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Saturday, June 25, 2022

सिनेमा पर आपातकाल का कहर

सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसका भारतीय समाज पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। सिने अभिनेता और अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का कई बार राजनीति में उपयोग किया जाता है। कभी चुनाव जीतने के लिए तो कभी भीड़ जुटाने के लिए। दब देश में इमरजेंसी लगी थी और संजय गांधी खुद को इंदिरा गांधी के राजनीतिक वारिस के तौर पर स्थापित करने में लगे थे तब उन्होंने भी फिल्मी क
लाकारों की लोकप्रियता का सहारा लेने की कोशिश की थी। जब इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपी उस वक्त कांग्रेस पार्टी में इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा का नारा हकीकत हो चुका था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता घुटने टेक चुके थे। संजय गांधी का बोलबाला था। इमरजेंसी में हुई ज्यादतियों का सारा ठीकरा इंदिरा गांधी के सर फोड़ा जाता है और संजय गांधी की कारगुजारियों पर कम चर्चा होती है। इमरजेंसी के दौरान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों पर जो पाबंदियां लगाई गईं उसके लिए संजय गांधी और उस दौर के उनके चमचे जिम्मेदार थे। इमरजेंसी के दौर में किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध की खूब चर्चा होती है लेकिन देवानंद की फिल्मों और उनकी फिल्मों के गानों पर लगे प्रतिबंध के बारे में कम ही लोगों का पता है। देवानंद पर प्रतिबंध की वजह भी लगभग वही है जिसकी वजह से किशोर कुमार के गानों को प्रतिबंधित किया गया। 

देश में जब इमरजेंसी लगी थी तो हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक और नायिकाएं उसके पक्ष में थे। बाद में उनमें से कइयों को कांग्रेस सरकार ने राज्यसभा में नामित करके पुरस्कृत भी किया। इनमें से एक अभिनेत्री तो वो भी हैं जो इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर और फासीवाद की आहट पर लगातार टिप्पणी करती हैं। ये अभिनेत्री इमरजेंसी के दौर में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में नृत्य करने आई थीं और स्टेज पर परफार्म भी किया था। संजय गांधी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए काम भी किया था। दिलीप कुमार और नरगिस तो घोषित तौर पर कांग्रेस और संजय गांधी के पक्ष में थे और हिंदी फिल्मों के अन्य कलाकारों को उनके पक्ष में मोबलाइज भी कर रहे थे। देवानंद ने अपनी  आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में संजय गांधी के समर्थकों के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि इमरजेंसी के दौर में युवा कांग्रेस की एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला बांबे (अब मुंबई) आई थी और उसने बालीवुड में संजय के पक्ष में समर्थन जुटाने का अभियान चलाया था। वो चाहती थी कि हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्री संजय गांधी की अगुवाई में दिल्ली में होनेवाली रैली में शामिल हों। देवानंद को भी उसने तैयार कर लिया। देवानंद जब दिल्ली की रैली में पहुंचे तो दिलीप कुमार वहां पहले से मंच पर मौजूद थे। देवानंद के मुताबिक उस रैली में संजय गांधी को नेता के तौर पर स्थापित करनेवाले भाषण हो रहे थे और नारे लग रहे थे। रैली खत्म होने के बाद देवानंद को कहा गया कि उनको दूरदर्शन के स्टूडियो जाकर युवा कांग्रेस और उसके नेता की प्रभावी नेतृत्व क्षमता के बारे में अपनी बात रिकार्ड करवानी है। देवानंद ने लिखा है कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस वक्त की प्रोपगंडा मंशीनरी एकदम से फासीवादी तरीके से हर अवसर और हर व्यक्ति का उपयोग संजय गांधी की छवि चमकाने में लगी हुई थी। देवानंद को प्रोपगंडा मशीनरी का ये प्रस्ताव नहीं भाया और उन्होंने न सिर्फ दूरदर्शन जाने से मना कर दिया बल्कि इसका विरोध भी किया। उस दौर में कई अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने इमरजेंसी और संजय गांधी के पक्ष में बयान दिया था जो दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुआ था। अगर दूरदर्शन के आर्काइव में वो सामग्री हो तो उसको निकालकर देश की जनता को बताना चाहिए कि कौन कौन से फिल्मी कलाकार इमरजेंसी के पक्ष में थे। खैर.. ये अवांतर प्रसंग है। 

