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Saturday, November 12, 2022

सांप्रदायिकता की शिकार अकादमियां


महारानी वेबसीरीज में एक संवाद है, जैसे ही मुझे लगता है कि मैंने बिहार को समझ लिया है, वैसे ही बिहार एक और झटका देता है। हो सकता है शब्दों में कुछ बदलाव हो लेकिन भाव यही है। इस संवाद में बिहार की जगह अगर वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिख दिया जाए तब भी इस संवाद के अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता दिखेगा। कुछ दिनों पहले की बात है बिहार में उर्दू अनुवादकों को समारोहपूर्वक नियुक्ति पत्र बांटा जा रहा था। मुख्य सचिव ने अपने उद्बोधन में विभाग को कई सुझाव दिए। बारी आई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बोलने की। उन्होंने मुख्य सचिव पर तंज कसते हुए कहा कि प्रवचन तो आपने बहुत अच्छा दिया। आप तो 2007 से मेरे साथ थे। 2008 से ही हम उर्दू अनुवादकों की बहाली (नियुक्ति) के लिए कह रहे हैं लेकिन अबतक नहीं हो पाया है। अभी भी पूरा बहाली नहीं हुआ है। जल्दी से सब पता करके काम पूरा करवाइए। पूरा सभागार पहले ठहाकों से और फिर तालियों से गूंज उठा। वेबसीरीज महारानी के पात्र मिश्रा जी की तर्ज पर बिहार के मुख्य सचिव अमीर सुब्हानी भी सोच रहे होंगे कि जैसे ही उनको लगता है कि वो नीतीश कुमार को समझने लगे हैं तो वो एक झटका देते हैं। प्यार से ही सही लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्य सचिव को सार्वजनिक तौर पर झटका तो दे ही दिया।

ठहाकों और तालियों के बीच एक महत्वपूर्ण बात दब सी गई वो ये कि ये समारोह उर्दू के अनुवादकों को नियुक्ति पत्र देने का था। जिसमें नीतीश कुमार ने कहा कि वो 2008 में जिसकी घोषणा की गई थी उसको चौदह साल बाद भी पूरी तरह से संपन्न नहीं किया जा सका। उर्दू को लेकर नीतीश कुमार की चिंता की प्रशंसा की जानी चाहिए। यह अपेक्षा की जाती है कि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री या उनके अधीन कार्य करनेवाले मंत्रालय या विभाग किसी भी भाषा के साथ भेदभाव नहीं करेंगे। संविधान भी यही कहता है। लेकिन क्या बिहार सरकार इस अपेक्षा को पूरा कर रही है। नीतीश कुमार ने जब तेजस्वी यादव के साथ मिलकर सरकार बनाई तो महागठबंधन की सरकार ने  बिहार की दो और स्थानीय भाषाओं के लिए अकादमियां खोलने की घोषणा की। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि वैशाली के आसपास के जिले में बोली जानेवाली बज्जिका और सीमांचल में बोली जानेवाली सुरजापुरी को संरक्षित और समृद्ध करने के लिए दो नई अकादमियों का गठन किया जाएगा। ये घोषणा स्वागतयोग्य है। उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में मुख्यमंत्री स्वयं कह चुके हैं कि उर्दू को लेकर 2008 में जो घोषणाएं की गई थीं वो अबतक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। तो क्या माना जाए कि इन अकादमियों की घोषणाओं को भी पूरा होने में काफी समय लगेगा। ये कब तक हो पाएगा ये तो भविष्य के गर्भ में है।

नीतीश सरकार ने दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा की लेकिन जो भाषा और सांस्कृतिक अकादमियां बिहार में पहले से चल रही हैं वो लगभग मृतप्राय हैं। बिहार में पहले से भोजपुरी अकादमी, मगही अकादमी, मैथिली अकादमी और संस्कृत अकादमी अस्तित्व में हैं। पटना के शास्त्री नगर इलाके के सरकारी कर्माचरियों के आवासीय फ्लैट्स में इन सभी अकादमियों का कार्यालय है। इन अकादमियों की हालत इतनी खराब है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। इनकी आधारभूत जरूरतें पूरी हो सकें, इतनी व्यवस्था भी बिहार सरकार का शिक्षा विभाग नहीं कर पा रहा है। अकादमियों में इतने कम नियमित कर्मचारी हैं कि किसी नए काम के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। कुछ दिनों पूर्व मगही अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के महत्वपूर्ण कवि रामगोपाल रुद्र से संबंधित सामग्री की तलाश में एक मित्र मगही अकादमी पहुंचे थे। कार्यालय में एक कर्मचारी अकेले बैठा था। कुछ सामग्री मिली लेकिन अकादमी कार्यालय बुरी  हालत में थी। इनकी हालत देखकर ही किसी के मन में ये प्रश्न भी नहीं उठेगा कि इनकी स्थापना किन उद्देश्यों के लिए की गई थी। ये अकादमियां स्थापना के समय निश्चित किए गए उद्देश्यों की पूर्ति में कितनी सफल रहीं। आंकलन तो उन संस्थानों का हो सकता है जो सक्रिय हों और साधन संपन्न हों। संसाधन की कमी वाले संस्थानों के कार्यों का आकलन लगभग असंभव है। अन्य भाषा अकादमियों की बदहाली के बीच दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा का कोई अर्थ नहीं है। दूसरी तरफ उर्दू को लेकर पूरी बिहार सरकार सक्रिय नजर आ रही है। मुख्यमंत्री स्वयं प्रदेश के मुख्य सचिव को सार्वजनिक रूप से सभी बहालियां जल्द करने के लिए कह रहे हैं। क्या अन्य अकादमियां भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार हो रही हैं।    

समग्रता में बिहार के कला और संस्कृति के परिदृश्य को देखा जाए तो उसको लेकर शासन के स्तर पर एक उदासीनता नजर आती है। भाषा अकादमियों के अलावा शिक्षा विभाग के अंतर्गत बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का संचालन भी होता है। इन दोनों संस्थाओं का बेहद समृद्ध इतिहास रहा है। यहां से अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था लेकिन अब उन पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। इन दोनों संस्थाओं का कार्यालय ऐसी जगह पर है जहां से शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी हर दिन गुजरते हैं लेकिन इनकी बदहाली पर किसी की नजर नहीं जाती है या देखकर अनदेखा किया जाता है। अगर ये दोनों संस्थाएं सिर्फ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों का प्रकाशन कर दें तो उनकी बिक्री से ही आगे की योजनाओँ पर काम करने लायक धन मिलने की संभावना बन सकती है। संस्कृति विभाग के अंतर्गत बिहार संगीत नाटक अकादमी और बिहार ललित कला अकादमी का संचालन होता है। ये दोनों संस्थाओं में लंबे समय से न तो अध्यक्ष हैं और न ही उपाध्यक्ष। प्रविधान है कि दोनों संस्थाओं में एक अध्यक्ष और दो उपाध्यक्ष को बिहार सरकार नामित करेगी। सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी विभाग के अधिकारियों के पास है। ऐसी स्थिति में इन संस्थाओं के क्रियाकलाप लगभग ठप हैं। बिहार में एक और अनूठी घटना हुई। पटना में एक हिंदी भवन बना, लोगों की उम्मीदें जगीं कि वहां हिंदी के प्रोन्नयन को लेकर कार्य हुआ करेंगे। लेकिन पहले वहां एक मैनेजमेंट संस्थान और अब जिलाधिकारी का कार्यालय चल रहा है।    

बिहार रचनात्मक रूप से बेहद उर्वर प्रदेश है। पहले भी और अब भी प्रदेश के कई लेखकों की राष्ट्रीय ख्याति रही है। रेणु से लेकर दिनकर तक, रामवृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय से लेकर उषाकिरण खान तक। वर्तमान में भी कई लेखक रचनात्मक रूप से खूब सक्रिय हैं। इन रचनाकारों और कलाकारों के साथ मिल कर ये भाषा संस्थान प्रदेश के गौरव को और विस्तार दे सकते थे लेकिन अफसोस कि शासन के स्तर पर इनपर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है। जिस तरह से उर्दू को लेकर नीतीश सरकार उत्साहित दिखाई देती है और उसके विस्तार के लिए योजनाएं बन रही है, नियुक्तियां हो रही हैं उस अनुपात में सरकार का ध्यान न तो मैथिली, न मगही और न ही भोजपुरी अकादमियों की ओर जा रहा है। अगर इन चार भाषा अकादमियों को कुछ स्थायी कर्मचारी भी मिल जाते तो इनका दैनंदिन कार्य सुचारू रूप से चल पाता। 2015 में पुरस्कार वापसी का जो प्रपंच रचा गया था, उसके कर्ताधर्ता बिहार की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फिर से विश्व कविता समारोह जैसे किसी आयोजन की रचना हो जाए और कोई अशोक वाजपेयी उसके आयोजन के लिए आगे न आ जाएं। करोड़ों का बजट आवंटन हो और कला संस्कृति के नाम पर मेला लगे।   

Saturday, July 1, 2017

‘पुरस्कार वापसी’ के पुरस्कार से परहेज कहां?

हाल ही में बिहार सरकार के कला, संस्कृति और युवा विभाग के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने दो हजार सत्रह अठारह के लिए अपना सांस्कृतिक कैलेंडर जारी किया। इस कैलेंडर में विभाग द्वारा आयोजित तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम, उसको आवंटित राशि, संभावित बजट, स्थान, माह के अलावा नोडल एजेंसी के नाम का उल्लेख है। इस कैलेंडर में क्रमांक सैंतीस पर लिखा है सत्याग्रह विश्व कविता समारोह। आयोजन स्थल पटना। संभावित बजट तीन करोड़ साठ लाख रुपए और नोडल एजेंसी के तौर पर विभाग और बिहार संगीत नाटक अकादमी का नाम उल्लिखित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भूलवश आयोजन का माह जनवरी दो हजार सत्रह छप गया है। दरअसल इस आयोजन को होना जनवरी दो हजार अठारह में है। इस पूरे कैलेंडर में इस आयोजन का संभावित बजट सबसे अधिक है। अगर जोड़ा जाए तो पूरे बजट का करीब पांचवां हिस्सा सिर्फ एक आयोजन के लिए आवंटित किया गया है। बिहार सरकार के इस संस्कृतिक कैलेंडर के जारी होते ही विश्व कविता समारोह को लेकर एक बार फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई। पाठकों को यह याद होगा कि इस स्तंभ में ही सबसे पहले इस बात की चर्चा की गई थी कि हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बिहार सरकार के सहयोग से विश्व कविता सम्मेलन करना चाहते हैं। उस वक्त यह बात सामने आई थी कि अशोक जी ये आयोजन दिल्ली में करवाना चाहते हैं, आयोजन को कॉर्डिनेट करने के लिए अशोक वाजपेयी को दिल्ली में स्टाफ और दफ्तर बिहार सरकार की तरफ से मुहैया करवाया जाएगा आदि आदि। पहली बाठक में इन विषयों पर बातचीत हुई भी थी।
अब बिहार सरकार ने इस विश्व कविता समारोह को पटना में सत्याग्रह विश्व कविता के नाम से आयोजित करने का फैसला लिया है। जाहिर सी बात है कि अशोक वाजपेयी इस योजना से शुरू से जुड़े रहे हैं लिहाजा इस बात की चर्चा एक बार फिर से शुरू हो गई है कि अशोक वाजपेयी को ही पटना में आयोजित होनेवाले विश्व कविता समारोह का जिम्मा सौंपा जा रहा है। बिहार के वरिष्ठ रचनाकार उषाकिरण खान और कर्मेन्दु शिशिर ने फेसबुक पर ये लिखा भी है कि अशोक वाजपेयी को ही ये जिम्मा दिया जा रहा है। उषा किरण खान जी ने तो साफ तौर पर लिखा कि बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग ने अशोक वाजपेयी जी को जिम्मा सौंपा है विश्व कविता सम्मेलन करने के लिए। कर्मेन्दु शिशिर जी ने लिखा कि ‘नीतीश जी जब दिल्ली गए थे तो अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल वगैरह उनसे मिलने गए थे। पहले तो वो नहीं मिले। के सी त्यागी जी तक ही रहा। मगर बाद में मिले। पवन वर्मा जी की भी भूमिका रही।‘ बाद में उन्होंने लिखा कि ऐसा उनको किसी ने बताया। इस मुलाकात के बारे में कितनी सचाई है ये तो पता नहीं लेकिन इन टिप्पणियों से ये हुआ कि विश्व कविता सम्मेलन के संयोजक के तौर पर अशोक वाजपेयी का नाम खुल गया।
दरअसल अशोक वाजपेयी ने भारत सरकार को 2014 में भी विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव दिया था जो परवान नहीं चढ़ सका था । दरअसल उस वक्त की सरकार ने अशोक वाजपेयी के उस प्रस्ताव को साहित्य अकादमी के पास भेज दिया था जिसे साहित्य अकादमी ने ठुकरा दिया था । साहित्य अकादमी ने अशोक वाजपेयी के प्रस्ताव को नकारते हुए साफ कर दिया था कि वो किसी से साथ साझीदारी में इतना बड़ा आयोजन करने के बजाए खुद इस तरह का आयोजन कर सकती है । साहित्य अकादमी ने विश्व कविता समारोह का आयोजन किया भी था । उसके बाद केंद्र में सरकार बदली। बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। चुनाव के दौरान असहिष्णुता को लेकर देश में माहौल बनाया गया। पुरस्कार वापसी अभियान को संगठित तरीके से चलाया गया। बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के गठबंधन की जीत हुई। उसके बाद अशोक वाजपेयी ने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह का प्रस्ताव दिया। लंबे समय तक सरकारी प्रक्रिया और बैठकों के बाद बिहार सरकार ने विश्व कविता समारोह के लिए तीन करोड़ साठ लाख का बजट आवंटित कर दिया है । आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा गया है लेकिन समिति में अशोक वाजपेयी हैं।
अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता सम्मेलन के बारे में कहा था कि उन्होंने एक समारोह में मुख्मंत्री को सुझाव को इस आयोजन का सुझाव दिया था। संभव है कि बिहार के मुख्मंत्री समारोह में दिए गए सुझावों पर अमल करवा देते हों । लेकिन बाद में इस आयोजन को लेकर बैठक हुई तो वहां अशोक वाजपेयी की तरफ से औपचारिक प्रसातव पर विचार किया गया। वाजपेयी उस बैठक में शामिल होने पटना गए। बैठक में उनके अलावा आलोक धन्वा, अरुण कमल और आरजेडी के नेता दीवाना भी शामिल हुए थे। उस बैठक में तय हुआ था कि समारोह पटना और बिहार के किसी एक और शहर में आयोजित की जाएगी। उस बैठक के बाद विश्व कविता समारोह के आयोजन में अशोक वाजपेयी की भूमिका को पुरस्कार वापसी के पुरस्कार के तौर पर देखा गया था। अशोक वाजपेयी ने भी लेख लिखकर इसका खंडन किया था और कहा था कि इस समारोह का पुरस्कार वापसी से कोई लेना देना नहीं है।
संभव है अशोक जी की बातें सही हों लेकिन अगर कर्मेन्दु शिशिर की उपरोक्त बातों में सचाई है तो अशोक वाजपेयी के साथ मंगलेश डबराल भी इस आयोजन को सुनिश्चित करवाने के लिए नीतीश कुमार से मिले थे। गौरतलब है कि मंगलेश डबराल भी पुरस्कार वापसी समूह में शामिल थे। यह अलहदा बात है कि इन दिनों मंगलेश डबराल साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में शिरकत करते नजर आ रहे हैं। विरोध का ये वामपंथी तरीका है, जहां आप प्रचार और लाभ हासिल करने के लिए नैतिकता आदि की आड़ लेते हैं लेकिन जैसे ही आपको किसी लाभ का प्रस्ताव मिलता है तो आप अपना विरोध त्यागकर उसे स्वीकार कर लेते हैं। पुरस्कार वापसी करने वाले लेखकों के साथ यही हो रहा है। अगर बिहार सरकार का सत्याग्रह विश्व कविता सम्मेलन पुरस्कार वापसी का पुरस्कार नहीं है तो फिर क्या है? अशोक वाजपेयी चाहे लाख सफाई दें लेकिन यह सचाई है। फेसबुक और सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा इस बात को पुष्ट भी करती हैं। जब संस्कृति विभाग का कैलेंडर जारी हुआ तो यह बात भी प्रकरांतर से सामने आने लगी कि अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता समारोह को लेकर उनपर हो रहे हमलों से आहत होकर इससे अलग होने का मन बना लिया है। इस तरह की बात भी सामने आई कि उन्होंने महीने भर पहले इस आयोजन को खुद से अलग कर लिया है। बिहार सरकार के संस्कृति विभाग के आला अफसरों से बात करने पर पता चला कि उन्हें अशोक वाजपेयी के इस समारोह से अलग होने की अबतक कोई जानकारी नहीं है। बल्कि विभागीय अफसरों ने इस बात को स्पष्ट किया कि विश्व कविता समारोह का मूल प्रस्ताव अशोक वाजपेयी का ही था और विभाग चाहता है कि अशोक वाजपेयी को ही इस आयोजन का जिम्मा मिले। सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं बस शासन के सर्वोच्च स्तर से उसपर अप्रूवल मिलना शेष है। अशोक वाजपेयी के इस समारोह से अलग होने की बात अबतक बिहार सरकार के संस्कृति मंत्रालय तक पहुंची नहीं है। ना ही उऩका कोई पत्र पहुंचा है।
पुरस्कार वापसी के पुरस्कार से भी बड़ा मुद्दा है कि विभाग के अन्य आयोजनों को पर्याप्त धनराशि का नहीं दिया जाना। इसके अलावा जो दूसरी बात है वो कि बिहार में तमाम सांस्कृतिक, साहित्यक संस्थाएं बदहाल हैं, उनके कर्मचारियों के सामने बहुधा वेतन तक का संकट पैदा हो जाता है। विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का जिम्मा जिस संगीत नाटक अकादमी को मिला है उसके अध्यक्ष तक नहीं हैं। इस बात पर गंभईरता से विचार करना होगा कि जबतक कला और संस्कृति के लिए इंफ्रास्ट्रक्टर नहीं विकसित किया जाएगा, स्थानीय प्रतिभाओं को अपने अपने क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध नहीं करवाया जाएगा तबतक इस तरह के महंगे आयोजनों का कोई अर्थ नहीं है। साहित्य अकादमी ने दिल्ली में विश्व कविता समारोह का आयोजन किया था उसमें साहित्यक लोगों की भी भागीदारी नगण्य थी। वैश्विक स्तर पर अलग अलग भाषाओं के कवियों ने अपनी भाषा में कविताएं पढ़ीं थीं, जिसको लेकर किसी तरह का उत्साह नहीं दिखा था। बिहार का संस्कृति विभाग अगर सच में साहित्य, कला संस्कृति के विकास और अंतराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान बनाने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसको इस तरह के व्यक्तिगत महात्वाकांक्षी प्रस्तावों पर विचार करने के पहले स्थानीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता और आयोजन से स्थानीय प्रतिभाओं को होनेवाले लाभ का आंकलन भी करना चाहिए। अन्यथा होगा ये कि इस तरह के आयोजन एक साल होकर, व्यक्ति या संस्था विशेष को लाभ पहुंचाकर बंद हो जाएंगे


