Translate

Showing posts with label राज कपूर. Show all posts
Showing posts with label राज कपूर. Show all posts

Saturday, July 25, 2026

सफेद रंग का इंद्रधनुष


राज कपूर के बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक तो उनको सफेद साड़ी पहनने वाली स्त्रियां पसंद थीं। या उनको पसंद करनेवाली स्त्रियां सफेद साड़ी पहनती थीं। दूसरी उनकी वो फिल्में जबरदस्त हिट होती थीं जिनकी लीड हीरोइन के साथ उनके अफेयर के चर्चे होते थे। नरगिस से लेकर पद्मिनी और वैजयंतीमाला तक का उदाहरण उनके साथ काम करनेवाले अबतक देते रहते हैं। उनपर लिखी कई पुस्तकों में भी इस तरह की बातों का उल्लेख मिलता है। एक और बात राज कपूर के बारे में कही जाती है, जब से नरगिस और उनका अलगाव हुआ तब से उनकी फिल्मों में सेंसुअलिटी का स्थान सेक्सुअलिटी ने ले लिया। इस बीच एक और घटना घटी जिसने राज कपूर को नायिकाओं को पेश करने का आयडिया दे दिया। एक दिन राज कपूर मुंबई (तब बांबे) में अपने किसी मित्र के यहां रात के खाने पर गए थे। मित्र के घर जब वो खाना खा रहे थे डायनिंग टेबल के ऊपर लगी तस्वीर देखकर वो खाना भूल गए। वो राजजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग थी। पेंटिंग में एक स्त्री भीगी हुई साड़ी में थी। गीली और झीनी साड़ी अपने बदन पर लपेटी। उस स्त्री की पेंटिंग में सेंसुअलिटी थी, जिसे राज कपूर ने पर्दे पर सेक्सुअलिटी में बदल दिया। ये वही दौर था जब राज कपूर की जिंदगी से नरगिस जा चुकी थीं। उनकी नई नायिका थीं पद्मिनी। उनको लेकर राज कपूर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बना रहे थे। इस फिल्म में पद्मिनी पर फिल्माए गए गीत ‘ओ मैंने प्यार किया ओहो क्या जुर्म किया’ में राज कपूर ने राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को दृष्यों में उतारने का प्रयास किया। गाने के दौरान पद्मिनी काली साड़ी पहनकर झरने के नीचे बने जलकुंड में कूदती हैं। तैरती हैं। पानी से बाहर आकर चट्टान पर लेटती हैं। पलटती हैं। इन सारी मादक अदाओं को कैमरा कैद करता रहता है। पद्मिनी ने इस पूरे सीन में काली साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के साथ चिपकी रहती है। झरने में नहाने का छोटा सीन भी है। जिसको राज कपूर दिखाते तो हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वो अगली फिल्म के लिए कुछ बचा लेना चाहते हैं।

राज कपूर ने फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में जो बचा लिया था उसको उन्होंने दिखाया अपनी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में। इस फिल्म का गाना याद करिए ‘अंग लग जा बालमा’। इस गाने के बोल शुरु होने से पहले लगभग एक मिनट तक नायिका अपने कमरे में बेचैनी में करवटें बदलती हैं। कैमरा विभिन्न मुद्राओं को कैद करता है। डेढ मिनट बाद जब कड़कती हुई बिजली और तूफानी रात में नायिका पद्मिनी पेड़ के तने से लिपट कर गाना आरंभ करती है तो दर्शक नायिका की अदाओं में खो जाते हैं। यहां राज कपूर अपनी नायिका को काली साड़ी से हल्के क्रीम कलर और लाल बार्डर वाली साड़ी तक लेकर आते हैं और उसको भिगाते भी हैं। चौखट पर अपने बदन पर साड़ी लपेटकर खड़ी पद्मिनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को साकार कर देती हैं। पर इस फिल्म में भी ऐसा लगता है कि राज कपूर ने यहां भी कुछ बचा लिया। इस फिल्म के करीब डेढ़ दशक बाद राज कपूर की एक फिल्म आती है ‘राम तेरी गंगा मैली’। ये फिल्म राज कपूर ने अपने बेटे राजीव कपूर को लेकर बनाई थी। इस फिल्म का गाना याद करिए, तुझे बलाए मेरी बाहें। इसमें लाल वस्त्र में नायिका आती है लेकिन उसके बाद जब वो पर्वत के नीचे और झरने के पीछे अपने होने की बात करती है तो सफेद पारदर्शी साड़ी पहने होती है और यहां आकर राज कपूर लगभग नग्नता तक चले जाते हैं। मंदाकिनी पर फिल्माए इस दृष्य को लेकर उस समय काफी बवाल मचा था। सेंसर से सर्टिफिकेट मिलने के बाद ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्म। इस फिल्म ने रातों रात मंदाकिनी को स्टार बना दिया। उसके बाद मंदाकिनी ने दर्जनों फिल्में की जिनमें मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा के साथ की गई फिल्में ठीक ठाक चली। मेरठ की रहने वाली यास्मीन जोसेफ को राज कपूर ने देखा। कहा जाता है कि हिंदी फिल्मों की नायिकाएं राज कपूर की नीली आंखों में खो जाती थीं लेकिन राज कपूर यास्मीन जोसेफ की नीली आंखों में खोए नहीं बल्कि डूब गए। सीधे अपनी फिल्म का लीड रोल दे दिया। मंदाकिनी नाम भी दिया। मेरठ की यास्मीन जोसेफ मंदाकिनी बनकर प्रसिद्ध हो गई। मंदाकिनी फिर प्रसिद्धि से गुमनामी में गई और कुछ दिनों बाद पता चला कि उन्होंने एक बौद्ध मतावलंबी से शादी कर ली और अब फिल्मी दुनिया से दूर अपना पारिवारिक जीवन जी रही हैं।    


Saturday, August 30, 2025

फिर भी रहेंगी निशानियां


आज से करीब 70 वर्ष पूर्व राज कपूर की फिल्म श्री 420 आई थी। इस फिल्म ने राज कपूर के सोच और उनकी स्टोरीटेलिंग स्टाइल को बदल दिया। ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने उनकी व्यक्तिगत जिंदगी में भी बदलाव देखा। श्री 420 के पहले राज कपूर की फिल्म आवारा आई थी। फिल्म आवारा जब रिलीज हुई थी तो फिल्म समीक्षकों ने उसमें एक मार्क्सवादी अंडरटोन होने की चर्चा की थी। संभव है ऐसा हो। हलांकि राज कपूर अपने साक्षात्कारों में हमेशा इस बात का निषेध करते थे कि वो किसी विचार या विचारधारा से प्रेरित होकर फिल्म बनाते हैं। फिल्म आवारा ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी। अब्बास गहरे तक मार्क्सवादी विचारधारा में डूबे हुए थे। कहा जाता है कि जब इस फिल्म का स्क्रीनप्ले लिखा गया थी तो ख्वाजा अहमद अब्बास और वी पी साठे ने बेहद चतुराई के साथ कई दृष्यों और संवादों में परोक्ष रूप से कम्युनिस्ट विचार और उन विचारों का पोषण करनेवाली स्थितियां लिख दी थीं। एक समीक्षक ने तब लिखा भी था कि ख्वाजा अहमद अब्बास एक वैचारिक गाइड थे। राज कपूर जब इस फिल्म को लेकर अमेरिका गए थे तो वहां इसके प्रदर्शन के दौरान उत्साह नहीं दिखा था। कुछ महीनों बाद जब वो आवारा के प्रदर्शन के लिए सोवियत संघ गए तो वहां जबरदस्त सफलता मिली। आवारा के प्रदर्शन के लिए सोवियत संघ जाने के पहले से ही श्री 420 फिल्म आकार लेने लगी थी। इस फिल्म का नाम भी दिलचस्प है। 420 भारतीय दंड संहिता की एक धारा थी जो धोखेबाजी के केस में लगाई जाती थी। उसके ही आधार पर इस फिल्म का नाम श्री 420 रखा गया था। 420 के आगे श्री जानबूझकर लगाया गया था ताकि विवाद ना हो।  

फिल्म आवारा की तरह इसके नायक का भी नाम राजू था। ये भी लगभग आवारा ही था लेकिन पढ़ा लिखा था। देश को स्वतंत्र हुए सात-आठ साल हुए थे। नौजवानों के अपने सपने थे। उन्हीं सपनों को केंद्र में रखते हुए राज कपूर ने इस फिल्म के नायक के चरित्र को गढ़ा था। आवारा में जिस तरह से मार्क्सवादी अंडरटोन की बात होती थी वैसे ही इस फिल्म में राष्ट्रवादी अंडरटोन देखा जा सकता है। इस फिल्म का गीत मेरा जूता है जापानी, सर पे लाल टोपी रूसी.. खूब लोकप्रिय हुआ था। हिन्दुस्तानी दिल को ढंग से इस गाने में रेखांकित किया गया था। इस फिल्म में राज कपूर और नर्गिस पर फिल्माया गया अमर गीत, प्यार हुआ इकरार हुआ है जिसमें एक पंक्ति है, हम न रहेंगे तुम न रहोगे फिर भी रहेंगी निशानियां। इस गाने के एक सीन में राज कपूर के तीन बच्चे रणधीर, रितु और ऋषि कपूर भी थे। बारिश में फिल्माए इस गीत के दौरान बच्चे रेन कोट पहनकर राज और नर्गिस के सामने से निकल जाते हैं। रितू कपर ने जब राज कपूर पर पुस्तक लिखी थी तो एक चर्चा में उन्होंने मुझे बताया था कि किस तरह से वो इस सीन के बाद अपने पिता का ख्याल रखने लगी थी। उनकी मां बताती थीं कि उनको अगर पिता से कुछ कहना होता था तो वो एक कागज पर लिख कर उनके तकिए पर रख देती थीं। रितू ने बताया था कि चूंकि उनके पिता को मोगरे की खुशबू पसंद थी इसलिए वो अपने संदेश के साथ उनके तकिए पर मोगरे के फूल भी रख देती थी। 

इस फिल्म का एक और गाना मुड़ मुड़ के ना देख, नादिरा पर फिल्माया गया था। ये गाना भी हिट रहा था। इसके पहले भी नादिरा ने कई कामेडी फिल्मों में काम किया था लेकिन इस गाने ने उनको लोकप्रियता की नई ऊंचाई दी। इस फिल्म के पहले राज कपूर और नर्गिस के बीच का प्रेम बहुत गाढ़ा हो चुका था । नर्गिस के भाई जब उनसे कहते कि राज कपूर उसकी स्टारडम का उपयोग अपनी फिल्मों को सफल बनाने में कर रहे हैं तो वो इसे नकार देती थी। उनके भाई जब उनसे कहते कि राज कपूर अपनी फिल्मों में नर्गिस की शोहरत के हिसाब से स्क्रीन टाइम नहीं देते हैं तो वो इस पर ध्यान नहीं देती थी क्योंकि तब वो राज के प्रेम में दीवानी थी। जब श्री 420 रिलीज हुई तो नर्गिस को लगा कि राज कपूर ने इस फिल्म में उनके साथ न्याय नहीं किया है। तबतक दोनों के प्रेम में उसके अंजाम तक पहुंचने को लेकर बहसें भी होने लगी थीं। श्री 420 के बाद नर्गिस, राज कपूर से दूर जाने लगी थी। श्री 420 के साथ राज कपूर के कई किस्से जुड़े हुए हैं लेकिन अगर फिल्म के लिहाज से देखें, उसके क्राफ्ट को देखें तो ये एक मास्टरपीस थी। ये अनायास नहीं है कि सत्यजीत राय श्री 420 को राज कपूर की सबसे अच्छी फिल्म मानते थे. कहते भी थे। 


Wednesday, March 19, 2025

तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती


शशि कपूर भारतीय फिल्म जगत के ऐसे नायक हैं जिनके बारे में फिल्म जगत से जुड़े लोगों की राय अलग अलग थी। शशि कपूर के बड़े भाई राज कपूर, श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी से लेकर विदेशी निर्देशकों की राय अलग थी। पहले तो शशि को फिल्मों के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। संघर्ष पर आगे चर्चा करेंगे पहले सफलता के दौर की बात। जब शशि के पास खूब सारी फिल्में थीं। दिन-रात, तीन तीन शिफ्टों में फिल्मों की शूटिंग करते थे। एक साथ चार पांच फिल्में कर रहे थे। फिल्में भी यश चोपड़ा और मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशकों के साथ। लगभग यही समय था जब राज कपूर ने फिल्म सत्य शिवम सुंदरम बनाने की सोची। उन्होंने तय किया कि इस फिल्म में शशि कपूर को लिया जाए। शशि कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक दिन राज जी अचानक उनके पास पहुंचे। बोले- मैं एक फिल्म करने जा रहा हूं। आपको उस फिल्म में लेना चाहता हूं। पता नहीं आप कितने पैसे लेते हैं? मैं दे भी पाऊंगा कि नहीं। आप बहुत व्यस्त एक्टर हो गए हो। क्या पता आपके पास डेट्स हैं भी या नहीं। इतना सुनते ही शशि कपूर इमोशनल हो गए। उन्होंने झट से राज कपूर का पांव छू लिया और कहा आप जैसा कहेंगे वैसा कर लूंगा। आपको अपनी डायरी भिजवा देता हूं आपको जो और जितनी डेट्स चाहिए वो ले लीजिएगा। शशि कपूर ने राज कपूर को अन्य प्रोड्यूसर्स पर वरीयता दी। इस कारण कई प्रोड्यूसर्स नाराज भी हुए। शशि की व्यस्तता देखकर राज साहब से रहा नहीं गया। एक दिन जब वो सत्य शिवम सुंदरम के सेट पर पहुंचे तो राज कपूर ने कहा, शशि साहब अब आप टैक्सी एक्टर बन गए हो। शशि को समझ नहीं आया। वो चुपचाप खड़े रहे। राज कपूर हंसे और बोले आपकी हालत टैक्सी जैसी हो गई है। जो भी प्रोड्यूसर आपको काम दे दे आप उसके पास चले जाते हो। टैक्सी की तरह ये नहीं देखते कि कहां जाना है बस ये देखते हो कि मीटर डाउन है कि नहीं। शशि कपूर झेंप कर मेकअप रूम की ओर चले गए। 

राज कपूर साहब शशि कपूर को अपने बेटे की तरह मानते थे, ख्याल रखते थे। शशि कपूर के सफल होने के पहले की कहानी बेहद दारुण है। आज नेपोटिज्म की बात होती है। उन दिनों पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर के भाई को फिल्म में काम मांगने के लिए दर दर भटकना पड़ता था। बीस वर्ष की उम्र में शशि की शादी हो गई और एक साल बाद पुत्र पैदा हो गया। पृथ्वी थिएटर की नौकरी से अपने परिवार को पालना मुश्किल हो रहा था। उनकी पत्नी जेनिफर को 200 और उनको भी 200 रु मिला करते थे। की तरह से घर चलता था लेकिन वो खुश थे। सब चल रहा था कि पृथ्वी थिएटर बंद हो गया। शशि की नौकरी खत्म। अब संकट बड़ा था। ये वही दौर था जब शशि का फिल्मों की ओर झुकाव हुआ अन्यथा वो तो थिएटर में ही खुश थे। शशि रोज सुबह फिल्मिस्तान के गेट पर बैठ जाते थे ताकि निर्देशक की उनपर नजर पड़े और काम मिले। इसी बेंच पर उनकी मुलाकात धर्मेन्द्र और मनोज कुमार से हुई थी। वो दोनों भी फिल्मों में काम करने के लिए संघर्षरत थे। मनोज कुमार को तो रोल मिल गया लेकिन इन दोनों को नहीं। शशि को पता था कि राज कपूर को केदार शर्मा ने ब्रेक दिया था और वो पृथ्वीराज कपूर के दोस्त थे। वो उनके पास पहुंचे लेकिन रोल नहीं मिला। अचानक इनकी भेंट यश चोपड़ा से हुई। उन्होंने शशि को लेकर एक फिल्म बनाई धर्मपुत्र जो असफल रही। इसके बाद शशि कपूर को बिमल राय जैसे निर्देशक मिले लेकिन सफलता नहीं मिली। पांच लगातार फिल्मों में असफलता ने प्रोड्यूसर्स को इनसे दूर कर दिया। वो शशि को दिए एडवांस पैसे वापस मांगने लगे। पांच साल तक असफलता का ये दौर चला। 1965 में नंदा के साथ उनकी फिल्म जब जब फूल खिले सुपरहिट हुई। फिर तो निर्माताओं की लाइन उनके घर पर लगने लगी। शशि और जेनिफर ने जो झेला था उसका गहरा असर उनके मन पर था। जब जब फूल खिले की सफलता के बाद एक निर्माता ने उनको अपनी अगली फिल्म के लिए साइनिंग अमाउंट के तौर पर पांच हजार रुपए नकद दिए। जेनिफर ने डरते हुए शशि से कहा कि इस पैसे को छह महीने तक हाथ नहीं लगाएंगे। अगर अगली फिल्म पिट गई तो फिर वो पैसा वापस मांगने पहुंच जाएगा। दोनों ने यही किया। उस पैसे को छह महीने तक हाथ नहीं लगाया। हलांकि उसके बाद शशि कपूर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक हिट फिल्में। प्यार का मौसम, हसीना मान जाएगी, नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे, प्यार किए जा जैसी फिल्में खूब लोकप्रिय हुईं। 1970 के बाद भी उनकी फिल्में खूब चल रही थीं। सूची लंबी है। लेकिन ये समझना होगा कि हर सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी दास्तान होती है। क्योंकि सफलता का शार्टकट नहीं होता। 