देवानंद के मना करने की उस वक्त की सरकार में बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई। दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों को तो बैन किया ही गया किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद का नाम नहीं आए ऐसी व्यवस्था बना दी गई। ये जानकर देवानंद को बहुत बुरा लगा था और उन्होंने उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। जब वो बांबे लौटे तो एक पार्टी मं उनको इस बात का एहसास हुआ कि उनके मना करने का कांग्रेस नेतृत्व ने कितना बुरा माना है। एक पार्टी में उनको अभिनेत्री नरगिस मिलीं और उनका हाथ पकड़कर एक कोने में ले गईं। वहां उन्होंने देवानंद से कहा कि आपने संजय गांधी के पक्ष में बोलने से मना कर अच्छा नहीं किया। उन्होंने देवानंद को दूरदर्शन पर जाने की सलाह भी दी। जब देवानंद ने उनको भी मना किया तो वो झल्ला गईं और बोली कि आप बेवजह हठ कर रहे हैं। आपको ये हठ छोड़ देना चाहिए। देवानंद नहीं माने और उन्होंने लिखा है कि उसके बाद वो संजय गांधी के चमचों और दरबारियों के निशाने पर आ गए थे। देवानंद की फिल्म देस परदेश रिलीज होनेवाली थी और उनको डर सता रहा था कि संजय गांधी के दरबारी उनकी फिल्म को नुकसान न पहुंचा दें। डर जायज भी था क्योंकि इमरजेंसी के दौर में जो भी संजय गांधी के विरोध में गया था उसको काफी परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। फिल्मकारों को भी और कलाकारों को भी।   

Wednesday, July 7, 2021

दिलीप कुमार का अमेठी कनेक्शन


दिलीप कुमार फिल्मों के बेहतरीन अभिनेता थे। फिल्मों के अलावा नेता का उनका रूप अल्पज्ञात है। दिलीप कुमार का उत्तर प्रदेश के अमेठी की राजनीति से नाता रहा है। इमरजेंसी के बाद 1977 में आम चुनाव की घोषणा हुई थी। संजय गांधी अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। दिलीप कुमार ने अमेठी में चुनाव प्रचार की इच्छा जताई थी। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र में इस बात का जमकर प्रचार किया कि फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार चुनाव प्रचार के लिए सात मार्च को अमेठी पहुंच रहे हैं। उन जगहों पर सुबह से लोगों की भीड़ जमा हो गई थी । लोग दिलीप कुमार को देखना चाहते थे। लेकिन अमेठी की जनता इंतजार करती रह गई क्योंकि दिलीप कुमार नहीं आए। कांग्रेस के किसी ने तारीख को लेकर घपला कर दिया था। 

दिलीप कुमार का दौरा आठ मार्च का था। वो आठ मार्च को फुर्सतगंज हवाई अड्डे पहुंचे लेकिन वहां उनको रिसीव करने के लिए कोई नहीं था। उन दिनों अमेठी में यातायात की सुगम व्यवस्था नहीं थी। एक पीपल के पेड़ के नीचे दिलीप कुमार दो घंटे अकेले खड़े इंतजार करते रहे। दो घंटे बाद एक बस आई और उससे दिलीप कुमार अमेठी पहुंचे। जहां वो एक चाय दुकान पर उतरे और किसी से कांग्रेस के दफ्तर में खबर भिजवाई गई। थोड़ी देर बाद एक जीप दिलीप कुमार को लेने आई और फिर आनन फानन में उनकी सभा तय की गई। चूंकि उनके नाम का प्रचार नहीं किया जा सका था इसलिए बमुश्किल कुछ ही लोग दिलीप कुमार की सभा में आ पाए। चुनावी सभा असफल हो गई। दिलीप कुमार मायूस होकर लौट गए। अपनी पुस्तक द संजय स्टोरी में विनोद मेहता ने इस प्रसंग का उल्लेख चुनाव के दौरान कांग्रेस की बदइंतजामी और खराब प्लानिंग के सिलसिले में की है। इस घटना के 23 साल बाद कांग्रेस ने उनको राज्यसभा में भेजा ।      

