Translate

Showing posts with label सुषमा स्वराज. Show all posts
Showing posts with label सुषमा स्वराज. Show all posts

Saturday, September 1, 2018

भाषा को तकनीक से जोड़ने का संकल्प


मॉरीशस में हाल ही में संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। सुषमा स्वराज ने कहा कि पूर्व में हुए ज्यादातर विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी साहित्य पर केंद्रित होते थे और सत्रों की संरचना उसी हिसाब से की जाती थी। उनका मानना था कि ‘हिंदी में उच्च कोटि का साहित्य रचा जा रहा है लेकिन अगर भाषा की समझ खत्म हो जाएगी तो पढ़ेगा कौन? इसलिए भोपाल के दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी भाषा को बढ़ाने, बचाने और उसकी शुद्धता को बरकरार रखने की कोशिश शुरू की गई थी। हिंदी के संवर्धन और उसकी शुद्धता को बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी भारत की है।‘ भाषा को साहित्य के दायरे से निकालकर विस्तार देने की कोशिश का दावा किया गया। मॉरीशस में आयोजित सम्मेलन में भाषा को और आगे ले जाकर संस्कृति के साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। भाषा और संस्कृति में तो बहुत मजबूत रिश्ता होता है। जिस समाज में भाषा का लोप होता है वहां संस्कृति के लोप का भी खतरा उत्पन्न हो जाता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कहा था- ‘जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वो अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुकरण करने लगती है।..जब वो मन ही मन अपने को हीन और दूसरो को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है। पारस्परिक आदान प्रदान तो संस्कृतियों का स्वाभाविक धर्म है, किंतु जहां प्रवाह एकतरफा हो वहां यही कहा जाएगा कि एक जाति दूसरी जाति की सांस्कृतिक दासी हो रही है। किन्तु सांस्कृतिक गुलामी का इन सबसे भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा को अपना लेती है और उसी में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगती है। यह गुलामी की पराकाष्ठा है, क्योंकि जो जाति अपनी भाषा में नहीं सोचती, वह परंपरा से छूट जाती है और उसके स्वाभिमान का प्रचंड विनाश हो जाता है।‘ दिनकर ने उपरोक्त चार पांच पंक्तियों में भाषा और संस्कृति के गहरे संबंध को रेखांकित किया है और इससे असहमति की कोई वजह नजर नहीं आती है। उन्होंने हिंदी भाषी लोगों के अंग्रेजी प्रेम पर परोक्ष रूप से तंज भी कसा था जब वो अन्य भाषा में तुतलाने की बात कर रहे थे। इस लिहाज से अगर देखें तो भाषा को साहित्य के दायरे से बाहर निकालकर उसको संस्कृति से जोड़ने की कोशिश करना या उसपर मंथन करना विश्व हिंदी सम्मेलन की सार्थकता मानी जा सकती है। 28 से 30 अगस्त 1976 तक मॉरीशस में ही आयोजित दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन की अंतिम गोष्ठी में डॉ हजरी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था, ‘यह जो विश्व हिंदी सम्मेलन है, इसका अभी दूसरा ही वर्ष है। बहुत बालक भी नहीं शिशु है।अभी तो यह पैदा ही हुआ है, एक दो साल का बच्चा है। लेकिन इसको देखकर लगता है कि एक महान भविष्य का द्वार उनमुक्त हो रहा है।‘ बताते चलें कि पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 से 12 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। द्विवेदी जी के इस कथन पर गंभीरता से विचार करना होगा कि दो सम्मेलनों के बाद विश्व हिंदी सम्मेलनों में क्या हुआ और उसने जो राह पकड़ी उससे भाषा को कितनी समृद्धि मिली क्योंकि वो ‘बालक’ अब तैंतालीस साल का युवक हो चुका है।  
ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को तकनीकी रूप से समृद्ध करने की पहल दिखाई देती है, यह पहल भोपाल में आयोजित दसवें सम्मेलन में भी दिखाई दी थी। उसके पहले भी छिटपुट रूप से इस पर चर्चा होती रही है। ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भी तकनीक को लेकर बहुत दावे किए गए और भविष्य के लिए अपेक्षाओं का अंबार भी पेश किया गया। अशोक चक्रधर ने बहुत सटीक टिप्पणी तकनीक और भाषा को लेकर की। उन्होंने कहा कि आप ‘एसएमएस’ लेकर आइए, उससे किसी का कोई विरोध नहीं है लेकिन जब ‘एसएमएस’ हमारे ‘संदेश’ की हत्या कर ना आए। अगर यह हमारे ‘संदेश’ की हत्या कर आगे बढ़ता है तो हिंदी के लोगों को उसका विरोध करना चाहिए। इस बात पर भी लंबी चौड़ी बहस होती रही है कि तकनीक अपने साथ अपनी भाषा लेकर चलती है। चले लेकिन तकनीक की भाषा हमारी हिंदी को नेपथ्य में ना डाल दे। कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि हिंदी तकनीक को अपनाए और तकनीक भी हिंदी को अपनाए। ये हो रहा है पर अपेक्षित रफ्तार से नहीं जिसकी वजह से तकनीक तो भाषा पर हावी होती जा रही है पर तकनीक में हिंदी भाषा के उपयोग का अनुपात वो नहीं है जो होना चाहिए। विश्व हिंदी सम्मेलन के सत्रों में तो भाषा को लेकर तकनीक के उपयोग पर जोर दिया गया लेकिन खुद सम्मेलन की बेवसाइट या सोशल मीडिया पर सम्मेलन के सत्रों की उपस्थिति बहुत कम रही। बेवसाइट को अपडेट करने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया. ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से वृहत्तर हिंदी भाषी समाज को जोड़ने की कोशिश नहीं हुई। विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के विकास पर भी चर्चा हुई। ‘कंठस्थ’, ‘लीला’, ‘प्रवाह’ जैसे तरह के सॉफ्टवेयर के उद्घोष के साथ ‘डिजीटल इंकलाब’ का नारा भी लगाया गया। अगर हिंदी अपने साथ अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर चलने लगे तो यह स्थिति बहुत अच्छी होगी। हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषाओं के मन में जो आशंका है वो दूर होगी। प्रौद्योगिकी के माघ्यम से अगर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच सामंजस्य या आवाजाही का माहौल बन सकता है तो यह स्थिति सबके लिए लाभप्रद होगी, हिंदी का भी शब्द भंडार बढ़ेगा और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों में भी बढोतरी होगी। समाज से भाषाई कटुता खत्म होगी और उसपर होनेवाली राजनीति भी बंद हो सकेगी।
विश्व हिंदी सम्मेलन हो और उसमें हिंदी को विश्वभाषा बनाने का और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने पर चर्चा ना हो यह संभव ही नहीं है। पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में भी इसकी चर्चा हुई थी और वहां हिंदी को आधिकारिक भाषा नहीं माने जाने पर विनावा भावे ने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा था कि ‘यूएनओ में स्पेनिश को स्थान है, अगरचे स्पेनिश बोलने वाले पंद्रह-सोलह करोड़ ही हैं। हिंदी का यूएनओ में स्थान नहीं है यद्यपि उसके बोलनेवालों की संख्या लगभग छब्बीस करोड़ है।‘  कालांतर में लगभग सभी हिंदी सम्मेलनों में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने का संकल्प लिया जाता रहा। इस बार भी सुषमा स्वराज ने इसका जिक्र किया लेकिन साथ ही इसको लेकर व्यावहारिक दिक्कत बताई। उन्हेंने कहा कि अगर यूएन हिंदी को आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता देता है तो उसपर आनेवाले खर्च को सभी सदस्य देशों को वहन करना पड़ेगा। इस नियम को लेकर कठिनाई आ रही है। लेकिन विदेश मंत्री ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा की सूची में शामिल करवाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। दरअसल संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषाई संवेदनशीलता का मुद्दा है जिसको कोई भी सरकार छोड़ना नहीं चाहती। आज भी अटल बिहारी वाजपेयी का संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में दिए गए पहले भाषण की खूब चर्चा होती है।   
ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में जिस तरह की अनुशंसाएं आई हैं या जो संकल्प लिया गया है अगर उसपर दस फीसदी भी काम हो सका तो हिंदी के लिए बेहतर होगा। अपेक्षा यह करनी चाहिए कि काम जमीन तक पहुंचे सिर्फ फाइलों, स्मारिकाओं और पुस्तकों में ना रहे। इससे भाषा मजबूत होगी और भाषा मजबूत होगी तो संस्कृति को मजबूlr मिलेगी और इन दोनों की मजबूती से राष्ट्र शक्तिशाली होगा।