Saturday, December 21, 2024

प्रेम और रोमांस का कुशल चितेरा


राज कपूर एक ऐसे फिल्मकार थे जो अपनी जिंदगी में घटित घटनाओं को अपनी फिल्मों में इस तरह पिरोते थे कि वो कहानी का बेहद दिलचस्प हिस्सा हो जाता था। दो फिल्मों का जिक्र जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी की घटनाओं को फिल्मों में रिक्रिएट किया। संगम फिल्म में एक सीन है। राज कपूर जब वैजयंतीमाला के पहनने के लिए गहना निकाल रहे होते हैं तो उनको एक पत्र मिलता है। वो उसको पढ़ना चाहते हैं। अचानक फोन की घंटी बजती है और वैजंयतीमाला उनके हाथ से कागज छीनकर दूसरे कमरे में चली जाती है। फोन पर बात करते-करते वो उस कागज को फाड़कर खिड़की से बाहर फेंक देती है। राज कपूर ये देख लेते हैं। दोनों पार्टी में जाने के लिए निकलते हैं तो राज कपूर रुमाल भूलने का बहाना करके वापस लौटते हैं। खिड़की के बाहर फटे कागज को उठाने लगते हैं। वैजंयतीमाला को शक होता है। वो वापस कमरे में आती है। दोनों में झगड़ा होता है। ये सब राज कपूर की असली जिंदगी में घटित हुआ था जिसको उन्होंने फिल्म संगम में उतार दिया। 1955 में राज और नर्गिस फिल्म चोरी चोरी की मद्रास (अब चेन्नई) में शूटिंग कर रहे थे। एक होटल में रुके थे। दोनों एक पार्टी में जानेवाले थे। देर हो रही थी। वो नर्गिस के पास पहुंचे तो देखा उसके हाथ में एक कागज था। राज ने कागज के बारे में पूछा कि ये क्या है। कुछ नहीं, कुछ नहीं कहकर नर्गिस ने कागज को फाड़ कर फेंक दिया। जब दोनों कार तक पहुंचे तो राज रुमाल भूलने का बहाना बनाकर वापस उसी जगह पहुंचे और डस्टबिन से फटे हुए कागज उठाकर अपने कमरे की दराज मे रख दिया। पार्टी से लौटेने के बाद राज ने फटे कागजों को जोड़कर पढ़ा। वो शाहिद लतीफ नाम के एक प्रोड्यूसर का प्रणय निवेदन था। दोनों में जबरदस्त झगड़ा होता है। राज कपूर ने अपनी जिंदगी की इस सच्ची घटना को संगम फिल्म में रख दिया। 

दूसरी घटना भी नर्गिस से ही जुड़ी हुई है। नर्गिस अपनी मां के साथ बांबे (अब मुंबई) के चित्तो मैंशन में रहती थीं। एक दिन राज कपूर उनके घर पहुंचे और उन्होंने घंटी बजाई। थोड़ी देर बाद एक सुंदर सी लड़की ने दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उसने अपने हाथ से बाल ठीक किए। वो सीधे रसोई से आई थी और उसके हाथ में बेसन लगा हुआ था। जब वो बाल ठीक कर रही थीं तो गीला बेसन उनके बालों में लग जाता है। राज कपूर के मन पर ये सुंदर दृश्य अंकित हो जाता है। वर्षों बाद जब वो बाबी फिल्म बनाते हैं तो ये दृष्य डिंपल कपाड़िया पर फिल्माते हैं। 

राज कपूर ने अपने लंबे फिल्मी करियर में एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में उस सपने को पर्दे पर उतारा जो कि भारतीय मध्यमवर्ग लगातार देख रहा था। अपने आंरंभिक दिनों में राज कपूर ने फिल्मों का व्याकरण और निर्माण कला की बारीकियों को सीखने के लिए इससे जुड़े प्रत्येक विभाग में कार्य किया। किशोरावस्था से ही वो सुंदर लड़कियों और महिलाओं के प्रति आकर्षित रहने लगे थे। कलकत्ता (तब कोलकाता) के अपने घर में उन्होंने जब बलराज साहनी की खूबसूरत पत्नी को देखा तो आसक्त हो गए थे। जब उनको केदार शर्मा ने फिल्म का आफर दिया तो उन्होंने बहुत संकोच के साथ उनके कान में फुसफुसफाते हुए कहा था कि प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। बेबी मुमताज को मधुबाला के नाम से जाना गया।

स्वाधीनता के पहले राज कपूर ने ‘आग’ फिल्म बनाने की सोची जो आजादी के बाद प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में राज कपूर ने स्वाधीन भारत के युवा मन को पकड़ने का प्रयास किया। इस फिल्म को सफलता नहीं मिली। इसके बाद राज कपूर ने ‘बरसात’ बनाई। इस फिल्म से राज कपूर पर धन और प्रसिद्धि दोनों की बरसात हुई। यहीं से राज ने एक टीम बनाई जिसने साथ मिलकर हिंदी फिल्मों में सार्थक हस्तक्षेप किया। नर्गिस, गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी, गायक मुकेश और लता मंगेशकर, संगीतकार शंकर जयकिशन, कैमरापर्सन राधू करमाकर और कला निर्देशक एम आर आचरेकर की टीम ने राज कपूर के साथ मिलकर हिंदी फिल्मों को एक ऐसी ऊंचाई प्रदान की जिसको छूने का प्रयत्न अब भी हो रहा है। 

शैलेन्द्र और राज कपूर के मिलने की दिलचस्प कहानी है। स्वाधीनता का संघर्ष अपने चरम पर था। बांबे (अब मुंबई) में प्रोफेशनल राइटर्स एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में शैलेन्द्र ने एक गीत गाया था, मेरी बगिया में आग लगा गया रे गोरा परदेशी। वहां राज कपूर भी थे। कार्.क्रम के बाद राज ने  शैलेन्द्र से अपनी फिल्म आग के लिए गीत लिखने का अनुरोध किया। शैलेन्द्र ने ये रहकर मना कर दिया कि वो पैसे के लिए कविता नहीं लिखते हैं। बात आई गई हो गई। आग के बाद जब राज कपूर अपनी अगली फिल्म की तैयारी कर रहे थे। एक दिन शैलेन्द्र उनके महालक्ष्मी वाले आफिस में पहुंचे। राज कपूर से मिलकर बोले शायद आप मुझे पहचान रहे हों। मेरी पत्नी गर्भवती और बीमार है, मुझे 500 रुपयों की आवश्यकता है। कुछ दिनों के लिए उधार दें। मैं रेलवे में नौकरी करता हूं। दो तीन महीने में वापस कर दूंगा। राज कपूर ने उनको रुपए दे दिए। दो महीने बाद शैलेन्द्र पैसे वापस करने आए। राज कपूर ने वापस लेने से मना कर दिया, बोले कि आपकी जरूरत के समय पैसे दिए थे मैं साहूकार नहीं कि पैसे देकर वापस लूं। स्वाभिमानी शैलेन्द्र को ये बात जंची नहीं। उन्होंने कहा कि मैं कर्ज कैसे उतारूं। राज कपूर ने हंसते हुए कहा कि अगर कर्ज उतारना चाहते हैं तो मेरी फिल्म बरसात के लिए गीत लिख दें। शैलेन्द्र ने बरसात के लिए दो गीत लिखे। राज की अगली आवारा के गीत लिखने के लिए शैलेन्द्र तैयार नहीं थे। ख्वाजा अहमद अब्बास के कहने पर उन्होंने आवारा के गीत लिखे। शैलेन्द्र और राज कपूर की मित्रता इस तरह से प्रगाढ़ हुई। 

फिल्म बरसात के बाद राज कपूर ने आर के स्टूडियोज की स्थापना की। यहीं अपनी फिल्म आवारा बनाई। ये फिल्म भारतीय गणतंत्र की मासूमियत को सामने लाती है। राज कपूर ने कहा भी था कि ये भारत के गरीब युवाओं के निश्छल प्रेम की कहानी है। इस फिल्म ने राज कपूर को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। आलोचकों ने तब इस फिल्म को साम्यवादी दृष्टि की प्रतिनिधि फिल्म बताने की चेष्टा की थी लेकिन राज कपूर किसी वाद की चौहद्दी में नहीं घिरे थे। फिल्म आवारा से लेकर राम तेरी गंगा मैली पर विचार करने के बाद ये लगता है कि राज कपूर प्रेम के ऐसे कवि थे जिनकी कविता फिल्मी पर्दे पर साकार होती रही। प्रेम पगे दृश्यों के बीच वो भारतीय समाज की विसंगतियों पर प्रहार भी करते चलते हैं। वो कहते थे कि मेरा पहला काम मनोरंजन करना है। ऐसा करते हुए अगर समाज को कोई संदेश जाता है तो अच्छी बात है। राज कपूर के बारे में उनके भाई शशि कपूर ने कहा था कि वो घोर परंपरावादी हिंदू हैं। इसका संकेत उनकी फिल्म के आरंभ में भी मिला करता था जहां उनके पिता पृथ्वीराज कपूर के शिवलिंग के सामने बैठकर श्लोक पढ़ने के दृष्य से होता था।


Sunday, December 8, 2024

मेरा नाम राजू...


दस ग्यारह वर्ष का एक बालक बाग में एयर गन से खेल रहा था। पेड़ पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। अचानक बालक ने एयर गन से चिड़ियों की झुंड पर फायर कर दिया। एक बुलबुल पेड़ से नीचे गिरी। उसकी मौत हो चुकी थी। बालक ने उसको प्यार से उठाया। बाग में ही गड्ढा खोदकर बुलबुल को उसमें डालकर मिट्टी से ढंक दिया। फिर कुछ फूल लाकर उसने उस जगह पर रखा। बुलबुल को श्रद्धांजलि दी। साथ खेल रहे भाई बहनों से भी फूल डलवाया। बाद में इस कहानी को उसने बेहद संवेदनशील तरीके से अपने परिवारवालों को सुनाया। मधु जैन ने अपनी पुस्तक में इस घटना का रोचक वर्णन करते हुए लिखा है कि वो बालक मास्टर स्टोरीटेलर राज कपूर था। कहना ना होगा कि राज कपूर में बचपन से ही कहानी कहने का ना केवल शऊर था बल्कि उसमें समय के अनुरूप रोचकता का पुट मिलाने का हुनर भी। वो कहानियों में संवेदना को उभारते थे। राज कपूर ने अपने लंबे फिल्मी करियर में एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में उस सपने को पर्दे पर उतारा जो कि भारतीय मध्यमवर्ग लगातार देख रहा था। अपने आंरंभिक दिनों में राज कपूर ने फिल्मों का व्याकरण और निर्माण कला की बारीकियों को सीखने के लिए इससे जुड़े प्रत्येक विभाग में कार्य किया। किशोरावस्था से ही वो सुंदर लड़कियों और महिलाओं के प्रति आकर्षित रहने लगे थे। कलकत्ता (तब कोलकाता) के अपने घर में उन्होंने जब बलराज साहनी की खूबसूरत पत्नी को देखा तो आसक्त हो गए थे। जब उनको केदार शर्मा ने फिल्म का आफर दिया तो उन्होंने बहुत संकोच के साथ उनके कान में फुसफुसफाते हुए कहा था कि प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। बेबी मुमताज को मधुबाला के नाम से जाना गया।

स्वाधीनता के पहले राज कपूर ने ‘आग’ फिल्म बनाने की सोची जो आजादी के बाद प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में राज कपूर ने स्वाधीन भारत के युवा मन को पकड़ने का प्रयास किया। इस फिल्म को सफलता नहीं मिली। इसके बाद राज कपूर ने ‘बरसात’ बनाई। इस फिल्म से राज कपूर पर धन और प्रसिद्धि दोनों की बरसात हुई। यहीं से राज ने एक टीम बनाई जिसने साथ मिलकर हिंदी फिल्मों में सार्थक हस्तक्षेप किया। नर्गिस, गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी, गायक मुकेश और लता मंगेशकर, संगीतकार शंकर जयकिशन, कैमरापर्सन राधू करमाकर और कला निर्देशक एम आर आचरेकर की टीम ने राज कपूर के साथ मिलकर हिंदी फिल्मों को एक ऐसी ऊंचाई प्रदान की जिसको छूने का प्रयत्न अब भी हो रहा है। फिल्म बरसात के बाद राज कपूर ने आर के स्टूडियोज की स्थापना की। यहीं अपनी फिल्म आवारा बनाई। ये फिल्म भारतीय गणतंत्र की मासूमियत को सामने लाती है। राज कपूर ने कहा भी था कि ये भारत के गरीब युवाओं के निश्छल प्रेम की कहानी है। इस फिल्म ने राज कपूर को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। आलोचकों ने तब इस फिल्म को साम्यवादी दृष्टि की प्रतिनिधि फिल्म बताने की चेष्टा की थी लेकिन राज कपूर किसी वाद की चौहद्दी में नहीं घिरे थे। फिल्म आवारा से लेकर राम तेरी गंगा मैली पर विचार करने के बाद ये लगता है कि राज कपूर प्रेम के ऐसे कवि थे जिनकी कविता फिल्मी पर्दे पर साकार होती रही। प्रेम पगे दृश्यों के बीच वो भारतीय समाज की विसंगतियों पर प्रहार भी करते चलते हैं। वो कहते थे कि मेरा पहला काम मनोरंजन करना है। ऐसा करते हुए अगर समाज को कोई संदेश जाता है तो अच्छी बात है। राज कपूर के बारे में उनके भाई शशि कपूर ने कहा था कि वो घोर परंपरावादी हिंदू हैं। 

राज कपूर ने अपनी फिल्मों में रोमांस का एक ऐसा स्वरूप पेश किया जो मिजाज में तो पश्चिमी था लेकिन उसमें भारतीयता के तत्व भी भरे हुए थे। उन्होंने एक ऐसी शैली विकसित की जिसमें पश्चिम की छाप थी लेकिन वातावरण और सामाजिक प्रतिरोध भारतीय था। आवारा में नर्गिस एक समय में दो पुरुषों से प्यार करती है। एक ऐसी नारी जो सोच और परिधान से पश्चिम से प्रभावित है लेकिन भारतीय वातावरण में रह रही है। इसका नायक भी समाज के तमाम बंधनों से मुक्त है। राज कपूर ने कैमरे की आंख से बाहर निकलकर एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जो दर्शकों को झटके भी दे रहा था लेकिन पसंद भी आ रहा था। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर में राज कपूर ने लाइटिंग से दृष्यों को जीवंत किया। रंगीन फिल्मों का दौर आया तो राज कपूर ने इंद्रधनुषी रंगों का बेहतरनी उपयोग करके दर्शकों को बांधने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद की फिल्मों में भी राज कपूर भारतीय जीवन के यथार्थ से टकराते रहे। नर्गिस से उनका रोमांस चरम पर था। देश विदेश में उनके साथ के दौरे चर्चा में रहते थे। 

