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Saturday, May 25, 2024

नैरेटिव गढ़ने का खोखला प्रयास


लोकसभा चुनाव के छह चरण संपन्न हो चुके हैं। एक चरण का मतदान शेष है। पिछले छह चरणों के चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न तरीकों का उपयोग किया। नेताओं के भाषणों और रोड शो के अलावा इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर तकनीक का उपयोग करते हुए चुनाव प्रचार किया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस) का दुरुपयोग भी हुआ। डीप फेक वीडियो को इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित किया गया। इसको लेकर केस भी हुआ और गिरफ्तारी भी। मतदाताओं के बीच नैरेटिव बनाने का प्रयास भी हुआ। नैरेटिव बनाने में अकादमिक जगत से जुड़े लोग भी सक्रिय दिखे। अकादमिक जगत में नैरेटिव बनाने के लिए चुनाव के पहले से योजनाएं बनने लगी थीं। फलस्वरूप चुनाव के दौरान पुस्तकें आईं। उसपर चर्चा हुई। चुनाव के दौरान नैरेटिव बनाने का ये वैश्विक तरीका है। अमेरिका में जब राष्ट्रपति का चुनाव होता है तो उस दौरान उम्मीदवारों या उनकी पार्टी या विचारधारा को केंद्र में रखकर पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में भी इस प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है। हिंदी प्रकाशन जगत इस मामले में थोड़ा पीछे है पर अंग्रेजी में ये प्रवृत्ति हर चुनाव में देखी जा सकती है। विधानसभा के चुनावों में भी पुस्तकों के माध्यम से नैरेटिव गढ़ने का प्रयत्न होता रहा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केंद्र में रखकर एक लेख को विस्तारित रूप देकर प्रकाशित करवाया गया था। उस पुस्तिका को अंग्रेजी के अलावा कन्नड़ में भी प्रकाशित करवाया गया था। उस पुस्तक में रामचंद्र गुहा और योगेन्द्र यादव की भी टिप्पणी प्रकाशित थी। पुस्तक का नाम था आरएसएस, द लांग एंड शार्ट आफ इट। इसके लेखक हैं देवारुण महादेव। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तथ्यहीन आलोचना है।

लोकसभा चुनाव के समय भी एक पुस्तक आई है, इंडियन फिलासफी, इंडियन रिवोल्यूशन आन कास्ट एंड पालिटिक्स। इस पुस्तक के लेखक हैं, दिव्या द्विवेदी और शाज मोहन। दिव्या द्विवेदी इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (आईआईटी) दिल्ली में दर्शनशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। सह-लेखक के परिचय में उनको दार्शनिक बताया गया है। पुस्तक लेखों का संग्रह है जो 2016 से 2023 के बीच लिखे गए हैं। पुस्तक का परिचय यह कहकर दिया गया है कि इन सात वर्षों में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रकृति को विकृत किया गया। जाति आधारित व्यवस्था गाढ़ी हुई। परिचय को पढ़ने क बाद इस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ी। लेखकों का मानना है कि भारत में हिंदु राष्ट्रवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकवाद के बीच राजनीति नहीं हो रही है। इस देश की राजनीति को उन्होंने जाति के आधार पर व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। इस प्रयास में उन्होंने कई जगह जानबूझकर तथ्यों की ना केवल अनदेखी की बल्कि कुछ तथ्यों को गढ़ने का प्रयास भी किया। अपनी धारणा को अवधारणा बनाकर प्रस्तुत करने का बचकाना प्रयास दिखा। अपने तर्कों को तथ्य बनाने के चक्कर में उन्होंने समकालीन भारतीय राजनीति के उन उदाहरणों को लिया जिसका प्रयोग विपक्षी दल के नेता चुनावी नारे के तौर पर कर रहे हैं। एक जगह कहा गया कि आज के दौर में भारत पर हिंदू राष्ट्रवादियों का शासन है जो देश के सेक्यूलर संविधान को बदलने और इसको हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। राहुल गांधी लगातार ये बात कर रहे हैं। दार्शनिक होने का दावा करनेवाले लेखक ये भूल गए कि संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द कैसे जोड़ा गया था। कई बार ये इतिहास में गए हैं लेकिन जब सेक्यूलर शब्द और संविधान पर अपनी धारणा थोपते हैं तो अतीत में जाने से बचते हैं। 

