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Saturday, May 24, 2025

अत्यधिक प्रशंसा से दोषपूर्ण निष्कर्ष


रील की दुनिया गजब है। वहां कई तरह की मनोरंजक सामग्री मिल जाती है। हाल ही में एक एक रील दिखा जिसमें अभिनेता मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, कवि कुमार विश्वास और हास्य कलाकार कपिल शर्मा एक शो में बैठे बातें कर रहे थे। सब एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे थे। चारों वाकपटु हैं इस कारण प्रशंसा की अति बुरी नहीं लग रही थी। पहले कुमार विश्वास ने अभिनेता मनोज वाजपेयी की प्रशंसा की। मनोज बाजपेयी ने भी कुमार विश्वास की तारीफों के पुल बांध दिए। मनोज ने भाषा से बात आरंभ की, कुमार के बारे में एक बात मैं बताऊं कि जब हमलोग तीस के आसपास हो रहे थे तो हमारी पूरी की पूरी कोशिश ये थी कि हमारी अंग्रेजी अच्छी हो जाए। वो अंग्रेजी को भाषा नहीं मानते खासकर हिन्दुस्तान में इसको भाषा के तौर पर कभी लिया नहीं गया। इसको स्किल के तौर पर लिया गया। अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती है तो आपको मौका नहीं मिलेगा। उस दौर में एक युवा कवि आता है और पूरा का पूरा जो साहित्य है उसको पलट देता है। उसको जनमानस तक लेकर जाता है। वो हैं कुमार विश्वास। मनोज वाजपेयी इतने पर ही नहीं रुके और कहने लगे कि ये काम अपने समय में दिनकर साहब ने किया था। जब क्लिष्ट हिंदी को उन्होंने बोलने चालने की भाषा में परिवर्तित किया और उसमें बड़ी बड़ी बातें की और गांव गांव तक कविता को पहुंचाया था। वही काम श्री हरिवंश राय बच्चन ने भी किया था।  

मैंने इस क्लिप को तीन बार सुना क्योंकि मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। लग रहा था कि किसी ने एआई से बनाकर शरारत की है। पता चला कि मनोज वाजपेयी ने सच में पंच वर्ष पूर्व ऐसा कहा था। रील के मूल वीडियो तक जाकर पुष्टि की। कुमार विश्वास बेहद लोकप्रिय कवि हैं। उनकी कविता, कोई दीवाना कहता है, लोकप्रिय है। इस कविता के उनकी कविताओं से हमारा परिचय नहीं है इसलिए टिप्पणी नहीं करूंगा। पर मनोज वाजपेयी के इस कथन- कि जब उनकी उम्र तीस वर्ष के आसपास थी तब कुमार विश्वास ने पूरे साहित्य को पलट कर रख दिया था- पर चर्चा अवश्य होनी चाहिए। पता नहीं मनोज वाजपेयी किस दिव्य दृष्टि से साहित्य को देख रहे थे और साहित्य के पलटने का उनका पैमाना क्या था। इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार मनोज वाजपेयी का जन्म वर्ष 1969 है। उनके हिसाब से कुमार विश्वास ने अपनी रचनात्मकता से 1999-2000 के आसपास हिंदी साहित्य को पलट दिया था। उन वर्षों में ऐसा कुछ हुआ होगा ये साहित्य जगत को ज्ञात नहीं है। उस समय कुमार विश्वास हास्य और मंचीय कवि के रूप में अपनी पहचान के लिए संघर्ष अवश्य कर रहे थे। कुमार विश्वास को देश ने अन्ना आंदोलन के समय जाना और उसके बाद उनकी सफलता एक किवदंती की तरह है। बावबूद इसके उनकी रचनात्मकता से साहित्य को कोई नई दिशा मिली हो ये सामने आना शेष है। कुमार के पास बोलने की कला है। वो श्रोताओं को बांध लेते हैं, लेकिन कवि के तौर पर उनका मूल्यांकन होना भी शेष है। 

प्रशंसा करते समय अति उत्साह में मनोज वाजपेयी ने कुमार की तुलना दिनकर और हरिवंश राय बच्चन से कर डाली। दिनकर के बारे में मनोज ने बताया कि उन्होंने हिंदी को क्लिष्टता से मुक्त किया और आम बोलचाल की भाषा में काव्य रचना कर जन जन तक पहुंचा दिया। पता नहीं आम बोलचाल की भाषा क्या होती है और उसके शब्द कैसे होते हैं। दिनकर की कविता हिमालय में उपयोग किए गए शब्द देख लेते हैं- साकार दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पूंजीभूत ज्वाल। इसके अलावा इस कविता में भाल, निस्समीम व्योम, गर्वोन्नत, वितान, दग्ध, विगलित, कराल, व्याल, ज्वाल, अंबुधि, अंतस्थल, अग्निज्वाल, प्रल्य नृत्य, शंखध्वनि। इसी तरह से अगर हम दिनकर की अन्य कविताओं को देखें तो उसमें भी हिंदी के इस तरह के शब्दों का ही उपयोग हुआ है। खून या रक्त की जगह रुधिर का उपयोग करते हैं दिनकर। रश्मिरथी से लेकर हुंकार तक में दिनकर की कविताओं में शब्दों का चयन विशिष्ट है। ये कहना कि दिनकर ने बोलचाल की भाषा में कविता को गांव-गांव तक पहुंचा दिया, उचित नहीं होगा। दिनकर ने कविता को लोकप्रिय बनाया अवश्य, पर ये संभव हुआ कविता के भावों से, उसकी संवेदनाओं के लोगों से जुड़ने की शक्ति से। बच्चन की कविताओं की भाषा और उसमें प्रयुक्त शब्दों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि मनोज उदारता में बच्चन से कुमार की तुलना कर गए। उनकी कविता जो बीत गई में कुसुम, मधुवन, वल्लरियां, मदिरालय, मादकता और मधु, अग्निपथ में अश्रु, स्वेद और रक्त, मुझे पुकार लो में तिमिर, नेत्र, विनष्ट, विभावरी, निदाघ और सुधामयी जैसे शब्द आते हैं। क्या ये बोलचाल के शब्द हैं? 

