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Saturday, September 10, 2022

भाषाई सांप्रदायिकता से हिंदी की हानि


दो दिन बाद हिंदी दिवस है। हिंदी भाषा के बारे में जमकर चर्चा होगी। हिंदी को बाजार और रोजगार से जोड़ने की कई तरह की बातें होगी। स्वाधीनता के बाद से लेकर अबतक हिंदी की व्याप्ति बढ़ने पर हिंदी समाज प्रसन्न भी होगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर अधिक प्रयास करने पर बल देते लोग भी मिलेंगे। हिंदी को  संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए केंद्र सरकार से अपील भी होगी। हर वर्ष हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े में इस तरह के वाक्य सुनाई पड़ते हैं। हिंदी के विकास और उसकी समृद्धि को लेकर कार्य भी हो रहे हैं। शब्दकोश से लेकर भारतीय भाषाओं के कोश तैयार किए जा रहे हैं। हिंदी को तकनीक से जोड़ने के लिए सांस्थानिक और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भले ही हिंदी शब्द का उल्लेख नहीं है लेकिन मातृभाषा और भारतीय भाषा को प्राथमिकता की बातें हैं। इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी शिक्षा के लिए हिंदी में पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। पर स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के बाद अब अमृतकाल में हमें उन ऐतिहासिक कारणों को भी देखना चाहिए जिसकी वजह से हिंदी को पराधीन हिंदुस्तान में संघर्ष करना पड़ा और जिसका असर स्वाधीनता के बाद भी हिंदी पर दिखाई दे रहा है। 

पिछले दिनों उपरोक्त कारणों की पड़ताल कर रहा था तो गोरखपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के 19वें अधिवेशन में 2 मार्च 1930 को गणेश शंकर विद्यार्थी का अध्यक्षीय भाषण देखने को मिला। अपने भाषण में गणेश शंकर विद्यार्थी ने विस्तार से उन कारणों और परिस्थितियों की चर्चा की है जिसकी वजह से हिंदी को पराधीन भारत में परिधि पर डालने और उसको वहीं बनाए रखने का षडयंत्र किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने लंबे वक्तव्य के आरंभ में ही इस ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने तब कहा था कि ‘आज से उन्नीस वर्ष पहले जब इस सम्मेलन का जन्म नहीं हुआ था और उसके जन्म के पश्चात भी कई वर्षों तक अपनी मातृभाषा का स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध करने के लिए पग पग पर न केवल संस्कृत, प्राकृत, शौरसैनी, मागधी, सौराष्ट्री आदि की छानबीन करते हुए शब्द-विज्ञान और भाषा-विज्ञान के आधार पर यह सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ा करती थी कि हिंदी भाषा संस्कृत या प्राकृत की बड़ी कन्या है, किंतु बहुधा बात यहां तक पहुंच जाया करती थी और यह भी सिद्ध करना पड़ता था कि नानक और कबीर, सूर और तुलसी की भाषा का बादशाह शाहजहां के समय जन्म लेनेवाली उर्दू बोली के पहले, कोई अलग गद्य रूप भी था। जिस भाषा में पद्य की रचना इतने ऊंचे दर्जे तक पहुंच चुकी हो, उसके संबंध में इस बात की सफाई देनी पड़े कि उसका उस समय गद्य रूप भी था, इससे बढ़कर कोई हास्यास्पद बात हो नहीं सकती।‘  गणेश शंकर विद्यार्थी के मुताबिक उस समय ये संभव हो सकता है कि गद्य लिखने की परिपाटी न हो और बड़े बड़े ग्रंथ पद्य में लिखे जाते रहे हों। उन्होंने इस संबंध में ईरान, ग्रीस, रोम और चीन का उदाहरण देकर अपनी बातें स्पष्ट की थीं। हिंदी को लेकर इस तरह की बातें कहनेवालों पर उपहास की शैली में प्रहार भी किया था। अब अगर हम गणेश शंकर विद्यार्थी के उपरोक्त कथन को देखें तो वो हिंदी को भाषा कहते हैं और उर्दू को बोली। इससे भी साफ होता है कि उस समय हिंदी और उर्दू की क्या स्थिति रही होगी। 