Friday, May 7, 2021

कठोर प्रशासक, संवेदनशील लेखक


करीब दो साल पहले की बात है। सर्दी के दिन थे। किसी मित्र ने दोपहर के भोजन के लिए इंडिया इंरनेशनल सेंटर(आईआईसी) आमंत्रित किया था। डायनिंग हॉल में जगह नहीं थी, तो हमलोग लॉन में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अचानक सफेद पैंट शर्ट पहने एक बुजुर्ग पास से निकले, मैंने अपने दोस्त से कहा कि ये तो जम्मू कश्मीर के पूर्व गवर्नर जगमोहन लग रहे हैं। उसने पुष्टि की। जगमोहन जी लॉन में टहल रहे थे। थोड़ी देर टहलने के बाद वो धूप में बैठ गए। मैंने थोड़ा साहस जुटाया और उनको परिचय देकर पास रखे खाली कुर्सी पर बैठ गया। उनसे कश्मीर पर बात शुरू की। उनकी एक बात मुझे अब भी याद है। उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर समाप्त कर दो, समस्या बहुत हद तक खत्म हो जाएगी। थोड़ी देर की बातचीत के बाद वो ये कहते हुए उठ खड़े हुए कि लाइब्रेरी जाने का समय हो गया है। आईआईसी की लाइब्रेरी जाने के लिए बढ़े, फिर थोड़ा रुके और बोले कि अगर समय मिले तो मेरी किताब ‘माई फ्रोजन टरबुलेंस इन कश्मीर’ पढ़ना। तीन मई को तिरानवे साल की उम्र में जगमोहन जी के निधन की खबर सुनते ही ये मुलाकात याद आ गई।   

जगमोहन का जन्म अविभाजित भारत के हफीजाबाद में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया। पंजाब से होते हुए जगमोहन दिल्ली पहुंचे थे।  पूरे देश ने उनका नाम इमरजेंसी में तब जाना जब वो दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष थे। उनके उपाध्यक्ष रहते हुए तुर्कमान गेट इलाके की अवैध इमारतों पर बुलडोजर चला था। काफी विरोध हुआ, प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं लेकिन जगमोहन ने काम नहीं रुकने दिया था। उस वक्त इस बात की चर्चा थी कि संजय गांधी चाहते थे कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ-साफ दिखे और उसके बीच कोई बाधा न हो। जगमोहन ने संजय गांधी की इस ख्वाहिश को पूरा किया था। तुर्कमान गेट पर जब इमारतों को ढहाने का काम रोका नहीं गया तो कुछ लोग जगमोहन के पास पहुंचे थे। इलाके के लोगों ने अपने पुनर्वास की बात की और जगमोहन से अनुरोध किया कि उन सबको एक ही जगह रहने की व्यवस्था की जाए। तब जगमोहन ने उनसे दो टूक कहा था कि वो यहां एक दूसरा पाकिस्तान नहीं बसाना चाहते हैं। उमा वासुदेव की उन्नीस सौ सतहत्तर में प्रकाशित पुस्तक ‘टू फेसेस ऑफ इंदिरा गांधी’ में इस प्रसंग का उल्लेख है। 

आज हम दिल्ली के ज्यादातर इलाकों को झुग्गियों से मुक्त देखते हैं तो इसके लिए जगमोहन की दूरदर्शी नीति और उनके कठोर निर्णय के अलावा अपने फैसलों के क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति जिम्मेदार है। उन्नीस सौ बयासी में दिल्ली में  एशियाई खेल का आयोजन हो या फिर उसके अगले साल निर्गुट देशों के राष्ट्राध्यक्षों का सम्मेलन, जगमोहन ने अपनी प्रशासनिक क्षमता की छाप छोड़ी। जगमोहन जब राजनीति में उतरे तो नई दिल्ली लोकसभा सीट से सुपरस्टार राजेश खन्ना को मात दी। इस सीट से तीन बार सांसद रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शहरी विकास मंत्री रहे। उनके निधन ने दिल्ली के बौद्धिक और प्रशासनिक जगत को थोड़ा विपन्न कर दिया है।   