राज कपूर की जिंदगी और उनकी फिल्मों का रास्ता बदलता है 1960 में। जब वो पद्मिनी को लेकर जिस देश में गंगा बहती है बनाते हैं। यहां से राज कपूर की फिल्मों में नारी देह पर कैमरा फोकस करने लगता है जो राम तेरी गंगा मैली तक निरंतर बढ़ता चला गया। इस बात पर बहस हो सकती है कि राज कपूर की फिल्मों में नारी देह का चित्रण जुगुप्साजनक होता है या सौंदर्य को उद्घाटित करने वाला। 1964 में राज कपूर की फिल्म आती है संगम। इस फिल्म से राज कपूर पूरी तरह से व्यावसायिक राह पर चल पड़े। लेकिन कलाकार मन फिर से दर्शन की ओर लौटने को बेताब था। 1970 में आई फिल्म मेरा नाम जोकर। फिल्म बिल्कुल नहीं चली। राज कपूर पर इस असफलता का गहरा प्रभाव पड़ा। यही वो दौर था जब उनके पिता का अमेरिका में इलाज चल रहा था। राज कपूर डिप्रेशन में तो गए लेकिन टूटे नहीं। पांच वर्ष बाद जब उनकी फिल्म बाबी आई तो उसने सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। हिंदी फिल्मों में रोमांस का रास्ता भी बदल दिया। बाबी के बाद की बनी कई फिल्मों में स्वाधीनता के बाद जन्मी पीढ़ी के किशोर और अल्हड़ प्रेम का प्लाट भी अन्य निर्माता निर्देशकों के हाथ लग गया। नारी देह पर घूमने वाला राज कपूर का कैमरा सत्यम शिवम सुंदरम में जीनत अमान की देह के विभिन्न कोणों पर पहुंचता है लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। नारी देह दिखाने का राज कपूर का फार्मूला हर फिल्म में नहीं चला। संगम में वैजयंती माला के अंग प्रदर्शन को दर्शकों ने पसंद किया लेकिन जब मेरा नाम जोकर में सिमी ग्रेवाल की नग्न टांगों को और सत्यम शिवम सुंदरम में जीनत के उत्तेजक दृष्यों को नकारा। फिर राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के देह दर्शन ने फिल्म को सफलता दिलाई। 1982 में जब राज ने प्रेम रोग बनाया तो इस फिल्म में सामतंवादी रूड़ियों पर प्रहार तो था लेकिन एक सुंदर प्रेम कहानी भी गढ़ी गई थी।

यहां ये भी ध्यान रखना चाहिए कि राज कपूर ने अपनी और अपने फिल्मों की अलग जगह उस समय बनाई जब महबूब खान और के आसिफ जैसे फिल्मकार फिल्में बना रहे थे। देवानंद, दिलीप कुमार और जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार निरंतर सफल हो रहे थे। समाजिक यथार्थ और रोमांस का ऐसा मिश्रण राज कपूर ने तैयार किया जिसमें गीत-संगीत से ऐसी मिठास घोली कि दर्शक चार दशकों तक उसके प्रभाव में रहा। राज कपूर की जन्मशती का उत्सव ग्रेट शौ मैन का स्मरण पर्व भी है। 


Saturday, November 16, 2024

महान कलाकारों के स्मरण का संयोग


किसी भी फिल्म फेस्टिवल के आयोजन का उद्देश्य देश में फिल्म संस्कृति का निर्माण करना होता है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने भी फिल्म फेस्टिवल की कल्पना की थी। आगामी 20 नवंबर से गोवा में अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिव का आरंभ हो रहा है। उसके बाद 5 दिसंबर से विश्व के सबसे बड़े घुमंतू फिल्म फेस्टिवल जागरण फिल्म फेस्टिवल की दिल्ली से शुरुआत हो रही है। भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के आयोजन अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन गोवा में होने जा रहा है। इस बार गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (ईफी) में भारतीय सिनेमा के चार दिग्गजों को भी याद किया जा रहा है। महान शोमैन राज कपूर, गायक मुहम्मद रफी, फिल्मकार तपन सिन्हा और अभिनेता ए नागेश्वर राव की जन्मशती मनाई जा रही है। इन चारों के फिल्मों का प्रदर्शन, उनके कार्यों और समाज पर उसके प्रभाव पर बात होगी। उनके जीवन और फिल्मों के आधार पर प्रदर्शनी लगाई जा रही है। जब हम फिल्म फेस्टिवल पर बात करते हैं और ये मानते हैं कि इससे देश में फिल्म संस्कृति का विकास होगा तो हमारे मानस में एक प्रश्न खड़ा होता है कि इसमें युवाओं की कितनी भागीदारी होगी। ईफी ने एक सराहनीय पहल की है। इस बार फिल्म फेस्टिवल की थीम ही युवा फिल्मकार है। इसमें युवा फिल्मकारों को मंच देने का प्रयास किया जा रहा है। देशभर के फिल्म स्कूलों से जुड़े चुनिंदा छात्रों को ना केवल ईफी में आमंत्रित किया गया है बल्कि उनके कार्यों को रेखांकित कर अंतराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने का उपक्रम भी किया गया है। पहली बार किसी फिल्म का निर्देशन करनेवाले युवा निर्देशक को सम्मानित करने के लिए जूरी ने मेहनत की है। कुछ वर्षों पूर्व 75 क्रिएटिव माइंड्स नाम से युवा फिल्मकारों को प्रोत्साहित करने का एक कार्यक्रम आरंभ किया गया था। इस अभियान के आरंभ में जुड़ने का अवसर मिला था। यह एक बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट था। ईफी के इस 55वें संस्करण में 75 क्रिएटिव माइंड्स की संख्या बढ़ाकर 100 क्रिएटिव माइंड्स कर दी गई है। 

अब बात कर लेते हैं उन महान फिल्मी हस्तियों की जिनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनपर विशेष आयोजन हो रहा है। ए नागेश्वर राव तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री को पहचान और नाम देने वाले कलाकार थे। करीब सात दशकों तक उन्होंने फिल्मों में जितना काम किया उसने तेलुगू सिनेमा की पहचान को गाढ़ा किया। उन्होंने एन टी रामाराव के साथ मिलकर तेलुगु फिल्मों को खड़ा किया। कहा जाता है कि तेलुगु फिल्मों के ये दो स्तंभ हैं। नागेश्वर राव का संघर्ष बहुत बड़ा है। वो एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुए थे। वो बचपन से ही फिल्मों में अभिनय करने का स्वप्न देखते थे। वो जब आठ नौ वर्ष के थे तभी से आइने के सामने खड़े होकर अभिनय किया करते थे। उनकी मां जब इसको देखती तो अपने बेटे को प्रोत्साहित करती। नागेश्वर राव की मां ने ही उनको अभिनय के लिए ना केवल प्रेरित किया बल्कि अपनी गरीबी के बावजूद उनको थिएटर में भेजने लगीं। इस बात को नागेश्वर राव स्वीकार भी करते थे कि अगर उनकी मां ना होती तो वो फिल्मों में नहीं आ पाते। रंगमंच पर नागेश्वर राव के काम की प्रशंसा होने लगी थी। 1941 में उनको फिल्मों में पहला काम मिला जब पुलैया ने अपनी फिल्म धर्मपत्नी में कैमियो रोल दिया। उनके इस काम पर प्रलिद्ध फिल्मकार जी बालारमैया की नजर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म सीतारामम जन्मम में केंद्रीय भूमिका के लिए चयनित कर लिया। स्वाधीनता के पूर्व 1944 में जब ये फिल्म रिलीज हुई तो नागेश्वर राव के काम की चर्चा हुई। पहचान मिली। 1948 में जब उनकी फिल्म बालाराजू आई तो उसको दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। उसके बाद तो वो तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार बन गए। ए नागेश्वर राव ने ढाई सौ से अधिक तेलुगु, तमिल और हिंदी फिल्मों में काम किया। एएनआर के नाम से मशहूर इस कलाकार को भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। 

जिस तरह से एएनआर ने तेलुगू फिल्मों को संवारा, कह सकते हैं कि राज कपूर ने भी हिंदी फिल्मों को एक दिशा दी। उनकी फिल्म आवारा का प्रदर्शन ईफी के दौरान किया जा रहा है। कौन जानता था कि जो बालक कोलकाता के स्टूडियो में केदार शर्मा से रील का रहस्य जानना चाहता था, जो किशोरावस्था में कॉलेज में पढ़ाई न करके अन्य सभी बदमाशियां किया करता था, जिसके पिता उसके करियर की चिंता में सेट पर उदास बैठा करते थे, वो रील की इस दुनिया में इतना डूब जाएगा, उसकी बारीकियों को इस कदर समझ लेगा या फिर रील में चलने फिरनेवाले इंसान के व्याकरण को इतना आत्मसात कर लेगा कि पहले अभिनेता राज कपूर के तौर पर और बाद में शोमैन राज कपूर के रूप में उनकी ख्याति पूरे विश्व में फैल जाएगी। राज कपूर ने ना केवल कालजयी फिल्में बनाईं बल्कि उन्होंने नई प्रतिभाओं को भी अवसर दिया। उनकी संगीत की समझ इतनी व्यापक थी कि अक्सर वो संगीतकारों के साथ होनेवाली संगत में फीडबैक दिया करते थे जिससे संगीत बेहद लोकप्रिय हो जाया करता था। कई गीतकारों और संगीतकारों ने इसको स्वीकार किया है। राज कपूर के सहायक रहे और फिर कई हिट फिल्मों का निर्देशन करनेवाले राहुल रवैल ईफी दौरान रणबीर कपूर के साथ संवाद करेंगे। 

तपन सिन्हा एक ऐसे निर्देशक थे जिन्होंने बेहतरीन फिल्में बनाईं। काबुलीवाला एक ऐसी फिल्म जिसको अंतराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। तपन सिन्हा की समाज और समकालीन राजनीति पर पैनी नजर रहती थी। वो अपनी फिल्मों के माध्यम से मनोरंजन तो करते ही थे फिल्मों के जरिए राजनीति की विसंगतियों पर प्रहार भी करते थे। तपन सिन्हा ने बंगाली, हिंदी और ओडिया में फिल्में बनाई। तपन सिन्हा ने बिहार के भागलपुर में अपनी स्कूली पढ़ाई की फिर पटना विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा। तपन सिन्हा ने अपना करियर साउंड इंजीनियर के तौर पर आरंभ किया था लेकिन उनके दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। वो फिल्म बनाना चाहते थे। जब उन्होंने फिल्मों का निर्देशन आरंभ किया तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनको डेढ़ दर्जन से अधिक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। सत्यजित राय और तपन सिन्हा ने मिलकर बांग्ला फिल्मों को एक नई ऊंचाई दी। वो एक बेहद अनुशासित निर्देशक थे और सुबह दस बजे फिल्मों की शूटिंग आरंभ करते थे और शाम पांच बजे समाप्त। उसके बाद गोल्फ खेलना उनकी दिनचर्या में शामिल था। 

मोहम्मद रफी के बारे में क्या ही कहना। वो भारत के ऐसे पार्श्व गायक थे जिनके गीतों को आज भी गुनगुनाया जाता है। ये देखना दिलचस्प होगा कि मोहम्मद रफी को ईफी में कैसे याद किया जाता है। ईफी की ओपनिंग फिल्म स्वातंत्र्य वीर सावरकर है। इस फिल्म को रणदीप हुडा ने निर्देशित किया है। गैर फीचर फिल्म श्रेणी में ओपनिंग फिल्म घर जैसा कुछ है जो लद्दाखी फिल्म है। इसके अलावा गीतकार प्रसून जोशी, संगीतकार ए आर रहमान और निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा फिल्मों की बारीकियों पर बात करेंगे। गोवा में आयोजित होनेवाले इस फिल्म फेस्टिवल को लेकर अंतराष्ट्रीय फिल्म जगत में भी एक उत्सकुता रहती है। इसमें कई बेहतरीन अंतराष्ट्रीय फिल्मों का भी प्रदर्शन होगा। चार भारतीय फिल्मी दिग्गजों को समर्पित ये फेस्टिवल लंबी लकीर खींच सकता है।      


Friday, June 21, 2024

ये मेरा प्रेम पढ़कर...


आज से 60 वर्ष पहले बनी फिल्म संगम का एक गाना है, ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम। उस गीत के पहले के एक दृष्य को याद करिए। फिल्म में आईने के सामने बैठकर वैजयंतीमाला गहने पहन रही होती हैं। राज कपूर आते हैं और नायिका से दूसरा गहना पहनने का अनुरोध करते हैं। वैजंयतीमाला कहती है कि तुम अपवनी पसंद के गहने निकाल लाओ। जब वो लाकर से गहना निकाल रहा होता है तो उसके हाथ एक प्रेम पत्र लगता है। वो उसको पढ़ने लगता है। वो जानना चाहता है कि किसने लिखा। तभी फोन की घंटी बजती है। वैजंयतीमाला उसके हाथ से प्रेमपत्र लेकर फोन उठाने दूसरे कमरे में चली जाती है। फोन पर बात करते-करते वो प्रेमपत्र फाड़कर खिड़की से बाहर फेंक देती है। राज कपूर ये देख लेते हैं। जब वो दोनों पार्टी में जाने के लिए निकलते हैं तो राज कपूर रुमाल भूलने का बहाना करके वापस घर में घुसते हैं। खिड़की के बाहर फटे प्रेमपत्र को उठा रहे होते हैं। वैजंयतीमाला को शक हो जाता है। वो भी वापस कमरे में आती है। दोनों में झगड़ा होता है। फिर राजकपूर पिस्तौल लेकर आते हैं। वैजंयतीमाला से कहते हैं कि जबतक उनको ये पता नहीं चल जाएगा कि ये खत किसने लिखे तबतक वो अंगारों पर लोटते रहेंगे, जैसे ही पता चलेगा ये अंगारा उसके सीने में उतार देंगे। इस संवाद के बाद दरवाजा बंद हो जाता है। पर्दे पर कुछ देर के लिए सन्नाटा। आपको लग रहा होगा कि इस दृष्य के बारे में विस्तार से चर्चा क्यों? वो इसलिए ये सीन राज कपूर की असली जिंदगी में घटित हुआ था जिसको उन्होंने फिल्म संगम में उतार दिया। 

1955 की बात है, राज कपूर और नर्गिस फिल्म चोरी चोरी की मद्रास (अब चेन्नई) में शूटिंग कर रहे थे। उस दौरान एक दिन दोनों के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ था। वो झगड़ा एक प्रेमपत्र को लेकर हुआ था। लगभग तीन दशक बाद राज कपूर ने पत्रकार सुरेश कोहली से बातचीत करते हुए ये स्वीकार भी किया था। जब दोनों के बीच बातचीत हो रही थी तो अचानक राज कपूर ने अपनी दराज से एक फ्रेम किया हुआ पत्र निकाला। उस पत्र के कुछ हिस्से गायब थे। फटे हुए टुकड़ों को चिपका कर फ्रेम करवाया गया था। राज कपूर ने उस दिन की बातचीत में दिल खोल दिया था, पूरी दुनिया रहती है कि मैंने नर्गिस को धोखा दिया। लेकिन कहानी इसके उलट है। हुआ ये कि हमलोग एक पार्टी में जानेवाले थे। देर हो रही थी। मैं नर्गिस के पास पहुंचा तो देखा उसके हाथ में एक कागज था। मैंने उससे पूछा कि क्या है तो उसने कहा, कुछ नहीं, कुछ नहीं। इतना कहकर उसने उस कागज को फाड़ दिया और मेरे साथ चल पड़ी। जब हम कार के पास पहुंचे तो मैं रुमाल भूलने का बहाना बनाकर वापस उसी जगह पहुंचा। तबतक मेड ने कागज के टुकड़ों को फर्श से हटाकर डस्टबिन में डाल दिया था। मैंने डस्टबिन से फटे हुए कागज उठाकर अपने कमरे की दराज मे रख दिया। जब हम पार्टी से लौटे तो उन फटे कागजों को जोड़कर पढ़ा। वो शाहिद लतीफ नाम के एक प्रोड्यूसर का प्रणय निवेदन था। नर्गिस ने पहली बार मुझसे झूठ बोला था और मेरा विश्वास तोड़ा था।‘  इस घटना के बाद राज कपूर और नर्गिस के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ था। कहा जाता है कि तभी से राज कपूर की जिंदगी में शराब का प्रवेश हुआ । राज कपूर ने अपनी जिंदगी की इस सच्ची घटना को संगम फिल्म में जस का तस रख दिया। फिल्म में भी इस घटना के बाद की पार्टी में राज जमकर शराब पीते हैं। 