गणेश शंकर विद्यार्थी के चिंतन के मूल में एक और बात थी जो उनके वक्तव्य में परिलक्षित होती है। उनके मुताबिक राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। राजनीतिक पराधीनता का भाषा पर किस प्रकार असर पड़ता है उसको भी विद्यार्थी जी स्पष्ट किया। उन्होंने तब कहा था कि ‘राजनीतिक पराधीनता ने भारतवर्ष में भी उसी प्रकार, जिस प्रकार उसने अन्य देशों में किया, भाषा विकास की राह में रोड़े अटकाने में कोई कमी नहीं की।...इस देश के मुसलमान शासकों के कारण भारतीय भाषाओं का सहज सवाभाविक विकास नहीं हो सका। सबसे अधिक हानि हिंदी की हुई। उनकी सत्ता देश के उत्तर, पश्चिम और मध्यवर्ती भाग में थी। यही प्रदेश शाही सत्ता के कारण अरबी अक्षरों और फारसी साहित्य से इतने प्रभावित हुए कि उनका रंग रूप ही बदल गया। एक भाषा दूसरी भाषा के संसर्ग में आकर शब्दों और वाक्यों का सदा दान-प्रतिदान किया करती है। यह हानिकारक या अपमानजनक बात नहीं है किन्तु जब ये दान-प्रतिदान प्रभुता या पराधीनता के भाव से होता है, एक भाषा को दूसरी भाषा के शब्दों  और वाक्यों को इसलिए लेना पड़ता है कि दूसरी भाषा के लोग बलवान हैं, उनकी प्रभुता है, उनको प्रसन्न करना है, उनके सामने झुकना है, तो इससे लेनेवाले की उन्नति नहीं होती, वो अपनी गांठ का बहुत कुछ खो देते हैं और पर-भाषा की सत्ता को स्वीकार करके अपनी परवशता और हीनता को पुष्ट करते हैं और अपने सर्वसाधारण जन से दूर जा पड़ते हैं। इस देश में विजेताओं के साथ फारसी के प्रवेश से ये बातें हुईं।‘  अब यहां से सूत्र पकड़ने की आवश्यकता थी जिसमें बाद के विद्वानों से चूक हुई या उनमें से कुछ अपनी विचारधारा की वजह से इन कारणों को जानबूझकर छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि हिंदी भाषियों को यह सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ी कि फारसी के आगमन और उर्दू के जन्म के पहले भी हिंदी गद्य का स्वतंत्र अस्तित्व था।

इस प्रकार का वातावरण लंबे कालखंड तक चला और फिर मगुलों के बाद इस देश पर अंग्रेजों का शासन कायम हुआ। उस समय अदालतों की भाषा फारसी थी। अंग्रेजों ने फारसी के स्थान पर उर्दू को स्थापित कर दिया। जबकि उर्दू का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। गणेश शंकर विद्यार्थी के मुताबिक उस समय मुसलमान जिस हिंदी को बोलते और लिखते थे और जिसमें वे फारसी के कुछ शब्दों का प्रयोग करते थे वही उर्दू थी। अंग्रेजों ने उत्तर भारत में उर्दू को ऐसा स्थान देकर जो उसे पहले से प्राप्त न था, हिंदी और उर्दू के विवाद का सूत्रपात किया। इस प्रकार बहुसंख्यक हिंदी भाषा-भाषी लोगों की सुविधा और विकास में बाधा उत्पन्न कर दी। अब अगर इन बिंदुओं पर विचार करें तो हिंदी के लंबे संघर्ष को समझा जा सकता है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंदी का उपयोग एक बार फिर से बढ़ा और उसको हिंदुस्तान के लोगों को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर देखा जाने लगा। उस समय के कई नेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा की संज्ञा देते हुए ये अपेक्षा की थी कि स्वाधीनता के बाद हिंदी देश की राष्ट्रभाषा बनेगी। ये सबको स्वीकार भी था। अगर हम स्वाधीनता संग्राम के दौरान होनेवाले विरोध अभियानों का नाम देखें तो हिंदी की स्थिति स्पष्ट होती है। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, जैसा सुंदर हिंदी शब्द हो, नमक सत्याग्रह या पूर्ण स्वराज या भारत छोड़ो आंदोलन। ये हिंदी शब्दों की स्वीकार्यता और संप्रेषणीयता थी जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक कर दिया। जब गांधी दक्षिण अफ्रका से भारत वापस लौटे थे तब वो भी हिंदी के पक्षधर थे। वो हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर देखते थे लेकिन कालांतर में वो हिन्दुस्तानी के पक्षधर होते चले गए। वो हिन्दुस्तानी जिसको लेकर स्वाधीनता के बाद संविधान सभा में बहस हुई, पहले आमचुनाव के बाद संसद में बहस हुई लेकिन आज वो अपनी पहचान और प्रासंगिकता दोनों खो चुका है। मुगलों के समय हिंदी आक्रांताओ की भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार बनी, उसके बाद अंग्रेजों ने हिंदी को उर्दू से दबाने की कोशिश की। अंग्रेजी को प्राथमिकता देकर भारतीय भाषाओं का तिरस्कार किया। कुल मिलाकर अमृतकाल में हमें इन बातों पर विचार करते हुए हिंदी और भारतीय भाषाओं को मजबूत करने का प्रण लेना चाहिए। 

