जमकर बिक्री हो रही है । चाहे वो सायना नेहवाल की जीवनी हो, चाहे कलाम की टर्निंग प्वाइंट्स हो । पाठकों के इस मनोविज्ञान का विश्लेषण करने से यह बात और साफ होती है कि अब हिंदी का पाठक यथार्थ के नाम पर नारेबाजी, क्रांति के नाम पर भाषणबाजी, सामाजिक बदलाव के नाम पर विचारधारा विशेष का पोषण को पसंद नहीं कर रहा है ।
अब हिंदी प्रकाशन जगत के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि पाठकों की पसंद क्या है और किस तरह की किताबें धड़ाधड़ बिक सकती हैं । अगर हम अंग्रेजी प्रकाशन जगत को देखें तो युवाओं को केंद्र में रखकर लिखे गए रोमांटिक प्लॉट वाले उपन्यास या कहानी संग्रह खूब बिक रहे हैं । इसके अलावा चिक लिट बुक्स हैं जो अपनी रोमांटिक और चमक दमक वाली जिंदगी की वजह से युवतियों के बीच खासी लोकप्रिय हो जाती हैं । अंग्रेजी में ज्यादातर बेस्ट सेलर किताबों में लव सेक्स और संघर्ष की कहानी होती है जो बीस से तीस वर्ष के युवाओं को लुभाता है और उन्हें खरीदकर पढ़ने को मजबूर करता है । अंग्रेजी में भी भारतीय लेखकों की एक नई फौज आई है जो इस तरह के प्लॉट को उठा रही हैं जिनमें कविता दासवानी, सिद्धार्थ नारायण ,प्रीति शिनॉय, निकिता सिंह, नवनील चक्रवर्ती और सचिन गर्ग जैसे लेखक प्रमुख हैं । इनका लेखन और प्लॉट अमिताभ घोष, अमिश त्रिपाठी, ताबिश खैर जैसे भारतीय लेखकों से अलग है । अंग्रेजी में लिखनेवाले इन लेखकों की सफलता का राज उनकी भाषा और उनके उपन्यासों के शीर्षक हैं जो गंभीरता के बोझ से मुक्त हैं । इन युवा लेखकों की वही भाषा है जो आज के युवाओं के बीच बोली जाती है । उनके उपन्यासों के शीर्षक भी उन्हीं बोलचाल के शब्दों से उठाए जाते हैं । जैसे ओह शिट्, नॉट अगेन, नॉटी मैन, बॉंबे गर्ल, ऑफ कोर्स आई लव यू, ओह यस आई एम सिंगल जैसे दो सवा दो सौ पन्नों के उपन्यास खासे लोकप्रिय हो रहे हैं । जाहिर तौर पर इन उपन्यासों के नायक नायिकाएं युवा होते हैं और उपन्यासों का परिवेश भी उनके आस पास का ही होता है । ऐसा नहीं है कि सारे के सारे युवा लेखक सिर्फ हल्के फुल्के प्रेम प्रसंगों पर ही लिख रहे हैं । कई लेखक तो गंभीर बीमारियों को भी अपने उपन्यास का विषय बना चुके हैं लेकिन उसमें भी कहीं ना कहीं प्रेम का तत्व डाल ही देते हैं । इन उपन्यासों की एक विशेषता और है कि ये दो सौ रुपए से कम में पाठकों को उपलब्ध है जिसकी वजह से चलते चलाते भी उसकी खरीदारी हो जाती है ।
हिंदी में इस तरह का लेखन-प्रकाशन जरा कम हुआ है । हिंदी में युवाओं के बदलते मनमिजाज और प्राथमिकताओं पर गीताश्री ने कई बेहतर कहानियां लिखी हैं लेकिन उनका कोई संग्रह या उपन्यास नहीं आया है जिससे लोकप्रियता का मूल्यांकन हो सके । अभी अभी सामयिक प्रकाशन दिल्ली ने युवा लेखक लेखिकाओं की कहानियों और उपन्यासों को पूरा सेट प्रकाशिकत किया है । जिसमें जयश्री राय, अजय नावरिया, पंकज सुबीर, कविता,रजनी गुप्त, शरद सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ की किताबें एक साथ प्रकाशित की हैं । लेकिन अब हिंदी के पुराने लेखक सर्वहारा और उस तरहब की नारेबाजी से मुक्त नहीं हो पाए हैं । जयश्री राय के कहानी संग्रह के ब्लर्ब पर संजीव ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है उससे खूबसूरत कहानियां उभरती नहीं है बल्कि बौद्धिकता के बोझ से दब जाती हैं । दरअसल अब हिंदी के प्रकाशकों को भी ब्लर्ब की शास्त्रीयता से मुक्त होने की जरूरत है । रजनी गुप्त ने अपने उपन्यास कुल जमा बीस में जो विषय चुना है वो समय के साथ है । उसमें किशोर के मनस्थिति उसके संघर्ष, वर्चुअल दुनिया को लेकर उसके मन में चल रहे द्वंद के इर्द-गिर्द कथा बुनी गई है । युवाओं के बीच इस उपन्यास को पढ़े जाने की उम्मीद है । कविता का पहला उपन्यास -मेरा पता कोई और है -को भी पाठक पसंद करेंगे लेकिन यहां भी ब्लर्ब पर वही बौद्धिकता और भारी भारी शब्दों का इस्तेमाल । सामयिक प्रकाशन से जिस तरह से हिंदी के अहम युवा लेखक लेखिकाओं की किताबें एक साथ प्रकाशित हुई हैं उससे एक उम्मीद तो जगती है । हॉर्ड बाउंड में छपी इन किताबों के मूल्य ढाई सौ से चार सौ रुपए तक हैं लेकिन प्रकाशक को युवाओं तक पहुंचने के लिए उसको दो सौ के अंदर रखना होगा भले ही चाहे वो पेपर बैक में क्यों ना छपे ।