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Saturday, January 27, 2024

चरित्र और संवाद के माध्यम से राजनीति


फिल्मों के माध्यम से पहले भी और अब भी एक विचारधारा विशेष को प्रमोट करने की युक्ति चल रही है। उसका विस्तार भी हो रहा है। जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ तो स्वाधीनता के बाद जब उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कर दिया था कि फिल्म इंडस्ट्री नए बने राष्ट्र की प्राथमिकता में नहीं है नेहरू के इस बान के बाद इंडस्ट्री से जुड़े लोग चिंतित हो गए थे। उस समय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने सरकार को प्रसन्न करने के लिए नेहरू की विचारधारा के अनुसार फिल्में बनाने का उपक्रम आरंभ किया था। नेहरू साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित थे। फिल्मकारों को लगा कि अगर साम्यवादी विचारधारा की कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो नेहरू खुश होंगे। उनको खुश करने के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने मार्क्स के बहुविध स्त्रोत से निर्माण के सिद्धांत को अपना लिया। इस प्रविधि में अलग अलग क्षेत्र के विशेषज्ञ अलग अलग भाग का निर्माण करते हैं और उन सबको एक जगह जमा करके या जोड़ करके एक पूरी फिल्म बना ली जाती थी। परिणाम यह हुआ कि पूंजीवादी व्यवस्था से फिल्में बनने वाली फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया साम्यवादी रही। लेखन में भी साम्यवादी व्यवस्था धीरे धीरे हावी होने लगी। 

जब नेहरू से मोहभंग का युग आरंभ हुआ तो हिंदी फिल्मों में साम्यवादी और पूंजीवादी धारा दोनों दिखाई देने लगी। फिर इंदिरा गांधी का दौर आया। उस दौर में हिंदी फिल्मों में साम्यवादी व्यवस्था और मजबूत हुई। इस कालखंड में साम्यवादी व्यवस्था में एक और रसायन मिलाया गया वो था हिंदू मुस्लिम एकता का। हिंदू महिला को उसके पुत्र के मुस्लिम दोस्त का खून चढ़ाकर बचाने जैसे दृष्य फिल्मों का हिस्सा बनने लगे। देश के विभाजन के समय हिंदू मुसलमान के बीच जो एक खाई बनी थी उसको पाटने की आड़ ली गई। इंदिरा जी ने देश में इमरजेंसी लगाई और संविधान की प्रस्तावना में मनमाने तरीके से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जोड़ा गया। संविधान की प्रस्तावना में संशोधन का असर भी फिल्मों पर भी पड़ा। अब हिंदू मुसलमान दोस्ती की मिसाल देनेवाली कहानियों पर फिल्में बनने लगीं। संवाद में कथित गंगा-जमुनी तहजीब की झलक दिखाई जाने लगी। साझा संस्कृति की बात होने लगी। इसके बाद असल खेल आरंभ होता है वो है फिल्मों में सनातन या हिंदू धर्म को नीचा दिखाना और अन्य धर्मों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति का आरंभ। नायक भगवान को कोसते नजर आने लगे। देश में जब आतंकवाद का दौर आया तो उसका असर फिल्मों पर भी दिखा। स्वाधीनता के बाद फिल्मों में साम्यवाद का प्रभाव था तो उस दौर की फिल्मों में नायकों के अपराधी बनने को जमींदारों या दबंगों के अत्याचार से जोड़कर दिखाया गया था। इसी तरह से मुसलमानों के आतंकवादी बनने को पुलिस प्रशासन की ज्यादतियों से जोड़ा जाने लगा। कश्मीर के आतंकवादियों को लेकर भी हिंदी के कई फिल्मकारों ने यही उक्ति अपनाई। चाहे वो आमिर खान और काजोल अभिनीत फिल्म फना हो या संजय दत्त और ह्रतिक रोशन की फिल्म मिशन कश्मीर हो। इस तरह की फिल्मों की सूची लंबी है, जहां हिंदी फिल्मकारों ने आतंकवादियों को लेकर रोमांटिसिज्म दिखता है। धीरे धीरे ये प्रवृत्ति बढ़ती ही चली गई। 

जब ओवर द टाप (ओटटीटी) प्लेटफार्म प्रचलन में आए तो वहां दिखाई जानेवाली वेबसीरीज में भी इस तरह का रोमांटिसिज्म दिखा। संवाद में आतंकवादियों ने वो बातें कहीं जो विचारधारा विशेष की राजनीति के अनुकूल थीं। हाल ही में एक वेब सीरीज आई है जिसको मशहूर फिल्मकार रोहित शेट्टी ने बनाई है। सात भागों में बनी इस वेब सीरीज का नाम है द इंडियन पुलिस फोर्स। इसमें भी मुस्लिम आतंकवादियों को लेकर एक विशेष प्रकार का रोमांटिसिज्म दिखता है। इंडियन मुजाहिदीन के लिए काम करनेवाले आतंकवादी जरार का चित्रण मानवीय तरीके से किया गया है।वेबसीरीज में दिखाया जाता है कि आतंकवादी जरार का परिवार कानपुर का रहनेवाला है। दंगाइयों ने उसकी फैक्ट्री में जिंदा जला दिया। उसका चाचा भी उस आग में जिंदा जल गया। प्रतिशोध के लिए में वो आतंकवादी बनता है। ये चित्रण आतंक और आतंकवाद को जस्टिफाई करने जैसा है। 

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि संवादों के माध्यम से भी उन स्थितियों को बल दिया जाता है जिसमें जरार जैसे लोग आतंकवादी बनते हैं। द इंडियन पुलिस फोर्स में एक मुसलमान पुलिस अफसर जब आतंकवादी जरार को पकड़ लेता है तो दोनों के बीच का संवाद उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। आतंकी जरार पुलिस अफसर कबीर से कहता है, एक बात बताइए कबीर साहब! अपनी कौम पर होते जुल्म को देखकर भी रात को आसानी से नींद आ जाती है आपको? कैसा लगता है खुदा से नाशुक्री करके, कैसा लगता है इन काफिरों का कुत्ता बनकर। इतना सुनकर कबीर उसके पास पहुंचता है और उससे कहता है कि इस्लाम तेरे ... का है, तू ठेकेदार है खुदा का। वो मेरा नहीं है, नफीसा का नहीं है जिसकी जिंदगी तुमलोगों ने बरबाद की । तुम लोग सिर्फ मजहब की आड़ में अपनी कमजोरी, नाकामी, फ्रस्टेसन गुस्सा निकालनेवाले लोग हो। सिर्फ अपना उल्लू सीधा करनेवाले खूनी। आतंकवादी। और कुछ नहीं। फिर रोष में जरार बोलता है कि आप सुनना चाहते हैं कि आतंकवादी कौन है। उसके बाद वो अपने बचपन की खौफनाक कहानी कहता है जिसमें कानपुर में उसके परिवार पर जुल्म होता है। गुड मुस्लिम- बैड मुस्लिम का संवाद चलता रहता है। इस सीरीज में कई जगह इस प्रकार के संवाद हैं। ये ठीक है कि सीरीज को समग्रता में देखें तो अच्छाई की बुराई पर जीत होती है। परंतु दर्शकों के मन में एक सवाल तो छोड़ ही देती है। अगर कानपुर कं दंगे में जरार की फैक्ट्री न जलाई जाती या उस दंगे में उसके चाचा को जिंदा न जला दिया गया होता तो वो आतंकवादी नहीं बनता। इसका ट्रीटमेंट उसी प्रकार है जब पहले की फिल्मों में दिखाया जाता था कि बीहड़ में कोई डकैत बनता था तो उसके पीछे दबंगों का जुल्म होता था।

प्रश्न सिर्फ द इंडियन पुलिस फोर्स की कहानी या संवाद का नहीं है बल्कि उस प्रवृत्ति का है जिसके अंतर्गत हिंदी फिल्मों की दुनिया से जुड़े लोग इस तरह की बातों को न केवल दिखाते हैं बल्कि प्रमुखता से उसको प्रचारित भी करते हैं। वेब सीरीज के माध्यम से ओटीटी पर चलनेवाली फिल्मों के माध्यम से जिस तरह की एजेंडा आधारित सामग्री दिखाई जाती है उसको लेकर समाज को ही विचार करना होगा। पिछले दिनों एक तमिल फिल्म आई थी अन्नपूर्णी। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। बताया गया कि इसके लिए उसको मांसाहारी खाना भी बनाना होगा। इसके संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। ये फिल्म सिनेमाघरों में एक दिसंबर को रिलीज हुई और महीने भर बाद ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर आई। ओटीटी प्लेटफार्म पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर केस हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी और नेटफ्लिक्स से इसको हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हुआ। पर इस फिल्म की टाइमिंग देखिए। अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी थी। कुछ राजनीतिक दल और साम्यवादी बौद्धिक इसका विरोध कर रहे थे। उसी समय पर राम को मांसाहारी बतानेवाली फिल्म ओटीटी पर रिलीज की गई। ओटीटी प्लेटफार्म की लोकप्रियता या व्याप्ति जैसी है उसको ध्यान में रखना होगा। मनोरंजन को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन धर्म की आड़ में राजनीतिक खेल बंद होना चाहिए। 


Friday, October 8, 2021

धर्म पर हमलावर के नाम सड़क क्यों?