Monday, December 20, 2021

मंदिरों की राष्ट्र संवर्धन में बड़ी भूमिका


काशी विश्वनाथ धाम के नव्य और भव्य स्वरूप के लोकार्पण के बाद भारतीय समाज और संस्कृति में मंदिरों के स्थान को लेकर भी चर्चा होनी चाहिए। मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र के ऐतिहासिक स्वरूप पर बात होनी चाहिए। मंदिरों से जुड़ी कलाओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। हमारीभारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर किया। समाज की ताकत पर प्रहार किया। मुगलों के शासनकाल में विदेशों से चित्रकार आदि भारत आए। मुगलों की कला में और उसके पहले के भारतीय कला में एक आधारभूत अंतर था। मुगल कला का केंद्र बिंदु बादशाह का निजी जीवन और निजी पसंद था। भारतीय कला लोक के बीच व्याप्त थी। मंदिर उसके केंद्र हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न कलाओं में खुलते और खिलते थे।

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। इसी काल में मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में माने जाने पर जोर दिया जाने लगा। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया। जब देश स्वाधीन हुआ तो पहले प्रधानमंत्री का वैचारिक झुकाव साम्यवाद की ओर था। सोमनाथ मंदिर पर देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्रीजवाहरलाल नेहरू के बीच ऐतिहासिक मतभेद हुआ था। राजेन्द्र बाबू सोमनाथ मंदिर को सिर्फ धर्म से जोड़कर नहीं देख रहे थे लेकिन साम्यवाद के प्रभाव में नेहरू उसको धार्मिक केंद्र मानते थे। यह भारतीय दृष्टि और विदेशी प्रभाव की दृष्टि की टकराहट भी थी। स्वाधीनता के कुछ वर्षों के बाद संस्कृति और शिक्षा पर साम्यवादियों की पकड़ मजबूत होने लगी थी। इंदिरा गांधी के शासनकाल में साम्यवादियों ने संस्कृति और शिक्षा पर अपनी सत्ता लगभग स्थापित कर ली। धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादियों का मंदिरों के प्रति क्या रुख रहा है ये सार्वजनिक है। साम्यवादियों ने विदेशी कलाओं से लेकर विदेशी नाटककारों के नाटकों को भारत में खूब बढ़ाया। कहना न होगा कि साम्यवादियों के इसी उपेक्षा भाव की वजह से भारतीय कला पर विदेशी कलाओं को प्राथमिकता दी गई। धर्म से दूरी की वजह से मंदिर कलाओं के साधकों को हाशिए पर डालने की कोशिशें हुईं। उनको सांप्रदायिक तक करार दिया गया, क्योंकि साम्यवादी कला को भी धर्म से मुक्त करवाकरध़र्मनिरपेक्ष बनाना चाहते थे। 

