Translate

Showing posts with label कम्युनिस्ट. Show all posts
Showing posts with label कम्युनिस्ट. Show all posts

Saturday, August 22, 2026

श्रीराम की छवि की व्याख्या का खेल


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किला की प्राचीर से दिमागी नक्सल शब्द युग्म का प्रयोग किया। तमाम दिमागी नक्सल बिलबिलाने लगे। समाज को पता लगाने के लिए श्रम नहीं करना पड़ा और उनकी पहचान हो गई। यह ठीक है कि समाज में दिमागी नक्सलियों की उपस्थिति है, पर दिमागी नक्सल व्यक्ति से अधिक प्रवृत्ति है। ये प्रवृत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती है। दिमागी नक्सली जैसी प्रवृत्ति समय के अनुसार अपने में बदलाव करके समाज को भ्रमित करने का कार्य भी करती है। प्रश्न उठता है कि क्या ये अनायास है कि प्रगतिशील और जनवादियों को अब प्रभु श्रीराम की चिंता होने लगी है। समाज में राम-राम कहकर अभिवादन करने की जगह जयश्रीराम से अभिवादन करना उनको राजनीतिक लगने लगा है। राम-राम और जयश्रीराम में उनको अंतर नजर आता है। राम-राम में कोमलता और जयश्रीराम में आक्रामकता। इतना ही नहीं समाजवाद की डोर थामे जनवाद की ध्वजा लहरानेवाले एक प्राध्यापक आलोचक तो कबीर और गांधी के राम, तुलसीदास के राम और सत्ताधारी दल के राम में अंतर दिखाने की कोशिश करते हैं। अयोध्या के भव्य और नव्य मंदिर में स्थापित श्रीराम की अलग छवि ढूंढने की कोशिश भी होती है। ढूंढते ही नहीं हैं बल्कि प्रभु श्रीराम की एक राजनीतिक छवि गाढा करने का प्रयत्न करते हैं। अच्छी बात है कि समाजवादी/जनवादी और वामपंथी प्रभु श्रीराम की बात तो करने लगे हैं। यह इनका ह्रदय परिवर्तन है या समाज को राम के नाम पर बांटने का प्रयास। इसको देखना होगा। वो राम की राजनीतिक छवि गढ़ने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि राम के इमाम-ए-हिंद कहे जाने की बात को दोहराते हुए एक अलग विमर्श खड़ा करना चाहते हैं। ये भूल जाते हैं कि लोक में प्रभु श्रीराम की जो छवि व्याप्त है उसको बदलने या उसको प्रश्नांकित करने का प्रयास सफल हो ही नहीं सकता है। 

एक वामपंथी प्राध्यापक आलोचक प्रभु श्रीराम की छवियों में अंतर खोज रहे हैं तो एक अन्य वामपंथी प्राध्यापक-आलोचक तुलसी को याद करते हुए उनकी पंक्तियों को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान राजनीति से जोड़कर सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। तुलसी दास की पंक्तियों के आधार पर ये महोदय भी श्रीराम की वाल्मीकि की बनाई छवि, तुलसी की रचनाओं से बनती छवि और आज की राजनीति में उनकी छवि को अलग अलग देखने का प्रयत्न करते हैं। आलोचक महोदय कहते हैं, तुलसी ने जिस राम को गढ़ा था वे वाल्मीकि से भिन्न हैं और आज जिस राम का प्रचार है वो तुलसी के राम से भिन्न हैं। फतवेबाजी करके निकल जाते हैं अपनी अवधारणा के समर्थन में कोई मजबूत तर्क प्रस्तुत नहीं करते हैं। ये महोदय तुलसी की एक पंक्ति राज-नीति बिनु धन-बिनु धर्मा को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इसमें तुलसी अपने समय में स्पष्ट कहते हैं कि राजनीति नीति-विहीन हो गई है और लोग अधर्म को अपना कर अमीर हो रहे हैं। साथ ही एक पंक्ति जड़ते हैं कि यह आज का भी यथार्थ है। प्रस्तुत ऐसे कर रहे हैं कि ऐसा हाल के दिनों में हो रहा है पहले ऐसा नहीं था। यही आलोचकीय बेईमानी है। इस तरह की कई पंक्तियों को उद्धत करके उसको आज का संदर्भ देने की कोशिश में भाईलोग लगे हुए हैं। तुलसीदास की पंक्तियों के साथ वामपंथी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं बल्कि पहले भी लगातार ऐसा करते हैं। महिलाओं और समाज के एक विशेष वर्ग को लेकर लिखी गई उनकी पंक्तियों के आधार पर तुलसीदास को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। 

तुलसीदास की बात करते हुए इन वामपंथियों को कबीर अवश्य याद आते हैं। कबीर को वो क्रांतिकारी सिद्ध करते रहे हैं । उनकी तुलना में तुलसी को परंपरावादी और दकियानूसी कहते हैं। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को परंपरावादी दिखाने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी जमकर आलोचना की। श्रीरामचरितमानस की एक पंक्ति को उठाकर तुलसीदास को कलंकित करने का प्रयास हुआ लेकिन उनकी कविताओं में उनकी रचित चौपाइयों में इतनी शक्ति है कि वो उनपर इन आलोचनाओं का कोई असर ही नहीं हुआ। वामपंथियों ने सुनियोजित तरीके से तुलसीदास की उन पंक्तियों को उठाया जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक की बनती हो। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले श्रीरामचरितमानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर उनकी नजर नहीं जाती है। तुलसीदास लिखते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो श्रीरामचरितमानस में पुत्री की विदाई के प्रसंग में लिखा - बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इतना ही नहीं तुलसी ये भी कहते हैं कि- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पंक्तियों को आलोच्य पंक्ति के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक उन पंक्तियों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी के रामराज्य में चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन मिलता है । इस ओर क्रांतिकारी कामरेड लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। चुलसी ने लिखा है– राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहां बरन चारिउ नर। साहित्य में ये वामपंथी खेल तुलसीदास के अलावा प्रेमचंद और निराला के साथ भी खेला गया। प्रेमचंद और निराला दोनों लेखकों ने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका कल्याण के विशेषांकों और अन्य अंकों में लेख लिखे। उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं चलने दिया गया कि प्रेमंद और निकाला ने कल्याण में भी लिखा है। उनको वामपंथी बता दिया गया। ये पाठ्य पुस्चतों से लेकर शोध तक होता रहा। इसके आधार पर ही स्वयं को बौद्धिक भी कहने लगे। 

इस तरह की बौद्धिक बेइमानियों को किस कोष्ठक में रखना चाहिए ये तो पाठक तय कर लेंगे। पाठकों के सामने नहीं आने देने का जो षडयंत्र रचा गया और जिसको सरकारों की शक्ति के कारण अंजाम तक पहुंचाया गया उसको परिभाषित करने के लिए लाल किला की प्राचीर से बोला गया शब्द युग्म दिमागी नक्सल सटीक बैठता है। हिंदी समाज को इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। वही तत्व अब श्रीराम को भी बांटकर समाज के सामने प्रस्तुत करने के चक्कर में लग गए हैं लेकिन इससे इतना तो हुआ कि प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे हैं, उनको काल्पनिक नहीं बता रहे हैं। जब ये संगठित और सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाने लगे और सबकी टिप्पणियों में एक साझा सूत्र दिखाई देने लगे तो समझ लीजिए कि साहित्य के बेईमान लोग इकट्ठा हो गए हैं और कुछ काल्पनिक अवधारणा को यथार्थ का रूप देने निकल पड़े हैं। पर इस बार ये भूल जा रहे हैं कि भारतीय समाज में श्रीराम को परिभाषित करके उनको किसी कोष्ठक में नहीं रखा जा सकता। सबके अपने अपने काम हैं उनको किसी परिभाषा की आवश्कता नहीं।   


Saturday, July 25, 2026

सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?


दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी। अब भी वामपंथी लेखक जिन कार्यक्रमों में जाते हैं और वहां इसी तरह की बातें करते हैं जिससे भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नीचा दिखाया जा सके। कई गोष्ठियों में इस तरह के विमर्श का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं इस कारण यह बात रख रहा हूं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र से वामपंथियों का प्रभाव कम नहीं हो पाया है। यह कार्य प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होना है। इस कार्य को करने के लिए शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे नेतृत्व को निर्णय लेना होगा। विश्वविद्यालयों में कुलपति के स्तर पर और सांस्कृतिक संस्थाओं में निदेशक/अध्यक्ष के स्तर पर ये कार्य होना चाहिए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं को भी ध्यानपूर्वक कार्य करना होगा। फिल्मों के क्षेत्र में जिस तरह से वाम विचार के लोग विचार की रामनामी ओढ़कर सक्रिय हैं उनकी पहचान करके उनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को नाकाम करना होगा। ये कहकर भी नहीं बचा जा सकता है कि सरकार भले ही हमारी है लेकिन सिस्टम तो उनका ही है। सिस्टम तो सरकार के हिसाब से बनती है। बनाने का प्रयास करना चाहिए। 

Saturday, October 4, 2025

सबरीमाला मंदिर की आस्था पर चोट


केरल में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं। सभी राजनीतिक दल चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्टों के गठबंधन ने केरल में सरकार बनाई। पी विजयन मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में कम्युनिस्ट गठबंधन तीसरी बार राज्य में सरकार बनाने के लिए प्रयत्नशील है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी वामपंथी गठबंधन को चुनावी मात देकर दस साल बाद सत्ता में वापसी के मंसूबे पाले बैठी है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से केरल की राजनीति में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने में लगी है। चुनाव की आहट के साथ त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड ने पिछले महीने वैश्विक अयप्पा संगमम का आयोजन किया। घोषित तौर पर इस संगमम का उद्देश्य सबरीमाला मंदिर की महिमा का वैश्विक स्तर पर विस्तार करना था। केरल के राजनीतिक दलों ने कम्युनिस्ट सरकार पर आरोप लगाया कि हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए संगमम का आयोजन किया गया। संगमम की चर्चा के बीच सबरीमाला मंदिर प्रशासन एक अन्य कारण से विवाद में घिर गया। सबरीमाला मंदिर से करीब पांच किलो सोना चोरी होने की आशंका है। इस समाचार के बाहर आते ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी केरल की कम्युनिस्ट सरकार पर हमलावर है। सरकार ही त्रावणकोर देवोस्थानम बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति करती है। बोर्ड की स्थापना तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के अलावा मंदिरों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए की गई थी। 

सबरीमाला मंदिर से पांच किलो सोना गायब होने का मामला केरल और दक्षिण भारत में इन दिनों खूब चर्चा में है। मंदिर प्रशासन पर आरोप लग रहे हैं मंदिर के गर्भगृह और उसके बाहर लगे द्वारपाल की मूर्ति और अन्य जगहों पर मढ़े गए सोने का वजन उसकी सफाई या बदलाव के दौरान पांच किलो कम हो गया। पूरा मामला इस तरह से है। 1998-99 में कारोबारी विजय माल्या, जो इन दिनों आर्थिक अपराध के आरोप में देश से फरार हैं, ने सबरीमाला मंदिर में 30 किलो सोने का चढ़ावा दिया था। उस समय ये बात सामने आई थी कि मंदिर प्रशासन ने उस सोना का उपयोग गर्भगृह और उसके बाहर लगे द्वारपाल की प्रतिमा को स्वर्णसज्जित करने में किया था। करीब बीस वर्षों के बाद जब त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड ने मंदिर के रखरखाव के लिए स्वर्ण परतों को हटाया तो पता चला कि वो सोने का नहीं था। अब इस बात की जांच की जा रही है कि सोना लगाते समय ही उसकी जगह किसी अन्य धातु का उपयोग किया गया था या बाद में उसको बदला गया। इस तरह की बात भी आ रही है कि गर्भगृह की दीवारों पर लगी स्वर्ण परतों को साफ सफाई के लिए चेन्नई भेजा गया था। जब वहां से प्लेट्स वापस आईं तो उसका वजन करीब पांच किलो कम था। त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड की विजिलेंस टीम ने कार्यालय से दस्तावेज जब्त किए हैं। अब इन दस्तावेजों और उनकी प्रामाणिकता पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। संपत्तियों की रजिस्टर में एंट्री पर भी प्रश्न उठने लगे हैं। केरल हाईकोर्ट ने पूर्व हाईकोर्ट जज की देखरेख में मंदिर की संपत्ति का ब्योरा जुटाने का आदेश दिया है। केरल हाईकोर्ट ने त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड को सही तरीके से रिकार्ड नहीं रख पाने के लिए लताड़ लगाई है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने केरल हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की है। 