Sunday, April 10, 2016

विलाप से नहीं होगा भला !

अभी पिछले दिनों दिल्ली में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग की चिंता को लेकर एक बैठक की । इस बैठक में विश्वविद्यालय के कुलपति और शिक्षकों के साथ संपादकों और संवाददाताओं की उपस्थिति रही । अहम बात ये रही कि बैठक में पूरे वक्त विदेश मंत्री सुषमा स्वराज मौजूद रहीं । उन्होंने संपादकों समेत वहां मौजूद कई लोगों की बातें पूरे मनोयोग से सुनीं और अपना पक्ष रखा । दरअसल ये बैठक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक सर्वे के आधार पर की गई थी । पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने सात हिंदी अखबारों का कई दिनों तक अध्ययन किया और फिर उसके आधार पर पंद्रह हजार सात सौ सैंतीस अंग्रेजी के शब्दों को चिन्हित किया जो अखबारों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं । अंग्रेजी के इन शब्दों का पांच श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया है और एक श्रेणी अंग्रेजी के वैसे शब्दों की है जिसका उपयोग बाजिब माना गया । इस सर्वेक्षण की सबसे बड़ी खामी ये रही कि इसने एक वैसे अखबार को शामिल नहीं किया जो सबसे ज्यादा अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करता है ।  हिंदी को लेकर ये विचार विनिमय जरूरी है और केंद्र सरकार का एक बड़ा मंत्री अगर पूरे वक्त मौजूद रहे तो इससे उसकी गंभीरता और बढ़ जाती है । विचार विनिमय का हमेशा स्वागत होता है लेकिन जब इस विनिमय ये निकले निचोड़ को हकीकत में बदला जाता है तब भाषा को मजबूती मिलती है । गोष्ठियों और सेमिनारों में हिंदी को लेकर विलाप करनेवाले यह भूल जाते हैं कि हिंदी का भला छाती कूटने और अंग्रेजी को कोसने से नहीं होगा । हम हिंदी वालों को ये आत्म मंथन करना होगा कि हमने हिंदी के लिए क्या किया । क्या हमने हिंदी को नए शब्द देने का उपक्रम किया । क्या हमने हिंदी को नए सिरे से नई पीढ़ी के सामने पेश करने का कोई उद्यम किया । आज हालात यह है कि हिंदी में अरविंद कुमार के समांतर कोश के बाद किसी भी कोश पर गंभीरता से काम नहीं हुआ । जिस किसी को कोश का काम सौंपा गया उसने बेहद चलताऊ तरीके से ये काम किया । प्रोज्क्ट पूरा हुआ, पैसे मिले और राम राम । अब भी हरदेव बाहरी और फादर कामिल बुल्के का हिंदी शब्दकोश ही प्रामाणिक तौर पर हमारे सामने है । हिंदी से कोशकार शब्द ही मानो गायब हो गया । बदलते वक्त और परिवेश के मुताबिक हिंदी में नए शब्द नहीं गढ़े जा रहे हैं । अंग्रेजी का एक शब्द है स्मॉग । अब इसके लिए हिंदी में कोई शब्द सूझता नहीं है । इसके लिए कुछ उत्साही युवा मित्रों ने धुंधूषण शब्द गढ़ा लेकिन ये परवान नहीं चढ़ सका । क्रोनी कैपिटलिज्म के लिए कुछ लोगों ने चंपू पूंजीवाद शब्द चलाने की कोशिश की लेकिन वो भी नहीं चला । कोश और नए शब्दों की कमी हिंदी को अंग्रेजी की ओर ले जाती है । अंग्रेजी के कोश हर साल कुछ नए शब्दों को लेकर आते हैं लेकिन वैसी व्यवस्था हिंदी में बन नहीं पा रही है । इसके अलावा हिंदी की शुद्धता और दूसरी भाषाओं पर इसकी श्रेष्ठता के पैरोकार भी इसका नुकसान कर रहे हैं । हिंदी के ज्यादा उपयोग को लेकर जोरदार तरीके से अपनी बात कहनेवाले भूल जाते हैं कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं में एक भय व्याप्त हो जाता है और वो हिंदी को अपना दुश्मन समझने लगती है । इसके लिए एक ही उदाहरण काफी है कि साहित्य अकादमी स्थापना के पांच दशक से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी मौजूदा अध्यक्ष पहली बार हिंदी से आए हैं । जब भी हिंदी का कोई शख्स चुनाव में खड़ा होता है तो तमाम भारतीय भाषा के प्रतिनिधि उसके खिलाफ एकजुट हो जाते हैं । इन सब बातों का भी ध्यान रखना होगा ताकि हिंदी भारतीय भाषाओं की सहोदर भाषा के रूप में अपना विकास कर सके ।   
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि सरकार का धर्म है कि वह काल की गति को पहचाने और युगधर्म की पुकार का बढ़कर आदर करे । दिनकर ने यह बात साठ के दशक में संसद में भाषा संबंधी बहस के दौरान कही थी । अपने उसी भाषण में दिनकर ने एक और अहम बात कही थी जो आज के संदर्भ में भी एकदम सटीक है । दिनकर ने कहा था कि हिंदी को देश में उसी तरह से लाया जाना चाहिए जिस तरह से अहिन्दी भाषी भारत के लोग उसको लाना चाहें । यही एक वाक्य हमारे देश में हिंदी के प्रसार की नीति का आधार है भी और भविष्य में भी होना चाहिए । साठ के दशक में जब दक्षिण भारत में हिंदी के खिलाफ हिंसक आंदोलन हुए थे तब भी और उसके पहले भी सबों की राय यही बनी थी कि हिंदी का विकास और प्रसार अन्य भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने से ही होगा, थोपने से नहीं । महात्मा गांधी हिंदी के प्रबल समर्थक थे और वो इसको राष्ट्रभाषा के तौर पर देखना भी चाहते थे लेकिन गांधी जी ने भी कहा भी था कि हिंदी का उद्देश्य यह नहीं है कि वो प्रांतीय भाषाओं की जगह ले ले । वह अतिरिक्त भाषा होगी और अंतरप्रांतीय संपर्क के काम आएगी ।
हमारा देश फ्रांस या इंगलैंड की तरह नहीं है जहां एक भाषा है । विविधताओं से भरे हमारे देश में दर्जनों भाषा और सैकड़ों बोलियां हैं लिहाजा यहां एक भाषा का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता है । इतना अवश्य है कि राजकाज की एक भाषा होनी चाहिए । आजादी के पहले और उसके बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की कोशिश हुई लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध के चलते वह संभव नहीं हो पाया । हिंदी राजभाषा तो बनी लेकिन अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा । जनता की भाषा और शासन की भाषा अलग रही । ना तो हिंदी को उसका हक मिला और ना ही अन्य भारतीय भाषाओं को समुचित प्रतिनिधित्व । हिंदी के खिलाफ भारतीय भाषाओं को खड़ा करने में अंग्रेजी प्रेमियों ने नेपथ्य से बड़ी भूमिका अदा की थी । यह अकारण नहीं था कि बांग्ला भाषा के तमाम लोगों ने आजादी पूर्व हिंदी भाषा का समर्थन किया था । चाहे वो केशवचंद्र सेन की स्वामी दयानंद को सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखने की सलाह हो या बिहार में भूदेव मुखर्जी की अगुवाई में कोर्ट की भाषा हिंदी करने का आंदोलन हो । जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हुई तो बंगला के लोग अपनी साहित्यक विरासत की तुलना हिंदी से करते हुए उसे हेय समझने लगे थे । जहां के चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिंदी के विकास के लिए अनथक प्रयास किया वहीं के तमिल भाषी अपने महाकाव्यों की दुहाई देकर हिंदी को नीचा दिखाने लगे । अंग्रेजी के पैरोकारों ने ऐसा माहौल बनाया कि हिंदी को अन्य भारतीय भाषा के लोग दुश्मन की तरह से समझने और उसी मुताबिक बर्ताव करने लगे । आज अंग्रेजी उन्हीं अन्य भारतीय भाषाओं के विकास में सबसे बड़ी बाधा है । इस बात को समझने की जरूरत है।