स्वाधीनता के बाद दिल्ली में कई सड़कों और इमारतों के नाम बदले गए। सर्कुलर रोड को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम किया गया, क्लाइव रोड को त्यागराज मार्ग का नाम दिया गया। कर्जन कोड को कस्तूरबा गांधी रोड और कर्जन लेन का बलवंत राय मेहता लेन का नाम दिया गया। दिल्ली में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जब मार्गों के नाम से औपनिवेशिकता के चिन्ह को मिटाकर स्वाधीनता सेनानियों या अपनी मिट्टी पर सर्वोच्च बलिदान करनेवालों का नाम दिया गया। ये काम पिछली कई सरकारों ने किया। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी तो एक बार फिर से मांग उठी कि राजधानी में मौजूद गुलामी के निशानों को मिटाकर उसको अपने देश के सपूतों का नाम दिया जाए। 2015 में नई दिल्ली इलाके के औरंगजेब रोड का नाम बदलकर पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम कर दिया गया। औरंगजेब मुगलों में सबसे क्रूर शासक था और उसने हिन्दुस्तान की जनता पर बेइतहां जुल्म ढाए थे। सिख पंथ के महान गुरु तेगबहादुर जी के साथ औरंगजेब ने क्या किया उसके बारे में पूरे देश को ज्ञात है। 

औरंगजेब ने अपने शासनकाल में सैकड़ों मंदिरों को  तोड़कर हिन्दुस्तान के इतिहास, धर्म और संस्कृति को मिटाने की कोशिश की। वो इतना कट्टर मुस्लिम शासक था कि वो चाहता था कि उसके सल्तनत में सिर्फ इस्लाम धर्म को मानने वाले रहें। वो हिन्दुस्तान की जनता को तलवार के जोर पर इस्लाम धर्म में परिवर्तित करना चाहता था। जो भी उसकी इस राह में बाधा बनने की कोशिश करता था उसको जान से मार डालता था। सत्ता के नशे में चूर एक विदेशी शासक पूरे हिन्दुस्तान की संस्कृति को मिटा देना चाहता था। ये तो हिन्दुस्तान की संस्कृति की शक्ति और उसमें जनता का विश्वास था कि औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद मिट नहीं पाई। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमारी क्या मजबूरी है कि जिस विदेशी शासक ने भारत और भारतीयता पर हमले कर उनको नष्ट करने की कोशिश की, उसके नाम पर एक दिल्ली के मुख्य इलाके में एक लेन है। ए पी जे अब्दुल कलाम रोड से एक लेन निकलती है जिसका नाम औरंगजेब लेन है। जब कर्जन रोड और कर्जन लेन दोनों का नाम बदल दिया गया तो औरंगजेब रोड के साथ साथ औरंगजेब लेन का नाम क्यों नहीं बदला जा सका। आज देश के मानस को ये प्रश्न मथता है। 


Saturday, September 25, 2021

सूफियों पर पुनर्विचार की जरूरत


हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह की एक पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ 1982 में प्रकाशित हुई थी। तब उस पुस्तक की बहुत चर्चा हुई थी। इसकी भूमिका में नामवर सिंह ने स्वीकार किया था कि ‘परंपरा के समान ही खोज भी एक गतिशील प्रक्रिया है’। उसी गतिशील प्रक्रिया के तहत उन्होंने अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि की खोज की थी। इस पुस्तक के प्रकाशन  के 37 साल बाद एक और मार्क्सवादी आलोचक सुधीश पचौरी ने ‘तीसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक लिखी जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। सुधीश पचौरी अपनी इस पुस्तक में ‘हिंदी साहित्य के उपलब्ध इतिहास की अबतक न देखी गई सीमा को उजागर करने’ का दावा करते हैं। ये भी कहते हैं कि ‘ये हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन का दरवाजा खोलती है’। इसमें नामवर सिंह की खोज से आगे जाकर सुधीश पचौरी ने कुछ ‘खोजा’ है। इस लेख का उद्देश्य इन दोनों पुस्तकों की तुलना करना नहीं है बल्कि सुधीश पचौरी की पुस्तक के कुछ निष्कर्षों पर विचार करना है। सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में सूफियों को इस्लाम का प्रचारक कहा है। अपनी इस अवधारणा के समर्थन में उन्होंने पूर्व में लिखी गई पुस्तकों और वक्तव्यों का सहारा लिया है। सुधीश पचौरी लिखते हैं, ‘मध्यकाल के इतिहास ग्रंथों में सूफी कवियों की छवि ठीक वैसी नजर नहीं आती जैसा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में नजर आती है। साहित्य के इतिहास में वे सिर्फ कवि हैं जबकि इतिहास ग्रंथों में वो वे इस्लाम के प्रचारक के तौर पर सामने आते हैं। साहित्य के इतिहास का लेखन अगर अंतरानुशासिक नजर से किया जाता तो सूफियों की इस्लाम के प्रचारक की भूमिका स्पष्ट रहती।‘ सुधीश पचौरी ने इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि सूफी लोग सुल्तानों के साथ आते थे। उनका काम इस्लाम का प्रचार होता था लेकिन यहां के यथार्थ की जटिलताओं को देखकर कई सुल्तान कट्टर की जगह नरम लाइन लेने लगते थे उसी तरह सूफी भी अपनी लाइन को बदलते थे। 

इतिहासकार मुजफ्फर आलम की बातों से इसकी पुष्टि भी होती है। उनके हवाले से लिखा गया है कि ‘उत्तर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवी के हमलों के साथ ही सूफियों का आगमन हो गया था। तेरहवीं शताब्दी में जब सल्तनत स्थापित हो गया तब सूफियों ने भी अपना विस्तार आरंभ किया’। सूफियों के विस्तार का तरीका बहुत चतुराई भरा था। वो इस्लाम के धर्मगुरुओं से अलग तरीके से काम करते थे लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही होता था कि जिन इलाकों को सुल्तान जीतता था उन इलाकों में इस्लाम को मजबूत करते चलना। इस काम के लिए वो भारत के संतों और महात्माओं से संवाद करते थे और उनकी उन बातों को अपनी रचनाओं में शामिल कर लेते थे जो उनके धर्म को बढ़ावा देने के काम आ सकती थीं। इतिहासकार जियाउद्दनी बरनी के हवाले से ये भी बताया गया है कि जब सुल्तान शम्सुद्दीन अलतुतमिश से इस्लाम के धर्मशास्त्रियों ने शरीआ लागू करने की मांग की और हिंदुओं के सामने इम्माइल इस्लाम-इम्माइल कत्ल यानि इस्लाम या कत्ल में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो सुल्तान ने बेहद चतुराई से इस मसले को टाल दिया था। सुल्तान ने तब कहा था कि अभी अभी हिन्दुतान को जीता गया है जहां हिन्दू बड़ी संख्या में रहते हैं। अगर अभी शरीआ लागू की गई तो हिंदू एकजुट हो सकते हैं और विद्रोह हो सकता है। जब मुस्लिम सेनाएं और ताकतवर हो जाएंगी तब हिंदुओं को इस्लाम या मृत्यु में से एक विकल्प चुनने की बात होगी। इस प्रसंग में अगर सूफियों के उपयोग की बात जोड़कर देखें तो पूरा परिदृश्य साफ हो जाता है। 

