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Saturday, September 29, 2018

दिनकर जयंती आयोजन पर विवाद


अपनी कविता में खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करने पर रामधारी सिंह दिनकर विवादों में नहीं आए थे, महाभारत के मूल पाठ में कर्ण के चरित्र को अलग तरीके से अपनी रचना में पेश करने के बावजूद दिनकर को लेकर विवाद नहीं हुआ था, हिंदी भाषा को लेकर उनके विचारों पर गैर हिंदी भाषियों ने कभी कोई विवाद नहीं खड़ा किया । दिनकर की राष्ट्रवादी अवधाराणाओं को लेकर भी विवादित करने की कोशिश हुई लेकिन हो नहीं पाया। दरअसल उनकी कई कविताओं में उग्र राष्ट्रवाद के स्वर भी मुखर होते हैं । उनकी रचनाओं में इस उग्र राष्ट्रीयता के पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था । ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में दिनकर ने अतीत के इस गौरव को बेहद करीने और सलीके से सजाया है । दिनकर साहित्य में मार्क्सवाद की सत्ता की गुलामी को भी तैयार नहीं थे।  दिनकर ने राष्ट्रवाद की अवधाराणा के संदर्भ में कुछ लोग कहते हैं कि वो नफरत की बुनियाद पर टिका है, लेकिन ऐसा कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश करनेवाले भी सफल नहीं हो पाए। दिनकर ने अपनी अवधारणा में घृणा को राष्ट्रीयता की बुनियाद बताया था लेकिन उसको उद्धरणों से स्पष्ट भी किया था। दिनकर का मानना था कि बहुधा राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है । उन्होंने इस संदर्भ में नेपिलियन का उदाहरण दिया था और कहा था कि नेपोलियन की हुकूमत के खिलाफ लोगों में एकता हुकूमत से घृणा की वजह से आई थी। इसी तरह से उन्होंने कहा था कि आजादी के पहले भारत में राष्ट्रीयता इस वजह से पनपी कि यहां के लोग अंग्रेजों से घृणा करने लगे थे । अब यहां अगर पूरे संदर्भ से काटकर सिर्फ ये बताया जाए कि दिनकर की राष्ट्रीयता का आधार घृणा है तो यह उनके साथ अन्याय होता । कुछ लोगों ने उनके साथ ये अन्याय करने की कोशिश की थी लेकिन वो परवान नहीं चढ़ पाई। दिनकर ने अपने लेखों में टैगोर के राष्ट्रीयता और अंतराष्ट्रीयता की अवधारणा पर भी विचार करते वक्त अपनी मान्यताओ को सामने रखा है । दिनकर की एक कविता भी है – ‘राष्ट्रदेवता का विसर्जन’, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि राष्ट्रीयता अगर अंतराष्ट्रीयता के खिलाफ खड़ी हो रही हो तो उसका विदा होना बेहतर है । कहना ना होगा कि दिनकर विश्व शांति और मैत्री की वकालत भी कर रहे थे । ये उदाहरण इस वजह से दिए जा रहे हैं ताकि पाठकों के सामने ये बात रखी जा सके कि दिनकर को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की जाती रही है।
लेकिन इस बार दिनकर को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है उसके साहित्यिक और गैर-साहित्यिक दोनों वजहें हैं। राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती बीते तेइस सितंबर को थी। दिनकर जी के गांव सिमरिया में और बेगूसराय में उनपर केंद्रित कार्यक्रम हुए। दिनकर जी के जन्मदिन पर बेगूसराय का कार्यक्रम आयोजन के पहले विवादों में आ गया था। पहला विवाद शुरू हुआ दिनकर पर बेगूसराय में आयोजित कार्यक्रम से। ये कार्यक्रम बिहार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की तरफ से आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में बिहार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा की गरिमामय उपस्थिति का कार्ड छपते ही वो विवादों में आ गया। दरअसल मुजफ्फरनगर बाल सुधार गृह में मंजू वर्मा के पति का नाम उछलने के बाद उनको मंत्रिपद से हटा दिया गया था। समारोह