Translate

Showing posts with label शब्दकोश. Show all posts
Showing posts with label शब्दकोश. Show all posts

Saturday, September 17, 2022

शब्दकोश संस्कृति पर संगठित प्रयास


उपराष्ट्रपति के पद से वेंकैयानायडू का विदाई समारोह चल रहा था। सभी गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वेंकैया जी के राजनीतिक गुणों की चर्चा कर रहे थे। राजनीतिक गुणों के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके भाषा प्रेम की प्रशंसा की। वहां प्रधानमंत्री ने एक सूचना साझा की कि भारत सरकार ने भाषिणी के नाम से एक वेबसाइट बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने बतया कि इस वेबसाइट पर भारतीय भाषाओं की समृद्धि को प्रदर्शित किया गया है। यहां एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद करने की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने मंच पर बैठे लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से एक अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि संसद के दोनों सदनों में जब कोई सदस्य मातृभाषा में भाषण करें या सदस्य किसी चर्चा में हस्तक्षेप करते हैं तो कई सदस्य के भाषण से या किसी चर्चा पर उनके हस्तक्षेप से बहुत बढिया शब्द निकलते हैं। भारतीय भाषाओं के वो शब्द दूसरी भाषा के सदस्यों के लिए बहुत रुचिकर भी होता है और सार्थक भी लगता है। प्रधानमंत्री ने मंच से ही ओम बिरला और हरिवंश से अनुरोध किया कि हमारे दोनों सदनों में ऐसे सार्थक, रुचिकर और भाषा वैविध्य को लेकर आनेवाले भारतीय भाषा के शब्दों का संग्रह करने की व्यवस्था की जाए। उसके बाद प्रतिवर्ष ऐसे शब्दों का एक संग्रह प्रकाशित करने की परंपरा का आरंभ किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने वेंकैया जी के मातृभाषा प्रेम के हवाले से एक बेहद गंभीर बात तो की ही, भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की पहल करने का सुझाव भी दे दिया। 

पिछले दिनों हिंदी दिवस के अवसर पर सूरत में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में गृह मंत्री अमित शाह ने शब्द सिंधु के नाम से एक खोजपरक डिजीटल शब्दकोश के पहले संस्करण का शुभारंभ किया। ये शब्दकोश हिंदी से हिंदी का है। इसमें शब्दों के अर्थ और आवश्यकतानुसार वाक्य प्रयोग भी दिए गए हैं। इसमें अभी इक्यावन हजार शब्द डाले गए हैं। भविष्य में इस शब्दकोश में शब्दों की संख्या बढ़ाई जाएगी। इसमें विज्ञान. तकनीक, न्यायिक प्रक्रिया और प्रोद्योगिकी से जुड़े शब्दों को शामिल किया गया है। ये शब्दकोश गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी निदेशालय और विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध होने की बात कही गई । इस शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को भी शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करने में एक असुविधा हो रही है। हिंदी के कई शब्द ऐसे हैं जिनका भारतीय भाषाओं और बोलियों में अलग अर्थ होता है। उदाहरण के तौर पर अगर शिक्षा शब्द को लिया जाए तो हिंदी में इसका अर्थ होता सिखाना। कुछ भारतीय भाषा और बोलियों में सिखाने का प्रयोग दंड के तौर पर भी होता है। इस शब्दकोश को बनाने वालों के सामने ये बड़ी चुनौती है कि किस प्रकार से भारतीय भाषाओं और हिंदी के शब्दों में साम्य स्थापित किया जाए ताकि अर्थ का अनर्थ न हो। बताया गया कि भाषा विशेषज्ञ इस पर कार्य कर रहे हैं। इस शब्दकोश का एक लाभ ये है कि सरकारी कार्यालयों में जिस प्रकार की हिंदी का प्रयोग होता है उसको सरल बनाया जा सकेगा। दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद करने में भी ये शब्दकोश सहायक सिद्ध होगा। इस शब्दकोश को अद्यतन करने के लिए विशेषज्ञों और तकनीकविदों की एक समिति निरंतर कार्य कर रही है। इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि अभी इसका पहला संस्करण जारी किया है और भविष्य में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होते रहेंगे। 