एक और मनोरंजनक और तथ्यहीन व्याख्या जिसका आधार जुवेनाइल तर्क हैं। लेखकद्वय का मानना है कि इंडिया तो हाल का नाम है। इसको वो इंडस या सिंधु नदी के बिगाड़ से उपजे शब्द तौर पर रेखांकित करते हैं। उससे ही हिंदू बनाते हैं। फिर उस आधार पर हिंदू धर्म को अपेक्षाकृत नया धर्म करार देते हैं। दोनों लेखक बेहद चतुराई से इंडस और इंडिया का सहारा लेते हुए हिंदू तक पहुंचते हैं लेकिन भारत पर नहीं जाते हैं। लेखकगण अगर भारत नाम पर जाते तो इनको ऋगवेद और विष्णु पुराण तक जाना पड़ता। फिर इस पुस्तक के लेख आधार खत्म हो जाता। अगर ये भारतीय दर्शन के अध्येता हैं तो इनको ये तो पता होना चाहिए कि विष्णु पुराण में एक श्लोक है, उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:। समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो भूमि स्थित है उसको भारत भूमि कहते हैं और इस पवित्र भारत भूमि पर निवास करनेवाले सभी को भारतीय कहते हैं। इस एक श्लोक को ही अगर द्विया द्विवेदी और मोहन समझ लेते तो इस दोषपूर्ण निष्कर्ष का शिकार नहीं होते। लेकिन वो तो भारत को, यहां की संस्कृति को अंतराष्ट्रीय विद्वान (?) वेंडि डोनिगर और शेल्डन पालक के लेखन से समझते हैं। विष्णु पुराण और ऋगवेद की बात की जाए तो संभव है कि लेखक गइ इन दोनों को ब्राह्मणवाद की उपज बताकर खारिज कर दें। 

एक बेहद हास्यास्पद अध्याय इस पुस्तक में है जिसका नाम है ‘द मीनिंग आफ क्राइम्स अगेंस्ट मुस्लिम्स इन इंडिया’। इस अध्याय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी का पैरेंट आर्गेनाइजेन बताया गया है। यहां तक तो चलिए किसी हद तक स्वीकार बी किया जा सकता है लेकिन आगे वो संघ को अर्धसैनिक संगठन (पैरामिलिट्री) कहकर संबोधित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इनको न तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पता है और न ही अर्धसैनिक संगठन की प्रकृति के बारे में। अन्यथा वो इस तरह की बातें नहीं करते। अगर वो संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषणों का ही अध्ययन कर लेते तो उनके ज्ञानचक्षु खुल सकते थे। एक और दोषपूर्ण धारणा इस पुस्तक में देखने को मिली जिसमें भारतीय समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था को यहां के निवासियों की त्वचा के रंग के आधार पर देखा गया है। अंग्रेजी के शब्द अपार्थाइड का उपयोग वर्ण व्यवस्था को समझाने के लिए किया गया है। यह ठीक है कि भारतीय समाज में पहले वर्ण व्यवस्था थी जो आगे चलकर जातियों में विभक्त हो गई। वर्ण व्यवस्था को समझने के लिए अगर ये भारत रत्न पी वी काणे को ही पढ़ लेते तो कम से कम सही बात तो कर सकते थे।