का कार्ड सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर इसको लेकर सवाल उठने शुरू हो गए। इस समारोह में मंजू वर्मा की गरिमामय उपस्थिति में प्रगतिशील लेखकों का जमावड़ा हो रहा था, जिसमें खगेन्द्र ठाकुर, अरुण कमल, आलोक धन्वा, अखिलेश जैसे घोषित वामपंथी लेखक की उपस्थिति होनी थी। समारोह का निमंत्रण कार्ड वितरित होने के बाद दो बातों को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा हुई। दिनकर पर होनेवाले आयोजन में वामपंथी लेखकों की इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति को लेकर फेसबुक पर टिप्पणियां आने लगीं। और दूसरी मंजू वर्मा की गरिमामय उपस्थित को लेकर। सबसे दिलचस्प टिप्पणी आई कि ‘मुजफ्फरपुर बालिका संरक्षण गृह मामले में जिस मंत्री को नीतीश कुमार ने नहीं बख्शा, उनकी ही गरिमामय उपस्थिति में बेगूसराय में क्रांति के ककहरा की पाठशाला लगेगी।‘ इसके अलावा भी कई तरह के आरोप उछले जिनमें मानदेय आदि को लेकर भी बातें हुई लेकिन उनका कोई कोई अर्थ नहीं है। बड़ा सवाल तो मंजू वर्मा की उपस्थिति का उठा था। जब मंजू वर्मा की उपस्थिति को लेकर तंज कसे जाने लगे और उस कार्यक्रम में जानेवाले लेखकों की घेरेबंदी शुरू हुई तो वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा और लेखक प्रेम कुमार मणि ने इस समारोह में जाने से इंकार कर दिया लेकिन क्रांति के ध्वजवाहक रहे कई लेखक बेगूसराय पहुंचे । बाद में पता चला कि मंजू वर्मा वहां नहीं पहुंची। तो ये तो आभासी दुनिया पर उठा एक ऐसा विवाद था जिसने वामपंथी लेखकों को कठघरे में खड़ा कर दिया।
बेगूसराय में आयोजित दिनकर जयंती समारोह के वामपंथीकरण का आरोप भी लगा। जिस विचारधारा के लोगों ने दिनकर का लंबे समय तक मूल्यांकन नहीं होने दिया और ना ही किया उस ही विचारधारा के लेखकों को दिनकर के सम्मान में बुलाने पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने विरोध भी जताया। बीजेपी के नेताओं ने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन ने बगैर किसी कोर कमेटी के गठन और बगैर सलाह मशविरा के जिला साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, जो कि प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हैं, की राय पर आमंत्रित वक्ताओं के नाम तय कर दिए। आरोप तो ये भी लगे कि जिन लोगों ने दिनकर की रटनात्मकता पर कोई काम नहीं किया है उनको भी देश के अन्य शहरों से बुलाया गया। ये सवाल भी पूछे गए कि कवि गोष्ठी में आमंत्रित कवियों के चयन का आधार क्या था। बीजेपी नेताओं के इन बयानों का प्रतिवाद बेगूसराय के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने किया। अखबारों में छपे उनके बयान के मुताबिक दिनकर पर आयोजित कार्यक्रम के लिए लेखकों को कला संस्कृति और युवा विभाग की ओर से आमंत्रित किया गया था। उनके मुताबिक इन लेखक और कवियों को 2014 के अखिल भारतीय काव्य समारोह और 2015 के अखिल भारतीय कथा समारोह में भी आमंत्रित किया गया था। संभव है जिलाधिकारी ने उसी सूची से लेखकों को आमंत्रित कर लिया होगा। इस बावत जब सूबे से संस्कृति मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि से बात की गई तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि बेगूसराय में दिनकर जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं के नाम संस्कृति विभाग ने नहीं तय किए थे। जब उनका ध्यान जिलाधिकारी के बायन की तरफ दिलाया गया तो उन्होंने डीएम के बयान को गलत करार दिया। खैर ये मुद्दा तो बयानबाजी में उलझ कर रह जाएगा, सचाई शायद ही बार आ पाए, लेकिन इससे इतर जो सवाल खडे हो रहे हैं वो ज्यादा संगीन