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Saturday, February 22, 2020

यथार्थ की आड़ में कमी छिपाते निर्देशक


इन दिनों हिंदी फिल्मों के बदलाव को लेकर काफी बातें होती हैं। बदलाव की इन बातों में कथानक, फॉर्म, क्राफ्ट से लेकर तकनीक और संगीत तक पर चर्चा होती है। ये चर्चा होनी भी चाहिए। दरअसल सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसमें लगातार बदलाव करते रहने की जरूरत भी है क्योंकि दर्शक एकरसता से उब जाते हैं। हिंदी फिल्मों में आ रहे इन तमाम बदलावों के बीच पिछले तीन चार वर्षों से एक बात अधिक सुनने को मिल रही है कि अब हिंदी फिल्मों की कहानियां यथार्थ के ज्यादा करीब पहुंच रही हैं। ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘दम लगा के हइशा’, ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में बनीं और लोगों ने इसको पसंद भी करना शुरू किया तो छोटे शहरों की बड़ी कहानियों की बातें शुरू हो गईं। फिर ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’, ‘पिंक’ जैसी फिल्में भी आईं जो सफलता के फॉर्मूले को न अपनाते हुए कहानी के साथ चलीं। सफल भी हुईं। 2015 में बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘मसान’ आई। बेहद शानदार फिल्म, कलाकारों का सधा अभिनय भी। इस तरह की फिल्मों को कालांतर में कंटेट फिल्म कहा जाने लगा। ये नामकरण ठीक वैसा ही है जैसे हिंदी में ‘नई वाली हिंदी’ को चलाने की कोशिश की गई। ‘कंटेंट फिल्म’ कहने का अभिप्राय चाहे जो भी रहा हो लेकिन इससे एक अलग भाव यह भी निकलता है कि सिर्फ इन्हीं फिल्मों में कंटेंट है और अन्य फिल्में कंटेंटविहीन हैं। ऐसा नहीं है, इस कोष्ठक से बाहर की फिल्मों में भी कंटेंट होता है। दरअसल जिन कथित फॉर्मूलाबद्ध फिल्मों से खुद को अलग दिखाने की कोशिश में ‘कंटेंट फिल्म’ का नाम चलाने की कोशिश की जा रही है वो फिल्में पहले भी थीं और आगे भी रहेंगी।
 हिंदी फिल्मों के इतिहास पर नजर डालें तो ये बहस बहुत पुरानी है। आजादी के बाद जब राज कपूर फिल्में बना रहे थे तब भी उनके सामने ये प्रश्न आया था। तब ये थोड़े बदले हुए रूप में आया था जब फिल्मों को बौद्धिक और संवेदनशील फिल्मों की श्रेणी में बांटकर देखा जाता था। राज कपूर फिल्मों को बौद्धिक माध्यम नहीं मानते थे उनका मानना था ये माध्यम संवेदना से चलता है। और वो इस बात को कहते भी थे। राज कपूर की बात सच भी है। हिंदी फिल्मों के इतिहास में अबतक ज्यादातर दर्शकों को वही फिल्में पसंद आती हैं या आ रही हैं जो कहानी को संवेदना की जमीन पर बुनती हैं। संवेदना से अलग खुरदरे यथार्थ को पेश करनेवाली फिल्में थोड़े दिनों के लिए चर्चा तो हासिल कर सकती हैं लेकिन ये चर्चा बेहद अल्पजीवी होती है। इसका सबसे सटीक उदाहरण अनुराग कश्यप नाम के एक निर्देशक हैं। अबतक इस निर्देशक ने जितनी भी फिल्में बनाई हैं, उनमें से ज्यादातर एक खास वर्ग द्वारा प्रशंसित रही हैं, दर्शकों में व्याप्ति का दायरा बेहद छोटा रहा। कहा जा सकता है कि इन साहब की फिल्में सुपरफ्लॉप लेकिन ‘क्रिटिकली अकेल्मड’ फिल्मों की स्मारक हैं। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता और अश्लीलता परोसने में इनको महारथ हासिल है। खैर ये अलहदा विषय है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी।