सूरत के सम्मेलन में ही राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी भारतीय भाषाओं के शब्दों को लेकर अपनी प्राथमिकता बताई। उनके मुताबिक भारतीय भाषाओं के सात सौ से अधिक शब्दों का चयन किया गया है जो रुचिकर और सार्थक शब्द हैं। इन शब्दों का उपयोग सभी भाषाओं में हो सकता है। इन प्रयासों से ये लगता है कि भारतीय भाषाओं और हिंदी को समृद्ध करने के लिए सरकारी स्तर पर गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं। स्वाधीनता के अमृतकाल में इस तरह की बातों के सामने आने से मातृभाषा या भारतीय भाषाओं के लिए सरकार के स्तर संगठित प्रयास भाषा-प्रेमियों के साथ साथ बौद्धिक जगत के लिए भी संतोष के संकेत हैं। हिंदी में शब्दकोश की परंपरा को पुनर्जीवित करके भाषा को समृद्ध किया जा सकता है। अब भी हिंदी के शब्दकोश की बात होती है तो दशकों पूर्व प्रकाशित ज्ञानमंडल शब्दकोश या फादर कामिल बुल्के के शब्दकोश या फिर हरदेव बाहरी के शब्दकोश तक बात आकर रुक जाती है। अपने देश में शब्दकोश संस्कृति सशक्त नहीं हो पाई है। शब्दों के अर्थ और उसकी उत्पत्ति को लेकर हम सजग नहीं रहते हैं। हिंदी या भारतीय भाषाओं में जो भाषाई समृद्धि है उसको जानने समझने के लिए शब्दकोश संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। इससे न केवल अकादमिक जगत में बल्कि पूरे भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना का विकास होगा। शब्दकोश को अद्यतन करने और उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों को शामिल करके न केवल भाषा को समृद्ध किया जा सकता है बल्कि इसका दायरा भी बढ़ाया जा सकता है। एक तरह से देखें तो ये औपनिवेशिक भाषाओं के चंगुल से मुक्ति का अभियान भी है।

इस संबंध में फ्रांस का उदाहरण दिया जा सकता है। सूरत में एक चर्चा के दौरान पता चला कि फ्रांस के लोग अपनी भाषा और मातृभाषा को लेकर कितने सजग हैं। एक मित्र ने बताया कि फ्रांस में अगर आप रास्ता भटक जाएं तो कभी भी किसी फ्रेंच से अंग्रर्जी में रास्ता न पूछें। वो बिना बताए आगे बढ़ जाएगा। आप भले ही हिंदी या भोजपुरी या तमिल में बात करें वो ठहरकर आपके हावभाव से आपके प्रश्नों को समझने का प्रयास करेंगे और आपकी सहायता भी करेंगे। जैसे ही आपने अंग्रेजी में कुछ कहा कि वो आपसे बात किए बिना आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन स्वाधीनता के पचहत्तर वर्ष बीतने के बाद भी हमारे देश में विदेशी भाषा की अहमियत बनी हुई है। अगर इसके कारणों की पड़ताल करेंगे तो इसके पीछे स्वाधीनता के बाद के शीर्ष भारतीय नेतृत्व की कमजोरी और उनका विदेशी भाषा प्रेम ही दिखाई पड़ता है। भाषा के नाम पर इस देश ने बहुत राजनीति देखी, भाषा को लेकर हिंसा भी हुई है, भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन भी हुआ है। दो भाषाओं के बीच कटुता भी देखी गई है। पूर्व में साहित्य अकादमी के चुनाव के दौरान इस तरह की कटुता खुलकर सामने आती रही है। हिंदी का विरोध भी देखा गया। हिंदी विरोध के पीछे राजनीति रही है जिसने शिक्षा और अकादमिक जगत में भाषाई विष फैलाने का काम किया है। अब इस विष को खत्म करने का कार्य आरंभ हुआ है। हिंदी नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने की नीति पर कार्य हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है। इस दिशा में समग्रता में कार्य भी हो रहा है। 