प्रशंसा करना अच्छी बात है लेकिन तुलना तो ऐसी होनी चाहिए कि लोगों के गले उतर सके। माना कि वो हास्य का मंच था। वहां सबकुछ हास्यभाव से कहा जा रहा होगा। हास्य के मंच पर भी जब दिनकर और बच्चन की कविताओं पर बात होती है तो चुटकुलेबाजी नहीं चल सकती। हल्की टिप्पणी भी नहीं। इन दोनों कवियों का शब्द भंडार इतना समृद्ध था कि उसको पढ़कर साहित्य की कई पीढ़ियां संस्कारित हुईं। मनोज वाजपेयी एक गंभीर अभिनेता हैं, उन्होंने अभिनय की वो ऊंचाई छू ली है जहां कम ही लोग पहुंच पाते हैं। उनको समाज सुनता है और उनके कहे को गंभीरता से याद ही नहीं रखता बल्कि समय समय पर उद्धृत भी करता है। मनोज को इसका ध्यान रखना चाहिए था। इसी तरह से इन दिनों इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर कुमार को युगकवि या महाकवि लिखा जा रहा है। कई बार पोस्टरों आदि पर भी दिख जाता है। यह भी एक प्रकार का अतिरेक है। युगकवि/महाकवि अपनी रचनाओं से बना जा सकता है इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर समर्थकों की टिप्पणी से नहीं। ये वैसा ही है जैसे न्यूज चैनलों पर चलनेवाली बहस में किसी नाम के आगे चिंतक या विचारक लिख दिया जाता है। प्रश्न ये उठता है कि क्या वो सही अर्थ में विचारक या चिंतक हैं। सफल अभिनेता और सफल नेता को अब भी हमारा समाज ध्यान से सुनता है। इस कारण उनकी जिम्मेदारी है कि वो जब बोलें तो सतर्क रहें। दोषपूर्ण टिप्पणियों से बचना चाहिए क्योंकि आनेवाली पीढ़ियां जब इतिहास पर नजर डालेंगी तो ये दोषपूर्ण टिप्पणियां उनको भ्रमित कर सकती हैं। 

Saturday, May 17, 2025

काल की चौहद्दी तोड़ती कविताएं


पहलगाम  में आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया तो देश के माहौल में अलग ही स्तर की राष्ट्रभक्ति दिखाई दे रही थी। हर भारतीय अपनी इस राष्ट्रभक्ति को भिन्न भिन्न तरीके से प्रकट कर रहा था। आतंकी हमले के बाद और इसके पहले भी कई महत्वपूर्ण अवसरों पर राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियों से लोग और संस्थाएं अपनी भावनाओं को प्रकट करती रहीं। आपरेशन सिंदूर के बाद जब भारतीय सेना पूरे घटनाक्रम की जानकारी देने आई तो दिनकर की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों से आरंभ किया। वे पंक्तियां कुछ इस तरह से हैं –हित वचन नहीं तूने माना/मैत्री का मूल्य न पहचाना/तो ले, मैं भी अब जाता हूं/अंतिम संकल्प सुनाता हूं/याचना नहीं, अब रण होगा/जीवन जय या कि मरण होगा। दिनकर की ये पंक्तियां रश्मिरथी के तृतीय सर्ग में है। इस कविता के माध्यम से भारत ने पाकिस्तान को संदेश देते हुए अपना अंतिम संकल्प सुना दिया। इसके पहले जब पहलगाम आतंकी हमला हुआ था। जनता आतंकवादियों से प्रतिशोध की अपेक्षा कर रही थी, तब भी दिनकर की पंक्तियां सुनाई दे रही थीं। रे रोक युधिष्ठिर को न यहां/ जाने दे उसको स्वर्ग धीर/ पर फिरा हमें गांडीव गदा/ लौटा दे अर्जुन भीम वीर। कह दे शंकर से आज, करें वो प्रलय नृत्य फिर एक बार/सारे भारत में गूंज उठे, हर हर बम का फिर महोच्चार। दिनकर की इस कविता का शीर्षक हिमालय है। जनता के मन में आतंकवादी हमला का बदला लेने की आकांक्षा प्रबल होने लगी तो वे इन पंक्तियों के माध्यम से अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण कर रहे थे। आशय ये था कि बहुत हुई बातचीत, बहुत हुई समाझाने बुझाने की प्रक्रिया। अब समय है सबक सिखाने का । सबक सिखाने के लिए धर्मराज युधिष्ठिर की आवश्यकता नहीं है उसके लिए बलशाली अर्जुन और भीम की जरूरत है।

दिनकर की ये कविता हिमालय, भारत चीन युद्ध के दौरान भी खूब गाई गई थी। उस समय जवाहरलाल नेहरू की छवि शांति चाहनेवाले नेता के रूप में थी। जब चीन, भारतीय सेना पर भारी पड़ने लगा था तब दिनकर की इस कविता से नेहरू को ललकारा गया था। इसी तरह से दिनकर के प्रबंध काव्य रश्मिरथी के तीसरे सर्ग की ही कुछ और पंक्तियां बहुधा सुनाई देती हैं। वे पंक्तियां हैं, जब नाश मनुज पर छाता है तो पहले विवेक मर जाता है। दिनकर हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं जो देश काल और परिस्थिति से ऊपर उठ चुके हैं। सही मायनों में अगर देखा जाए तो तुलसीदास के बाद दिनकर ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएं लोक में काफी पसंद की जाती हैं। कई लोगों को कंठस्थ भी हैं। चाहे वो उर्वशी के सर्ग हों या कुरुक्षेत्र या रश्मिरथी के। सिर्फ युद्ध ही नहीं, इमरजेंसी के दौरान भी दिनकर की कविताएं गाई जा रही थीं। पूरा देश इंदिरा गांधी के विरुद्ध खड़ा था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन जोर पकड़ रहा था। कहा तो यहां तक जाता है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने दिनकर की कविता का पाठ किया था। इसकी कविता की अंतिम पंक्तियां हैं, फावड़े और हल राजदंड बनने को हैं /धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है/दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो /सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। समय का घर्घर-नाद है उसके माद्यम से इंदिरा गांधी को जयप्रकाश नारायण संदेश दे रहे थे। क्या जनता पार्ची का चुनाव चिन्ह हलधर किसान भी इस कविता से ही प्रेरित है? दिनकर की यही पंक्तियां 2011 में दिल्ली में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान भी सुनने को मिली थीं। दिनकर ने ये कविता देश में इमरजेंसी लगाए जाने के दशकों पहले लिखी थी। इतने वर्षों बाद भी लोगों के मानस पर अंकित थीं। इसी तरह से रश्मिरथी का रचनाकाल भी 1952 का है, लेकिन जब सेना को 2025 में पाकिस्तान को संदेश देना था तो उसने दिनकर की कविता चुनी।