Tuesday, June 6, 2017

घोटाले की जड़ पर हो प्रहार

इन दिनों सोशल मीडिया पर बिहार में बहार है, टॉपर गिरफ्तार है का जुमला लगातार चल रहा है। इसके अलावा भी तरह तरह के जुमले गढ़े और वायरल किए जा रहे हैं। बिहार की शिक्षा व्यवस्था की पोल एक बार फिर खुली है। यह लगातार दूसरा साल है जब बारहवीं के टॉपर को उसके विषय का ज्ञान ही नहीं है और वो न्यूज चैनलों के कैमरे के सामने अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हुए धरे गए हैं । पिछले साल हाजीपुर की एक लड़की ने टॉप किया था और उसका विषय पॉलिटिकल साइंस था लेकिन उसको अपने विषय का नाम भी पता नहीं था और उसने कैमरे के सामने पॉलिटिकल साइंस को प्राडिकल साइंस कहा था । इस साल भी जिस शख्स ने म्यूजिक को विषय लेकर टॉप किया है उसको संगीत की ए बी सी भी नहीं आती है । इसका सार्वजनिक प्रदर्शन भी हुआ। इकतालीस बयालीस साल का एक शख्स बारहवीं में टॉप करता है और सिस्टम इसको कहीं भी जांच नहीं पाता है। सिस्टम को धोखा देकर या सिस्टम की मदद लेकर टॉप कर जा रहा है। इससे मेधावी छात्रों को नुकसान तो हो ही रहा है लेकिन उससे भी ज्यादा नुकसान बिहार की छवि को हो रहा है जिसको लेकर बिहार के मुख्मंत्री खासे सतर्क रहते हैं । इस बार भी टॉपर पर केस हुआ, गिरफ्तारी हुई लेकिन इस समस्या की जड़ में जाना होगा । पिछले साल भी बिहार के मुख्यमंत्री ने कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया था । कार्रवाई हुई भी लेकिन लगता है वो नाकाफी था। पिछली बार जो टॉपर घोटाला हुआ था उसके बाद सरकार ने अड़सठ स्कूलों की बारहवीं की मान्यता रद्द कर दी थी और 19 स्कूलों की मान्ता रद्द करने जैसी बड़ी कार्रवाई भी हुई थी लेकिन सिस्टम में इतने झोल और सुराख हैं कि लीकेज को रोक पाना संभव नहीं है । पिछले साल भी टॉपर घोटाले के सामने आने के बाद ताबड़तोड़ छापेमारी हुई थी । पूर्व बोर्ड अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद आदि पर भी कार्रवाई हुई थी ।
पिछले साल बिहार में बोर्ड परीक्षा के वक्त एक फोटो वायरल हुआ था जिसमें हर खिड़की पर एक शख्स लटका था और बताया जा रहा था कि हर मंडिल पर खिड़कियों पर लटके लोग नकल करवाने में व्यस्त हैं । इस फोटो के सामने आने के बाद उसपर जमकर चर्चा हुई थी और विदेशों तक में बिहार की शिक्षा व्यवस्था को उस फोटो के आधार पर परखा गया था । विदेशी अखबारों ने उस फोटो के आधार पर एडिटोरियल लिखे थे। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था को बुनियादी स्तर से ठीक किया जाए। बिहार की शिक्षा व्यवस्था में कमजोरी की जड़ में बहुत हद तक शिक्षकों की कमी का होना है । प्रशासनिक लालफीताशाही में शिक्षकों की नियुक्ति का मामला उलझता रहा है और विभागीय मंत्रियों ने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया । प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक ये बीमारी व्याप्त है लेकिन इसके इलाज के लिए पिछले दो दशक में कुछ किया गया हो ये दिखाई नहीं देता । चंद सालों पहले जब ठेके पर प्राइमरी शिक्षक रखे गए थे तब उसमें भी गड़बड़झाला हुआ था । बाद में पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद तीन हजार कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों को बर्खास्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी क्योंकि जब उनका टेस्ट लिया गया तो वो आधारभूत जानकारी भी नहीं बता पाए । दो हजार बारह में भी एक सौ इक्यावन प्राइमरी शिक्षकों को योग्य नहीं होने के चलते हटा दिया गया था । अब जब शिक्षक ही इस तरह के होंगे तो छात्रों से क्या अपेक्षा की जा सकती है । पिछले साल यह भी चर्चा उठी थी कि देशरत्न डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने छपरा के जिस स्कूल से दसवीं पास की थी उस स्कूल की हालत ये है कि वहां नवीं- दसवीं के लिए एक भी शिक्षक नहीं थे। राजेन्द्र बाबू ने वहां पढ़ाई की थी लिहाजा उसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए हाई स्कूल को इंटर कॉलेज बना दिया गया । स्कूल को अपग्रेड तो कर दिया गया लेकिन स्कूल की रीढ़ माने जानेवाले शिक्षक वहां नहीं है । अब जिस स्कूल में कोई शिक्षक नहीं हो और साल दर साल वहां परीक्षा हो तो फिर क्या हो सकता है इसकी कल्पना ही की जा सकती है ।
बिहार मे स्कूली शिक्षा के अलावा कॉलेजों में भी हाल बुरा है । बिहार में कई ऐसे कॉलेज हैं जहां विषय विशेष में कोई भी शिक्षक नहीं है लेकिन वहां हर साल एडमिशन हो रहा है और छात्र पास भी कर रहे हैं । तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के अंतर्गत मुंगेर के एक कॉलेजों में केमिस्ट्री, ज्योग्राफी और संस्कृत में कोई शिक्षक नहीं है लेकिन वहां हर साल इन विषयों में छात्रों का नामांकन हो रहा है । इसी तरह से इसी शहर के एक और कॉलेज में शिक्षकों की संख्या इतनी कम हो गई है कि कॉलेज के जरूरी काम भी संभव नहीं हो पा रहे हैं । पास के खड़गपुर के कॉलेज की भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है । अब यह तो अजूबा है कि किसी कॉलेज में विषय का कोई शिक्षक नहीं हो और वहां से हर साल उसी विषय में छात्र पास कर रहे हों । यहीं से नकल और टॉपर घोटाले की जमीन तैयार होती है । छात्र मजबूर हैं, स्कूल और क़ॉलेज के शिक्षक इस नासूर को रोकने में बेबस । सवाल यही उठता है कि टॉपर घोटाले में मुजरिम तो पकड़े जा सकते हैं लेकिन साल दर साल इस तरह के घोटाले की वजहों को चिन्हित करके उसको दुरुस्त करने का काम जितना जल्द शुरू हो सकते उतना अच्छा है । इस वक्त नीतीश कुमार के सहयोगी दल कांग्रेस के कोटे से शिक्षा मंत्री हैं। कांग्रेस को आगे बढ़कर घोटाले की जमीन पर प्रहार करने की इच्छाशक्ति दिखाना होगा। 

Thursday, May 18, 2017

अवसर की ताक में नीतीश कुमार

चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव औपर उनके बेटे बेटियों के ठिकानों पर छापेमारी हुई। आरोप है कि उनके रेल मंत्री रहते हजार करोड़ रुपए के आसपास बेनामी संपत्ति उनके बेटों और बेटियों के नाम पर की गईं। यह तो जांच के बाद साफ हो पाएगा कि इन आरोपों में कितना दम है लेकिन लालू यादव एक बार फिर से भ्रष्टाचार के आरोपों में बुरी तरह से घिरते नजर आ रहे हैं। पटना में अस्सी लाख की मिट्टी खरीद का आरोप लालू यादव के बेटे पर लगा और उसके बाद तो दानापुर से लेकर दिल्ली तक में बेनामी संपत्ति की बात सामने आने लगी। शेल कंपनियों की मार्फत लेन-देन की बात भी सामने आ रही है। छापेमारी के बाद अब बिहार की गठबंधन सरकार को लेकर भी कयासबाज़ी का दौर शुरू हो गया है। इन अटकलों को लालू यादव के एक ट्वीट ने ही हवा दी जिसमें उन्होंने लिखा कि बीजेपी को नया साथी मुबारक हो। उनका इशारा साफतौर पर नीतीश कुमार की ओर था।
नीतीश कुमार की बीजेपी के साथ नजदीकियों की अटकलें समय समय पर जोर पकड़ती हैं। लेकिन लालू यादव को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने दूसरे ट्वीट में सफाई दी। पहले ट्वीट और सफाई के बीच एक चतुर राजनेता की तरह उन्होंने नीतीश कुमार को संदेश दे दिया । दरअसल लालू यादव के ठिकानों पर छापेमारी के पहले की घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक तस्वीर नजर आती है । संभव है कि ये तस्वीर दूर की कौड़ी हो। छापे के एक दिन पहले एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने एलान किया था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचारियों को किसी कीमत पर छोड़नेवाली नहीं है । उस कार्यक्रम में उन्होंने ये भी कहा था कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई को लेकर मीडिया सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने का आरोप ना लगाए।
अमित शाह के इस बयान के पहले पटना में नीतीश कुमार से जब लालू यादव पर लग रहे आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि अगर लालू यादव पर लग रहे आरोपों में दम है तो केंद्रीय एजेंसी से जांच करा लें। इन बयानों के अगले ही दिन लालू यादव के ठिकानों पर छापेमारी हुई। हो सकता है कि इन बयानों में कोई साझा सूत्र नहीं हो लेकिन इनके निहितार्थ तो ढूंढे ही जाएंगे। इनको जोड़कर देखा ही जाएगा। लालू यादव पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप में सजा काट रहे हैं, लिहाजा इन आरोपों की वजह से वो परसेप्शन की लड़ाई में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। लालू यादव भले ही इसको सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी लड़ाई करार दें, लेकिन जनता के मन में शायद ही लालू के बयानों का असर हो। पहले हर बात में लालू यादव सामाजिक न्याय की दुहाई दिया करते थे, इन दिनों वो सांप्रदायकिता को अपनी राजनीति का आधार बनाना चाहते हैं। सामाजिक न्याय इन दिनों नेपथ्य में चला गया है। लालू यादव इस वक्त अपनी राजनीति के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। खुद सजायाफ्ता है, बेटों और बेटी पर संगीन इल्जाम लग रहे हैं। नीतीश कुमार के साथ चलना उनकी मजबूरी है। लेकिन नीतीश कुमार की कोई मजबूरी नहीं है। जब-जब लालू यादव या उनकी पार्टी के लोग नीतीश कुमार को आंख दिखाने की कोशिश करते हैं तो नीतीश कुमार एक महीन राजनीतिक चाल से सबको लाइन पर ले आते हैं। लालू यादव के ठिकानों पर छापे के बाद नीतीश कुमार ने बेहद सधा हुआ बयान दिया है।