Thursday, March 20, 2014

सूना हुआ जीवंत कोना

जिंदगी की पिच पर खुशवंत सिंह शतक से चूक गए और निन्यानवे साल की उम्र में उनका निधन हो गया । कहते हैं कि हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता लेकिन खुशवंत सिंह ने ना केवल मुकम्मल जिंदगी जी बल्कि उन्हें मुकम्मल जहां भी मिला । विदेश सेवा में अफसर से लेकर संपादक, इतिहासकार और राजनेता तक का जीवन जिया और हर जगह अपनी अमिट छाप छोड़ी । खुशवंत सिंह को विवादों में बड़ा मजा आता था और उनके करीबी बताते हैं कि वो जानबूझकर विवादों को हवा देते थे । उनके करीबी लेखकों का तो यहां तक कहना है कि विवादों से उन्हें लेखकीय उर्जा मिलती थी और यही ऊर्जा उनसे जीवन पर्यंन्त स्तंभ लिखवाती रही । उनका स्तंभ- विद मलाइस टुवर्ड्स वन एंड ऑल लगभग पचास साल तक चला और माना जाता है कि भारत में सबसे लंबे समय तक चलनेवाला और सबसे लोकप्रिय स्तंभ था । इस स्तंभ में मारियो मिरांडा का बनाया एक कार्टून भी छपता था जिसमें बल्ब के अंदर वो बैठे थे । मारियो उनके साथ एक पत्रिका में काम करते थे । अबतक खुशवंत सिंह की लगभग अस्सी किताबें छप चुकी हैं। पिछले साल भी उनकी एक किताब आई थी । उस किताब पर पंजाब के एक विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें खुशवंत सिंह के बेटे राहुल सिंह ने उनका एक वक्तव्य पढा था । अपने संदेश में खुशवंत सिंह ने कहा था- लगता है कि वक्त आ गया है मुझे अब मर जाना चाहिए और मरने के बाद मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचान चाहता हूं जिसने ताउम्र लोगों को हंसाया । खुशवंत सिंह ने अपने पाठकों को हंसाया जरूर लेकिन अपनी टिप्पणियों और लेखों से लोगों को सोचने पर मजबूर भी किया था । उनकी किताब ट्रेन टू पाकिस्तान और दो खंडों में सिखों का इतिहास काफी चर्चित रहा था । उनकी आत्मकथा का हिंदी अनुवाद – सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत जब छपा तो अपने प्रसंगों की वजह से काफी चर्चित हुआ था ।
खुशवंत सिंह इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और उन्होंने इमरजेंसी के दौरान उनका समर्थन भी किया था लेकिन बाद में जब इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को मंजूरी दी तो वो उनके खिलाफ हो गए और पद्म सम्मान वापस कर दिया । यहां यह बात गौर करने लायक है कि खुशवंत सिंह ने चरमपंथी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनकी नीतियों का जमकर विरोध किया था । खुशवंत सिंह पाकिस्तान के हदाली में उन्नीस सौ पंद्रह में पैदा हुए थे और बंटवारे के बाद भारत आ गए थे । खुशवंत सिंह के पिता सरदार सोभा सिंह को लुटियन दिल्ली बनाने का ठेका मिला था । दिल्ली के ही सुजान सिंह पार्क में खुशवंत सिंह ने अंतिम सांसे ली । खुशवंत सिंह के जाने के बाद साहित्य और पत्रकारिता का एक जीवंत कोना सूना हो गया है ।   
 