संगम एक ऐसी फिल्म थी जिसने राज कपूर को प्रसिद्धि तो दिलाई लेकिन उनकी पारिवारिक जिंदगी में भूचाल ला दिया था। इस फिल्म की नायिका वैजंयतीमाला अचानक सफेद साड़ी पहनने लगी थी। माना जाता था कि जो स्त्री राज कपूर के प्रेम में होती थी वो सफेद साड़ी या कपड़े पहनने लगती थी।  उसके और राज कपूर के रोमांस के किस्से आम होने लगे थे। शम्मी कपूर ने अपनी भाभी कृष्णा कपूर को राज कपूर के नए रिश्ते को लेकर सावधान किया था। मुंबई  में चेंबूर के राज कपूर के घर में इस फिल्म के बनने के समय झगड़े शुरू हो गए थे। बात इतनी बढ़ी कि राज कपूर जब फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन के लिए लंदन गए तो कृष्णा को भी साथ लेकर जाना पड़ा। वैजंयतीमाला वहीं थीं। उस समय कृष्णा की मित्र ने उनसे पूछा था कि आप ये सब कैसे झेल पाती हैं। उन्होंने कहा था कि छाती पर पत्थर रखकर। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वैजंयतीमाला और राज कपूर के रिश्ते से कृष्णा इतनी झुब्ध हुईं कि घर छोड़कर चली गईं थी। वो तो भला हो इंकम टैक्स डिपार्टमेंट का कि राज कपूर के घर रेड मारी तो उनको अपनी पत्नी  की याद आई, क्योंकि सारे कागज वही संभालती थीं। किसी तरह मिन्नतें करके कृष्णा को वापस घर लाए। संगम को एक सुपर हिट फिल्म के तौर पर तो याद किया ही जाता है लेकिन उस दौरान राज कपूर की जिंदगी की बदलती कहानी भी याद आती है। 


Saturday, January 13, 2024

रामकथा प्रसंगों से भरी हिंदी फिल्में


श्रीरामजन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। 22 जनवरी को मंदिर में श्रीराम के बालस्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। पूरे देश के सनातनी इस समय रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्साहित हैं। ऐसे वातावरण में श्रीरामचरित पर, श्रीराम कथा पर अन्य भाषाओं में लिखे रामायण के विभिन्न आयामों पर चर्चा हो रही है। नई-नई पुस्तकें आ रही हैं। बच्चों के लिए रामकथा और श्रीरामजन्मभूमि पर कामिक्स का प्रकाशन हो रहा है। फिल्मों और सीरियल्स का निर्माण हो रहा है। ऐसे वातावरण में मन में सहज ही एक प्रश्न उठा कि श्रीराम कथा का हिंदी फिल्मों पर क्या प्रभाव रहा है। जब इस दिशा में विचार करने लगा तो सामने आया कि रामकथा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को लेकर हिंदी के फिल्मकारों ने फिल्में बनाई। फिल्म या पटकथा लिखनेवालों ने रामकथा से प्रसंग उठाए। उन प्रसंगों को आधार बनाकर आधुनिक परिवेश और पात्रों की रचना की और उनको कथासूत्र में पुरो दिया। ये बहुत ही रोचक विषय लगा । इसको सोचते हुए सचिन भौमिक और राजकपूर से जुड़ा एक किस्सा याद आ गया। सचिन भौमिक हिंदी फिल्मों से जुड़े सफलतम कहानीकारों में से एक हैं। उनकी लिखी कहानियों पर बनी फिल्में निरंतर सुपर हिट होती रही हैं। उनकी सफल फिल्मों की लंबी सूची है जिसमें अनुराधा, आई मिलन की बेला, जानवर, आया सावन झूम के, अराधना, गोल-माल, कर्ज, नास्तिक, झूठी, सौदागर, ताल आदि प्रमुख हैं। इन सफल फिल्मों में उन्होंने किसी की कहानी लिखी तो किसी फिल्म की पटकथा, लेकिन लेखक के रूप में वो बेहद सफल रहे हैं। बताया जाता है कि एक जमाने में निर्माताओं की वो पहली पसंद थे। कहना न होगा कि सलीम जावेद की जोड़ी से ज्यादा हिट फिल्में सचिन भौमिक के नाम पर दर्ज है। तो बात कर रहा था एक किस्से की। वो किस्सा है सचिन भौमिक और राज कपूर से जुड़ा। सचिन भौमिक कोलकाता (तब कलकत्ता) से मायानगरी मुंबई (तब बांबे) पहुंचे थे। उनकी इच्छा राज कपूर से मिलने की थी। वो इसके लिए प्रयत्न कर रहे थे। एक दिन वो राज कपूर से मिलने आर के स्टूडियो पहुंच गए। उन्होंने गेट पर अपना परिचय दिया लेकिन किसी कारणवश उस दिन राज कपूर से उनकी भेंट नहीं हो सकी। उनको अगले दिन के लिए मुलाकात का समय मिल गया। अगले दिन नियत समय पर सचिन भौमिक फिर से चेंबूर स्थित आर के स्टूडियो पहुंचे। उनको राज कपूर के कमरे में ले जाया गया। अभिवादन आदि के बाद राज कपूर ने उनसे मुलाकात का प्रयोजन जानना चाहा। सचिन भौमिक ने खुल कर अपनी इच्छा बताई और कहा कि वो उनके लिए फिल्म की कहानी लिखना चाहते हैं। राज कपूर ने धैर्यपूर्वक उनकी बात सुनी और कहानी भी। जब बातचीत खत्म हो गई तो राज कपूर ने कहा कि आप हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखते हो, अच्छी बात है, लिखते रहो लेकिन इतना ध्यान रखना कि हिंदी फिल्मों में कहानी तो एक ही होती है, ‘राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।‘ सचिन भौमिक ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज कपूर की ये बात उन्होंने गांठ बांध ली थी और वो कोई भी कहानी लिखते थे तो उनके अवचेतन में रामकथा अवश्य चल रही होती थी।

राज कपूर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण बात  सचिन भौनिक ने भी कही कि कहानी लिखते समय उनके अवचेतन रामकथा होती थी। इस अवचेतन मन की छाप आपको कई फिल्मों पर दिखेगी। अगर आप सुपरहिट फिल्म शोले पर विचार करें तो श्रीरामकथा का एक प्रसंग आपको उसमें दिखाई देगा। श्रीरामकथा में जब राक्षसों ने ऋषियों को बहुत तंग करना आरंभ कर दिया, यज्ञ आदि में बाधा डालने लगे तो विश्वामित्र ने राजा दशरथ से जाकर ये बातें बताईं। उनसे राक्षसों से मुक्ति के लिए राम और लक्ष्मण को साथ भेजने का आग्रह किया। राजा दशरथ पहले घबराए लेकिन फिर राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। दोनों भाइयों ने राक्षसों का वध करके ऋषियों के यज्ञादि में आनेवाले विघ्न को दूर किया। अब फिल्म शोले की कहानी को देखिए तो आपको इस प्रसंग की छाया वहां दिखाई देगी। ठाकुर बलदेव सिंह और उनकी बहू को छोड़कर डकैत गब्बर सिंह ने उनके परिवार के सभी सदस्यों की हत्या कर दी थी। रामगढ़ इलाके में उसका आतंक था। गब्बर के आतंक को खत्म करने के लिए ठाकुर जय और वीरू को रामगढ़ लेकर आते हैं। कहानी में तमाम तरह के मोड़ आते हैं और अंत में गब्बर के आतंक का अंत होता है। अब यहां अगर हम देखें तो विश्वामित्र वाले प्रसंग को कहानीकार ने उठाया और नए परिवेश और पात्रों को बदलकर कहानी में पिरो दिया। यहां हम सिर्फ विश्वामित्र के लिए राक्षसों को खत्म करने के लिए राम और रावण को ले जाने की बात कर रहे हैं। श्रीराम कथा में वर्णित दोनों भाइयों के चरित्र के बारे में बिल्कुल ही बात नहीं कर रहे हैं। इसी तरह से एक और फिल्म आई, कभी खुशी कभी गम। इसमें भी श्रीरामकथा का प्रसंग आपको दिखाई देगा। राजा दशरथ के वचन की रक्षा करने के लिए प्रभु श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास पर चले गए। इस फिल्म में भी अपने पिता यशवर्धन रायचंद के कहने पर उनका ज्येष्ठ पुत्र राहुल घर छोड़कर अपनी पत्नी के साथ विदेश चला जाता है। राहुल की माता नंदिनी को बहुत कष्ट होता है। वो घुटती रहती है। अब इस छोटे से प्रसंग को उठाकर करण जौहर ने बिल्कुल ही आधुनिक परिवेश और पात्रों के साथ फिल्म बना दी। यहां एक बार फिर से स्पष्ट करना चाहता हूं कि इसमें न तो श्रीराम के चरित्र का अंश है और ना ही उनका मर्यादित आचरण की झलक। बस प्रसंग वहीं से उठाए गए हैं। हिंदी फिल्मों में इस तरह के सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कई फिल्मों के गीतों में भी रामकथा के प्रसंग आपको दिख जाएंगे। स्वदेश फिल्म का गीत याद करिए, पल पल है भारी वो विपदा है आई, मोहे बचाने अब आओ रघुराई। आओ रघुवीर आओ, रघुपति राम आओ, मोरे मन के स्वामी, मोरे श्रीराम आओ। इतना ही नहीं कई फिल्मी गीत तो इतने लोकप्रिय हुए उसको सुनकर आम जनता के मन में श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है। फिल्म नीलकमल का गाना- हे रोम रोम में बसनेवाले राम, जगत के स्वामी, हे अंतर्यामी, मैं तुमसे क्या मांगू। या फिर 1961 की फिल्म घराना का गीत, जय रघुनंदन जय सियाराम से ऐसा ही प्रभाव उत्पन्न होता है। 

दरअसल श्रीराम कथा और उनका चरित्र इतना विराट है कि उससे जुड़े किसी प्रसंग को कहानीकार उठाते हैं और फिर उसकी पृष्ठभूमि में अपनी कथा रच लेते हैं। रामकथा तो गंगा है जो सदियों से बहती आ रही है और हर कोई अंजुलि भर जल वहां से लेता है। अपनी श्रद्धानुसार उसका उपयोग करता है। इसी तरह से रामकथा रूपी गंगा से फिल्मी कथाकार अंजुलि भर भर कर प्रसंग उठाते रहते हैं और अपनी शैली में, अपनी भावभूमि पर उसका उपयोग करते रहते हैं। श्रीराम कथा के मूल में है अर्धम पर धर्म की विजय और जितनी भी सुखांत हिंदी फिल्में हैं उसमें यही दिखता है। तमाम बाधाओं के बाद अधर्म का नाश होता है और धर्म की स्थापना होती है। यहां धर्म को व्यापक संदर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है। अब जबकि कई विश्वविद्यालयों में फिल्म अध्ययन केंद्र खुल गए हैं तो जरूरत इस बात की है कि वहां श्रीराम कथा के हिंदी फिल्मों पर व्यापक प्रभाव पर शोध हो, चर्चा हो और उसको जनता के सामने रखा जाए। कथाकारों के अवचेतन को समझा जाए।     


Saturday, May 13, 2023

वेब सीरीज ने खोली कम्युनिस्टों की पोल


इन दिनों एजेंडा फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म द केरल स्टोरी को एक विशेष वर्ग के लोग एजेंडा या प्रोपगैंडा फिल्म कहकर प्रचारित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि द केरल स्टोरी को एजेंडा फिल्म बतानेवालों ने फिल्म नहीं देखी है। दरअसल एक पूरा ईकोसिस्टम है जो वैकल्पिक विमर्श वाली फिल्मों को एजेंडा के तौर पर प्रचारित कर परोक्ष रूप से बहिष्कार करते हैं। कई फिल्में, डाक्यूमेंट्री या वेबसीरीज ईकोसिस्टम की विचारधारा के अनुकूल नहीं होती हैं। उनमें उनकी विचारधारा की करतूतों का पर्दाफाश होता है। ऐसी फिल्मों या वेबसीरीज के उन बिंदुओं को लेकर शोर मचाते हैं जिसमें विचारधारा की आड़ में की गईं करतूतें दब जाती हैं। उनपर जनता या दर्शकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा सके। ऐसी ही एक सीरीज है, जुबली। इस सीरीज में स्वाधीनता के कुछ वर्ष पहले और उसके बाद के चंद वर्षों की हिंदी फिल्मों की कहानी कही गई है। इसमें राय टाकीज के बनने उसके खत्म होने से लेकर नायकों के बनने और नायिकाओं की स्थितियों का चित्रण किया गया है। विक्रमादित्य मोटवानी के निर्देशन में बनी इस सीरीज में उस दौर के कई नायकों और नायिकाओं का चित्रण किया गया है। इस वेब सीरीज को लेकर जो विमर्श हो रहा है वो ये कि इसका नायक मदन कुमार किस हीरो के चरित्र से मेल खाता है।नायिका नीलोफर में किसकी छवि दिखती है। राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय का चरित्र क्या हिमांशु राय से मिलता है या मालकिन का किरदार देविका रानी से। क्या इसका एक और नायक जय खन्ना राज कपूर के व्यक्तित्व से प्रेरित है आदि। इस बात की दबी जुबान में भी चर्चा नहीं हो रही है कि रूसियों ने किस तरह से हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा चलाया। 