इस पुस्तक के लेखों को अंतराष्ट्रीय पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें उन घटनाओं और वक्तव्यों को उद्धृत किया गया है जो लेखकों की धारणा का पुष्ट करती हैं। जाति और वर्ण का घालमेल, हिंदू शब्द की उत्पत्ति, हिंदू- मुसलमान संघर्ष, दलितों और मुस्लिमों पर अत्याचार, हिंदू राष्ट्र, धर्मनिरपेक्षता, संविधान बदलने का प्रयास, लोकतांत्रिक संस्थाओं का हनन जैसे शब्दों का उपयोग इस पुस्तक की मंशा को संदिग्ध करती है। अगर लेखक सही मायने में लेखकगण दार्शनिक हैं तो इनको भारत को भारतीय ग्रंथों के आधार पर समझने का प्रयास करना चाहिए था। पौराणिक ग्रंथों के निहितार्थों को समझना होता। संस्कृत में लिखी मूल अवधारणाओं को समझने के लिए अगर आपको अंग्रेजी अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है तो ये निश्चित मानिए कि आपके सामने निष्कर्ण दोषपूर्ण होंगे। संभव है कि विदेश में उनकी इन अवधारणाओं के पाठक हों, हमारे देश में रहनेवाले चंद लोगों को उनकी यह पुस्तक पसंद आए लेकिन भारतीय मानस इतना परिपक्व हो चुका है कि वो इस तरह की बातों को गंभीरता से नहीं लेगा। चुनाव के समय इस तरह की पुस्तक का आना जिसमें परोक्ष रूप से जातिभेद को गाढा करने का प्रयास हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये एक विचारधारा विशेष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। 


Saturday, March 9, 2024

राष्ट्र और संस्कृति पर राजनीति


कुछ दिनों पूर्व द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के सांसद ए राजा ने भारत और राष्ट्र को लेकर कुछ बातें कहीं। उनकी बातों पर राजनीतिक दलों ने प्रतिक्रिया दी। दोनों बातें समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुईं। ए राजा कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा। एक राष्ट्र, एक भाषा एक परंपरा और एक संस्कृति को दर्शाता है और ऐसी विशेषताएं ही एक राष्ट्र का निर्माण करती है। डीएमके के सांसद इतने पर ही नहीं रुके, आगे बोले कि तमिल एक राष्ट्र है, उड़िया एक भाषा है और एक राष्ट्र है। ऐसी सभी इकाइयां मिलकर भारत का निर्माण करती हैं। ऐसे में भारत एक देश नहीं है बल्कि यह एक उपमहाद्वीप है इसमें विभिन्न प्रथाएं, परंपराएं और संस्कृतियां हैं। तमिलनाडु, केरल, दिल्ली और ओडिशा जैसे राज्यों में अपनी अपनी स्थानीय संस्कृति है। ए राजा ने इसके बाद भी अनेक विवादित बातें कीं। वो भारत के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि ये एक राष्ट्र नहीं बल्कि छोटे राष्ट्रों का समूह है। यहां की संस्कृति एक नहीं है। इस तरह की बातों से वो अपने अज्ञान का प्रदर्शन करते हैं। भारत एक राष्ट्र के तौर पर प्राचीन काल से पूरी दुनिया में जाना जाता रहा है। भारतीय संस्कृति भी एक है जिसको लेकर भी तमाम विद्वानों ने लिखा है। पौराणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख कई बार मिलता है। ए राजा और उनकी पार्टी के नेताओं को भारत के पौराणिक ग्रंथों या सनातन से जुड़े ग्रंथों पर हो सकता है विश्वास न हो इस कारण उनकी धारणा का निषेध आधुनिक काल के इतिहासकारों के लेखन से ही करना उपयुक्त रहेगा। ए राजा से ये अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है कि उन्होंने ऋगवेद या स्मृतियों को पढ़ा होगा। अपेक्षा तो ये भी नहीं की जा सकती है कि उन्होंने आनंद कुमारस्वामी, वासुदेवशरण अग्रवाल, जैसे लेखकों को पढ़ा होगा। पर ये अपेक्षा तो की जा सकती है कि ए एल बैशम का पुस्तक द वंडर दैट वाज इंडिया पढ़ा होगा। रोमिला थापर और रामशरण शर्मा जैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों के बारे में सुना होगा। उनके लेखन से परिचित होंगे। ए एल बैशम आस्ट्रेलियन नेशनल युनिवर्सिटी, कैनबरा में एशियन सिविलाइजेशन के प्रोफेसर थे। उन्होंने 1954 में ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ नाम की पुस्तक लिखी थी। ये कई वर्षों बाद भारत में प्रकाशित हुई थी। ये पुस्तक छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हुई और इतिहास के छात्रों के लिए लगभग अनिवार्य भी। इस पुस्तक में बैशम ने भारत के बारे में विस्तार से लिखा है। दूसरे संस्करण की भूमिका की कुछ पंक्तियों का उल्लेख राजा के बयान के संदर्भ में करना उचित रहेगा। बैशम लिखते हैं कि इस पूरी किताब में ‘इंडिया’ शब्द का प्रयोग भौगोलिक आधार पर किया गया है, जिसमें पाकिस्तान समाहित है। इसका अर्थ है कि वो एक राष्ट्र के तौरा पर अखंड भारत की बात कर रहे हैं। इस पुस्तक के पहले अध्याय में भी ए एल बैशम ने विस्तार से भारत और उसकी प्राचीन संस्कृति के बारे में बताया है। इसमें भी वो ‘लैंड आफ इंडिया’ के बारे में जब लिखते हैं तो भारत को एक राष्ट्र के तौर पर ही रेखांकित करते हैं। जब वो हिमालय पर्वत शृंखला और नदियों की बात करते हैं तो दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की सीमाओं की बात करते हैं। जब वो डिस्कवरी आफ इंडिया की बात करते हैं तो प्राचीन भारतीय सभ्यता को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्राचीन भारत की सभ्यता मिस्त्र, मेसोपोटामिया और ग्रीस की सभ्यताओं से अलग हैं क्योंकि इनकी पंरपराएं सभ्यता के आरंभ से लेकर अबतक निर्बाध रूप से कायम हैं। इसके आगे वैशम एक पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण कहते हैं, भारत और चीन प्राचीनतम सांस्कृतिक परंपरा वाले देश हैं जहां एक निरंतरता लक्षित की जा सकती है। लगभग 500 पृष्ठों की इस पुस्तक को ही राजा पढ़ लेते तो भारत को एक राष्ट्र नहीं कहने की अज्ञानता नहीं करते। इसको विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का देश नहीं बताते। रोमिला थापर से लेकर रामशरण शर्मा तक ने भी जब भारत की बात की है तो एक देश के तौर पर ही की है। 