Friday, February 1, 2013

संजय गांधी की कहानी


आजाद भारत के इतिहास में संजय गांधी इकलौते ऐसे राजनेता हैं जिनके व्यक्तित्व और क्रियाकलापों के बारे में जानने की जिज्ञासा भारतीय जनमानस में अब भी है, लेकिन उनके बारे में ज्यादा लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है, लिहाजा उनके बारे में सबसे ज्यादा किवदंतियां सुनी जाती रही हैं । संजय गांधी खुद कहा करते थे कि उनकी रैलियों के दौरान किसी को भी पैसे देकर रैली में नहीं लाया जाता है बल्कि ये लोगों की मेरे बारे में जानने और मुझको देखने की जिज्ञासा से मेरी रैली में खिंचे चले आते हैं । इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के तानाशाही रवैये को लेकर काफी कुछ लिखा गया है, उनके दोस्तों और युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ज्यादतियों के बारे में भी सैकडो़ं लेख लिखे गए , किताबें भी आईं । इस बात की भी काफी चर्चा हुई कि संजय गांधी की महात्वाकांक्षा इंदिरा गांधी को लगातार कमजोर करती रही । संजय गांधी को भारत में कई लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म करने या कमजोर करने का भी जिम्मेदार माना जाता है । इमरजेंसी, उस दौरान सरकारी कामकाज, इंदिरा गांधी के दांव पेंच आदि के बारे में राजनीतिक टिप्पणीकार इतने उलझ गए कि संजय गांधी की जीवनी या उनपर कोई मुक्कमल किताब लिखने के बारे में सोचा ही नहीं गया । अगर सोचा गया होता तो संजय गांधी पर लिखने के लिए बेहद श्रम करना होता क्योंकि उनके व्यक्तित्व कई पहलू हैं और विश्लेषण के अनेक विंदु । संजय गांधी को भगवान ने बहुत छोटी सी उम्र दी लेकिन उस छोटी उम्र में ही संजय ने देश को हिलाकर रख दिया था ।
मेरे जानते अबतक संजय गांधी की एकमात्र जीवनी लिखी गई है जिसका नाम है – द संजय स्टोरी और उसके लेखक हैं – वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता । यह जीवनी भी ना तो प्रामाणिक होने का दावा करती है और ना ही आधिकारिक । भारत जब इमरजेंसी की बेड़ियों से मुक्त होने का जश्न मना रहा था और कई पत्रकार, लेखक इमरजेंसी की ज्यादतियों पर अपनी लेखनी चला रहे थे उसी वक्त विनोद मेहता ने इमरजेंसी के कथित खलनायक संजय गांधी की जीवनी छपवाने का साहसपूर्ण निर्णय लिया था । जयको पब्लिशिंग से 1978 में विनोद मेहता की किताब छपी थी उस वक्त इसकी कीमत पैंतीस रुपए थी । अब चौंतीस साल बाद विनोद मेहता की नई भूमिका के साथ इस किताब का पुनर्प्रकाशन हुआ है । विनोद मेहता ने इस किताब की नई भूमिका में लिखा है – मैंने कोशिश की है कि उस व्यक्ति के जीवन के बारे में पाठकों को बताऊं जो एक दिन राजा बननेवाला था । वह व्यक्ति जिसने लगभग राजगद्दी पर कब्जा कर लिया था, अगर उसने हवाई जहाज उडा़ने के वक्त कोल्हापुरी चप्पल नहीं पहनी होती । दरअसल जब विनोद मेहता कोल्हापुरी चप्पल की बात कर रहे हैं तो वो उस हादसे की ओर इशारा कर रहे हैं जो दिल्ली के आसमान में 23 जून 1980 की सुबह घटा। उस विमान हादसे की बात कर रहे हैं जिसमें संजय गांधी की मौत हो गई थी । विनोद मेहता ने इस पूरी किताब में संजय गांधी के व्यक्तित्व का जो खाका खींचा है उसके मुताबिक संजय गांधी अपने निर्णयों पर अडिग रहने वाले शख्सियत थे । वो अगर किसी चीज को करने की ठान लेते थे तो फिर किसी की भी नहीं सुनते थे चाहे वो उनकी मां इंदिरा गांधी ही क्यों ना हों । यही जिद संभवत संजय गांधी की मौत की वजह भी बनी । माना जाता है कि राजीव गांधी, जो कि एक ट्रेंड पायलट थे, हमेशा संजय को विमान उड़ाने वक्त जूते पहनने की सलाह दिया करते थे और चप्पल पहन कर विमान उड़ाने से मना करते थे, लेकिन संजय ने कभी उनकी बात नहीं मानी ।