विक्रमादित्य मोटवानी ने इस सीरीज में उस दौर में हिंदी फिल्मों में सोवियत रूस और अमेरिका के एजेंडे को सामने लाकर रख दिया है। इस फिल्म के एक संवाद पर नजर डालते हैं। आवाम तक अपनी आवाज पहुंचाने के दो जरिए हैं, सिर्फ दो। सिनेमा और रेडियो। सोवियत संघ और अमेरिका इस समय दोनों भारत सरकार की खुशामद कर रहे हैं, सिनेमा और रेडियो में अपने पैर जमाने के लिए। कोल्ड वार शुरु हो चुका है। दोनों ही मुल्क अपने अपने प्रोपगैंडा के लिए फिल्में बनाना चाहते हैं। और इसी सिलसिले में सोवियत संघ ने अपना खास आदमी ब्लादीमीर यहां भेजा है। इन्होंने प्रोपगैंडा फिल्मों के लिए काफी काम किया है चाइना में। संवाद से स्पष्ट है कि सोवियत संघ हिंदी फिल्मों को लेकर कितना गंभीर था। वो उस दौर के उभरते हुए सितारे मदन कुमार को अपने एजेंडा के लिए काम करवाने के लिए उत्सुक था। उसको प्रोत्साहित करनेवाले राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय से रूस के प्रतिनिधियों की भेंट भी होती है। श्रीकांत राय उनके प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। रूसी उस समय हिंदी फिल्मों  में काफी निवेश करना चाहते थे। उनको कोई भी स्टार नहीं मिल रहा था जिसकी फिल्मों पर पैसा लगाया जा सके। परिस्थितियां इस प्रकार की बनती है कि जय खन्ना अपने फाइनेंसर वालिया को फिल्म बनाने के लिए तैयार करता है। ये दोनों रूसियों के संपर्क में आते हैं। एक बेहतरीन दृश्य है जब वालिया एक फिल्म का पोस्टर तैयार करवाता है। फिल्म का नाम होता है मजदूर। मजदूर की कहानी भी उसके पास नहीं होती है लेकिन वो कमिटमेंट कर देता है। उसके और जय खन्ना के बीच बहस होती है। जय कहता है कि उसके पास कहानी नहीं है तो वालिया उत्तर देता है कि मास्को में ढेर सारी टैरेटरी खुलनेवाली है। रूस का दरवाजा खुलावाना है। रशियन तीन फिल्मों का फाइनेंस करने को तैयार हैं। रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होगा जिसमें इन फिल्मों को दिखाया जाएगा। आदि आदि। इसलिए मजदूर की कहानी तो लिखनी होगी। उस दौर को याद करिए जिस दौर की बात हो रही है। राज कपूर की कई फिल्में आती हैं, रूस में रिलीज होती हैं। वहां के अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उनको दिखाया जाता है। राज कपूर की आरंभिक फिल्मों के बारे में कहा गया कि वो समाजवाद से प्रेरित हैं। उसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ या इप्टा लोकप्रिय होने लगा था। फिल्मों में रुचि रखनेवालों को याद होगा कि महबूब खान जिन्होंने मदर इंडिया बनाई उनके प्रोडक्शन हाउस का लोगो हशिया और हथौड़े के निशान के बीच में अंग्रेजी में एम लिखा था। वही हंशिया और हथौड़ा जो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का निशान था। प्रश्न यही उठता है कि क्या इन सबके बीच किसी प्रकार का कोई संबंध था। वेब सीरीज जुबली ने इन परिस्थितियों को दस एपिसोड में दर्शकों के सामने पेश कर दिया है। ये सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि ये बताता है कि कम्युनिस्टों ने हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा किस तरह से चलाया। विचार और विचारधारा का प्रोपगैंडा कैसे किया। 

फिल्मकारों को सोवियत रूस के प्रतिनिधि बताते थे कि सिस्टम के खिलाफ लड़नेवाला नायक कैसा होना चाहिए। फिल्मों में सेठ को गाली दी जानी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि गरीब अपने वेतन पर कपड़ा नहीं खरीद सकता, पूरे परिवार को खाना नहीं खिला सकता। अगर गरीब जाग गया तो सबकी रातों की नींद उड़ा देगा। फिल्मकारों को प्रलोभन दिया जाता था कि अगर उनकी फिल्में रूसियों की विचारधारा का प्रोपगैंडा करेंगी और उनके एजेंडा पर चलेंगी तो उनकी फिल्मों को तत्कालीन सोवियत संघ, तुर्की और यूरोप में प्रदर्शित करवाया जाएगा। फिल्म बनाने के लिए पैसे दिए जाएंगे। एक और बेहद चौंकानेवाला प्रसंग इस सीरीज में है। रूसी हिंदी फिल्मी गानों के विरुद्ध थे। 1952 में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों पर प्रतिबंध लगा दिया। कारण ये दिया गया कि ये गाने भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। रूसी भफी यही कहते थे। प्रश्न ये उठता है कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे या रूसी अपनी विचारधारा को गाढ़ा करने के लिए इनपर प्रतिबंध लगवाना चाहते थे। प्रतिबंध के दौर में अमरीकियों ने हिंदी गानों को रेडियो सिलोन पर बजवाने का प्रबंध किया था। राय टाकीज के मालिक जब रूसियों के सामने नहीं झुकते हैं तो उनकी तबाही का षडयंत्र रचा जाता है। उनकी पत्नी सुमित्रा को रूसी अपनी तरफ करते हैं। उनके वित्त विभाग की देखरेख करनेवाले को घूस भी दिया जाता है और वादा भी किया जाता है कि उनके बेटे का दाखिला मास्को के इंजीनियरिंग कालेज में करवा दिया जाएगा। उस दौर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के लिए कई छात्र सोवियत रूस गए थे। गजब समानता है। उस वक्त रूसियों ने फिल्मकारों के फोन टैप करके उनको ब्लैकमेल भी किया था। सरकारें खबरें भी रुकवा देती थीं। कहानी में इन सबका चित्रण है।  

आज जो कम्युनिस्ट या वाम विचारधारा के लोग फिल्मों में एजेंडा और प्रोपगैंडा की बात करते हैं उनको इस वेब सीरीज को देखना चाहिए। किस तरह से भारत की स्वाधीनता के बाद से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक हिंदी फिल्मों में रूसियों की विचारधारा का एजेंडा चलता रहा। किस तरह से वर्ग संघर्ष को बढ़ावा दिया गया।। कई फिल्मों में इसको नेहरू के समाजवाद और गांधी की ग्राम-व्यवस्था के बीच के संघर्ष के तौर पर दिखाया गया। उद्देश्य और मंशा तो वामपंथी विचार को बढ़ावा देना था। यह अनायास नहीं था कि इप्टा जैसे संगठन और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक लोकप्रिय होने लगे थे। कैफी आजमी से लेकर जावेद अख्तर तक इस तरह का लेखन कर रहे थे जिसमें वर्ग संघर्ष का चित्रण था। दस एपिसोड में विक्रमादित्य मोटवानी ने कुछ ही परतें खोली हैं, संभव है कि दूसरे सीजन में और भी दिलचस्प खुलासे हों।   


Saturday, December 10, 2022

कला पर भारी अभिनेताओं की छवि


वर्ष 2022 समाप्त होने को है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में इस वर्ष को हिंदी फिल्मों पर आए संकट के तौर पर याद किया जाएगा। इस संकट के कारणों को लेकर भी वर्ष भर चर्चा हुई। सिनेमा हाल में दर्शकों की कमी पर लगातार चिंता प्रकट की जा रही है। फिल्मों के जानकार अलग अलग कारणों की पड़ताल करने में जुटे हुए हैं। अभिनय के अलावा कहानी, पटकथा, निर्देशन से लेकर एडिटिंग की कमजोरी तक को हिंदी फिल्मों के नहीं चल पाने की वजह बताई जा रही है। कलाकारों के अभिनय में अति नाटकीयता को भी कुछ फिल्म समीक्षक रेखांकित कर रहे हैं। जो लेखक-समीक्षक हिंदी फिल्मों में कलाकारों की अति नाटकीयता को रेखांकित कर रहे हैं वो दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों के हिट होने की कारणों को जब गिनाते हैं तो उसमें कलाकारों की अति नाटकीयता को नजरअंदाज कर देते हैं। दक्षिण भारतीय फिल्मों में अति नाटकीयता आम है। हिंदी फिल्मों को किसी एक कारण से कम दर्शक नहीं मिल रहे हैं बल्कि उसके अनेक कारण हैं। 

हिंदी फिल्मों के निर्माण के दौरान पहले निर्देशक अपने साथी कलाकारों के साथ फिल्म की कहानी, उसके संवाद, उसके गीत और दृष्यों को लेकर खूब चर्चा करते थे। अपने साथी कलाकारों के साथ चर्चा करने से फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेता और निर्देशक के बीच एक सहज रिश्ता कायम हो जाता था। चूंकि अभिनेता या अभिनेत्री फिल्मों के दृष्यों पर या संवाद पर चर्चा में शामिल रहते थे इस वजह से उनके अभिनय में एक खास किस्म की स्वाभाविकता दिखाई देती थी। आर के स्टूडियो में राज कपूर की कुटिया में होने वाली बैठकी प्रसिद्ध है। पूरी पूरी रात वो अपने साथी कलाकारों के साथ फिल्म निर्माण पर, फिल्म के संगीत पर, फिल्म के संवाद पर बातें करते थे। इससे साथी कलाकारों और निर्देशकों के बीच एक रागात्मक संबंध विकसित होता था। सभी का सोच एक ही दिशा में जाता था। निर्देशक जिस फिल्म की परिकल्पना करता था, साथी कलाकार उस कल्पना को साकार करने में जुटते थे। वी शांताराम जैसे प्रसिद्ध निर्देशक भी अपने साथ काम करनेवाले कलाकारों के साथ फिल्म को लेकर लगातार बैठकें करते थे। के आसिफ जब मुगल ए आजम बना रहे थे तो उस दौरान अभिनेता चंद्रमोहन का निधन हो गया। प्रोड्यूसर सिराज अली हाकिम ने पाकिस्तान जाने का निर्णय किया जिसके कारण शूटिंग बंद हो गई थी। कई वर्षों के के बाद जब के आसिफ को दूसरे प्रोड्यूसर मिले और फिल्म पर नए सिरे से नए कलाकारों के साथ काम आरंभ हुआ तो तय किया गया कि फिल्म को अंग्रेजी और तमिल में भी बनाया जाएगा। आसिफ ने निणय लिया कि फिल्म की पटकथा नए सिरे से लिखी जाएगी। उन्होंने हिंदी फिल्म के लिए एहसान रिजवी, कमाल अमरोही, अमान और वजाहत मिर्जा को हिंदी पटकथा के लिए अनुबंधित किया। ये कलाकारों के साथ बैठकर मंथन का ही परिणाम था कि फिल्म मुगल ए आजम में जोधाबाई के संवाद के लिए हिंदी और उर्दू के शब्दों के साथ ब्रजभाषा के भी कई शब्दों का उपयोग किया गया। इस तरह के संवाद ने जोधाबाई के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया था। जब फिल्म की शूटिंग आरंभ हुई थी तो उसके पहले पृथ्वीराज कपूर के चलने के शाही अंदाज पर भी चर्चा हुई थी। तय किया गया था कि वो सीना तान कर अपेक्षाकृत धीरे-धीऱे चला करेंगे। इससे अकबर के व्यक्तित्व के चित्रण में सहायता मिली थी। हिंदी फिल्मों से जुड़े इस तरह के कई किस्से पुस्तकों में दर्ज हैं।    

अब हिंदी फिल्म निर्माण में स्थितियां लगभग पूरी तरह से बदल गई हैं। निर्देशकों और कलाकारों के साथ बैठक की परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों से फिल्म मेकिंग की कला सीखकर आए निर्देशकों ने फिल्म निर्माण की बारीकियां तो सीखी हीं फिल्म निर्माण का कथित प्रोफेशनल अप्रोच भी सीख लिया। अब हो ये रहा है कि निर्देशक फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को एक्सेल शीट पर बनाते हैं। इसको काल शीट कहते हैं। काल शीट में तिथि के अनुसार फिल्म निर्माण की गतिविधियां दर्ज होती हैं। कितने बजे कौन आएगा, कौन सा दृष्य फिल्माया जाएगा। अभिनेता कौन है, वो कितने बजे आएंगे, मेकअप में कितना समय लगेगा, कितने बजे शूट आरंभ होगा, कास्ट्यूम क्या होगा आदि के अलावा नजदीकी अस्पताल, एंबुलेंस के नंबर के साथ साथ सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी लिखा होता है। फिल्म निर्माण में अनुशासन और खर्च को व्यवस्थित करने के लिए काल शीट आवश्यक है। लेकिन जब काल शीट के अनुसार अभिनेताओं को अभिनय करने पर मजबूर किया जाता है तो उसका असर फिल्म पर पड़ता है। इस दौर के प्रसिद्ध अभिनेता ने एक किस्सा सुनाया। एक बार उनको काफी बुखार था। काल शीट के अनुसार उनको बारह बजे सेट पर पहुंचना था। उनपर काफी दबाव बनाया गया कि वो शूटिंग के लिए पहुंचे। सेट पर डाक्टर और एंबुलेंस की व्यवस्था रहेगी। वो दवा लेकर सेट पर पहुंचे। हर शाट के बीच डाक्टर उनकी नब्ज देखते थे और कहते थे कि सब ठीक है आप शूटिंग करिए। दवा खाकर तीन घंटे तक काल शीट के अनुसार उन्होंने अभिनय किया। बुखार का असर अभिनय पर फिल्म बनने के बाद भी दिखा। सुपर स्टार्स ने इसकी काट निकाल ली है। जब वो काल शीट के अनुसार नहीं आ पाते हैं तो कई शाट्स के लिए वो निर्माताओं से कहते हैं कि बाडी डबल का उपयोग कर लें। बाद में फेस रिप्लेसमेंट की तकनीक का उपयोग करके उसको स्वाभाविक दिखा दिया जाता है। 

हिंदी फिल्मों के निर्माण को जो एक दूसरी बात नुकसान पहुंचा रही है वो है स्टारडम। बड़े स्टार अब निर्देशकों की नहीं सुनते हैं। वो अपनी मर्जी से स्क्रिप्ट से लेकर सीन तक में बदलाव करवा लेते हैं। इतना ही नहीं वो इससे आगे जाकर अपनी वेशभूषा के बारे में भी निर्णय करने लगे हैं। कई सुपरस्टार को तो सेट पर निर्देशकों को निर्देशित करते हुए देखा जा सकता है। वो निर्देशक को बताते हैं कि फलां सीन को इस तरह से शूट किया जाए। इसका नुकसान ये होता है कि निर्देशक ने फिल्म के बारे में जो समग्र सोच बनाया है उसको सुरस्टार बाधित कर देते हैं। कुछ सुपर स्टार तो फिल्म के एडिट होने के बाद उसमें दृष्य जुड़वाते और कटवाते तक हैं। ये पहले भी होता था लेकिन उस समय अधिकतर सुपरस्टार अपने साथी कलाकारों के चयन में हस्तक्षेप करते थे। वो अपने मन मुताबिक नायिका का चयन करने के लिए निर्माता निर्देशक पर दबाव डालते थे। कई बार लोकेशन को लेकर भी। पर फिल्म निर्माण में दखल कम होता था। अब तो इन सुपरस्टार्स का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। उनको लगता है कि दर्शक उनके अभिनय को पसंद कर रहे हैं तो वो फिल्म को भी अपने हिसाब से बनवाएं। फिल्म निर्देशक बेचारगी में हथियार डाल देते हैं। उनको भी बड़ा बैनर और बड़ी फिल्म का नाम चाहिए होता है।  

आज जब आमिर खान और अक्षय कुमार जैसे सुपरस्टार्स की फिल्में एक के बाद एक फ्लाप हो रही हैं तो निर्माताओं को इन कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है। खुद को फिल्म में सबसे उत्तम दिखने की सुपरस्टार्स की मानसिकता निर्देशकों को महत्वहीन कर रही है। इस प्रवृत्ति को कम करना होगा। निर्देशकों को छूट देनी होगी कि वो अपने हिसाब से फिल्म बनाएं। काल शीट को लचीला बनाया जाए, कलाकारों के साथ फिल्म निर्माण को लेकर, उसको बेहतर बनाने को लेकर संवाद हो। सुपरस्टार्स निर्देशकों की सुनें और अपनी मनमानी कम करें। ये फिल्म जगत के लिए भी अच्छा होगा और कलाकारों के लिए भी। इन प्रवृत्तियों पर बात होनी चाहिए। 


Sunday, September 11, 2022

विरह और प्रेम का राग पहाड़ी


फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग लंबे अरसे से हो रहा है लेकिन जब संगीतकार लोक से जुड़े दृश्यों को दिखाते हैं तो उनकी पहली पसंद राग पहाड़ी होती है। जैसा कि इस राग के नाम से ही स्पष्ट है कि इसकी उत्पत्ति पहाड़ी इलाकों में हुई होगी। माना जाता है कि हिमालय की तराई वाले इलाकों में ये राग प्रचलन में रहा है। संगीत के जानकारों का कहना है कि राग पहाड़ी को सबसे पहले कश्मीर के लोकगीतकारों ने आरंभ गाना किया। संगीत की परंपरा में इसको बजाने का समय देर शाम या रात्रि के आरंभिक समय को माना गया है। इस राग का संबंध बिलावल थाट से है और इसमें राग पीलू की सुगंध भी महसूस की जा सकती है। इस राग की एक विशेषता ये भी है कि इसको आरोह और अवरोह में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इस राग की एक विशेषता ये है कि इसको सुनते हुए कई बार प्रेम की अग्नि और विरह की पीड़ा के साथ साथ प्रेमी की प्रतीक्षा करती नायिका के मनोभावों को इस राग में अभिव्यक्ति मिलती है। इस राग को सुनते हुए कई बार ये भ्रम होता है कि ये एक धुन है। अगर इसको बजाने या गानेवाला कलाकार अगर सिद्ध होता है तो इसके राग के आरोह और अवरोह को बरतने में इसके सरगम के मानकों का इतनी निपुणता से विन्यास करता है कि वो इसको राग की ऊंचाई प्रदान कर देता है। इसी कारण ये राग सधता है और लोक संगीत को एक खास प्रकार की कर्णप्रियता से सजाता है। 