पिछले दिनों प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह से संवाद पर आधारित यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक देवप्रिया (वाणी प्रकाशन)पढ़ रहा था। अचानक मेरी नजर एक प्रश्न पर चली गई।यतीन्द्र ने सोनल जी से उनपर सांप्रदायिक होने के लगनेवाले आरोपों के बारे में पूछा। सोनल मानसिंह ने लंबा उत्तर दिया। उसका एक अंश, ‘मैंने जिस विधा में जीवन गुजारा है वो संस्कृति से उपजा है और नृत्य जैसी महान परंपरा का स्थायी अंग है। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की ज्यादातर नृत्य परंपराएं मंदिर कलाओं के उदाहरण हैं। ये मठ, मंदिरों से जन्मी हैं और उनमें ज्यादातर कार्य व्यवहार देवता के प्रति आभार प्रदर्शन के अर्थ में होता आया है। पुराण, धर्म ग्रंथ, संत साहित्य, भजनावलियों और मंदिरों के महात्म्य का वर्णन ही नृत्य विधा में होता रहा है। यही मैंने जीवनभर किया है। । अब अगर ओडिसी या भरतनाट्यम के नृत्य करने से, गीत-गोविंद की चर्चा या आदर करने से कोई सांप्रदायिक ठहराया जाए तो मैं क्या कर सकती हूं। इस लिहाज से यदि आप या कोई व्यक्ति किसी कला या कलाकार का सरलीकरण करेगा, तब यह देखना मुश्किल हो जाएगा कि क्या क्या सांप्रदायिक हो सकता है? शास्त्रीय संगीत में भी अधिकांश गायन भक्तिपदों का होता है तो क्या सारे गायक सांप्रदायिक हो गए। भारतीय संस्कृति को उजागर करनेवाली कलाओं में खासकर नृत्य में कोई मार्क्सवादी विचार, मेरे देखने में नहीं आया है। आपको कहीं मिले तो ढूंढकर मुझे भी दीजिएगा।‘ 

सोनल मानसिंह के उत्तर के कई आयाम हैं और उसमें उन्होंने कई ऐसी बातें कही हैं जिसपर चर्चा होनी चाहिए। पहली बात तो ये कि भारत की ज्यादातर नृत्य परंपराएं मंदिर कलाओं के उदाहरण हैं। इससे यह बात पुष्ट होती है कि मंदिर भारतीय कलाओं का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय साहित्य में नटराज यानि शिव सबसे अच्छे नर्तक के रूप में स्थापित हैं। शिव का ये स्वरूप नृत्य कला का आधार भी कहा जाता है। सोनल जी अपने उत्तर का अंत एक प्रश्न से करती हैं और जानना चाहती हैं कि नृत्य में कोई मार्क्सवादी विचार हैं क्या? नृत्य और कला में मार्क्सवादी विचार के बारे में कल्पना करना भी व्यर्थ है। मार्क्सवादियों का तो नृत्य संगीत से ही कोई लेना देना रहा नहीं है। उनके हिसाब से तो ये सब बुर्जुआ से जुड़ी विधाएं हैं। काफी समय तक तो सिनेमा को लेकर भी उनकी यही राय थी।गीत संगीत को लेकर भी। वो कला की विभिन्न विधाओं से चिढ़ते हैं। उसकी उपेक्षा करते हैं। मार्क्सवादियों को लगता है कि हिंदू धर्म या सनातन धर्म नृत्य, गीत, अभिनय और कला की अन्य प्रवृत्तियों की वजह से जीवंत है। आततायियों के आक्रमण और मंदिरों को तोड़े जाने के बावजूद भारतीय धर्म के निर्मल आदर्शों के कारण भारतीय कला बची रही। आज जब एक बार फिर से मंदिरों को सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्रों के रूप में स्थापित किया जा रहा है तो मार्क्सवादी असहज हो रहे हैं। उनको लग रहा होगा अगर ये मंदिर फिर से सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर शक्तिशाली हो गए तो धर्म का प्रभाव बढ़ेगा। धर्म का प्रभाव बढ़ेगा तो भारतीय संस्कृति मजबूत होगी। प्रसिद्ध लेखक वासुदेव शरण अग्रवाल ने स्वाधीनता के बाद अपने एक लेख में कहा था, ‘राष्ट्र संवर्धन का सबसे प्रबल कार्य संस्कृति की साधना है। उसके लिए बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करना होगा, हमारे देश की संस्कृति की धारा अति प्राचीन काल से बहती आई है, उसके प्राणवंत तत्त्व को अपनाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं।‘ मंदिरों के सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पुनर्स्थापना राष्ट्र संवर्धन का उपक्रम है इसको सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में देखना गलत है। मंदिरों के प्राचीन वैभव की वापसी के उपक्रम से किसी अन्य मतावलंबियों को कोई खतरा नहीं है।मार्क्सवादी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने के लिए समाज में कई तरह से भ्रम फैलाते हैं। इस भ्रम का परोक्ष लक्ष्य अपनी वैचारिकी से जुड़े राजनीतिक दलोंको फायदा पहुंचाना होता है। आगामी महीनों में कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं । मार्क्सवादियों को लगता है कि मंदिर के नाम पर वो समाज में ध्रुवीकरण करने में सफल हो जाएंगे और चुनाव में उनको फायदा मिल जाएगा। ऐसी ही परिस्थतियों को ध्यान में रखकर वासुदेव शरण अग्रवाल ने बुद्धिपूर्वक प्रयत्न की सलाह दी थी।