जिस तरह के समाचार केरल से आ रहे हैं उससे तो ये प्रतीत होता है कि सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह में और उसके बाहर लगी मूर्तियों की स्वर्णसज्जा के साथ छेड़छाड़ की गई है। आरोप ये भी लग रहे हैं कि सोने को निकालकर उसकी जगह पीतल से सज्जा कर दी गई। ये खबरें सिर्फ एक सामान्य चोरी की खबर नहीं है बल्कि भगवान अयप्पा के भक्तों की श्रद्धा पर डाका जैसा है। केरल की कम्युनिस्ट सरकार की जिम्मेदारी है कि वो दोषियों को जल्द से जल्द पकड़कर मंदिर के सोने की बरामदगी करवाए। मंदिर की फिर से स्वर्णसज्जा हो। भगवान अयप्पा के भक्त सिर्फ केरल में ही नहीं बल्कि पूरे भारत और विश्व के अन्य देशों में भी हैं। सबकी आस्था और श्रद्धा इस मंदिर से जुड़ी हुई है। जैसे जैसे इस चोरी की परतें खुल रही हैं हिंदू श्रद्धालुओं के अंदर क्षोभ बढ़ता जा रहा है। निश्चित है कि भगवान अयप्पा मंदिर से सोना चोरी चुनावी मुद्दा भी बनेगा। आपको याद होगा कि ओडीशा विधानसभा चुनाव के दौरान भगवान जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार की चाबी को लेकर विवाद हुआ था। कोर्ट के आदेश के बाद भगवान जगन्नाथ मंदिर की संपत्तियों की जांच और उसकी सूची को लेकर रत्न भंडार खोला गया था। जब इस कार्य को कर रहे लोग रत्न भंडार तक पहुंचे तो वहां ताला बंद था। उस ताले की चाबी की तलाश की गई। चाबी नहीं मिली। जब 1978 में भगवान जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार का सर्वे हुआ तो वहां 149 किलो स्वर्ण आभूषण और 258 किलो के चांदी के बर्तनों की सूची बनी थी। उसके बाद 2018 में फिर से सर्वे का प्रयास हुआ तो चाबी ही नहीं मिल पाई। विधानसभा चुनाव के दौरान रत्न भंडार की चाबी गायब होने का मुद्दा बड़ा हो गया था। नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली राज्य सरकार कठघरे में आ गई थी। भगवान जगन्नाथ और भगवान अयप्पा में हिंदुओं की आस्था इतनी गहरी है कि उसको जब भी ठेस लगती है तो जनता अपनी प्रतिक्रिया देती है। ओडिशा में नवीन पटनायक की हार का एक बड़ा कारण रत्न भंडार की चाबी का ना मिलना भी बना। 

इन दो उदाहरणों से मंदिरों की संपत्ति की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने आराध्य को भेंट अर्पित करते हैं। जिनपर भक्तों की भेंट को सुरक्षित रखने का दायित्व है वो उसका निर्वहन ठीक तरीके से नहीं कर पा रहे हैं तो उसको लेकर सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा। विचार तो इसपर भी करना चाहिए कि मंदिरों की संपत्ति का कस्टोडियन सरकार हो या हिंदू समाज। इससे संबंधित एक एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिससे प्रभु की संपत्ति में सेंध ना लग सके। क्या अब समय आ गया है कि मंदिरों का प्रबंधन सरकार को हिंदू समाज को सौंप देना चाहिए। कोई ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें सरकार और हिंदू समाज साथ मिलकर मंदिरों की संपत्ति की रक्षा कर सकें। आप इस बात की कल्पना करिए कि अगर भगवान अयप्पा के गर्भगृह की स्वर्ण सज्जा को हटाकर उसको पीतल से आच्छादित कर दिया गया तो इसके पीछे कितनी गहरी साजिश रही होगी। कितने लोगों की मिलीभगत रही होगी तब जाकर इस पाप को किया जा सका होगा। अगर ये साबित हो जाता है कि सोना चोरी करके वहां पीतल लगा दिया गया तो भक्तों की आस्था को कितनी ठेस पहुंचेगी। हिंदू समाज को अपनी आस्था के इन केंद्रों की सुरक्षा को लेकर संगठित होकर एक कार्ययोजना पेश करना होगा, ताकि सरकार उसपर विचार कर सके। दोनों की सहमति से कोई ठोस निर्णय लिया जा सके। समाज जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह मंदिर प्रबंधन को लेकर राष्ट्रव्यापी नीति बनाने की आवश्यकता है।   


Saturday, December 23, 2023

लाल झंडा थामने को आतुर 'हाथ'


हाल ही में जब नई दिल्ली में विपक्षी दलों के गठबंधन आईएनडीआईए की बैठक हुई तो राहुल गांधी और सीताराम येचुरी की साथ बैठी तस्वीरें सामने आईं। इसी तरह जब विपक्षी दलों के नेता नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर सांसदों के निलंबन पर विरोध जताने के लिए जुटे तो उसमें भी राहुल गांधी और सीताराम येचुरी एक दूसरे का हाथ थामे नजर आए। इन दोनों जगहों पर कांग्रेस और कम्युनिस्टों की निकटता ही नहीं दिखी बल्कि उनके साथ में एक विशेष प्रकार का उत्साह भी दिखा। इस प्रसंग की चर्चा इस कारण से कर रहा हूं कि कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अजीत कुमार पुरी की पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम, समाजवाद और श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी के लोकार्पण समारोह में उपस्थित रहने का अवसर मिला। कार्यक्रम में मुझे भी पुरी जी की पुस्तक और श्रीरामवृक्षबेनीपुरी जी पर बोलना था। इस वजह से समारोह में जाने के पहले बेनीपुरी की डायरी के पन्ने को पलट रहा था। अचानक नजर एक जगकह जाकर रुकी, तारीख थी, 11 दिसंबर 1957। उस दिन बेनीपुरी जी ने अपनी डायरी में लिखा, आज बेनीपुर से पटना लौट रहा हूं। इधर 15 नवंबर से ही भाई अशोक मेहता के चुनाव के चक्कर में रहा। वह मुजफ्फरपुर-सदर निर्वाचन क्षेत्र से पार्लियामेंट के उम्मीदवार थे। आज से मतगणना शुरू हुई है, तीन थानों में आधे निर्वाचन क्षेत्र में 2700 वोट से जीत गए हैं। आधे में भी विजयी होंगे, ऐसा विश्वास है। दरअसल बेनीपुरी जी प्रख्यात समाजवादी नेता अशोक मेहता के चुनाव की बात कर रहे थे। 1957 में अशोक मेहता ने बिहार के मुजफ्फरपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था। उस समय समाजवादी नेता अशोक मेहता का कम्युनिस्टों ने विरोध किया था और कांग्रेस के उम्मीदवार नहीं खड़ा करने की घोषणा के बाद भी अपना उम्मीदवार खड़ा कर अपनी पार्टी के असली चरित्र के दर्शन करवाए थे। तब मतपत्रों से चुनाव होता था और उसकी गिनती में कई दिन लग जाते थे।

