Translate

Showing posts with label मुद्राराक्षस. Show all posts
Showing posts with label मुद्राराक्षस. Show all posts

Saturday, December 24, 2016

बिछड़े सभी बारी बारी...

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को है, विमर्श के कोलाहल के बीच साहित्य, संस्कृति और कला के दिग्गजों के निधन से अपूरणीय क्षति हुई । साल के शुरुआत में ही कथाकार और संपादक रवीन्द्र कालिया का छिहत्तर साल की उम्र में निधन हो गया । कालिया जी की कहानियों ने अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप किया था । उनकी किताब ‘गालिब छुटी शराब’ धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों के देवता’ के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबों में से है । कालिया जी के निधन से साहित्य जगत उबरा भी नहीं था कि निदा फाजली के निधन की खबर आई थी । निदा फाजली ने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । निदा के बाद काल के क्रूर हाथों ने हमसे उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में एक जोगेन्द्र पॉल को छीन लिया । जोगेन्द्र पॉल के तेरह से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें खुला, खोदू बाबा का मकबरा और बस्तिआन शामिल हैं । कहानियों के अलावा पॉल ने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें से एक बूंद लहू की खासी चर्चित रही है । पॉल की ज्यादातर किताबें हिंदी में भी अनूदित हैं ।
साल 2016 में हिंदी के मशहूर लेखक मुद्राराक्षस का भी निधन हुआ । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्राराक्षस ताउम्र अपनी विचारधारा को लेकर मजबूती से साहित्य और समाजकी जमीन पर डटे रहे । बांग्ला की प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी भी इस साल अपनी महायात्रा पर निकल गईं । महाश्वेता देवी ने हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा जैसी मशहूर कृतियां रचीं । उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड के अलावा पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था । पंजाबी के मशहूर कथाकार गुरदयाल सिंह भी इस वर्ष हमसे जुदा हो गए ।उनका उपन्यास मरही दे दीवा पंजाबी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है और इस उपन्यास ने ही उनको उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई । इनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । गुरदयाल सिंह को उनके लेखन के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था ।मलयालम के मशहूर कवि ओ वी एन कुरुप का निधन भी साहित्य के लिए बड़ा झटका था । यशस्वी संपादक और लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए । प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने संपादन से युवा लेखकों की पहचान कर उनको संस्कारित किया । पूरब के प्रेमचंद कहे जानेवाले विवेकी राय भी इस साल हमसे बिछुड़ गए । उनकी रचनाओं में गांव अपने समग्र परिवेश के साथ उपस्थित रहता था । इनके ललित निबंध हिंदी साहित्य की थाती हैं । विवेकी राय के अलावा हाल ही में उपन्यासकार ह्रदयेश का भी निधन हुआ । ह्दयेश हिंदी के उन चंद लेखकों में थे जो खामोशी के साथ बगैर किसी शोर-शराबे के लेखन में जुटे रहते थे । उनके दस के करीब उपन्यास और दर्जनभर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।
सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को बड़ा नुकसान हुआ । सैयद हैदर रजा रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । इसी साल मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । मशहूर कलाकार और पद्मविभूषण से सम्मानित के जी सुब्रह्मण्य भी इस साल हमसे बिछड़ गए । इस साल पत्रकारिता को भी एक बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर का निधन हो गया । दिलीप उन संपादकों में थे जो इस संस्था की गरिमा और साख बचाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे ।


