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Saturday, October 18, 2025

पीआर से चक्रव्यूह में हिंदी फिल्म


कुछ दिनों पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा के साथ अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की एक तस्वीर सार्वजनिक हुई। अवसर था दीपिका पादुकोण को केंद्र सरकार के मेंटल हेल्थ एंबेसडर नियुक्त करने का। इस तस्वीर को देखते हुए दीपिका की ही एक और तस्वीर याद आई। वो तस्वीर आज से करीब पांच वर्ष पूर्व की थी। उसमें दीपिका पादुकोण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के मध्य उनको समर्थन देने पहुंची थी। वो आंदोलन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्लाय में लेफ्ट समर्थित छात्र संगठनों का था। आंदोलनकारी मोदी सरकार के विरोध में थे। इस तस्वीर की याद आते ही मन में प्रश्न उठा कि सिर्फ पांच वर्षों में ये बदलाव कैसे। जो दीपिका पादुकोण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन करने पहुंची थी उसको भारत सरकार ने मेंटल हेल्थ का अंबेसडर क्यों बना दिया। फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अपने साथियों से बात कर ये जानने का प्रयास किया कि क्या दीपिका पादुकोण के विचार बदल गए हैं, क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने एक साक्षात्कार में राहुल गांधी की भी प्रशंसा की थी। क्या केंद्र सरकार अधिक समावेशी हो गई है। हिंदी फिल्मों से जुड़े लोगों से बात करने पर पता चला कि ये सब पब्लिक रिलेशन यानि पीआर का खेल है। 

आज हिंदी फिल्मों के छोटे-बड़े सितारे सभी पीआर कंपनियों के भरोसे चल रहे हैं। उन्हें कहां जाना है, कितना बोलना है से लेकर सार्वजनिक जगहों पर कैसे कपड़े पहनने हैं आदि सभी कुछ पीआर कंपनियां या उनके नुमांइदें ही तय करते हैं। यह अनायास नहीं है कि सभी अभिनेता-अभिनेत्रियों के एयरपोर्ट के वीडियो इंटरनेट मीडिया पर आ जाते हैं। बताया गया कि कोई भी अभिनेता या अभिनेत्री कहीं आते जाते हैं तो उसकी पूर्व सूचना पैपराजियों को या इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय पीआर हैंडल्स को दे दी जाती है। सितारों के गाड़ी से उतरने से लेकर एयरपोर्ट के अंदर जाने तक का वीडियो चंद मिनटों में वायरल करवाने का प्रयास किया जाता है। इसके पीछे एक पूरा तंत्र काम करता है। इसकी एक आर्थिकी भी है। अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि सितारों को कितना बोलना है ये भी पीआर कंपनी के लोग ही बताते हैं। आज से कुछ वर्षों पहले अभिनेता-अभिनेत्री अपनी मन की बात मीडिया से साझा करते थे। इससे उनकी एक छवि बनती थी। अब तो सबकुछ पहले से तय होने लगा है। किसी सितारे के इंटरव्यू को लेकर जिस तरह की खबरें आती हैं वो भी चिंताजनक हैं। भगवान जाने इसमें कितनी सचाई है लेकिन बताया जाता है कि पीआर कंपनी वाले मीडिया के लोगों को पहले से बताते हैं कि क्या प्रश्न करना है और कितने प्रश्न पूछने हैं। जब इंटरव्यू हो रहा होता है तो पीआर कंपनी वाले वहां मौजूद रहते हैं। अगर साक्षात्कारकर्ता तय प्रश्नों से अलग जाने का प्रयास करता है तो पीआर वाले रोकने की कोशिश करते हैं। ऐश्वर्य़ राय की एक फिल्म आई थी ऐ दिल है मुश्किल। उस समय इस तरह की चर्चा हुई थी कि जब साक्षात्कारकर्ताओं ने ऐश्वर्य से उनके और रणबीर की आनस्क्रीन केमेस्ट्री के बारे में प्रश्न किया था तो पीआरवालों ने रोक दिया था। कुछ लोग तो बिना इंटरव्यू किए निकल भी गए थे। पहले अभिनेता-अभिनेत्री अपने दिमाग से प्रश्नों के उत्तर देते हैं अब वो बताई गई बातें ही बोलते हैं। याद करिए शाह रुख खान के कितने स्मार्ट इंटरव्यूज हुआ करते थे। अब वो बहुत नाप-तौल कर बोलते हैं। सिर्फ शाह रुख ही क्यों रणवीर सिंह के पुराने साक्षात्कार देखिए और अभी के देखिए। आपको जमीन आसमान का अंतर नजर आएगा।

सितारों के छवि निर्माण की कला होती है। उसका प्रबंधन भी किया जाता रहा है लेकिन हिंदी फिल्मों के सितारों को जिस तरह से पीआर कंपनियों ने घेर लिया है उससे उनकी मौलिकता बाधित हो रही है। सितारों की सार्वजनिक छवि बनाने के काम में अधिकतर 25 से 30 वर्ष के युवक युवतियां लगे हुए हैं। विशेषकर अगर बड़े सितारों के इर्द-गिर्द नजर डालेंगे तो ये सब आपको स्पष्ट दिखाई देगा। अब चालीस पचास वर्ष के अभिनेताओं को ये लड़के-लड़ियां बताती हैं कि क्या बोलना है। इनमें से ज्यादातर लोग वैसे हैं जिनकी दुनिया ही इंटरनेट मीडिया है। वो रील्स, लाइक और रीपोस्ट के आधार पर सबकुछ तय करते हैं। कुछ दिनों पूर्व हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार्स के ताम-झाम पर आने वाले खर्चे को लेकर निर्माता-निर्देशक करण जौहर ने सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि अभिनेता-अभिनेत्रियों के साथ चलनेवाले लोगों और शूटिंग के दौरान उनकी सुविधाओं पर निर्माताओं को बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। इससे फिल्म की लागत कई गुणा बढ़ जाती है। कई निर्माताओं ने करण की इस बात का समर्थन किया। अब जरा देख लेते हैं कि ताम-झाम क्या होता है। सुपरस्टार्स के साथ गाड़ियों का काफिला होगा। वैनिटी वैन होगी। स्टार की गाड़ी अलग होगी, उनके साथ आवश्यक व्यक्तियों के साथ पीआर की लंबी चौड़ी टीम होगी। वो जहां भी जाएंगें या जाएंगी पीआर के लोग उनके साथ इस कारण रहते हैं कि उनको आवश्कता से अधिक सुविधाएं, बहुधा निरर्थक, की मांग रखी जा सके। 

ओमएमजी- 2 के निर्देशक अमित राय ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था कि चाय से अधिक गरम केतली होती है। तात्पर्य ये था कि हीरो या हिरोइन से अधिक उनकी पीआर टीम उनको लेकर, उनके एपियरेंस को लेकर, अगर वो कहीं बाहर हैं तो वो किस होटल में रहेंगे, किस तरह का कमरा होगा, उनके सहयोगी कैसे कमरे में रहेंगे, कैसी गाड़ी होगी, कितने लोग होंगे सबकी सूची बनाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि एक दिन रविवार को अक्षय कुमार के साथ किसी रेलवे स्टेशन पर शूट करना था लेकिन उनकी टीम ने अमित को बताया कि सर (अक्षय) रविवार को शूट नहीं करते हैं। सारी तैयारी हो चुकी थी। रेलवे से अनुमति मिल गई थी। ऐसे में अमित राय ने सीधे अक्षय को फोन किया। वो शूटिंग के लिए तैयार हो गए। मतलब चाय का तापमान ठीक था लेकिन केतली गर्म थी। इसी तरह वाराणसी में जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान बातचीत में अभिनेता सिद्धांत चतुर्वेदी ने भी हिंदी फिल्मों की दुनिया में पीआर कल्चर पर टिप्पणी की थी। जब बड़े सितारे ऐसा करते हैं तो अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय सितारे भी ये समझने लगे हैं कि इसी तरह से स्टारडम हासिल किया जा सकता है। आपकी स्टार वैल्यू तभी बढ़ेगी जब विलासितापूर्ण जीवन जीते दिखेंगे। आज अगर दर्शक फिल्मों से दूर हो रहे हैं तो उसके अन्यान्य कारणों में से एक कारण पीआर कल्चर भी है। ये संस्कृति परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से छवि निर्माण के नाम पर सितारों को उनके प्रशंसकों से दूर कर रहे हैं। उनके सोच को जनता तक नहीं आने दे रहे हैं। फिल्म दर्शकों से मीडिया के माध्यम से उनका जो एक संवाद बनता था वो सही तरीके बन नहीं पा रहा है। रील्स या इंस्टा पर विलासिता का भोंडा प्रदर्शन दर्शकों को पसंद नहीं आता है। अभिनेता के काम से दर्शक उनको पसंद करते हैं पीआर के चक्रव्यूह से नहीं। हिंदी फिल्म जगत को इस बारे में सोचना होगा। 

Saturday, July 5, 2025

फिल्म प्रचार का औजार सेंसर बोर्ड !