उसी दिन डायरी में बेनीपुरी जी ने आगे लिखा, अजीब चुनाव रहा यह। भाई अशोक की विद्वता का ख्याल करके कांग्रेस ने यह सीट छोड़ दी। साथियों ने सोचा, अब क्या है, आसानी से विजय मिल जाएगी। किंतु बीच में कम्युनिस्ट आ टपके। हमारे किशोरी भाई उनके उम्मीदवार! फिर क्या था, सिद्धांत गया ताखे पर- जाति के नाम पर, जिले के नाम पर वह बावला मचाया गया, कि हम चकित रहे और प्रांत भर के कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गांव-गांव में डेरे डालकर पड़ गए। कोई भी उपाय नहीं छोड़ा गया। हमें कदम कदम पर लड़ना पड़ा। आज की गणना से थोड़ा इत्मीनान हुआ। ...कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन देखकर हैरान रह जाना पड़ा। अशोक हमारी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के यशस्वी संपादक। विचारक अर्थशास्त्री। श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी की इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि उस चुनाव में कम्युनिस्टों ने सिद्धांत को ताखे पर रख दिया था। जातिवाद और प्रांतवाद का खेल जमकर खेल गया था। दरअसल अशोक मेहता बांबे (अब मुंबई) के थे और बिहार से आकर चुनाव लड़ रहे थे। वो दौर ऐसा था कि कई अन्य प्रांतों के नेता बिहार से आकर चुनाव लड़ते थे। मधु लिमय ने मुंगेर से और जार्ज फर्नांडिस ने मुजफ्फरपुर और बांका से चुनाव लड़ा था। जीते भी थे। बेनीपुरी की डायरी में दर्ज इस टिप्पणी पर गौर करना चाहिए कि कांग्रेस और कम्युनिस्टों के गठबंधन को देखकर उनको हैरानी हुई थी। हैरानी दरअसल कम्युनिस्टों की उस राजनीति को देखकर हुई थी जिसमें उन्होंने जाति और प्रांत का कार्ड खेला था। असामनता और विभेद की राजनीति का दंभ भरनेवाली विचारधारा का असली चेहरा खुला था। 

12 दिसंबर 157 को श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी ने अपनी डायरी में बहुत छोटी सी टिप्पणी दर्ज की। लिखा, और वही होकर रहा, अशोक जीत गए। चौदह हजार वोटों से। कम्युनिस्ट हारे, जातिवाद की हार हुई, प्रांतवाद की हार हुई। अशोक की जीत, जनतंत्र की जीत, समाजवाद की जीत, राष्ट्रीयता की जीत, विद्वता की जीत, देशभक्ति की जीत! हिप-हिप हुर्रे!! इस पूरी टिप्पणी से बेनीपुरी की प्रसन्नता दिख रही है। कम्युनिस्टों की हार को उन्होंने जातिवाद और प्रांतवाद की हार से जोड़ा और अशोक की जीत को उन्होंने राष्ट्रीयता और देश भक्ति के साथ समाजवाद और विद्वता से जोड़ा। भारत में जो समाजवाद पनपा वो साम्यवाद से अलग था। उसमें देशभक्ति और राष्ट्रीयता के गुण और भारतीयता कूट कूट कर भरी थी। बहुधा ये बेनीपुरी के लेखन में दिखती भी है। एक बार बेनीपुरी कलकत्ता (अब कोलकाता) गए। वहां बंगीय परिषद की सभा में उन्होंने सीता की मां नाम की रचना सुनाई। फिर पत्रकारों की एक सभा हुई उसमें कम्युनिस्टों ने कुछ उल्टा पुल्टा बोल दिया तो बेनीपुरी भड़क गए। उन्होंने लिखा है, पत्रकारों की ओर से जो सभा हुई, उसमें कम्युनिस्टों ने कुछ ऊटपटांग बातें कहीं। बस, मेरा देवता जाग गया और लोगों ने कहा कि मैंने बड़ा ही ओजपूर्ण भाषण दिया। कितनी खूबसूरती से उन्होंने बताया कि कम्युनिस्टों की क्या गत की। 

बेनीपुरी जी कम्युनिस्टों की मौकपरस्त राजनीति से खिन्न रहते थे। उनको लगता था कि कम्युनिस्ट कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। इस तरह के संकेत उनकी डायरी के पन्ने में यत्र-तत्र बिखरे हैं। समाजवादी लोग राष्ट्र और भारतीय संस्कृति के साथ चलनेवाले थे जबकि साम्यवादियों की राष्ट्र में आस्था न थी, न है। बेनीपुरी शाश्वत भारत या सांस्कृतिक भारत की बात करनेवाले लेखक और राजनेता थे। वो इस सांस्कृतिक भारत के खान पान, रहन सहन, गीत-नृत्य, पर्व-उत्सव, आनंद-विनोद आदि में एकात्मता देखते थे । उनका मानना था कि राजनीतिक उलटफेरों के बावजूद संपूर्ण भारत में आदिकाल से एक अविच्छिन्न सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती रही है। समय समय पर उसका चित्रण किया जाना चाहिए। बेनीपुरी जब भी इस सांस्कृतिक धारा में किसी प्रकार की बाधा देखते या बाधा की आशंका को भांपते तो उसका सार्वजनिक रूप से लिखकर और बोलकर प्रतिकार करते। मुजफ्परपुर लोकसभा चुनाव के समय कम्युनिस्टों और कांग्रेस के साथ आने पर उन्होंने तब भी कहा था और बाद में भी कहते रहे।

हलांकि कांग्रेस ने कम्युनिस्टों का स्वाधीनता के बाद से ही साथ लेना आरंभ कर दिया था। नेहरू का झुकाव साम्यवाद की ओर था और उसके ऐतिहासिक कारण थे। इंदिरा गांधी ने भी कम्युनिस्टों का साथ लिया, समर्थन के एवज में उनको कला संस्कृति और शिक्षा से जुड़ी सरकारी संस्थाएं आउटसोर्स कर दीं। लेकिन इन दोनों ने कभी भी कम्युनिस्टों को हावी नहीं होने दिया। जब आवश्यकता पड़ी कम्युनिस्टों का अपनी और अपनी राजनीति के हक में उपयोग किया, उनको उसका ईनाम दिया और फिर आगे चल पड़े। हाल के दिनों में जिस प्रकार से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की कम्युनिस्टों से निकटता बढ़ी है, जिस प्रकार से कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोग कांग्रेस पार्टी को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं वैसे में ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस की राजनीतिक चालें भी वहीं लोग तय कर रहे हैं। दरअसल ऐसा तब होता है जब पार्टी में विचारवान नेताओं की कमी हो जाती है। उनको अपनी राजनीतिक राय बनाने के लिए किसी के सहारे की जरूरत होती है। कम्युनिस्टों की एक विशेषता है कि वो बातें बड़ी अच्छी करते हैं, गरीबों और मजदूरों की बातें करते हैं जो किसी को भी लुभाने का सामर्थ्य रखती हैं। सैद्धांतिक धरातल पर इन बातों का असर होता भी है लेकिन जब उनको यथार्थ की धरातल पर उतारने की बात आती है तो सारे सिद्धांत धरे रह जाते हैं। वो भी जात-पात और अन्य प्रकार की बातें करने लग जाते हैं। बेनीपुरी जी जैसे और उनके बाद की पीढ़ी के लेखकों का ना केवल साम्यवाद से मोहभंग होता है बल्कि साफ तौर पर बगैर हिचके सिद्धांतों को ताखे पर रखने की बात भी कह जाते हैं। 

