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Saturday, September 17, 2016

‘पुरस्कार वापसी’ का पुरस्कार ! ·

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले हिंदी के चंद कवियों और लेखकों ने देशभर में असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करने का एलान कर माहौल बनाने की कोशिश की थी । माहौल बना भी था । अशोक वाजपेयी ने ठीक-ठाक समां बांध दिया था । चंद दिनों तक पूरे देश में इस बात पर ही बहस हुई थी कि देश में असहिष्णुता का मौहाल है । यहां तक कि वित्त मंत्री अरुण जेटली और बाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी इस पर बयान देना पड़ा था । साहित्य अकादमी को भी आपात बैठक बुलानी पड़ी थी । इस बात के लिए अशोक वाजपेयी को दाद देनी होगी कि उन्होंने देश भर में एक सरकार के खिलाफ माहौल बना दिया था । उस माहौल के बाद बिहार विधानसभा का चुनाव परिणाम आया और भारतीय जनता पार्टी वहां बुरी तरह से परास्त हो गई । महागठबंधन की जीत के बाद नीतीश कुमार ने बिहार की कमान संभाली । पुरस्कार वापसी अभियान के लोगों से उनकी मुलाकातें होती रहीं । इस समूह के रहनुमाओं ने नीतीश कुमार को विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ये जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि महागठबंधन की जीत में उनके द्वारा निर्मित माहौल का भी हाथ था । अब बिहार फतह करने के बाद नीतीश कुमार की महात्वाकांक्षा अपने लिए देश की सियासत में बड़ी भूमिका तलाश रही है । नीतीश कुमार को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करने का भरोसा एक बार फिर से इस पुरस्कार वापसी समूह ने दिया है । दिल्ली में इस समूह के सदस्यों और नीतीश कुमार की एक बैठक हुई जिसमें समान विचारधारा के लेखकों को एक मंच पर लाने की कोशिश करने की बात हुई । देशभर के इस तरह के लेखकों से नीतीश कुमार की मुलाकातें करवाई जाएंगी । अब ये देखना दिलचस्प होगा कि इन मुलाकातों से क्या निकलता है । देखना तो ये भी दिलचस्प होगा कि वो कौन सी वजहें हैं जिसकी वजह से प्रगतिशील, जनवादी और कलावादी लेखक एक साथ एक मंच पर तमाम वैचारिक विरोधों को भुलाकर बैठेंगे । इतनी लंबी पृष्ठभूमि बताने की भी वजह है । वजह पुरस्कार वापसी समूह की मंशा को उजागर करने की है ।
देश में फैल रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी समूह के मुखिया अशोक वाजपेयी की लंबे समय से इच्छा रही है कि वो देश में विश्व कविता समारोह का आयोजन करें । इस तरह के कार्यक्रमों में करोड़ों रूपए खर्च होते हैं लिहाजा आयोजन का भार कोई सरकार या सरकारी संस्था ही उठा सकती है । अशोक वाजपेयी ने भारत सरकार को 2014 में भी इस तरह के आयोजन का प्रस्ताव दिया था जो परवान नहीं चढ़ सका था । दरअसल उस वक्त सरकार ने अशोक वाजपेयी के उस प्रस्ताव को साहित्य अकादमी के पास भेज दिया था जिसे साहित्य अकादमी ने ठुकरा दिया था । साहित्य अकादमी ने अशोक वाजपेयी के प्रस्ताव को नकारते हुए साफ कर दिया था कि वो किसी से साथ साझीदारी में इतना बड़ा आयोजन करने के बजाए खुद इस तरह का आयोजन कर सकती है । साहित्य अकादमी ने विश्व कविता समारोह का आयोजन किया भी था । अब एक बार अशोक वाजपेयी ने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह के आयोजन के लिए तैयार कर लिया है । बिहार सरकार ने इस आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा है । इस संस्था के अध्यक्ष कवि आलोक धन्वा हैं । विश्व कविता सम्मेलन के लिए जिस आयोजन समिति का गठन किया गया है उसमें सरकारी नुमाइंदों के अलावा राष्ट्रीय जनता दल के नेता