नीतीश कुमार के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी छवि को लेकर खासे सतर्क रहते हैं। इसके अलावा उनके प्रतिद्वंदी भी ये मानते हैं कि राजनीति में भविष्य को भांपने की कला में वो माहिर हैं। भविष्य को भांपकर ही उन्होंने राजनीति में अपने चिर प्रतिद्वंदी लालू यादव के साथ बिहार विधानसभा चुनाव के पहले गठबंधन कर लिया था। इस गठबंधन का लाभ भी उनको मिला। हो सकता है कि नीतीश कुमार को लग रहा हो कि अब अगले दस साल की राजनीति में बीजेपी का विरोध करके कोई फायदा नहीं है। वो जिस दिन अपने इस आंकलन से कन्विंस हो जाएंगे उस दिन उनको बीजेपी के साथ जाने में कोई संकोच नहीं होगा। दूसरे नीतीश कुमार अगर विपक्ष की राजनीति में अपनी जगह तलाशते हैं तो उनको ज्यादा से ज्यादा नंबर दो की हैसियत मिल सकती है, हलांकि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक आदि के रहने से नंबर दो की पोजिशन हासिल करने में भी नीतीश को खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। विपक्षी एकता की धुरी इस वक्त कांग्रेस ही है और राष्ट्रीय पार्टी होने की वजह से उसका दावा भी यही होगा। अब राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता कितनी हो पाएगी इसमें भी संदेह है। विपक्षी दलों के नेताओं और पार्टियों के अपने इतने अंतर्रविरोध हैं कि सबको एक साथ लाना लगभग टेढ़ी खीर है। यूपी में मायावती- अखिलेश को साथ लाना, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और वामपंथियों को साथ लाना आसान नहीं है। सबकी अपनी अपनी महात्वाकांक्षा है, सबके अपने अपने एजेंडे हैं, सबके अपने अपने सपने भी हैं। ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार अगर बीजेपी के साथ जाते हैं तो कम से कम बिहार में उनके लिए किसी तरह की चुनौती नहीं होनेवाली है। दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी भी चाहेगी कि उसको बिहार में नीतीश कुमार जैसा मजबूत और बेदाग छवि वाला सहयोगी मिले। सारी स्थितियां किसी नए समीकरण की ओर संकेत कर रही है। हो सकता है कि ये आंकलन अभी कालपनिक लगे लेकिन इस वक्त के माहौल में इनको काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है।    

Wednesday, October 19, 2016

घोटालों की जड़ पर हो प्रहार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली बिहार सरकार ने शिक्षा माफिया पर नकेल कसना शुरू कर दिया है । एक ऐतिहासिक फैसले में बिहार विद्याल. परीक्षा समिति ने 68 स्कूलों की बारहवीं की मान्यता रद्द कर दी है । इसके अलावा 19 स्कूलों की मान्यता को भी निलंबित कर दिया गया है । बिहार में टॉपर घोटाले के बाद ये अबतक की सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है । बिहार की सियासत को नजदीक से देखने वालों का मानना है कि नीतीश कुमार इस मामले में लालू यादव के दबाव में नहीं आते हुए कार्रवाई कर रहे हैं । दरअसल बिहार के टॉपर घोटाले के मास्चर माइंड और बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद के साथी बच्चा राय को लालू यादव का करीबी माना जाता है । पहले शहाबुद्दीन के मामले में सुप्रीम कोर्ट जाकर नीतीश ने साफ कर दिया कि वो किसी के दबाव में नहींआनेवाले हैं और अब इस कार्रवाई से भी कुछ इसी तरह के संकेत निकल रहे हैं । मान्यता रद्द करने की इस कार्रवाई के बाद बच्चा राय पर शिकंजा और कसेगा । पिछले साल टॉपर घोटाले के सामने आने के बाद ताबड़तोड़ छापेमारी समेत कई कार्रवाइयां की गई थीं और ये संदेश देने की कोशिश की गई कि शिक्षा में घपला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । कई गिरफ्तारियां भी हुईं थी । प्रशासनिक मामलों में कार्रवाई होना और कार्रवाई होते दिखना दोनों आवश्यक है । दरअसल पिछले साल बिहार में बोर्ड की परीक्षा के वक्त एक तस्वीर छपी थी जिसमें स्कूल की हर खिड़की पर एक शख्स खड़ा होकर नकल करवा रहा था । ये फोटो और इस घटना का वीडियो सोशल साइट्स पर वायरल हुआ । देश विदेश के अखबारों में इस तस्वीर के हवाले से लेख लिए गए, न्यूज चैनलों पर प्रोग्राम बने । इस तस्वीर की स्मृति धुंधली हो ही रही थी कि बिहार में टॉपर घोटाला हो गया ।
हाजीपुर की एक लड़की ने बोर्ड में टॉप किया वो पॉलिटिकल साइंस को प्रोडिकल साइंस कह रही थी । इसको भी गिरफ्तार आदि कर तमाम कार्रवाईयां की गईं । कहना ना होगा कि शिक्षा घोटाले पर बिहार सरकार सख्त है लेकिन सरकार को इस समस्या की जड़ में भी जाना होगा । इस तरह के घोटालों या फिर हर खिड़की पर नकल करानेवालों की तस्वीर सामने आने के पीछे बिहार की शिक्षा व्यवस्था में लगा घुन या फिर राज्य सरकार की उदासीनता है ।
बताया जा रहा है कि देशरत्न डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने छपरा के जिस स्कूल से दसवीं पास की थी उस स्कूल की हालत ये है कि वहां नवीं- दसवीं के लिए एक भी शिक्षक नहीं हैं । चूंकि राजेन्द्र बाबू ने वहां पढ़ाई की थी लिहाजा उसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए हाई स्कूल को इंटर कॉलेज बना दिया गया । स्कूल को अपग्रेड तो कर दिया गया लेकिन स्कूल की रीढ़ माने जानेवाले शिक्षक वहां नहीं है । अब जिस स्कूल में कोई शिक्षक नहीं हो और साल दर साल वहां परीक्षा हो तो फिर क्या हो सकता है इसकी कल्पना ही की जा सकती है । ये तो रहा हाईस्कूल का हाल, अब जरा उसी इंटर कॉलेज में शिक्षकों की स्थिति देख लीजिए जहां स्वीकृत पद से एक तिहाई शिक्षक नियुक्त हैं । छपरा के इस इंटर क़लेज के बारे में जिला के शिक्षा अधिकारियों को जानकारी है लेकिन फिर भी बगैर शिक्षक के स्कूल चल रहा है । ऐसा नहीं है कि ये स्थिति छपरा के एक स्कूल की है । बिहार में कई ऐसे कॉलेज भी हैं जहां विषय विशेष में कोई भी शिक्षक नहीं है लेकिन वहां हर साल एडमिशन हो रहा है और छात्र पास भी कर रहे हैं । मुंगेर के एक कॉलेजों में केमिस्ट्री, ज्योग्राफी और संस्कृत में कोई शिक्षक नहीं है लेकिन वहां हर साल इन विषयों में छात्रों का नामांकन हो रहा है । इसी तरह से इसी शहर के एक और कॉलेज में शिक्षकों की संख्या इतनी कम हो गई है कि कॉलेज के जरूरी काम भी संभव नहीं हो पा रहे हैं । पास के खड़गपुर के कॉलेज की भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है । अब यह तो अजूबा है कि किसी कॉलेज में विषय का कोई शिक्षक नहीं हो और वहां से हर साल उसी विषय में छात्र पास कर रहे हों । यहीं से नकल और टॉपर घोटाले की जमीन तैयार होती है । छात्र मजबूर हैं, स्कूल और क़ॉलेज के शिक्षक इस नासूर को रोकने में बेबस । सवाल यही उठता है कि टॉपर घोटाले में छापेमारी करके मुजरिम तो पकड़े जा सकते हैं लेकिन साल दर साल इस तरह के घोटाले के लिए तैयार होनेवाली स्थिति के बारे मे बिहार सरकार कब सोचना शुरू करेगी ।
बिहार की शिक्षा व्यवस्था में कमजोरी की जड़ में बहुत हद तक शिक्षकों की कमी का होना है । प्रशासनिक लालफीताशाही में शिक्षकों की नियुक्ति का मामला उलझता रहा है और विभागीय मंत्रियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया । प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक ये बीमारी व्याप्त है लेकिन इसके इलाज के लिए पिछले एक दशक में कुछ किया गया हो ये दिखाई नहीं देता । चंद सालों पहले जब ठेके पर प्राइमरी शिक्षक रखे गए थे तब उसमें भी गड़बड़झाला हुआ था । बाद में पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद तीन हजार कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों को बर्खास्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी क्योंकि जब उनका टेस्ट लिया गया तो वो आधारभूत जानकारी भी नहीं बता पाए । दो हजार बारह में भी एक सौ इक्यावन प्राइमरी शिक्षकों को योग्य नहीं होने के चलते हटा दिया गया था । बिहार में महागठबंधन की सरकार में इस वक्त कांग्रेस कोटे से शिक्षा मंत्री हैं । पिछले दिनों उनका तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी से ‘डियर’ विवाद हुआ था । अशोक चौधरी से अपेक्षा की जाती है कि पहले वो बिहार के स्कूल और कॉलेजों में बुनियादी सुविधा मुहैया करवाएं फिर विवादों में उलझें । योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करवाएं तभी ना तो खिड़की से लटके नकल करवानेवाले की तस्वीर सामने आएगी और ना ही टॉपर घोटाला होगा और ना ही बिहार की बदनामी होगी और बिहारियों का मजाक बनेगा ।


Monday, April 18, 2016

संघमुक्त भारत का जादुई स्वप्न !

बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव के साथ गठजोड़ करके सत्ता तक पहुंचे नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति में अपनी संभावनाएं तलाशने में जुटे हुए हैं । नीतीश अब इस जुगत मे लगे हैं कि जेडीयू को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिले । इसके लिए वो अजीत सिंह समेत कई छोटे दलों से बातचीत करके उनका विलय जेडीयू में करवाने में लगे हैं । हाल की में नीतीश कुमार शरद यादव की जगह अपनी पार्टी जेडीयू के अध्यक्ष बने हैं । अब नीतीश कुमार अपनी पार्टी को नेशनल पार्टी का दर्जा दिलवाकर अपना कद बढ़ाने में लगे हैं । दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद नीतीश कुमार अब बीजेपी विरोध की धुरी बनना चाहते हैं । नीतीश कुमार एक मंजे हुए नेता हैं और उनको लगता है कि बीजेपी और मोदी के विरोध की उनकी मुहिम तले तमाम दल उनके साथ आएंगें । पुरानी कहावत है कि राजनीति में कोई किसी का स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है । इमरजेंसी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण आंदोलन की उपज नीतीश कुमार इन दिनों कांग्रेस के साथ साझा सरकार चला रहे हैं । बीजेपी के साथ लंबे अरसे तक सरकार चलानेवाले नीतीश कुमार इन दिनों बीजेपी के विरोध में तनकर खड़े हैं । कहा जाता है कि जब नीतीश कुमार पहली बार एनडीए में शामिल होना चाहते थे तो उन्होंने उस वक्त के संघ प्रमुख रज्जू भैया की मदद ली थी। नीतीश कुमार वक्त और माहौल देखकर अपनी राणतीति तो तय करते ही हैं, अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए साथी चुनते और छोड़ते हैं । एक जमाने में वो लालू यादव के साथ थे फिर लालू से अलग होकर सरकार चलाई और जब जरूरत महसूस हुई तो एक बार फिर से लालू यादव का दामन थाम लिया । अलग अलग वक्त पर अलग अलग साथी चुनने को नीतीश कुमार कभी बिहार हित तो कभी देशहित में बताते हुए जस्टिफाई करते रहे हैं । इस वक्त बीजेपी के विरोध में उनको संभावना नजर आ रही है लिहाजा उन्होंने संघ पर हमला बोला है ।  अपनी इस छवि को पुख्ता करने के लिए नीतीश ने अब एक नया दांव चला है । नीतीश कुमार ने संघ मुक्त भारत की बात करते हुए लोकतंत्र की रक्षा की खातिर सभी गैर बीजेपी दलों से एकजुट होने की अपील की है । नीतीश बाबू का कहना है कि बीजेपी और उसकी बांटनेवाली विचारधारा के खिलाफ एकजुट होना ही, लोकतंत्र को बचाने का एकमात्र रास्ता है । नीतीश ने साफ तौर पर एलान किया कि उनका किसी व्यक्ति विशेष से विरोध नहीं है लेकिन वो देश को बांटनेवाली विचारधारा के खिलाफ हैं । वो बीजेपी के विचारधारा को आरएसएस की विचारधारा मानते हुए उसकी खिलाफत की हुंकार भरते हैं । उनका कहना है कि भारत को संघमुक्त करना आवश्यक है ष एक तरफ तो वो कहते हैं कि वो किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं हैं लेकिन अगली ही पंक्ति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमलावर नजर आते हैं । नीतीश के मुताबिक बीजेपी की बागडोर अब एक ऐसे नेता के हाथ में है जिसका धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द में कोई यकीन है और उसने पार्टी के कद्दावर नेताओं को हाशिए पर डाल दिया है ।
एक और पुरानी कहावत है कि अगर आप किसी का लगातार विरोध करते हैं तो कई बार आप उसकी ही तरह हो जाते हैं । बीजेपी का विरोध करते करते नीतीश कुमार भी बीजेपी के नारों के अनुयायी बनते नजर आ रहे हैं जब वो बीजेपी के नारे कांग्रेस मुक्त भारत की तर्ज पर संघ मुक्त भारत का नारा बुलंद करते हैं । दरअसल नीतीश कुमार यह बात बखूबी जानते हैं कि बीजेपी को असली ताकत संघ से ही मिलती है । संघ से बीजेपी को ना केवल वैचारिक शक्ति बल्कि कार्यकर्ताओं की ताकत भी हासिल होती है जो चुनाव दर चुनाव पार्टी को मजबूत करती नजर आती है । संघ भले ही प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में ना हो लेकिन बीजेपी के गठन के बाद से वहां एक सहसरकार्यवाह होते हैं जो पार्टी और संघ के बीच तालमेल का काम देखते हैं । इन दिनों ये काम कृष्ण गोपाल देख रहे हैं । सबसे पहले 1949 में के आर मलकानी ने संघ के सक्रिय राजनीति में आने की वकालत की थी । तब मलकानी ने लिखा था – संघ को सक्रिय रूप से राजनीति में शामिल होना चाहिए ताकि राजनीति की षडयंत्रों को नकारा जा सके । इसके अलावा सरकार की भारत विरोधी नीतियों का विरोध किया जा सके । बावजूद इसके संघ सक्रिय राजनीति में तो नहीं उतरा बल्कि परोक्ष रूप से राजनीति से गहरे जुड़ता चला गया ।  नीतीश कुमार के बयान को संघ के इस अप्रत्यक्ष ताकत को काउंटर करने के आलोक में देखा जाना चाहिए ।

नीतीश कुमार को ये भी लगता है कि बिखरी हुई कांग्रेस और राहुल गांधी के नाम पर सभी दल बीजेपी के खिलाफ एकजुट नहीं हो सकते हैं और उनकी केंद्रीय राजनीति के सपने को पूरा करने के लिए ये सबसे मुफीद वक्त है । संघ पर हमला बोलकर नीतीश कुमार अपनी सेक्युलर छवि भी पेश करना चाहते हैं । पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री और फिर करीब दस साल तक बीजेपी के साथ बिहार में सरकार चलानेवाले नीतीश कुमार संघ पर हमला कर अपनी इसी सेक्युलर छवि को और गाढा करना चाहते हैं । लेकिन नीतीश कुमार ये भूल गए हैं कि उन्नीस पच्चीस में बना संगठन भारत में अपनी जड़े बहुत गहरे जमा चुका है । नीतीश कुमार के लिए यह जानना बेहद आवश्यक है कि आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है । यह भी तथ्य है कि संघ की कोई औपचारिक सदस्यता नहीं होती लेकिन शाखाओं में उसके स्वयंसेवक आते हैं । दो हजार दस से लेकर दो हजार पंद्रह के बीच संघ की दैनिक शाखा की संख्या में 29 फीसदी की, 61 फीसदी बढ़ोतरी साप्ताहिक शाखाओं की और 40 फीसदी बढ़ोतरी मासिक शाखाओं की दर्ज की गई है । पिछले पांच साल में संघ ने युवाओं के बीच अपनी गहरी पैठ बनाई है । उसका ही नतीजा है कि हाल में गणवेश में बदलाव को हरी झंडी गई । तो नीतीश कुमार जब संघमुक्त भारत की कल्पना करते हैं तो उनको देश के सामने इस योजना का ब्लूप्रिंचट भी पेश करना चाहिए था अन्यथा ये फकत नारेबाजी या जुमलेबाजी ही मानी जाएगी । वैसी जुमलेबाजी जिसके लिए वो नरेन्द्र मोदी को आड़े हाथों लेते रहे हैं ।  

Monday, August 24, 2015

भाषाई अकादमी का दुरुपयोग ?