फिल्मों में जब भी लोक से जुड़े प्रसंग आते हैं तो राग पहाड़ी संगीतकारों और गायकों की पसंद बन जाता है। राज कपूर ने राग पहाड़ी का अपनी कई फिल्मों में उपयोग किया है। फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में नायिका मंदाकिनी जब पर्दे पर ‘हुस्न पहाड़ों का ओ साहिबा, क्या कहना कि बारों महीने, यहां मौसम जाड़े का’ गाती है तो राग पहाड़ी अपने उत्स पर होती है। इस गाने का संगीत दिया है रवीन्द्र जैन ने और इसको लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से अमर कर दिया। आर डी बर्मन को भी राग पहाड़ी बेहद पसंद था और वो अपनी कई फिल्मों के गानों में राग पहाड़ी का उपयोग किया करते थे। 1966 में एक फिल्म आई थी ‘तीसरी मंजिल’ जिसमें एक गाना था ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना...।‘ इसको लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने। इस गीत में आर डी बर्मन ने बेहद खूबसूरती के साथ राग पहाड़ी का उपयोग किया था। आर डी बर्मन ने  इस गीत का संगीत तैयार करते समय राग पहाड़ी और जैज के छोटे टुकड़ों को गीत में पिरो दिया था। आशा और रफी की आवाज में ये गीत पचास साल से अधिक समय से श्रोताओं की पसंद बना हुआ है। 

Tuesday, February 8, 2022

प्रतिभा को मिलती रही अंतराष्ट्रीय मान्यता


कोरोना महामारी के दौर में ओवर द टाप (ओटाटी) प्लेटफार्म और तकनीक के अन्य माध्यमों के जरिए देश विदेश में फिल्मों का प्रदर्शन होता है। फिल्म निर्माता या कंपनी फिल्म के मुनाफे को प्रचारित करती हैं तो बहुधा फिल्म के विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय को भी जोड़ा जाता है। आमिर खान की फिल्म दंगल या इरफान खान अभिनित फिल्म हिंदी मीडियम की विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय पर भी खूब बातें हुईं। करण जौहर की फिल्मों की विदेश में सफलता को भी प्रचारित किया जाता रहा है। जब इन फिल्मों के विदेश में सफलता की बात होती है तो हम ये भूल जाते हैं कि भारतीय निर्माताओं की फिल्में स्वाधीनता के पहले से विदेशी दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। किश्वर देसाई ने अपनी पुस्तक द लाइफ एंड टाइम्स आफ देविका रानी में हिमांशु राय की फिल्म कर्मा के लंदन और बर्मिंघम के सिनेमा में प्रदर्शन और उसको लेकर उत्सुकता के बारे में विस्तार से लिखा है।  ये फिल्म 1933 में लंदन में रिलीज हुई थी और इसका निर्माण भारत, ब्रिटेन और जर्मनी के निर्माताओं ने संयुक्त रूप से किया था। इसके लीड रोल में हिमांशु राय और देविका रानी थी। 68 मिनट की इस फिल्म को देखने के लिए उस वक्त लंदन का पूरा अभिजात्य वर्ग उमड़ पड़ा था। आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर इस फिल्म का एक बड़ा पोस्टर लगा था जिसमें सिर्फ देविका रानी की तस्वीर लगी थी। इस फिल्म के बारे में लंदन के समाचारपत्रों में कई प्रशंसात्मक लेख छपे थे। उसके बाद भी कई हिंदी फिल्मों को विदेश में सराहना मिली थी। इससे परतंत्र भारत के फिल्मकारों और कलाकारों का स्वयं पर भरोसा भी गाढ़ा हुआ था। 

जब देश आजाद हुआ तो भारतीय फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों को लेकर पूरी दुनिया में एक उत्सुकता का माहौल बना। फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक इसकी वजह ये थी कि दुनिया के अलग अलग देशों के लोग भारत के बारे में जानना चाहते थे। 1952 में दिलीप कुमार और निम्मी की एक फिल्म आई थी ‘आन’। इस फिल्म को योजनाबद्ध तरीके से दुनिया के 28 देशों में रिलीज किया गया था। दुनिया की 17 भाषाओं में इस फिल्म का सबटाइटल तैयार किया गया था। लंदन में इस फिल्म के प्रीमियर पर ब्रिटेन के उस समय के प्रधानमंत्री लार्ड एटली के उपस्थित रहने का उल्लेख कई जगहों पर मिलता है। अंग्रेजी में इसको सैवेज प्रिंसेस तो फ्रेंच में मंगला, फी दिज आंद ( मंगला, भारत की लड़की) के नाम से रिलीज किया गया था। इस फिल्म में निम्मी ने जिस चरित्र को निभाया था उसका नाम मंगला था। इस फिल्म को कुछ समय बाद जापान में भी रिलीज किया गया था और वहां के दर्शकों ने भी इसको खूब पसंद किया था। राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ हिंदी में 1951 में रिलीज हो गई थी। 1954 में मास्को और लेनिनग्राद में भारतीय फिल्म फेस्टिवल में राज कपूर की इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया और वहां के अखबारों में राज कपूर के अभिनय की जमकर प्रशंसा हुई। राज कपूर का जादू ऐसा चला कि इस फिल्म को रूस के अन्य सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया गया। इस फिल्म के बाद ‘श्री 420’ आई उसको भी रूस के दर्शकों ने बेहद पसंद किया था। इस फिल्म के प्रीमियर पर जब राज कपूर वहां पहुंचे थे तो दर्शकों को काबू में करना मुश्किल हो गया था। फिर तो राज कपूर की हर फिल्म रूस में रिलीज होने लगी और व्यावसायिक रूप से भी सफल हुई । राज कपूर की फिल्मों को तो इजरायल के दर्शकों ने भी खूब पसंद किया था। वहां तो राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का गाना ‘ईचक दाना बीचक दाना’ तो इतना अधिक लोकपर्य हुआ कि इजरायल के गायक नईम ने उसको अपनी भाषा में गाया। कई फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि रूस और चीन में राज कपूर की फिल्में इस वजह से दर्शकों को पसंद आ रही थीं कि वो समाजवादी विचारधारा के नजदीक थीं। पर राज कपूर खुद कह चुके हैं कि उनकी फिल्में विचार या विचारधारा को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती हैं। उनकी फिल्मों में दर्शकों की संवेदना का ध्यान रखा जाता है। 

1960 के दशक और उसके बाद बनी फिल्में भी विदेश में लोकप्रिय हुईं जिनमें मुगले आजम प्रमुख हैं। 1965 आई देवानंद की फिल्म गाइड को भी विदेश में पसंद किया गया। उसके बाद शोले फिल्म को भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। कालांतर में करण जौहर की रोमांटिक फिल्मों ने भी अंतराष्ट्रीय दर्शकों को अपनी ओर खींचा लेकिन तबतक हिंदी फिल्मों में पैसा आ चुका था और तकनीक भी बेहतर हो चुकी थीं। तकनीक के मामले में भी अगर हिंदी फिल्मों के सफर को देखें तो हिंदी फिल्मकारों ने कम संसाधन होने के बावजूद बेहतरीन दृश्यों की संरचना की। व्ही शांताराम जैसे निर्देशक तो बैलगाड़ी के अगले हिस्से में कैमरा लगाकर जिमी जिब तैयार कर मूविंग शाट्स लेते थे। उस जमाने में एल्यूमिनियम शीट्स पर पानी डालकर समंदर की लहर का अहसास करवाने वाले शाट्स बनाए जाते थे। तकनीक के मामले में भी हिंदी फिल्मों ने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है। वीएफएक्स के इस दौर में तो गानों से लेकर नायकों की त्वचा तक को बेहतर बनाया जा सकता है। इस तरह से हम देखें तो भारतीय फिल्मकारों ने स्वाधीनता के पहले जो एक विश्वास अर्जित किया था उसकी बुनियाद पर बाद के फिल्मकारों ने सफलता की बुलंद इमारत खड़ी की। 

Saturday, December 25, 2021

आत्मकथा और जीवनियों का वर्ष


वर्ष 2021 बीतने को आया। कुछ दिनों बाद ये वर्ष इतिहास हो जाएगा। इस वर्ष का उत्तरार्ध कोरोना महामारी के भय में गुजरा। चारो ओर कोरोना संक्रमण की बातें हो रही थीं। संक्रमण के फैलने की आशंका से जो भय का वातावरण बना था उसने सिनेमा जगत को भी प्रभावित किया। सिनेमा हाल लंबे समय तक बंद रहे, नई फिल्मों के निर्माण पर असर पड़ा, फिल्म जगत के सामने ओटीटी (ओवर द टाप) प्लेटफार्म चुनौती बनकर खड़े हो गए। सिनेमा हाल की व्यवस्था पर ऐसा ही बड़ा असर तब पड़ा था जब 1980 के बाद के वर्षों में देश में वीसीआर और कैसेट पर फिल्में देखने का चलन बढ़ा था। 2020 में फिल्म जगत का जो परिदृश्य बदलने लगा था वो बदलाव 2021 में और गाढ़ा हुआ। वीसीआर के दौर में तकनीक की वजह से सिनेमा दर्शकों का स्वभाव बदला था और अब भय की वजह से फिल्में देखने का माध्यम बदला। सिनेमा से जुड़े लोग अब भी दर्शकों के सिनेमा हाल में वापसी को लेकर आशंकित हैं। फिल्म निर्माण, वितरण और उसके अर्थशास्त्र को लेकर तमाम तरह की आशंकाओं के बीच वर्ष 2021 में फिल्म से जुड़ी एक विधा में उम्मीद की किरण नजर आई।  वर्ष 2021 में फिल्मों से जुड़े लोगों की आत्मकथाएं और जीवनियां प्रकाशित हुई। इनमें से कई पुस्तकें काफी चर्चित रही और बेहद लोकप्रिय भी हुईं। आत्मकथा या जीवनी या संस्मरण ऐसी विधा है जिसके ज्यादातर लेखक अपने को कसौटी पर नहीं कसते या अपने से जुड़े अप्रिय प्रसंगों को छोड़ देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि फिल्मी आत्मकथाएं या जीवनियां उबाऊ और बोझिल हो जाती हैं। 2021 में इस विधा की कई पुस्तकें ऐसी आईं जिनमें बहुत हद तक लेखक ने खुद को कसौटी पर कसा है और अपने से जुड़े अप्रिय प्रसंगों को भी लिखा है। ज्यादातर लेखकों ने ईमानदारी बरती। 

सबसे पहले चर्चा करना चाहूंगा कबीर बेदी की आत्मकथा स्टोरीज आई मस्ट टेल, द इमोशनल लाइफ आफ एन एक्टर की। कबीर बेदी ने इसमें काफी हद तक ईमानदारी से अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें लिखी हैं। कबीर बेदी अपने बचपन की यादों को भी इस पुस्तक में लेकर आते हैं। 1970 के बाद के वर्षों में मुंबई में फिल्मों से जुड़े कई युवाओं का एक ‘बोहेमियन जूहू गैंग’ होता था, जिसमें कबीर के अलावा शेखर कपूर, डैनी, महेश भट्ट, परवीन बाबी और शबाना आजमी आदि हुआ करते थे। कबीर बेदी ने उन वर्षों को रोचक अंदाज में याद किया है। इस पुस्तक में अपने कई संबंधों के बारे में भी बेबाकी से लिखा है। अपने पहले प्यार और पत्नी प्रतिमा बेदी के साथ साथ परवीन बाबी से अपने अफेयर पर भी लिखा है। हलांकि प्रतिमा बेदी ने अपनी पुस्तक टाइमपास, द मेमोरीज आफ प्रतिमा बेदी में इन प्रसंगों को अलग तरीके से लिखा है। कबीर ने परवीन बाबी की मानसिक स्थिति पर भी तटस्थ होकर लिखा है। इसमें उन्होंने परवीन बाबी के पत्रों का उल्लेख भी किया है। कबीर बेदी जब अपने युवा पुत्र की आत्महत्या के बारे में लिखते हैं तो पाठक उनकी संवेदना के साथ खुद को एकाकार कर लेता है। अपनी पीड़ा और संत्रास को उन्होंने कोमल गद्य के सहारे अपनी पुस्तक में आगे बढ़ाया है। कबीर बेदी के माता पिता स्वाधीनता सेनानी थी और उनका चिंतन गहरा था। अपनी इस पुस्तक में कबीर बेदी ने कई जगहों पर अपने अभिभावकों की सीख को भी उद्धृत किया है। बेदी धर्म को लेकर भी अपनी राय पाटकों के सामने रखते हैं। एक अध्याय में तो गुरू नानक, कबीर और सूफी संतों के हवाले से कई दार्शनिक बातें भी कहते हैं। इसमें वो गीता और बुद्ध के ज्ञान को भी अपने तरीके से पाठकों के सामने रखते हैं। अगर समग्रता में देखें तो कबीर बेदी की ये पुस्तक फिल्म से जुड़े किस्से तो बताती है लेकिन साथ ही इसमें एक पूरा कालखंड भी जीवंत होता है।   

फिल्मों से जुड़ी एक और शख्सियत नीना गुप्ता की आत्मकथा ‘सच कहूं तो’ भी इस वर्ष प्रकाशित हुई। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित हो और उसका शीर्षक हिंदी के शब्दों का हो। नीना गुप्ता ने ये किया। नीना गुप्ता की आत्मकथा से पाठकों को ये उम्मीद रही होगी कि इसमें उनकी और विवियन रिचर्ड्स की लव स्टोरी का किस्सा  होगा। इस पुस्तक में नीना ने रिचर्ड्स से अपने संबंधों के बारे में नहीं बताया लेकिन उनको पाठकों की अपेक्षा का अंदाज रहा होगा। उन्होंने इस बारे में लिखा कि वो उन स्थितियों को अपने और रिचर्ड्स की बेटी मसाबा गुप्ता की खातिर दोहराना नहीं चाहती हैं। वो नहीं चाहती हैं कि एक बार फिर से उन स्थितियों को लेकर उनकी बेटी के सामने अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो। पर उन्होंने मातृत्व के अपने अनुभवों को और एक अनव्याही मां को लेकर समाज की प्रतिक्रियाओं के बारे में लिखा है। अपनी जिंदगी के उतार चढ़ाव को भी उन्होंने स्वीकार किया है। इस पुस्तक में एक बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि नीना ने अपने आसपास के लोगों का नाम लेकर उनको शर्मिंदा नहीं किया। संकेतों में बात करके निकल गई हैं। जब नीना गुप्ता अपनी फिल्म बाजार सीताराम बना रही थीं तो वो उन्होंने श्याम बेनेगल से बात की थी। बेनेगल ने उनको सलाह दी थी कि हमेशा इस बात को याद रखना कि किसी भी कहानी का एक निश्चित आरंभ हो, उसका सुगठित मध्य भाग हो और उसका तार्किक अंत हो। अगर किसी कहानी में ये तीनों चीजें हैं तो वो कहानी कभी पिट नहीं सकती। ये सीख उनके जीवन में बहुत काम आई। नीना गुप्ता ने इसमें अपने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दिनों को बेहद संजीदगी से याद किया है। इस पुस्तक में भी छिपाया कम बताया ज्यादा गया है। 