हैं। दरअसल अगर हम बिहार के कला संस्कृति विभाग के सालाना कैलेंडर को देखें तो उसके मुताबिक दिनकर के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम का आयोजन उनके पैतृक गांव सिमरिया में होना था, जिसका नाम दिनकर साहित्य उत्सव था। और इसके आयोजन का जिम्मा जिला प्रशासन पर था। इस आयोजन का बजट दस लाख रुपए रखा गया था। अब सवाल यही उठता है बिहार सरकार के इस आयोजन का नाम और स्थान कैसे और किसके आदेश पर बदला गया। इस बारे में जब मंत्री ऋषि से बात की गई तो उन्होंने कहा ‘ मुझे लगता है कि इसमें विभाग की अनुमति नहीं के बराबर है, अगर अनुमति ली गई होती तो मेरी जानकारी में रहता।‘  तो क्या अब इस बात की जांच की जानी चाहिए कि स्थान और नाम परिवर्तन कैसे हुआ। दिनकर की जन्मस्थली सिमरिया में कार्यक्रम होने का अपना एक अलग महत्व होता और साहित्यिक दृष्टि से एक घटना भी होती कि जिस विचारधारा के लोगों ने दिनकर को उनके जीवन काल में हमेशा हाशिए पर रखने की कोशिश की उसी विचारधारा के पोषक दिनकर की जन्मभूमि पर जाकर कवि की रचनात्मकता की तारीफ कर रहे हैं। लेकिन ये हो नहीं पाया। सिमरिया में एक कार्यकर्म हुआ अवश्य लेकिन वो अलग था, उस कार्यक्रम में राज्यसभा के मनोनीत सांसद राकेश सिन्हा शामिल हुए, उन्होंने वहां पुस्तकालय को दस लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा भी की। वामपंथियों पर प्रहार भी किए। क्या संस्कृति विभाग और इसके मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि इस बात की जांच करवाएंगे कि किसके कहने और आदेश पर कैलेंडर मं बदलाव किया गया। साहित्य जगत तो जानना चाहेगा । जानना तो जनता भी चाहेगी कि एनडीए के शासन काल में राज्य सरकार का कार्यक्रम अलग और बीजेपी का कार्यक्रम अलग, ये कैसे और क्यों ? 



Saturday, October 15, 2016

जंगल के बीच साहित्यक विमर्श

विजयादशमी का दिन, जिम कॉर्बेट का विशाल जंगली इलाका और साहित्य पर मंथन करने जुटे करीब डेढ सौ लेखक-पत्रकार-कवि और बुद्धिजीवी । यह एक ऐसा अवसर और मंच था जिसको मुहैया करवाया कुमांऊ लिटरेरी फेस्टिवल ने । दरअसल अक्तूबर के महीने से पूरे देश में इस तरह के साहित्यक महोत्सवों या लिटरेरी फेस्टिवल्स की शुरुआत हो जाती है जो मार्च तक चलता है । इन छह महीनों में देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग भाषाओं में और अलग अलग फॉर्मेट में साहित्यक महोत्सवों का आयोजन होता है । कुमांऊ लिटरेरी फेस्टिवल उस वक्त आयोजित हुआ जिस वक्त देश में राष्ट्रवाद और उसके तरीकों और प्रकारों को लेकर बहस चल रही है । लिहाजा कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल में राजनैतिक और अन्य बहसों में भी ये विषय सायास या अनायास आ ही जा रहा था । कुछ सत्र भी इस तरह के विषयों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे और वक्ताओं को चयन भी उसी हिसाब से था । लिटरेरी फेस्टिवल कि शुरुआत में ही मैगसेसे अवॉर्ड से हाल ही में नवाजे गए टी एम कृष्णा ने इस मुद्दे को बेहद संजीदगी से उठा दिया था । जब उन्होंने तमिल लेखक मुरुगन से लेकर कई अन्य उदाहरण देते हुए साझा करने की संस्कृति को मजबूत करने पर जोर दिया था और उसके क्षरण पर अपनी चिंता प्रकट की थी । मंच पर पवन वर्मा और तरुण विजय मौजूद थे लिहाजा राष्ट्रवाद पर कैसी बहस हो सकती थी इसका अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है । पवन वर्मा ने अपनी पार्टी लाइन के हिसाब से बात की तो तरुण विजय ने अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया । मंच पर मौजूद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए के सीकरी ने अपने भाषण