ये सही है कि इन दिनों हिंदी फिल्मों के विषय अपेक्षाकृत यथार्थ के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस बात को रेखांकित करना भी आवश्यक है कि यथार्थ के करीब जाने में वो जीवन को जस का तस उठा कर रख देने की ओर भी बढ़ने लगे हैं। जीवन को जस का तस रखने का अर्थ है कि वो सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के उन प्रसंगों या उन घटनाओं को उसी तरह से फिल्मा कर दर्शकों के लिए पेश कर देना। व्यक्तिगत जीवन में कई ऐसे पल होते हैं जिनको सीधे सीधे फिल्मों में नहीं उतारा जा सकता है, उसको दिखाने की एक न्यूनतम मर्यादा अपेक्षित होती है। फिल्मों में जीवन जस का तस पेश करने की प्रवृत्ति पर ध्यान देने के लिए क्रेंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड है लेकिन इंटरनेट के माध्यम से चलनेवाले प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले कंटेंट पर ध्यान देने की कोई प्रविधि अभी है नहीं। इसका नतीजा क्या है। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता, अश्लीलता, भयानक हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक दृश्य का चित्रांकन। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर पहले भी कई बार चर्चा हो चुकी है। इस माध्यम के विनियमन को लेकर भी चर्चा हो चुकी है। सरकार ने वेब सीरीज की दशा और दिशा को लेकर एक-दो बैठक भी कर ली है। अबतक नतीजा कुछ नहीं निकला है। हो सकता है सरकार इन सीरीज पर पेश किए जा रहे कंटेंट को लेकर संतुष्ट हो गई हो।
अभी हाल ही में नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज आई है नाम है जामताड़ा। दस एपिसोड में पेश किए गए इस सीरीज के केंद्र में झारखंड का कस्बा जामताड़ा है जहां से बैंक फ्रॉड की वारदात को अंजाम दिया जाता है। अब अगर इस सीरीज को ही देखें तो इसमें जीवन को जस का तस दिखाने की प्रवृत्ति के कई प्रसंग हैं। इस वेब सीरीज में गालियों की भरमार है, कोई भी एपिसोड ऐसा नहीं है, बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लगभग सभी प्रसंगों में गालियां उपस्थित हैं। जामताडा के युवाओं को इस तरह से पेश किया गया है कि प्रतीत होता है कि वहां का युवा कोई वाक्य बगैर गाली के बोलता ही नहीं है। हद तो तब हो जाती है जब नायक अपनी प्रेमिका से प्रेम प्रसंगों में गाली में ही बात करता है। ये यथार्थ है या फिर सारी सामाजिक वर्जनाओं को छिन्न भिन्न कर मुनाफा कमाने की युक्ति। इसपर विचार करने की जरूरत है। सरकार से अधिक निर्माताओं और निर्देशकों को समझने की जरूरत है। जामताड़ा की भाषा को लेकर भी इस वेब सीरीज में घालमेल किया गया है। कनटाप शब्द कानपुर से इतना जुड़ा है कि हिंदी पट्टी का कोई भी व्यक्ति इसको जानता है। जब इस सीरीज जामताडा में वहां के स्थानीय लड़के अपने संवाद मे कनटाप का प्रयोग करते हैं तो ये संवाद लेखक से लेकर निर्देशक के अज्ञान को ही दर्शकों के सामने पेश करता है। इसके अलावा भी अगर इस वेब सीरीज को देखें तो जाति व्यवस्था को सूक्ष्मता से समझे बगैर पात्रों के जातीय वर्गीकरण को चित्रित करने की कोशिश की गई है। जामताडा में जिस सहजता के साथ अपराधी बैंक में पैसे जमा करते और निकालते हैं वो भी यथार्थ से दूर नजर आता है। अगर आप बैंकों के फ्रॉड को लेकर कोई सीरीज बना रहे हैं तो इसके लिए न्यूनतम शोध तो अपेक्षित ही होता है।