बिहार में विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है, औपचारिक एलान बाकी है लेकिन सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है । सभी राजनीतिक दल अपने अपने मोहरे चल रहे हैं । शह और मात का खेल जारी है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बिहार दौरों ने चुनावी फिंजा को संगीन बना दिया है । इस बार का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार और बारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए बेहद अहम है, लालू के लिए तो अस्तित्व को बचाने की लड़ाई ही है । लेकिन इन सबसे इतर भी एक वजह है जिसके कारण ये चुनाव चर्चित हो रहा है । विधानसभा की इस सियासी बाजी में इस बार साहित्यक और सांस्कृतिक संस्थाओं को भी मोहरा बनाया जा रहा है । जिन संस्थाओं पर भाषा और संस्कृति के विकास की जिम्मेदारी है वो अपने मंच का इस्तेमाल राजनीति चमकाने के लिए करने की इजाजत दे रहे हैं । ताजा मामला है दिल्ली का । दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी ने दिल्ली में एक आयोजन किया । इस कार्यक्रम का उद्देश्य भाषा से जुड़े साहित्यकारों कलाकारों और अहम शख्सियतों का सम्मान करना था ।  इस कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी बुलाया गया था । यहां तक तो सब कुछ ठीक था । कोई भी अकादमी किसी भी राजनेता को साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए या सम्मान समारोह का गवाह बनने के लिए बुला सकती है । लेकिन क्या किसी भी राजनीतिक दल के नेता या किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को इस मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करने की इजाजत दी जा सकती है । दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी के उद्देश्यों में राजनीतिक कार्यक्रमों के बारे में कुछ लिखा लिखा नहीं है । ये राजनीतिक कार्यक्रम था भी नहीं । ये कार्यक्रम तो उस सरोगेट विज्ञापन की तरह था जो हमारे यहां टेलीविजन पर चलते या अखबारों में छपते हैं । शराब के विज्ञापन पर रोक है तो फिर शराब के नाम से ही पानी की बोतल बना लो और फिर उसके विज्ञापन से जनता को बताओ कि अमुक नाम से शराब भी है । इसी तरह से दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी ने भी एक सरोगेट साहित्यक कार्यक्रम आयोजित किया था । इस कार्यक्रम में मंच पर जेडीयू और आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री बैठे थे । हाथ में हाथ डालकर उपर उठाकर नेताओं ने फोटो भी खिंचवाए और साथ होने का संदेश भी जनता को दिया । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों ने  मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच से पूरी तरह से राजनैतिक भाषण दिया । नीतीश और केजरीवाल दोनों ने मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जोरदार हमला बोला । बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयानों को खारिज किया बल्कि अपने तर्कों को सामने रखने के लिए लंबा वक्त भी लिया । नीतीश कुमार को मालूम था कि कार्यक्रम दिल्ली में है और केजरीवाल की मंच पर मौजूदगी सुर्खियां बनेंगी लिहाजा उन्होंने उस अवसर का बेहतरीन इस्तेमाल किया । दिल्ली के मुख्यमंत्री और मैथिली भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने भी इस मंच से भारतीय जनता पार्टी, नरेन्द्र मोदी, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग आदि की आलोचना की । साहित्यक सम्मान नेपथ्य में चला गया । सारी चर्चा मोदी बनाम नीतीश-केजरीवाल पर आकर टिक गई । नीतीश और केजरीवाल की दोस्ती पर भी चर्चा शुरू हो गई । इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दिल्ली की अन्य भाषाई अकादमियों के कर्मचारियों को भी काम पर लगाया गया था । जाहिर है कि दिल्ली सरकार इस कार्यक्रम को बेहतर करना चाहती थी । कार्यक्रम में राजनेताओं को भी न्योता दिया गया था । उन राजनेताओं को भी जिनका मैछिली भोजपुरी से कोई लेना देना नहीं था । आयोजकों की मंशा साफ थी । इस कार्यक्रम को राजनीतिक रखना और दिल्ली और बिहार के मुख्यमंत्रियों को अपननी बात रखने का मंच देना । उसमें मैथिली पंजाबी अकादमी सफल रही ।  
दिल्ली में जब शीला दीक्षित की सरकार ने मैथिली भोजपुरी अकादमी का गठन किया था तब उसका लक्ष्य था – मैथिली और भोजपुरी भाषओं व साहित्य-संस्कृति का उन्नयन व पल्लवन । इसके अलावा इस अकादेमी की कार्य और उद्देश्यों की एक बड़ी लंबी फेहरिश्त बेवसाइट पर मौजूद है लेकिन उसमें ये कहीं नहीं लिखा गया है कि इसके मंच से राजनीति होगी । नई बनी कमेटी ने इन दोनों भाषाओं के उन्नयन और पल्लवन के लिए क्या काम ये तो अभी ज्ञात नहीं हो सका है क्योंकि सरकार की बेवसाइट इपडेट नहीं है । हां इतना अवश्य हुआ कि केजरीवाल- नीतीश को एक साथ मंच पर लाकर अकादमी ने अपने अध्यक्ष का काम कर दिया । मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच के इस दुरुपयोग पर मुझे हरिशंकर परसाईं का एक लेख – हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं - का स्मरण हो आया है। अपने उस लेख में परसाईं जी ने कई चुटीले वाक्य लिखे हैं जो आज भी वर्षों बाद मौजूं हैं – ‘मेरे नाम, काम,, धाम सब बदल गए हैं । मैं राजनीति में शिफ्ट हो गया हूं । उसी लेख में हरिशंकर परसाईं ने आगे लिखा है – पार्टी का नाम जनमंगल कांग्रेस होगा । नाम में जन या जनता, या लोक रखने का आधुनिक राजनीति में फैशन चल पड़ा है । इसलिए हमने भी जन शब्द रख लिया । जनता से प्रार्थना है कि वो इसे गंभीरता से ना लें, इसे वर्तमान राजनीति का एक मजाक समझें । ...जनता कच्चा माल है । इससे पक्का माल विधायक मंत्री आदि बनते हैं । पक्का माल बनाने के लिए कच्चे माल को मिटाना ही पड़ता है । हम जनता को विश्वास दिलाते हैं उसे मिटाकर हम ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाएंगे । हमारा न्यूनतम कार्यक्रम सरकार में रहना है । ‘  तो क्या ये मान लिया जा कि दिल्ली की मैथिलि भोजपुरी अकादमी राजनीति में ‘शिफ्ट’ हो गई है  । क्या वो पक्का माल बनाने के काम में लग गई है । क्या वो साहित्य संस्कृति के विकास के कामों को मिटाकर ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाने में लग गई है । क्या उनका न्यूनतम कार्यक्रम सरकार बनवाना हो गया है । अगर इन सारे प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है तो ये बेहद चिंता की बात है ।  कम से कम मैथिली और भोजपुरी भाषा-भाषियों के लिए । पहले भी इन अकादमियों का राजनीति के लिए इस्तेमाल होता रहा है लकिन इस तरह से खुले आम, अकादमी के मंच से राजनीतिक भाषण पहली बार हुआ है । दरअसल दिल्ली में नई सरकार के गठन के बाद इन भाषाई अकादमियों में उपाध्यक्षों की नियुक्तियां हुईं । सरकार ने अपने मनमाफिक लेखकों और पत्रकारों को इन पदों पर बैठाया । यह सरकार का विशेषाधिकार है कि वो अपने मनमुताबिक लोगों का चयन करे लेकिन इन पद पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वो भाषा और साहित्य के विकास के लिए कोई ठोस रूपरेखा बनाएंम और उसको क्रियान्वित करें ।

अब अगर हम दिल्ली के अलावा पूरे देश की भाषाई अकादमियों पर विचार करें तो लगभग सारी अकादमियां सरकारी कार्यक्रमों को ही बढ़ावा देती हैं । इन अकादमियों पर होनेवाला खर्च करदाताओं के खून पसीने की कमाई से अर्जित किए गए पैसों की बर्बादी है । इनका उद्देश्य देखने में बहुत अच्छा लगता है , आदर्शवाद की तमाम बातें भी होती हैं लेकिन जब कार्यक्रमों को करने का वक्त आता है तो फिर राजनीतिक आकाओं की ओर देखा जाने लगता है । कभी मंत्री तो कभी मुख्यमंत्री की इच्छा पर कार्यक्रम तय किए जाते हैं, बहुधा इस बात का ख्याल रखा जाता है कि जिस पार्टी की सरकार हो उस पार्टी के विरोधियों को ना बुलाया जाए । इस चक्कर में कई बार कार्यक्रमों में भारी भरकम खर्च होने के बावजूद उससे भाषा और साहित्य को कुछ हासिल नहीं होता है । इन अकादमियों का गठन भाषा और साहित्य को बढ़ाना देने के लिए किया गया था लेकिन काला्ंतर में हुआ यह कि भाषा और साहित्य की बजाए ये अपने अपने सूबे के मुख्यमंत्रियों की छवि के विकास के लिए काम करने लगीं । नतीजा क्या हुआ कि ये अकादमियां राज्य सरकार के सूचना विभाग का एक्सटेंशन बन गईं और इसके सचिव वगैरह उस विभाग के अफसरों की तरह काम करने लगे । इन अकादमियों को चलाने के लिए कभी कभार अच्छे लेखकों का भी चयन हो जाता है लेकिन उन अच्छे लेखकों के सामने सरकारी बाबुओं से निपटने की बड़ी चुनौती होती है । सुविधाएं भी कम होती हैं । उपाध्यक्षों के लिए मात्र चार हजार रुपए महीने के मानदेय का प्रावधान है जो कि मेरी समझ से इस पद पर बैठनेवाले का अपमान है । या तो इसको अवैतनिक कर देना चाहिए या फिर सम्मानजनक राशि का प्रावधान किया जाना चाहिए । वर्ना वही होगा कि अकादमी के कार्यक्रमों को राजनीतक मंच बनाकर उसके कर्ताधर्ता अपना रसूख बढ़ाने में लग जाएंगे, और यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है जो न इन अकादमियों को खत्म कर दे सकती हैं । 