इतना ही नहीं आप न्यूज चैनलों पर चलनेवाले डिबेट्स में या विचार गोष्ठियों में एक पंक्ति अवश्य सुनते होंगे। कई बार नेता अपनी चुनावी रैलियों में भी इस पंक्ति का उपयोग करते हुए दिखाई देते हैं। वो पंक्ति है, समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। अब दिनकर की कविता के साथ एक खूबसूरत बात ये है कि अलग अलग पक्षों के लोग उनकी पंक्तियों का उपयोग अपने तर्कों को बल प्रदान करने के लिए करते हैं। अगर विपक्षी दलों को प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों को घेरना होता है तो वो इस पंक्ति का उपयोग करते हैं। मोदी के कुछ समर्थक जिनका दिनकर की इस कविता से परिचय है वो विपक्षी दलों को इसी कविता की अन्य पंक्ति से घेर लेते हैं। वो पंक्ति है, समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल। इस तरह से देखें तो दिनकर की एक ही कविता पक्ष और विपक्ष दोनों उद्धृत करते हैं। इतना ही नहीं जब देश में जाति गणना की बात हुई तो समाचार चैनलों पर बहस चलने लगी थी। अलग अलग पक्ष के लोग अलग अलग दलीलें दे रहे थे। जाति गणना में भी दिनकर की कविता की पंक्ति सामने आ रही थी। रश्मिरथी के प्रथम सर्ग में जब कर्ण से कहा जाता है कि वो अगर अर्जुन से लड़ना चाहता है तो उसको अपनी जाति बतानी होगी। तब कर्ण व्यथित होता है। झुब्ध भी। कर्ण की मनोदशा को चित्रित करते हुए दिनकर रचते हैं- ‘जाति!, हाय री जाति!’ कर्ण का ह्रदय क्षोभ से डोला/कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला/जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाखंड/मैं क्या जानूं जाति?/जाति हैं मेरे ये भुजदंड। इस कविता की पंक्ति जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाखंड जमकर उद्धृत होती है।    

दरअसल दिनकर की कविताओं विशेषकर उनके प्रबंध काव्य या कथा काव्य पर गंभीरता से विचार करें तो ये स्पष्ट होता है कि दिनकर अतीत और वर्तमान दोनों को साथ लेकर चलते हैं। ना केवल साथ लेकर चलते हैं बल्कि परंपरा और आधुनिकता का निर्वाह भी करते हैं। कई लोग उनके इन काव्यों को युद्ध काव्य कहते हैं लेकिन अगर समग्रता में विचार करें तो दिनकर अपने इन प्रबंध काव्यों में कहीं भी युद्ध का समर्थन नहीं करते हैं। दिनकर का कवित्व इन्हीं गुणों के कारण समकालीन बना रहता है। दिनकर की सिर्फ कविताएं ही नहीं बल्कि उनके लिखे गद्या भी असाधारण रूप से काल की चौहद्दी को तोड़ते चलते हैं। इसी असाधारण गुण के कारण उनकी रचनाएं कालजयी हो गई हैं।  

Saturday, April 12, 2025

साहित्यिक बाजार में नया कारोबार


कुछ दिनों पूर्व मेरे एक मित्र का फोन आया। इधर-उधर की बातें करने के बाद बोला कि यार! मैं कविताएं लिखना चाहता हूं। मुझे लगा ये सनक गया है या मजाक कर रहा है। हमाररी मित्रता लंबे समय से है उसने कभी इस तरह की बातें नहीं की। बात टालने के लिए मैंने कहा कविताएं लिखना तुम्हारे वश में नहीं है। तुम अपने करियर में अच्छा कर रहे हो वहीं ध्यान दो। उसने बहुत प्यार से उत्तर दिया। कहा मैं इस बात से सहमत हूं कि कविता लिखना कठिन है। पर सोचो अगर अनामिका जी जैसी सिद्धहस्त कवयित्री कविता लेखन की बारीकियां सिखाएंगीं तो मेरे जैसा व्यक्ति भी कविता लिख लेगा। अब मैं थोड़ा घबराया कि वो मुझे इस बात के लिए कहेगा कि मैं अनामिका जी से उसको समय दिला दूं। उसको टालने के लिए मैंने कहा कि अनामिका जी बहुत व्यस्त रहती हैं। उनका अपना लेखन है, कालेज की व्यस्तता है और पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां हैं, वो समय नहीं दे पाएंगी। उसने तपाक से उत्तर दिया कि मुझे तो अनामिका जी का समय मिल गया है। वो हमें कविता लेखन की बारीकियां सिखाएंगी। मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। उसने मेरे मनोभाव को समझकर पूरी बात बताई कि साहित्यिक पत्रिका नईधारा ने कविता लेखन वर्कशाप का आयोजन किया है। इस वर्कशाप का विज्ञापन उसने फेसबुक पर देखा था। विज्ञापन में वकर्शाप में भाग लेने की पूरी प्रक्रिया थी। उसने प्रक्रिया पूरी की और निर्धारित शुल्क जमाकर वो निश्चिंत हो गया था। इस बात से प्रसन्न भी कि अनामिका जी से वो कविता लेखन की बारीकियां सीखने जा रहा है। 

हमारी बातचीत समाप्त हो गई लेकिन बाद में मैं सोचने लगा कि चार घंटे के वर्कशाप में कोई कविता लेखन की बारीकियां कैसे सीख सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि अनामिका जी कविता लेखन पर विस्तार से बात कर सकती हैं। कविता का स्ट्रक्चर बता सकती हैं। हिंदी-अंग्रेजी कविता की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा पर बात कर सकती हैं। पर कोई किसी वर्कशाप में बारीकियां सीख कर कवि कैसे बन सकता है। कविता की उन परिभाषाओं का क्या होगा जो विभिन्न भाषाओं में प्रचलित है। हम तो बचपन से सुनते आए हैं कि वियोगी होगा पहला वो कवि आह से उपजा होगा गान। अगर वर्कशाप से कविता लिखना सीख जाएगा तो फिर न तो वियोग की आवश्यकता होगी और न ही आह की। विलियम वर्ड्सवर्थ की उस उक्ति का क्या होगा जिसमें वो कहते हैं, पोएट्री इज द स्पांटेनियस ओवरफ्लो आफ पावरफुल फीलिंग्स, इट टेक्स इट्स आरिजन फ्राम इमोशंस रिकलेक्टेड इन ट्रैंक्विलिटि। वर्ड्सवर्थ भी पावरफुल फीलिंग्स की बात कर रहे हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक लंबा लेख है कविता क्या है? उसमें एक जगह शुक्ल कहते हैं, जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार ह्रदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। ह्रदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। विचार करने की बात है कि कुछ घंटों में ह्रदय की मुक्ति साधना के लिए शब्द विधान सीखा जा सकता है। इन प्रश्नों के बारे में विचार किया जाना चाहिए। वरिष्ठ कवियों की नियमित संगति कविता से, उसकी लेखन पद्धति से हमें परिचित करवा सकती है पर लिखना तो अलग ही बात है। इन दिनों कविता छंद आदि से भी दूर हो गई है तो कह सकते हैं कि बारीकियां तो बची नहीं। छंद, मीटर आदि की आवश्यकता रही नहीं। 