तीन वर्ष बाद आमिर खान की फिल्म सितारे जमीं पर रिलीज होनेवाली थी। लंबे अंतराल के बाद आमिर खान की फिल्म रूपहले पर्दे पर आ रही थी। इसको लेकर दर्शकों में जिस तरह का उत्साह होना चाहिए था वो दिख नहीं रहा था। तीन वर्ष पहले आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा आई थी जो बुरी तरह फ्लाप रही थी। दर्शकों ने उसको नकार दिया था। जब सितारे जमीं पर का ट्रेलर लांच हुआ था तो इस फिल्म की थोड़ी चर्चा हुई थी। लेकिन जब इसके गाने रिलीज हुए तो वो दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाए। फिल्म मार्केटिंग की भाषा में कहें तो इस फिल्म को लेकर बज नहीं क्रिएट हो सका। यहां तक तो बहुत सामान्य बात थी। उसके बाद इस तरह के समाचार प्रकाशित होने लगे कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसको बोलचाल में सेंसर बोर्ड कहा जाता है, ने फिल्म में कट लगाने को कहा है, जिसके लिए आमिर तैयार नहीं हैं। विभिन्न माध्यमों में इस पर चर्चा होने लगी कि सेंसर बोर्ड आमिर खान की फिल्म को रोक रहा है। फिर ये बात सामने आई कि आमिर और फिल्म के निर्देशक सेंसर बोर्ड की समिति से मिलकर अपनी बात कहेंगे। इस तरह का समाचार भी सामने आया कि चूंकि सेंसर बोर्ड फिल्म को अटका रहा है इस कारण फिल्म की एडवांस बुकिंग आरंभ नहीं हो पा रही है। बताया जाता है कि ऐसा नियम है कि जबतक फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिल जाता है तब तक एडवांस बुकिंग आरंभ नहीं हो सकती है। ये सब जून के दूसरे सप्ताह में घटित हो रहा था। फिल्म के प्रदर्शन की तिथि 20 जून थी। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन इसके बाद इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी समाचार में आया। कहा गया कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म निर्माताओं को आरंभ में प्रधानमंत्री की विकसित भारत को लेकर कही एक बात उद्धृत करने का आदेश दिया है। आमिर खान की फिल्म, सेंसर बोर्ड की तरफ से कट्स लगाने का आदेश और फिर प्रघानमंत्री मोदी का नाम। फिल्म को प्रचार मिलने लगा। वेबसाइट्स के अलावा समाचारपत्रों में भी इसको जगह मिल गई। जिस फिल्म को लेकर दर्शक लगभग उदासीन से थे उसको लेकर अचानक एक वातावरण बना। 

फिल्म को 17 जून को फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण पत्र मिल गया। फिल्म समय पर रिलीज भी हो गई। आमिर खान तमाम छोटे बड़े मीडिया संस्थानों में घंटों इस फिल्म के प्रचार के लिए बैठे, इंटरव्यू दिया। परिणाम क्या रहा वो सबको पता है। फिल्म सफल नहीं हो पाई। यह फिल्म 2018 में स्पेनिश भाषा में रिलीज फिल्म चैंपियंस का रीमेक है। आमिर और जेनेलिया इसमें लीड रोल में हैं। इसके अलावा कुछ स्पेशल बच्चों ने भी अभिनय किया है। फिल्म के रिलीज होते ही या यों कहें कि सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट मिलते ही इसको लेकर हो रही चर्चा बंद हो गई। ये सिर्फ आमिर खान की फिल्म के साथ ही नहीं हुआ। इसके पहले अनंत महादेवन की फिल्म फुले आई थी जो ज्योतिराव फुले और सावित्री फुले की जिंदगी पर आधारित थी। इस फिल्म और सेंसर बोर्ड को लेकर भी तमाम तरह की खबरें आईं। इंटरनेट मीडिया पर सेंसर बोर्ड के विरोध में काफी कुछ लिखा गया। एक विशेष इकोसिस्टम के लोगों ने इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जोड़कर भी देखा। समुदाय विशेष की अस्मिता से जोड़कर भी देखा गया। वर्तमान सरकार को भी इस विवाद में खींचने की कोशिश की गई। फिल्म के प्रदर्शन के बाद सब ठंडा पर गया। ऐसा क्यों होता है। इसको समझने की आवश्यकता है। दरअसल कुछ निर्माता अब सेंसर बोर्ड को अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं। जिन फिल्मों को लेकर उसके मार्केटिंग गुरु दर्शकों के बीच उत्सुकता नहीं जगा पाते हैं वो इसको चर्चित करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाने लगे हैं। कुछ वर्षों पूर्व जब दीपिका पादुकोण की फिल्म छपाक रिलीज होनेवाली थी तो उस फिल्म का पीआर करनेवालों ने दीपिका को सलाह दी थी कि वो दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन करें। दीपिका वहां पहुंची भी थीं। पर फिल्म फिर भी नहीं चल पाई थी। 

फिल्मकारों को मालूम होता है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड किन परिस्थितियों में कट्स लगाने या दृश्यों को बदलने का आदेश देता है। दरअसल होता ये है कि जब फिल्मकार या फिल्म कंपनी सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करती है तो आवेदन के साथ फिल्म की अवधि, उसकी स्क्रिप्ट, फिल्म का नाम और उसकी भाषा का उल्लेख करना होता है। अगर आवेदन के समय फिल्म की अवधि तीन घंटे बताई गई है और जब फिल्म देखी जा रही है और वो तीन घंटे तीन मिनट की निकलती है तो बोर्ड ये कह सकता है कि फिल्म को तय सीमा में खत्म करें। फिर संबंधित से एक अंडरटेकिंग ली जाती है कि उसकी फिल्म थोड़ी लंबी हो गई है और अब उसकी अवधि तीन घंटे तीन मिनट ही मानी जाए। इसके अलावा अगर एक्जामिनिंग कमेटी को किसी संवाद पर संशय होता है तो वो फिल्म के मूल स्क्रिप्ट से उसका मिलान करती है। अगर वहां विचलन पाया जाता है तो उसको भी ठीक करने को कहा जाता है। जो भी कट्स लगाने के लिए बोर्ड कहता है वो फिल्मकार की सहमति के बाद ही संभव हो पाता है। अन्यथा उसको रिवाइजिंग कमेटी के पास जाने का अधिकार होता है। कई बार फिल्म की श्रेणी को लेकर भी फिल्मकार और सेंसर बोर्ड के बीच मतैक्य नहीं होता है तो मामला लंबा खिंच जाता है। पर इन दिनों एक नई प्रवृत्ति सामने आई है कि सेंसर बोर्ड के क्रियाकलापों को फिल्म के प्रचार के लिए उपयोग किया जाने लगा है। इंटरनेट मीडिया के युग में ये आसान भी हो गया है। 

कुछ फिल्मकार ऐसे होते हैं जो सेंसर बोर्ड की सलाह को सकारात्मक तरीके से लेते हैं। रोहित शेट्टी की एक फिल्म आई थी सिंघम अगेन। इसमें रामकथा को आधुनिक तरीके से दिखाया गया था। फिल्म सेंसर में अटकी क्योंकि राम और हनुमान के बीच का संवाद बेहद अनौपचारिक और हल्की फुल्की भाषा में था। राम और हनुमान का संबंध भी दोस्ताना दिखाया गया था। भक्त और भगवान का भाव अनुपस्थित था। इस फिल्म में गृहमंत्री को भी नकारात्मक तरीके से दिखाया गया था। विशेषज्ञों की समिति ने फिल्म देखी। फिल्मकार रोहित शेट्टी और अभिनेता अजय देवगन के साथ संवाद किया, उनको वस्तुस्थिति से अवगत करवाया। दोनों ने इस बात को समझा और अपेक्षित बदलाव करके फिल्म समय पर रिलीज हो गई। प्रश्न यही है कि जो निर्माता निर्देशक अपनी फिल्म के प्रमोशन से अपेक्षित परिणाम नहीं पाते हैं वो सेंसर बोर्ड को प्रचार के औजार के तौर पर उपयोग करने की चेष्टा करते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि ऐसा करके वो एक संवैधानिक संस्था के क्रियाकलापों को लेकर जनता के मन में भ्रम उत्पन्न करते हैं। यह लोकतांत्रिक नहीं बल्कि एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है। अनैतिक तो है ही।      