ए राजा के उपरोक्त बयान के कारणों पर आने के पहले सम्राट अशोक के शिलालेखों को भी देख लेते हैं। 1837 तक अशोक के शिलालेखों के बारे में पता नहीं था। 1837 में पहली बार जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के शिलालेखों के बारे में लिखना आरंभ किया। 1901 के आसपास वी स्मिथ ने सम्राट अशोक पर एक मोनोग्राफ लिखा। इसके बाद अशोक के कालखंड के शिलालेखों की ओर पूरी दुनिया के इतिहासकारों का ध्यान गया। अब यह तो नहीं कहा जा सकता है कि ए राजा को वी स्मिथ के मोनोग्राफ को पढ़ना चाहिए। 1925 में डी आर भंडारकर ने सम्राट अशोक के शासनकाल पर दिए अपने व्याख्यानों को प्रकाशित करवाया। उससे भी भारत के एक राष्ट्र और एक पारंपरिक संस्कृति के बारे में पता चला है। 

इस स्तंभ में पहले भी सभ्यता और संस्कृति के बारे में लिखा जा चुका है। संस्कृति के चार अध्याय जैसा ग्रंथ लिखनेवाले रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है कि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है और संस्कृति वो गुण है जो हममें व्याप्त है। वो ये भी कहते हैं कि संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है। वह सभ्यता के भीतर उसी तरह व्याप्त रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूलों में सुगंध। संस्कृति ऐसी चीज नहीं जिसकी रचना दस-बीस या सौ-पचास वर्षों में की जा सकती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान प्रदान से बढ़ती है। जब भी दो देश वाणिज्य-व्यापार अथवा शत्रुता-मित्रता के कारण आपसे में मिलते हैं तब उनकी संस्कृतियां एक दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं। भारत वर्ष पर आक्रांताओं का आक्रमण हुआ। उन्होंने भारत पर शासन किया। उस कालखंड में भी भारत की संस्कृति प्रभावित हुई थी। संस्कृति के प्रभावित होने का ताजा उदाहरण हम 1991 के बाद के कालखंड में देख सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था को जब खोला गया तो उसने भी हमारी संस्कृति को प्रभावित किया। जब भारत की संस्कृति कहा जाता है तो उसको संस्कृति के अर्थ में ही समझना होगा। कई इतिहासकारों और विद्वानों ने जब संस्कृति के प्रभावित होने की बात की तो उन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ये कहा कि भारत की संस्कृति एक ही है जहां हम विविधताओं का उत्सव मनाते हैं। संस्कृति की स्थापित परिभाषा के आलोक में उनकी ये बात सटीक प्रतीत होती है। 