Sunday, April 26, 2015

बिहार के साहित्यिक हकीम

मशहूर व्यंग्यकार और हिंदी साहित्य जगत के अपने तरह के अनूठे रचनाकार हरिशंकर परसाईं ने साहित्य और नंबर दो का कारोबार में लिखा है – ‘मैं भी सांस्कृतिक क्रांति के दौर से गुजर लिया । पहले अपना कमाया पैसा भी अपना नहीं लगता था । अब सिर्फ दूसरों का खाया पैसा ही अपना कमाया लगता है । सारे मूल्यों में क्रांति हो गई । पहले समारोहों में फूल माला पहनते खुशी होती थी । अब वह गर्दन में लटका फालतू बोझ मालूम होती है । सांस्कृतिक क्रांति ने फूलों की सुगंध छीन ली है और मैं माला पहनते हिसाब लगाता रहता हूं कि अगर हर फूल की जहग नोट होता तो रहर वक्त कितने रुपए मेरे गले में लिपटे होते । मैं माला से उस लिफाफे की रकम का अंदाज लगाता रहता हूं जो कि बाद में दिया जाएगा । मुझे गुलाब की माला पहनाओ, चाहे गेंदे की, चाहे भटकटैया की – सब एक ही हैं । फूल की पंखुड़ी सिक्के का एहसास देती है । बीच में मूल्यों का विघटन हो गया था. अब वे सिक्के से जुड़ गए हैं । अपना मूल्यहीनता का युग समाप्त। जिनका चल रहा है वो इस पुरानी बीमारी का इलाज कराएं । साहित्य में अच्छे अच्छे अनुभवी हकीम मौजूद हैं ।‘  बिहार के कला संस्कृति और युवा विभाग द्वारा आयोजित अखिल भारतीय हिंदी कथा समारोह के बारे में जानकर परसाईं जी की उक्त पंक्तियां शिद्दत से याद आईं । बिहार में मूल्यहीनता का युग समाप्त हो चुका है । वहां साहित्य के एक से एक अच्छे और अनुभवी हकीमों ने मूल्यहीनता का एक ऐसा वातावरण बना दिया है कि फूल की पंखुड़ी सिक्कों से जुड़ती चली जा रही हैं । बिहार में साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में पिछले दिनों जिस तरह से विवाद और गिरावट आई है उससे कम से कम इस धारणा की पुष्टि अवश्य होती है । हालिया उदाहरण है अखिल भारतीय हिंदी कथा समारोह के आयोजन का । पच्चीस से लेकर सत्ताइस अप्रैल तक चलनेवाले तीन दिनों के इस कथा समारोह में लेखकों के चयन को लेकर साहित्यक हकीमों ने जबरदस्त खेल खेला । इस आयोजन के लिए जिम्मेदार लोगों में बिहार में जेडीयू कोटे से विधान परिषद के सदस्य रामबचन राय, एक जमाने में क्रांति की कविता लिखने वाले आलोक धन्वा, हाल ही में पद्मश्री से सम्मानित उषा किरण खान के अलावा सूबे के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय के निदेशक, संगीत नाटक अकादमी बिहार के सचिव और संस्कृति विभाग के सहायक निदेशक को जिम्मा सौंपा गया । सबसे पहली गड़बड़ी इसके सहभागियों के चयन को लेकर हुई । आयोजन समिति के दो सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों को प्रतिभागी बना दिया । रामबचन राय की पत्नी इंदु मौआर को बतौर कहानीकार प्रतिभागी बना दिया गया और उषाकिरण खान की बेटी कनुप्रिया को अपनी मां द्वारा लिखित रचना पर नाटक के मंचन की जिम्मेदारी दी गई । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नैतिकता की दुहाई देते नहीं थकते लेकिन इतने बड़े आयोजन में नैतिकता की धज्जियां उड़ी और उनका पूरा अमला खामोशी के साथ देखता रहा । बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष और क्रांतिवीर आलोक धन्वा ने इसका बचाव करते हुए कहा मार्ग्रेट थैचर का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने बेटे को लाइसेंस दिया था क्योंकि वो योग्य था । यहां आलोक धन्वा पता नहीं क्यों ब्रिटेन चले गए बल्कि उनको तो इंदिरा गांधी और संजय गांधी का उदाहरण देना चाहिए था क्योंकि जिस क्रांति की विचारधारा के वो समर्थक हुआ करते थे उसने इमरजेंसी में इंदिका गांधी का समर्थन किया था । इंदु मौआर के चयन को वो नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के उदाहरण से भी सही ठहराने की कोशिश करते हैं लेकिन आलोक धन्वा यह भूल जाते हैं कि इंदु मौआर जी की कहानीकार के रूप में हिंदी के वृहत्तर जगत से परिचय होना शेष है । इसके अलावा की इस समारोह के चयन पर सवाल खड़े हुए । एक और राजनेता पद्माशा को भी कथाकार बना दिया गया । उसी तरह से हिंदी के मशहूर कथाकार और साहित्यक पत्रिका तद्भव के यशस्वी संपादक अखिलेश को समीक्षक बनाकर आमंत्रित किया गया । यह एक कथाकार का अपमान और चयन समिति के सदस्यों की अज्ञानता भी है क्योंकि अखिलेश को डॉ खगेन्द्र ठाकुर, रविभूषण, चकुण कुमार जैसे आलोचकों के साथ रखा गया है । हलांकि कुछ लोगों का कहना है कि यह किसी तरह से ‘एडजस्ट’ करने का मामला भी है । दरअसल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों सियासी उलझनों में फंसे हैं और साहित्य कला संस्कृति के उन्होंने आलोक धन्वा, रामबचन राय और ऊषाकिरण खान के हवाले कर दिया है । कथा समारोह में कथाकारों और समीक्षकों के चयन में गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदारी तय हो पाएगी इसमें संदेह है ।
इसी तरह से अगर देखें तो पहले राजभाषा पुरस्कारों को लेकर विवाद हुआ था । उस विवाद की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि अब वहां कला पुरस्कारों के चयन को लेकर सवाल खड़े हो गए । कला पुरस्कार के लिए चयनित वरिष्ठ कथाकार और रंगसमीक्षक ह्रषिकेश सुलभ ने एलान के बाद पुरस्कार ठुकरा दिया । सुलभ के पुरस्कार ठुकराने के बाद चयन पर ही सवाल खड़े होने लगे । संस्कृतिकर्मियों ने इस पुरस्कार के एलान के बाद इसके खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया हुआ है । बिहार के रंगकर्मी कला पुरस्कारों में हुई धांधली के आरोपों की जांच की मांग भी कर रहे हैं । कला पुरस्कारों की चयन समिति में भी आलोक धन्वा, ऊषाकिरण खान हैं । उनके अलावा परवेज अख्तर और आनदी बादल हैं । कला पुरस्कारों के चयन पर उठे विवादों की पृष्ठभूमि बहुत दिलचस्प है । निर्णायक मंडल ने नियमों को शिथिल करते हुए रेवड़ियां बांटने का फैसला लिया । बिहार के कला पुरस्कारों के चयन का नियम यह है कि रंगकर्मी या कलाकार अपने बयोडाटा के साथ आवेदन करते हैं और उस आवेदन के साथ वो अनुशंसाएं भी नत्थी करते हैं । कला पुरस्कार के चयन समिति के सदस्य उन आवेदनों पर विचार करते हैं और फिर उसमें से नामों को चुना जाता है । इस बार इन नियमों को दरकिनार कर पुरस्कार देने की बातें सामने आई हैं । कला पुरस्कार ठुकराते हुए ह्रषिकेश सुलभ ने लिखा कि – बिहार में कला संस्कृति और राजभाषा विभागों के पुरस्कार का बंटवारा दिनों दिन अश्लील होता जा रहा है । बिहार में सरकारें हमेशा संस्कृति और साहित्य को लेकर असंवेदनशील रही हैं । सरकार को चाहिए कि वो रेवड़ियां बांटना बंद करे । सुलभ ने आगे लिखा- मैंने ना तो इस पुरस्कार के लिए आवेदन किया था और ना ही अपना बॉयोडाटा भेजा था । सरकार को पुरस्कार घोषित करने से पहले मुझसे स्वीकृति लेनी चाहिए थी ।‘  बहुत संभव है कि चयन समिति को योग्य लोगों के आवेदन नहीं मिले हों लेकिन क्या पुरस्कार देना इतना जरूरी था । इसी तरह की एक और गड़बड़ी रंगकर्मी अनीश अंकुर के साथ भी की गई । उनके नाम का भी एलान जूनियर पुरस्कार के लिए कर दिया गया जबकि उनकी उम्र आर्हता से ज्यादा है । यह कलाकारों का अपमान भी है । चयन समिति के सदस्य पुरस्कारों को अपनी जमींदारी की तरह चलाते प्रतीत होते हैं और पुरस्कारों को खैरात की तरह बांटते । यह सामंती मानसिकता है । फिल्मों की समीक्षा पर दिए जानेवाले राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए भी आवेदन मंगाए जाते हैं । वहां कभी ऐसा नहीं होता है कि नियमों में ढील देकर किसी को पुरस्कृत कर दिया जाए । अगर श्याम बेनेगल ने भी आवेदन नहीं किया हो तो उनको पुरस्कार नहीं दिया जाता है । फिर बिहार के कला पुरस्कारों में नियमों को शिथिल कर लेखकों कलाकारों को अपमानित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी है । हो सकता है कि नियमों में यह प्रावधान हो कि स्तरीय आवेदन नहीं मिलने पर निर्णायक समिति की अनुशंसा को मानते हुए पुरस्कारों के नामों का एलान हो । अगर ऐसा है तो  यह बात तो साफ होनी चाहिए कि जिन्होंने आवेदन किया था उनके नाम स्तरीय नहीं थे । किस आधार पर उनके आवेदन को खारिज किया गया । सामने तो वो परिस्थितियां भी आनीं चाहिए जिसमें निर्णायक मंडल के चारो सदस्य में से किसने किसके नाम की सिफारिश की और कमेटी उस पर एकमत हो गई ।

दरअसल बिहार के वर्तमान साहित्यक परिदृश्य में सरकारी विभागों में जबरदस्त अराजकता है । मुख्यमंत्री की प्राथमिकता सूची में साहित्य संस्कृति आती नहीं क्योंकि इनका कोई वोट बैंक होता नहीं है । लेकिन नीतीश कुमार जैसे समझदार नेता शायद यह भूल गए हैं कि इन चीजों से परसेप्शन बनता है । परसेप्शन के इस दौड़ में वो पिछड़ते नजर आ रहे हैं क्योंकि साहित्य और संस्कृति की कमान उन्होंने जिन दो तीन नामों के हाथ में सौप रखी है वो अपनी भूमिका के विर्वहन में लगातार फेल होते नजर आ रहे हैं और चुनावों की आहट ने उनको बेलगाम भी कर दिया है । बिहार के इन साहित्यक हकीमों को इस बात का अंदाज है कि नीतीश कुमार इन दिनों अपनी खोई सियासी जमीन वापस हासिल करने में जुटे हैं लिहाजा ये हकीम अपनी मनमानी कर नीतीश का नुकसान पहुंचाने में जुटे हुए हैं ।  

Sunday, February 16, 2014

हवाई गठबंधन, आसमान पर मंसूबे

न्यूज चैनलों पर हो रहे लोकसभा चुनाव पूर्व सर्वे में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है । सबसे ज्यादा सीटें अन्य दलों के खाते में जा रही हैं । दूसरे नंबर पर भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गबंधन है तो सबसे आखिर में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार चला रही संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन । इसके अलावा इन सर्वे में जो एक बात प्रमुखता से उभरकर आ रही है वो यह है कि प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे ज्यादा पसंदीदा शख्स नरेन्द्र मोदी हैं । सभी चैनलों और पत्रिकाओं के सर्वे में मोदी के बारे में मतैक्यता है । अब इन चुनाव पूर्व सर्वे से ही तीसरे मोर्चे के गठन के सूत्र निकलते दिखने लगे हैं । देश के अलग अलग राज्यों के क्षत्रपों को केंद्र की सत्ता में अपनी और पार्टी की संभावना तलाशने का अवसर दिखने लगा है । पिछले साल तेइस अक्तूबर को दिल्ली में सांप्रदायिकता से मुकाबले की रणनीति के नाम पर चौदह दलों के नेताओं की एक बैठक हुई थी । उस वक्त भी यह बात निकलकर आई थी कि सांप्रदायिकता से मुकाबला तो एक बहाना था, मकसद अलग अलग दलों के नेताओं के मन को एक साथ एक मंच पर आने के लिए टटोलना था । अब संसद के मौजूदा सत्र में ग्यारह गैर कांग्रेस-गैर भाजपा दलों ने एक समूह का गठन किया है जो संसद में बेहतर समन्वय से काम करेगा । इस समूह में वाम दलों के अलावा, नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू, देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस, नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी, जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके, असम गण परिषद आदि शामिल हैं । इस लोकसभा के अंतिम सत्र में इस तरह से इन दलों का एक साथ आना इस बात का संकेत है कि उनकी महात्वाकांक्षाएं हिलोरे ले रही हैं । अगले लोकसभा चुनाव में सत्ता की सौदेबाजी के लिए जमीन तैयार की जा रही है । इस सौदेबाजी के अलावा जो एक मकसद है वो है अपनी खिसकती जमीन को पुख्ता करने की । इस बार तीसरे मोर्चे के गठन के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश में सरकार चला रही समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव दिखाई दे रहे हैं । अब इनकी सक्रियता की भी अपनी वजह है । धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन खत्म करने के बाद नीतीश कुमार बिहार में पहले से कमजोर हुए हैं । नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी पार्टी का कमजोर संगठन है । बिहार में उनकी अगुवाई में जब विधानसभा चुनाव हुआ था तो बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता मजबूती के साथ गठबंधन के लिए काम करते थे । सुशासन पर ध्यान देने के चक्कर में नीतीश जेडीयू के संगठन को मजबूत नहीं कर पाए । उन्हें उम्मीद थी कि बिहार में सुशासन के नाम पर उनको लोकसभा में भी काफी सीटें मिलेंगी । लेकिन बिहार में भाजपा ने अपनी स्थिति बेहतर की है । उधर अगर कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान में समझौता हो जाता है तो वो भी मजबूती से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे । संभावना है कि वो भी अपनी स्थिति बेहतर कर सकें । इस सारी परिस्थितियों के मद्देनजर नीतीश कुमार की पार्टी को लेकसभा चुनाव में कम सीटें मिलने का अनुमान है । मोदी के नाम पर बीजेपी छोड़नेवाले नीतीश कुमार ने इसको प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है । अब वो तीसरे मोर्चे के कंधे पर सवार होकर मोदी को रोकने की कवायद में जुटे हैं । उधर मुलायम सिंह यादव की भी स्थिति यही है । मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से अल्पसंख्यकों का वोट उनसे छिटकता नजर आ रहा है । इसके अलावा सूबे में नियमित अंतराल पर होनेवाले दंगों की वजह से मुसलमानों में खासी नाराजगी है तो कानून व्यवस्था कायम रखने में नाकाम रहने से आम जनता खफा है । विधानसभा चुनाव के वक्त अखिलेश यादव ने बाहुबली और आपराधिक छवि के नेता डीपी यादव को पार्टी में शामिल करने पर जिस तरह का सख्त रुख अपनाया था उससे जनता आशान्वित हुई थी । अब अखिलेश ने अपराधी राजनेताओं के सामने घुटने देक दिए हैं । अतीक अहमद से लेकर तमाम बाहुबलियों को टिकट बांटने से तो यही संदेश जा रहा है । दूसरी बात जो भाजपा के पक्ष में है वो है केंद्र की कांग्रेस सरकार से भारी नाराजगी । इस नाराजगी का असर उत्तर प्रदेश पर भी पड़ेगा । इन सबको भांपते हुए मुलायम ने भी तीसरे मोर्चे का राग छेड़ा हुआ है । बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया मायावती ने तो चुटकी लेते हुए कह दिया कि जिन पार्टियों का जनाधार खिसक रहा है वही इस तरह के मोर्चे के गठन की कवायद में जुटी हैं । उधर दिल्ली में अपना पहला चुनाव लड़कर सरकार बना लेनेवाली आम आदमी पार्टी भी तीसरे मोर्चे की संभावनाओं के संकेत दे रही है । पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव ने कहा कि हाल के दिनों में देश में तीसरे मोर्चे के लिए संभावना पैदा हुई है । इस बयान से तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी को तीसरे मोर्चे से परहेज नहीं है भले ही वो लोकसभा चुनाव अलग से लड़े लेकिन चुनाव बाद की स्थितियों में उन्हें तीसरे मोर्चे की छतरी के नीचे आने से परहेज नहीं होगा ।

पूर्व में भी हमारे देश में तीसरे मोर्चे का प्रयोग हो चुका है लेकिन उनका अनुभव देश के लिए अच्छा नहीं रहा है । तीसरे मोर्चे का अनुभव इस बात का गवाह है कि वो सत्ता पाने के लिए बनाया गया गठबंधन था जिसका कोई वैचारिक आधार नहीं था । किसी भी गठबंधन के लंबे समय तक चलने के लिए यह जरूरी है कि उसके सहयोगी दलों में न्यूनतम साझा वैचारिक समझ विकसित हो सके । नब्बे के दशक के बाद जब भी लोकसभा चुनाव की आहट होती है तो तीसरे मोर्चे की कवायद शुरू हो जाती है । हर बार गैर बीजेपी और गैर कांग्रसेवाद का नारा बुलंद करती हुई क्षेत्रीय पार्टियां एक मंच पर आने के लिए लालायित दिखती हैं । चुनाव खत्म होने के बाद सत्ता के साथ जाने में परहेज नहीं होता है । लिहाजा इस बार भी तीसरे मोर्च के गठन के लिए क्षेत्रीय दलों की सक्रियता दिखने लगी है । इस बार तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर सबसे बड़ी चुनौती है क्षेत्रीय क्षत्रपों की प्रधानमंत्री पद को लेकर ललक। मौजूदा संसद सत्र के पहले दिन जिन दलों के नेताओं ने संदन में एक गुट बनाकर काम करने पर सहमति जताई है उसमें ही कई प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश वाले दल हैं । मुलायम सिंह यादव कई बार देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर जाने की अपनी आकांक्षा का सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शन कर चुके हैं । उनके पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी अपने कार्यकर्ताओं से नेताजी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए जोर लगाने का आह्वान कर चुके हैं । बिहार को गर्त से निकाल कर विकास की पटरी पर ला देने वाले सुशासन बाबू नीतीश कुमार की साफ सुथरी छवि उन्हें स्वाभाविक रूप से इस पद का उम्मीदवार बना देती है । देवगौड़ा तो एक बार प्रधानमंत्री रह ही चुके हैं ।इस कथित तीसरे मोर्चे के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे सर्वमान्यनेता के चयन की है जिसके साथ सभी दल के नेता कम से कम सामान्य कामचलाऊ सहजता महसूस कर सकें । ऐसा होता दिख नहीं रहा है । दूसरे इस मोर्चे में अगर जयललिता हैं तो डीएमके नहीं होगी, मुलायम सिंह हैं तो मायावती नहीं होंगी । ऐसी स्थिति में चुनाव पूर्व सर्वे में अन्य के खाते की सीटें भी कम होंगी । बात वहीं आकर अटकती है कि जिस भी दल को दो सौ के आसपास सीटें मिलेंगी वो सरकार बना लेगी । तीसरे मोर्चे का कुनबा बिखरकर उसका दामन थाम लेगी । इतिहास कम से कम यही बताता है । 