हिंदी साहित्य कि बात करें तो सूफियों को इस तरह से स्थापित किया गया कि वो सामाजिक समरसता को बढ़ाने में या सामासिक संस्कृति की जड़ें मजबूत करने के लिए अपनी कविताओं और गीतों का उपयोग करते थे। उनको इस तरह से स्थापित किया गया कि कई लोग तो सूफी ‘संत’ तक कहे जाने लगे। साहित्य के इतिहास में ऐसे कई ‘संतों’ का उल्लेख मिलता है। जबकि वो उन दिनों अपने धर्म का प्रचार करने के लिए इस भूमि पर आए थे। उनका उपयोग उस दौर के आक्रमणकारियों ने साफ्ट पावर के तौर पर किया था। जो काम तलवार नहीं कर पा रही थी उस काम को इन कथित संतों ने अपनी बोली और वाणी से करने का काम किया। इन ‘संतों’ को स्थापित और लोकप्रिय करने के लिए कई मार्क्सवादी इतिहासकारों ने श्रमपूर्वक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। सतीश चंद्रा ने मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखते हुए भक्तिकाल के कवियों की चर्चा में सूफियों को तो याद किया लेकिन तुलसीदास का नाम भी नहीं लिया। ये भूल नहीं हो सकती, ये सायास था। ऐतिहासिक घटनाओं की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की गई जिसने हमारे देश में इस्लाम के प्रचार प्रसार को अलग ही रंग दे दिया। युद्ध में जय पराजय को उस वक्त हमारे देश में व्याप्त सामाजिक स्थितियों से जोड़कर देखा गया। नागरीय क्रांति जैसे पद गढे गए। भारतीय समाज को जातियों में बांटकर इतिहास लेखन किया गया। उस वक्त समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी इतिहास लेखन का आधार बनाया गया।  लेखन की इस पक्षपाती प्रविधि ने इतिहास को एकांगी कर दिया। अगर इतिहास को समग्रता में लिखा गया होता और सारी बातों जनता के सामने आती तो संभव है कि इतिहास के पुनर्लेखन की बात नहीं होती। दुनिया में इतिहास लेखन इस बात का गवाह है कि जब भी इतिहास लेखन एकांगी हुआ है तो उसको वर्षों बाद भी समावेशी करने की कोशिशें हुई हैं। अगर इतिहासकार किसी भी देश के इतिहास को यथार्थ से दूर लेकर जाते हैं और उसमें कल्पना या अपने सिद्धांत के आधार पर की गई व्याख्या को यथार्थ बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर उसके पुनर्लेखन की बात होती ही है चाहे वो दशकों बाद हो या उससे भी बड़े कालखंड के बाद। 

सूफियों का जिस तरह से महिमामंडन किया गया वो भले ही बहुत लंबे कालखंड तक स्वीकार्य रहा लेकिन अब साहित्य के अंदर से ही उस महिमामंडन पर प्रश्न खड़े होने आरंभ हो गए हैं। हिंदी साहित्य में अनेक प्रकार के ज्ञानात्मक विमर्श होते रहे हैं लेकिन साहित्य के इतिहास लेखन को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं दिखाई देता। यूरोप और अमेरिका में आज से करीब पचास पूर्व ही इतिहास लेखन को लेकर एक बहुत गंभीर बहस चली थी। न सिर्फ बहस चली बल्कि इतिहास को नए नजरिए से देखने की कोशिशें भी हुईं। हमारे देश में इतिहास लेखन को राजनीति से जोड़ दिया जाता है इस वजह से हमारे यहां इतिहास लेखन की प्रविधियों को लेकर न तो विमर्श हो पाता है और न ही नए दृष्टिकोण से लेखन। नतीजा यह होता है कि जब भी कोई लेखक इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश करता है तो उसको हतोत्साहित किया जाता है। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है कि तो ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि इतिहास लेखन को लेकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि अलग अलग तरीके से घटनाओं और प्रवृतियों पर विचार किया जाए। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करके उसको गुलाम बनानेवाली ताकतों और उन ताकतों को भारत में स्थापित करने वाले तमाम लोगों, समूहों और शक्तियों के बारे में उपलब्ध जानकारियों के आधार पर समग्र विश्लेषण हो। कोई तथ्य न दबाया जाए न छिपाया जाए। न तो सतीश चंद्रा जैसी गलती होने दी जाए और न ही सूफियों के बारे में उपलब्ध तथ्यों को दबाया जाए। 