यह अनायस नहीं है कि प्रधानमंत्री एक सभा में भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की बात करते हैं। इसके लिए संसद के दोनों सदनों के जिम्मेदार अधिकारियों से अनुरोध करते हैं और दूसरी तरफ गृह मंत्री हिंदी शब्दकोश को अद्यतन करने का उपक्रम आरंभ करते हैं। उसके क्रियान्वयन की जानकारी राष्ट्र को देते हैं। यह सरकार का भाषा के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी है और अपनी संस्कृति पर अभिमान भी। अपनि संस्कृति पर अभिमान के इस अभियान में हर भारतीय नागरिक को जुड़ना चाहिए और आनेवाली पीढ़ी को शब्दकोश से संपर्क बनाने और बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। 


Sunday, December 4, 2016

वैश्विक प्रेम से सराबोर हिंदी

भारतीय भाषाओं का बाजार लगातार बढ़ रहा है । यह बात अरसे से कही जा रही है लेकिन हिंदी के लेखक इसको बाजार के बढ़ते वर्चस्व की तरह लेते हैं और इनमें से ज्यादातर लेखक बाजार के वर्चस्ववादी खतरे को लेकर छाती कूटते रहते हैं । उनको लगता है कि बाजार का विस्तार होगा तो वो अपनी शर्तों पर साहित्य में दखल देगा । बजाए इस आसन्न दखल के खतरे का समाधान ढूंढने के, इससे बचकर निकलने के रास्ते ढूंढने के, बाजार की वर्चस्ववादी ताकतों को अपने हिसाब से ढालने के, बाजार से ही नाता तोड़ लेने की ओर बढ़ जाते हैं । दरअसल बाजार का जो अर्थशास्त्र है वो बहुत अलग नहीं है उसके व्यवहार को समझने के लिए हमारे यहां कई उदाहरण भरे पड़े हैं । जैसे कहावत है कि कमाऊ पूत का सबकुछ सहा जाता है, दूसरी कहावत है कि दुधारू गाय की लात भी भली । इन दोनों लोकोक्तियों का अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं है । बजाए बाजार को अपनी ताकत से झुकाने के हम बाजार के खिलाफ जाने का उपक्रम शुरू कर देते हैं जिससे ना केवल अपना नुकसान कर डालते हैं बल्कि भाषा का भी नुकसान होता है । लेखक बहुधा यह आरोप लगाते हैं कि बाजार की ताकतें भाषा को भ्रष्ट कर देती हैं, वो भाषा में अपने मुताबिक बदलाव करवा देते हैं लेकिन वो भूल जाते हैं अगर भाषा में ताकत होती है तो वो बाजार को अपने हिसाब से झुका सकती है । पाठकों का याद होगा कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन की भाषा । वो जिस तरह की हिंदी का इस्तेमाल करते थे वो बिल्कुल शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ हिंदी कही जाती है । कोटि जैसे शब्दों का इस्तेमाल उस शो के टाइटल में हुआ था और बाजार उस शो की लोकप्रियता के आगे बिछ गया था ।
दरअसल भाषा की सबसे बड़ी ताकत होती है कि उसका सहज और सरल संप्रेषण । हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की लगातार बढ़ रही ताकत ही है कि जिसने अमेजन जैसी बड़ी ऑनलाइन अमेरिकी कंपनी को किंडल जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों को उपलब्ध करवाने के लिए मजबूर कर दिया । इसके पहले किंडल पर जापानी, चीनी, फ्रेंच और जर्मन भाषा की कृतियां ही मौजूद थीं । किंडल पर अब हिंदी के अलावा तमिल, मलयालम, गुजराती और मराठी भाषा की कृतियां उपलब्ध करवा दी गई हैं । किंडल से जुड़े लोगों का कहना