Monday, July 29, 2013

जाति के जंजाल में मोदी

किसी भी समाज के लोगों का दिल जीतने और उन पर राज करने के लिए उस क्षेत्र विशेष की सामाजिक संरचना को जानना और समझना बेहद आवश्यक है । हमारे देश की सामजिक संरचना का आकलन और उसके हिसाब से उस संरचना को अपने अनुकूल करने के लिए शासक वर्ग हमेशा से रणनीति बनाता रहा है । सिर्फ शासक वर्ग ही नहीं बल्कि बल्कि राजा बनने की ख्वाहिश रखनेवाले भी सामाजिक संरचना को अपने अनुकूल बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है और उसी हिसाब से अपनी चालें चलता है । इतिहास इस बात का गवाह है कि किस तरह से अंग्रेजों ने भारत की सामाजिक संरचना का बेहतरीन आकलन और इस्तेमाल कर अपनी सत्ता लंबे समय तक कायम रखी । समाजिक संरचना में जितनी तरह की विषमताएं या जटिलताएं होती हैं वो शासक लर्ग को अनुकूल स्थितियां प्रदान करती है । यह बात औपनिवेशिक काल से लेकर उत्तर औपनिवेशिक काल तक में कई बार साबित होती रही है । बिहार की राजनीति में जाति लंबे समय से अहम स्थान रखती है । देश के तकरीबन हर प्रांत में चुनाव के वक्त उम्मीदवारों के चयन में जाति को ध्यान में रखा जाता है लेकिन बिहार में कई सीटों की उम्मीदवारी तो सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर किया जाता है । जातिगत आधार पर चुने गए ज्यादातर उम्मीदवार चुनाव जीतकर संसद और विधानसभा में पहुंचते भी रहे हैं । बिहार में जातिगत आधार पर चुनाव की जड़े बेहद गहरी हैं । नबंवर 1926 के काउंसिल चुनावों को अगर हम जातिगत वोटिंग पैटर्न का आधार मानें तो हम देखते हैं कि यह पैटर्न साल दर साल और ज्यादा मजबूत होता चला गया । 1927 में बोर्ड चुनाव के बाद तिरहुत के उस वक्त के कमिश्नर मिडलटन ने अपनी रिपोर्ट में इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उम्मीदवारों के चयन का आधार सिद्धांत या सामाजिक क्रियाकलाप नहीं है बल्कि उनकी जाति है और कांग्रेस को भी यह मालूम है । यह कहना सही नहीं होगा कि बिहार में छियासी साल बाद भी हालात बदले नहीं हैं लेकिन इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि चुनाव में अब भी जाति एक मुख्य फैक्टर है । अन्य पिछड़ा वर्ग को मंडल कमीशन के तहत आरक्षण देने के फैसले के बाद से सूबे में एक बार फिर से जातीय ध्रुवीकरण हुआ । उसी ध्रुवीकरण और पिछड़ों की अस्मिता के नाम पर लालू यादव ने डेढ दशक तक बिहार पर राज किया । लेकिन लालू राज से त्रस्त लोगों ने बाद के चुनावों में विकास की राह को अपनाने की ठानी और नीतीश को सूबे की कमान मिली । नीतीश कुमार को भी यह मालूम था कि बगैर जातिगत वोट बैंक के लिए लंबे समय तक शासक बने रहना मुमकिन नहीं है । तो उन्होंने भी विकास के रास्ते पर चलते हुए अगड़ी जातियों और अति पिछड़ा, महादलित और पसमांदा मुसलमान के गठजोड़ की जमीन तैयार करने की लगातार कोशिश की । मेरा मकसद बिहार चुनाव में जातियों का इतिहास बताना नहीं बल्कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को लेकर बिहार में भारतीय जनता पार्टी की विशेष रणनीति पर बात करना है ।
यह अकारण नहीं है कि जब देशभर में बीजेपी के नए नायक नरेन्द्र मोदी को हिंदुत्व के सबसे ताकतवर प्रतीक के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है ठीक उसी वक्त बिहार में मोदी को पिछड़ा कह कर प्रचारित किया जा रहा है । 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में जिस रणनीति पर भारतीय जनता पार्टी काम कर रही है उसमें मोदी की जाति को प्रचारित किया जाना बेहद अहम है । सूबे में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रचार मशीनरी का भरपूर फायदा उठाने का भी फैसला लिया है । इस मशीनरी के तहत सूबे के सुदूर इलाकों में यह बात फैलाई जा रही है कि नरेन्द्र मोदी तेली जाति से आते हैं जो पिछड़ी जाति में शुमार होता है । रणनीति यह भी है कि बिहार में नरेन्द्र मोदी को पिछड़ों के नेता के तौर पर पेश किया जाए और पिछड़ी जाति के बीच यह संदेश दिया जाए कि जब एक पिछड़े के प्रधानमंत्री बनने का वक्त आया तो एक पिछड़े वर्ग के ही नेता नीतीश कुमार ने उन्हें धोखा दिया । इस रणनीति के पीछे पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाने की योजना है । नरेन्द्र मोदी को पिछड़े वर्ग का नेता प्रचारित करनेवाली भारतीय भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत नीतीश और लालू यादव के बीच चुनाव करने की है । लालू और नीतीश दोनों का वोट बैंक पिछड़ी जाति के वोटर हैं । बिहार के जातीय समीकरण में अन्य पिछड़ी जातियां यानि ओबीसी और अति पिछड़ी जातियां यानि एमबीसी की अहम भूमिका है । सूबे में तकरीबन तैंतीस फीसदी ओबीसी हैं तो एमबीसी भी तकरीबन बाइस फीसदी हैं । इसमें अगर पिछड़ी जातियों के ग्यारह फीसदी कोयरी और कुर्मी को जोड़ दिया जाए तो एक तैंतीस फीसदी का मजबूत गठजोड़ बनता है । नीतीश कुमार इसको ही अपनी ताकत बनाना चाहते हैं । उन्हें मालूम है कि तकरीबन साढे चौदह फीसदी यादव उनके साथ नहीं आएंगे । उधर भारतीय जनता पार्टी भी पिछड़ों को यह कहकर अपने पाले में लाने की जुगत में है कि मोदी पिछड़ा वर्ग के नेता हैं । बिहार के वर्तमान विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के इक्यानवे विधयकों में से इकतालीस विधायक अति पिछड़े और महादलित हैं । उन्हें विधयाकों की इस संख्या पर संतोष भी है लेकिन इस बात की चिंता भी सता रही है कि उनके अति पिछड़े और महादलित विधायक तो नीतीश के साथ रहकर चुनाव जीते थे । उनको अपने पाले में बचाए रखने की गंभीर चुनौती भारतीय जनता पार्टी के सामने है । भारतीय जनता पार्टी यह मान चल रही है कारोबारी वर्ग से उनको समर्थन मिलता रहा है । बिहार में सात फीसदी बनिया हैं जिनके वोट भारतीय जनता पार्टी को पारंपरिक रूप से मिलते रहे हैं । जातिगत आंकड़ों के इस उलझे हुए इस राजनीतिक गणित में तकरीबन पौने पांच फीसदी भूमिहार और पौने छह फीसदी ब्राह्मण अहम हो गए हैं । आज हर कोई ब्रह्मर्षि समाज की बात कर रहा है । भूरा बाल साफ करने का नारा बुलंद करनेवाले लालू यादव भी अब भूमिहारों को पटाने में लगे हैं । उधर नीतीश कुमार को लगता है कि लालू विरोध की वजह से स्वाभानिक रूप से भूमिहार उनके साथ हैं ।  उन्होंने प्रतीकात्मक तौर पर सूबे के डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी भूमिहार को बनाया हुआ है । उधर भारतीय जनता पार्टी भी इस बात को लेकर काफी उत्साहित है कि भूमिहार उनके साथ हैं । राजनीतिक दलों को यह लगता है कि भूमिहारों की संख्या भले ही कम हो लेकिन वो कई सीटों के नतीजों को प्रभावित करते हैं । ब्राह्मण पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के साथ रहे हैं लेकिन सूबे में कांग्रेस का ही कोई अस्तित्व नहीं बचा तो फिर उनके पास दूसरी पार्टी का रुख करने के अलावा कोई विकल्प है नहीं । ब्राह्मणों के वोटों का वंटवारा होगा ।
इन तमाम गुणा भाग के बीच मोदी की हिंदू हृदय सम्राट और विकास पुरुष की छवि को बिहार में पेश तो किया जाएगा साथ ही बोधगया में सीरियल धमाकों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा का तड़का भी लगाया जाएगा । उधर जेडीयू मोदी के उग्र हिदुवादी छवि को प्रचारित कर मुसलमानों के वोट खींचने की कोशिश करेगी । मुसलमानों का वोट नीतीश को उस स्थिति में मिलने की उम्मीद है जब वो कांग्रेस के साथ जाने का फैसला करेगी । क्योंकि अगर ध्रुवीकरण होता है तो मुसलमान वोटर उसकी तरफ ही जाएगा जो मोदी को रोक पाएगा । लेकिन विराट हिंदू समाज की बात करनेवाली पार्टी का तेली और पिछड़े के नाम पर वोट मांगने की रणनीति बनाना उनके असली चाल चरित्र और चेहरे को भी उजागर करता है ।

Monday, June 17, 2013

सियासी बाजीगर

तेरह दिसंबर दो हजार तीन को गुजरात के कच्छ जिले के आदीपुर में बतौर रेल मंत्री बोलते हुए नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी की तारीफों के पुल बांधे थे । उस वक्त नीतीश ने कहा था- मुझे पूरी उम्मीद है कि बहुत दिन गुजरात के दायरे में सिमट कर नरेन्द्र भाई नहीं रहेंगे और देश को उनकी सेवा मिलेगी । यह बयान उस वक्त आया था जबकि गुजरात में भयानक दंगे हो चुके थे और मोदी को उन दंगों पर समय रहते काबू नहीं कर पाने के लिए कठघरे में खड़ा किया जा रहा था । उनपर दंगों को रोकने में असफल रहने के लिए उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म का पालन ना कर पाने का सार्वजनिक बयान दिया था । लेकिन नीतीश कुमार उनकी शान में कसीदे गढ़ रहे थे । अपने उस बयान के करीब दस साल बाद जब नीतीश को अपनी उम्मीद सही साबित होती दिखने लगी, यानि कि नरेन्द्र मोदी गुजरात के दायरे से बाहर निकलकर देश की ओर बढ़े, तो वो मोदी के नाम पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हो गए । दोष बीजेपी पर मढ़ा कि उसने हालात ऐसे पैदा कर दिए कि गठबंधन में रहना संभव नहीं हो पाया । लेकिन इन दस सालों में गुजरात की नर्मदा नदी और बिहार से होकर जानेवाली गंगा में भी काफी पानी बह गया । नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में बीजेपी को जीत दिलाकर पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी दावेदारी को मजबूती प्रदान की । उधर नीतीश कुमार ने रसातल में जा चुके बिहार को विकास की पटरी पर लाकर पूरे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचा था । बिहार का विकास दर गुजरात से ज्यादा पहुंचा दिया । नतीजा यह हुआ कि दोनों नेताओं की महात्वाकांक्षा सातवें आसमान पर पहुंचने लगी । मोदी ने अपने राजनीतिक कौशल से पार्टी में अपने आपको सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता के तौर पर स्थापित कर लिया था । राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी एक बड़ा धड़ा मोदी में हिंदुत्व का नायक देखने लगा था । यह बात गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और बाद में आडवाणी के इस्तीफे और उसे वापस लेने के ड्रामे के बाद और साफ हो गई थी । उधर नीतीश कुमार को फेडरल फ्रंट के सपने आने लगे थे । बीजेपी में आंतरिक कलह और कांग्रेस की अलोकप्रियता में नीतीश अपनी संभावनाएं तलाशने लगे थे । नीतीश की इस महात्वाकांक्षा को भांपते हुए कांग्रेस ने उसको हवा दे दी । इसी संभावना की तलाश में नीतीश को लगा कि मोदी का खुला विरोध करके वो सेक्युलरवाद के सबसे बड़े झंडाबरदार बनकर उभर सकते हैं । लिहाजा उन्होंने मोदी का बैगर नाम लिए खुला विरोध शुरू कर दिया । नीतीश कुमार ने दिल्ली की अपनी अधिकार रैली में साफ कर दिया था कि उन्हें नरेन्द्र मोदी कतई मंजूर नहीं हैं । नरेन्द्र मोदी की काट के लिए नीतीश ने आडवाणी का नाम आगे बढाया लेकिन इस आकलन में नीतीश से चूक हो गई । बीजेपी में आडवाणी अब लगभग इतिहास हो चुके हैं, उनका युग और दौर दोनों खत्म हो चुका है ।
नीतीश कुमार आज नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक बताते हुए अटल-आडवाणी के गुणगान में लगे हैं । परोक्ष रूप से उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर आडवाणी को बीजेपी अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे तो उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बने रहने में कोई परहेज नहीं है । यह तो वही बात हुई कि गुड़ खाए लेकिन गुलगुल्ले से परहेज । आज नीतीश की नजर में आडवाणी सेक्युलर हो गए हैं । अपनी सुविधाजनक सियासत के हिसाब से नीतीश यह भूल गए कि अयोध्या के बाबरी मस्जिद के विध्वंस में आडवाणी की कितनी बड़ी और अहम भूमिका थी । आडवाणी की रथयात्रा से देश में कितना वैमनस्य फैला था । नीतीश यह भी भूल गए कि आडवाणी का रथ जिन इलाकों से गुजरा था वहां कितने दंगे हुए थे । नीतीश यह भी भूल गए कि आडवाणी ने संघ की कट्टर और उग्र हिंदूवादी धारा को ना केवल प्रश्रय दिया बल्कि उसको देशभर में फैलाने और मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी । दरअसल नीतीश कुमार की अपनी मौकापरस्ती की राजनीति है । उन्हें जहां फायदा दिखता है उसके साथ हो लेते हैं औ सुविधानुसार तर्क गढ़ लेते हैं । नीतीश कुमार राजनीति में सही टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं और सही समय पर सही पाले में रहकर उन्होंने सियासत में अपनी एक मजबूत जमीन तैयार की है । नब्बे के दशक में जब उनको लालू की पार्टी में भविष्य नहीं दिखा तो जॉर्ज की उंगली पकड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया ।
बदले हालात में अब नीतीश कुमार को लगने लगा कि मोदी के आगे आने से बिहार में अकलियत का वोट उनसे अलग हो सकता है । बिहार में मुसलमानों की संख्या लगभग सत्रह फीसदी है । माना जाता है कि नीतीश कुमार अपना दोस्त और दुश्मन दोनों बहुत सोच समझकर चुनते हैं । नीतीश का आकलन था कि अगर मोदी का दामन नहीं छोड़ा तो बिहार के सत्रह फीसदी वोटर उनसे छिटककर लालू यादव के पाले में जा सकते हैं । महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव में इस बात के भी संकेत मिले थे कि बिहार की मजबूत और दबंग मानी जानेवाली भूमिहार जाति उनसे दूर जा रही है । नीतीश ने बिहार में महादलितों और पासमंदा मुसलमान को अपने पाले में लाने और बनाए रखने के लिए पिछले आठ सालों में काफी मेहनत की थी । लेकिन बदले माहौल में मुसलमानों को अपने पाले में बनाए रखना मुमकिन नहीं था । मोदी और मुसलमान दोनों एक साथ आ नहीं सकते । लिहाजा नीतीश के सामने अपने आप को सेक्यूलरिज्म का चैंपियन घोषित करने के अलावा और कोई चारा नहीं था और इसके लिए मोदी का विरोध जरूरी था । बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने अपने सियासी करियर का सबसे बड़ा दांव चल दिया है । फिलहाल उनके पास कामचलाऊ बहुमत है और बिहार में उनकी सरकार पर कोई खतरा भी नहीं नजर आता । पिछले सत्रह सालों से दोनों पार्टियां मिलकर बिहार में चुनाव लड़ रही थी और नीतीश कुमार को बीजेपी के संगठन का लाभ मिलता रहा है । लेकिन अब बीजेपी से अलग होने के बाद उनके सामने संगठन सबसे बड़ी चुनौती होगी ।
ऐसा नहीं है कि गठबंधन के टूटने से सिर्फ नीतीश के सामने ही मुश्किलें बढ़ी हैं – दिल्ली की गद्दी पर बैठने का ख्बाव देख रहे नरेन्द्र मोदी के लिए भी नीतीश जैसे सहयोगी के चले जाने की भारपाई करना आसान नहीं होगा । आगामी लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है । इन हालात में सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन के तौर पर उभरना बेहद जरूरी है । बीजेपी के साथ अब ले देकर शिवसेना और अकाली दल बचे हैं । शिवसेना भी मोदी को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं दिखती है क्योंकि बाला साहब ठाकरे ने अपनी मौत के पहले प्रधानमंत्री पद के लिए सुषमा स्वराज की वकालत की थी । हां अकाली दल बेहद मजबूती के साथ बीजेपी के साथ खड़ा है । लोकसभा चुनाव की तैयारियों और रणनीतियों के लिए ग्यारह महीने का वक्त बहुत कम होता है । खासकर तब जबकि देश लगभग आधे हिस्से में आपका जनाधार नहीं हो और आपके सहयोगी आपसे छिटक रहे हों । जहां एक एक सीट के लिए मारामारी मचनेवाली हो वहां इक्कीस लोकसभा सीट जीतनेवाली सहयोगी पार्टी के अलग होने से मोदी के सपनों पर ग्रहण लगने का खतरा बढ़ जाता है । ऐसे में मोदी के सामने अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की बड़ी चुनौती है । इसके अलावा मोदी को नए सहयोगियों की तलाश भी करनी होगी । अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो देश में फिर से अस्थिर सरकारों का दौर शुरू हो सकता है जो ना तो देश के हित में होगा और ना ही जनता के ।