Saturday, May 5, 2018

इस्लाम के नाम पर विरोध का पाखंड


अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर पर मचे बवाल के बीच एक और बेहद अहम खबर दब सी गई। उसपर चर्चा कम हो पाई। वैसे भी राजनीति के शोरगुल में कला संस्कृति हमेशा से दबती रही है, लेकिन राजनीति का शोरगुल अस्थायी होता है जबकि संस्कृति, कला और साहित्य में उठने वाले विवाद भले ही नेपथ्य में रहें पर कई पीढ़ियों पर इसका असर होता है। नेहरू जी के समय उठे राजनीतिक विवादों और आरोप-प्रत्यारोप किसको याद हैं लेकिन दिनकर की कृति ‘उर्वशी’ का विवाद अभी भी लोगों के जेहन में ताजा है। पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कृति ‘चॉकलेट’ पर उठा विवाद और उसमें महात्मा गांधी के हस्तक्षेप को ना केवल याद किया जाता है बल्कि उसकी साहित्यिक मसलों में मिसाल भी दी जाती हैं।इस पृष्ठभूमि की चर्चा इस वजह से आवश्यक है कि पिछले दिनों सूफी और इस्लाम के नाम पर एक महिला को धमकाया गया, उसके कपड़ों को लेकर टिप्पणियां की गईं। 30 अप्रैल 2018 को गायिका सोना महापात्रा ने मुंबई पुलिस को एक के बाद एक कई ट्वीट किए। अपने पहले ट्वीट में सोना ने लिखा कि ‘मुझे मदारिया सूफी फाऊंडेशन से एक धमकी भरा नोटिस मिला है जिसमें उन्होंने मुझे मेरे म्यूजिक वीडियो ‘तोरी सूरत’ को हर प्लेटफॉर्म से हटा लेने को कहा है। उनका दावा है कि ये वीडियो अश्लील है और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा देगा।‘ इसके बाद उन्होंने मुंबई पुलिस से ये जानना चाहा कि वो किससे संपर्क कर सकती है। इसके चंद मिनटों के बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया ‘सूफी मदारिया फाउंडेशन मुझे आदतन अपराधी मानता है और उनके मुताबिक पांच साल पुराना मेरा वीडियो जिसमें मैने सूफियाना कलाम ‘पिया से नैना’ गाया था, में इस्लाम का अपमान किया गया है क्योंकि मैंने उस वीडियो में जो कपड़े पहने हुए हैं उससे मेरा शरीर दिखता है।‘ एक और ट्वीट में फिर लिखा जिसमें उन्होंने साफ किया कि स्लीवलेस ड्रेस और शरीर दिखाती नृत्यांगनाओं पर फाउंडेशन को आपत्ति है। इस मसले को लेकर उन्होंने थाने जाने की जानकारी भी अपने ट्वीट के जरिए दी थी।
सोना को मिले इस धमकी भरे पत्र पर सोशल मीडिया में थोडा स्पंदन हुआ, एक-दो न्यूज चैनलों पर चर्चा भी हुई। जहां सोना ने खुद से मोर्चा संभाला। फाउंडेशन के अध्यक्ष का कहना था कि सोना इस वीडियो के माध्यम से पश्चिम की अपसंस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं और उनका गाना और वीडियो में स्लीवलेस कपड़े पहनकर नृत्य करना सूफी परंपरा के खिलाफ है। सोना के मुताबिक सूफी फाउंडेशन के अध्यक्ष तो इसको इस्लाम के अपमान से भी जोड़ रहे थे। उनको कौन समझाए कि सूफी परंपरा मुहब्बत की परंपरा है, नफरत का वहां कोई स्थान नहीं है। फाउंडेशन को अगर लगता है कि इस म्यूजिक अल्बम में अमीर खुसरो और इस्लाम का अपमान हुआ है तो उनको अदालत की शरण में जाना चाहिए था। वो धमकी भरे मेल्स क्यों भेज रहे हैं। टीवी चैनलों पर अपनी आहत भावनाओं का प्रदर्शन क्यों कर रहे थे। उनको इस बात का पता था कि सोना महापात्रा का ये म्यूजिक वीडियो सेंसर बोर्ड से प्रमाणित है लेकिन वो इसको मानने को तैयार नहीं थे।
न्यूज चैनलों पर कई बार ये देखने को मिलता है कि जो शख्स दाढ़ी रखता है और टोपी भी पहनता है वो टीवी चैनलों पर इस्लामिक विद्वान के रूप में प्रस्तुत होता है। टीवी स्क्रीम पर बनी खिड़कियों में बहुधा ऐसे लोग चीखते नजर आते हैं। सोना के मामले में भी इस तरह के लोगों ने धर्म की आड़ में अपनी रोटी सेंकनी शुरू कर दी। इस्लाम को फिर से परिभाषित किया गया लेकिन स्त्री का किसी को ध्यान नहीं। वहीं ये तय किया जाने लगा कि स्त्री कैसे रहे, क्या पहने, क्या गाए आदि आदि। अन्य वक्ताओं ने विरोध भी किया पर मुख्य मुद्दा सियासत के बियावान में खो सा गया। सियासत का तो काम है कि वो किसी भी मुद्दे को अपना औजार बना ले, लेकिन बौद्धिक जगत के किसी भी वर्ग से इस तरह की अपेक्षा नहीं की जाती है। सोना के मामले पर बौद्धिक और कला जगत में कोई खास विरोध देखने को नहीं मिला। एक स्त्री को इस वजह से धमकी दी गई कि उसके कपड़े ठीक नहीं हैं, नृत्य अश्लील है, लेकिन स्त्री विमर्श की झंडाबरदार भी लगभग खामोश ही रहीं। कुछ लोगों ने ट्वीट पर विरोध जताया । मशहूर लेखक और शायर जावेद अख्तर ने सोना के समर्थन में ट्विटर पर लिखा- ‘मैं इस तरह के प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी संगठनों के इस तरह के बर्ताव का पुरजोर विरोध करता हूं, जो सोना महापात्रा के अमीर खुसरो के गीत पर बनाए गए वीडियो पर धमकी देते हैं। इन मुल्लाओं को ये मालूम होना चाहिए कि अमीर खुसरो सभी भारतीयों के हैं, सिर्फ उनकी जागीर नहीं हैं।‘ अन्य इस्लामिक बुद्धिजीवियों को भी जावेद साहब की तरह आगे आकर इस तरह के मसलों का विरोध करना चाहिए और इस्लाम के मुताबिक स्थिति साफ करनी चाहिए।
जावेद अख्तर ने विरोध किया लेकिन अन्य प्रगतिशील विद्वानों का क्या? उनको सोना महापात्रा का अपमान और उनको मिल रही धमकी क्यों नजर नहीं आ रही है। नजर तो उनको अभिनेत्री जायरा वसीम को मिल रही धमकियां भी नहीं आई थीं, जब वो बच्ची दंगल फिल्म की सफलता के बाद अपने गृह राज्य कश्मीर गई थी। उसे इतनी धमकियां मिली थीं कि फेसबुक पोस्ट तक जिलीट करनी पड़ी थी। जिन्ना और अलीगढ़ हिंसा पर न्यायिक जांच की मांग करनेवाले जनवादी लेखक संघ को सोना महापात्रा को मिल रही धमकी और उसका अपमान नजर नहीं आता। उन बयानवीर लेखकों को भी सोना के कपड़ों पर इस्लाम के बहाने सवाल उठानेवाले लोग नजर नहीं आते जो बयान देने के लिए लालायित रहते हैं। क्यों इस्लाम का नाम लेते ही हमारे कथित प्रगतिशील, जनवादी आदि आदि कहलाने वालों के हलक सूखने लगते हैं। सोना एक कलाकार होने के अलावा एक स्त्री भी है, वो क्या पहने, कैसे रहे, क्या गाए ये उसकी स्वतंत्रता है, भारत का संविधान उसको इसकी इजाजत देता है। अगर कोई संविधान के दायरे से बाहर निकलकर उसको धमकी देता है तो भी हमारे प्रगतिशीलता के धव्जवाहक खामोश रहते हैं क्योंकि मामला उनके राजनीतिक अकाओं के मुताबिक नहीं है। सवाल तो उन स्त्रीवादी, नारीवादियों पर भी है जो सोना महापात्रा के समर्थन में खड़ी नहीं हो पा रही हैं। इस मसले पर उनकी कलम भी सूख सी गई, कीबोर्ड जाम हो गया, उनके अंदर का एक्टिविस्ट निरपेक्ष हो गया। यह चुनी हुई चुप्पी या चुनी हुई खामोशी है जो जनवाद और प्रगतिशीलता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
यह पहला मौका नहीं है जब किसी कट्टरपंथी की धमकी पर हमारा कथित तौर पर तरक्कीपसंद खेमा खामोश है। दरअसल अगर हम देखें तो जनवाद, प्रगतिवाद या फिर इससे अलग होकर जन संस्कृति के नाम पर साहित्य के मार्फत सियासत करनेवाले लेखक, संस्कृतिकर्मी, कलाकार दो मसलों पर बिल्कुल खामोश हो जाते हैं। एक तो जब इस्लामिक कट्टरपंथी संस्कृति आदि के नाम पर कुछ करते या बोलते हैं और दूसरे रूस या चीन में कुछ घटित होता है। कुछ महीनों पहले बांग्लादेश में कट्टरपंथियों ने टैगोर की रचनाओं को वहां की पाठ्य पुस्तक से हटवाने की मुहिम चलाई थी, लेकिन हमारा प्रगतिशील तबका तब खामोश रहा था। इसी तरह चीन के एक विश्वविद्यालय ने छात्रों के लिए एक फरमान जारी किया था जिसके मुताबिक कैंपस में लड़का- लड़की एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर नहीं चल सकते थे । लड़का-लड़की एक दूसरे के कंधे पर हाथ भी नहीं रख सकते हैं। इस फैसले में हमारे कथित प्रगतिशील जमात में से किसी को निजता का हनन नजर नहीं आया था।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर के लिए जिनका दिल धड़कता है, जो किसी छोटी सी घटना पर देश के गृहमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को कठघरे में खड़ा कर देते हैं, उनसे जवाब की अपेक्षा रखते हैं उनकी सोना जैसे मसलों पर खामोशी का मतलब समझ नहीं आता । अगर आप बौद्धिक रूप से ईमानदार हैं, अगर आप किसी विचारधारा की बेड़ियों में जकड़े हुए नहीं हैं तो साहित्यक और सामाजिक मुद्दों पर आपकी कलम वस्तुनिष्ठ होकर चलनी चाहिए । कलम में वो धार होनी चाहिए, वो तेज होनी चाहिए जो कि एक न्यायप्रिय शासक के पास हुआ करती थी । जो बगैर धारा, विचारधारा, संगठन, स्वार्थ, जाति समुदाय आदि को देखे न्याय करता था । कलम को अगर हम किसी खास विचारधारा का गुलाम बनाएंगे या फिर कलम की धार किसी खास समुदाय के समर्थन में उठा करेगी तो समय के साथ उस कलम पर से पाठकों का विश्वास  उठता चला जाएगा । लेखकों की नैतिक आभा का क्षरण होना किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं होता है।

Monday, February 20, 2017

धर्म की आड़ में अपमान क्यों ?