Saturday, May 13, 2023

वेब सीरीज ने खोली कम्युनिस्टों की पोल


इन दिनों एजेंडा फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म द केरल स्टोरी को एक विशेष वर्ग के लोग एजेंडा या प्रोपगैंडा फिल्म कहकर प्रचारित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि द केरल स्टोरी को एजेंडा फिल्म बतानेवालों ने फिल्म नहीं देखी है। दरअसल एक पूरा ईकोसिस्टम है जो वैकल्पिक विमर्श वाली फिल्मों को एजेंडा के तौर पर प्रचारित कर परोक्ष रूप से बहिष्कार करते हैं। कई फिल्में, डाक्यूमेंट्री या वेबसीरीज ईकोसिस्टम की विचारधारा के अनुकूल नहीं होती हैं। उनमें उनकी विचारधारा की करतूतों का पर्दाफाश होता है। ऐसी फिल्मों या वेबसीरीज के उन बिंदुओं को लेकर शोर मचाते हैं जिसमें विचारधारा की आड़ में की गईं करतूतें दब जाती हैं। उनपर जनता या दर्शकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा सके। ऐसी ही एक सीरीज है, जुबली। इस सीरीज में स्वाधीनता के कुछ वर्ष पहले और उसके बाद के चंद वर्षों की हिंदी फिल्मों की कहानी कही गई है। इसमें राय टाकीज के बनने उसके खत्म होने से लेकर नायकों के बनने और नायिकाओं की स्थितियों का चित्रण किया गया है। विक्रमादित्य मोटवानी के निर्देशन में बनी इस सीरीज में उस दौर के कई नायकों और नायिकाओं का चित्रण किया गया है। इस वेब सीरीज को लेकर जो विमर्श हो रहा है वो ये कि इसका नायक मदन कुमार किस हीरो के चरित्र से मेल खाता है।नायिका नीलोफर में किसकी छवि दिखती है। राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय का चरित्र क्या हिमांशु राय से मिलता है या मालकिन का किरदार देविका रानी से। क्या इसका एक और नायक जय खन्ना राज कपूर के व्यक्तित्व से प्रेरित है आदि। इस बात की दबी जुबान में भी चर्चा नहीं हो रही है कि रूसियों ने किस तरह से हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा चलाया। 

विक्रमादित्य मोटवानी ने इस सीरीज में उस दौर में हिंदी फिल्मों में सोवियत रूस और अमेरिका के एजेंडे को सामने लाकर रख दिया है। इस फिल्म के एक संवाद पर नजर डालते हैं। आवाम तक अपनी आवाज पहुंचाने के दो जरिए हैं, सिर्फ दो। सिनेमा और रेडियो। सोवियत संघ और अमेरिका इस समय दोनों भारत सरकार की खुशामद कर रहे हैं, सिनेमा और रेडियो में अपने पैर जमाने के लिए। कोल्ड वार शुरु हो चुका है। दोनों ही मुल्क अपने अपने प्रोपगैंडा के लिए फिल्में बनाना चाहते हैं। और इसी सिलसिले में सोवियत संघ ने अपना खास आदमी ब्लादीमीर यहां भेजा है। इन्होंने प्रोपगैंडा फिल्मों के लिए काफी काम किया है चाइना में। संवाद से स्पष्ट है कि सोवियत संघ हिंदी फिल्मों को लेकर कितना गंभीर था। वो उस दौर के उभरते हुए सितारे मदन कुमार को अपने एजेंडा के लिए काम करवाने के लिए उत्सुक था। उसको प्रोत्साहित करनेवाले राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय से रूस के प्रतिनिधियों की भेंट भी होती है। श्रीकांत राय उनके प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। रूसी उस समय हिंदी फिल्मों  में काफी निवेश करना चाहते थे। उनको कोई भी स्टार नहीं मिल रहा था जिसकी फिल्मों पर पैसा लगाया जा सके। परिस्थितियां इस प्रकार की बनती है कि जय खन्ना अपने फाइनेंसर वालिया को फिल्म बनाने के लिए तैयार करता है। ये दोनों रूसियों के संपर्क में आते हैं। एक बेहतरीन दृश्य है जब वालिया एक फिल्म का पोस्टर तैयार करवाता है। फिल्म का नाम होता है मजदूर। मजदूर की कहानी भी उसके पास नहीं होती है लेकिन वो कमिटमेंट कर देता है। उसके और जय खन्ना के बीच बहस होती है। जय कहता है कि उसके पास कहानी नहीं है तो वालिया उत्तर देता है कि मास्को में ढेर सारी टैरेटरी खुलनेवाली है। रूस का दरवाजा खुलावाना है। रशियन तीन फिल्मों का फाइनेंस करने को तैयार हैं। रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होगा जिसमें इन फिल्मों को दिखाया जाएगा। आदि आदि। इसलिए मजदूर की कहानी तो लिखनी होगी। उस दौर को याद करिए जिस दौर की बात हो रही है। राज कपूर की कई फिल्में आती हैं, रूस में रिलीज होती हैं। वहां के अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उनको दिखाया जाता है। राज कपूर की आरंभिक फिल्मों के बारे में कहा गया कि वो समाजवाद से प्रेरित हैं। उसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ या इप्टा लोकप्रिय होने लगा था। फिल्मों में रुचि रखनेवालों को याद होगा कि महबूब खान जिन्होंने मदर इंडिया बनाई उनके प्रोडक्शन हाउस का लोगो हशिया और हथौड़े के निशान के बीच में अंग्रेजी में एम लिखा था। वही हंशिया और हथौड़ा जो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का निशान था। प्रश्न यही उठता है कि क्या इन सबके बीच किसी प्रकार का कोई संबंध था। वेब सीरीज जुबली ने इन परिस्थितियों को दस एपिसोड में दर्शकों के सामने पेश कर दिया है। ये सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि ये बताता है कि कम्युनिस्टों ने हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा किस तरह से चलाया। विचार और विचारधारा का प्रोपगैंडा कैसे किया। 

फिल्मकारों को सोवियत रूस के प्रतिनिधि बताते थे कि सिस्टम के खिलाफ लड़नेवाला नायक कैसा होना चाहिए। फिल्मों में सेठ को गाली दी जानी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि गरीब अपने वेतन पर कपड़ा नहीं खरीद सकता, पूरे परिवार को खाना नहीं खिला सकता। अगर गरीब जाग गया तो सबकी रातों की नींद उड़ा देगा। फिल्मकारों को प्रलोभन दिया जाता था कि अगर उनकी फिल्में रूसियों की विचारधारा का प्रोपगैंडा करेंगी और उनके एजेंडा पर चलेंगी तो उनकी फिल्मों को तत्कालीन सोवियत संघ, तुर्की और यूरोप में प्रदर्शित करवाया जाएगा। फिल्म बनाने के लिए पैसे दिए जाएंगे। एक और बेहद चौंकानेवाला प्रसंग इस सीरीज में है। रूसी हिंदी फिल्मी गानों के विरुद्ध थे। 1952 में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों पर प्रतिबंध लगा दिया। कारण ये दिया गया कि ये गाने भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। रूसी भफी यही कहते थे। प्रश्न ये उठता है कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे या रूसी अपनी विचारधारा को गाढ़ा करने के लिए इनपर प्रतिबंध लगवाना चाहते थे। प्रतिबंध के दौर में अमरीकियों ने हिंदी गानों को रेडियो सिलोन पर बजवाने का प्रबंध किया था। राय टाकीज के मालिक जब रूसियों के सामने नहीं झुकते हैं तो उनकी तबाही का षडयंत्र रचा जाता है। उनकी पत्नी सुमित्रा को रूसी अपनी तरफ करते हैं। उनके वित्त विभाग की देखरेख करनेवाले को घूस भी दिया जाता है और वादा भी किया जाता है कि उनके बेटे का दाखिला मास्को के इंजीनियरिंग कालेज में करवा दिया जाएगा। उस दौर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के लिए कई छात्र सोवियत रूस गए थे। गजब समानता है। उस वक्त रूसियों ने फिल्मकारों के फोन टैप करके उनको ब्लैकमेल भी किया था। सरकारें खबरें भी रुकवा देती थीं। कहानी में इन सबका चित्रण है।  