आज हिंदी बगैर किसी सरकारी बैसाखी के खुद लंबा सफर तय कर चुकी है और विंध्य को लांघते हुए भारत के सुदूर दक्षिणी छोर तक पहुंच चुकी है और पूर्वोत्तर में भी यह धीरे धीरे लोकप्रिय हो रही है । सरकार अगर सचमुच हिंदी के विकास को लेकर संजीदा है तो उसको सभी भारतीय भाषाओं के बीच के संवाद को तेज करना होगा । एक भाषा से दूसरी भाषा के बीच के अनुवाद को बढ़ाना होगा । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय नेएक पहल की है उसको आधार बनाकर आगे बढ़ना होगा  सरकार को साहित्य अकादमी की चूलें कसने के तरीके ढूंढने होंगे । साहित्य अकादमी के गठन के वक्त उद्देश्य था कि वो भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय का काम करेगी । लेकिन कालांतर में साहित्य अकादमी ने साहित्य में अपना रास्ता तलाश लिया और भाषाओं के समन्वय का काम छोड़ दिया । एक भाषा से दूसरी भाषा के बीच अनुवाद का काम भी अकादमी कितनी गंभीरता से करती है इसपर बात होनी चाहिए । अकादमी बनने से भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय को भी कसौटी पर कसा जाना चाहिए । साहित्य अकादमी के राजनीति का अखाड़ा बनने और वामपंथियों के दबदबे की वजह से नतीजा यह हुआ कि अन्य भारतीय भाषाओं की हिंदी को लेकर शंकाए दूर नहीं हो पाईं । अगर हम हिंदी के लोग और सरकार सचमुच इसके विकास को लेकर गंभीर हैं तो हमें गंभीरता से भारतीय भाषाओं को स्पेस देना होगा । हिंदी के विकास में बोलियों की भी अहम भूमिका है । हिंदी के शुद्धतावादी जब बोलियों से हिंदी को अलग कर देखने की कोशिश करते हैं तो हिंदी की ताकत को कम करते हैं । क्या भोजपुरी, अवधी या अन्य बोलियों से हिंदी को अलग किया जा सकता है । अन्य भारतीय भाषाओं के साथ बोलियों के सहयोग से हिंदी मजबूत होगी । अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिंदी में शामिल किए जाने से परहेज नहीं किया जाना चाहिए । अंग्रेजी की ही तरह हर साल शब्दकोश के नए संस्करण आएं जिनमें नए नए शब्द हों तभी हिंदी का भला होगा अन्यथा तो इस तरह के शोध और सेमिनार आदि तो सालों से हो ही रहे हैं । 

Saturday, May 31, 2014

हिंदी के भी अच्छे दिन !