में संजीदगी से साहित्य लेखन पर प्रकाश डाला था । उन्होंने कहा कि जज जब फैसले लिखता है तो वो भी सृजनात्मक कार्य कर रहा होता है बस फर्क इतना होता है कि कविता, कहानी और उपन्यास की पहुंच काफी ज्यादा होती है जबकि जजों के फैसले प्रभावित लोग या फिर उस तरह के केस करनेवाले वकीलों के काम ही आता है । उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट के लेखक मुरुगन पर दिए फैसले को बेहतरीन बताया । साहित्य महोत्सव के उद्धाटन से इस बात के संकेत मिल गए थे कि बाकी बचे राजनीतिक विषयों के सत्र कैसे होंगे ।
महोत्सव के दूसरे दिन एक सत्र हुआ जिसका विषय था आपका राष्ट्रवाद बनाम हमारा राष्ट्रवाद । वक्ताओं में वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सांसद शाहिद सिद्दिकि, हाल ही में अपनी किताब गुजरात फाइल्स की वजह से चर्चा में आई राणा अयूब, उद्योगपति और प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य सुनील अलघ और लेखक-पत्रकार हिंडोल सेनगुप्ता । सर्जिकल स्ट्राइक के बाद या उसके थोड़ा पहले से देश का जो माहौल है उसमें बदलते भारत की, उसकी नई पहचान की और नए आयाम की काफी चर्चा हो रही है । देशभक्त- देशद्रोह, मजबूत भारत, मजबूत नेतृत्व तमाम तरह के शब्दों की गूंज सुनाई देती है । जब भी नेशनिज्म की बात होती है तो सवाल यही कि किस तरह का राष्ट्रवाद होना चाहिए । आजादी के पहले गांधी ने भी राष्ट्रवाद को उभारा था । उन्होंने एक सभ्यता को राष्ट्र में बदला और देशभक्ति की भावना जगाकर उद्देश्य की एकता लाने की महिम चलाई । ये 1920 का दौर था । गांधी ने यूरोपीय राष्ट्रवाद की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया था । भाषा को राष्ट्रवाद से अलग किया गया । सभी भाषा और क्षेत्र के नेताओं को राष्ट्रवाद को प्रचारित करने का जिम्मा दिया गया था ।  वन लैंग्वेज वन नेशन को गांधी ने निगेटकिया था ।  अगर उक्त सिद्धांत को माना गया होता तो आजादी के बाद भारत में कई छोटे-बड़े राष्ट्र होते । नेशनलिज्म पर यह सत्र बेहद गर्मागर्मी वाला रहा । सुनील अलघ ने नेशनलिज्म और पैट्रियॉटिज्म को शब्दकोश के हवाले से अलग बताते हुए उस अवधारणा पर अपनी बात रखी । इस सत्र में हिंडोल सेनगुप्ता और राणा अयूब के बीच तीखी बहस हुई । राणा अयूब ने जैसे ही सर्जिकल स्ट्राइक से फायदा उठाने की बात की तो लेखक हिंडोल सेनगुप्ता ने उसका तीखा प्रतिवाद किया । पाकिस्तानी कलाकारों के मुद्दे पर हिंडोल का तर्क था कि जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद अपने चरम पर था तब वहां के क्रिकेटरों के खेलने पर पाबंदी थी और ओलंपिक में अफ्रीकी खिलाड़ी शामिल नहीं हो पाते थे । हिंडोल सेनगुप्ता का कहना था कि पाकिस्तान के कलाकारों की पाबंदी को अतीत के आलोक में देखा जाना चाहिए । इस बहस में इतनी गर्मागर्मी हो गई कि श्रोताओं को कहना पड़ा कि टीवी डिबेट जैसी बहस ना करें जिसमें कुछ सुनाई नहीं देता है । शाहिद सिद्दिकी के तर्क थे कि ना तो इस्लाम में दिक्कत है और ना ही हिंदुत्व में बल्कि दिक्कत तो अतिवाद में है। उनका कहना था कि जब भी नेशनलिज्म में अतिवाद हो जाता है तो दिक्कत शुरू हो जाती है । श्रोताओं के बीच बैठे कांग्रेस के सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने अभिव्यक्ति की सीमा का सवाल उठाया जिसका जवाब संचालक ने दिया कि सीमा तो वही है जो जवाहरलाल नेहरू ने पहले संविधान संशोधन के वक्त तय कर दी थी ।