Saturday, January 8, 2022

भाषा के बीच की खाई भरती फिल्में


कोरोना की तीसरी लहर के आरंभ होने के पहले एक बड़ी हिंदी फिल्म रिलीज हुई, जिसका नाम है 83। रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण जैसे बड़े सितारों और कबीर खान जैसे निर्देशक के होने के बावजूद यह फिल्म बुरी तरह असफल रही। इतनी बड़ी स्टार कास्ट के बावजूद फिल्म का लागत भी नहीं निकाल पाना कई सवाल खड़े करता है। फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को चार उसके अधिक स्टार दिए थे, लेकिन ये फिल्म नहीं चली। समीक्षा को फिल्म की सफलता से नहीं जोड़ा जा सकता है। मुझे याद है मैं बहुत छोटा था तब फिल्म शोले रिलीज हुई थी। उसकी प्रकाशित समीक्षा का शीर्षक अबतक याद है। शीर्षक था, शोले जो भड़क न सका। शोले ऐसा भड़का कि उसने सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। फिल्म 83 को समीक्षकों ने सर पर चढ़ाया लेकिन दर्शकों पर जादू नहीं चल सका। कुछ लोगों का तर्क है कि फिल्म 83, जो कि 1983 में भारत के क्रिकेट विश्व कप जीतने पर आधारित है, का क्लाइमैक्स दर्शकों को मालूम है इस वजह से फिल्म नहीं चली। इस तरह के तर्क देनेवालों के सामने रामलीलाओं के मंचन का उदाहरण है। रामलीला का क्लाइमैक्स सभी को पता है। बावजूद इसके रामलीला में भारी भीड़ उमड़ती है। इसलिए यह तर्क सही प्रतीत नहीं होता है कि क्लाइमैक्स पता होने की वजह से फिल्म नहीं चली। कुछ लोगों का तर्क है कि लोग क्रिकेट देखने सिनेमा हाल में नहीं जाते हैं और निर्देशक ने फिल्म में क्रिकेट बहुत अधिक दिखाई है। अलग अलग लोग अलग अलग तर्क। पर मुझे लगता है कि इसपर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या दिल्ली के जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी दीपिका की तस्वीर अब भी दर्शकों के मन पर अंकित है?  2020 के जनवरी में दीपिका की फिल्म छपाक आई थी तब वो अपने फिल्म के प्रमोशन को ध्यान में रखते हुए दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी हो गई थी। तब उनकी फिल्म छपाक पिट गई थी। अब एक बार फिर 83 में दीपिका की उपस्थिति और फिल्म का असफल होना, कहीं कोई संकेत तो नहीं है? अगर ये संकेत सही है तो फिल्मी दुनिया के कलाकारों को सावधान हो जाना चाहिए। उनको ये बात समझ में आ जानी चाहिए कि फिल्म और राजनीति दोनों अलग अलग हैं। दोनों का घालमेल नुकसान पहुंचा सकता है।  

इसी समय एक दूसरी फिल्म आई पुष्पा, जो मूलरूप से तेलुगू में बनी है। इस फिल्म को हिंदी में डब करके रिलीज की गई। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इसके नायक अल्लू अर्जुन हैं। फिल्म भले ही एक्शन ड्रामा है लेकिन पूरा परिवेश दक्षिण भारतीय है, फिर भी हिंदी के दर्शकों को भाया। इस फिल्म को दर्शकों ने 83 से अधिक पसंद किया। कमाई भी अधिक रही। वजह है फिल्म की कहानी और उसको कहने का अंदाज। पुष्पा फिल्म के निर्देशक सुकुमार ने फिल्म 83 के निर्देशक कबीर खान से बेहतर तरीके से अपनी कहानी को दर्शकों के सामने रखी। दर्शकों ने उसको पसंद किया। कबीर खान फिल्म 83 को भव्य और ग्लैमरस बनाने के चक्कर में कहानी को यथार्थ से दूर ले गए। नतीजा यह हुआ कि दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया। दंगल हो या फिर सुल्तान दोनों फिल्में भव्य भी थीं, ग्लैमर भी था लेकिन निर्देशक ने यथार्थ की डोर नहीं छोड़ी। दूसरी एक बात जो फिल्म 83 को अति साधारण फिल्म बना देती है वो यह कि इस फिल्म से दर्शकों की भावनाएं नहीं जुड़ पाई। 1983 की विश्व कप जीत के बाद पैदा और जवान हुई पीढ़ी खुद को इस फिल्म के साथ आईडेंटिफाई नहीं कर पाई। निर्देशक इसमें चूक गए। फिल्म चक दे इंडिया के निर्देशक शमित अमीन अपनी फिल्म को दर्शकों की संवेदना से जोड़ने में सफल रहे थे। फिल्म भी सुपरहिट रही थी। 

फिल्म 83 के फ्लॉप होने की को दर्शकों की बदलती पसंद से जोड़कर भी देखा जा सकता है। ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म के लोकप्रिय होने के बाद से फिल्मी सितारों से अधिक लोग कहानी को पसंद करने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी फिल्मों से स्टार और सुपरस्टार वाली व्यवस्था खत्म हो जाएगी । दरअसल ओटीटी ने दर्शकों की रुचि का विस्तार किया है। अब हिंदी भाषी दर्शक अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में अपेक्षाकृत अधिक देखने लगे हैं। ओटीटी के पहले ये विकल्प मौजूद नहीं था। पहले होता ये था कि तमिल भाषा की फिल्म सिर्फ तमिलनाडु या पडुचेरी में दिखाई जाती थी। अन्य प्रदेशों में उसको दिखाने के लिए उस प्रदेश की भाषा में डब करना पड़ता था। एक दौर में टीवी पर दक्षिण भारतीय भाषाओं की हिंदी में डब की गई फिल्में खूब दिखाई जाती थीं। ओटीटी के प्रचलन में आने के बाद से अब दर्शक मूल भाषा में फिल्में देखना पसंद करने लगे हैं। अभी पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी जिसमें ये बताया गया था कि मलयालम में बनी फिल्म को केरल के बाहर के दर्शकों ने अधिक देखा। अब मलयालम या मराठी फिल्मों को गैर मलयाली और गैर मराठी दर्शक भी देख रहे हैं। जिनको पहले क्षेत्रीय फिल्में कहा जाता था आज वो मुख्यधारा की फिल्में बन रही हैं। अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा हो या मलयाली फिल्म कुरुथी हो या फिर तमिल फिल्म सरपता परमबराई हो। इन सबकी सफलता ने ये साबित किया है कि क्षेत्रीय फिल्में अपनी भौगोलिक सीमा से बाहर निकलकर दूसरी भाषा के लोगों को भी पसंद आ रही हैं। अमेजन प्राइम वीडियो के एक अधिकारी का बयान प्रकाशित हुआ था कि तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्म के पाचस प्रतिशत दर्शक उनके अपने प्रदेशों के बाहर के होते हैं। भाषाई फिल्मों की व्याप्ति बढ़ने से जो सबसे महत्वपूर्ण घटित हो रहा है वो ये कि भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्यता कम हो रही है। हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषा के कुछ लोगों के मन में जो दुर्भाव था वो कम हो रहा है। जब इस तरह के लोग ये जानते पढ़ते हैं कि हिंदी भाषी लोग अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को उनसे अधिक संख्या में देख रहे हैं तो उनके मन से हिंदी प्रति दुर्भावना कम या खत्म हो रही है। इस तरह से अगर हम देखें तो भाषाई वैमनस्यता दूर करने में फिल्में अब बड़ी भूमिका निभा रही हैं।ये बहुत बड़ी बात है। 

अपनी तमाम कमियों और राजनीतिक एजेंडा के बावजूद ओटीटी पर दिखाई जानेवाले कंटेट ने मनोरंजन की दुनिया को पहले से अधिक समावेशी बनाया है। अब फिल्मों में पहले की अपेक्षा अधिक प्रयोग हो रहे हैं। एक और बात जो रखांकित की जानी चाहिए वो ये कि ओटीटटी पर भारतीय फिल्मों को वैश्विक दर्शक भी मिलने लगे हैं। इसके भी कई फायदे हैं। अब वैश्विक मंचों पर भारतीय फिल्मों की चर्चा होने लगी है। पूरी दुनिया का ध्यान भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की ओर जाने लगा है। भारत कहानियों का देश है, कथावाचकों का देश है। कहानियां भी हैं और कहने का अलग अलग अंदाज भी है। कहने के विविध अंदाज को भी वैश्विक दर्शक मिले हैं। कोरोना के संकट ने एक बार फिर से सिनेमा हाल के जरिए फिल्म के व्यवसाय को बाधित किया है। फिर से फिल्मों के ओटीटी पर दिखाने का दौर आरंभ होगा। ओटीटी पर आनेवाली फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों को भारतीय दर्शकों की रुचियों में आ रहे बदलाव का ध्यान रखना होगा। कहानी को यथार्थ के रास्ते पर चलाकर ही प्रयोग करने होंगे। सफलता की कुंजी वहीं हैं।  