संजय गांधी की जीवनी में विनोद मेहता ने बेहद वस्तुनिष्ठता के साथ संजय गांधी के बहाने उस दौर को भी परिभाषित किया है । इमरजेंसी की ज्यादतियों के अलावा मारुति कार प्रोजेकट के घपलों पर तो विस्तार से लिखा है लेकिन साथ ही इमरजेंसी हटने पर सरकारी कामकाज में ढिलाई पर भी अपने चुटीले अंदाज में वार किया है । वो लिखते हैं- जिस दिन 21 मार्च को इमरजेंसी हटाई गई उस दिन राजधानी एक्सप्रेस चार घंटे की देरी से पहुंची । कानपुर में एल आई सी के कर्मचारियों ने लंच टाइम में मोर्चा निकाला, दिल्ली के प्रेस क्लब में मुक्केबाजी हुई, कलकत्ता में दो फैमिली प्लानिंग वैन जलाई गई, बांबे के शाम के अखबारों में डांस क्लासेस के विज्ञापन छपे, तस्करी कर लाई जानेवाली व्हिस्की की कीमत दस रुपए कम हो गई । देश में हालात सामान्य हो गए । व्यगंयात्मक शैली में ये कहते हुए विनोद इमरजेंसी के दौर में इन हालातों के ठीक होने की तस्दीक करते हैं ।
संजय की स्टोरी की शुरुआत विनोद मेहता आनंद भवन से करते हैं और कहते हैं कि माना जाता है कि आनंद भवन उसी जगह पर स्थित है जहां राम के 14 वर्षों के बनवास से लौटने के बाद भरत मिलाप हुआ था । आनंद भवन की कहानी में मोती लाल नेहरू के अलावा जवाहर लाल नेहरू और कमला नेहरू के दांपत्य जीवन के बारे में कई दिलचस्प प्रसंग हैं । किस तरह से नेहरू शादी के बाद हनीमून के लिए कश्मीर गए तो कमला को दो हफ्ते के लिए होटल में छोड़ कर अपने एक रिश्तेदार के साथ ट्रेकिंग पर चले गए । इंदिरा और फिरोज के प्रेम संबंधों के बारे में विनोद मेहता ने जो लिखा है वो वरिष्ठ पत्रकार प्रणय गुप्ते की किताब - मदर इंडिया अ पॉलिटकल बायोग्राफी ऑफ इंदिरा गांधी से कई जगहों पर अलग नजर आता है । तथ्यों में भी कई असमानताएं हैं लेकिन हम फिलहाल संजय गांधी की जीवनी पर बात कर रहे हैं ।
इस किताब में संजय गांधी के स्कूल के दिनों और बाद में स्कूल छोड़कर वापस दिल्ली आने और यहां अपने दोस्तों का साथ उधम मचाने का विनोद मेहता ने बेहद ही दिलचस्प वर्णन किया है । दिल्ली के शिव निकेतन स्कूल से वेलहम्स होते हुए संजय गांधी दून स्कूल पहुंचते हैं । संजय गांधी का दिल पढ़ाई में कहीं नहीं लगा । एक बार जब छुट्टियों में संजय गांधी प्रधानमंत्री निवास तीन मूर्ति भवन लौटे तो उन्होंने कहा था- आई हेट स्कूल, आई डोंट वांट टू गो बैक । विनोद मेहता की किताबों में कई तथ्य पुराने हैं- जैसे दून स्कूल में ही संजय को कमलनाथ जैसा दोस्त मिला जो लगातार दो साल तक फेल हो चुका था । स्कूल से वापस आने के बाद संजय गांधी की दोस्तों के साथ मस्ती काफी बढ़ गई थी और विनोद मेहता ने बिल्कुल फिक्शन के अंदाज में उसको लिखा है जिसकी वजह से रोचकता अपने चरम पर पहुंच जाती है । संजय गांधी की इस किताब में जो सबसे दिलचस्प अध्याय है वो है मारुति कार के बारे में देखे गए संजय के सपने के बारे में । मारुति- सन ऑफ द विंड गॉड में विनोद मेहता ने संजय गांधी की किसी भी कीमत पर अपनी मन की करने, किसी भी कीमत पर अपनी चाहत को हासिल करने की, उस हासिल करने के बीच में रोड़े अटकाने वाले को हाशिए पर पहुंचा देने की मनोवृत्ति का साफ तौर पर चित्रण किया है । संजय गांधी की बचपन से मशीनों और उपकरणों में खास रुचि थी जिसे देखकर नेहरू जी कहा करते थे कि उनका नाती एक बेहतरीन इंजीनियर बनेगा । संजय गांधी इंजीनियर तो नहीं बन पाए लेकिन रॉल्स रॉयस में मैकेनिक का काम सीखने जरूर गए जिसे आधे में ही छोड़ आए थे । वापस दिल्ली लौटने पर एक गैरेज मालिक अर्जुन दास मिले जिसमें संजय को अपने कार बनाने के सपने का साथी दिखाई दिया । अर्जुन दास के साथ एक गैरेज खोला लेकिन उनका सपना तो कार बनाना था । संजय के सपने को पूरा करने के लिए उस वक्त की सरकार ने अपनी नीतियों में आमूल चूल बदलाव कर दिया । उनके कार बनाने के प्रस्ताव का औपचारिक ऐलान