इन दिनों होता ये है कि जैसे ही आप फेसबुक पर कोई एक विषय सर्च करते हैं तो उसी से संबंधित पोस्ट आपकी टाइमलाइन पर आने लग जाती है। चूंकि मैंने नईधारा का विज्ञापन उनकी पोस्ट पर जाकर देखा था। विज्ञापन के नीचे लिखे विवरण को पढ़ा भी था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी टाइमलाइन पर विभिन्न प्रकार के साहित्य लेखन सिखानेवाले पोस्ट आने लग गए। उनमें से तो कई लेखक ऐसे हैं जो उपन्यास और गद्य लिखना सिखा रहे हैं। उनकी अच्छी खासी फीस है। सिखानेवाले भी इस तरह के लेखक हैं जिनको अभी लेखक के तौर पर स्वयं को स्थापित करना है। स्वयं शुद्ध हिंदी लिखना सीखना है। वाक्य विन्यास ठीक हो इसपर मेहनत करने की आवश्यकता है। इन सबको देखकर मैं इस सोच में पड़ गया कि हिंदी साहित्य कितना विविधरंगी हो गया है। जो हिंदी साहित्य कभी बाजार के विरुद्ध चीखता नहीं थकता था आज उसी हिंदी साहित्य में लिखना सिखाना कारोबार हो गया है। साहित्य का बाजार सज चुका है। आकांक्षी लेखकों के लिए तरह-तरह की दुकानें हैं जिनपर विभिन्न विधाओं के बोर्ड लगे हुए हैं। उन बोर्ड को देखिए और अपनी पसंद की विधा का चयन कीजिए। भुगतान करिए और लेखक बनने की राह पर आगे बढ़ जाइए। कविता लिखना सीखिए, उपन्यास लेखन करिए, कहानियां लिखना सीखिए जो चाहें वो सीख सकते हैं। और अब तो आनलाइन के इस युग में सीखना भी आसान हो गया है। आप गाड़ी चलाते हुए सीख सकते हैं, जिम करते हुए सीख सकते हैं। 

प्रश्न ये है कि लेखन सिखाने की ये दुकानें क्यों खुल रही हैं और उनको पैसे देकर सीखने वाले मिल कहां से रहे हैं। ये जानने के लिए मैंने अपने मित्र को ही फोन मिलाया। मैंने उससे वर्कशाप के बारे में तो नहीं पूछा लेकिन कहा कि आप कवि बनकर क्या हासिल करना चाहते हैं। उन्होंने चहकते हुए कहा कि दोस्त तुम पता नहीं क्यों, समझना नहीं चाहते हो? अगर कविताएं लिखने लग गया तो रोज लिखूंगा। फेसबुक पर डालता रहूंगा। लाइक्स आदि तो मिल ही जाएंगे। सौ दिन में सौ कविताएं लिख दूंगा। आजकल दर्जनों ऐसे प्रकाशक हैं जो पैसे लेकर पुस्तकें छाप दे रहे हैं। उनसे अपनी कविताओं का संकलन छपवा लूंगा। सौ दो सौ प्रतियां बांट दूंगा। हो गया कवि। लिटरेचर फेस्टिवल में बुलाया जाने लगूंगा। कविता पाठ करने लग जाऊंगा। समाज में एक प्रतिष्ठा बन जाएगी। 

इसके बाद मैंने एक दूसरे आकांक्षी लेखक को फोन किया। उसने पिछले साल उपन्यास लेखन की वर्कशाप की थी। उसने बताया कि कहानी लिखना तो बहुत ही आसान है। आप किसी घटना को जैसे देखते हैं लिख दीजिए। अधिक से अधिक 1000 शब्द में। दस-बीस कहानी हो गई तो संग्रह प्रकाशित करवा लीजिए। एक प्रकाशक के पास पैकेज है, सिल्वर, गोल्ड और डायमंड। अगर आप डायमंड पैकेज लेते हैं तो वो आपकी पुस्तक और आपको प्रमोट करेगा, लिट फेस्ट में भी भेजने की व्यवस्था करेगा। ऐसे कई कथित उपन्यासकार या कहानीकार समकालीन हिंदी साहित्य की दुनिया में विचरण कर रहे हैं। और तो और ऐसे ही एक उपन्यासकार कहानी लिखना सिखाने की कार्यशाला का आयोजन भी करने जा रहे हैं। दरअसल साहित्य की दुनिया पिछले दिनों इतनी ग्लैमरस हो गई है कि हर कोई उस दुनिया में जाना चाहता है। वहां मंच है, सेल्फी है, सेल्फ प्रमोशन है, नेटवर्किंग का अवसर है, गासिप है। कहना ना होगा कि वहां हर चीज है जो ग्लैमरस दुनिया में होनी चाहिए। पर सबको ये समझना होगा कि साहित्य रचना एक लंबी तपस्या है जिसके बाद ही कोई विधा सधती है। ये कोई इंस्टैंट नुडल नहीं है कि झट डाला पट तैयार। 


Saturday, March 22, 2025

रील्स की मायावी दुनिया और साहित्य


इन दिनों रील्स और उसके कटेंट की अच्छे और बुरे कारणों से खूब चर्चा होती रहती है। रील्स देखना भी लोकप्रिय होता जा रहा है। चकित करने वाली बात ये है कि रील्स के विषयों का फलक इतना व्यापक है कि वो किसी को भी घंटों तक रोके रख सकता है। अब तो स्थिति ये हो गई है कि रील्स में दिखाई गई बातों को सत्य माना जाने लगा है। रील्स की दुनिया में भविष्यवक्ताओं की बाढ़ आई हुई है। कोई आपके नाम के आधार पर तो कोई आपके नाम में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या को जोड़कर आपका भविष्य बता रहा है। कई महिलाएं भी भविष्य के बारे में बात करती नजर आएंगी। वो भी बता रही हैं कि कैसे शुक्रवार को पति के साथ व्यवहार करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। कोई बताती हैं कि पत्नी को हर दिन पति के पांब दबाने चाहिए। क्योंकि लक्ष्मी जी भी विष्णु जी के पांव दबाती हैं। कोई महिला ये बताती है कि अमुक अंक लिखकर अपने घर की तिजोरी में रख दो या अमुक नंबर के नोट अगर आपने अपने घर में पैसे रखने के स्थान पर रख दिया तो पैसौं की कमी नहीं होगी। इतना ही नहीं रील्स की दुनिया में बिजनेस करने के तौर तरीकों और और जमाधन को दुगुना और तिगुना करने के नुस्खे भी बताए जाने लगे हैं। ये सब इतने रोचक अंदाज में बताया जाता है कि देखनेवाला मोबाइल से चिपका रहता है। आमतौर पर यह देखा जाता है कि अगर रील्स देखना आरंभ कर दें तो घंटे दो घंटे तो ऐसे ही निकल जाते हैं। कहना न होगा कि रील्स की दुनिया एक ऐसी मनोरंजक दुनिया है जो लोगों को बेहतर भविष्य का सपना भी दिखाती है। लोगों को पैसे कमाने से लेकर घर परिवार की सुख समृद्धि के नुस्खे बताती है। ये नुस्खे कितने सफल होते हैं ये पता नहीं क्योंकि इस तरह का कोई रील देखने में नहीं आता है कि फलां नुस्खे ये उनका लाभ हुआ या इस तरह की कोई केस स्टडी भी सामने नहीं आई है कि फलां नंबर के नोट तिजोरी में रखने से उसकी आमदनी निरंतर बढ़ती चली गई। पर हां इतना अवश्य है कि रील्स एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में ले जाता है जहां सबकुछ मोहक और मायावी लगता है। 