Saturday, January 18, 2020

रणनीतिक चूक से असफल हुई फिल्म


अजय देवगन की फिल्म तान्हाजी ने एक बार फिर से ये साबित किया कि दर्शकों की अपने ऐतिहासिक चरित्रों में खासी रुचि है। ये फिल्म रिलीज के पहले ही सप्ताह में सौ करोड़ के कारोबारी आंकड़ें को पार करके अपनी सफलता का परचम लहरा चुकी है। जबकि इसके साथ ही दीपिका पादुकोण की फिल्म छपाक भी रिलीज हुई थी जिसको मेघना गुलजार जैसी मशहूर शख्सियत ने निर्देशित किया था। अपनी फिल्म की रिलीज के पहले दीपिका ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों को मूक समर्थन देकर मीडिया में सुर्खियां बटोरने का उपक्रम भी किया था। बावजूद इसके फिल्म छपाक को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। छपाक एक सप्ताह में लागत भी नहीं निकाल सकी और सप्ताह का कलेक्शन 26 करोड़ से नीचे रहा। बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक दीपिका की फिल्प ‘छपाक’ फ्लॉप हो गई है। सोशल मीडिया पर तमाम क्रांतिकारी शूरवीरों ने भी दीपिका की इस फिल्म को सफल बनाने की मुहिम चलाई थी लेकिन उस फिल्म को लेकर जो एक अवधारणा लोगों तक पहुंचनी चाहिए थी वो बन नहीं पाई। रिपोर्ट क मुताबिक ‘छपाक’ ने बड़े शहरों में भी अच्छा बिजनेस नहीं किया और रिलीज होने के अगले शुक्रवार को उसका बिजनेस सवा करोड़ तक पहुंच गया। फिल्म छपाक का विषय अच्छा है लेकिन उसका ट्रीटमेंट और निर्देशन उस स्तर का नहीं है कि वो फिल्म से कोई छाप छोड़ सके। एसिड पीड़िता के दर्द को समाज में प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति महसूस करता है, इस हमले के खिलाफ उसके मन से प्रतिरोध की आवाज भी उठती रहती है लेकिन फिर भी लोग इस फिल्म को अपेक्षित संख्या में देखने नहीं गए। इसकी वजह यही रही कि ये फिल्म लोगों के बीच आपसी बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाई। ‘छपाक’ जैसी फिल्मों को कभी भी बंपर ओपनिंग नहीं मिली है और इस तरह की फिल्में धीरे-धीरे ही बेहतर कारोबार करती हैं। हाल ही में रिलीज हुई निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15’ भी इसी रास्ते पर चलकर सफल हुईं। ‘आर्टिकल 15’ के बारे में उसके विषय के बारे में, उसके ट्रीटमेंट के बारे में, आयुष्मान खुराना के अभिनय के बारे में लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई और फिर धीरे-धीरे दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हॉल जाने लगे और फिल्म सफल हो गई। लोगों के बीच चर्चा से फिल्म हिट होने का एक और सटीक उदाहरण है फिल्म ‘शोले’। 1975 में जब फिल्म ‘शोले’ रिलीज हुई थी तब ना तो चौबीस घंटे के न्यूज चैनल थे, ना ही वेबसाइट्स और ना ही सोशल मीडिया। ट्विटर और फेसबुक का तो अता-पता ही नहीं था इस वजह से लाइव समीक्षा भी नहीं हो पाती थी फिल्मों की। तब अखबारों में विज्ञापन आया करते थे। फिल्म समीक्षा छपा करती थी। पोस्टरों से लोगों को फिल्मों की जानकारी मिलती थी या कई शहरों में तो रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर फिल्म का प्रचार किया जाता था। जब अगस्त 1975 में ‘शोले’ रिलीज हुई थी तो लगभग सभी अखबारों ने इसको फ्लॉप करार दे दिया था। समीक्षकों को ये फिल्म अच्छी नहीं लगी थी। एक अखबार में तो फिल्म समीक्षा का शीर्षक था- ‘शोले’ जो भड़क न सका। लेकिन फिल्म को लेकर जब लोगों के बीच बातचीत शुरू हुई तो फिर माउथ पब्लिसिटी ने वो असर दिखाया जिसके आगे प्रचार के सारे माध्यम पिछड़ गए। ‘शोले’ की सफलता की कहानी लिखने की आवश्यकता नहीं है। ‘शोले’ की सफलता के पीछे भी दर्शकों में आपस में हुई बातचीत के फैलने का असर ही माना जाता है। ये एक कारक था लेकिन इसके अलावा इसका निर्देशन और सभी कलाकारों का अभिनय भी कमाल का था।
दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने की एक वजह उनका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाना भी रहा। वो छात्रों के बीच गईं, मौन रहीं लेकिन उनके आसपास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की उपस्थिति और वामपंथी विचारधारा के लोगों के दीपिका के पक्ष में आने से फिल्म के खिलाफ माहौल बन गया। जेएनयू जाकर दीपिका वामपंथियों के साथ खड़ी दिखी। इस स्तंभ में विस्तार से इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इस वजह से गई कि उनकी प्रचार टीम को दीपिका के इर्द गिर्द चर्चा चाहिए थी। प्रचार टीम इस बात का आकलन करने में चूक गई कि बाजार के औजार तभी सफल हो सकते हैं जब उसके साथ व्यापक जन समुदाय हो। बाजार उस विचारधारा के कंधे के पर नहीं चल सकता है जिस विचारधारा को पूरे देश ने लगभग नकार दिया। इसका प्रकटीकरण चुनाव दर चुनाव होता रहा। प्रचार टीम की इस रणनीतिक चूक का खामियाजा फिल्म को भुगतना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक कोई फिल्म तभी सफळ मानी जाती है जबकि उसको देखने के लिए कम से कम पचास लाख लोग पहुंचें। इस पचास लाख की संख्या से एक तय फॉर्मूल के आधार पर धनार्जन देखा जाता है।
बाजार के स्वभाव को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि आमिर और शाहरुख खान की फिल्मों के फ्लॉप होने या उनकी चमक फीकी पड़ने के पीछे उनका 2014 के बाद दिया गया बयान रहा है। जन के मानस पर जो बात एक बार अंकित हो जाती है उसको कुछ लोग आक्रामक तरीके से प्रकट कर देते हैं जबकि ज्यादातर लोग खामोशी से उसका प्रतिरोध करते हैं। फिल्मों के वितरण के कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि जनता के मन को समझते हुए ही शाहरुख और आमिर दोनों ने अपना रास्ता बदला और वो दोनों नरेन्द्र मोदी से मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ते और प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की तस्वीरों को प्रचारित भी करते हैं ताकि जनता को ये संदेश जा सके कि वो अब मोदी के विरोध में नहीं हैं। दूसरी बात ये कि देश की जनता खासकर हिंदी फिल्मों के दर्शक इस बात को पसंद नहीं करते हैं कि राजनीति को फिल्मों के सफल होने का उपयोग किया जाए। इस बात के दर्जनों उदाहरण हैं कि जब फिल्म के कलाकारों ने फिल्म रिलीज के पहले राजनीति का दांव चला है उसका फायदा नहीं हुआ उल्टे नुकसान हो गया।  
दीपिका के जेएनयू जाने से जो प्रतिरोध हुआ उसका फायदा अजय देवगन की फिल्म को मिला। आज जिस तरह से देशभर में राष्ट्रवाद को लोग पसंद कर रहे हैं और उसके खिलाफ सुनने को तैयार नहीं है। कोई भी देश अपने स्वर्णिम इतिहास और उस इतिहास के उन चरित्रों को बेद पसंद करते हैं जिन्होंने देश की गौरव गाथा लिखी और अपनी वीरता, शौर्य और अपने कृत्यों से देश का नाम रौशन किया। अपने अतीत को लेकर गौरव का उभार इस वक्त पूरी दुनिया में है। इस वैश्विक परिघटना से भारत भी अछूता नहीं है। अब भारत औपनिवेशिक गुलामी से मानसिक रूप से भी लगभग मुक्त हो चुका है। आजादी के बाद की फिल्मों को देखें तो उस दौर में फिल्मकार अंग्रेजों के जुल्म को दिखाते थे और फिर नायक उस जुल्म के खिलाफ खड़ा होता था। उसको देखने के लिए जनता की भारी भीड़ उमड़ती थी। ये क्रम काफी लंबे समय तक चलता रहा। क्रांति और लगान भी इसी थीम पर बनी और उसको दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला। इसके बाद भारत पाकिस्तान के युद्ध पर आधारित फिल्में बनीं। पाकिस्तानियों को हारते हुए देखकर लोग खूब ताली बजाते थे और टिकट खिड़की पर दर्शक टूट पड़ते थे।  
हिंदी फिल्मों में अब वो दौर बदल गया है। अब लोग भारत की गौरव गाथा को देखना चाहते हैं। चाहे वो खेल के मैदान में लिखी गई गौरव गाथा हो, विज्ञान की दुनिया की खास उपलब्धि हो या फिर आजाद भारत की सैन्य उपलब्धियां हों। चाहे वो अक्षय कुमार की फिल्म गोल्ड हो, उनकी ही फिल्म मिशन मंगल हो या फिर फिर विकी कौशल की फिल्म उरी हो। ये बदलाव इस बात को रेखांकित करता है कि भारत में सिनेमा के दर्शकों का मन और मिजाज दोनों बदल रहा है। सिर्फ फिल्म ही क्यों अगर हम वेब सीरीज की या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर भी देखें तो ऐतिहासिक चरित्रों के इर्द गिर्द बनी सीरीज बेहद सफल हो रही है। ना सिर्फ सफल हो रही बल्कि लगातार इस तरह की सीरीज बनने की घोषणाएं भी हो रही हैं। नेटफ्लिक्स से लेकर अमेजन और जी फाइव से लेकर एमएक्स तक के प्लेटफॉर्म पर गौरव गाथाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। बाजार का अच्छा जानकार वही होता और माना जाता है जो देश के मूड को भांपते हुए जनता के मन मुताबिक चीज उसके सामने रखे। सफलता मिलती ही है नहीं तो फिर उसका ‘छपाक’ हो जाता है।    