इसी तरह का एक सत्र भारत की नई राजनीति को लेकर भी हुआ । जिसमें अभय कुमार दूबे, तरुण विजय और पाणिनी आनंद ने हिस्सा लिया । इस सत्र में बहस ब्रैंड मोदी पर रहा जिसको लेकर तरुण विजय और पाणिनी के बीच तीखी नोंक झोंक हुई । इस सत्र में नफरत की विचारधारा और अघोषित आपातकाल जैसे जुमले सुनने को मिले । अभय दूबे ने कहा कि देश अबतक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और कई सिस्टम पिछले पचास साल में सड़ गए हैं जिसको बदले बिना नई राजनीति की कल्पना बेमानी है । महिलाओं से जुड़े मुद्दे और उनको संसद में आरक्षण के सवाल पर प्रियंका चतुर्वेदी, नूपुर शर्मा, तुहीन सिन्हा ने अपनी बातें रखीं । पर ऐसा नहीं था कि सभी सत्र राजनीतिक विषयों पर ही थे । साहित्य और फिल्मों पर भी बेहद गंभीरता से विमर्श हुआ । दरअसल इस लिटरेरी फेस्टिवल की विशेषता ये रही कि यहां लेखकों के बीच ही संवाद हुआ और पाठकों और श्रोताओं की भागीदारी लगभग नहीं के बराबर थी, लिहाजा आपाधापी कम थी ।
एक दिलचस्प बातचीत स्टारडम को लेकर हुई जिसमें राजेश खन्ना के बॉयोग्राफर गौतम चिंतामणि और यासिर उस्मान के अलावा असीम छाबड़ा ने हिस्सा लिया । इसमे वक्ताओं ने स्टारडम के वैश्विक फेनोमिना पर विस्तार से बात की । इस सत्र के दौरान ये सवाल भी उठा कि क्या बॉलीवुड में सिर्फ अभिनेता ही स्टार हो सकते हैं । क्या किसी अभिनेत्री में स्टारडम की क्षमता नहीं है । कमोबेश इसपर सभी विशेषज्ञों की राय नकारात्मक थी लेकिन भारतीय सिनेमा के उस दौर को वो भूल गए जब संगीतकार नौशाद किसी भी कलाकार से ज्यादा पैसा लेते थे और उनका नाम पोस्टर पर प्रमुखता से छपता था । बल्कि ये भी माना जाता था कि नौशाद ने अगर संगीत दे दिया है तो फिल्म के हिट होने की गारंटी है । इसका फिल्म समीक्षक मयंक शेखर ने मॉडरेट किया । एक और दिसचस्प सत्र रहा जिसमें राखी बक्षी ने लेखक गुरुचरण दास से उनकी किताब डिफिकल्टी ऑफ बीइंग गुड के आधार पर महाभारत के चरित्रों के पुनर्पाठ को लेकर बातचीत की । महाभारत पर लिखी अपनी इस किताब में गुरुचरण दास ने पात्रों की चरित्रगत विशेषताओ को ध्यान में रखकर उनके पुनर्पाठ की कोशिश की है । इस किताब में दास ने अन्यान्य जगहों पर देसी-विदेशी लेखकों को उद्धृत किया है लेकिन उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को भुला दिया है । अब ऐसा अज्ञानतावश किया गया या जानबूझकर ये कहना मुश्किल है । इन विषयों के अलावा हिन्दुस्तानी कविता पर भी संजीदगी से बात हुई जिसमें रक्षंदा जलील ने विद्वतापूर्ण तरीके अपनी बात रखी । अंग्रेजी के लेखक अमीष त्रिपाठी की लगभग हर फेस्टिवल में एक स्थायी मौजूदगी होने लगी है । जैसे कुछ दिनों पहले तक गुलजार ऐसे आयोजनों में स्थायी रूप से मौजूद रहा करते थे हलांकि दोनों की मौजूदगी की वजहें अलहदा हैं । इस फेस्टिवल में आकर्षण के एक और केंद्र रहे पंद्रह साल के उपन्यास लेखक विश्वेष देसाई जिनको राणा कपूर अवार्ड से नवाजा गया ।

तीन दिनों तक कॉर्बेट के जंगल में साहित्य, संस्कृति, राजनीति, सिनेमा पर मंथन के बाद दो दिनों तक धानाचुली में फिल्मों पर चर्चा हुई । दरअसल इस आयोजन के सर्वेसर्वा सुमंत बत्रा फिल्मों से जुड़ी चीजों को इकट्ठा करते रहे हैं और उन्होंने धानाचुली में एक बेहतर कलेक्शन जमाकर संग्रहालय बनाने की कोशिश की है । अब अंत में हम ये पूछ सकते हैं कि इस लिटरेरी फेस्टिवल का हासिल क्या रहा क्योंकि यहां वृहत्तर पाठक वर्ग से जुड़ने की कोशिश तो है नहीं । आयोजकों का कहना है कि वो इस साहित्यक उत्सव को गंभीर विमर्श का स्वरूप देना चाहते हैं ताकि किसी विषय विशेष पर बगैर किसी शोरगुल, विवाद और हल्ला गुल्ला के विद्वान आपस में बैठकर मंथन कर सकें ।   

Thursday, September 22, 2016

अपने समय का सूर्य 'दिनकर'