बीते रविवार तो दिल्ली में जश्न-ए-ऱेख्ता खत्म हुआ । उर्दू भाषा के इस उत्सव में काफी भीड़ इकट्ठा होती है । बॉलीवुड सितारों से लेकर मंच के कवियों की महफिल सजती है । प्रचारित तो यह भी किया जाता है कि ये तरक्कीपसंद और प्रोग्रेसिव लोगों का जलसा है । होगा । लेकिन इस बार जश्न-ए-रेख्ता में जो हुआ वह इस आयोजन को और इसके आयोजकों को सवालों के घेरे में खड़ा करता है और यह साबित भी करता है कि इस कथित प्रग्रोसिव जलसे में कट्टरपंथियों का भी जुटान होता है । क्या हमारे देश की यह तहजीब है कि सड़सठ साल के एक बुजुर्ग को चारो ओर से घेर कर हल्ला कर किसी समारोह से जाने के लिए मजबूर कर दिया जाए । जश्न ए रेख्ता में मौजूद लोगों ने पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक फतेह के खिलाफ नारेबाजी की और उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अपशब्द भी कहे । इस बात की जानकारी खुद तारेक फतेह ने ट्वीट करके दी । आयोजकों की तरफ से भी बाद में जो सफाई आई वो भी आपत्तिजनक है । इस घटना पर खेद प्रकट करने की बजाए उन्होंने साफ किया कि तारिक फतेह को किसी सेशन के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था । आयोजकों को कार्यक्रम के चलते रहने की फिक्र थी लेकिन एक स्कलॉर के अपमान का अफसोस शायद उनको नहीं था । किसी भी कार्यक्रम के आयोजक की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने मेहमानों की सुरक्षा और उनके मान के लिए प्रयत्न करे । जश्न-ए-रेख्ता के आयोजकों की तरफ से ऐसा कोई संदेश सामने नहीं आया । इससे भी अफसोसनाक तो प्रगतिशील जमात का तारिक फतेह के समर्थन में नहीं उठना रहा । असहिष्णुता के विरोध में बवंडर खड़ा करनेवाले भी कमोबेश खामोश रहे ।  दरअसल तारेक फतह बलोचिस्तन की आजादी की वकालत करते हैं और इस्लाम के कट्टरपंथियों को तार्किक तरीके से एक्सपोज करते हैं । वो दक्षिण एशिया खासकर पाकिस्तान की करतूतों का हमलावर तरीके से विरोध करते हैं लिहाजा कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं । क्या किसी साहित्यक आयोजन में इस तरह का वाकया हमें समाज में बढ़ती असिहुष्णता की ओर इशारा करती है ।
इसी तरह का वाकया हाल ही में समाप्त हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में देखने को मिला था जहां तस्लीमा नसरीन की मौजूदगी पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने विरोध प्रकट किया था और नारेबाजी भी की थी । तस्लीमा का विरोध कर रहे चंद मुस्लिम संगठनों के दबाव में आयोजकों ने उनको भविष्य में जयपुर लिट फेस्ट में नहीं बुलाने का एलान किया।  मुस्लिम संगठनों के दबाव में आयोजकों ने अगर तस्लीमा को नहीं बुलाने का फैसला बरकरार रखा तो तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा । तस्मीमा के विरोध और जयपुर लिट फेस्ट के आयोजकों की उनको भविष्य में नहीं बुलाने के आश्वासन पर भी हमारे बौद्धिक समाज में किसी तरह का कोई स्पंदन नहीं हुआ । यह भी एक किस्म की बौद्धिक बेइमानी है जब अभिव्यक्ति की आजादी पर चुनिंदा तरीके से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं । जब बौद्धिक समाज या कोई विचारधारा अपने आंकलन में पक्षपात करने लगता है तब यह मान लेना चाहिए कि उसका संक्रमण काल है और वाम विचारधारा के अनुयायी करीब करीब हमेशा इस तरह का ही प्रतिक्रिया प्रदर्शन करते हैं । एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने के नाते हमें ये विचार करना होगा कि तस्लीमा या तारेक फतेह के खिलाफ हई घटना छोटी घटना नहीं है और इसको हल्के में नहीं लिया जा सकता है । अब इस बात पर विचार करना होगा कि धार्मिक कट्टरता के खिलाफ किस तरह की रणनीति बनाई जाए क्योंकि कट्टरता ही आतंकवाद की नर्सरी है । कट्टरता के खात्मे के लिए आवश्यक है कि पूरी दुनिया के बौद्धिक इसके खिलाफ एकजुट हों और अपने अपने देशों में आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा दें । इस्लामिक बुद्धिजीवियों पर जिम्मेदारी ज्यादा है । उनको धर्म की आड़ में कट्टरता को पनपने से रोकने के लिए धर्म की गलत व्याख्या पर प्रहार करना होगा । धर्म के ठेकेदारों के खिलाफ बोलना शुरू करना होगा । हर विचारधारा और धर्म के लोगों को गलत को गलत कहने का साहस दिखाना होगा । हम किसी अन्य धर्म में बढ़ रही कट्टरता का विरोध करना इस तर्क के आधार पर नहीं छोड़ सकते हैं कि यह उनका आंतरिक मामला है । जब बात मानवता और इंसानियत की आती है तो फिर वो मामला किसी का भी आंतरिक नहीं रह जाता है क्योंकि आतंक की तबाही ना तो धर्म देखती है और ना ही रंग वो तो सिर्फ जान लेती है ।
हाल की आतंकवादी वारदातों,चाहे वो बांग्लादेश की आतंकवादी वारदात हो या फिर पेरिस में भीड़ पर आतंकवादी हमला या तुर्की में हुआ आतंकवादी हमला, पर नजर डालें तो खतरनाक प्रवृत्ति दिखती है । इन हमलावरों की प्रोफाइल देखने पर आतंकवाद को लेकर चिंता बढ़ जाती है । आश्चर्य तब होता है जब एमबीएम और इंजीनियरिंग के छात्र भी आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं, हमले करने लगे हैं । रमजान के पाक महीने में बांग्लादेश, पेरिस और मक्का समेत कई जगहों पर आतंकवादी वारदातें हुईं थीं । ढाका पुलिस के मुताबिक बम धमाके के मुजरिम शहर के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय में पढ़नेवाले छात्र थे । पूरी दुनिया में इस बात पर मंथन हो रहा है कि इस्लाम को मानने वाले पढ़े लिखे युवकों का रैडिकलाइजेशन कैसे संभव हो पा रहा है । जबतक गलत को गलत कहने का साहस हम नहीं दिखा पाएंगे या फिर तस्लीमा और तारेक फतह के साथ हुई घटना का पुरजोर तरीके से विरोध नहीं करेंगे और उसको धर्म की आड़ देते रहेंगे तो कट्टरता को बढ़ावा मिलता रहेगा । यही कट्टरता कालांतर में मानवता की दुश्मन बनकर खड़ी हो जाती है । तब हम सिर्फ अफसोस कर सकते हैं ।