Saturday, November 3, 2012

नीतीश पर साख का संकट

बिहार में सुशासन के रथ पर सवार होकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे नीतीश कुमार की सूबे में हनक कम होती दिखाई देने लगी है । बिहार से जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे लगता है कि नीतीश कुमार के सुशासन का तिलिस्म दरकने लगा है । पहले मधुबनी में अफवाह की वजह से हिंसा और फिर पुलिस फायरिंग में मौत, उसके बाद पटना में दिन दहाड़े बमबाजी और अब उनकी पार्टी से जुड़े पूर्व विधायक और जेल में बंद बाहुबलि मुन्ना शुक्ला पर एक इंजीनियरिंग कॉलेज के एमडी से दो करोड़ की रंगदारी मांगने का मामला । सूबे के आला पुलिस अधिकारी ये मानते हैं कि प्रथम दृष्टया मुन्ना शुक्ला पर केस बनता है बावजूद इसके पटना की सड़कें मुन्ना शुक्ला के पोस्टरों से भरी है । ये दो करोड़ की फिरौती नीतीश कुमार के बहुप्रचारित अधिकार रैली के लिए मांगे जाने का आरोप है । लेकिन मुख्यमंत्री इस पूरे मामले में कानून अपना काम करेगा की मुगली घुट्टी पिलाकर अपना पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं । अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क  रहे नीतीश कुमार का किसी तरह की कार्रवाई नहीं करना हैरान करता है । इसके पहले बिहार के खगड़िया में भी नीतीश की यात्रा के दौरान जब विरोध प्रदर्शन हुआ तो वहां के बाहुबलि नेता और जेडीयू विधायक के पति रणबीर यादव ने पुलिस वालों के हाथ से गन लेकर फायरिंग की और फिर विरोध करनेवालों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा । इस घटना की फुटेज कई दिनों तक बिहार के न्यूज चैनलों की सुर्खियां रहीं । रणबीर के खिलाफ कोई कार्रवाई ज्ञात नहीं है ।
अधिकार रैली के नाम पर जिस तरह से पटना की सड़कों पर बाहुबलियों के पोस्टर लगे हैं उससे ये लगता है कि नीतीश कुमार भी ये समझने लगे हैं कि बगैर बाहुलबलियों की मदद से रैली में भीड़ नहीं जुटाया जा सकता है । बिहार में पूर्व की रैलियों के व्याकरण को अगर समझने की कोशिश करें तो ये तस्वीर और साफ हो जाती है । नीतीश कुमार को चुनावों में जनता का अपार समर्थन मिला लेकिन पिछले दिनों उनकी यात्रा के दौरान जिस तरह से कई जगहों पर उनको काले झंडे दिखाए गए क्या उससे नीतीश का आत्मविश्वास हिल गया है । प्रतीत यही होता है और इसी हिले हुए आत्मविशवास का नतीजा है कि अपराधी और आपराधिक छवि के नेताओं की अधिकार रैली में मदद ली जा रही है । नहीं तो कोई वजह नहीं है कि पटना की सड़कों पर लगे होर्डिंग में नीतीश कुमार से बड़ी तस्वीरें अनंत सिंह और मुन्ना शुक्ला की लगी है ।
अपराधियों और बाहुबलियों के समर्थन से अधिकार रैली में भीड़ जुटाकर नीतीश हो सकता है अपनी ताकत का एहसास करवा दें लेकिन उससे उनकी लोकप्रियता में इजाफा होगा इसमें संदेह है । नीतीश कुमार बिहार में एक ऐसा नेता के तौर पर उभरे और स्थापित हुए जो अपराध और अपराधियों से नफरत करता था लेकिन अपनी राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के लिए इन दिनों वो जिस तरह से अपराधिक छवि के दागदार नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं उससे उनकी इस छवि को बट्टा लग रहा है । इसके पहले नीतीश कुमार ने अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के नतीजे देने वाले कदम उठाए । फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर अपराधियों को सलाखों के पीछे भिजवाने के बाद से बिहार में कानून का राज कायम होता दिखने लगा था । सैयद शाहबुद्दीन से लेकर पप्पू यादव जैसे बाहुबलियों को भी कानून और पुलिस की ताकत का एहसास करवा दिया गया था । सभी पार्टियों में मौजूद बाहुबलियों ने अपने आपको संयमित और नियंत्रित कर लिया था । लेकिन हाल के दिनों में फिर से वो संयम और नियंत्रण के खोल से बाहर निकलकर दबंगई पर उतारू हैं । राष्ट्रीय जनता दल के नेता ब्रजबिहारी की हत्या की सजा काट रहे मुन्ना शुक्ला की रैली के लिए दो करोड़ की रंगदारी मांगना इसी ओर संकेत करता है । लालू यादव के शासन काल में जेल में रहकर भी अपराधी अपना गिरोह बखूबी संचालित करते थे लेकिन नीतीश के आने के बाद से ये धंधा बंद हो गया था ।
दरअसल हमें इसको कानून व्यवस्था की समस्या के अलावा भारतीय राजनीति में आ रहे गिरावट और जनप्रतिनिधियों के लिए संविधान में समानता के मिले अधिकार को भी परखना होगा । भारत के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है – लोकसभा और विधानसभा में जीतकर आने वाले जनप्रतिनिधियों, जिनपर शासन चलाने की जिम्मेदारी होती है, के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है । हर वयक्ति चाहे वो शैक्षणिक, चारित्रिक या अन्य रूप से चाहे जितना अक्षम हो उसे रोका नहीं जा सकता । हमारा संविधान सबको बराबरी का हक देता है । हम देश की बेहतरी की बात तो करते हैं लेकिन क्या हमने कभी देश को बेहतर तरीके से चलानेवालों के लिए कोई आर्हता तय की है । राजेन्द्र बाबू के मुताबिक संविधान में ऐसा प्रावधान इस वजह से नहीं हो सका क्योंकि किसी पश्चिमी देश में इस तरह का प्रावधान नहीं है और हमारा संविधान पश्चिम के कई देशों के संविधान का कॉकटेल है । राजेन्द्र बाबू ने इस बात की जोरदार वकालत की थी संविधान में इस तरह का प्रावधान होना चाहिए । लेकिन उन्होंने जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम आर्हता तय नहीं कर पाने के लिए उस वक्त के नेताओं की सोच को जिम्मेदार माना था । इस तरह की बात को संविधान में शामिल नहीं कर पाने के लिए राजेन्द्र बाबू उस वक्त के नेताओं के पश्चिमी देशों के प्रभाव में फैसले लेने की मानसिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं । उनका मानना था कि इस तरह की मानसिकता पश्चिमी देशों की शिक्षा से बनी थी ।
लेकिन अब वक्त आ गया है कि राजेन्द्र बाबू के कथन पर गंभीरता से विचार हो और चरित्रवान और विषेषज्ञों के हाथ में सत्ता सौंपने का उपक्रम किया जाना चाहिए । नीतीश कुमार जैसे नेताओं से राजनीति में शुचिता की उम्मीद जगी थी लेकिन जिस तरह से क्षणिक सफलता के लिए नीतीश ने इन दिनों बाहुबलियों को बढ़ावा दिया है उससे शुचिता की ये उम्मीद तार तार हो गई है । यहां सवाल ये उठता है कि क्या अपनी अधिकार यात्रा के दौरान जनता के गुस्से और विरोध से नीतीश कुमार का जनसमर्थन से विश्वास हट गया और वो लालू यादव की राह पर चलने की सोचने लगे । लालू यादव ने भले ही पंद्रह वर्षों तक बिहार पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राज किया हो लेकिन जनता ने वक्त आने पर उनको उनकी जगह दिखा दी । नीतीश कुमार लालू यादव की राह की ओर बढते दिख रहे हैं लेकिन उन्हें लालू यादव का हश्र भी नहीं भूलना चाहिए । लालू यादव को एक समय बिहार की जनता मसीहा के तौर पर देखती थी लेकिन सिर्फ राजनीति में अपराध और अपराधियों के घालमेल ने उन्हें बिहार की राजनीति में हाशिए पर पहुंचा दिया । नीतीश कुमार के लिए अब भी वक्त है कि वो अपनी इल गलती को सुधारें और बिहार की जनता ने जिस उम्मीद और अपेक्षा के साथ उनको शासन की बागडोर सौंपी थी उसको कायम रखें नहीं तो उनके भी राजनीति के बियावान में गुम हो जाने का खतरा है ।