आज जो कम्युनिस्ट या वाम विचारधारा के लोग फिल्मों में एजेंडा और प्रोपगैंडा की बात करते हैं उनको इस वेब सीरीज को देखना चाहिए। किस तरह से भारत की स्वाधीनता के बाद से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक हिंदी फिल्मों में रूसियों की विचारधारा का एजेंडा चलता रहा। किस तरह से वर्ग संघर्ष को बढ़ावा दिया गया।। कई फिल्मों में इसको नेहरू के समाजवाद और गांधी की ग्राम-व्यवस्था के बीच के संघर्ष के तौर पर दिखाया गया। उद्देश्य और मंशा तो वामपंथी विचार को बढ़ावा देना था। यह अनायास नहीं था कि इप्टा जैसे संगठन और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक लोकप्रिय होने लगे थे। कैफी आजमी से लेकर जावेद अख्तर तक इस तरह का लेखन कर रहे थे जिसमें वर्ग संघर्ष का चित्रण था। दस एपिसोड में विक्रमादित्य मोटवानी ने कुछ ही परतें खोली हैं, संभव है कि दूसरे सीजन में और भी दिलचस्प खुलासे हों।   


Saturday, February 5, 2022

राष्ट्र पर राहुल की लचर दलील


राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में कुछ ऐसी बातें कहीं जिस पर, उनको लगता है कि चर्चा की जानी चाहिए। पहली बात तो उन्होंने ये कही कि भारत राष्ट्र नहीं है और ये राज्यों का संघ है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों को भारतीय संविधान पढ़ने की भी सलाह दी और कहा कि संविधान में लिखा है कि भारत राज्यों का संघ है और वो राष्ट्र नहीं है।इसके आगे वो नरेन्द्र मोदी पर हमलावर हुए। संविधान के अनुच्छेद एक में ये अवश्य लिखा है कि भारत राज्यों का संघ होगा लेकिन पूरे संविधान में ये कहीं नहीं लिखा है कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। दरअसल राहुल गांधी ने संविधान का अनुच्छेद एक तो पढ़ लिया लेकिन वो संविधान की प्रस्तावना पढ़ना भूल गए, प्रतीत होता है। संविधान की मूल प्रस्तावना और इमरजेंसी के समय हुए संशोधन के बाद की प्रस्तावना में भारत के लिए राष्ट्र शब्द का उल्लेख है। प्रस्तवाना में लिखा है कि ...उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए...। ये तो स्पष्ट  कि संविधान भारत को एक राष्ट्र के तौर पर देखता है। अगर संविधान की प्रस्तावना और संविधान सभा की बहस को देखें तो ये अधिक स्पष्ट होता है। संविधान सभा की बहस में राज्यों के यूनियन आफ स्टेट्स और फेडरल शब्द के उपयोग को लेकर लंबी बहस हुई थी। उस बहस में बाबा साहब अंबेडकर, प्रो के टी शाह, एच वी कामथ आदि ने हिस्सा लिया था। भारत औप भारत वर्ष नाम पर भी लंबी चर्चा हुई थी। तमाम दलीलों के बाद भारत को राज्यों के संघ के तौर पर स्वीकृत किया गया था। फेडरल स्टेट की मांग को खारिज कर दिया था। दरअसल राजनीतिक भाषणों में जब अकादमिक पुट दिया जाता है तो इस तरह की त्रुटियां हो जाती हैं, क्योंकि राजनीतिक भाषणों में समग्रता में अपनी बात कहने का अवसर नहीं होता है जबकि अकादमिक बहसों या लेखन में अपनी बात समग्रता में कही जा सकती है। राहुल गांधी की चिंता राज्यों के अधिकारों को लेकर है। सविंधान के अलग अलग अनुच्छेद में राज्यों के अधिकारों की चिंता की गई है। ये बात संविधान सभा की बहस में बाबा साहेब अंबेडकर ने भी कई बार दोहराई है। 

दरअसल जब राहुल गांधी भारत के राष्ट्र होने की अवधारणा का निषेध करते हैं तो वो जाने अनजाने कम्युनिस्टों के सोच को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। देश की स्वाधीनता के बाद कम्युनिस्टों ने भी राष्ट्र की अवधारणा को, लोकतंत्र की अवधारणा को, लोक कल्याणकारी राज्य का निषेध किया था। कम्युनिस्ट हमेशा से अंतराष्ट्रीयता को मानते रहे। यह अनायस नहीं है कि उनकी पार्टी का नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नहीं। कम्युनिस्ट विचारधारा लोक कल्याणकारी सबल राष्ट्र की पक्षधर नहीं रही है। कम्युनिस्ट पार्टियों में ये बहस चलती रही है कि सरकार की नीतियों को गरीबों तक पहुंचने दिया जाए या नहीं। आप अगर ध्यान से देखेंगे तो नक्सली हमेशा से स्कूल और अस्पतालों पर हमला करते हैं और उनको नष्ट करने की फिराक में रहते हैं। उनका मानना है कि अगर सभी वर्गों तक सरकारी सुविधाओं या योजनाओं का लाभ पहुंच गया तो वर्ग संघर्ष के माध्यम से मजदूरों का राज कायम नहीं हो सकेगा। कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के आधार को देखेंगे तो वहां भी भारत से अधिक रूस और चीन में व्याप्त विचारधारा का असर दिखता है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) में जब विभाजन हुआ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बनी तो वैचारिक भिन्नता का आधार रूस और चीन की साम्यवादी विचारधारा थी। एक गुट रूस तो दूसरा चीन की विचारधारा को लेकर आगे बढ़ना चाहता था। जब देश आजाद हुआ था तो जवाहरलाल नेहरू रूस के अधिक करीब थे। रूस की कम्युनिस्ट पार्टी चाहती थी कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी नेहरू को लेकर उदार रहे। जबकि सीपीआई का एक गुट इसके खिलाफ था। 1962 में चीन के साथ युद्ध होने के बाद भी सीपीआई का एक गुट चीन की पैरोकारी में लगा रहा। माओ को लेकर नारा भी लगता था उनका चेयरमैन हमारा चेयरमैन। चीन के साथ युद्ध के दो वर्ष बाद पार्टी में विभाजन हुआ। जब राष्ट्र के निषेध की बात होती है तो कम्युनिस्टों की पुरानी वैचारिकी जीवंत हो उठती है। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो राहुल गांधी का राष्ट्र की अवधारणा का निषेध चौंकाता है। उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा संवाद से शासन चला है और इस संबंध में उन्होंने अशोक, मौर्य और गुप्तवंश की चर्चा की। शायद राहुल गांधी जोश में बिंदुसार के शासन काल के युद्धों को भूल गए, भूल तो वो कलिंग युद्ध को भी गए। 