यथार्थ के नाम पर कहानी के लोकेशन और गाली वाली भाषा को पेश करने की जो भेड़चाल इस दौर की वेब सीरीज में दिखाई देती है उसपर भी विचार करना होगा। यथार्थ के चित्रण के लिए जिस कौशल की जरूरत होती है वो न तो अनुराग कश्यप में है और न ही गाली गलौच और अश्लीलता दिखाने वाले निर्देशकों में। दरअसल इस तरह के लोग अपनी कमजोरियों को ढ़कने के लिए गालियों, हिंसा और यौनिक दृश्यों का सहारा लेते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि फिल्म या वेब सीरीज के क्राफ्ट या निर्देशकों के कौशल पर बात नहीं होती है और सारी चर्चा इन गालियों और फूहड़ता पर केंद्रित हो जाती है। समांतर सिनेमा के दौर में भी फिल्मों में यथार्थ दिखाया जाता था चाहे वो गोविंद निहलानी की फिल्में हों या श्याम बेनेगल की या महेश भट्ट की। इनकी फिल्मों में भी यथार्थ होता था, वैसा य़थार्थ जो बगैर लाउड हुए जीवन को दर्शकों के सामने पेश करता था। 1982 में महेश भट्ट निर्देशित एक फिल्म आई थी ‘अर्थ’ । इस फिल्म में समाज का ऐसा यथार्थ है जिसकी चर्चा फिल्म बनने के करीब चार दशक बाद अब भी होती है। फिल्म का अंतिम दृश्य जिसमें नायिका शबाना और नायक कुलभूषण खरबंदा का संवाद है वो इतना पॉवरफुल है कि अब भी दर्शकों के मानस पटल पर अंकित है। उस यथार्थ के चित्रण में फिल्मकार का कौशल दिखाई देता था। उनको अपने कौशल पर भरोसा होता था और वो उसी भरोसे के आधार पऱ फिल्म बनाते थे और उसी कौशल ने उनकी फिल्मों को अबतक जिंदा रखा है, उसकी चर्चा होती है। अब जिस कंटेंट फिल्म की चर्चा हो रही है उसको कबतक याद रखा जाएगा ये तो आनेवाले समय में पता चलेगा। लेकिन यथार्थ की आड़ में अपनी कमी छुपाने वाले निर्देशक इतिहास में गुम हो जाएंगे इस बात को समझने के लिए किसी समय का इंतजार नहीं करना होगा।  

Saturday, June 9, 2018

सफल होती नायिका प्रधान फिल्में


तीन साल पहले की बात है, कुमाऊं लिटरेचर फेस्टिवल में फिल्मों पर एक सत्र चल रहा था जिसमें फिल्मी शख्सियतों पर पुस्तकें लिखनेवाले लेखक शामिल थे। राजेश खन्ना के जीवनीकार गौतम चिंतामणि और यासिर उस्मान, शशि कपूर के जीवनीकार असीम छाबड़ा के अलावा अन्य लोग थे। सत्र का संचालन फिल्म पत्रकार मयंक शेखर कर रहे थे। इस चर्चा के दौरान किसी वक्ता ने ये कह दिया कि हिंदी में नायिकाएं अपने बूते पर फिल्मों को हिट नहीं करवा पाती हैं। इस बयान के बाद वहां मौजूद श्रोताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई और श्रोताओं के हस्तक्षेप की वजह से चर्चा काफी गरम हो गई थी। मंच पर बैठे सभी वक्ता बैकफुट पर आ गए थे। मंचासीन सभी वक्ता इस बात पर एकमत हो गए कि उनके कहने का आशय ये था कि हिंदी फिल्मों के इतिहास में कोई महिला सुपरस्टार नहीं हुई जो अपने दम पर फिल्म को लगातार हिट करवा सके। किसी तरह बात संभली थी लेकिन इसके बाद चर्चा इस पर होने लगी थी कि बॉलीवुड नायक प्रधान क्यों है। क्यों नायिकाओं को नायकों से कम पैसे मिलते हैं। क्यों नायकों से नायिकाओं के बारे में उनकी पसंद पूछी जाती है, आदि आदि। यह बात उस वक्त होकर खत्म हो गई लेकिन उक्त वक्ता की टिप्पणी मन के किसी कोने अंतरे में धंसी रह गई।