रामश्रेष्ठ दीवाना, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि अरुण कमल, रामवचन राय और अशोक वाजपेयी को इस कमेटी में रखा गया है । इस कमेटी की एक बैठक हो चुकी है और तय किया गया है कि अगले साल अप्रैल में पटना में विश्व कविता समारोह का आयोजन किया जाएगा । सूबे के संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम के मुताबिक इस समारोह में चालीस देशों के कवि शिरकत करेंगे । राम के मुताबिक कमेटी ने जो फैसला लिया है उसके मुताबिक पटना और सूबे के अन्य ऐतिहासिक शहरों में ये समारोह आयोजित होगा । इसके लिए दिल्ली में एक अस्थायी कार्यालय होगा जो अशोक वाजपेयी की देखरेख में चलेगा । अब इस कार्यालय में क्या क्या सहूलियतें होंगी इस बारे में जानकारी सामने आने का इंतजार है ।
अभी नामवर सिंह के नब्बे साल के मौके पर प्रकाशित पत्रिका बहुवचन के अंक में अशोक वाजपेयी ने एक लंबा लेख लिखकर नामवर सिंह के दुर्गुणों को गिनाया था । अशोक वाजपेयी के मुताबिक विचारधारा के अतिरेक के अलावा नामवर सिंह के यहां तीन और अतिचार सक्रिय हैं- वाचिकता, अवसरवादिता और सत्ता का आकर्षण । अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह पर सत्ता के आकर्षण का आरोप लगाते हुए कहा कि वो सत्ताधारियों के मंच पर होने पर बहुत विनम्र हो जाते हैं । अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह पर तो सत्ता के आकर्षण का आरोप जड़ा लेकिन कहावत है ना कि अगर आप किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो आपकी ओर भी कुछ उंगलियां उठती हैं । यह कहावत अशोक वाजपेयी पर भी लागू होती है । अशोक जी को भी ना तो कभी सत्ता से परहेज रहा और ना ही कभी उन्होंने सत्ताधारियों से निकटता से कोई परहेज किया । चाहे वो समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेन्द्र यादव के साथ मंच साझा करना हो या फिर नीतीश कुमार के साथ । पुरस्कार वापसी अभियान के बाद तो नीतीश कुमार से उनकी निकटता बढ़ती ही गई और पिछले दिनों जिस तरह की खबरें आई उसके मुताबिक अशोक वाजपेयी खेमे के लेखकों की नीतीश कुमार के साथ लंबी बैठक हुई जिसमें देशभर के लेखकों के साथ नीतीश की मुलाकातें तय करवाने का बीड़ा उठाया गया । क्या ये सत्ता का आकर्षण नहीं है । क्या ये सत्ता का आकर्षण नहीं है कि अशोक वाजपेयी जैसे हिंदी के वरिष्ठ और बेहद आदरणीय लेखक को उस कमेटी में रखा गया है जिसमें कि लालू यादव की पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के मुखिया हैं । कमेटी की सदस्यता स्वीकार करना अवसरवादिता नहीं है ।
अबतक भले ही बिहार में विश्व कविता सम्मेलन करने के फैसले का दावा किया जा रहा है लेकिन पर्दे के पीछे इस कविता महोत्सव को दिल्ली में करवाने का खेल भी चल रहा है । इस आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि अशोक वाजपेयी और बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष आलोक धन्वा इस पक्ष में हैं कि विश्व कविता के इस आयोजन को दिल्ली में करवाया जाए । अब दिल्ली में आयोजन के लिए तर्क ढूंढे जा रहे हैं । एक तर्क तो ये दिया जा रहा है कि विश्व के चालीस देशों के कवियों के रुकने का पटना में इंतजाम कैसे हो सकता है । दूसरा तर्क ये गढ़ा जा रहा है कि दिल्ली में इस आयोजन से नीतीश कुमार की छवि को देशभर में मजबूती मिलेगी और एक संवेदनशील और उनको सहिष्णु विकल्प के रूप में पेश किया जाएगा । इन तर्कों से ज्यादा तो इस तर्क में दम लगता है कि विश्व कविता महोत्सव अगर बिहार में करवाया गया तो रसरंजन कैसे होगा । बिहार में पूर्ण शराबबंदी है और ऐसे में कविता सुनाने के बाद कवियों के सामने संकट पैदा हो सकता है । इसकी काट के तौर पर भी इस आयोजन को दिल्ली ले जाया जा सकता है । अगर ऐसा होता है तो नीतीश की छवि मजबूत होगी या कमजोर ये तो उस वक्त ही तय होगा ।