रील्स की दुनिया को हल्के फुल्के मनोरंजन के तौर पर लिया जाना चाहिए। लिया जा भी रहा है। लेकिन इन दिनों साहित्य, कला और कविता से जुड़े कुछ ऐसे रील्स देखने को मिले जो चिंतित करते हैं। हाल के दिनों में कई ऐसे रील्स देखने को मिले जिनमें सेलिब्रेटी कविता पढ़ते नजर आ रहे हैं। वो कविता किसी और की पढ़ते हैं और रील्स के डिस्क्रप्शन में कवि का नाम लिख देते हैं। रील में कहीं कवि का नाम नहीं होता है। सेलिब्रिटी की टीम उसको इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर पोस्ट कर देती है और अश्वत्थामा हतो नरो...वाली ईमानदारी के साथ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में कवि का नाम लिख देती है। होता ये है कि सेलिब्रटी की पढ़ी गई कविताओं का वीडियो इन प्लेटफार्म्स से डाउनलोड करके उनके प्रशंसक उसको फिर से उन्हीं प्लेटफार्म्स पर साझा करना आरंभ कर देते हैं। प्रशंसक अश्वत्थामा वाली ईमानदारी को समझ नहीं पाते और वो सेलिब्रिटी की कविता के नाम से ही उसको साझा करना आरंभ कर देते हैं। दिनकर जी जैसे श्रेष्ठ कवियों की कविताएं तो लोगों को पता है तो उसमें ये खेल नहीं हो पाता है लेकिन कई नवोदित कवि की कविताएँ सेलिब्रिटि के नाम से चलने लगती हैं। कवि को पता भी नहीं चलता और वो कविता सेलिब्रिटी के नाम हो जाती है। रील्स की दुनिया में इस बेईमानी से कई साहित्यिक प्रतिभा कुंद हो जा रही हैं। इसका निदान कहीं न कहीं बौदधिक जगत को ढूंढना ही चाहिए। 

एक और नुकसान जो साहित्य का हो रहा है वो ये कि पौराणिक ग्रंथों से बगैर संदर्भ के किस्सों को उठाकर प्रमाणिक तरीके से पेश कर दिया जा रहा है। पिछले दिनों जब अल्लाबदिया का केस हुआ था तो उसके कुछ दिनों बाद एक रील मेरी नजर से गुजरा। एक बेहद लोकप्रिय व्यक्ति उसमें एक किस्सा सुना रहे थे। किस्से में वो बता रहे थे कि कालिदास अपना ग्रंथ कुमारसंभव पूरा क्यों नहीं कर पाए? उनके हिसाब से कालिदास जब कुमारसंभव में पार्वती और शंकर जी की रतिक्रिया के बारे में लिखने जा रहे थे तब पार्वती जी को पता चल गया। उन्होंने सरस्वती जी तो बुलाया और कहा कि ये कौन सा कवि है और क्या लिखने जा रहा है। इसको रोकना होगा। फिर किस्सागोई के अंदाज में ये प्रसंग आगे बढ़ता है। वो बताते हैं कि सरस्वती जी ने क्रोधित होकर उनको श्राप दे दिया और वो बीमार हो गए। इस कारण से कुमारसंभव पूरा नहीं हो पाया। कालिदास बीमार अवश्य हुए थे। उनको पक्षाघात हो गया और वो भी सरस्वती के श्राप के कारण इसको कहां से उद्धृत किया गया था यह सामने आना चाहिए। इस पूरे प्रसंग में शब्द कुछ अलग हो सकते हैं पर उनका भाव यही था। चिंता की बात ये है कि ये पूरा प्रसंग जैसे सुनाया गया वो विश्वसनीय सा लगता है। इसको सुनकर नई पीढ़ी के लोगों में से कई सच मान सकते हैं, विशेषकर वो जो उनके प्रशंसक हैं। इससे तो एक अलग तरह का इतिहास बनता है। बौद्धिक समाज को इस तरह के प्रसंगों पर विचार करते हुए इसपर विमर्श को बढ़ावा देना चाहिए। चिंता तब और अधिक होती है जब इस तरह के रील बनानेवाले लोग बेहद लोकप्रिय होते हैं।

रील्स की दुनिया के पहले फेसबुक ने साहित्य का बहुत नुकसान किया, विशेषकर कविता का। फेसबुक के लाइक्स और कमेंट ने कवियों औ रचनाकारों के दिमाग में ये बैठा दिया कि अब उनके आलोचकों की आवश्यकता ही नहीं है। वो सीधे पाठक तक पहुंच रहे हैं। ऐसे लोग ये मानते थे कि आलोचक पाठकों तक पहुंचने का एक जरिया है। जबकि आलोचकों की भूमिका उससे कहीं अलग होती है। आलोचक रचना के अंदर प्रवेश करके उसकी गांठों को खोलकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। रचनाओं में अंतर्निहित भावों को आसान शब्दों में पाठकों को समझाने का प्रयत्न करता है। इससे रचनाकार और पाठक के बीच एक ऐसा संबंध बनता था जो फेसबुक के कमेंट से नहीं बन सकता है। फेसबुक पर जिस तरह के कमेंट आते हैं उनमें से अधिकतर तो प्रशंसा के ही होते हैं जो रचना का ना तो आकलन कर पातें हैं और ना ही रचना के भीतर प्रवेश करके उसकी परतों को पाठकों के लिए खोलते हैं। कुल मिलाकार आज जो परिस्थितियां बन रही हैं उनमें प्रमाणिक स्त्रोंतो के आधार पर तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए साहित्यकारों को आगे आना होगा। प्रो जगदीश्वर चतुर्वेदी कई वर्षों से ये आह्वान कर रहे हैं कि साहित्यकारों को इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर लिखना चाहिए। उनके नहीं लिखने से अनर्गल लिखनेवालों का बोलबाला होता जा रहा है। तकनीक को साहित्यकारों को अपनाना चाहिए और उसके नए माध्यमों को पाठकों तक पहुंचने का औजार बनाना चाहिए।     