हमारे देश, खास हिंदी भाषी राज्यों से और हिंदी प्रेमियों की तरफ से यह बात लगातार उठाई जाती रही है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाएं । यह एक बड़ी विडंबना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की अधिसंख्यक जनता द्वारा बोली जानेवाली भाषा राष्ट्रों के संगठन में मान्यता प्राप्त नहीं है, जबकि अरबी जैसी कई अन्य भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता प्राप्त है । आजादी के बाद से ही उठ रही इस मांग को लेकर सरकारें समय समय पर बयान देती रही हैं । सरकार के उन बयानों से जो भावर्थ निकलता रहा है वह यह है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए भारत सरकार गंभीरता से प्रयासरत है । अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में अपना संबोधन दिया था तब से इस मांग ने और जोर पकड़ा था । एनडीए की सरकार के दौरान हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में इस तरह का प्रसातव भी पारित किया गया था । लेकिन हाल ही में विदेश मंत्रालय ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में बताया है कि सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए कोई प्रस्ताव नहीं भेजा है । विदेश मंत्रालय की दलील है कि अगर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा का आधिकारिक दर्जा मिल जाता है तो एक अनुमान के मुताबिक सरकार को हर साल तकरीबन बयासी करोड रुपए या उससे अधिक खर्च करने होंगे । विदेश मंत्रालय का मानना है कि अगर भारत इस तरह का प्रस्ताव करता है तो संयुक्त राष्ट्र के नियमों के मुताबिक उसको वित्तीय सहायता देनी होगी । यह वित्तीय सहायता अनुवाद और हिंदी में दस्तावेजों को छपवाने में आने वाले खर्च के मद्देनजर देना होगा । उन्नीस सौ तिहत्तर में संयुक्त राष्ट्र में पारित एक प्रस्ताव के मुताबिक किसी भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रस्तावक राष्ट्र को उस भाषा के अनुवाद करवाने , उसे छपवाने आदि पर आनेवाले खर्च का वहन करना होगा । भारत सरकार के विदेश मंत्रालय का यह तर्क गले नहीं ऊतर रहा है । देश की राजभाषा को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान और मान्यता दिलवाने के लिए बयासी करोड़ सालाना खर्च का तर्क बेमानी है । सिर्फ बयासी करोड़ या मान लिया जाए कि सौ करोड़ सालाना के खर्च से बचने के लिए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रस्तावित नहीं करना देश के करोड़ों हिंदी भाषियों के लिए झटके की तरह है । हिंदी प्रेमियों के अलावा किसी देश की भाषा को अंतराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता उस देश के गौरव के साथ जुड़ा होता है । भारत जैसे विशाल देश के लिए हिंदी के गौरव के लिए सौ करोड़ सालाना खर्च करना बहुत मामूली काम है । हर साल हिंदी दिवस के मौके पर सरकार के विभिन्न विभाग और सार्वजनिक उपक्रम की कंपनियां करोड़ों फूंक देती हैं और उससे कुछ हासिल नहीं होता है । हिंदी दिवस के अवसर पर होनेवाली रस्म अदायगी में ही अगर कटौती कर दी जाए तो सौ करोड़ से ज्यादा की बचत संभव है ।
केंद्र में सरकार के बदलने और शपथ ग्रहण के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत ज्यादातर मंत्रियों ने हिंदी में शपथ ली, यहां तक उत्तर पूर्व से आनेवाले गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने भी शपथ ग्रहण के दौरान हिंदी भाषा को अपनाकर एक मिसाल पेश किया है। मोदी मंत्रिमंडल के शपथग्रहण समारोह और मोदी के हिंदी भाषा के प्रति रुझान को देखते हुए इस बात की उम्मीद जगी है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता प्राप्त भाषा के तौर पर मान्यता दिलवाने के लिए केंद्र सरकार बयासी करोड़ रुपए सालाना खर्च करने को तैयार हो जाएगी । विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का भी हिंदी के प्रति अनुराग सार्वजनिक तौर पर ज्ञात है । सुषमा स्वराज ज्यादातर वक्त संसद में भी हिंदी में ही बोलती रही हैं और उनकी हिंदी है भी बेहतरीन । प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की संयुक्त कोशिश से अगर यह संभव होता है तो हिंदी भाषा के अलावा हिंदी प्रेमियों के लिए भी यह गौरव का क्षण होगा । नरेन्द्र मोदी प्रतीकों को लेकर खासे सजग रहते हैं और माना जाता है कि प्रतीकों की राजनीति में उनको महारथ हासिल है । प्रतीकों के माध्यम से जनता को संदेश देने का उनका अपना एक खास अंदाज है ।  अब अगर भारत के प्रधानमंत्री प्रतीकात्मक तौर पर भी अगर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनवाने के लिए बयासी करोड़ का फंड आगामी आम बजट में रखवाने का उपक्रम करते हैं तो हिंदी को सालों बाद उसका देय हासिल हो पाएगा । हिंदी के फैलाव के लिए की जा रही कोशिशों को बल भी मिलेगा ।
दो हजार बारह में जोहानिसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में पहली बार इस आशय का प्रसातव पास किया गया कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए समयबद्ध योजना पर काम किया जाएगा । जोहानिसबर्ग विश्व हिंदी सम्मेलन को आयोजित हुए लगभग डेढ़ साल बीत गए हैं । अब विदेश मंत्रालय का खर्चे की बिनाह पर इससे इंकार विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान पारित प्रस्ताव का अपमान भी है । जोहानिसबर्ग में विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान जब प्रस्ताव पारित हो रहा था तब उस वक्त की विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर वहां मौजूद थीं । बावजूद उसके विदेश मंत्रालय का ये रवैया समझ से परे है । दरअसल विदेश मंत्रालय में हिंदी को लेकर एक खास किस्म की उदासीनता का वातावरण है । वहां अंग्रेजी का बोलबाला है । अब सुषमा स्वराज के कैबिनेट मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह के विदेश राज्यमंत्री बनने के बाद यह आस जगी है कि अंग्रेजी का बोलबाला खत्म तो नहीं होगा लेकिन हिंदी को भी तवज्जो मिलेगी । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश के आजाद होने के फौरन बाद हरिजन में लिखे एक लेख में कहा था- मेरा आशय यह है कि जिस प्रकार हमने सत्ता हड़पने वाले अंग्रेजों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका उसी तरह हमें सांसकृतिक अधिग्रहण करनेवाली अंग्रेजी को हटा देना चाहिए । इस आवश्यक परिवर्तन में जितनी देरी हो जाएगी, उतनी ही राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती चली जाएगी ।  आजादी के सड़सठ साल बाद भी महात्मा गांधी के उस कथन पर अमल नहीं हो सका । मंत्रालयों से अभी तक हम अंग्रेजी के वर्चस्व को खत्म नहीं कर पाए हैं नतीजा है कि हिंदी को अब तक उसका देय नहीं मिल पाया है । तकरीबन हर मंत्रालय में हिंदी को दोयम दर्जा हासिल है । कहने को वो राजभाषा अवश्य है लेकिन अगर हम अंग्रेजी के बरक्श उसको खड़ा करके देखते हैं तो बहुत ही निराशाजनक तस्वीर हमारे सामने उभरती है । एक ऐसी तस्वीर जिसको देखकर हिंदी प्रेमियों का सर शर्म से झुक जाना चाहिए ।