दूसरी बात राहुल गांधी ने कही कि भारत मे हर राज्य का अपना इतिहास है, अपनी भाषा है और अपनी संस्कृति है। इतिहास और भाषा तक तो बात समझ आती है लेकिन अलग अलग संस्कृति की बात गले नहीं उतरती है। पूरे भारत की संस्कृति एक ही है जहां हम विविधता का उत्सव मनाते हैं। ये बात हमारे पौराणिक ग्रंथों से भी सिद्ध होती है और वासुदेव शरण अग्रवाल, कुबेरनाथ राय और रामधारी सिंह दिनकर के लेखन से भी स्पष्ट होता है। जब हम संस्कृति की बात करते हैं तो हमें उसके मूल तत्वों को समझना होगा। दिनकर ने स्पष्ट किया है कि संस्कृति ऐसी चीज है जिसे लक्ष्णों से तो हम जान सकते हैं किंतु उसकी परिभाषा नहीं दे सकते। कुछ अर्शों में वो सभ्यता से भिन्न गुण है। सभ्यता वो चीज है जो हमारे पास है, संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है। दिनकर के अलावा अगर हम राजनीतिशास्त्र के विद्वानों की तरफ से दिए गए आयडिया आफ इंडिया की बात भी करें तो वहां भी स्पष्ट है कि भारत की संस्कृति तो एक ही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कोलकाता तक भाषा, पहनावे, और खान-पान में विविधता दिखाई देती है लेकिन पूरे देश की संस्कृति में भारत की व्याप्ति नजर आती है। इस वजह से स्वाधीनता के बाद अपने एक लेख में वासुदेव शरण अग्रवाल कहते हैं कि ‘राष्ट्र संवर्धन का सबसे प्रबल कार्य संस्कृति की साधना है। उसके लिए बुद्धिपूर्वक यत्न करना होगा। इस देश की संस्कृति की धारा  अति प्राचीन काल से बहती आई है उसके प्राणवंत तत्व को अपनाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं।‘ जब हम राष्ट्र को ही निगेट करेंगे तो हमको संस्कृतियां भी अलग अलग नजर आएंगी । 

राहुल गांधी के भाषण के इस बिंदुओं पर अगर हम समग्रता में देखें तो लगता है कि वो किस तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में आकर अपनी ही पार्टी की विरासत को भूल रहे हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की मूल भावना और सरदार पटेल की राष्ट्र निर्माण के अथक परिश्रम की भी अनदेखी कर रहे हैं। स्वाधीनता आंदोलन में अपना सर्वस्व होम करनेवाले सेनानियों के योगदान को भूल रहे हैं। तात्कालिक राजनीतिक सफलता के लिए इस तरह की जुमलेबाजी की अपेक्षा 136 साल पुरानी पार्टी के अध्यक्ष रहे व्यक्ति से नहीं की जा सकती है। इस तरह के बयानों से हो सकता है तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिल जाए। अपने राजनीतिक विरोधी नरेन्द्र मोदी को घेरने में सफलता मिल जाए।कुछ राज्यों में शासन कर रही क्षेत्रीय दलों का समर्थन कांग्रेस को मिल जाए, कुछ चुनावी फायदा हो जाए लेकिन इसका असर लंबे समय तक रहेगा, इसमें संदेह है। इतनी पुरानी पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहे व्यक्ति से ये अपेक्षा की जाती है कि वो देश को समझे, उसके संविधान की मूल भावना को समझे, देशवासियों की भावना को उनकी संवेदनाओं को समझें और उसके अनुसार सार्वजनिक बयान दें।   



Saturday, November 27, 2021

कम्युनिस्टों से क्यों चिढ़ते थे आंबेडकर


अभी-अभी संविधान दिवस बीता है। जब भी संविधान दिवस (26 नवंबर) आता है या संविधान से जुड़ी बातों पर देशव्यापी विमर्श होता है तब वामपंथी धारा में बहने वाले लेखक और बौद्धिक बाबा साहेब आंबेडकर की कई बातों को संदर्भ से काटकर उद्धृत करते हैं। आंबेडकर के विचारों की आड़ में वो भारत और भारतीयता के साथ साथ हिंदू धर्म और दर्शन पर प्रहार करते हैं। उनके विचारों को इस तरह से पेश करते हैं जैसे कि आंबेडकर हिंदू धर्म के विरोधी थे। वो ये नहीं बताते हैं कि आंबेडकर हिंदू धर्म की कुरीतियों के विरोधी थे और उनका मत था कि इन कुरीतियों को दूर किया जाए। ऐसा करते हुए कम्युनिस्ट इस बात को भी छिपा ले जाते हैं कि उनको लेकर आंबेडकर के क्या विचार थे। मार्क्स और मार्क्सवाद से लेकर उनके अनुयायियों के बारे में बाबा साहेब की सोच क्या थी। 12 दिसंबर 1945 को नागपुर की एक सभा में आंबेडकर ने देशवासियों को कम्युनिस्टों से बचकर रहने की सलाह दी थी। आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘मैं आप लोगों को आगाह करना चाहता हूं  कि आप कम्युनिस्टों से बच कर रहिए क्योंकि अपने पिछले कुछ सालों के कार्यों से वो कामगारों का नुकसान कर रहे हैं। वे उनके (कामगारों) दुश्मन हैं, इस बात का मुझे पूरा यकीन हो गया है। कम्युनिस्ट कहते हैं कि कांग्रेस पूंजीपतियों की संस्था है। साथ ही वे कामगारों को उसमें जाने की सलाह भी देते हैं। हिन्दुस्तान के कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नहीं है, उन्हें सारी चेतना रूस से मिलती है।‘ अपने इस कथन से आंबेडकर ने स्पष्ट कर दिया था कि अपने देश के कम्युनिस्टों की चेतना का आधार रूस से आयातित विचार है और वो कामगारों या मजदूरों को भ्रमित कर कांग्रेस को मजबूत करना चाहते हैं। आंबेडकर की ये बातें स्वाधीनता के बाद भी सही साबित हुई। कम्युनिस्टों को जब भी मौका मिला उन्होंने कांग्रेस का समर्थन किया, सरकार बनाने से लेकर देश में इमरजेंसी लगाने तक में। आज भी कर रहे हैं। आज जब कम्यनिस्ट पार्टियां अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं तो उनको कांग्रेस में ही अपना भविष्य नजर आ रहा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुयायी  लगातार कांग्रेस को मजबूत करने की बात इंटरनेट मीडिया के अलग अलग मंचों पर लिख रहे हैं। 