दरअसल ए राजा का बयान एक राजनीतिक बयान है। जब एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि इस तरह की बातें करता है तो उसका समाज पर असर पड़ता है। लोकतंत्र में जनता का अधिकार है कि वो अपने नेताओं की बातों के पीछे की राजनीति को समझे। राजा जब तमिल, तेलुगु और उड़िया की अलग संस्कृति की बात करते हैं या भारत के एक राष्ट्र की अवधारणा पर चोट करते हैं तो उनका सोच विभाजनकारी प्रतीत होता है। इस तरह के बयानों से फौरी तौर पर कुछ राजनीतिक लाभ हो सकता है लेकिन न तो उनको न ही पार्टी को कोई दीर्घकालिक फायदा होगा न ही उनको व्यक्तिगत रूप से। इस तरह के विभाजनकारी बयानों का प्रतिकार इस कारण भी किया जाना चाहिए ताकि विभाजनकारी सोच को रोका जा सके। कुछ दिनों से देश में उत्तर दक्षिण के बीच विवाद को हवा दी जा रही है। राजा के बयान को भी उसी आलोक में देखा जाना चाहिए। ऐसे लोग भारत के संविधान की शपथ लेकर संसद में बैठते हैं लेकिन प्रतीत होता है कि वो जिसकि शपथ लेते हैं उनमें भी उनकी आस्था नहीं है। 

Saturday, June 8, 2019

सलमान खान का अपना ‘भारत’