Sunday, May 3, 2015

कट्टरता को सींचती प्रगतिशीलता

इस्लाम धर्म को बहुत वैज्ञानिक धर्म माना जाता रहा है । कुरान के आधार पर संचालित होनेवाले इस धर्म में कट्टरता की कोई गुंजाइश इसके शुरुआत में नहीं थी लेकिन कांलांतर में कुरान की व्याख्या करनेवाले मौलवियों ने इस धर्म को कट्टरता के गड्ढे में धकेल दिया। आज सही या गलत लेकिन इस्लाम को लेकर पूरे विश्व में यह धारणा बन गई है कि यह बेहद कट्टर धर्म है और इसमें ना तो सहिष्णुता है और ना ही सहनशीलता । यह बहुत ही खतरनाक बात है, प्रवृत्ति भी । मशहूर इस्लामिक चिंतक असगर अली इंजीनियर ने अपनी किताब- इस्लाम का जन्म और विकास- में लिखा था कि दुनियाभर के मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने आधुनिक समाजविज्ञानों की रौशनी में आरंभिक इस्लाम के विश्लेषण के आवश्यक मगर कठिन कार्य को अनदेखा किया । असगर अली इंजीनियर की बात में यह भी जोड़ा जा सकता है कि जब चंद कठमुल्ले कुरान की गलत व्याख्या कर रहे थे तो प्रगतिशील सोच के मुसलमान उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाए । उनकी खामोशी से इस्लामिक कट्टकपंथ को बढ़ावा मिला । हौसले तो बुलंद उनके उन मौलवियों ने भी किए जो फतवा के नाम पर कुरान की आयतों की गलत व्याख्या करते रहे । फतवे की इस राजनीति ने सबसे ज्यादा नुकसान इस्लाम की छवि को पहुंचाया । मुस्लिम प्रगतिशील तबकों के अलावा अपनी प्रगतिशीलता का तमगा गले में लटकाए घूमने वाले और बात बात पर धर्मनिरपेक्षता की दुंदुभि बजानेवाले लोग भी इस्लाम में बढ़ते कट्टरवाद पर खामोश रहे । हिंदू कट्टरतावाद, अव्वल यह शब्द ही गलत प्रचलित किया गया, के खिलाफ जो बयानवीर सामने आते थे वो ऊलजलूल के फतवों के खिलाफ खामोशी ओढ़ लेते थे । इसकी सबसे बड़ी मिसाल तस्लीमा नसरीन हैं । उन्हें पश्चिम बंगाल की प्रगतिशील सरकार ने ही सूबे से बाहर किया था। उस वक्त भी प्रगतिशील लेखकों ने आश्चर्यजनक चुप्पी साध ली थी । जबकि होना यह चाहिए था कि धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार हर धर्म की बुराइयों पर समान रूप से विरोध जताते । चुनिंदा विरोध की वजह से धीरे धीरे उनकी विश्वसनीयता खत्म होती चली गई । इस तरह से अगर हम देखें तो प्रगतिशील जमात ने ही धर्मनिरपेक्षता का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया ।
एक साथ लगभग एक ही तरह की दो बातें सामने आईं हैं । एक तरफ तो भारत सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को कानूनी जामा पहनाने से इंकार कर दिया । भारत सरकार का तर्क है कि भारत में विवाह एक पवित्र संस्था है लिहाजा वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा यहां लागू नहीं हो सकती है । राज्यसभा में भारत सरकार की तरफ से गृह राज्य मंत्री ने अपने लिखित बयान में बताया कि- वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा जैसा कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर समझा जाता है अनेक कारणों से भारतीय परिप्रेक्ष्य में उपयुक्त रूप से लागू नहीं की जा सकती। इन कारणों में शिक्षा-निरक्षरता का स्तर, अनेक रीति रिवाज और मूल्य, धार्मिक आस्थाएं, विवाह को संस्कार मानने की समाज की सोच आदि हैं । भारत सरकार के संसद में दिए गए इस बयान पर पूरा का पूरा तथाकथित प्रगतिशील खेमा तलबारबाजी में जुट गया । दुनिया के तमाम देशों में लागू वैवाहिक बलात्कार के कानून की दुहाई दी जाने लगी । स्त्रियों के अधिकारों की बात पर कोलाहल होने लगा, स्त्री देह की स्वतंत्रता की दुहाई दी जाने लगी, आदि आदि । ऐसा लगा कि आसमान सर पर उठा लिया गया हो । भारत सरकार को दकियानूसी सोच वाली से लेकर उनके इस जवाब को पुरातनपंथी तक करार दे दिया गया । कथित बुद्धिजीवियों में इस बात को लेकर होड़ मच गई कि कौन भारत सरकार की ज्यादा से ज्यादा लानत मलामत कर सकता है ।  संभव है कि उनके तर्क ठीक हों । यह भी संभव है कि देश को अब इस तरह के कानून की जरूरत हो । इस लेख का विषय इस कानून की जरूरत और उसकी बारीकियों के बारे में बात करना नहीं है, बल्कि उन बुद्धिजीवियों को आईना दिखाना है जो विरोध के लिए धर्म विशेष का चुनाव करते हैं । अब एक दूसरा वाकया देखिए जो लगभग इसी तरह का है । मलेशिया के एक मौलवी ने फतवा जारी कर कहा कि औरतें अपने पति को शारीरिक संबंध बनाने के लिए कभी भी मना नहीं कर सकती हैं चाहे वो ऊंट पर ही क्यों ना बैठी हों । उन्होंने भी वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को यूरोपियन अवधारणा करार दिया । यह फतवा धर्म की आड़ में जारी करते हुए कहा गया कि महिला शारीरिक संबंध से सिर्फ तब इंकार कर सकती है जब वो रजस्वला हो, बहुत बीमार हो । मलेशिया के पेराक मुफ्ती जकारिया ने साफ शब्दों में कहा कि मुस्लिम महिला शारीरिक संबंध बनाने के लिए इंकार का अधिकार उस वक्त ही खो देती है जब उसका पिता उसको उसके पति के हाथों सौंप देता है । उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम महिलाओं के पास पति को मना करने का हक ही नहीं है । अपने इस फतवे के समर्थन में वो धर्म के सबसे बड़े ढाल का इस्तेमाल करते हैं । अन्य मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि इस्लाम में बलात्कार की अवधारणा शादी से बाहर की है, बल्कि वो तो यह तक कहते हैं कि बलात्कार कुंवारी लड़कियों पर ही लागू होता है । उनका कहना है कि इस्लाम में अगर शारीरिक संबंध बनाने के पहले पत्नी की सहमति नहीं ली गई तो यह बलात्कार नहीं है बल्कि इसे बेरदब कहा जाता है जिसका मतलब होता है असभ्य। इसको हराम नहीं माना जाता है बल्कि इसको मकरूह कहा जाता है जिसका अर्थ होता है ऐसा कार्य जिसको नहीं किया जाना चाहिए था । इस फतवे के खिलाफ कहीं से कोई आवाज नहीं उठी । इसमें किसी को स्त्री स्वातंत्र्य का हनन नजर नहीं आया । किसी भी कथित प्रगतिशील बौद्धिक ने इसपर सार्वजनिक एतराज नहीं जताया । जबति भारत सरकार के तर्क में सामाजिक स्थितियों से लेकर शिक्षा के स्तर तक की दुहाई दी गई थी वहीं फतवे में तो फैसला सुनाया गया था । पिता के द्वारा पति तो सौंपे जाने की बात भी थी । इस वक्तव्य में किसी को भी महिला उपभोग की वस्तु नजर नहीं आती है । कोई हाय तौबा नहीं मचती है । अब इन लगभग समान दो स्थितियों पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं इन कथित प्रगतिशीलों को कठघरे में खड़ाकर देती है । उनकी मंशा पर संदेह करने का पुख्ता आधार प्रदान करती है ।
दरअसल इस्लाम में कट्टरपंथियों के बोलबाला बढ़ते चले जाने की बड़ी वजह यही है कि हम उसपर सख्त रूप से अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते हैं । हाल में तो प्रतिक्रिया देनेवालों को मौत की नींद सुला देने की वारदातें ज्यादा होने लगी हैं । बांग्लादेश में ब्लॉगर की नृशंस हत्या, फिर पाकिस्तान में भी मानवाधिकार कार्यकर्ता सबीन का कत्ल आदि जैसी वारदातें धर्म की आड़ में ही की जा रही हैं । दरअसल इस्लाम धर्म के नाम पर इस तरह के दहशत का खेल पूरी दुनिया में खेला जा रहा है । अभी हाल ही में दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में एक प्रोफेसर पर जानलेवा हमला हुआ क्योंकि उसने सलमान रश्दी के पक्ष में लेक्चर दे दिया था । कुछ दिनों से श्रीलंका की तमिल लेखिका शर्मिला सईद निर्वासित जीवन बिताने को मजबूर हैं क्योंकि उन्होंने तमिल में चलनेवाले एक रेडियो पर दो हजार बारह में उन्होंने इस बात की वकालत की थी कि श्रीलंका में वेश्यावृत्ति को कानूनी कर दिया जाए । उनके इस बयान को इस्लाम की कसौटी पर कसा गया और वहां उसको पाप की श्रेणी में पाया गया क्योंकि इस्लाम में वेश्यावृत्ति को गुनाह माना गया है । उसके बाद शर्मिला सईद और उसके परिवारवालों को धमकियां मिलनी शुरू होने लगी । फेसबुक पर उनके नाम से प्रोफाइल बनाकर अश्लील और भद्दे कमेंट लिखे जाने लगे । ये प्रोफाइल रक्तबीज की तरह बढ़ते थे । शर्मिला और उसके पिता फेसबुक से कहकर एक को हटवाते थे तो सौ और प्रोफाइल बन जाते थे । हर जगह यही तर्क दिए जाने लगे कि एक मुस्लिम महिला कैसे वेश्यावृत्ति की वकालत कर सकती है । शर्मिला के माफी मांगने के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ क्योंकि कठमुल्ले उनसे बगैर शर्त माफी की मांग कर रहे थे जबकि शर्मीला इसके लिए राजी नहीं थी । यहां भी शर्मिला के समर्थन में इक्का दुक्का बुद्धिजीवी ही आए और अपील जारी करने की औपचारिकता निभा गए ।

अब अगर हम गहराई से इस पूरे परिदृश्य पर विचार करें तो बहुत अंधेरा नजर आता है । आलोचना पर हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति भारतीय मुस्लिम समाज पर भी हावी होने के लिए सर पर तैयार खड़ी है । भारत में इस कट्टरपंथ को रोकने के लिए मुस्लिम बुद्धि्जीवियों को तो आगे आना ही होगा साथ ही समाज के हर तबके के बुद्धिजीवियों को समान भाव से कट्टर पंथ पर हल्ला बोलना होगा । अगर हमारे प्रगतिशीलों ने चुनिंदा विरोध की आदत से तौबा नहीं किया तो संभव है कि कट्टरपंथ और हिंसक हो जाए । वह स्थिति हमारे लोकतंत्र के साथ साथ देश को भीकमजोर करेगी । 