दरअसल आजादी के बाद माहौल कुछ ऐसा बना कि हिंदी को अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषा के दुश्मन की तरह पेश कर दिया गया । अंग्रेजी के लोगों ने सुनियोजित तरीके से यह बात फैलाई कि अगर हिंदी का वर्चस्व बढ़ा तो अन्य भारतीय भाषा खत्म हो जाएगी । नतीजा यह हुआ कि अन्य भारतीय भाषा के लोगों ने हिंदी का विरोध शुरू कर दिया, उनको हिंदी में अपना दुश्मन नजर आने लगा । जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हुई तो देश के कई राज्यों में हिंसक विरोध हुए । हिंदी के इस विरोध ने अन्य भाषाओं को अंग्रेजी के करीब पहुंचा दिया । जो हिंदी देश की संपर्क भाषा हो सकती थी उसको अंग्रेजी ने अन्य भारतीय भाषाओं की सम्मिलित ताकत से पछाड़ दिया । अन्य भारतीय भाषओं को हिंदी को गले लगाकर सहोदर भ्राता की तरह से प्रेम करना होगा । इस दिशा में साहित्य अकादमी की एक भूमिका हो सकती है लेकिन अकादमी में जिस तरह से काम काज हो रहा है उससे बहुत उम्मीद तो नहीं जगती है । साहित्य अकादमी में हर भारतीय भाषा के प्रतिनिधि होते हैं उनके साथ मिल बैठकर ये माहौल बनाया जा सकता है । इसके लिए अकादमी के आकाओं को पहल करनी होगी । अगर ऐसा होता है तो हिंदी के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भी ताकत मिलेगी । इसके अलावा अगर सरकारी स्तर पर मोदी सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनवाने के गंभीर प्रयास करती है तो हिंदी को विश्व भाषा का दर्जा हासिल होगा । हिंदी अब बाजार की भाषा बन चुकी है । बाजार ने उसको अपना लिया है आवश्यकता इस बात की है कि हमारे देश की सरकार हिंदी को तहेदिल से अपनाए और उसके विकास और संवर्धन के लिए होनेवाले खर्च को उसकी राह का रोड़ा नहीं बनने दे । अगर मोदी की अगुवाई वाली सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनवाने में कामयाब हो जाती है तो जिस तरह से लोग अब भी अचल बिहारी वाजयेपी को याद करते हैं उसी तरह से मोदी भी इतिहास में दर्ज हो जाएंगे । 