बिहार संगीत नाटक अकादमी के विश्व कविता महोत्सव के आयोजन पर करीब चार-पांच करोड़ रुपए के बजट पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं । बिहार में शुरू हुआ अखिल भारतीय कविता समारोह और कहानी समारोह को सरकार ने बंद कर दिया जिसमें बमुश्किल पच्चीस तीस लाख रुपए खर्च होते थे । पटना लिटरेचर फेस्टिवल को बिहार सरकार ने मदद बंद कर दिया जिससे वो आयोजन भी ठप है । अब सवाल यही है कि विश्व कविता महोत्सव के आयोजन पर करोड़ों खर्च करने का औचित्य क्या है । इससे बिहार की जनता को या बिहार की रचनात्मकता को क्या फायदा होना है । इस बात का आंकलन सरकार के स्तर पर किया गया या सिर्फ अशोक वाजपेयी को पुरस्कार वापसी मुहिम के लिए पुरस्कृत करने के लिए ये आयोजन किया जा रहा है । इस बात को भी प्रचारित किया जा रहा है कि गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने के जश्न के तौर पर भी इसका आयोजन किया जा रहा है । बेहतर तो ये होता कि बिहार सरकार इस चार पांच करोड़ रुपए की राशि से पटना या बिहार के किसी अन्य शहर में एक बेहतरीन कला केंद्र की स्थापना करती जहां बिहार के प्रतिभाशाली कलाकार ना केवल अपनी कला को मांज सकते बल्कि उसका प्रदर्शन भी कर सकते । पटना में मौजूद सांस्कृतिक केंद्रों की बदहाली इन पैसों से दूर हो सकती है । लेकिन नेताओं को तो अपने कार्यकर्ताओं का ध्यान रखना होता है और इस आयोजन में भी इस सिद्धांत का पालन किया जा रहा है ।  

Saturday, May 7, 2016

प्रासंगिक बने रहने का दबाव

जब कोई लेखक अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में होता है, उस वक्त लिखना छोड़ दे ऐसा सुनने में कम ही आता है, हिंदी में तो और भी कम । हिंदी के लेखक जब तक जीवित रहते हैं तब तक लिखते रहते हैं । ज्यादातर हिंदी के लेखकों को लगता है किताबों की संख्या से ही उनको अमरत्व प्राप्त होता उसकी गुणवत्ता से नहीं, लिहाजा वो पचनात्मक तौर पर चुक जाने के बाद भी कुछ ना कुछ लिखते रहते हैं । नतीजा यह होता है कि पूर्व में जो प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की होती है वो भी छीजने लगती है । इस रोग से हिंदी का शायद ही कोई लेखक अछूता रहा है । पहले उपन्यास लिखकर साहित्य जगत में अपना डंका बजाने वाले लेखक से जब उपन्यास छूटता है तो वो संस्मरण लिखने लगते हैं । यहां भी जब उनकी थाती खत्म हो जाती है तो वो आत्मकथा की ओर मुड़ते हैं । बीच बीच में छिटपुट लेखों के संग्रह आदि छपवा लेते हैं । इसका फायदा यह होता है कि उनके किताबों की संख्या बढ़ती चली जाती है । प्रकाशक लेखक की प्रसिद्धि के दबाव में किताबें छाप भी देते हैं । उम्र के छिहत्तरवें पड़ाव पर आकर राजेन्द्र यादव ने किशोरावस्था में लिखा अपना उपन्यास एक था शैलेन्द्र छपवा लिया था जो बेहद अनगढ़ और उनकी प्रतिष्ठा को कम करनेवाला था । उसपर से तुर्रा ये कि इसको अविकल और असंपादित कहकर प्रचारित भी किया गया था । इस उपन्यास ने राजेन्द्र यादव के किताबों की संख्या में अवश्य इजाफा कर दिया था लेकिन उनकी लेखकीय प्रतिष्ठा इससे धूमिल ही हुई थी । दो हजार छह में उन्होंने ये किताब मुझे दी थी और समीक्षा लिखने का आदेश दिया था । किताब पढ़कर मैंने उन्हें फोन किया कि अगर मैं इसकी समीक्षा लिख दूंगा तो आप खफा हो जाएंगे । साथ ही मैंने विस्तार से अपनी आपत्तियों को उनको बताया था । खैर यादव जी इतने लोकतांत्रिक थे कि वो सामनेवाले की ना केवल बात सुनते थे बल्कि उसकी राय का सम्मान भी करते थे । अपने अंदाज में उन्होंने मुझे हड़काया भी था लेकिन उसके बाद एक बार भी मुझे समीक्षा लिखने के लिए उन्होंने नहीं कहा था । इसके पहले राजेन्द्र जी ने हंस के अपने संपादकीय को भी संकलित कर प्रकाशित करवाया था । दो हजार एक में उनका लगभग आत्मकथ्य मुड़ मुड़ के देखता हूं...