Saturday, January 11, 2020

विवाद से मुनाफा कमाने का दांव फुस्स


दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ रिलीज हो गई और फिल्म कारोबार के जानकारों के मुताबिक उसकी फिल्म को अपेक्षित ओपनिंग नहीं मिल पाई। फिल्म के दर्शकों के पसंद करने के पूर्वानुमान के आंकड़ों से भी कम की ओपनिंग मिली। पहले दिन की जो ओपनिंग मिली है वो भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती है। ‘छपाक’ पहले दिन पांच करोड़ रु का बिजनेस भी नहीं कर पाई जबकि अनुराग कश्यप जैसे स्वनामधन्य सूरमा भी इस फिल्म के प्रमोशन के लिए कूद गए थे। वैसे भी अनुराग कश्यप फ्लॉप फिल्मों के ही निर्देशक बन कर रह गए हैं जो अपनी निजी कुंठा बेहद अमर्यादित तरीके से ट्वीटर पर निकालते रहते हैं। जिस तरह की गाली गलौच वो अपनी फिल्मों या वेब सीरीज में दिखाते-सुनाते हैं वो भी उसी मर्यादाहीन भाषा के शिकंजे में जकड़ते जा रहे हैं।  पहले दिन पांच करोड़ से नीचे रह जाना छपाक की टीम क लिए झटके जैसा है। मेट्रो शहरों के कुछ मल्टीप्लैक्स में इस फिल्म को देखने दर्शक पहुंचे लेकिन मेट्रो से बाहर इस फिल्म को अतिसाधारण ओपनिंग मिली। बिहार समेत कई मार्केट से इस तरह की खबरें आईं कि पहले शो में तो फिल्म छपाक को दर्शक ही नहीं मिले। पटना के एक सिनेमा हॉल में एक शो में तीन दर्शक के रहने की खबरें आई। दीपिका पादुकोण जैसी बड़ी स्टार और मेघना गुलजार जैसी मशहूर निर्देशक के होते हुए फिल्म ‘छपाक’ को पहले दिन बॉक्स ऑफिस पर इतनी कम ओपनिंग मिलना चकित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि दीपिका का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के बीच जाने की युक्ति भी काम नहीं कर पाई। 7 जनवरी की शाम जब दीपिका पादुकोण जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंची थीं तो उसके बाद एक वर्ग विशेष ने फिल्म के पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर दिया था। टिकट खरीदने और उसका स्क्रीन शॉट ट्विटर पर पोस्ट करने की मुहिम भी चलाई गई थी। कई घंटे तक ये मुहिम चलती भी रही थी। लेकिन अब जब दीपिका की फिल्म छपाक को देखने के लिए अपेक्षित संख्या में दर्शक नहीं पहुंचे तो ये संकेत तो साफ हो गया है कि सोशल मीडिया पर चाहे जितना शोर मचा लो फिल्म को फायदा नहीं मिला। बल्कि इसका फायदा अजय देवगन की फिल्म ‘तान्हाजी’ को हो गया। ‘तान्हाजी’ को बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन 15 करोड़ से अधिक की ओपनिंग मिली जो कि सफल फिल्म होने का संकेत देती है। फिल्म ‘छपाक’ की रिलीज के तीन दिन पहले दीपिका पादुकोण का जेएनयू जाना और वहां आंदोलनकारी छात्रों के साथ खड़े होने की रणनीति फिल्म प्रमोशन के लिए थी लेकिन अब वो चौतरफा घिर गई हैं। राजनीतिक तौर पर भी उनके बयानों की लानत मलामत हो रही है। केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने उनके जेएनयू जाने को लेकर उनको घेरा है। लगता है फिल्म को सफल बनाने के लिए जेएनयू जाने की रणनीति उल्टी पड़ती नजर आ रही है।   
फिल्म इंडस्ट्री में कई बड़े निर्माता निर्देशक एक रिपोर्ट पर विश्वास करते हैं और फिल्म की रिलीज के पहले उसकी रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार कर रणनीति बनाते हैं। एक कंपनी ऑरमैक्स, सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट जारी करती है जिसके आधार पर पहले दिन बॉक्स ऑफिस ओपनिंग (एफबीओ)  के बारे में अंदाज लगाया जाता है। ऑरमैक्स सिनेमैट्रिक्स निश्चित तारीख पर रिलीज होनेवाली फिल्मों के प्रमोशन कैंपन को चार आधार पर ट्रैक करती है ताकि पहले दिन फिल्म की ओपनिंग का अंदाज लगाया जा सके। ये चार आधार होते हैं बज़ (चर्चा), रीच (पहुंच), अपील और इंटरेस्ट (रुचि)। ये एक रियल टाइम रिपोर्ट होती है जो किसी भी फिल्म के प्रमोशन कैंपेन को रोजाना ट्रैक करती है। इसको फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस मॉडल कहते हैं। इसके आधार पर ना केवल फिल्म का प्रमोशन कैंपेन डिजायन किया जाता है बल्कि उसमें आवश्यकतानुसार बदलाव भी किया जाता है। इस व्यवस्था को भरोसेमंद बनाने के लिए फिल्मों के 29 मार्केट से जानकारियां जमा की जाती है। जानकारियों का विश्लेषण करने के बाद सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट तैयार की जाती है।
इस रिपोर्ट में फिल्मों पर असर डालनेवाले बाहरी कारकों के प्रभाव का भी ध्यान रखा जाता है। बाहरी कारक यानि फिल्म रिलीज की तारीख के दिन या उसके आसपास पड़नेवाले त्योहार,छुट्टियां,क्रिकेट मैच, परीक्षाएं या मौसम को विश्लेषित किया जाता है। गौरतलब है कि फिल्म ‘धूम 3’ के लिए एफबीओ रिपोर्ट साढे बत्तीस करोड़ रुपए की ओपनिंग की थी जबकि वास्तविक ओपनिंग 30.9 करोड़ रु की रही जो कि पूर्वानुमान के बहुत करीब थी। फिल्म ‘आर..राजकुमार’ के लिए ओपनिंग का पूर्वानुमान 8.3 करोड़ रु का था जबकि वास्तविक ओपनिंग 8.8 करोड़ रुपए की हुई थी। कंपनी मानती है कि उसकी रिपोर्ट एकदम सटीक नहीं होती है और उसमें पांच फीसदी ऊपर नीचे की गुंजाइश होती है। कंपनी की बेवसाइट का दावा है कि फिल्म उद्योग के कई स्टूडियोज उनकी इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हैं।  
‘छपाक’ फिल्म की 7 जनवरी को दिन में ये रिपोर्ट आती है जिसमें वो उपर उल्लिखित चारों मापदंडों पर तीसरे स्थान पर आती है जबकि उसके रिलीज वाले दिन अजय देवगन-काजोल की फिल्म ‘तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर’ पहले स्थान पर थी। पहुंच में भी फिल्म ‘छपाक’, इसी दिन रिलीज होनेवाली फिल्म ‘तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर’ और 24 जनवरी को रिलीज होनेवाली फिल्म ‘स्ट्रीट डांसर’ से पीछे थी। दर्शकों की रुचि में भी दीपिका की फिल्म ‘तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर’ से पीछे चल रही थी। इससे भी चिंता की बात ये थी कि एफबीओ में ‘छपाक’ और ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ की पहले दिन की ओपनिंग में बहुत अधिक फर्क थी ‘तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर’ को इस रिपोर्ट में ‘छपाक’ से लगभग दुगनी ओपनिंग मिलने का पूर्वानुमान लगाया गया था। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट के आते ही फिल्म ‘छपाक’ का प्रमोशन देख रहे लोगों ने रणनीति बदली और उसके बाद ही दीपिका के जेएनयू जाने की योजना बनाई थी। फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का कहना था कि ऐसा पहली बार हो रहा था कि दीपिका की किसी भी फिल्म की पहले दिन बॉक्स ऑफिस ओपनिंग (एफबीओ) का आंकड़ा इकाई में नहीं आया था। एफबीओ के सिंगल डीजिट में आने से भी आनन फानन में जेएनयू जाने की योजना बनी थी। दीपिका पादुकोण के जेएनयू जाने के दो दिन बाद सिनेमैट्रिक्स की 9 जनवरी की रिपोर्ट से पता लगा था कि ‘छपाक’ को बहुत मामूली फायदा हुआ था। चार मापदंडों पर दीपिका के जेएनयू जाने का थोड़ा ही असर हुआ लेकिन फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस ओपनिंग के पूर्वानुमान पर जरा भी असर नहीं पड़ा। जबकि ‘तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर’ के एफबीओ में मामूली वृद्धि होती दिख रही है। दोनों फिल्में फिल्म रिलीज हो गई हैं तो ये साफ हो गया है कि सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट के आंकड़े फिल्म दर्शकों के बारे में तकरीबन सही अंदाज लगा पाती है।
दीपिका पादुकोण की फिल्म का प्रमोशन देख रहे लोगों ने सोचा होगा कि उनके जेएनयू जाने से छपाक के पहले भी उसी तरह का विवाद उठ खड़ा होगा जिस तरह का विवाद फिल्म पद्मावत के वक्त उठ खड़ा हुआ था। उनके जेएनयू पहुंचने पर विवाद शुरू तो हुआ लेकिन उसकी चंद घंटों में ही निकल गई। विवाद से मुनाफा कमाने की रणनीति का कोई फायदा नहीं हुआ। विवाद उठाकर मुनाफा कमाने की रणनीति अब पुरानी हो गई है। आमिर खान की जब भी कोई फिल्म रिलीज होती है तो वो विवाद उठाने से नहीं चूकते हैं। किसी फिल्म की रिलीज के पहले उनको गुजरात दंगों की याद आती है तो किसी फिल्म के पहले वो नर्मदा आंदोलन को लेकर विवादित बयान दे देते हैं। विवाद उठाकर मुनाफा कमाने में आमिर खान को महारत हासिल है। जब कोई फिल्म नहीं आ रही होती है तो वो आमतौर पर खामोश ही रहते हैं। किसी भी कलाकार को या फिल्म प्रोड्यूसर को अपने उपक्रम से मुनाफा कमाने का हक है लेकिन मुनाफा के लिए लोगों की भावनाएं भड़का कर उनको सिनेमा हॉल तक खींचने का उपाय करना कितना उचित है इसपर भी विचार करने की जरूरत है। दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ को जिस तरह से विवाद का कोई फायदा नहीं मिला उससे बॉलीवुड के इन सितारों को सीख तो मिली ही होगी। उल्ट इस बार तो दीपिका विवाद में चौतरफा घिर भी गईं हैं। हां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़े होने का एक फायदा ये हुआ कि कुछ राज्यों में ये फिल्म टैक्स फ्री हो गईं।