आंबेडकर ने नागपुर की ही सभा में देश के दलितों को भी कम्युनिस्टों से आगाह किया था। आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के बारे में कहा था कि ‘वे अब हमारे संगठन में घुसकर अपनी हरकतें करने लगे हैं। इसलिए मैं आपलोगों से यही कहना चाहता हूं कि आपलोग कम्यनिस्टों से बचकर रहिए। उन्हें अपने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का उपयोग अपने प्रचार के लिए मत करने दीजिए।‘ अब 1945 में कहे गए बाबा साहेब के शब्दों पर गौर करें तो स्थिति और स्पष्ट होती है। उनको इस बात की आशंका थी कि अगर कम्युनिस्ट उनके संगठन में घुस गए तो संगठन कमजोर होगा लिहाजा इसलिए वो सार्वजनिक रूप से शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के कार्यकर्ताओं को कम्युनिस्टों की ‘हरकतों’ से बचकर रहने की सलाह दे रहे थे। आंबेडकर की इन बातों की चर्चा कभी भी कम्युनिस्ट नहीं करते हैं। अपने बौद्धिक विमर्शों में भी अंबेडकर की आलोचना पर ध्यान नहीं देते हैं। बाद के दिनों में या आंबेडकर के निधन के बात तो वो समानता के सिद्धांत के आधार पर उनको भी वामपंथी विचारधारा के करीब दिखाने और प्रचारित करने की कोशिश करते रहते  हैं। वामपंथी कभी भी इस बात की चर्चा नहीं करते हैं कि आंबेडकर की राय मार्क्स या उनके सिद्धांतों को लेकर क्या थी। 20 नवंबर 1956 को आंबेडकर का नेपाल में दिया गया एक भाषण है जिसमें उन्होंने बुद्ध और कार्ल मार्क्स पर विचार किया था। अपने उस भाषण में आंबेडकर ने मार्क्सवाद की तुलना में बौद्ध दर्शन को श्रेष्ठ और स्थायी माना है। आंबेडकर ने साम्यवादी जीवन मार्ग और बौद्ध जीवन मार्ग को लेकर अपने विचार रखे थे। उसमें आंबेडकर कहते हैं कि जो जीवनमार्ग अल्पजीवी होगा, गुमराह करनेवाला होगा या अराजकता की ओर ले जानेवाला होगा ऐसे जीवन मार्ग का समर्थन करना उचित नहीं होगा। साफ है कि वो साम्यवादी जीवन मार्ग का निषेध कर रहे थे। उनके इस कथन को नागपुर में कम्युनिस्टों पर व्यक्त किए गए उनके विचारों से जोड़कर देखते हैं तो यह साफ हो जाता है कि कि साम्यवाद के बारे में उनकी राय एक अराजक विचारधारा की रही है और उसको वो भारत के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे। 

आंबेडकर ने मार्सवादी सोच को व्याख्यायित करते हुए कहा था कि ‘ साम्यवादी विचारधारा का मूल सूत्र यह है कि दुनिया में शोषण है। यहां अमीरों की ओर से गरीबों का शोषण हो रहा है क्योंकि धनवानों में धन बटोरने की होड़ लगी हुई है। इसी होड़ की वजह से पूंजीपति लोग मेहनतकश वर्ग को गुलाम बना रहे हैं और इसी प्रकार की गुलामी दरिद्रता और निर्धनता का कारण बनती है। कार्ल मार्क्स ने गरीबों के संबंध में या मजदूरों के शोषण के संबंध में सवाल उपस्थित कर अपने साम्यवाद की नींव रखी।‘ लेकिन आंबेडकर इसके सूत्र की तलाश में बौद्ध दर्शन में जाते हैं और वहां से अपनी बात उठाते हैं। उनका मानना है कि बुद्ध दुनिया में दुख की बात करते हैं और बुद्ध ने भी शोषण से पैदा हुए दुख और दरिद्रता के आधार पर अपने दर्शन की नींव रखी। यहां आंबेडकर बहुत स्पष्ट रूप से मानते हैं कि मार्क्स कुछ नया प्रतिपादित नहीं करते हैं बल्कि उनके सिद्धांत के सैकड़ों साल पहले बुद्ध ऐसा कह चुके हैं और इससे मुक्ति का मार्ग भी सुझा चुके हैं। अंबेडकर बुद्ध और मार्क्स के सुझाए मुक्ति के मार्ग के बुनियादी अंतर को भी बहुत साफगोई से जनता के सामने रखते हैं। उनका मानना है कि साम्यवाद की स्थापना के लिए मार्क्सवादियों का रास्ता हिंसा का है और वो अपने विरोधियों को नष्ट कर लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। बुद्ध का रास्ता इससे बिल्कुल अलग है। आंबेडकर के शब्दों को देखते हैं, ‘बुद्धिज्म की स्थापना के लिए लोगों के दिलो दिमाग को परिवर्तित करना यही बुद्ध का संवैधानिक रास्ता है। बुद्ध अपने विरोधियों को डरा धमका कर या सत्ता के बल पर पराजित करना नहीं बल्कि प्यार और अपनत्व की भावना से अपना बना लेना है।‘ 

बाबा साहेब साम्यवाद के गैर संवैधानिक तरीकों को रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि साम्यवादी मनुष्य को खत्म करने के सिद्धांत पर अमल करना चाहते हैं लेकिन अगर मनुष्य ही नहीं रहेगा तो न तो कोई प्रतिकार कर पाएगा न ही विरोध तो ऐसी सफलता तो सिर्फ दिखावा बन कर रह जाती है।‘ आंबेडकर ने साम्यवादियों के ‘मजदूरों की तानाशाही’ ( डिक्टेटरशिप आफ प्लोरेतेरियत) और उसको स्थापित करने के खूनी क्रांति के सिद्धांत को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। आंबेडकर के प्रश्नों का उत्तर वामपंथियों के पास नहीं है लिहाजा वो संदर्भ से काटकर सिर्फ ये कहते हैं कि अंबेडकर ने मार्क्स और बुद्द के सिद्धांतों में कई समानताएं थीं। पर इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि लक्ष्य तक पहुंचने का दोनों का रास्ता बिल्कुल अलग है। बाबा साहेब ने हमेशा ही साम्यवादियों के रास्तों को खारिज किया, उसके लिए वो बुद्ध के सिद्दांतों को अपनी वैचारिकी का आधार बनाते हैं। अंबेडकर ने साम्यवाद के विदेशी दर्शन पर भारतीय दर्शन या भारतीय सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की देश की माटी से उपजे विचारों को समग्रता में एक बार फिर से देश की जनता के सामने लाना चाहिए।