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Monday, March 20, 2017

पस्त संगठन, मस्त नेता

दो हजार चौदह के बाद से जब भी कोई चुनाव होता है और उसमें कांग्रेस को हार मिलती है तो राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े होने लगते हैं । राजनीतिक विश्लेषकों के अलावा कांग्रेस के नेता भी उनके नेतृत्व को लेकर प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं लेकिन संगठन की चूलें आदि कसने के नाम पर सवाल उठाने लगते हैं । इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी में एक सौ तीस साल पुरानी पार्टी की अगुवाई को लेकर कोई स्पार्क नहीं दिखा है । ना ही किसी तरह की कोई ठोस रणनीति के दर्शन हुए हैं । हालिया विधानसभा चुनावों खासकर यूपी में कांग्रेस की हार के बाद एकबार फिर से कांग्रेस के नेता तरह तरह के सवाल खड़े करने लगे हैं । कोई शल्य चिकित्सा की बात कर रहा है तो कोई संगठन मजबूत करने की बात कर रहा है । यह सही है कि पार्टी को सही तरीके से चलाने और उसको संसदीय प्रणाली में जीत दिलवाने की जिम्मेदारी नेतृत्व पर होती है परंतु यह भी उतना ही सच है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने मजबूत नेतृत्व के साथ साथ समर्पित अन्य नेताओं के कंधों पर ही चल सकता है । अब कांग्रेस को देखें तो इस वक्त पार्टी को लेकर जो ज्यादा चिंतित नजर आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर राज्यसभा के सदस्य हैं । इसके अलावा कांग्रेस ने यूपी में जिनको जिम्मेदारी भीदी वो सारे के सारे राज्यसभा वाले नेता थे चाहे वो गुलाम नबी आजाद हों, प्रमोद तिवारी हों, राज बब्बर हों या फिर संजय सिंह, पीएल पूनिया हों या फिर राजीव शुक्ला ।  जनता के बीच जाकर संघर्ष का उनका कोई हालिया इतिहास नहीं रहा है । हम अगर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को ही देखें तो भारतीय जनता पार्टी ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दर्जनों रैलियां की, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने करीब दो सौ रैलियां की । इसके अलावा करीब बीस केंद्रीय मंत्री उत्तर प्रदेश में पार्टी के पक्ष में रात-दिन एक किए हुए थे । एक केंद्रीय महासचिव को पार्टी ने महीने भर से ज्यादा के लिए लखनऊ में तैनात कर दिया था । अब इसकी तुलना में कांग्रेस के नेताओं को देखें । बड़ी बड़ी बातें करनेवाले, टीवी कैमरों के आगे चिंता जताने वाले किस कांग्रेस नेता ने उत्तर प्रदेश में प्रचार किया । सत्यव्रत चतुर्वेदी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और गठबंधन होने के बाद तो गुलामनबी आजाद और राज बब्बर भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देने लगे थे । कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी जैसे नेता यूपी चुनाव के दौरान कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे । हिंदी में एक पुरानी कहावत है कि अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता है । कांग्रेस के साथ इन दिनों वही हो रहा है ।
आज के अखबारों में कमलनाथ का साक्षात्कार छपा है जिसमें उन्होने कहा है कि राहुल गांधी को नेतृत्व संभाल लेना चाहिए । दरअसल कमलनाथ हर हार के बाद बाहर आते हैं और राहुल गांधी के बारे में अपनी अपेक्षा जाहिर कर नेपथ्य में चले जाते हैं । पिछले दिनों मुंबई लिटो फेस्ट में एक सत्र में कांग्रेस की पूर्व सांसद प्रिया दत्त से संवाद का अवसर मिला था । मैंने उनसे जब पूछा कि क्या कांग्रेस को नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है तो उन्होंने साफ जवाब तो नहीं दिया लेकिन इतना जरूर कहा कि कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता के साथ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है । प्रिया दत्त ने बगैर कहे भी सबकुछ कह दिया था । दरअसल कांग्रेस के नेता अपनी कमजोरियों को ढांपने के लिए राहुल की कमजोरी को अपनी ढाल बना लेते हैं । दिग्विजय सिंह बहुधा ज्ञान देते रहते हैं लेकिन गोवा कांग्रेस के नेता उनपर जो इल्जाम लगा रहे हैं उसपर ध्यान देने की जरूरत है । गोवा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने वाली कांग्रेस समर्थन का पत्र टाइप नहीं करवा पाई। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने उतने वक्त में ही समर्थन भी जुटा लिया और अपने रक्षा मंत्री का इस्तीफा दिलवाकर दावा भी पेश कर दिया। बावजूद इस भ्रम के दिग्विजय सिंह से किसी तरह की कोई पूछताछ की गई हो, लगता नहीं है ।