है कि वो आनेवाले दिनों में वो हिंदी की तमाम कृतियों को वहां अपलोड कर देंगे । किंडल पर सिर्फ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पांच सौ किताबें दिखाई दे रही हैं जो अपलोड कर दी गई हैं । इसके अलावा हिंदी के अन्य प्रकाशनों की किताबें भी वहां अपलोड की गई हैं । प्रभात प्रकाशन के निदेशक पियूष कुमार इसको ऐतिहासिक घटना के तौर पर तो देखते हैं वो इसमें हिंदी के पाठकों और लेखकों के लिए ऐतिहासिक अवसर भी तलाशते हैं । उनका मानना है कि किंडल पर हिंदी की किताबों के आ जाने से पूरी दुनिया में इस भाषा की कृतियां सहजता से उपलब्ध हो गई हैं ।
दरअसल अगर हम देखें तो अमेजन का यह कदम ग्लोबल और लोकल को मिलाकर एक ग्लोकल दुनिया की ओर बढ़ाया गया कदम है । इंटनेट के विस्तार ने विश्वग्राम की अवधारणा को और मजबूती मिल रही है । सिर्फ इकना ही नहीं भारत में भी कृतियों की उपलब्धता बढ़ेगी । जैसे जैसे इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ये विस्तार और मजबूती पाएगा । कहते हैं ना कि अवसर अपने साथ चुनौती भी लेकर आता है तो किंडल पर हिंदी की कृतियों के उपलब्ध होने से लेखकों और प्रकाशकों के लिए चुनौती भी बढ़ गई है । लेखकों को समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती और प्रकाशकों के सामने विश्वस्तर की रचनाएं प्रकाशित करने की चुनौती
ऐसा नहीं है कि सिर्फ अमेरिकी कंपनी अमेजन ने ही हिंदी की धमक को महसूस करते हुए उसको स्वीकार किया है । कुछ दिनों पहले हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के चुनाव में मतदान पर्ची पर पहली बार हिंदी में मतदाताओ को धन्यवाद का उल्लेख किया गया था । अमेरिका के चुनावी इतिहास में पहली बार अन्य भाषाओं के साथ हिंदी ने अपनी जगह बनाई । यह एक भाषा के बढ़ते दायरे का प्रतीक तो है ही भारतीयता के बढ़ते धमक का सूचक भी है । हिंदी को लेकर एक और उत्साहवर्धक खबर ऑस्ट्रेलिया से भी आई है । ऑस्ट्रेलिया में अपने बच्चों को विदेशी भाषा सिखाने का विकल्प दिया गया है और जिन भाषाओं को उसमें चुना गया है उसमें हिंदी भी शामिल है । अर्ली लर्निंग लैंग्वेज ऑस्ट्रेलिया ने चार साल के बच्चों से लेकर शिक्षकों को ऑनलाइन हिंदी सीखने का विकल्प दिया है । ऑस्ट्रलिया सरकार के शिक्षा मंत्री ने ये ऐलान करते हुए कहा कि दो हजार अठारह से बच्चों को हिंदी सीखने का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा । इटालियन, स्पैनिश, जापानी और चीनी भाषा के साथ अब हिंदी को भी ऑस्ट्रेलिया के बच्चे सीख सकेंगे । यह हिंदी के बढ़ते प्रभाव का ही संकेत है कि विदेशों में अब बच्चों को भी हिंदी सीखने का विकल्प दिया जा रहा है । अर्ली लर्निंग लैंग्वेज ऑस्ट्रेलिया के प्रोग्राम वहां काफी लोकप्रिय हैं और सरकार भी इसको बढ़ावा देने के लिए खास इंतजाम करती है ।