हाल ही में कई फिल्में इस तरह की आईं है जिसमें नायिकाओं ने अपने बूते पर फिल्म को हिट करवाया। आलिया भट्ट ने अपने अभिनय के बूते पर फिल्म ‘राजी’ को 100 करोड़ के क्लब में शामिल करवा दिया। इस फिल्म में कोई स्टार नायक नहीं है, बावजूद इसके ये फिल्म सुपर हिट रही। इससे तो एक और दिलचस्प बात जुड़ी है कि इस फिल्म का निर्देशन भी एक महिला ने किया है, मेघना गुलजार। ‘राजी’ की रिलीज के चंद दिनों बाद एक और फिल्म आई ‘वीरे द वेडिंग’। इस फिल्म ने भी दो हफ्ते में करीब साठ करोड़ का बिजनेस किया है, जिसको बेहतर प्रदर्शन माना जा सकता है। इसमें भी कोई स्टार नहीं है बल्कि चार नायिकाएं करीना कपूर खान, सोनम कपूर आहूजा, शिखा और स्वरा भास्कर है। हलांकि इस फिल्म में सफल होने के लिए तमाम तरह का मसाला डाला गया । फिल्म में महिलाओं की बातचीत में गालियों की भरमार है, यौनिकता का प्रदर्शन है, स्वछंदता की वकालत की गई है और इसको फेमिनिस्ट फिल्म कहकर प्रचारित भी किया गया। फेमिनिज्म की आड़ में सेक्सुअलिटी से लेकर गाली गलौच को आधिनिक महिलाओं की जीवन शैली का हिस्सा बताकर पेश किया गया है। दरअसल कुछ फिल्मकारों को लगता है कि गाली गलौच करके, फ्री सेक्स की वकालत करके ही महिलाएं स्वतंत्र हो सकती हैं। फिल्म  ‘वीरे द वेडिंग’ के कर्ताधर्ता इसी दोष के शिकार हो गए। ऐसे फिल्मकारों को स्त्री स्वतंत्रता और स्वछंदता का भेद समझना होगा। फिल्म अच्छी कमाई करने की राह पर भले ही अग्रसर दिखाई देती हो लेकिन इस फिल्म का स्थायी महत्व होगा, इसमें संदेह है। हां, कमाई के लिहाज से इसको याद रखा जा सकता है। फेमिनिज्म पर पूर्व में भी कई फिल्में बनीं जो भारतीय हिंदी सिनेमा में आज भी याद की जा सकती हैं। स्मिता पाटिल और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म ‘अर्थ’ में नारी स्वतंत्रता का जो चित्रण है वो स्थायी है। फिल्म के क्लाइमैक्स पर शादीशुदा कुलभूषण खरबंदा अपनी प्रेमिका स्मिता पाटिल को छोड़कर वापस अपनी पत्नी शबाना आजमी के पास पहुंचता है और माफी मांगता है। शबाना आजामी उसको माफी देने से मना करती है और कहती है कि अगर मैं किसी मर्द के साथ इतने दिन गुजारकर तुम्हारे पास वापस आती तो क्या मुझे माफ कर देते। फिल्म यहां खत्म हो जाती है। स्त्री स्वतंत्रता का उत्स है इस फिल्म में। बगैर किसी शोर शराबे के, बगैर किसी गाली गलौच के। उस फिल्म की नायिका जितनी बोल्ड और बिंदास थी, ‘वीरे द वेडिंग’ में वो बात नहीं है। खैर ये अलहदा मुद्दे हैं उसपर फिर कभी विस्तार से बात होगी।
फिलहाल हम बात कर रहे हैं नायिका के केंद्रीय रोल में फिल्मों के सफल होने की। इसी तरह की एक फिल्म आई थी ‘हिचकी’। ये फिल्म भी रानी मुखर्जी ने अपने बूते पर सफल करवाई। ‘हिचकी’ फिल्म की नायिका ‘टूरेट सिंड्रोम’ से पीड़ित होती है जिसके बारे में कम लोगों को पता था। ये एक न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या है जो किसी को भी बचपन से ही हो सकती है। इस फिल्म को भी पर्याप्त सफलता मिली। इसके पहले ‘मॉम’ फिल्म भी सफल रही। ऐसा नहीं है कि नायिका प्रधान फिल्में पहले हिट नहीं होती रही हैं। नायिका प्रधान फिल्मों के हिट होने का एक लंबा इतिहास है । फिल्म ‘मदर इंडिया’ से लेकर फिल्म ‘लज्जा’ तक और फिर फिल्म ‘कहानी’ से से लकर ‘क्वीन’ तक। हर दौर में महिला प्रधान फिल्में बनती रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में महिला प्रधान फिल्मों के सफल होने की संख्या बढ़ी है। समकालीन समय में हम ‘क्वीन’ को इस सफलता का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। 2014 में रिलीज हुई इस फिल्म ‘क्वीन’ में कंगना रनौट ने अपने अभिनय के बल पर शानदार सफलता हासिल की थी। फिल्मी दुनिया के ट्रेड पंडितों के मुताबिक ‘क्वीन’ के निर्माण पर करीब 13 करोड़ रुपए खर्च हुए थे और फिल्म ने सौ करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया था। इस तरह से देखें तो इस फिल्म ने अपनी लागत के करीब नौ गुना ज्यादा रकम का बिजनेस किया। श्रीदेवी की फिल्म ‘मॉम’ भी सफल रही थी। उसने भी अपने लागत से कई गुणा ज्यादा का बिजनेस किया था।