उस वक्त के उद्योग मंत्री ने 13 नवंबर 1968 को संसद में किया था । बताया गया था कि संजय ने जो प्रस्ताव दिया है उसके मुताबिक उनकी कंपनी मात्र 6 हजार रुपए में ऐसी कार बनाएगी जो 53 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी । इस एलान के बाद संसद में जमकर हंगामा हुआ था जार्ज फर्नांडिस से लेकर मधु लिमेय, राज नारायण, ज्योतिर्मय बोस और श्यामनंदन मिश्रा ने इंदिरा गांधी को घेरा था । अटल बिहारी वाजपेयी ने तो इसे करप्शन अनलिमिडेट की संज्ञा दी थी । लेकिन संजय गांधी ने किसी की परवाह नहीं की और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया । हरियाणा के मुथ्यमंत्री बंसीलाल ने डंडे के जोर पर गुड़गांव के पास मारुति को सैकड़ों एकड़ जमीन मुहैया करवाकर संजय के दरबार में अपनी स्थिति पक्की कर ली थी । इस अध्याय में विनोद मेहता ने विस्तार से मारुति कंपनी के माध्यम से शेयर होल्डिंग पैटर्न के जरिए लाभ लेने की स्थितियों का खुलासा भी किया है जो नई पीढ़ी के लिए चौंकानेवाली नहीं हे क्योंकि अब के समय में ऐसा होना आम है ।
जाहिर सी बात है कि जब संजय गांधी की जीवनी लिखी जाएगी तो तुर्कमान गेट, नसबंदी कार्यक्रम और युवा कांग्रेस के बारे में बात तो होगी ही । विनोद मेहता ने अपनी इस किताब में तुर्कमान गेट से झोपड़पट्टी हटाने के वक्त की घटनाओं का सूक्षम्ता से विवरण दिया है, विवेचन भी किया है । नसबंदी पर तो एक पूरा अध्याय इंद्रिय बचाओ ही है । नसबंदी को विनोद मेहता परोक्ष रूप से देश के लिए जरूरी मानते हैं लेकिन जोर जबरदस्ती की वकालत वो नहीं करते हैं । संजय गांधी के दौर में जब भी युवा कांग्रेस की चर्चा होगी तो गुवाहाटी सम्मेलन और अंबिका सोनी का नाम भी आएगा । गुवाहाटी सम्मेलन के दौरान ही संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम को देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से मंजूरी ही नहीं दी बल्कि समर्थन भी किया । राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गुवाहाटी में ही इंदिरा गांधी ने संजय गांधी में अपना वारिस ढूंढ लिया था और नवंबर 76 तक तो वो यह मानने लगी थी कि देश का भविष्य संजय के हाथों में सुरक्षित है । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । अपनी इस किताब में विनोद मेहता ने उस दौर की पत्र पत्रिकाओं और उसके संपादकों की भूमिका को भी परखा है  विनोद मेहता के मुताबिक इमरजेंसी की हार के बाद भी इंदिरा गांधी अपने बेटे संजय को लेकर बेहद पजेसिव थी और उसकी पसंदगी का ख्याल रखती थी ।
विनोद मेहता का दावा है कि उनकी संजय गांधी से कभी मुलाकात नहीं हुई । उन्होंने जीवनी लिखने के वक्त संजय और मेनका से मिलने की कई कोशिशें की लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके । संजय की शर्तें उन्हें मंजूर नहीं थी । विनोद मेहता अगर इस जीवनी को लिखने के क्रम में संजय गांधी से मिल लेते और उनकी राय और बातें इस किताब में होती तो ये आधिकारिक होती, प्रामाणिक भी । विनोद मेहता की एक खूबी यह है कि वो अपनी बातें अफवाहों के सहारे बखूबी कहते रहे हैं । इंदिरा गांधी और संजय के संबंधों के बारे में उन्होंने इस जीवनी में चार थ्योरी दी है और फिर उनमें से तीन को काटकर अपनी बात कही है । ठीक उसी तरह जिस तरह अपनी आत्मकथा- लखनऊ ब्यॉय में मैच फिक्सिंग के प्रसंग में कपिलदेव के भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से मिलने और अपने हिंदू होने की दुहाई देने का प्रसंग है । लेखन के इस स्टाइल का फायदा यह होता है कि सारी बातें भी आ जाती हैं और उसको काटकर लेखक अपनी विश्वसनीयता भी बचा कर ले जाता है । इस किताब का एक फायदा यह है कि नई पीढ़ी को भारत के एक ऐसे नेता के बारे में जानने को मिलेगा जिनको राजनीतिक विश्लेषक इतिहास के फुटनोट की तरह देखते हैं ।