Saturday, April 20, 2024

फिल्मों से निकलते साहित्यिक संदेश


फिल्मों में रुचि के कारण मित्रों से नई और पुरानी फिल्मों पर चर्चा होती रहती है। आपस में बातचीत करते रहते हैं कि कौन सी फिल्म या वेबसीरीज आई है, किसका ट्रीटमेंट कैसा है, संवाद कैसा है, कौन सी देखी जा सकती है। इसी क्रम में साइलेंस टू का नाम आया। बताया गया कि वो अमुक प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। मैंने सोचा, मनोज वाजपेयी की फिल्म है, देख ली जाए। प्रशंसा भी हो रही थी कि अच्छी मर्डर मिस्ट्री है। इस फिल्म को देखने की इच्छा के साथ टीवी आन किया। अलेक्सा का बटन दबाकर कहा, साइलेंस टू। अलेक्सा सर्च करने लगा। चंद पलों में उसने साइलेंस टू को स्क्रीन पर उपस्थित कर दिया। फिल्म का पोस्टर लगा था और नीचे उसकी अवधि भी एक घंटे पचास मिनट उल्लिखित थी। मैंने उसको सेलेक्ट करके चालू कर दिया। फिल्म आरंभ हो गई। मनोज वाजेयी इस फिल्म में थे। कहानी अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी की थी। मेंने देखना आरंभ कर दिया। कुछ अंतराल के बाद मुझे लगा कि गलत फिल्म देख रहा हूं। मैंने उसको बंद किया और फिर अलेक्सा को बोला कि साइलेंट टू दिखाओ। वो फिर वहीं लेकर गया । मैं उसी फिल्म को देखने लगा। करीब पौने घंटे के बाद फिर मुझे लगा कि गलत फिल्म देख रहा हूं। अपने मित्र को फोन करके कहा कि आपने नाम गलत बता दिया । थोड़ी नाराजगी भी दिखाई। उन्होंने फिर से कहा कि साइलेंस टू सर्च करिए और देखिए। अच्छी फिल्म है। मैंने फिर से देखा तो फिल्म के ऊपर छोटे अक्षरों में लिखा आ रहा था साइलेंस टू, मनोज वाजपेयी, प्राची देसाई। मैं फिर निश्चिंत हो गया और आगे देखने लगा। थोड़ी देर बाद ये समझ आ गया कि मैं साइलेंस टू नहीं बल्कि मनोज वाजपेयी की ही एक और फिल्म अलीगढ़ देख रहा था। तबतक एक घंटा देख चुका था। खैर...फिल्म पूरी देख गया। इस फिल्म ने दो सूत्र दे दिए जिसकी चर्चा यहां करना चाहता हूं। पहला तो ये कि अलेक्सा को भी धोखा दिया जा सकता है। किसी ने अलीगढ़ फिल्म के ऊपर साइलेंस टू का थंबनेल लगा दिया था। तकनीकी तौर फिल्म अलीगढ़ को यूट्यूब पर इस तरह से लगाया था कि साइलेंस टू सर्च करने पर वही फिल्म आए। स्तंभ लिखने के पहले एक बार फिर चेक किया। अब भी यही हो रहा था। दरअसल मुझसे गलती ये हो गई थी कि मुझे जी 5 प्लेटफार्म पर जाकर इस फिल्म को सर्च करना चाहिए था। 

दूसरी महत्वपूर्ण बात साहित्य से जुड़ी है। अलीगढ़ फिल्म में प्रोफेसर सिरस (मनोज वाजपेयी) और युवा पत्रकार दीपू (राजकुमार राव) के बीच एक संवाद है। बुजुर्ग प्रोफेसर सिरस युवा पत्रकार दीपू से पूछते हैं कि अच्छा बताओ तुमने किन किन पोएट को पढ़ा है। उत्तर मिलता पोएट, अय्यो! ज्यादा कुछ तो नहीं पढ़ा है...शब्दों का जो खेल है वो सब ऊपर से चला जाता है। प्रोफेसर सिरस कहते हैं कि पोएट्री शब्दों में कहां होती है बाबा। कविता तो शब्दों के अंतराल में मिलती है, साइलेंसेज और पाजेज में होती है। लोग अपने हिसाब से उसका अर्थ निकालते रहते हैं। उम्र और मैच्युरिटी के हिसाब से। समझे। दीपू कहता है, समझा। इसके बाद दीपू उनकी कविता पुस्तक के बारे में पूछता है। प्रोफेसर सिरस बेहद गंभीर भाव भंगिमा में बोलते हैं, नैचुरली आजकल कविता खरीदता कौन है?  और तुम्हारे जेनरेशन के लोगों को तो पोएट्री की समझ ही नहीं है। वो तो हर चीज को किसी न किसी लेबल से चिपकाना चाहते हैं- फैंटेस्टिक, फैबुलस, सुपर, सुपर्ब, कूल और आसम। फिर दोनों की बात केस को लेकर आगे चलती रहती है। संवाद की उपरोक्त पंक्तियों को अगर समकालीन साहित्य के संदर्भ में समझने का प्रयत्न करें तो काफी हद तक ये सही प्रतीत होती है। अगर प्रकाशकों की मानें तो कविता संग्रहों के खरीदार पहले की अपेक्षा में कम हुए हैं। कवियों को अपने संग्रह को प्रकाशित करवाने में संघर्ष करना होता है। समकालीन कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर से स्वयं मुझसे कहा कि उन्होंने एक कविता संग्रह तैयार किया था। उसको प्रकाशित करवाना चाहते थे लेकिन प्रकाशक तैयार नहीं हो रहे थे। उनके मुताबिक प्रकाशकों के तर्क थे कि कविता आजकल खरीदता कौन है। कविता के पाठक घट गए हैं। कई बार फिल्मों के संवाद में साहित्यिक यथार्थ उद्घाटित हो जाते हैं। 