कौन जानता था कि सिमरिया घाट की बालू की रेत पर खेलनेवाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा ‘लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर, आंसू के कण बरसाता चल ।‘ सिमरिया घाट है बिहार के मौजूदा बेगूसराय जिले में और उसकी बालू की रेत पर खेलनेवाला बालक था रामधारी सिंह दिनकर । यह दिनकर की कल्पनाशीलता है कि वो प्रेम के बल पर लोहे के पेड़ के हरे होने की बात करते हैं । यह दिनकर का आत्मविश्वास है कि वो खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करता है – ‘मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं ।‘ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा भी था कि दिनकर अपने ढंग का अकेला हिंदी कवि है । यौवन और जीवन उसे आकृष्ट करते हैं, सौंदर्य के मोहन संगीत उसे मुग्ध करते हैं पर वह इनसे अभिभूत नहीं होता है । रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के ऐसे कवि लेखक हैं जिनका रेंज इतना व्यापक है कि वो अपने में साहित्य, समाज, इतिहास और राजनीति को एक साथ समेट कर चलते हैं । नामवर सिंह का मानना है कि ‘दिनकर जी को सूर्य कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि सूर्य का एक ही रंग नहीं होता है और सूर्य में ताप हीनहीं होता है, रोशनी भी होती है । उस प्रकाश के उस आलोक के अनेक रंग होते हैं, बल्कि धरती पर जितने रंग दिखाई पड़ते हैं, वे सारे के सारे रंग और रंग बिरंगे पुष्प सूरज की रोशनी से ही हैं । सूरज न हों तो उतने रंग धरती पर नहीं होंगे ।‘ करीब पांच दशक लंबे कालखंड में सृजनरत दिनकर समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे । आजादी के पहले बारदोली विजय पर ‘विजय संदेश’ के नाम से उनकी कविताओ की एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसके बारे में दिनकर ने खुद लिखा है कि उसमें एक उदयीमान कवि के रेंगने की रेखाएं देखने को मिलती हैं ।    
दिनकर की रचनाओं की व्यपकता का आलम यह है कि वो गांधी से लेकर मार्क्स तक, आर्य से लेकर अनार्य तक, हिन्दू संस्कृति के आविर्भाव से लेकर प्राचीन हिन्दुत्व से विद्रोह के अलावा हिंदू संस्कृति और इस्लाम से लेकर भारतीय संस्कृति और यूरोप के संबंधों को परखते हुए विपुल लेखन किया है । गांधी और मार्क्स को लेकर दिनकर में एक खास तरह का द्वंद् देखने को मिलता है । वो गांधी की अहिंसा और मार्क्स के हिंसक सिद्धातों के बीच फंसे हुए नजर आते हैं । हिंसा ओर अहिंसा के बीच का उनका द्वंद्व उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है । जब चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था तब दिनकर जी ने परशुराम की प्रतीक्षा लिखी जिसमें उन्होंने अपने तर्कों के आधार पर हिंसा और अहिंसा के इस्तेमाल के दर्शन को साफ किया । दिनकर ने स्वीकार भी किया है कि – ‘मैं जीवनभर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूं । इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है वही रंग मेरी कविता का रंग है ।‘ लेकिन जब साहित्य की बात आती है तो दिनकर बेहद साफगोई से कहते हैं कि – ‘साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद का समर्थन लिखवाए औप न किसी स्टालिन की ही, जो हमे साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने फलने नहीं दे सकता । हमारे लिए फरमान न तो क्रेमलिन से आ सकता है और न आनंद भवन से ही । अपने क्षेत्र में तो हम सिर्फ उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है ।‘ दिनकर इस बात से बहुधा खिन्न नजर आते थे कि मार्क्सवादियों को लेखन की स्वतंत्रता नहीं थी । उन्हें पार्टी लाइन पर लेखन करना पड़ता था और दिनकर इस क्षोभ को दृढता से प्रकट भी करते थे ।  