Saturday, June 18, 2016

मुद्राराक्षस की बेबाकी को सलाम

पिछले दिनों जब हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस के निधन की खबर आई तो अचानक पच्चीस साल पहले की एक स्मृति दिमाग में कौध गई । कॉलेज के दिन थे और मैं साहित्य की दुनिया में एक पाठक की तरह विचरने लगा था । तभी एक नाम से सामना हुआ था - मुद्राराक्षस । यह ठीक से याद नहीं है कि उनकी कौन सी कृति थी लेकिन तब उस नाम को लेकर मन में जिज्ञासा हुई थी । कई लोगों से तब इसके बारे में पूछा था लेकिन ठोस जवाब नहीं मिल पाया था, लेकिन ये नाम जेहन में कहीं अटका हुआ था । बाद में पता चला था कि तार सप्तक की समीक्षा की वजह से उनका नाम बदल गया था । ये उस वक्त की बात है जब वो सुभाष चंद्र आर्य थे । तारसप्तक की समीक्षा छपने के लिए उन्हॆंने  डॉ देवराज के पास भेज दिया था जो उन दिनों एक पत्रिका निकाला करते थे । अपनी समीक्षा में उन्होंने अज्ञेय पर जमकर हमला बोला था और ये साबित करने की कोशिश की थी कि उनके लेखन पर विदेशी लेखकों की गहरी छाप है । उस वक्त अज्ञेय की साहित्य में तूती बोलती थी, लिहाजा देवराज जी ने उनको सलाह दी कि इस लेख को नाम बदलकर छापना चाहिए । दोनों के बीच सलाह मशविरा के बाद मुद्राराक्षस नाम तय हुआ और वो ही नाम आखिर तक चलता रहा । मुद्राराक्षस ने लंबी उम्र पाई और अपनी लंबी जीवन यात्रा में साहित्य के कई सफल मुकाम हासिल किए । उन्होंने साहित्य की हर विधा में हाथ आजमाया । करीब दर्जनभर नाटक लिखे और निर्देशित किए । उनके बारह उपन्यास, पांच कहानी संग्रह, तीन व्यंग्य संग्रह और आलोचना और इतिहास की कई किताबें प्रकाशित हैं । मुद्राराक्षस जी ने लंबे समय तक साहित्यक पत्रिकाओं का संपादन भी किया और अपने संपादकीय कौशल से हिंदी साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया । मुद्राराक्षस ने आकाशवाणी की नौकरी भी लेकिन वहां भी उन्होंने समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन किया ।

छोटे कदकाठी के मुद्राराक्षस अंत तक अपने सिद्धांतों पर डिगे ही नहीं रहे बल्कि उसको फैलाने के लिए सक्रिय भी रहे । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्रा जी ने सामजिक आंदोलनों में भी भागीदारी की । इस बात को कई लोग स्वीकार करते हैं कि मुद्राराक्षस सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे । मुझे याद है दो तीन साल पहले कथाक्रम सम्मान के मौके पर एक गोष्ठी थी जिसमें मुझे बोलना था । तमाम उद्भट मार्क्सवादियों की मौजूदगी में मैंने मंच से मार्क्सवाद के अंतर्विरोधों और मार्क्स के अंधभक्तों पर हमला बोला था । कार्यक्रम के बाद मुद्रा जी मुझसे मिले तो बोले कि मैं तुम्हारे तर्कों से सहमत नहीं हूं लेकिन तुम्हारे साहस की दाद देता हूं । उस वक्त भी उनकी तबीयत ठीक नहीं थी और वो किसी के सहारे से चल रहे थे लेकिन साहित्य समारोह में उनकी मौजूदगी उनके साहित्यप्रेम को दर्शाता था । 13 जून 1933 को लखनऊ के पास बेहटा में जन्मे मुद्राराक्षस ने रंगमंच की दुनिया में भी अपना लोहा मनवाया । उनका लिखा - आला अफसर – बेहतरीन नाटक है । उन्हें रंगमंच की गहरी समझ थी और वो नाट्य निर्देशक के तौर पर कई प्रयोग करते थे जो कि दर्शकों और आलोचकों दोनों को चौंकाते थे । मुद्राराक्षस हिंदी भाषा को लेकर भी बेहद चिंतित रहा करते थे लेकिन गोष्ठियों आदि में इस बात पर बेहद कुपित नजर आते थे कि हिंदी के लिए विलाप सिर्फ सेमिनारों तक सिमट गया है और लोग आगे बढ़कर उसके लिए कुछ सार्थक नहीं कर रहे हैं । वो युवा लेखन से भी संतुष्ट नजर नहीं आते थे और बहुधा इस बात को लेकर टिप्पणी भी करते चलते थे कि सोशल मीडिया के लिए हो रहे लेखन से साहित्य का भला नहीं हो सकता है । अपनी बेबाकी के लिए जाने जानेवाले मुद्राराक्षस के निधन से जो क्षति हुई है उसकी भारपाई निकट भविष्य में तो संभव नहीं दिखाई देती है । नमन ।