तीसरी पुस्तक जिसकी चर्चा की जानी चाहिए वो है अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा जोनस के संस्मरणों की किताब, अनफिनिश्ड । इस पुस्तक को लेकर इंटरनेट मीडिया पर जबरदस्त उत्सुकता का माहौल बना था। आनलाइन बुक स्टोर में अपने प्रकाशन के कई महीनों बाद तक ये पुस्तक लोकप्रियता के शीर्ष पर बनी रही थी। इस पुस्तक की शुरुआत उसके दस साल के भाई के अपनी बहन को मिस इंडिया प्रतियोगिता में भेजने के प्रसंग से होती है। प्रियंका के घर में दो बेडरूम थे। एक उसका था और एक माता पिता का। भाई को एक छोटे से कमरे में जगह दी गई थी और दस साल का बच्चा अपना बड़ा और अच्छा बेडरूम चाहता था। इसलिए उसने अपनी बहन को मिस इंडिया में भेजने की योजना बनाई ताकि वो उसके बेडरूम में रह सके। प्रियंका ने अमेरिकी फिल्मों में काम करने के लिए जो संघर्ष किया वो भी लिखा है। हिंदी फिल्मों की दुनिया से जुड़े प्रसंग भी हैं। दो अन्य पुस्तकों का उल्लेख भी आवश्यक है। एक है संजीव कुमार की आधिकारिक जीवनी, एन एक्टर्स एक्टर।  इसको हनीफ जरीवाला और सुमंत बत्रा ने लिखा है। संजीव कुमार पर कम लिखा गया और ये पुस्तक उस कमी को पूरा करती है। एक और पुस्तक अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है, राज कपूर द मास्टर एट वर्क। ये पुस्तक राहुल रवैल और प्रियंका शर्मा की है। राहुल रवैल लंबे समय तक राज कपूर के सहायक रहे हैं, लिहाजा उन्होंने राज कपूर से जुड़े कई दिलचस्प प्रसंग लिखे हैं, कुछ व्यक्तिगत संसमरणों को भी जगह मिली है। महामारी की आशंका के बीच फिल्मों से जुड़े इन व्यक्तित्वों ने पाठकों के सामने स्तरीय पठनीय सामग्री पेश की है। आनलाइन बुक स्टोर में लोकप्रियता की सूची में इन पुस्तकों की रैकुंक देखकर इस बात का संकेत मिलता है कि पाठकों ने भी इन आत्मकथाओं और जीवनियों को पसंद किया है। 

Wednesday, July 7, 2021

दो सितारों की दोस्ती की मिसाल


दिलीप कुमार के पेशावर से मुंबई (तब बांबे) आने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया में कई बदलाव आने लगे थे। कारोबार के अवसर कम हो गए थे और कारोबारी नए नए व्यवस्या की तलाश में इधर उधर जाने लगे थे। दिलीप कुमार के पिता भी कारोबार के सिलसिले में मुंबई आ गए थे। एक दिन बेहद दिलचस्प घटना घटी। शाम को दिलीप साहब के पिताजी मुंबई के अपोलो बंदर इलाके में टहल रहे थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक दंपति अपने बेहद खूबसूरत बच्चे को प्रैम में लिटाकर टहल रहे थे। उस बच्चे के चेहरे को देखकर उनको अपने छोटे से बच्चे युसूफ की याद आ गई। वो प्रैम तक पहुंचे और बच्चे को उठाकर गले से लगा लिया। हट्टे-कट्ठे पठान को प्रैम से अपने बच्चे को उठाते देखकर दंपति शोर मचाने लगे। ये देखकर युसूफ के पिताजी ने बच्चे को प्रैम में लिटा दिया और दंपति से ये कहकर क्षमा मांगी कि बच्चे को देखर उनको अपने बेटे की याद आ गई थी इसलिए गोद में उठा लिया था। लेकिन इस घटना ने एक पिता को बेचैन कर दिया। वो पेशावर लौट गए और फिर अपनी पत्नी और सात बच्चों को लेकर मुंबई आ गए। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वो अपने परिवार के साथ फ्रंटियर मेल से मुंबई के लिए रवाना हो गए। ठीक से याद नहीं पर ये 1935 के आसपास की बात होगी। ये उनकी पहली ट्रेन यात्रा थी, इस वजह से सभी बच्चे बेहद उत्साहित थे। रास्ते में उनके रिश्तेदार और पहचान वाले उनसे मिलने आते थे और कहीं सामिष तो कहीं निरामिष भोजन मिलता था। दिलीप कुमार ने एक बेहद अजीब सी बात लिखी है अपनी आत्मकथा में। उन्होंने लिखा है कि जब ट्रेन स्टेशन पर रुकती थी तो चायवाले जोर जोर से चिल्लाते थे- हिंदू चाय, हिंदू पानी, मुस्लिम चाय, मुस्लिम पानी। दिलीप कुमार के मुताबिक उनके परिवार के लोग इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं देकर कोई भी पानी और कोई भी चाय पी ले रहे थे। उनके डब्बे में बैठे कई लोग भी ऐसा ही कर रहे थे लेकिन कई लोग अपने धर्म के हिसाब से चाय और पानी पी रहे थे। सुबह सुबह इनकी ट्रेन कोलाबा पहुंची और वहां से तांगा करके ये लोग किराए के घर में क्रॉफर्ड मार्केट के निकट नागदेवी रोड पर अब्दुल्ला बिल्डिंग में रहने आ गए। वहां तीन कमरों के फ्लैट में दिलीप कुमार का परिवार रहने लगा। दिलीप कुमार की पढ़ाई भी शुरु हुई और 1937 में उनके पिता ने उऩका नामांकन अंजुमन इस्लाम हाई स्कूल में पांचवीं क्लास में करवा दिया। फिर वहां से वो खालसा कॉलेज पहुंचे जहां रा कपूर से उनकी मुलाकात हुई। दोनों का पेशावर कनेक्शन था और दोनों दोस्त बन गए। दिलीप कुमार के पिता सरवर खान और राज कपूर के दादा बसेश्वरनाथ मित्र थे। सरवर खान बहुधा बसेश्वरनाथ को कहा करते थे कि यार! तुम कैसे अपने बेटे पृथ्वीराज को नाचनेवालियों के साथ काम करने की इजाजत दे देते हो। उस दौर में फिल्मों में कई लोग पेशेवर नृत्यांगनाओं के बारे में इस शब्द का प्रयोग करते थे। जब युसूफ खान को देविका रानी ने फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया था तब दिलीप कुमार अपने पिता के रुख से परिचित थे, उनको इस बात की आशंका भी थी कि पिता उनको अनुमति नहीं देंगे। उन्होंने अपनी मां को बताया कि उनको एक नौकरी मिल गई है। मां ने जब पूछा कि क्या नौकरी मिली है तो उन्होंने ये कहकर मां को बरगला दिया कि उनकी अच्छी उर्दू की वजह से नौकरी मिली है।

बांबे टॉकीज में एक दिन अचानक उनको राज कपूर मिल गए, दोनों ने आश्चर्य से एक दूसरे को आश्चर्य से देखा और राज कपूर ने देविका रानी के सामने ही पूछ लिया कि तुम्हारे पिता जानते हैं कि तुम फिल्मों में काम करते हो। दिलीप कुमार ने फौरन बात बदल दी और खालसा कॉलेज के दौर की अपनी और राज कपूर  बातें देविका रानी को बताने लगे। बाद में राज और दिलीप कुमार की दोस्ती और परवान चढ़ी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि ‘संगम’ फिल्म के लिए राज कपूर ने दिलीप कुमार को ऑफर दिया था जिसे दिलीप साहब ने ठुकरा दिया था। तब दिलीप कुमार और राज कपूर के बीच एक खास तरह का खिंचालव रहता था, प्रतिद्वंदिता थी। जब राज कपूर दिल्ली के एम्स के आईसीयू में भर्ती थे और जिंदगी की जंग लड़ रहे थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे थे। राज कपूर अचेत थे। दिलीप कुमार ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगे ‘उठ जा राज! अब उठ जा, मसखरापन बंद कर। तू तो बेहतरीन कलाकार है जो हमेशा हेडलाइंस बनाता है। मैं अभी पेशावर से आया हूं और चपाली कबाब लेकर आया हूं। याद है राज हम बचपन में पेशावर की गलियों में साथ मिलकर ये स्वादिष्ट कबाब खाया करते थे।‘ बीस मिनट तक दिलीप कुमार आईसीयू में राज कपूर का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलते रहे थे। आज दिलीप कुमार के निधन से एक युग का अंत हो गया। 

https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-dilip-kumar-unknown-facts-personal-and-professional-life-and-career-21806889.html

Thursday, March 11, 2021

जीवन का 'आनंद'


किसी भी फिल्म को अगर क्लासिक का दर्जा मिलता है तो उसके पीछे कई कारण होते हैं, कई लोगों की मेहनत होती है। फिल्म ‘आनंद’ को अगर आज 50 साल बाद भी लोग पसंद कर रहे हैं तो इसके पीछे कहानी, संवाद, निर्देशन, अभिनय, गीत, संगीत और संपादन का समुच्चय है। ‘आनंद’ एक ऐसी फिल्म है जिसके निर्माण को लेकर कई बेहद रोचक किस्से हैं। इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी ने जब पहली बार एक कैंसर के युवा मरीज और उसके दोस्त को केंद्र में रखकर फिल्म बनाने की सोची थी तब उनके दिमाग में आनंद सहगल की भूमिका के लिए राज कपूर का नाम था। दोनों गहरे मित्र भी थे। तय भी हो गया था कि राज कपूर इस फिल्म में काम करेंगे। ये साल था 1955। लेकिन उसके बाद ह्रषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की अन्य व्यस्तताओं की वजह से फिल्म का निर्माण टलता रहा। जब ह्रषिकेश मुखर्जी और एन सी सिप्पी ने फिल्म निर्माण के लिए हाथ मिलाया तो मुखर्जी ने सिप्पी को कैंसर मरीज वाली कहानी सुनाई। उनको कहानी बेहद पसंद आई। फिल्म पर काम शुरू हुआ। लेकिन तबतक राज कपूर की उम्र चालीस पार हो चुकी थी और वो युवा मरीज के रोल में फिट नहीं बैठ रहे थे। शशि कपूर के बारे में विचार चल रहा था कि एक दिन अचानक ह्रषिकेश मुखर्जी के घर राजेश खन्ना पहुंचे और इस फिल्म में काम करने की इच्छा जताई। मुखर्जी ने साफ तौर पर राजेश खन्ना को कहा कि वो उनकी फीस नहीं दे पाएंगे क्योंकि फिल्म का बजट बहुत कम है। तब राजेश खन्ना एक फिल्म के पांच लाख रुपए लेते थे। राजेश खन्ना ने कहा कि उनको फीस नहीं चाहिए इसके बदले में उनको बांबे(अब मुंबई) क्षेत्र में फिल्म वितरण का अधिकार दे दिया जाए। मुखर्जी ने कहा कि वो सिप्पी से बात करके बताएंगे। उनके घऱ से निकलने के पहले राजेश खन्ना ने उनसे एक वादा ले लिया कि अब वो शशि कपूर से बात नहीं करेंगे। इसी तरह से अभिनेता ओमप्रकाश ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और अमिताभ से मिलने के बाद ह्रषिकेश मुखर्जी उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। 

सिप्पी की स्वीकृति के बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। राजेश खन्ना सेट पर हर रोज देर से आते थे। एक दिन जब राजेश खन्ना देर से आए तो ह्रषिकेश मुखर्जी भन्नाए हुए बैठे हुए थे। उन्होंने राजेश खन्ना को खूब खरी-खोटी सुनाई, कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि उन्होंने खन्ना को जमकर गालियां भी दी और फिल्म बंद करने की घोषणा करके घर चले गए। राजेश खन्ना परेशान थे, परेशान तो बाकी के कलाकार भी थे ही। दो तीन दिन बाद इस फिल्म के ही एक और कलाकार रमेश देव ह्रषिकेश दा के घर पहुंचे। अपने साथ राजेश खन्ना को लेकर भी गए थे, बगैर ह्रषिकेश मुखर्जी को बताए। राजेश खन्ना को नीचे बैठकर वो दादा के पहली मंजिल के कमरे में पहुंचे और उनसे बातचीत करने लगे।बातचीत के क्रम में उन्होंने पूछा कि क्या वो सच में फिल्म बंद करना चाहते हैं? दादा बोले नहीं यार! मैं को ये सोच रहा हूं कि गुस्से में राजेश खन्ना को बहुत बुरा भला कह दिया, क्या वो फिर से फिल्म में काम करने को तैयार होगा। जब ये बात हो रही थी तो राजेश खन्ना पहली मंजिल पर पहुंच गए थे और कमरे के बाहर खड़े होकर सुन रहे थे। जैसे ही उन्होंने ह्रषिकेश मुखर्जी की बात सुनी तो कमरे में घुसे और जाकर दादा के चरण पकड़ कर फर्श पर लेट गए। कहने लगे कि क्षमा कर दीजिए अब कभी शूटिंग के लिए लेट नहीं करूंगा। ह्रषिकेश मुखर्जी पिघल गए। लेकिन राजेश खन्ना नहीं माने और बोले कि जबतक आप सिप्पी साहब को फिर से फिल्म शुरू करने के लिए फोन नहीं करेंगे तबतक वो पांव नहीं छोड़ेगे। दादा ने सिप्पी को फोन कर दिया और फिल्म फिर से शुरू हो गई। राजेश खन्ना दो तीन दिन तो समय से शूटिंग के लिए आए लेकिन फिर वही रवैया लेकिन तबतक मुखर्जी समझ चुके थे कि इस मसले पर कुछ हो नहीं सकता। राजेश खन्ना देर से आते रहे और शूटिंग चलती रही, फिल्म पूरी हो गई।

राजेश खन्ना इस फिल्म के नायक जरूर थे लेकिन पूरी फिल्म में ह्रषिकेश दा ने इस बात का ध्यान रखा कि कहानी पर नायकत्व हावी न हो सके। कहीं भी राजेश खन्ना अपने स्टाइल में अभिनय करते नजर नहीं आते हैं, न तो गरदन झटकते हैं न ही हाथ मोड़ कर अपने विशेष अंदाज में संवाद अदायगी करते हैं। 11 मार्च 1971 को फिल्म रिलीज हुई और आज पचास साल होने के बाद भी ‘आनंद’ को उतना ही प्यार मिल रहा है।  


Thursday, July 30, 2020

फिल्मों में रामकथा


सचिन भौमिक को क्या पता था कि राज कपूर से उनकी एक मुलाकात उनको सफलता की ऐसी राह दिखा देगा जिसपर चलकर वो हिंदी फिल्मों के सबसे सफल कहानीकार बन जाएंगे। हिंदी फिल्मों के इतिहास में जितनी सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली फिल्में सचिन भौमिक के खाते में हैं उतनी किसी और के नहीं। सलीम-जावेद की जोड़ी को भी नहीं। सचिन भौमिक की सफलता के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। सचिन काम की तलाश में कोलकाता (तब कलकत्ता) से मायानगरी मुंबई (तब बांबे) पहुंचे थे। जब वो मुंबई आए तो उस समय राज कपूर को प्रसिद्धि मिल चुकी थी और उनकी फिल्म ‘बरसात’, ‘सरगम’, ‘आवारा’, ‘बूट पॉलिश’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं। सचिन भौमिक किसी तरह से राज कपूर से मिलना चाहते थे। एक दिन वो आर के स्टूडियो पहुंचे और राज कपूर से मिलने की इच्छा जताई। उस दिन राज कपूर से भेंट नहीं हो सकी लेकिन अगले दिन का समय तय हुआ। नियत समय पर सचिन भौमिक चेंबूर के आर के स्टूडियो पहुंचे। वहां उनको राज कपूर के कमरे में ले जाया गया। सचिन भौमिक से राज कपूर ने हाल-चाल पूछा और फिर आने का प्रयोजन। भौमिक ने बताया कि वो फिल्मों के लिए कहानी लिखना चाहते हैं। राज कपूर की सहमति के बाद सचिन ने कहानी सुनाना आरंभ किया और राज कपूर बहुत धैर्यपूर्वक उनकी कहानियां और बातें सुनते रहे। बातचीत जब खत्म हुई तो राज कपूर ने कहा कि आप हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखते हो, अच्छी बात है, लिखते भी रहो लेकिन इतना ध्यान रखना कि हिंदी फिल्मों में कहानी तो एक ही होती है, ‘राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।‘ सचिन भौमिक जब राज कपूर से मिलकर निकल रहे थे तो उनके मस्तिष्क में ये बात बार-बार कौंध रही थी। सचिन भौमिक ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज कपूर की ये बात उन्होंने गांठ बांध ली थी और वो कोई भी कहानी लिखते थे तो उनके अवचेतन मन में रामकथा अवश्य चल रही होती थी।