कविता के अलावा प्रोफेसर सिरस ने जो एक और बात कही वो भी महत्वपूर्ण है। युवा पत्रकार को जब वो कहते हैं कि तुम्हारी पीढ़ी हर चीज को किसी न लेबल से चिपकाना चाहती है, फैंटेस्टिक, फैबुलस, सुपर, सुपर्ब, कूल और आसम। ऐसा लेबलीकरण इंटरनेट मीडिया पर साफ तौर देखा जा सकता है। अगर किसी ने फेसबुक पर कोई कविता पोस्ट की तो कमोबेश इसी तरह की प्रतिक्रिया अधिक मिलती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि कविता बिना पढ़े पोस्ट पर अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए प्रशंसात्मक लेबलनुमा टिप्पणी कर देते हैं। यह तो हुई वो बात जो सतह पर दिखती है। प्रो सिरस के लेबल लगानेवाली बात के गंभीर निहितार्थ भी हैं। इस तरह की टिप्पणियों (लेबलीकरण) से खराब कविता लिखनेवालों को बढ़ावा मिलता है। उनको लगता है कि वो पंत और निराला के स्तर की कविताएं लिख रहे हैं। तुकबंदी मिलाने और भावोच्छ्वास को कविता की तरह परोसनेवाले लेखकों का उत्साहवर्धन इतना हो जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर इस तरह की कविताएं बहुतायत में उपलब्ध होने लगती है। प्रशंसात्मक टिप्पणियों से उनको लगता है कि वो महान कवि हो गए हैं। अब उनकी कविताओं का संग्रह आना ही चाहिए। वो भावोच्छ्वास और तुकबंदी लेकर प्रकाशकों के यहां पहुंचने लगते हैं। कुछ प्रकाशक, दबाव या अन्य कारणों से संग्रह प्रकाशित भी कर देते हैं। इस तरह के संग्रह कविता के गंभीर पाठकों को भाते नहीं। परिणाम ये होता है कि वो बिक नहीं पाते और कविता को लेकर एक खराब धारणा बनने लगती है। 

इन प्रशंसात्मक लेबलों का एक और गंभीर नुकसान होता है। खराब कविता लिखकर भी प्रशंसा पाने वाले कवियों को ये लगता है कि आलोचकों की कोई भूमिका ही नहीं है। वो खुलेआम ये घोषणा करते नजर आते हैं कि पाठक उनकी कविताओं को पसंद कर रहे हैं तो आलोचकों की आवश्यकता क्या है। कवि और पाठक के बीच तीसरा क्यों ? आलोचकों के इस नकार का परिणाम आज युवा कवि ही सबसे अधिक झेल रहे हैं। संजय कुंदन, प्रेमरंजन अनिमेष, हेमंत कुकरेती की पीढ़ी की कविताओं पर तो कुछ आलोचकों ने विचार किया भी। उनकी कविताओं को रेखांकित किया। उनको साहित्य जगत में कवि रूप में स्थापित किया। इसके बाद की पीढ़ी के कवियों का क्या हुआ ?  इनके बाद की पीढ़ी का आलोचक नहीं होने के कारण अच्छे कवि भी रेखांकित नही हो पा रहे हैं। उनकी पहचान नहीं बन पा रही है। प्रोफेसर सिरस कह रहे हैं कि कविता शब्दों के अंतराल में उसके साइलेंस में होती है। इसी अंतराल और साइलेंस की कविता को उद्घाटित करने का कार्य आलोचक करते हैं। सामान्य लेबलीकरण से न तो अंतराल और न ही साइलेंस के अर्थ पाठकों के सम्मुख आ सकते हैं। आंत में प्रोफेसर सिरस अनुवाद की स्थिति पर भी टिप्पणी करते हुए कहते हैं अनुवाद भी स्तरीय न होने के कारण कविता का रूप बिगड़ जाता है। यह स्थिति सिर्फ कविता की नहीं है। अधिकतर गद्य के अनुवाद भी स्तरहीन हो रहे हैं। सिनेमा को जो लोग सिर्फ मनोरंजन का माध्यम मानते हैं उनको सिनेमा के दृश्यों और संवादों से निकलते संदेशों को पकड़ना चाहिए। कई बार फिल्मों और उसके संवादों से जो संदेश निकलते हैं वो समकालीन रचनात्मकता या सामाजिक संदर्भों पर टिप्पणी होती है।  


Saturday, January 14, 2017

कविता की अनुपस्थिति !

दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले का आज आखिरी दिन है । विश्व पुस्तक मेले में ताबड़तोड़ किताबों का विमोचन हुआ । हर विधा की सैकड़ों किताबों का मेलार्पण हुआ कभी लेखक मंच पर तो कभी प्रकाशकों के स्टॉल पर ही विमोचन हुआ । कहीं ताजा ताजा छप कर आई किताबों का विमोचन हुई तो कहीं पखवाड़े भर पहले छपी किताबों को वहां मौजूद लेखकों से मेलार्पण करवा दिया गया । जाहिर है कि इस तरह के मेलार्पण सोशल मीडिया के लिए किए करवाए गए । इसमें कोई बुराई भी नहीं है कम से कम फेसबुक आदि पर फोटो पोस्ट करने से पाठकों तक जानकारी तो पहुंची कि अमुक लेखक की अमुक किताब अमिक प्रकाशन से प्रकाशित हुई । किताबों की बड़ी संख्या में विमोचन और मेले में हर दिन पाठकों की उपस्थिति ने पुस्तकों को लेकर पाठकों के बढ़ते प्रेम की ओर भी इशारा किया जिससे एक आश्वस्तिकरक स्थिति बनी । मेले पर नोटबंदी का भी कोई असर दिखाई नहीं दिया । पाठकों की स्टॉलों पर भीड़ लगी रही और खरीद भी हुई । इतना बदलाव अवश्य देखने को मिला कि लगभग सभी प्रकाशकों ने पेटीएम से या फिर क्रेडिट कार्ड से भुगतान की सहूलियत का इंतजाम कर रखा था । मेले में किताबों पर चर्चा के दौरान छिटपुट विवाद भी हुए । मैत्रेयी पुष्पा की राजेन्द्र यादव पर लिखी किताब पर चर्चा के दौरान लेखकों में पीढ़ियों की टकराहट भी देखने को मिली । लेकिन जिस एक बात को रेखांकित किया जाना आवश्यक है वह है हिंदी के स्थापित कवियों के संग्रह का मेले के दौरान प्रकाशित नहीं होना । उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने अपनी टीम से एक सर्वे करवाया है जिसकी सूचना उन्होंने फेसबुक पर साझा की है ।
मोरवाल जी द्वारा करवाए गए सर्वे के मुताबिक - मेले से हिंदी कविता लगभग पूरी तरह अनुपस्थित है. प्रकाशकों के स्टाल्स पर एक के बाद एक ,कहानी संग्रह और उपन्यासों के लोकार्पण और उन पर चर्चा कराई जा रही है ,या हो रही है वहां कविता एक तरह से उपेक्षित-सी रही है. हिंदी के बड़े कवि कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल , लीलाधर जगूड़ी, उदय प्रकाश,कृष्ण कल्पित , अनामिका, सविता सिंह , नरेश सक्सेना , लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप का कोई कविता संग्रह मेले में नहीं आया । इसके अलावा भी संजय कुंदन, पवन करन, संजय चतुर्वेदी, कात्यायनी , अनीता वर्मा जैसे उनके बाद की पीढ़ी के कवियों के संग्रह भी प्रकाशित नहीं हुए । इस सर्वे के मुताबिक लगभग यही स्थिति फेसबुक से उपजे युवा कवि-कवयित्रियों की भी रही। चर्चा हुई भी होगी तो उस तरह नहीं जिस तरह मंचीय कवियों और ग़ज़लों के नाम पर लोकप्रिय शायरी को प्रोत्साहित किया जा रहा है । अगर इस सर्वे के नतीजों को सही माना जाए तो कविता के लिए ये स्थिति उत्साहजनक तो नहीं ही कही जाएगी । हिंदी के कवियों को इस पर विचार करने की जरूरत है कि क्या वजह है कि प्रकाशन जगत के इस सबसे बड़े आयोजन में स्थापित कवियों की अनुपस्थिति दर्ज की गई । क्या कविता अपने समय से पिछड़ गई है या फिर कविता को लेकर पाठकों में कोई उत्साह नहीं रहा जिसका प्रभाव प्रकाशकों की उदासीनता के रूप में सामने आ रहा है । दूसरी बात ये भी देखने को मिली कि छोटे छोटे कई प्रकाशकों की सूची के नए प्रकाशनों में कविता संग्रहों को अच्छी खासी जगह मिली हुई है । तो क्या कविता को लेकर प्रकाशन का अर्थशास्त्र बदल रहा है । या फिर कोई और वजह है । कविता एक ऐसी विधा है जो साहित्य को हमेशा से नये आयाम देती रही है अगर उसपर किसी तरह की आंच आती है तो यह गंभीर बात होगी ।