अभिनेता सलमान खान ने गुरूवार को एक ट्वीट किया- सबको बहुत धन्यवाद, मेरे करियर का सबसे बड़ा ओपनिंग देने के लिए, पर मुझे जिस पल सबसे ज्यादा खुशी मिली या मैं जब सबसे अधिक गौरवान्वित हुआ वह क्षण था जब मेरी फिल्म में राष्ट्रगान बजा और मैं उसके सम्मान में खड़ा हो गया। अपने देश के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता है। जय हिंद और हैश टैग के साथ भारत। सलमान खान अपनी नई फिल्म ‘भारत’ की बात कर रहे थे। अबतक सलमान के इस ट्वीट को एक लाख से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं और ये बारह हजार से ज्यादा रिट्वीट हो चुका है। दरअसल ये ट्वीट सलमान खान ने बुधवार को रिलीज हुई अपनी फिल्म ‘भारत’ को मिली बंपर ओपनिंग से खुश होकर किया था। इस फिल्म ने पहले ही दिन 42 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। ईद का दिन भी था। ये सलमान की अबतक की किसी भी फिल्म की ओपनिंग की कमाई से अधिक है। इसके पहले 2015 की दीवाली पर आई सलमान की फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ को 39 करोड़ 32 लाख रुपए की ओपनिंग मिली थी जो अबतक उनके फिल्मी करियर की सबसे बड़ी ओपनिंग थी। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक अबतक सलमान की ईद पर रिलीज होनेवाली फिल्मों में सबसे बड़ी ओपनिंग फिल्म ‘सुल्तान’ को मिली थी, जिसने पहले दिन 36 करोड़ 54 लाख रुपए का बिजनेस किया था । सलमान की फिल्म ‘भारत’ को ये रिकॉर्डतोड़ सफलता तो तब मिली जब पहले ही दिन ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को कमजोर करार दिया था। कोरियाई फिल्म ओड टू माई फादर के आधार पर भारत पाक विभाजन की थीम पर बनी इस फिल्म को समीक्षकों ने कमजोर तक करार दे दिया। सलमान की ये फिल्म, क्रिटिक कैटेगरी में भले ही अच्छा नहीं कर पाई पर पॉपुलर कैटेगरी में तो उसने बंपर सफलता हासिल की। तीन दिन में इस फिल्म ने 95 करोड़ से अधिक का बिजनेस कर लिया और उम्मीद जताई जा रही है कि रविवार को फिल्म ‘भारत’ सौ करोड़ के क्लब में शामिल हो जाएगी। अगर ऐसा होता है तो ये सलमान की चौदहवीं फिल्म होगी जो सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस करेगी। एक के बाद एक लगातार सफल फिल्में देकर सलमान खान ने साबित कर दिया है कि लोगों पर उनका जादू बरकरार है। अब ये देखना होगा कि किस वजह से सलमान खान का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा है। एक तरफ शाहरुख खान हैं जो ढलती उम्र के साथ एक अदद सफलता की तलाश में हर तरह की फिल्में करने का जोखिम उठाते जा रहे हैं, पर सफलता है कि उनके हाथ नहीं लग रही है। आमिर खान की फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान’ औंधे मुंह गिरी है। ऐसे में सलमान की फिल्मों की बंपर सफलता के मायने क्या है, क्यों लोग सलमान भाई को पसंद कर रहे हैं। पिछले दो सालों में ईद के मौकों पर रिलीज सलमान की फिल्म ट्यूबलाइट और रेस-3 ने औसत बिजनेस किया था, उसके बाद से ये कहा जाने लगा था सलमान खान के दिन अब लद गए। लेकिन ‘भारत’ ने सलमान के बारे में बन रही इस अवधारणा का निषेध कर दिया है।  
सलमान खान की फिल्मों की सफलता का कारक उनकी ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन छवि दोनों का समुच्चय है। सबसे पहले अगर हम सलमान खान की ऑन स्क्रीन छवि की बात करें तो फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ की नायिका विद्या बालन का उसी फिल्म का एक संवाद याद आता है। एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, और एंटरटेनमेंट। सलमान खान की फिल्में भी शुरू से लेकर आखिर तक एंटरटेनमेंट ही होती हैं। इनकी फिल्मों में किसिंग सीन नहीं होते, बेड सीन नहीं होता यानि कि एक साफ सुथरी फिल्म जिसको आप पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं। फिल्म ‘भारत’ में दिशा पटनी एक डांस सीक्वेंस में अचानक आकर सलमान खान के गाल पर किस कर लेती हैं जिसको सलमान की फिल्म में किसिंग सीन कहकर प्रचारित किया गया । लेकिन फिल्म में जब दर्शक वो गाना देख रहे होते हैं तो ये सीन कब आकर कब निकल जाता है, पता भी नहीं चलता। ना तो किसिंग सीन है और ना ही दर्शकों को उस सीन को दिखाने का कोई मकसद। बहुत ही नैचुरल तरीके से डांस