Thursday, January 9, 2020

आंकड़ों ने बनाया आंदोलनकारी!


आज दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ रिलीज हो रही है। इसके दो दिन पहले अचानक शाम को ये खबर आई कि दीपिका पादुकोण जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंच गई। इस खबर के साथ ही सोशल मीडिया पर घमासान मच गया। ट्वीटर के बयानवीरों ने इसको दीपिका की हिम्मत के साथ जोड़कर उनकी शान में कशीदे पढ़ने शुरू कर दिए। कई लोग तो इतने जोश में आ गए कि उनकी इस बात के लिए तारीफ करनी शुरू कर दी कि इतनी बड़ी फिल्म को दांव पर लगाकर आंदोलनकारी छात्रों के साथ खड़ी हो गई। ट्वीटर पर जोशीले ट्वीट्स तूफानी अंदाज में लिखे जाने लगे। सोशल मीडिया पर ही दूसरा पक्ष विरोध में उठ खड़ा हुआ और दीपिका के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचने को उनकी फिल्म के प्रमोशन से जोड़ दिया। दोनों पक्षों में सोशल मीडिया पर भिड़ंत हो गई। ट्वीटर पर ‘छपाक’ फिल्म के पक्ष और विपक्ष में बनाया गया हैशटैग ट्रेंड करने लगा। बॉलीवुड के भी अनुराग कश्यप जैसे सूरमाओं को ये लगा कि उनके विरोध को दीपिका के साथ आने से ताकत मिली है। वो भी जोश में आ गए। लेकिन उऩको ये नहीं समझ आया कि दीपिका पादुकोण का वहां पहुंचने के पीछे की वजह एक रिपोर्ट थी।
दरअसल एक कंपनी ऑरमैक्स, सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट जारी करती है जिसके आधार पर पहले दिन बॉक्स ऑफिस ओपनिंग (एफबीओ)  के बारे में अंदाज लगाया जाता है। ऑरमैक्स सिनेमैट्रिक्स निश्चित तारीख पर रिलीज होनेवाली फिल्मों के प्रमोशन कैंपन को चार आधार पर ट्रैक करती है ताकि पहले दिन फिल्म की ओपनिंग का अंदाज लगाया जा सके। ये चार आधार होते हैं बज़ (चर्चा), रीच (पहुंच), अपील और इंटरेस्ट (रुचि)। ये एक रियल टाइम रिपोर्ट होती है जो किसी भी फिल्म के प्रमोशन कैंपेन को रोजाना ट्रैक करती है। इसको फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस मॉडल कहते हैं। इस रिपोर्ट के सब्सक्राइवर को इसके अलावा उनकी मांग के अनुरूप अन्य आंकड़े और जानकारियां भी दी जाती हैं। फिल्म जगत में इस रिपोर्ट पर बड़ी फिल्म निर्माता कंपनी काफी भरोसा करती हैं।इसके आधार पर प्रमोशन कैंपेन को डिजायन भी किया जाता है और उसमें बदलाव भी किया जाता है। इंडस्ट्री से जुड़े लोग इसको बखूबी जानते और समझते भी हैं। इस कंपनी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस व्यवस्था को भरोसेमंद और व्यापक बनाने के लिए फिल्मों के 29 मार्केट से जानकारियां उठाई जाती है। उन जानकारियों और सूटनाओं के आधार पर उसका विश्लेषण किया जाता है और फिर सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट तैयार की जाती है।
इस रिपोर्ट में फिल्मों पर असर डालनेवाले बाहरी कारकों का भी ध्यान रखा जाता है। इसके प्रभाव को भी इसमें शामिल किया जाता है। बाहरी कारक यानि फइल्म रिलीज की तारीख के दिन या उसके आसपास पड़नेवाले त्योहार,छुट्टियां,क्रिकेट मैच, परीक्षाएं या मौसम का भी ध्यान रखकर विश्लेषित किया जाता है और फिर रिपोर्ट तैयार की जाती है। गौरतलब है कि फिल्म ‘धूम 3’ के लिए एफबीओ रिपोर्ट साढे बत्तीस करोड़ रुपए की ओपनिंग की थी जबकि वास्तविक ओपनिंग 30.9 करोड़ रु की रही जो कि पूर्वानुमान के बहुत करीब थी। फिल्म ‘आर..राजकुमार’ के लिए ओपनिंग का पूर्वानुमान 8.3 करोड़ रु का था जबकि वास्तविक ओपनिंग 8.8 करोड़ रुपए की हुई थी। कंपनी मानती है कि उसकी रिपोर्ट एकदम सटीक नहीं होती है और उसमें पांच फीसदी उपर नीचे की गुंजाइश होती है। बेवसाइट का दावा है कि फिल्म उद्योग के कई स्टूडियोज उनकी इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हैं।  
अब शुरू होती है दीपिका के जेएनयू पहुंचने की असली कहानी। जिस दिन दीपिका शाम को जेएनयू पहुंचती हैं उस दिन यानि 7 जनवरी को दिन में ये रिपोर्ट आती है जिसमें वो उपर उल्लिखित चारों मापदंडों पर तीसरे स्थान पर आती है जबकि आज ही रिलीज होनेवाली अजय देवगन-काजोल की फिल्म ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ पहले स्थान पर थी। पहुंच में भी फिल्म ‘छपाक’, इसी दिन रिलीज होनेवाली फिल्म ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ और 24 जनवरी को रिलीज होनेवाली फिल्म ‘स्ट्रीट डांसर’ से पीछे थी। दर्शकों की रुचि में भी दीपिका की फिल्म ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ से पीछे चल रही थी। इससे भी चिंता की बात ये थी कि एफबीओ में ‘छपाक’ और ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ की पहले दिन की ओपनिंग में बहुत अधिक फर्क था। टतानाजी, द अनसंग वॉरियरट को इस रिपोर्ट में ‘छपाक’ से लगभग दुगनी ओपनिंग मिलने का पूर्वानुमान लगाया गया था। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट के आते ही फिल्म ‘छपाक’ का प्रमोशन देख रहे लोगों ने रणनीति बदली और उसके बाद ही दीपिका के जेएनयू जाने की योजना बनी।  दीपिका जेएनयू पहुंच गई। दीपिका के जेएनयू जाने को लेकर सोशल मीडिया पर भले ही हो हल्ला मचा हो लेकिन सिनेमैट्रिक्स की 9 जनवरी की रिपोर्ट बताती है कि इसका मामूली फायदा ‘छपाक’ को हुआ। चार मापदंडों पर दीपिका के जेएनयू जाने का थोड़ा ही असर हुआ लेकिन फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस ओपनिंग के पूर्वानुमान पर कोई असर नहीं पड़ा। जबकि ‘तानाजी, द अनसंग वॉरियर’ के एफबीओ में मामूली वृद्धि होती दिख रही है। आज दोनों फिल्म रिलीज होगी और उसके वास्तविक आंकड़ें आएंगे तो पता चलेगा कि दीपिका की जेएनयू जाने की रणनीति कितनी कामयाब रही और फिल्म को ओपनिंग में या कारोबार में कितना फायदा हो पाया या इसका कोई असर नहीं पड़ा।
दरअसल अगर हम फिल्मी कलाकारों को देखें तो विवादित विषयों को उठाकर या उनके साथ खड़े होकर फिल्म प्रमोशन की रणनीति बहुत पुरानी है। दीपिका पादुकोण की ही फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर उठा विवाद अभी पाठकों और दर्शकों के मानस पर अंकित ही है।पूर्व में भी बॉलीवुड के हीरो इस तरह के विवादों को हवा देते रहे हैं, कभी किसी को डर लगने लगता है तो किसी की पत्नी को डर लगने लगता है तो कभी किसी अभिनेता को अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है। कई बार फिल्म के उन अंशों को जानबूझकर लीक कर दिया जाता है जो विवाद पैदा कर सकते हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं जब विवाद उठाने के बाद निर्माता सफाई देते हैं कि इस तरह का कोई प्रसंग इस फिल्म में नहीं है। कई बार इस तरह की रणनीति सफल होती है और कई बार असफल। दीपिका की फिल्म छपाक का प्रमोशन देख रही टीम ने इस बार आंदोलन के साथ जाकर फिल्म को सफल करने का दांव चला है। सफलता तो दर्शकों के हाथ में है, दांव पर तो सिनेमैट्रिक्स की रिपोर्ट की साख भी है।   