Sunday, October 4, 2015

अलविदा वीरेन दा

हिंदी साहित्य जगत के वीरेन दा का जाना हिंदी कविता को सूना कर देने जैसा है । उनके निधन से हिंदी कविता को तो भारी क्षति हुई ही है, हिंदी समाज को जोड़कर आगे बढ़नेवाला एक अद्भुत व्यक्तित्व की कमी भी हिंदी जगत में लंबे समय तक महसूस होगी । साहित्यकारों, साहित्यप्रेमियों और पत्रकारों के बीच वीरेन दा के नाम से लोकप्रिय वीरेन्द्र डंगवाल एक ऐसी शख्सियत थे जिनसे जो एक बार मिला तो फिर उनका ही होकर रह गया । बरेली में अध्यापन के अलावा उन्होंने एक अखबार में भी अपना योगदान दिया और उस दौर के लोग उनकी पत्रकारीय संवेदना और सूझबूझ की अब भी तारीफ करते हैं । उस दौरे के उनके साथ के पत्रकार सालों बाद भी उनको इतनी इज्जत देते हैं जिसकी अपेक्षा उन्होंने कभी नहीं की थी । मेरा वीरेन्द्र डंगवाल से कभी कोई परिचय नहीं था । मैं साहित्य अकादमी के पुरस्कारों और उसमें होनेवाली गड़बड़ियों पर लंबे समय से लिखता रहा हूं ।  दो हजार चार में जब वीरेन डंगवाल को उनके कविता संग्रह दुश्चक्र में स्रष्टा पर पुरस्कार मिला था तो चयन समिति की हड़बड़ी पर सवाल उठाते हुए मैंने एक लेख लिखा था । उस वक्त हिंदी भाषा के संयोजक थे उपन्यासकार गिरिराज किशोर और आधार सूची तैयार की थी कहानीकार प्रियंवद ने । मैंने उस वक्त साहित्य अकादमी के दस्तावेजों के हवाले से लिखा था कि निर्णायक मंडल के तीन सदस्यों में से दो कमलेश्वर और श्रीलाल शुक्ल बैठक में उपस्थित ही नहीं हो सके थे । अपनी टिप्पणी में निर्णायक मंडल के तीसरे सदस्य से रा यात्री ने लिखा- दुश्चक्र में स्रष्टा- काव्य कृति को हम सभी निर्णायक मंडल के सदस्य एक समान प्रथम वरीयता देते हैं और साहित्य अकादमी के दो हजार चार के पुरस्कार के लिए सहर्ष प्रस्तुत करते हैं । उसी जगह हिंदी भाषा के तत्कालीन संयोजक गिरिराज किशोर ने लिखा- श्री श्रीलाल शुक्ल एवं कमलेश्वर जी उपस्थित नहीं हो सके । उन्होंने अपनी लिखित संस्तुति बंद लिफाफे में भेजी है । श्रीलाल जी ने ज्यूरी के उपस्थित सदस्य से रा यात्री से फोन पर लंबी बातकर दुश्चक्र में स्रष्टा को 2004 के पुरस्कार के लिए समर्थन दिया । हलांकि साहित्य अकादमी के दस्तावेजों में श्रीलाल जी की संस्तुति मौजूद नहीं थी । कमलेश्वर का बीस दिसंबर खत था जो इक्कीस दिसंबर की बैठक के पहले प्राप्त हो गया था । इन तमाम तथ्यों के आधार पर मैंने साबित किया था कि साहित्य अकादमी ने डंगवाल को पुरस्कृत करने में हड़बड़ी दिखाई । बात आई गई हो गई थी । अभी तीन साल पहले वीरेन जी दिल्ली में एक कार्यक्रम में मिले थे । मैंने उनको अपना परिचय देकर अभिवादन किया तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार पर तुमने अकादमी की खूब खबर ली थी । आठ साल बाद भीउनको मेरा लेख याद था । उन्होंने कहा कि उस लेख में उन्हें सबसे अच्छी बात ये लगी थी तमाम बड़े लोगों के होने के बावजूद उनको कठघरे में खड़ा करने में कोताही नहीं बरती गई थी । तो ऐसे थे वीरेन दा ।

वीरेन्द डंगवाल ने कम लिखा, लेकिन जो लिखा उससे समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया । वीरेन दा के बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता की दो पीढ़ी को संस्कारित किया । अपनी लेखनी से,अपनी रहनुमाई से, अपने विजन से । उनके फेसबुक वॉल पर और उनकी याद में लिखे जा रहे तमाम लेखों में इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि किस तरह से उन्होंने अपने संपर्क में आनेवाले हर इंसान की जिंदगी को प्रभावित किया । जनपक्षधरता के स्वर उनकी कविताओं में अंत तक मुखर रहे । और यही अपनापन और जनपक्षधरता उनकी पहचान है जिसको मृत्यु कभी मिटा नहीं पाएगी ।