Saturday, January 5, 2013

राजनीति का दिवालियापन

उन्नीस सौ पैंसठ की जनवरी की बात है – तब यह तय किया गया था कि 26 जनवरी को अंग्रेजी की जगह हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का ऐलान किया जाएगा । दक्षिणी राज्यों के हुक्मरान इस बात के लिए तैयार भी हो गए थे लेकिन जनता में इस बात को लेकर गहरा रोष था कि हिंदी उनपर थोपी जा रही है । लिहाजा तमिलनाडु में हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे थे । तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री इंतजार करो और देखो की रणनीति अपना कर चुप बैठे थे । लेकिन मद्रास में हालात बेकाबू हो रहे थे और प्रदर्शनकारी लगातार उग्र हो रहे थे और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे । उस वक्त तमिलनाडू कांग्रेस के दिग्गज के कामराज की भी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि वो तमिलनाडु के हिंसाग्रस्त इलाकों में जाएं और वो दिल्ली में ही रुके थे । ऐसे हालात में इंदिरा गांधी ने फैसला लिया कि वो तमिलनाडु जाएंगी । वो वहां पहुंच गई और मद्रास में प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर उनसे बात की । उनकी मांगों को सुना और उन्हें जितना हो सकता है वो करने का आश्वासन दिया । इतिहास इस बात का गवाह है कि इंदिरा गांधी के मद्रास पहुंचने और आंदोलनकारियों से बात करने का जबरदस्त असर हुआ और हिंसा की आग में जल रहा मद्रास एकदम से शांत हो गया ।
पिछले दिनों दिल्ली में एक मेडिकल छात्रा के साथ गैंग-रेप के दौरान इंडिया गेट और राजपथ पर लोगों के प्रदर्शन के दौरान इंदिरा गांधी और मद्रास आंदोलन का प्रसंग शिद्दत से याद आ रहा था । गैंगरेप के खिलाफ जब आंदोलन अपने चरम पर था तो सोनिया गांधी ने जरूर अपने घर के बाहर निकलकर गेट पर चंद मिनट आंदोलनकारियों से बात चीत की थी । उनसे बातचीत भी हुई थी लेकिन अगले दिन उनके कारकुनों ने जिन छात्रों को उनसे मिलवाया उनके परिदृश्य से गायब होने से सोनिया की पहल हवा हो गई । इसके अलावा आंदोलन के काफी दिनों बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जंतर मंतर पर पहुंची थी । यह अलग बात है कि तबतक काफी देर हो चुकी थी और आंदोलनकारियों ने उन्हें वहां रुकने की इजाजत नहीं दी । देर ही सही शीला दीक्षित ने यह साहस तो दिखाया कि वो आंदोलनकारियों के बीच जाएं । गैंगरेप के खिलाफ लगभग हफते भर तक इंडिया गेट और विजय चौक पर जमा लोगों से मिलने के लिए किसी भी दल का राजनेता नहीं पहुंचा । उम्मीद तो सत्ता पक्ष के नेताओं से काफी थी कि कोई वहां पहुंचकर आक्रोशित आंदोलनकारियों से बात करेगा । लेकिन कांग्रेस का कोई नेता यह साहस नहीं दिखा पाया जबकि दिल्ली की सातों लोकसभा सीट से कांग्रेस के पार्टी के ही सांसद हैं । यहीं से एक सांसद महिला एवं बालविकास मंत्रालय की मंत्री हैं । आंदोलनकारियों से राजनीतिक तौर पर निबटने की बजाए उन्हें दिल्ली पुलिस के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया ।
सत्तपक्ष से तो अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में चूक हुई ही, विपक्षी दल भी अपनी भूमिका के निर्वहन में नाकाम रहे । देश की मुख्य विपक्षी पार्टी , भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने अपने घरों से चंद मीटर की दूरी पर हो रहे प्रदर्शन में शामिल होने की बात तो दूर आंदोलनकारियों से बात तक करने की जहमत नहीं उठाई । लोकसभा में विपक्ष की नेता और भारतीय जनता पार्टी में प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश पाले सुषमा स्वराज सिर्फ ट्विटर पर बयानबाजी करती नजर आई । सुषमा जी ने अपनी पोजिशनिंग एक ऐसी भारतीय नारी की बनाई है जो तमाम भारतीय परंपराओं का पालन करती हुई भी राजनीति के शीर्ष पर ना केवल पहुंची है बल्कि वहां लंबे समय से जमी हुई हैं । जब भी जनता के बीच जाने की बात आती है तो सुषमा जी कहीं नजर नहीं आती है । गैंग रेप के मामले में लगातार ट्विटर पर अपनी बात कहने वाली सुषमा स्वराज का ज्यादा जोर संसद का विशेष सत्र बुलाने को लेकर था । क्या हमारे देश के आज के नेताओं को लगता है कि जनता के बीच जाने का सबसे बेहतरीन जरिया संसद है । संसद जनता की समस्याओं को उठाने का मंच हो सकता है लेकिन संसद जनता से संवाद कायम करने का माध्यम नहीं हो सकता है । आज बीजेपी के नेताओं को लगने लगा है कि संसद में साल में दो बार लच्छेदार भाषण देकर, जिसे