Friday, September 24, 2021

आक्रांता के सेनापति के नाम सड़क


अगर आप कभी पूर्वी दिल्ली से लोदी कालोनी होते हुए बीके दत्त कालोनी जाते हैं तो आपको एक सड़क से गुजरना पड़ता है। उस सड़क का नाम है नजफ खान रोड। ये लोदी कालोनी के बाहर बाहर निकलती है और इसी सड़क पर नजफ खान का मकबरा भी है। ये मकबरा एक बहुत बड़े पार्क में बना हुआ है। कभी आपने सोचा है कि ये नजफ खान कौन था जिसके नाम पर इस महत्वपूर्ण इलाके की एक सड़क का नामकरण हुआ। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि वो कौन लोग थे जिन्होंने हिन्दुस्तान को परतंत्र बनाए रखने के लिए दर्जनों युद्ध लड़े । जब मुगलों की सत्ता कमजोर होने लगी थी तो शाह आलम द्वितीय ने मिर्जा नजफ खान को अपना सेनापति बनाया था। मिर्जा नजफ खान ने मुगलों की सत्ता को फिर से स्थापित करने के लिए सेना को संगठित किया और दिल्ली के आसपास कई युद्ध लड़े। उसने जाट राजा नवल सिंह की सेना के साथ मैदानगढ़ी पर कब्जा करने के लिए युद्ध किया था। इस युद्ध में नजफ खान बुरी तरह से घायल हुआ लेकिन मैदानगढ़ी पर कब्जा करने में उसको कामयाबी हासिल हुई। नजफ खान यहीं नहीं रुका था उसने दिल्ली से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर रामगढ़ के किले पर कब्जे के लिए भी उसपर चढाई की और कई दिनों के युद्ध के बाद उसपर कब्जा कर लिया। उसने रामगढ़ के किले पर कब्जा करने के बाद उसका नाम बदलकर अलीगढ़ कर दिया। तब से अलीगढ़ उसी के नाम से जाना जाता है। 

मिर्जा नजफ खान बहुत शातिर सैनिक था और वो जानता था कि साम्राज्य को बढ़ाने और उसको कायम रखने के लिए किन किन विधियों का उपयोग करना चाहिए। मुगल सल्तनत को दिल्ली में मजबूती देने के लिए उसने जासूसी का एक पूरा तंत्र विकसित किया था। उसके पास महल के अंदर की हर गतिविधि की जानकारी होती थी। यहां तक कि वो शाह आलम द्वितीय के हरम पर भी नजर रखता था। वो अपने विरोधियों को निबटाने के लिए खुफिया जानकारियों का उपयोग करता था। उसके जासूस आम जनता पर भी नजर रखते थे ताकि किसी तरह की विद्रोही गतिविधि से निबटा जा सके। नजफ खान को इस बात के लिए याद किया जाना चाहिए कि उसने दिल्ली के आसपास हुए स्थानीय विद्रोह को नाकाम किया, उसको रोका ताकि मुगलों का राज कायम रह सके। विदेशी आक्रांताओं को मदद और मजबूती देनेवाले नजफ खान नाम पर स्वाधीन भारत में सड़क होना सालता है।  