Monday, April 6, 2015

कट्टरपंथियों पर हल्ला बोलना होगा

कोलकाता में एक बार फिर से धर्म के नाम पर हिंसा का खेल खेला गया । एक मदरसे के हेडमास्टर पर उसके स्कूल में घुसकर जानलेवा हमला किया गया । चिंता की बात तो ये है कि पुलिस की मौजूदगी में मासूम अख्तर नाम के इस शख्स पर हमला होता रहा और बंगाल पुलिस खामोशी के साथ असहाय खड़ी रही । मासूम अख्तर का दोष सिर्फ इतना है कि उसने बर्धवान धमाके को लेकर एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह संकेत दिया था कि अगर किसी मदरसे से आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है या फिर मदरसे में आतंकवाद को पनाह दिया जाता है तो उसको भंग कर दिया जाना चाहिए । यह बात इस्लामी कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरी और इस लेख के बाद मासूम अख्तर को धमकियां मिलने लगीं । फिर बहाना मिला ईशनिंदा का । अपने एक क्लास में मासूम अख्तर मे ऐतिहासिक संदर्भ में पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा को लेकर टिप्पणी की । वह टिप्पणी इस संदर्भ में थी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के पैगंबर ने दुनिया में ज्ञान का प्रकाश फैलाया । लेकिन कट्टरपंथियों ने क्लास में दिए मासूम के वक्तव्य को इस तरह से पेश कर दिया कि उसने पैगंबर की शिक्षा पर सवाल खड़े किए । यह बात जंगल में आग की तरह फैली और फिर मासूम अख्तर के स्कूल में घुसकर कट्टरपंथियों ने उनपर लाठी और सरिए से वार किया । अस्पताल में इलाज करा कर घर लौटे मासूम अख्तर को अब भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं । वो सरकार से गुहार लगा रहे हैं, उनको कार्रवाई का भरोसा मिल रहा है लेकिन स्तंभ लिखे जाने तक हमलावर आजाद घूम रहे हैं । मासूम अख्तर को इस बात का डर है कि उनका हश्र भी बांग्लादेश के उन ब्लागरों जैसा ना हो । पिछले दिनों बांग्लादेश में दो ब्लागरों को कट्टरपंथियों ने मौत के घाट उतार दिया । इसके पहले भी ईशनिंदा के आरोप में पाकिस्तान के सूबे के गवर्नर को भी गोली मार दी गई थी । सलमान रश्दी पर भी यही आरोप है, तस्मीमा पर भी । मासूम अख्तर को भी यही धमकी मिल रही है कि तुम सलमान रश्दी बनना चाहते हो तो सुधर जाओ वर्ना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो । क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है । हमारा संविधान किसी भी नागरिक को अपनी बात कहने का हक देता है । इस हक की सीमा वहां तक है जहां कि किसी को नुकसान ना पहुंचे या उसकी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आए । अभी हाल के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66 ए को खत्म करते हुए भी कहा था कि संविधान में मिली अभिव्यक्ति की आजादी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि आईटी एक्ट की धारा 66 ए से अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होती है लिहाजा उस धारा को रद्द कर दिया । एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट अभियक्ति की आजादी की रक्षा के लिए भारत सरकार के कानून को रद्द कर दे रहा है वहीं दूसरी ओर एक शख्स अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए दर बदर भटक रहा है । बंगाल की ममता सरकार की चुप्पी मासूम के लिए जानलेवा साबिकत हो सकती है ।  उसकी जान खतरे में है लेकिन कोई देखनेवाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं, कोई कानून सम्मत काम करने के लिए आगे आना वाला नहीं । हमारे मजबूत होते लोकतंत्र के लिए यह बहुत ही चिंता का विषय है ।
अब हम मासूम अख्तर के बहाने से अगर इस बात की पड़ताल करें कि क्यों ममता सरकार इस पर सख्ती से पेश नहीं आ रही है । क्यों बंगाल पुलिस त्वरित कार्रवाई कर मासूम के जान की गारंटी नहीं दे पा रही है  । क्यों हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है ? क्यों हमलावरों की खुलेआम पैरोकारी करने वाले इमाम की गिरफ्तारी नहीं हो रही है ? क्यों मासूम अख्तर को सुरक्षा नहीं दी जा रही है ? अगर हम इन सवालों से मुठभेड़ करते हैं तो नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसके पीछे सियासी और वोट बैंक की राजनीति है । पश्चिम बंगाल की आबादी में से करीब छब्बीस फीसदी हिस्सा मुसलमानों का है। कई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं को मत निर्णायक होता है । अब इसी चुनावी गणित की वजह से बंगाल का में राजनीतिक दल कट्टरपंथियों के खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत नहीं कर पाते हैं । पश्चिम बंगाल वामपंथियों का गढ़ रहा है । वामपंथी हमेशा से अपने आपको अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार के तौर पर पेश करते रहे हैं । मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को लेकर जब विवाद उठा था तो इन वामपंथियों ने आसमान सर पर उठा लिया था । लेकिन यही वामपंथी नेता, विचारक, लेखक उस वक्त खामोश रहे जब पश्चिम बंगाल की सरकार ने बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन को वहां से निकाल दिया । वही वामपंथी नेता इलस वक्त भी खामोश हैं जब मासूम अख्तर अपनिी जान बचाने के लिए भागा भागा फिर रहा है ।  उस वक्त आसमान सर पर उठा लेने वाली ममता बनर्जी जब सूबे की मुख्यमंत्री  बनी तो वो तस्लीमा के मसले पर खामोश रहीं । तस्मीमा को अब भी बंगाल में कदम रखवे की इजाजत नहीं है, उसकी किताबों को कोलकाता पुस्तक मेले में बेचे जाने पर अघोषित रोक है । अगर गलती से कोई प्रकाशक तस्मीमा की किताब बेचने लगता है तो वहां हंगामा होता है या हंगामे की कोशिश होती है । तस्लीमा को बंगाल से बाहर करने को लेकर एक मौलाना खुलेआम गरजते हैं कि हां उन्होंने बाहर किया तस्मीमा को लेकिन ना तो वामपंथी नेता और ना ही ममता बनर्जी उसका विरोध करती है, कार्रवाई की बात तो दूर  । वामपंथियों के इसी चुनिंदा विरोध की वजह से उनकी साख रसातल में चली गई । राजनीति में उनके घटते समर्थन का असर साहित्य पर भी दिखा और साहित्य में वामपंथियों की गिरोहबंदी कमजोर पड़ती नजर आने लगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कई फिर विस्तर से चर्चा होगी ।
मासूम अख्तर के बहाने से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है वह है देश में अभिव्यक्ति की आजादी का । क्या किसी भी शख्स को वाजिब सवाल उठाने पर जान से मार देने की धमकी मिलेगी या फिर उसे जान से मार दिया जाएगा । क्या भारत में भी कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हो जाएंगे कि उनको कानून का खौफ नहीं रहेगा । क्या वोटबैंक की इस राजनीति को लोकतंत्र को कमजोर करने की इजाजत दी जा सकती है । इन सवालों के आलोक में देशभर में बहस होनी चाहिए । हमारा मानना है कि इस्लाम को मानने वाले सभी कट्टरपंथी नहीं हो सकते हैं । मासूम अख्तर जैसे विवादित मसलों पर मुसलिम इंटलैक्चुअल को सामने आना होगा और उनको सही तस्वीर पेश करनी होगी । अपनिी राय से देश को अवगत करवाना होगा । इस तरह के मसलों पर मुस्लिम बौद्धिक का खामोश रहना कट्टरपंथियों को मौन समर्थन देने जैसा है । इससे यह भी संदेश जाता है कि इस्लाम में कट्टरपंथ है जबकि ऐसा है नहीं । अव्वल तो सभी लोगों को इस तरह के कदमों का और इस तरह की राजनीति का विरोध करना होगा लेकिन अगर इसी धर्म को मानने वाले लोग अंदर से अपनी बात कहेंगे तो उसका दूसरा असर होगा । देश के सियासतदां को लगेगा कि मुसलमानों के बीच भी अलहदा सोच रखनेवाले लोग हैं । इससे उनको यह भी संदेश जाएगा कि वोट बंट सकते हैं । इस संकेत को बाद संभव है कि वो कोई कार्रवाई कर सकें या कम से कम इस दिशा में कोई कदम तो उठा सकें ।

जिस तरह से मुस्लिम बैद्धिकों से अपेक्षा की जाती है कि वो कट्टरपंथियों के खिलाफ बोलें, उठ खड़े हों , उसी तरह से सभी बौद्धिकों को समान रूप से इस तरह की घटनाओं के विरोध में लिखना चाहिए याजिस भी तरीके से हो सके विरोध जताना चाहिए । यह खतरा उठाना होगा । दरअसल हमारे देश के बौद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा के दबदबे ने इस तरह का माहौल बना दिया है कि अगर मुसलमानों के कट्टरपंथ के बारे में लिखोगे तो संघी करार दिया जाएगा । आपकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े होने लगेंगे । इसी माहौल की वजह से लेखक विचारक इस मसले पर बोलने से कतराते हैं । हिंदी के मशहूर लेखक राजेन्द्र यादव तो हमेशा कहते थे कि मुसलमानों के मसले पर हम क्यों बोलें वो खुद अपने मसलों पर बोलें । दरअसल हमें इस सोच को बदलने की आवश्यकता है । सच को सच कहना ही होगा । वर्ना मासूम अख्तर जैसे शख्स दर बदर भटकते हुए किसी दिन मार दिए जाएंगे और कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद होंगे और सियासतदां उनकी कब्र पर वोट की लहलहाती फसल देख कर खुश होते रहेंगे ।       