देशभऱ के तमाम न्यूज चैनल एक साथ चलाते हैं, जनता पर चमत्कारिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है । बीजेपी के दूसरे कद्दावर नेता और प्रधानमंत्री पद के एक और सुयोग्य उम्मीदवार अरुण जेटली भी इस पूरे आंदोलन के दौरान कहीं नजर नहीं आए । जेटली साहब भी शानदार वक्ता हैं लेकिन जनता से सीधे संवाद कायम करने में उनकी कोई रुचि दिखाई नहीं देती है । मुझे उस वक्त का एक वाकया याद आ रहा है जब भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने कोलकाता से जम्मू तक की भारत एकता यात्रा की थी तब जम्मू  में उसमें शरीक होने पर अरुण जेटली को हिरासत में लिया गया था । उस वक्त बीजेपी की तरफ से जो खबरें आ रही थी उसमें इस बात पर जोर दिया जा रहा था कि जेटली साहब को हिरासत में लेकर जिस कार में बैठाया गया है उसमें एयरकंडीशनर नहीं लगा है । यह हमारे देश के विपक्ष के नेताओं की एयरकंडीशनर राजनीति की मानसिकता का उत्स था । भारतीय जनता महिला मोर्चा की अध्यक्षा स्मृति ईरानी न्यूज चैनलों पर संघर्ष करती नजर आई लेकिन लोगों के बीच जाने का साहस उनमें भी नहीं था ।
हमारे देश में आजादी के बाद से ही वामपंथी पार्टियों ने अपने आपको जन और वाद का रहनुमा बताया और कई मौकों पर वाम दलों ने आंदोलनों की रहनुमाई की लेकिन दिल्ली गैंगरेप के मुद्दे पर उनके नेता भी जनता के साथ खड़े नहीं दिखे । लोक और जन की भलाई और उनके बीच समानता के सिद्धांतों की बुनियाद पर खड़ी ये पार्टियां भी जन और लोक की भावनाओं को समझने में बुरी तरह से नाकाम रही । गैंगरेप के खिलाफ आक्रोशित जनता को नेतृत्व देनेवाला कोई सामने नहीं आ सका । बैगर नेतृत्व के किसी आंदोलन का जो हश्र हो सकता है वही इस आंदोलन का भी हुआ । आंदोलन के बीच कुछ गुंडे और मवाली किस्म के लोग घुस आए और उन्होंने कुछ ऐसी हरकतें की जिसकी वजह से पुलिस को कार्रवाई का मौका मिल गया । कई जानकारों का कहना है कि पुलिस ने ही इन लोगों को आंदोलनकारियों के बीच में घुसाया । यह जांच का विषय हो सकता है ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाकर जंग छेड़नेवाले अरविंद केजरीवाल पर राजनीति का रंग चढ़ गया है । गैंगरेप के खिलाफ आंदोलन जब अपने चरम पर पहुंचा तो उन्हें लगा कि मौका हाथ से निकल ना जाए लिहाजा तीन चार दिन बाद वो अपने सहयोगियों के साथ आंदोलनकारियों के बीच जाकर बैठ गए । टेलीविजन चैनलों के लिए बातें की, विजुअल बनवाए और फिर वहां से चलते बने । अरविंद केजरीवाल एंड आम आदमी कंपनी भी आंदोलन के दौरान चंद घंटों के लिए वहां नजर आई । अब उनके लोग तर्क दे रहे हैं कि रेप जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे का वो राजनीतिकरण नहीं करना चाहते थे लिहाजा केजरीवाल एंड कंपनी वहां से लौट आई । उनका यह तर्क बेहद ही हास्यास्पद है , अगर उनको इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति नहीं करनी थी तो दो दिन भी वहां जाने का कोई औचित्य नहीं था । लेकिन केजरीवाल चर्चा में बने रहने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते हैं लिहाजा उन्होंने ये मौका भी नहीं छोड़ा ।
गैंगरेप के दौरान लोगों के गुस्से और दिल्ली के इंडिया गेट और विजय चौक पर लगातार हफ्ते भर चले आंदोलन ने भारत के राजनीतिक वर्ग के दिवालिएपन को उजागर कर रख दिया है । आज देश में राजनीतिक समस्याओं का प्रशासनिक हल निकालने की लगातार बढ़ती प्रवृत्ति से लोकतंत्र की स्थापित मान्यताओं के बिखर जाने का खतरा भी पैदा हो गया है । आज देश को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो जनता के बीच जा सके और उनकी समस्याओं को उनके बीच बैठकर बात करे । देश की जनता तैयार है वैसे नेताओं को अपने सर आंखों पर बैठाने के लिए जो जनता की भावनाओं को वाणी दे सके । विपक्ष में होने की वजह से भारतीय जनता पार्टी की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि उनके नेता वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बयानबाजी करने के बजाए जनता के बीच जाएं और उनके दुख दर्द में भागीदार बने और उसको वाणी दें । कांग्रेस के लिए तो बस वही कहा जा सकता है जो इंदिरा गांधी ने पहली बार अध्यक्ष चुने के सालभर बाद पद छोड़ने पर कहा था- आजादी के आंदोलन के दौरान जो कांग्रेस एजेंट ऑफ चेंज थी वही कांग्रेस अब चुनावी मशीन बन कर रह गई है । वक्त बेवक्त राहुल गांधी चेंज की बात करते हैं लेकिन बातें हैं , बातों का क्या