14 मई 1957 को राज्यसभा के अपने भाषण में दिनकर ने साफ किया था- कम्युनिस्ट देश के लेखकों और कवियों ने पाया तो क्या पाया ? शारीरिक सुख और रुपया तो बहुत पाया, आराम तो उनको सबसे अधिक है। उनके साथ इंकम टैक्स की दरों में रियारतें रखी जाती हैं, लेकिन बदले में उनको देना क्या पड़ा है ?  देना यह पड़ा है कि अपनी स्वाधीनता का हनन करना पड़ा है । रेजीमेंटेशन को स्वीकार करना पड़ा है । मैं पूछना चाहता हूं कि क्रांति हुए इतने दिन हुए हैं, तो दस्तोव्स्की, तुर्गनेव, चेखोव, टॉलस्टाय और गोर्की के समान लेखक क्यों नहॆं पैदा हुए कम्युनिज्म में ? फिर पैदा हो नहीं सकते क्योंकि मनुष्य की आत्मा को जहां स्वाधीनता नहीं है वहां सच्चा साहित्य, सच्ची कविता, सच्ची कला कभी पैदा नहीं हो सकती।‘

इसी तरह से पिछले दिनों जब पूरे देश में राष्ट्रीयता और असहिष्णुता को लेकर बहस चली थी तो पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के नेताओं और विद्वानों ने दिनकर को उद्धृत करते हुए अपने तर्कों को वैधता प्रदान करने की कोशिश की । दिनकर की कविता समर शेष है की आखिरी पंक्ति– ‘समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ।‘ के हवाले से उस बहस में तटस्थ रहनेवालों की लानत मलामत की गई थी । लेकिन उस वक्त किसी को याद नहीं आया कि इसी कविता में दिनकर कहते हैं – समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं, गांधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं ।‘ दिनकर को उस बहस में लोगों ने सुविधानुसार उद्धृत किया और विरोधियों ने बगैर दिनकर को समग्रता में पढ़े उनपर जाने कैसे कैसे आरोप मढ़ दिए । दिनकर राष्ट्रवादी कवि हैं इसमें कोई दो राय नहीं है । उनकी कविताओं में उग्र राष्ट्रवाद के स्वर भी मुखर रहे हैं । उनकी रचनाओं में इस उग्र राष्ट्रीयता के पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था । संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने अतीत के इस गौरव को बेहद करीने और सलीके से सजाया है । लेकिन इसका यह मतलब नहीं हुआ कि दिनकर की राष्ट्रीयता सांप्रदायिक या फिर जनता विरोधी है  । इसको उनकी कविता ‘दिल्ली’ को पढ़कर समझा जा सकता है । दिनकर साहित्य में मार्क्सवाद की सत्ता की गुलामी को भी तैयार नहीं थे लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि दिनकर उस राष्ट्रवाद के समर्थक थे जो नफरत की बुनियाद पर टिका था । दिनकर ने घृणा को राष्ट्रीयता की बुनियाद बताया था लेकिन उसको उद्धरणों से स्पषट भी किया था । दिनकर का मानना है कि बहुधा राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है । उनका मानना है कि नेपोलियन की हुकूमत के खिलाफ लोगों में एकता हुकूमत से घृणा की वजह से आई । इसी तरह से भारत में राष्ट्रीयता इस वजह से पनपी कि यहां के लोग अंग्रेजों से घृणा करने लगे । अब यहां अगर पूरे संदर्भ से काटकर सिर्फ ये बताया जाए कि दिनकर की राष्ट्रीयता का आधार घृणा है तो यह उनके साथ अन्याय होगा । कुछ लोगों ने उनके साथ ये अन्याय पिछले दिनों किया । दिनकर ने अपने लेखों में टैगोर के राष्ट्रीयता और अंतराष्ट्रीयता की अवधारणा पर भी विचार करते वक्त अपनी मान्यताओ को सामने रखा है । दिनकर की एक कविता भी है – ‘राष्ट्रदेवता का विसर्जन’, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि राष्ट्रीयता अगर अंतराष्ट्रीयता के खिलाफ खड़ी हो रही हो तो उसका विदा होना बेहतर है । कहना ना होगा कि दिनकर विश्व शांति और मैत्री की वकालत भी कर रहे थे । दरअसल अगर देखा जाए तो दिनकर का सभी ने अपने अपने हक में इस्तेमाल किया लेकिन उनका समग्र मूल्यांकन करने में किसी ने रुचि नहीं दिखाई