Thursday, June 20, 2013

अलविदा ! इंजीनियर

एक बार कुछ लोग मोहम्मद साहब के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि हुजूर आपके बाद अगर इस्लाम के नाम पर उसकी अनर्गल व्याख्या की जाने लगे तो उसको कैसे परखा जाए कि वो सही है या गलत । मोहम्मद साहब ने कुछ देर सोचने के बाद जबाव दिया कि इस्लाम की किसी भी तरह की व्याख्या को पवित्र कुरआन की कसौटी पर कसना और अगर कोई भी व्याख्या, चाहे वो कितने भी विद्वान की क्यों ना हो,कुरआन की कसौटी पर खरा ना उतरे तो उसको उठाकर दीवार पर मारना । मोहम्मद साहब के इस कथन को कई व्याख्याकारों ने भुला दिया या फिर ये कह सकते हैं कि उसे दरकिनार कर दिया । नतीजा यह हुआ कि इस्लाम में कट्टरपंथ को लागातर बढावा मिलता रहा । लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि सभी इस्लामी विद्वानों ने इस्लाम की व्याख्या में गलती की । वहां भी कई तरक्कीपसंद और प्रगतिशील विचारधारा के स्कॉलर हुए जिन्होंने इस्लाम में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई । अस्सी के दशक में भारत में एक ऐसा ही चिंतक और विचारक सामने आया जिसने इस्लाम और उसकी व्याख्या को तर्कों की कसौटी पर कसना शुरू किया । इस शख्स का नाम था असगर अली इंजीनियर । अस्सी के दशक में ही असगर अली इंजीनियर साहब ने इस्लाम और भारत में सांप्रदायिक हिंसा के नाम के नाम पर किताबों की एक पूरी श्रृंखला प्रकाशित की । असगर अली इंजीनियर के तर्कों ने कट्टरपंथियों को बेचैन कर दिया । उन्हें लगा कि अगर इस शख्स को नहीं रोका गया तो उनकी दुकानदारी बंद हो सकती है । धर्म की गलत-सलत व्याख्या कर अपनी दुकान चमकानेवालो ने असगर अली इंजीनियर पर एक नहीं, दो नहीं बल्कि आधा दर्ज बार जानलेवा हमला करवाया । लेकिन असगर अली इंजीनियर अरने पथ से डिगे नहीं और अपनी कलम के जोर पर कुरीतियों के खिलाफ जंग को जारी रखा ।
असगर अली का जन्म राजस्थान के दाउदी वोहरा समाज के आमिल परविार में हुआ 10 मार्च 1939 को हुआ था । उनकी प्रारंभिक शिक्षा मदरसे में हुई जहां उन्हें कुरान, हदीस और अरबी की तालीम दी गई । लेकिन असगर अली का दिल कहीं और लग रहा था । अपने मेहनत के बल पर उन्होंने इंदौर के इंजीनियर कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और नौकरी के लिए मुंबई जा पहुंचे । असगर अली साहब ने तकरीबन दो दशक तक मुंबई महानगर पालिका में इंजीनियर की नौकरी की और यहीं से उनके नाम के साथ इंजीनियर जुड़ गया । जब पूरा देश इमरजेंसी के सदमे और खौफ में था उस वक्त असगर अली साहब ने तय किया कि वो नौकरी नहीं करेंगे । नौकरी छोड़ने के बाद असगर अली साहब ने दाऊदी बोहरा समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी । 1977 में वो सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कमेटी के महासचिव बने । इस पद पर पहुंचते ही उन्होंने इस समाज में जारी कठमुल्लेपन पर अपनी लेखनी और कार्यों के जरिए हल्ला बोल दिया । असगर अली साहब ने इस्लाम और इस्लामिक न्याय शास्त्र का तार्किक विवेचन शुरू कर दिया ।  नतीजा यह हुआ कि बोहरा समाज के धर्मगुरू ने उनको समाज से बाहर करने का फरमान जारी कर दिया । समाज बदर के फरमान के बाद उनके दफ्तरों पर हमले हुए लेकिन कोई भी इस्लामी संगठन उनके बचाव के लिए आगे नहीं आाया । इस वक्त असगर अली इंजीनियर बेहद जांबाजी के साथ कठमुल्लों से लोहा लेते रहे और यह साबित किया कि क्रांति के लिए हथियार उठाना जरूरी नहीं बल्कि कलम के जोर पर भी समाज में बदलाव के बीज बोए जा सकते हैं ।  उनके इस काम में हिंदी की उस दौर की प्रतिष्ठित पत्रिका सारिका और उसके तत्कालीन संपादक कमलेश्वर ने साथ दिया । असगर अली इंजीनियर के कई लेख उस दौर में सारिका में छपे जिसके बाद गैर उर्दू पाठकों के बीच भी असगर अली इंजीनियर साहब की एक छवि निर्मित हुई । इस्लाम की व्याख्या का असगर अली इंजीनियर का अपना एक अलहदा तरीका था । असगर अली मानते थे कि इस्लाम में जिनकी आस्था नहीं है वो भी इ्स्लामिक नागरिकों की तरह के ही इंसान हैं । जोर जबरदस्ती से धर्म के प्रचार के वो खिलाफ थे, उनकी यही बातें कठमुल्लों को रास नहीं आती थी ।
आज के मौजूदा हालात में भारत के अलावा विश्व के कई देशों में इस्लाम को लेकर बहुत भ्रांतियां व्याप्त हैं । अलग अलग तरह की टीकाओं और व्याख्याओं के चलते इस्लाम की छवि एक कट्टरपंथी धर्म के रूप में दिनों दिन मजबूत होती जा रही है । इस्लाम की सही व्याख्या करती हुई किताबें भी भारत में लगभग नहीं के बराबर मौजूद हैं । असगर अली इंजीनियर ने अपने लेखन से भरसक इस कमी को दूर करने की कोशिश की । उनकी कई किताबें- इस्लाम एंड इट्स रेलिवेंस टू ऑवर एज, इस्लाम एंड रिवोल्यूशन, इस्लाम एंड मुस्लिम्स जैसी किताबों ने धर्म पर छाए धुंध को हटाने का काम किया । भारत में दंगों पर भी असगर अली इंजीनियर साहब ने काफी काम किया । दंगा पीड़ित इलाकों का भ्रमण करने के बाद वहां के लोगों को मनोविज्ञान पर भी उन्होंने किताबें लिखी । इस विषय पर लिखी उनकी दो किताबें- कम्युनिल्ज्म और कॉमिन्यूल वॉयलेंस इन इंडिया और कम्युनल रॉयट्स इन पोस्ट इंडिपेंडेंस इंडिया- बेहतरीन हैं । भारत के सामाजिक तानेबाने को समझने के लिए इन दो किताबों को पढ़ना मुझे जरूरी सा लगता है ।
असगर अली इंजीनियर साहब इस्लाम में स्त्रियों की स्थिति को लेकर खासे चिंतत रहा करते थे । उनका मानना था कि कुरआन में स्त्रियों को जो जगह दी गई है वो अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाई हैं । असगर अली साहब कहते थे कि मुसलमानों में जिस तरह का पितृसत्तात्मक समाज है वहां महिलाओं का अभी तक बराबरी का हक नहीं दिया जा सका है । वो ताउम्र मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ते रहे । असगर साहब का मानना था कि आधुनिक जमाने की महिलाएं ज्यादा पढ़ी लिखी और संवेदनशील हैं लिहाजा उन्हें यह गंवारा नहीं है कि वो अपने पति का प्यार अपनी सौतन के साथ बांटे । उनका मानना था कि स्त्रियों को बराबरी का हक देने की वकालत नहीं करनेवाले लोग धार्मिक नहीं हो सकते । असगर अली के आलोचक इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते थे । उनके विरोधियों का तर्क है कि असगर अली ने कुरआन की व्याख्या बेहद आधुनिक तरीके से की है । जिस वक्त कुरआन अस्तित्व में आया था उलस वक्त के हालात अलग थे । लेकिन असगर अली इंजीनियर अपनी बातों पर अडिग रहे । असगर अली इंजीनियर साहब ने पचास से ज्यादा किताबें लिखी ।अभी कुल सालों पहले ही उनकी आत्मकथा भी आई थी।
14 मई को असगर अली इंजीनियर साहब ने मुंबई में अंतिम सांसे ली । उन्हें उनकी आखिरी इच्छा के मुताबिक दाऊदी बोहरा संप्रदाय के कब्रिस्तान में नहीं दफनाकर सांताक्रूज के मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया गया जहां उनके दोस्त मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी, अली सरदार जाफरी दफ्न हैं । उन्हें उनके बेटे इरफान के साथ उनके निकट सहयोगी राम पुनियानी ने कब्र में उतारा । एक मुसलमान स्कॉलर को एक हिंदू ने कब्र में उतारा, इसका एक बड़ा संदेश है जो अली असगर इंजीनियर साहब देना चाहते थे । असगर अली इंजीनियर साहब को श्रद्धांजलि–
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