Friday, November 10, 2017

साहित्य क्षितिज पर छाए सितारे

अभी पिछले दिनों हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की खासी चर्चा रही। इस पुस्तक की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। हलांकि इसके पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। पहली प्रामाणिक जीवनी के दस साल बाद दूसरी प्रामाणिक जीवनी का प्रकाशित होना इस बात का संकेत है कि सिनेमा के पाठक लगातार बने हुए हैं। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में पहली वाली से कुछ ही चीजें अधिक हैं, एक तो वो जो पिछले दस सालों में घटित हुआ और दूसरी वो घटनाएं जो पहली में किसी कारणवश रह गई थी। हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। इस पुस्तक के लॉंच के मौके पर दीपिका पादुकोण ने इसका संकेत भी किया था। दीपिका ने जहां अपने डिप्रेशन की खुलकर सार्वजनिक चर्चा की वहीं हेमा मालिनी ने उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। कई दिलचस्प प्रसंग और होंगे। इस आलेख का उद्देश्य हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी पर लिखना नहीं है बल्कि इससे इतर और आगे जाकर बात करना है।
दरअसल पिछले तीन चार सालों से फिल्मी कलाकारों और उनपर लिखी जा रही किताबें बड़ी संख्या में बाजार में आ रही हैं । फिल्मी कलाकारों या उनपर लिखी किताबें ज्यादातर अंग्रेजी में आ रही हैं और फिर उसका अनुवाद होकर वो हिंदी के पाठकों के बीच उपलब्ध हो रही हैं । पहले गाहे बगाहे किसी फिल्मी लेखक की जीवनी प्रकाशित होती थी या फिर किसी और अन्य लेखक के साथ मिलकर कोई अभिनेता अपनी जिंदगी के बारे में किताबें लिखता था लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है । फिल्मी सितारे खुद ही कलम उठाने लगे हैं। हेमा मालिनी की जीवनी के पहले करण जौहर की आत्मकथानुमा संस्मरणों की किताब ‘एन अनसुटेबल बॉय’ प्रकाशित हुई जो कि बाद में ‘एक अनोखा लड़का’ के नाम से हिंदी में अनूदित होकर प्रकाशित हुई। इसमें उनके बचपन से लेकर जुड़वां बेटों के गोद लेने के पहले तक की कहानी है । इस पुस्तक में करण और अभिनेता शाहरुख खान की दोस्ती के किस्से पर तो पूरा अध्याय ही है। करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया गया है। लगभग उसी समय ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ भी प्रकाशित हुई जो कि दाऊद इब्राहिम के प्रसंग को लेकर और फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की स्वाकारोक्ति को लेकर खासी चर्चित हुई थी। इसके बाद आशा पारेख की जीवनी प्रकाशित हुई। इसके साल भर पहले राजू भारतन ने आशा भोंसले की सांगीतिक जीवनी लिखी थी। लगभग उसी वक्त सीमा सोनिक अलीमचंद ने दारा सिंह पर ‘दीदारा’ के नाम से किताब लिखी थी।
अंग्रेजी में फिल्मी शख्सियतों से जुड़ी किताबों की एक लंबी फेहरिश्त है । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी, दिलीप कुमार साहब की भी। उसके पहले करिश्मा और करीना कपूर की किताबें आई । दो हजार बारह में करीना कपूर की किताब- ‘द स्टाइल डायरी ऑफ द बॉलीवुड दीवा’ आई जो उन्होंने रोशेल पिंटो के साथ मिलकर लिखी थी । उसके एक साल बाद ही उनकी बड़ी बहन करिश्मा कपूर की किताब- ‘माई यमी मम्मी गाइड’ प्रकाशित हुई जो उन्होंने माधुरी बनर्जी के साथ मिलकर लिखी ।
इसके पीछे हम पाठकों का एक बड़ा बाजार को देख सकते हैं या बाजार का विस्तार की आहट भी महसूस कर सकते हैं । रूपहले पर्दे के नायक नायिकाओं के बारे में जानने की इच्छा पाठकों के मन में होती है। उनकी निजी जिंदगी कैसी रही, उसका संघर्ष कैसा रहा, उसकी पारिवारिक जिंदगी कैसी रही, उनका क्या किसी से प्रेम संबंध रहा, अगर रहा तो वो कितना रोचक रहा, आदि आदि । हम कह सकते हैं कि भारतीय मानसिकता में हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसके पड़ोसी के घर में क्या घट रहा है ये जाने । इसी मानसिकता का विस्तार पाठकों को फिल्मी सितारों तक ले जाता है और अंतत: बड़े पाठक वर्ग में बदल जाता है जो किताबों के लिए एक बड़े बाजार का निर्माण करती है ।
दूसरे फिल्मी सितारों के अंदर एक मनोविज्ञान काम करता है कि अगर वो किताबें लिखेगा तो बॉलीवुड से लेकर पूरे समाज में उनकी छवि गंभीर शख्सियत की बनेगी । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा को साहित्य जगत में बेहद गंभीरता से लिया गया । शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी जो भारती प्रधान ने लिखी थी उसमें फिल्मों पर कम उनके सामाजिक जीवन पर ज्यादा बातें है । इसी तरह से स्मिता पाटिल पर मैथिली राव की किताब और सलमान खान पर जसिम खान की किताब प्रकाशित हुई थी । जीवनी और आत्मकथा से अलग हिंदी फिल्मों को लेकर कई गंभीर किताबें अंग्रेजी में प्रकाशित हुई हैं । जैसे एम के राघवन की डायरेक्टर्स कट, अनुराधा भट्टाचार्य और बालाजी विट्ठल की पचास हिंदी फिल्मों पर लिखी गई किताब गाता रहे मेरा दिल, प्रकाश आनंद बक्षी की डायरेक्टर्स डायरीज आदि प्रमुख हैं । इन किताबें ने फिल्मी दुनिया की सुनी अनसुनी कहानियों को सामने लाकर आती हैं । पचास फिल्मी गीतों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब में उन गानों के लिखे जाने से लेकर उनकी रिकॉर्डिंग तक की पूरी प्रक्रिया को रोचक अंदाज में लिखा गया है । इसी तरह से डॉयरेर्टर्स डायरी में गोविंद निहलानी, सुभाष घई, अनुराग बसु, प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया समेत कई निर्देशकों के शुरुआती संघर्षों की दास्तां है ।
इसके बरक्श अगर हम हिंदी में देखें तो फिल्म लेखन में लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । कुछ समीक्षकनुमा लेखक फिल्म समीक्षा पर लिखे अपने लेखों को किताब की शक्ल दे देते हैं या फिर कई लेखकों के लेखों को संपादित कर किताबें बाजार में आ जाती है । दरअसल ये दोनों काम गंभीर नहीं हैं और ना ही हिंदी के पाठकों की क्षुधा को शांत कर सकते हैं । पाठक इन किताबों को उसके शीर्षक और लेखक के नाम को देखकर खरीद लेता है लेकिन पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदी में छपी फिल्मी किताबें अब कम बिकने लगी हैं।
इसकी क्या वजह है कि हिंदी के लेखक बॉलीवुड सितारों पर कोई मौलिक और मुक्कमल पुस्तक नहीं लिख रहे है या नहीं लिख पा रहे हैं। दरअसल हिंदी के लेखकों ने फिल्म को सृजनात्मक विधा के तौर पर गंभीरता से नहीं लिया और ज्यादातर फिल्म समीक्षा तक ही फंसे रहे। अगर हम इक्का दुक्का पुस्तकों को छोड़ दें तो हिंदी में फिल्म को लेकर, फिल्मी शख्सियतों को लेकर गंभीर काम क्यों नहीं हो रहा है, इस सवाल का उत्तर ढूंढना होगा। हम इस कमी की वजहों की पड़ताल करते हैं तो एक वजह तो ये नजर आती है कि सालों तक हिंदी में फिल्म पर लिखने को दोयम दर्जे का माना जाता रहा । फिल्मों पर लिखने वालों को फिल्मी लेखक कहकर उपहास किया जाता रहा । मुझे याद है कि एक समारोह में अशोक वाजपेयी जी ने फिल्म पर लिखी एक पुस्तक के बारे में कहा कि ये लोकप्रिय गायिका पर लिखी किताब है। लोकप्रिय कहते वक्त दरअसल वो लगभग उपहास की मुद्रा में थे। यह उपहास-भाव लेखक को हतोत्साहित करने के लिए काफी होता है। मैंने अशोक जी का उदाहरण सिर्फ इस वजगह से दिया कि वो अभी चंद दिनों पहले का वाकया है, लेकिन यह प्रवृत्ति हिंदी के आलोचकों और वरिष्ठ लेखकों में बहुत गहरे तक है। मुझे तो याद नहीं पड़ता कि हिंदी में फिल्म पर लिखी किसी किताब पर किसी वरिष्ठ आलोचक का कोई लेख या फिर सिनेमा पर स्वतंत्ररूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक आई हो। हिंदी में इस माहौल ने फिल्म लेखन को बाधित किया। इसके अलावा एक खास विचारधारा में भी फिल्मी लेखन को गंभीरता से नहीं देखा जाता था। फिल्मों को बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता रहा। इस विचारधारा से जुड़े लेखकों ने भी कभी भी फिल्मों पर गंभीरता से नहीं लिखा और ना ही इस विधा पर लिखनेवालों को प्रोत्साहित किया। विचारधारा विशेष की इस उपेक्षा भी एक वजह है। अब जब अंग्रेजी में बहुतायत में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं तो हिंदी के लेखकों के बीच भी इस तरह के लेखन को लेकर सुगबुगाहट है और कोशिशें शुरू हो गई हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि हिंदी साहित्य में पाठकों को विविधता का लेखन उपलब्ध करवाना होगा ताकि भाषा की चौहद्दी का विस्तार हो सके ।