Wednesday, July 13, 2011

'सांस्कृतिक क्रांति' पर बवाल

चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में कुछ दिन पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संसकृति मंत्रालय के कॉफी टेबल बुक बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयास की चर्चा की थी । अपने उस लेख में मैंने बिहार सरकार के हाल-फिलहाल में किए गए कामों को रेखांकित करते हुए लालू-राबड़ी राज को इन कला और सांस्कृतिक संस्थाओं की दुर्गति के लिए जिम्मेदार ठहराया था । मेरे इस लेख पर कई लोगों को सख्त आपत्ति है । उस लेख के जबाव में कई लेख लिखे गए । लेख के बहाने मुझ पर व्यक्तिगत टिप्पणियां की गई । लेकिन प्रतिलेख लिखनेवाले विद्वतजनों ने अपनी आपत्ति में जो तर्क दिए वो उनकी विद्वता के अनुकूल नहीं है । मेरे लेख की जबाव में लिखा गया लेख चूंकि प्रतिक्रिया में लिखे गए हैं इसलिए वो हल्के हैं । हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है लेकिन जब प्रतिक्रिया में बदले की भावना और वयक्तिगत राग-द्वेष शामिल हो जाए तो वह नरेन्द्र मोदी वाली प्रतिक्रिया हो जाती है । लोगों ने मुझपर ये भी आरोप लगाए कि मैं अपनी सवर्ण ग्रंथि के तहत लालू यादव को बिहार की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराता हूं और नीतीश कुमार को उसी ग्रंथि के तहत शीर्ष पर पहुंचाता हूं । लालू यादव के बारे में लिखी गई मेरी टिप्पणी से वो इतने आहत हो गए कि उनलोगों ने यह भी पता लगा लिया कि मैं कितने पानी में हूं । मेरे लेख को सावधानी के पढ़े बगैर मेरी जाति और मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर राय बना लेनेवाले इन विद्वानों की समझ पर सिर्फ मुस्कुराया जा सकता है । हंसी तो कतई नहीं आती । बिहार में लालू यादव के शासनकाल के दौरान सूबे की क्या दुर्गति हुई थी इस बारे में किसी को कुछ कहने की या कुछ साबित करने की जरूरत ही नहीं है । जिस तरह से हर साल कोसी में बाढ़ आती है और पूरे इलाके में तबाही मचा देती है उसी तरह सरकारी विभागों में चारा,अलकतरा, बीएड घोटालों की बाढ़ ने पूरे सूबे के विकास की राह को तबाह कर दिया था । क्या लालू यादव की जय जयकार करनावालों को यह बताने की जरूरत है कि लालू-राबड़ी शासनकाल के दौरान बिहार में ग्रोथ रेट कहां से कहां तक पहुच गया था । क्या उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि किस तरह से सूबे के अफसरों को खुलेआम उनके दफ्तर में घुसकर उनके साथ बदतमीजी की जाती थी । क्या उन्हें यह याद दिलाना पड़ेगा कि लालू के राज में अपहरण एक उद्योग में तब्दील हो चुका था । क्या उन्हें यह भी याद दिलाना होगा कि लालू की शह पर शहाबुद्दीन जैसे नेता बिहार में फल फूल रहे थे । क्या उन्हें यह भी याद दिलाना होगा कि उन पंद्रह सालों में अस्पतालों से डॉक्टर, स्कूल से शिक्षक और दफ्तरों से बाबू गायब रहा करते थे । क्या उन्हें यह भी याद नहीं कि पंद्रह साल में बिहार में परिवहन वयवस्था चंद चुनिंदा लोगों की बपौती बनकर रह गई । बिहार परिवहन निगम की खूबसूरत इमारत खंडहर में तब्दील हो गई। उस वक्त के कानून व्यवस्था की बात करने से शरीर में सिहरन हो जाती है । लालू यादव के शासन काल में बिहार सिर्फ निगेटिव ग्रोथ और छवि हासिल कर पाया । जिन लोगों लालू यादव सामजिक क्रांति के मसीहा और समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों के मसीहा नगर आते हैं उनको मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि उन दबे कुचलों ने ही उनको सत्ता से च्युत कर दिया । शासन सिर्फ नारों और जुमलों और मसखरेपन से नहीं चलता । उसके लिए ठोस कार्य और अहम फैसले करने होते हैं । दरअसल लालू यादव के बिहार विधानसभा में करारी हार के बाद कुछ लोगों को लालू में अपना भविष्य नजर आने लगा है और वो उनमें संभावना तलाशने लगे है। अब अगर मैं ये कहूं कि उनकी जातिवादी मानसिकता उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है तो मैं भी उसी ग्रंथिदोष का शिकार हो जाऊंगा जिसका आरोप मुझपर लगाया गया है ।
मेरे उस लेख की प्रतिक्रिया में जिसतरह से बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह और बाबा साहब भीराव अंबेडकर का उल्लेख किया गया वो भी बेहद हास्यास्पद और मनोरंजक है । उसपर मैं कुछ नहीं कहना चाहता ।
दूसरी बात जो साबित करने की कोशिश की गई वो यह कि लालू यादव के शासनकाल में बिहार में जमकर सांस्कृतिक गतिविधियां होती थी । इस क्रम में यह बताया गया कि लालू यादव के समय में बिहार विधान परिषद की साहित्यिक गतिविधियां ‘सुगढ़’ फ थी । इस सुगढ़ता के लिए दो उदाहरण दिए गए–एक तो उस वक्त की परिषद पत्रिका साक्ष्य और संवाद राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रही थी । अब इस कथन का क्या किया जाए । राष्ट्रीय स्तर की तो बात छोड़िए मैं तो सिर्फ इतना कह सकता हूं कि ये पत्रिकाएं अब भी साहित्यिक हलके में अपनी जगह और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं । जाबिर हुसैन हमारे मित्र हैं, मैं भी उन पत्रिकाओं को लगातार देखता रहा हूं । लेकिन राष्ट्रीय लोकप्रियता का कथन अति उत्साह में दिया गया प्रतीत होता है। दूसरे ये कि विधान परिषद में राजेन्द्र यादव, गुलजार, सीताराम येचुरी जैसे बौद्धिक वहां की गतिविधियों में शामिल होते थे । ये सच है कि जाबिर हुसैन के बिहार विधानसभा के सभापति रहते परिषद में कुछ साहित्यिक गतिविधियां हुई थी । उसकी तारीफ भी हुई थी । खुद जाबिर हुसैन की किताब पर लिखते हुए मैंने भी उनकी साहित्यिक सक्रियता को सराहा था । लेकिन क्या उतना भर ही काफी है । क्या मुझपर आरोप लगानेवाले यह जानते हैं कि उस वक्त कला और संसकृति मंत्री कौन थे या फिर उस मंत्रालय की पहल पर क्या सार्वजनिक कार्य किए गए ।
दिल्ली के एक समाजवादी कवि-उपन्यासकार ने भी फोन करके मुझसे बहस की । उनकी पहली लाइन थी – बेबसाइट्स पर चौथी दुनिया में छपे आपके लेख पर खूब बहस हो रही है । मैंने पढ़ा नहीं है लेकिन जैसा कि लोगों ने मुझे बताया कि आपने बिहार की सांस्कृतिक हलचल पर लिखा है । पहले तो वो फेसबुक पर लिखत-पढ़त में बहस करना चाहते थे लेकिन बाद में मौखिक बहस हुई । उनका कहना था कि बिहार की अकादमियां बहुत बुरे हाल में है । मैं उनकी राय से सौ फीसदी सहमत हूं । अकादमियों की हालत बुरी है । लेकिन फिर से मैं उसी तर्क पर लौटता हूं कि वर्तमान हालत को पिछले शासनकाल के बरक्श रखकर देखिए आपको हकीकत का पता चल जाएगा । क्या उन अकादमियों की बेहतरी की दिशा में सोचा नहीं जा रहा । क्या उनके कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं के बारे में सरकार ने धन मुहैया कराने की कार्ययोजना नहीं बनाई । उनको सक्रिय करने की दिशा में पहल नहीं हो रही । ये सच है कि बिहार सरकार की प्राथमिकता में कला संस्कृति नहीं है । लेकिन ये प्राथमिकता तो किसी भी सरकार की नहीं रही है और ना ही आगे रहेगी । हिंदी के नाम पर राजनीति करनेवालों को यह भी याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता है । हम सिर्फ बिहार की अकादमियों के बारे में ही क्यों सोचते हैं । आप देशभर की अकादमियों की तफ्तीश करके देख लीजिए- कमोबेश हर जगह आपको एक जैसे हालात नजर आएंगे । लेकिन इस तर्क पर बिहार के अकादमियों की बदहाली को जायज नहीं ठहराया जा सकता है । बिहार सरकार की कला और संस्कृति मंत्रालय की इस बात के लिए तो सराहना करनी ही चाहिए कि उसने सुधार की दिशा में कदम उठाए हैं । कवि मित्र मुझे यह भी समझाने की कोशिश करने लगे कि वो बिहार की मंत्री सुखदा पांडे की समझ को जानते हैं और उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है । मैंने उनसे निवेदन भी किया कि किसी की वयक्तिगत क्षमता को उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि उसके काम के आधार पर आंका जाना चाहिए । लेकिन उनका गुस्सा चरम पर था और वो कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थे और वही संवाद टूटने की वजह बना । बातचीत खत्म होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने तो बगैर मेरे लेख को पढ़े किसी के कहने के आधार पर अपनी राय बना ली । खैर हिंदी की दुर्दशा के लिए यही चीज- बिना पढ़े राय बनाना- बहुत हद तक जिम्मेदार है ।
अंत में सिर्फ इतनी बात कहना चाहूंगा कि किसी विचार पर सार्थक बहस हो, तर्कों का सहारा लेकर एक दूसरे पर हमले हों। लेकिन लेखन में एक न्यूनतम मर्यादा का पालन तो हो । आजकल बेवसाइट पर हर किसी को गाली गलौच करने और व्यक्तिगत जीवन पर कीचड़ उछालने की हासिल छूट को जो बेजा इस्तेमाल हो रहा है वो चिंता की बात है । मैं उस तरह के लोगों का नाम लेकर उनको वैधता नहीं प्रदान करना चाहता लेकिन उन कुंठित लोगों के बारे में हिंदी समाज को गंभीरता से सोचना होगा, नहीं तो आनेवाले दिनों में ये लंपटई हम सब पर भारी पड़ सकती है ।

Tuesday, July 12, 2011

बिहार में 'सांस्कृतिक क्रांति'

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि – विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है । दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृह राज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती है। बिहार में लालू यादव और उनकी पत्नी श्रीमती रावड़ी देवी के तकरीबन डेढ दशक के शासन काल में सूबे की सारी संस्थाएं एक एक कर नष्ट होती चली गई या फिर प्रयासपूर्वक उनको बरबाद कर दिया गया । जो बिहार में एक जमाने में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में विश्व में मशहूर था, जहां नालंदा विश्वविद्यालय जैसे उच्च कोटि के शिक्षा केंद्र हुआ करते थे, उन पंद्रह सालों के दौरान सबकुछ खत्म सा हो गया । जिस बिहार में कला संस्कृति की एक समृद्ध परंपरा थी वहां कला –संस्कृति मजाक बनकर रह गए । जो सूबा शिक्षा का अप्रतिम केंद्र हुआ करता था वहां से हर साल उच्च शिक्षा के लिए हजारो छात्र पलायन कर दिल्ली और अन्य शहरों का रुख करने लगे । जिस सूबे में ज्ञान की गंगा बहा करती थी वहां अपराध और रंगदारी का बोलबाला हो गया । राज्य के संवैधानिक मुखिया होने के नाते यह सारी जिम्मेदारी लालू-रावड़ी की की बनती है कि उन्होंने बिहारी गौरव को बिहारी गाली में तब्दील कर दिया । लालू यादव का फूहड़पन और उनके रिश्तेदारों के रंगदारी के किस्सों पर फिल्में बननी लगी और उन फिल्मों के अहम किरदारों में आपको उन लोगं की झलक साफ तौर पर दिखाई देने लगी । बिहारी शब्द हास्य और व्यंग्य का प्रतीक बन गया । लेकिन जैसा कि दिनकर जी ने लिखा है कि विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं कि उसका विस्फोट अचानक होता है । उसी तरह जनता के गुस्से का विस्फोट होने में सालों लग गए । बिहार की जनता ने समझदारी दिकाते हुए सूबे में सरकार बदल दी । पहले तो कुछ अंदेशे के साथ लेकिन दूसरी बार जब भरोसा हो गया तो प्रचंड बहुमत के साथ। इस प्रचंड बहुमत के साथ ही जनता की आशाएं और आकांक्षाएं भी सातवें आसमान पर जा पहुंची है ।
यह वर्ष बिहार राज्य के स्थापना के सौ वर्ष के रूप में साल भर जश्न के रूप में मनाया जा रहा है । राज्य की नीतीश सरकार ने साल भर के कई कार्यक्रम बनाए हैं जिनमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गोष्ठी सेमिनार तो हैं ही उसके अलावा कई पुस्तकों का प्रकाशन और सांस्कृतिक रूप से लुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण का काम भी शुरू किया गया है । इस काम में बिहार का कला संस्कृति मंत्रालय बेहद शिद्दत से जुटा है । इसी कड़ी में मंत्रालय ने बिहार विहार नाम से एक कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन किया है । इस किताब में बिहार की कला संस्कृति एवं युवा विभाग की मंत्री सुखदा पांडे ने मर्म पर चोट की है – मैकाले के हवाले से उन्होंने लिखा है – हिंदुस्तानी यदि अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक इतिहास को जान जाएं तो हम उनको गुलाम नहीं कर पाएंगे इस लिए उन्हें उनके इतिहास को नहीं जानने दो । बिहार में तकरीबन डेढ दशत में यही हुआ । बिहार की नई पीढ़ी को उसके सांसक्कृति और वैचारिक इतिहास की जानकारी से वंचित रखने का षडयंत्र रचा जाता रहा और प्रयासपूर्वक ऐसा किया भी गया । लेकिन अब सुखदा पांडे के नेतृत्व में बिहार का यह मंत्रालय मैकाले के इस सिद्धांतो को झुठलाने में लगा है । सुखदा पांडे शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं और उनसे .ह उम्मीद भी की जा सकती है कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में बिहार के गौरव को वापस लाने में महती भूमिका निभाएंगी ।
बिहार के गौरवशाली इतिहासल को सामने लाने के लिए संस्कृकि मंत्रालय ने एक किताब बिहार-विहार छापी है य़ इस किताब का संपादन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक विनोद अनुपम ने किया है । विनोद अनुपम ने अएपने संपादकीय में बिहारकी होने की पीड़ा से ही सुरुआत की है कि किस तरह से जब वो 1992 में फिल्म एप्रिशिएशन का कोर्स करने के लिए पुणे गए थे तो उनके साथ के लोगों को इस बात का आश्चर्य होता था और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछते थे कि कैसा है आपका बिहार । विनोद अनुपम के मुताबिक - अब बदलते वक्त में भी लोग बिहार के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन अब वो लोग बिहार के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, बिहार में हो रहे नवीनतम बदलाव के बारे में जानना चाहते हैं । जनता वह सबकुछ जानना चाहती है जो शायद हम भी नहीं जानते। शायद इसलिए कि उन्हें पता है कि बदलाव की इबारत बिहार से ही लिखी जानी है , देश में भविष्य की रोशनी बिहार से ही आनी है । बिहार को करीब से जानने की इसी क्षुधा की पूर्ति की छोटी सी कोशिश है – बिहार विहार । दरअसल इस कॉफी टेबल बुक से बिहार की संस्कृति और समृद्ध लोक कलाओं की एक छोटी से झलक भर ही मिलती है । संकेत मिलते हैं कि हमारे बिहार की कला परंपराएं कितनी समृद्ध रही है । बिहार का होने के बावजूद इस किताब को पढ़ने के बाद मेरी जानकारी में भी जबरदस्त इजाफा हुआ । इस किताब से भी एक दिलचस्प प्रसंग जुड़ा है । विनोद अनुपम ने जब फोन पर मुझे कहा कि बिहार की कला संस्कृति पर वो बिहार सरकार की तरफ से प्रकाशित होनेवाली कॉफी टेबल बुक का संपादन कर रहे हैं तो मुझे लगा था कि वो मजाक कर रहे हैं । पहले तो मुझे लगा था कि सरकार की कला संस्कृति में क्यों दिलचस्पी होगी । और उसपर से कॉफी टेबल बुक । जब भी हमारी बातचीत होती थी तो विमोद अनुपम उलके बारे में बताते थे लेकिन हर बार मैं सोचता था कि वो दिवास्वप्न देख रहे हैं और मैं सपने तोड़ने में यकीन नहीं रखता हूं इसल वजह से उनको कुछ कहता नहीं था लेकिन कालांतर में पता चला कि बिहार विहार को जो सपना था और जिसे मैं दिवा-स्वपन सोच समझ रहा था, दरअसल वो हकीकत था और सपना पूरा भी हुआ ।
कॉफी टेबल बुक की योजना के बारे में विवेक कुमार सिंह ने अपनी पूर्व पीठिका में लिखा है – देश विदेश में घूमते हुए मुझे कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता का एहसास हुआ। विषय विशेष में रुचि जगाने के लिए कॉफी टेबल बुक हमेशा से एक बेहतर माध्यम रही है । यह विषय की विस्तार से जानकारी भले ही ना दे, उसके प्रति दिलचस्पी अवश्य जगाती है । बिहार विहार की परिकल्पना बिहार के प्रति दुनिया की दिलचस्पी जगाने के लिए ही की गई है । विवेक कुमार सिंह को नजदीक से जानने वाले यह बताते हैं कि इस प्रशासनिक अधिकारी ने बिहार में कला संस्कृति के विकास के लिए बहुच कार्य किए हैं और कई मृत प्राय संस्थाओं में नई जान फूंक दी थी । लेकिन कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता उसकी उपलब्धता पर भी निर्भर करती है । अगर बिहार सरकार सिर्फ किताब छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेगी तो इसका उद्देश्य पराजित हो जाएगा । जरूरत इस बात की है कि इस किताब को उन खास लोगों तक पहुंचाया जाए जहां से किसी भी सूबे की छवि निर्मित होती है । अन्यथा यह किताब भी अन्य सरकारी प्रकाशनों की तरह गोदाम में धूल फांक रही होगी और इसके प्रकाशम से जुड़े लोग अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे ।
इस किताब में बेहद श्रमपूर्वक सामग्री का चयन किया गया है लेकिन इसमें जो चित्र लगे हैं वो इस किताब की कमजोरी हैं । हो सकता है वक्त की कमी के चलते ऐसा हुआ हो या फिर कोई और कारण रहे हों लेकिन सामग्री के हिसाब से ना तो चित्रण कमजोर हैं चाहे वो रामलीला के पहले के चित्र हों राजाओं का चित्रण हो । लेकिन हमें इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की और सामग्री सामने आएं, कमजोरियां तो दूर हो ही जाती है । बस जैसा कि मैंने उपर भी कहा कि इसे टारगेट पाठक वर्ग तक पहुंचावने का काम होना चाहिए ।