अगर हम हिंदी फिल्मों के सौ साल से अधिक के इतिहास पर नजर डालें तो रामकथा अब तक सौ से अधिक फिल्मों का निर्माण हो चुका है। मूक फिल्मों के दौर में 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। कहना न होगा कि जब लंका दहन के प्रसंग की चर्चा होगी तो राम कथा के अन्य प्रसंग भी इसमें आते चले जाते हैं। इस फिल्म की सफलता के साथ तो कई किवदंतियां भी जुड़ी हुई हैं। मद्रास (अब चेन्नई) में ये फिल्म इतनी हिट रही थी कि इसकी कमाई के पैसों को बैलगाड़ी में भरकर ले जाना पड़ता था। उस दौर में एक और फिल्मकार हुए जिनका नाम था श्री नाथ पाटणकर। इन्होंने 1918 में ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। इस बात का उल्लेख मिलता है कि पाटणकर की कंपनी फ्रेंड्स एंड कंपनी ने इस फिल्म को करीब पच्चीस हजार फीट के रील में शूटिंग की थी। इसको दर्शकों को धारावाहिक के रूप में दिखाया गया था और दर्शकों के लिए एक विशेष प्रकार का टिकट भी बनाया गया था। जब भी इस फिल्म का प्रदर्शन होता था तब उसके पहले राम की महिमा का बखान करनेवाले विशेष प्रकार के गीत-संगीत का कार्यक्रम होता था। उसी दौर में सीक्वल का भी चलन हिंदी फिल्मों में शुरू हो गया था और पाटणकर ने राम वनवास के सीक्वल के तौर पर ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं। ‘अहिल्या उद्धार’, ‘श्री राम जन्म’, ‘लव कुश’, ‘राम रावण युद्ध’, ‘सीता विवाह’, ‘सीता स्वयंवर’ और ‘सीता हरण’ आदि प्रमुख फिल्में हैं।      
जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तब भी रामकथा फिल्मकारों की पंसद बनी रही। बंगाल के मशहूर फिल्मकार देवकी बोस ने ‘सीता’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी जो बेहद लोकप्रिय हुई थी। इस फिल्म में राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को स्थापित करने की कोशिश की गई थी। इस फिल्म में सीता की भूमिका मशहूर अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने निभाई थी और पृथ्वीराज कपूर ने राम की। ये हमारे देश में बनी पहली ऐसी फिल्म थी जिसको अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया था। इस फिल्म का प्रदर्शन 1934 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में किया गया था। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि के रामयाण के आधार पर चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन चारों फिल्मों में पूरी रामायण को फिल्माया गया। इन चार फिल्मों में राम का किरदार अभिनेता प्रेम अदीब और सीता की भूमिका का शोभना समर्थ ने निभाई थी। इन फिल्मों में प्रेम अदीब और शोभना समर्थ ने बेहद शानदार काम किया था। उस दौर में लोग प्रेम अदीब और शोभना समर्थ की तस्वीरें देखकर उनके सामने सर झुकाकर प्रणाम करते थे। आज की पीढ़ी ने दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण की लोकप्रियता देखी। प्रकाश पिक्चर्स की ये चारों फिल्में भी अपने दौर में इसी तरह लोकप्रिय हुई थीं। इनमें से ‘रामराज्य’ को महात्मा गांधी ने देखी।
1967 में प्रकाश पिक्चर्स ने जब ‘रामराज्य’ को नए अंदाज में बनाने तैयारी शुरू की तो इसके निर्देशक विजय भट्ट ने नूतन से सीता के रोल के लिए संपर्क किया था। उनको लगा था कि शोभना समर्थ की बेटी नूतन इस भूमिका के लिए उपयुक्त होंगी। नूतन ने तब ये कहते हुए मना कर दिया था कि उनके अभिनय की तुलना उनके मां के अभिनय से होगी और वो ऐसा नहीं चाहती। नूतन के इंकार के बाद सीता की भूमिका वीणा राय ने निभाई थी। लेकिन ये फिल्म सफल नहीं हो पाई थी। इसके बाद भी नियमित अंतराल पर राम कथा पर फिल्में बनती रहीं हैं जो इस बात को साफ तौर पर इंगित करती हैं कि राम और उनसे जुड़ी कहानियां भारतीय जनमानस को हमेशा आकर्षित करती हैं। इसी आकर्षण को पकड़ने हुए राज कपूर ने सचिन भौमिक को कहा था कि कहानी तो एक ही है राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।   

Monday, June 1, 2020

न वो राज रहे, न वो राजघाराना

1942 में केदार शर्मा मुंबई के रंजीत स्टूडियोज के लिए एक फिल्म बना रहे थे, विषकन्या, जिसमें पृथ्वीराज कपूर, साधना बोस और सुरेन्द्र नाथ प्रमुख भूमिका में थे। केदार शर्मा और पृथ्वीराज कपूर में कलकत्ता (अब कोलकाता) के दिनों से बहुत दोस्ती थी और दोनों एक दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। बाद में दोनों कोलकाता से मुबई आ गए थे। फिल्म विषकन्या की शूटिंग के दौरान केदार शर्मा ने इस बात को नोटिस किया कि पृथ्वीराज कपूर जब भी शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचते हैं तो वो बहुत उदास रहते हैं। शूटिंग के पहले और बाद में भी गुमसुम रहते हैं और सेट पर किसी से बातचीत नहीं करते हैं। केदार शर्मा लगातार इस बात को नोट कर रहे थे लेकिन पृथ्वीराज कपूर से पूछ नहीं पा रहे थे। एक दिन अवसर मिल ही गया, पृथ्वीराज कपूर एक शॉट देने के बाद सेट पर एक कोने में जाकर बैठ गए। ये देखकर केदार शर्मा उनके पास पहुंचे उनका हाथ पकड़कर बोले कि अगर इसमें बहुत व्यक्तिगत कुछ नहीं हो तो मैं आपकी उदासी का कारण जानना चाहता हूं। मुझे लगता है कि आप किसी खास वजह से बेहद परेशान हैं। आप मुझपर भरोसा रखकर उदासी की वजह बताइए मैं उसको दूर करने की कोशिश करूंगा। इतना सुनकर पृथ्वीराज कपूर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और जोर से केदार का हाथ पकड़कर बोले, केदार! मैं अपने बेटे राजू को लेकर बहुत चिंतित हूं। किशोरावस्था की उलझनों में वो मुझे भटकता हुआ लग रहा है, मैंने उसको पढ़ने के लिए कॉलेज भेजा लेकिन पर वहां पढ़ाई से ज्यादा वो लड़कियों में खो गया है। इतना बोलकर पृथ्वीराज कपूर चुप हो गए। केदार शर्मा ने पृथ्वीराज कपूर के कंधे पर अपना हाथ रखकर कहा कि अपने बेटे को मुझे सौंप दो लेकिन एक वादा करो कि मेरे और उसके बीच आप दखलअंदाजी नहीं करोगे। मैं उसको रास्ते पर लाऊंगा ठीक उसी तरह जिस तरह से कोई गुरू अपने चेले को लेकर आता है। मैं उसको अपना असिस्टेंट डायरेक्टर बनाने के लिए तैयार हूं। पृथ्वीराज कपूर का दुख कुछ कम हुआ। 
अगले दिन वो अपने बेटे राजू को लेकर केदार शर्मा के पास पहुंचे। कपूर खानदान की परंपरा के मुताबिक राजू ने केदार शर्मा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। केदार शर्मा ने राजू को उनके बचपन के दिनों की याद दिलाई जब वो कोलकाता में रहते थे और अपने पिता के साथ स्टूडियो आया करते थे। एक दिन जब केदार शर्मा रील देख रहे थे तो राजू ने उनसे जानना चाहा था कि रील में कैद चित्र पर्दे पर चलने कैसे लगते हैं। तब केदार शर्मा ने राजू को कहा था कि एक दिन मैं तुम्हें इसका रहस्य बताऊंगा। अब केदार शर्मा ने राजू से कहा कि रील का रहस्य जानने का समय आ गया है। तुम अब मेरे साथ काम करो आज से तुम मेरे असिस्टेंट डायरेक्टर हो। इसके बाद की कहानी बहुचर्चित है कि कैसे केदार शर्मा ने राजू को एक जोरदार थप्पड़ जड़ा था और फिर उसके बाद अपनी फिल्म में काम करने का ऑफर दिया था। जब राजू को केदार शर्मा ने फिल्म का ऑफर दिया था तब राजू ने उनसे कहा था कि हां अंकल! मैं कैमरे के आगे काम करना चाहता हूं और दुनिया को अपनी अभिनय की प्रतिभा दिखाना चाहता हूं। इतना सुनते ही केदार शर्मा ने राजू को गले लगा लिया था। गले लगते ही राजू ने उनकी कान में कहा था, प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। इसी बेबी मुमताज को लोगों ने बाद में मधुबाला के नाम से जाना। केदार शर्मा ने वादा तो कर दिया लेकिन बाद में बेबी मुमताज को फिल्म में लेने के लिए उनको अपने पार्टनर की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी। खैर ये अलहदा प्रसंग है जिसकी विस्तार से चर्चा केदार शर्मा ने अपनी आत्मकथा में की है।   
पर कौन जानता था कि जो बालक कोलकाता के स्टूडियो में केदार शर्मा से रील का रहस्य जानना चाहता था, जो किशोरावस्था में कॉलेज में पढ़ाई न करके अन्य सभी बदमाशियां किया करता था, जिसके पिता उसके करियर की चिंता में सेट पर उदास बैठा करते थे, वो रील की इस दुनिया में इतना डूब जाएगा, उसकी बारीकियों को इस कदर समझ लेगा या फिर रील में चलने फिरनेवाले इंसान के व्याकरण को इतना आत्मसात कर लेगा कि पहले अभिनेता राज कपूर के तौर पर और बाद में शोमैन राज कपूर के रूप में उनकी ख्याति पूरे विश्व में फैल जाएगी। आज राज कपूर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन रील की उनकी समझ, रील के रूप में उनकी सृजनात्मकता आज भी लोगों को चमत्कृत करती है।  

Wednesday, January 15, 2020

फिर भी रहेंगी निशानियां...

रितु नंदा एक ऐसी शख्सियत थीं जो दिल्ली के कारोबारी जगत से लेकर कला की दुनिया में अपने संवेदनशील स्वभाव की वजह से जानी जाती थीं। वो मसङूर अभिनेता और हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े शो मैन राज कपूर की बेटी और एस्कॉर्ट कंपनी के मालिक राजन नंदा की पत्नी थीं। लेकिन इससे इतर भी उन्होंने अपनी एक पहचान बनाई थी। पेंटिग्स में उनकी गहरी रुचि थी और उन्होंने राज कपूर पर एक बेहतरीन पुस्तक भी लिखी थी जिसमें उन्होंने शुरू में ही ये स्वीकारा है कि- ‘पापा ने बहुत अधिक पढ़ाई नहीं की थी और ना ही वो सिनेमा को बौद्धिक माध्यम मानते थे, वो एक रोमांटिक व्यक्तित्व थे और देश में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असामनता को वो बौद्धिक नजरिए से नहीं बल्कि संवदेनशील नजर से देखते थे।‘ इस एक पंक्ति से उन्होंने अपने पिता के व्यक्तित्व को व्याख्यायित कर दिया था। राज कपूर पर लिखी उनकी किताब का दूसरा संस्करण जब 2002 में प्रकाशित हो रहा था तब उनसे मिलने का मौका मिला था। वो तय समय पर टीवी स्टूडियो में आ गईं थी। उनको स्टूडियो के बाहर एक कमरे में बैठाया गया जहां वो किसी वजह से सहज नहीं हो पा रही थीं। उन्होंने अपनी परेशानी को जाहिर नहीं किया बल्कि मुझसे पूछा कि कार्यक्रम शुरू होने में कितना समय है। जब मैंने उनको कहा कि 15 मिनट तो फौरन बोलीं कि क्या आप थोड़ी देर मेरी गाड़ी में बैठकर कार्यक्रम के बारे में बात कर सकते हैं। हमलोग उनकी गाड़ी में बैठे बातें करने लगे ठीक बारह मिनट बाद उन्होंने बातचीत समाप्त की और हम स्टूडियो में चले गए। उनका ये बड़ा गुण था कि वो सामने वाले को बहुत महत्व देती थीं और जो अगर कुछ पसंद नहीं आता था उसको जाहिर नहीं करती थीं।
किताब पर बातें हुईं, उन्होंने राज कपूर के बारे में ढेर सारी यादें ताजा की। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनके भर्ती होने के समय का एक बेहद मार्मिक किस्सा सुनाया था। उन्होंने बताया था कि बहुत कम लोगों को मालूम है कि ‘संगम’ फिल्म के लिए राज कपूर ने दिलीप कुमार को ऑफर दिया था जिसे करने से दिलीप साहब ने मना कर दिया था। ये वो दौर था जब दिलीप कुमार और राज कपूर के बीच प्रतिद्वंदिता थी। बावजूद इसके दोनों दोस्त थे। अपनी जिंदगी की आखिरी जंग लड़ रहे राज कपूर दिल्ली के एम्स के आईसीयू में भर्ती थे। दिलीप कुमार उनसे मिलने पहुंचे। राज कपूर अचेत थे। दिलीप कुमार ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगे ‘उठ जा राज! अब उठ जा, मसखरापन बंद कर। तू तो हमेशा से बढ़िया कलाकार रहा है जो हमेशा हेडलाइंस बनाता है। मैं अभी पेशावर से आया हूं और चापली कबाब लेकर आया हूं। याद है राज हम बचपन में पेशावर की गलियों में साथ मिलकर ये स्वादिष्ट कबाब खाया करते थे।‘ बीस मिनट तक दिलीप कुमार राज कपूर का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलते रहे थे।
रितु कपूर एक सफल उद्यमी भी थीं। इंश्योरेंस का उनका अपना कारोबार था जिसमें उनकी कंपनी देशभर में शीर्ष पर थीं। एक दिन में सबसे अधिक पॉलिसी बेचने का रिकॉर्ड उनके नाम पर ही था। न्य फ्रेंड्स कॉलोनी में उनका कार्यालय था जहां वो नियमित आती थीं। उनकी पेंटिग्स में भी गहरी रुचि थीं। एक बार अपने कार्यालय में उन्होंने मुझे एक पेंटिंग दिखाई जिसमें एक खाली कुर्सी रखी है जिसके सामने नीला आकाश था। उन्होंने इसको मानव मन के अकेलेपन से जोड़कर बेहतरीन व्याख्या की थी। 14 दिसंबर 2005 की इस मुलाकात के बाद उन्होंने अपनी पुस्तक दी उसपर लिखा- ‘प्रिय अनंत, हम सभी मरने के लिए पैदा होते हैं। सिर्फ हमारे अच्छे काम बचे रह जाते हैं। बहुत प्यार के साथ आपको ये किताब भेंट कर रही हूं जो कि एक बेटी की अपने पिता और एक कलाकार को श्रद्धांजलि है, जिनका पूरा जीवन सिनेमा को समर्पित था।‘ उसके बाद उन्होंने अपने पिता की फिल्म के एक गीत की दो पंक्ति लिखी- ‘हम न रहेंगे, तुम ना रहोगे, फिर भी रहेंगी निशानियां।‘  अब जब 71 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया है तो उनकी ये पंक्तियां बहुत याद आ रही हैं।