Friday, April 14, 2017

इश्क वाली दीपिका


अभी एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गई कि दीपिका और रणवीर सिंह के बीच इश्क शुरू हो गया है । दरअसल एक तस्वीर ने और दीपिका के इश्क के चर्चों ने इंटरनेट पर मौजूद अफवाहबाजों के मसाला दे दिया । उनके कई तरह के फोटो इंटरनेट पर बेवजह वायरल होते रहते हैं । अभी हाल ही में एक फोटो इतना वायरल हुआ कि लोग उसको सच मान बैठे और इस बात पर कयासबाजी शुरू हो गई कि दीपिता और रणवीर सिंह फिर एक हो गए हैं । इंटरनेट पर जो फोटो वायरल किया गया उसके साथ कहानी ये चली कि करण जौहर की पार्टी में रणवीर ने दीपिका को जोरदार तरीके से आलिंगबद्ध किया और दोनों की वो तस्वीर क कर दी गई । इंटरनेट पर इस तस्वीर के सामने आते ही दीपिका और रणवीर सिंह के फैंस खुशी से पागल हो गए और उसको साझा करना शुरू कर दिया । सोशल मीडिया साइट्स पर ये तस्वीर बेतरह साझा हुई और एक टिप्पणी तो ये आई कि इसने इंटरनेट को तोड़ डाला लेकिन वो फेक निकला । बताया गया कि दीपिका और रणवीर सिंह की ये तस्वीर फोटो शॉप का कमाल था । इसमें किसी और लड़की के चेहरे पर दीपिका की तस्वीर लगाकर किसी ने शरारत की और उसको सोशल मीडिया पर डाल दिया। बॉलीवुड की इश्कक्वीन दीपिका ने जिस तरह से नियमित अंतराल पर प्यार किया और उतनी ही नियमितता के साथ उनका ब्रेक अप होता गया उसने बॉलीवुड के इश्क को एक अलग ही परिभाषा दे डाली ।    
दीपिका के पहले बॉलीवुड में दो तरह के इश्क होते देखे गए हैं, एक तो सचमुच का इश्क जो अगर अंजाम तक नहीं भी पहुंच सकता है तो ताउम्र दोनों के दिलों में जिंदा रहता है । कई बार शादी हो जाती फिर तलाक हो जाता है तो कई बार शादी नहीं भी होती है लेकिन दोनों एक दूसरे की याद को दिल से लगाकर जिंदगी गुजार देते हैं । इस वाले इश्क की मिसाल मीना कुमारी- कमाव अमरोही से लेकर धर्मेन्द्र हेमा मालिनी से लेकर बोनी कपूर श्रीदेवी तक हैं । जैसे लोग कहते हैं कि सलमान और कटरीना का इश्क भी इसी कैटेगिरी में आता है । लंबे समय से ब्रेक अप के बाद भी ऐसा लगता है कि सलमान अपनी महबूबा कटरीना को दिल से निकाल नहीं सकते हैं । कभी टाइगर जिंदा है के सेट से कटरीना और अपनी तस्वीर ट्वीट कर दोनों के साथ होने की मुनादी करते हैं तो कभी खबर आती है कि सलमान ने फिल्म ठग्स ऑफ हिन्दोत्सान में आमिर खान के अपोजिट कटरीना कैफ को कास्ट करने के लिए आदित्य चोपड़ा को फोन किया है । ये वही वाला इश्क है जो भुलाए नहीं भूलता है ।  यह लिस्ट काफी लंबी हो सकती है । दूसरे तरह का इश्क बस करने के लिए होता है, कभी अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए तो कभी अपने पुराने ब्यॉय फ्रेंड को जलाने के लिए । यह लिस्ट भी बहुत लंबी है और इसमें किसी का नाम लेना ठीक नहीं होगा । बॉलीवुड की दुनिया को करीब से जानने वाले और फिल्मी दुनिया के पाठक इस तरह की जोड़ियों को बखूबी पहचनाते हैं ।
अब एक तीसरे तरह का भी इश्क होता है जो दीपिका पादुकोण को होता है । दीपिका के इश्क को अभी तक डिकोड नहीं किया जा सका है क्योंकि अगर उनके बॉलीवुड में आने के बाद से लेकर अबतक के सफर पर नजर डाला जाए तो इस तरह की बातें फिजां में तैरती रही हैं कि उनको कई साथियों से इश्क हुआ है । निहार पांड्यासे लेकर रणबीर सिंह तक के साथ । कुछ सालों पहले दीपिका रणबीर कपूर से दब ब्रेक अप हुआ तो दीपिका को दूसरे रणवीर ने सहारा दिया । कपूर से सिंह के इस यात्रा को मुकाम मिला संजय लीला भंसाली की फिल्म राम-लीला में । दोनों के बीच का केमिस्ट्री फिल्म राम-लीला के दौरान भी देखने को मिली थी और दीपिका की बर्थडे पर दोनों ने न्यूयॉर्क में साथ जश्न भी मनाया था । रणवीर और दीपिका खुले आम अपने इश्क का इजहार भी करते थे । दीपिका कोई भी ऐसा मौका हाथ से जाने नहीं देती थी जहां वो अपने और रणवीर के अफेयर का संकेत दे सकती हो । अभी हाल ही में एक अवॉर्ड फंक्शन में दीपिका और करण जौहर के बीच की चुहलबाजी में भी रणवीर का नाम आया तो उसका चेहरा खिल गया । लेकिन इस रिश्ते में भी ब्रेक अप का मुकाम आया । ये अफेयर चल ही रहा था कि दीपिका को हॉलीवुड फिल्म ट्रिपल एक्स में मौका मिला और वो विन डीजल के साथ काम करने लगी । इस फिल्म के दौरानऔर फिल्म रे प्रमोशन के दौरान जब विन डीजल इंडिया आए तो दोनों के इश्क की खबरें खूब चलीं । उसी दौर में रणवीर सिंह से ब्रेकअप भी था लिहाजा इस रिश्ते को खब हवा मिलीऔर बॉलीवुड की तमाम पत्र-पत्रिकाएं दीपिका और विन डीजल के रिश्तों के बारे में कयासबाजी करते रहे । लेकिन हर रिश्ते की तरह दीपिका का ये रिश्ता भी ब्रेकअप काशिकार हो गया । कहते है कि दीपिका को विन डीजल में संभावना नहीं दिखी तो दोनों अलग हो गए । कई लोगों का दावा है कि दीपिका अपनी फिल्मों के रिलीज के वक्त इस तरह का इश्क प्लान करती हैं और फिल्म रिलीज होने के बाद फिर हवा ए इश्क का रुख मोड़ देती हैं । दीपिका के इश्क को डिकोड करने में इस वजह से भी दिक्कत होती है कि उनका इश्क कई बार ब्रेकअप की राह पर चलकर फिर से वापस आ जाता है । जिगर मुरादाबादी साहब कहते हैं कि ये इश्क नहीं आसां, इतना ही समझ लीजै, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है । लेकिनव बॉलीवुड में अब तो ऐसा लगता है कि ये इश्क बेहद आसां भी है आग का दरिया तो बिल्कुल भी नहीं है जिसमें डूबना पड़ता है । अब तो इश्क को सतह से करते हुए. छूटे हुए निकला जा सकता है ।