सीक्वेंस में वो सीन आता है और एक सेंकेंड से भी कम समय में चला जाता है। इसके अलावा अगर हम देखें तो अपनी ज्यादातर फिल्मों में सलमान एक नायक के तौर पर किसी ना किसी परिवार के साथ खड़ा दिखता है। किसी परिवार को बचाते हुए दिखता है। किसी परिवार पर आई मुसीबत से उनको बचाने की कोशिश करता दिखता है। किसी परिवार के किसी सदस्य को गंभीर बीमारी से बचाने में जुटा होता है। सलमान की फिल्मों की कहानियों में परिवार की एक अंतर्धारा रहती है जो जो शुरू से लेकर अंत तक फिल्म में चलती रहती है। चाहे वो फिल्म वांटेड हो, फिल्म सुल्तान हो, फिल्म दबंग या किक हो, सभी फिल्मों में आपको परिवार को बचाने या उसके जोड़ने की एक धारा दिखाई देती है। इसलिए जब दर्शक फिल्म को देख रहा होता है तो फिल्म की इस पारिवारिक अंतर्धारा से खुद का जुड़ाव महसूस करता है। यही जुड़ाव दर्शकों को बार-बार सलमान की फिल्म देखने के लिए हॉल तक खींच लाता है। सलमान खान की फिल्मों में हिंसा होती है, लेकिन वो जुगुप्साजनक नहीं होती है। मार-पीट, खून खराबा सब होता है लेकिन जिस तरह की हिंसा हाल के दिनों में कुछ फिल्मों और वेब सीरीज में दिखाई जाती है वो यहां नहीं होती है।       
सलमान खान की फिल्म ‘भारत’ का ही एक डॉयलॉग है, देश लोगों से बनता है और लोगों की पहचान उनके परिवार से होती है। तुझमें पूरा देश है भारत। यह एक फिल्म का डॉयलॉग भर नहीं है अगर इसको सलमान की निजी जिंदगी पर भी लागू करके देखें तो वहां फिट बैठता है। सलमान की एक पहचान परिवार से भी होती है। यह ठीक है कि सलमान खान सुपरस्टार हैं, उनकी फिल्मों की अपार सफलता के बाद उनको किसी और परिचय की जरूरत नहीं है लेकिन बार-बार अपनी निजी जिंदगी में सलमान अपने परिवार के साथ ही दिखाई देते हैं। अकारण ऐसी खबरें नहीं आती हैं कि सलमान की फिल्में उसके पिता सलीम खान सबसे पहले देखते हैं और फिर वो जो बदलाव सुझाते हैं उसपर अमल होता है। सलमान की अपनी मां और बहनों के साथ की तस्वीरें आती हैं। अपने भाई और भाई के परिवार को साथ लेकर चलने के किस्से सुनने को मिलते हैं। इतना यश और पैसा कमाने के बावजूद अपने माता-पिता के साथ एक छोटे से फ्लैट में रहना। मां के हाथ का बनाया खाना खाना आदि-आदि। इऩ सबका असर भी भारतीय जनमानस पर पड़ता है। जब सलमान की फिल्में आती हैं तो दर्शकों के अवचेतन मन में बसी सलमान खान की ये छवि उसको सिनेमा हॉल तक लेकर जाती हैं। इन सबसे दर्शकों का एक भरोसा और बनता है कि इसकी फिल्मों को देखते हुए घर-परिवार के साथ बैठकर मनोरंजन हो सकता है।
सलमान की ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन छवि के अलावा उनका अपने दर्शकों से एक कनेक्ट है। दर्शकों से सलमान के जुड़ाव की गुत्थी को बहुधा फिल्म समीक्षक पकड़ नहीं पाते हैं। जब भी उनकी फिल्म आती है तो फिल्म क्रिटिक बहुत ही पारंपरिक और सैद्धांतिक तरीके से उनकी फिल्मों का आकलन कर डालते हैं। सलमान की फिल्मों को ज्यादातर समीक्षक ठीक ही कसौटी पर कसते होंगे लेकिन पारंपरिक तरीके से सलमान खान की फिल्म और उसकी सफलता-असफलता का  आकलन संभव नहीं है। अभी अभी संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में एक बात की खूब चर्चा रही कि चुनाव का आकलन अब अंकगणित के आधार पर नहीं हो सकता है अब उसका आकलन केमिस्ट्री के आधार पर करना होगा । लोकसभा चुनाव के पहले ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों ने नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी और भारतीय जनता पार्टी की संभावनाओं को चुनावी अंकगणित के आधार पर विश्लेषित करने की कोशिश की और जब नतीजे आए तो लगभग सभी के आकलन गलत निकले। नरेन्द्र मोदी की जनता के साथ केमिस्ट्री ऐसी थी जिसको राजनीतिक पंडित पकड़ नहीं पाए। सवाल ये उठता है कि क्या सलमान खान की भी अपने दर्शकों के साथ ऐसी ही कोई केमेस्ट्री है जिसको फिल्मी पंडित पकड़ नहीं पाते हैं। जिस फिल्म को वो औसत बताते हैं वो फिल्में चार दिन में ही सौ करोड़ के क्लब में शामिल हो जाती हैं। आनेवाले दिनों में ये देखना दिलचस्प होगा कि सलमान की फिल्मों के आकलन का मानदंड बदलता है या नहीं, उसको देखने के लिए अगले ईद तक इंतजार करना होगा जब संजय लीला भंसाली की फिल्म में सलमान और आलिया की जोड़ी दिखेगी।