दरअसल कांग्रेस के नेताओं को यह लगता है कि उनकी पार्टी अपने बूते पर कम विपक्षी दलों की गलतियों की वजह से सत्ता में आती रही है । चाहे वो इमरजेंसी के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार की नाकामियां हो जिसकी वजह से उन्नीस सौ अस्सी में इंदिरा गांधी की वापसी हुई या फिर चौरासी में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर हो । या फिर 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद मिला जनादेश हो । इसी तरह से दो हजार चार में शाइनिंग इंडिया को लेकर भारतीय जनता पार्टी के आंकलन में हुई गलती से कांग्रेस को सत्ता मिली । अभी पंजाब भी इसका सर्वेत्तम उदाहरण है जहां अकालियों की वजह से कांग्रेस को सत्ता मिली । इस लंबे कालखंड में सत्ता मिलते रहने से कांग्रेस के नेता आराम तलब हो गए हैं । उनके ज्यादातर नेता जमीन से भी कटने लगे और उनको लगता है राज्यसभा का रूट सबसे अच्छा है, चुनाव लड़ना नहीं है लेकिन सत्ता सुख हासिल होता रहता है । संघर्ष से दूर होते जाने से पार्टी आम जनता से भी दूर होती चली गई । लोगों से उसका कनेक्ट लगभग खत्म हो गया । संसदीय प्रणाली में चुनावी जीत बहुत अहम होती है । दो हजार नौ से लेकर दो हजार बारह तक भारतीय जनता पार्टी के माहौल को भी याद करना चाहिए । कितनी निराशा थी, लेकिन उसी वक्त गुजरात से पार्टी को आशा की किरण दिखाई दी । नरेन्द्र मोदी ने अपने कुशल नेतृत्व से पार्टी को लगातार जीत दिलाई । अमित शाह जैसे कुशल संगठनकर्ता ने उस जीत को आगे बढ़ाया । अब अगर कांग्रेस को अपनी खोई जमीन हासिल करनी है तो उसको जमीन पर आना होगा । सोनिया और राहुल गांधी के बीच के पार्टी का असली बॉस कौन के भ्रम को भी दूर करना होगा ।  