ऐसा नहीं है कि इस दौर में सभी नायिका प्रधान फिल्म सुपरहिट ही रहीं। विद्या बालन की फिल्म ‘बेगम जान’ जिसे मशहूर निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने निर्देशित किया था वो ज्यादा बिजनेस नहीं कर पाई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब बीस करोड़ में बनी ये फिल्म तीस करोड़ का ही बिजनेस कर पाई। हलांकि विद्या की ही एक और फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’ ने औसत बिजनेस किया। बीस करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ का कारोबार किया।
दरअसल स्त्रियों को लेकर वही फिल्में ज्यादा दर्शकों को अपनी ओर खींच रही हैं जिसमें स्त्री पात्रों को लेकर ज्यादा जिम्मेदार किस्म की कथानक पर फिल्में बन रही हैं। हमारे देश में 1991 में आर्थिक उदारीकरण के दौर और खुले बाजार की वजह से कई ऐसी फिल्में आई जिनमें स्त्री चरित्रों का इस्तेमाल फिल्मकारों ने अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए किया और खुलेपन के तर्क की ओट में नायिकाओं के कपड़े कम करते चले गए। यह उन्नीस सौ सत्तर या उन्नीस सौ अस्सी के दौर की फिल्मों से अलग थी। ब्रिटिश अभिनेत्री एमा थॉमसन का हॉलीवुड फिल्मों को लेकर एक मशहूर कथन है- ‘1980 या उस दौर के आसपास बनने वाली फिल्में का नैतिक स्तर बिल्कुल शून्य था। मुनाफा ही उसका उद्देश्य था, जिसका सीधा संबंध उन भूमिका से रहा है जो फिल्मों में नायिकाओं को दी जाती रही हैं। उस दौर में स्त्री का मतलब या तो भोली भाली स्त्री या नायकों को अपने हाव-भाव से लुभानेवाली नायिका।‘ इस कथन के आलोक में हम हिंदी फिल्मों के 1990 से लेकर 2000 तक के दौर को देख सकते हैं बल्कि दो चार साल आगे तक भी। लेकिन अब जब नए लेखकों का दौर आया है तो उन्होंने हिंदी फिल्मों में भारतीय स्त्रियों की परंपरागत छवि को ध्वस्त करते हुए उसका एक नया रूप गढ़ा है।इस नए रूप में कई बार विचलन भी देखने को मिलता है लेकिन वो ज्यादातर यथार्थ के करीब होती हैं। जैसे अगर हम दो हजार ग्यारह में आई फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ को देखें, जो दक्षिण भारतीय फिल्मों की नायिका सिल्क स्मिता की जिंदगी पर बनी थी, में तमाम मसालों और सेक्सी दृश्यों की भरमार के के बावजूद यथार्थ बहुत ही खुरदरे रूप में मौजूद था। नायिका प्रधान फिल्मों की सफलता इस ओर भी संकेत दे रही है कि अगर कहानी अच्छी हो, उस कहानी का फिल्मांकन बेहतर हो तो वो सफल हो सकती है। यह भी प्रतीत होता है कि हिंदी दर्शकों की रुचि का भी परिष्कार हो रहा है और अब वो यथार्थवादी फिल्मों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा पसंद करने लगा है। उदाहऱम के तौर पर अगर हम 2016 में रिलीज हुई फिल्म ‘पिंक’ का उदाहरण लें तो वो फिल्म अपनी कहानी और उसके बेहतरीन चित्रण की वजह से दर्शकों को खूब पसंद आई। 23 करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने 100 करोड़ से ज्यादा बिजनेस किया। इस तरह की फिल्मों की सफलता से यह उम्मीद जगी है कि अगर हिंदी फिल्मों में स्त्री पात्रों का चित्रण यथार्थपरक तरीके से किया जाए तो वो समाज पर असर भी डालेंगी और कारोबार भी अच्छा करेगी।