Friday, September 10, 2021

सांस्कृतिक हमलावरों को सम्मान क्यों


नई दिल्ली में एक सड़क है जिसका नाम है हुमांयू रोड। ये सड़क करीब डेढ किलोमीटर लंबी है और दिल्ली के पाश इलाकों को जोड़ती है। इंडिया गेट से सुजान सिंह पार्क या खान मार्केट जाना हो तो हुमांयू रोड मिलता है। हिन्दुस्तान में मगुल सल्तनत की स्थापना करनेवाले बाबर के बेटे हैं हुमांयू। मध्यकाल पर लिखनेवाले इतिहासकारों ने हुमांयू पर बहुत उदारता के साथ लिखा है। 1970 के बाद के वर्षों में रूस के कई प्रकाशन गृहों ने इस तरह की पुस्तकें प्रकाशित की जिनमें मुगल बादशाहों का महिमामंडन किया गया था। उनको बहुत कम दाम पर बेचा भी जाता था ताकि अधिक से अधिक लोग खरीद कर पढ़ सकें। इनमें प्रगति प्रकाशन और रादुगा प्रकाशन प्रमुख थे। मुगलकाल के इतिहास पर लिखते हुए भारतीय इतिहासकारों ने बाबरनामा, हुमांयूनामा और अकबरनामा को आधार बनाकर लिखा। ये सब आत्मकथाएं या जीवनियां थीं। इनका स्त्रोत के तौर पर उपयोग किया जा सकता था लेकिन इसको इतिहास लेखन का आधार बनाने से इतिहास दोषपूर्ण हो गया। कालखंड विशेष का समग्र मूल्यांकन नहीं हो पाया। परिणाम यह हुआ कि हमारे देश पर आक्रमण करनेवाले, हजारों लोगों का कत्ल कर अपने सल्तनत की स्थापना करनेवालों, देश की सांस्कृतिक परंपराओं को नष्ट करनेवालों के प्रति उदारता का भाव पैदा होने लगा। इसी उदारता की वजह से मुगल आक्रांता हुमांयू के नाम से सड़क और मुहल्ला बना दिया गया। 

अपने पिता की मौत के बाद जब हुमांयू दिल्ली की गद्दी पर बैठा था तो कई युद्धों के बावजूद सल्तनत नहीं बचा सका था। शेरशाह सूरी से हारने के बाद वो फारस भाग गया था। कई वर्षों बाद फारस के सैनिकों के साथ उसने फिर से दिल्ली सल्तनत पर कब्जा किया। जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने भले ही हिन्दुस्तान में मुगल सल्तनत की स्थापना की लेकिन उसके बेटे हुमांयू ने सांस्कृतिक सल्तनत का बीजोरोपण किया। जब हुमांयू दूसरी बार दिल्ली की गद्दी पर बैठा तब उसने भारत में फारसी कलाओं को बढ़ाना आरंभ किया। उसने फारसी वास्तुकला, चित्रकला, स्थापत्य कला आदि को प्राथमिकता देना आरंभ किया। इसके लिए फारस के वास्तुविद, चित्रकार आदि हिन्दुस्तान बुलाए गए। ये हुमांयू का हिन्दुस्तान पर सांस्कृतिक हमला था। समय के साथ मुगल सल्तनत का भले ही अंत हो गया लेकिन जिस सांस्कृतिक सल्तनत की स्थापना हुमांयू ने की थी वो अब भी हमारे देश में चल रहा है। आज भी मुगल कुजीन से लेकर मुगल स्थापत्य कला और मुगल चित्रकला जीवित है। रहे, पर उस आक्रांता के नाम पर सड़क का नाम क्यों है जिसने भारत की संस्कृति को बदलने का काम किया।