Tuesday, December 27, 2016

भ्रम और उलझन के भंवर में कांग्रेस

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस वक्त उस दौर से गुजर रही है जहां नेतृत्व को लेकर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में एक भ्रम और उलझन लक्षित किया जा सकता है । सोनिया गांधी की बीमारी और राहुल गांधी को आगे बढ़ाने की रणनीति के तहत कांग्रेस अध्यक्षा ने खुद को नेपथ्य में रखा था । उनके नेपथ्य में रहने की वजह से पुरानी पीढ़ी के नेता स्वत: परिधि पर चले गए थे और राहुल गांधी के आसपास के नेता पार्टी के केंद्र में दिखाई देने लगे थे । यह संसद और उसके बाहर दोनों जगह पर साफ तौर पर देखा जा सकता था । सोनिया के नेपथ्य में जाने के बावजूद उनके इर्दगिर्द के नेता भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों लेकिन उनकी ताकत कम नहीं हुई थी । ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं का भाव बढ़ गया । इस परिस्थिति में नियमित अंतराल के बाद राहुल गांधी की पार्टी की कमान संभालने की खबरें आती रहती हैं । इस परिस्थिति में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बयान में एकरूपता नहीं दिखाई देती है । उदाहरण के तौर पर अगर हम हाल के बयानों और घटनाओं को देखें तो यह साफ दृष्टिगोचर होता है । हाल ही में जब थल सेनाध्यक्ष के तौर पर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति की गई तो उस मुद्दे पर भी कांग्रेस नेताओं के अलग अलग सुर सुनाई दिए थे । कांग्रेस के प्रवक्ता और पूर्व सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री मनी। तिवारी ने सरकार पर आरोप लगाया था कि लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को सेनाध्यक्ष नियुक्त करने में राजनीति की गई थी । उनके बयान के पहले कांग्रेस के महाराष्ट्र इकाई के सचिव शहजाद पूनावाला ने प्रधानमंत्री पर इल नियुक्ति में मुसलमान लेफ्टिनेंट जनरल की अनदेखी का आरोप लगाया था । मनीष तिवारी ने शहजाद के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था । मनीष तिवारी के बयान के बाद सत्यव्रत चतुर्वेदी ने बयान दिया कि सेना की नियुक्तियों पर राजनीति नहीं करनी चाहिए । अब तीन नेताओं के अलग अलग बयान ने पार्टी में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी । कार्यकर्ताओं के बीच जो संदेश गया वो भी भ्रमित करनेवाला था ।
इसी तरह से पिछले दिनों राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के किसानों की समस्या को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने पहुंच गए । उनके साथ कई युवा नेता थे, कहा तो यहां तक गया कि लोकसभा में पार्टी की संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को अंतिम वक्त में इस मुलाकात की जानकारी दी गई और उनको आने को कहा गया । वो भागे भागे वहां पहुंचे थे । राहुल गांधी से प्रधानमंत्री की इस मुलाकात की रूपरेखा उनके एक युवा सांसद साथी ने तैयार की थी और वरिष्ठ नेताओं को इसकी जानकारी मुलाकात का वक्त मिलने के बाद दी गई । अब इस मुलाकात को लेकर भी पार्टी में अलग अलग राय सामने आ रही है । कुछ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी जब नोटबंदी का विरोध कर रहे थे और धीरे-धीरे अन्य विपक्षी दलों के नेता उनके साथ आते दिख रहे थे वैसे में प्रधानमंत्री से सिर्फ अपनी पार्टी के नेताओं से मिल आना विपक्षी एकता के प्रयासों को झटका दे गया । इस बात में दम भी है क्योंकि उसके बाद एक बार फिर से विपक्षी दल अलग अलग राह पर चलते नजर आने लगे । पार्टी के हलकों में तो दबी जुबान में ये आरोप भी लग रहे हैं कि जिस युवा नेता ने ये मुलाकात तय करवाई या इसकी योजना बनाई उनके भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री से अच्छे संबंध हैं और ये भारतीय जनता पार्टी की एक सियासी चाल थी विपक्ष के आसन्न एका को रोकने की ।

दरअसल अगर हम देखें तो दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के बाद ही राहुल गांधी को कमान सौपने की मांग के बाद से यह भ्रम की स्थिति बनी हुई है । इस भ्रम ने दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डुबोई थी । सात आठ साल से यह स्थित बनी हुई है और पिछले आम चुनाव में पार्टी की हार के बाद यह और बढ़ गया है । प्रशांत किशोर को उत्तर प्रदेश में रणनीति बनाने के काम को लेकर भी भ्रम बना रहा । शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश का चेहरा बनाने और फिर उनको किनारा कर देने का फैसला भी एक तरह से भ्रमित फैसले की परिणति ही कही जा सकती है । इसी तरह से अगर हम देखें तो राज बब्बर को यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद अब अखिलेश यादव के साथ गठबंधन की बात की जा रही है । रणनीतिकार ये भूल गए कि अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल को राज बब्बर ने हराया था और ये फांस अब भी अखिलेश के दिल में है । अगर यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में गठबंधन होता है तो राज बब्बर का हाशिए पर जाना लगभग तय माना जाना चाहिए । अब एक बार फिर एक फैसले हुआ है जिससे कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के समर्थकों के बीच रस्साकशी सामने आ सकती है । नोटबंदी पर देशव्यापी विरोध की रणनीति तय करने के लिए सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की अगुवाई में कमेटी बनाई गई है जिसके संयोजक राहुल के सिपहसालार रणदीप सिंह सुरजेवाला हैं । नोटबंदी पर विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक सोनिया ने बुलाई । इस तरह के फैसलों का असर संगठन पर पड़ता है जो दिख भी रहा है ।  
(नेशनलिस्ट आनलाइन- 27.12.2016)