विदेशों में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता के बाद अब हमारी भाषा से जुड़े लोगों की जिम्मेदारियां भी काफी बढ जाती है । हिंदी भाषा के विकास के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है । हिंदी में मानक शब्दकोश की बहुत सख्त जरूरत है । शब्दकोश बनाने की दिशा में छोटी छोटी पहल हुई है लेकिन इसको लेकर एक गंभीर कोशिश करने की जरूरत है । किसी एक संस्था को आगे आकर हर साल शब्दकोश को अद्यतन करते रहने और उसको प्रकाशित करने की जरूरत है । इसका एक फायदा ये होगा कि हिंदी को हर साल कुछ नए शब्द मिलेंगे । अभी हाल ही में प्रदूषण को लेकर एक शब्द काफी सुनने को मिला – स्मॉग । अब इस शब्द को लेकर हिंदी के लोगों ने काफी विमर्श किया लेकिन उसका उचित हिंदी शब्द नहीं मिल पाया । तकनीक के बढ़ते चलन की वजह से कई बार हिंदी का हाथ तंग नजर आता है । अगर हर साल शब्दकोश छपने लगे तो इस समस्या से कुछ हद तक निजात मिल सकता है ।
हिंदी से जुड़े लोगो को एक और आदत डालनी होगी वो ये कि उनको नए नए शब्द गढ़ने होंगे । न गढ़े हुए शब्दों को लेकर उनको भाषा में स्थापित करने की पहल करनी होगी । हिंदी में बोलियों के काफी शब्द इस्तेमाल होते थे जो धीरे-धीरे गायब होते चले गए और उनका स्थान आसान अंग्रेजी के शब्दों ने ले लिया । हर गली मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए अंग्रेजी स्कूलों ने भी इसमें अहम भूमिका अदा की । बोलियों के शब्द के हिंदी से गायब होने की वजह से हिंदी में शब्दों का टोटा पड़ता चला गया । ये सब तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनानी होगी, विज्ञान और अन्य विषयों को लेकर किताबें लिखनी होंगी आदि आदि, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम पहले हिंदी को मजबूत करने के लिए जिन बुनियादी सुधारों की जरूरत है वो किए जांए । अगर हम हिंदी को विश्वभाषा के तौर पर देखना चाहते हैं तो उसको बहुत मजबूत और समकालीन बनाना होगा । अगर हम हिंदी को समकालीन बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो कोई वजह नहीं बचती है कि ये विश्वभाषा का दर्जा नहीं हासिल कर सके । विश्वभाषा बनने के लिए बाजार कि भाषा होना जरूरी है और भारत का बाजार इतना बड़ा है कि वो स्वत: हिंदी को ये स्थान दिला देगा । इस बात के संकेत किंडल पर हिंदी के लिए रास्ता खुलने से मिल ही रहा है ।
दरअसल जब हिंदी की बात करते हैं तो हमें ये समझना होगा कि वो गंगा की तरह बहनेवाली भाषा है जिसका स्वरूप गंगोत्री में अलग है और जब वो वहां से उतर कर मैदानी इलाकों में आती है तो उत्तर प्रदेश में अलग और बिहार में अलग स्वरूप दिखाई देता है । और जब वो पूर्व की ओर बहती चली जाती है तो उसका स्वरूप या गंगोत्री वाले स्वरूप से बिल्कुल अलग हो जाता है । हिंदी से अगर हम ये अपेक्षा करें कि वो एक तालाब के ठहरे हुए जल की तरह रहे और हम लगातार उसको शुद्ध करते रहे तो इस भाषा के साथ अन्याय होगा । दरअसल ये अपेक्षा किसी भी भाषा के साथ अन्याय ही होता है । भाषा तो बहती हुई नदी के समान होती है जिसमें आगे के पानी को पीछे से आ रहा पानी विस्थापित करता है । हिंदी के लेखकों वरिष्ठ लेखकों के सामने बड़ी चुनौती पीछे से आ रहे पानी को रास्ता देने की है अगर वो उसके साथ मिलकर बह लें तो आगे चले जाएंगे नहीं तो पानी का स्वभाव होता है कि वो रास्ते में आनेवाली बाधाओं को किनारे कर देती हैं और आगे बढ़ जाती हैं । विचार करिए ।