प्रकाशित हुआ था । तब उस किताब में उन्होंने अपनी जिंदगी को कठघरे में खड़ा किया था और व्यक्तिगत अर्थहीनता का प्रश्न भी उछाला था । चेखव के नाटक तीन बहनों की एक पात्र, जो कि व्यर्थता बोध की मारी थी, का एक संवाद उद्धृत किया था – काश ! जो कुछ हमने जिया है, वह सिर्फ जिंदगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक अवसर हमें और मिलता । दरअसल ये लाइन हिंदी के उन तमाम लेखकों की बाद की रचनाओं को देखते हुए बरबस याद आ जाती है कि काश उनको एक बार फिर से रचनात्मक जीवन मिलता और वो अपनी कमजोर रचनाओं को पुनर्लेखन कर पाते । यहां राजेन्द्र यादव का नाम सिर्फ इसलिए ले सका कि उनसे जुड़ा एक प्रसंग स्मरण में था । अन्यथा तो हिंदी के बहुतेरे लेखक यही कर रहे हैं । कई लेखक तो अपनी चंद कहानियों को बार बार अलग अलग नाम से प्रकाशित करवा कर किताबों की संख्या बढाते रहते हैं – मेरी प्रिय कहानियां, मेरी चुनिंदा कहानियां, मेरी दस कहानियां, मेरी पच्चसी कहानियां, फलां और अन्य कहानियां आदि आदि ।
दरअसल जब हम लेखन में आ रहे अवरोध की बात करते हैं तो यह बात साफ है कि लेखक भी एक तय सीमा तक ही लिख पाते हैं और उसके बाद वो खुद को या तो दोहराने लगते हैं या फिर अपने बनाए लेखकीय मानदंड को ही पार नहीं कर पाते हैं । हिंदी के कथाकार सृंजय की कहानी कामरेड का कोट इतना चर्चित हुआ कि उसके बाद सृंजय की कोई रचना उनको वो प्रसिद्धि नहीं दिला पाई और फिर कालांतर में वो साहित्य की दुनिया से लगभग विस्मृत हो गए । इसी तरह से अगर हम देखें तो हिंदी के बड़े कवियों में से एक आलोक धन्वा का लेखन भी लगभग स्थगित है । आलोक धन्वा का अबतक एक ही कविता संग्रह प्रकाशित है, हलांकि बाद में उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट कविताएं लिखी । एक आलोचक के मुताबिक आलोत धन्वा का लंबा मौन अपनी कविता को विकास के नए धरातल पर पहुंचाने की तैयारी थी । इसी तरह से अगर हम हिंदी की मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की कृतियों पर विचार करें तो देखते हैं कि जो धार या जो पैनापन उनके लेखन में इदन्नम से लेकर अल्मा कबूतरी तक था या जिस तरह की रचनात्मक ऊंचाई उनकी आत्मकथा से दो खंड- कस्तूरी कुंडल बसै और गुड़िया भीतर गुड़िया में दिखाई दिए वह उसके बाद के लिखे उपन्यासों में नहीं मिलता है । मैत्रेयी पुष्पा के पहले लिखे गए उपन्यास उनके बाद के उपन्यासों के लिए अबतक चुनौती बनकर खड़े हैं । मेरा मानना है कि अल्मा कबूतरी उनकी अबतक प्रकाशिक रचनाओं में सबसे श्रेष्ठ है ।
दऱअसल लेखकों की ना लिख पाने की जो समस्या है वो विश्वव्यापी है । पश्चिम में इसको राइटर्स ब्लॉक कहते हैं । वहां यह माना जाता है कि किसी भी रचना पर सालों तक काम करते रहो, उसको लगातार संपादित करते रहो, उसमें जोड़ो घटाओ और जब संतुष्ट हो तो प्रकाशित करवाओ । यह सवाल भी पश्चिम में लगातार उठता रहा है कि कविता कहानी या उपन्यास लिखना शुरू करना आसान है लेकिन लेखक को अपना लेखन कब रोक देना चाहिए ये बड़ा सवाल है । उस सवाल से अमेरिका के लेखक लगातार मुठभेड़ करते रहे हैं । अमेरिका के ही एक मशहूर लेखक थे राल्फ एलिसन जिनकी एक बेहतरीन कृति द इनविजिबल मैन उन्नीस सौ बावन में प्रकाशित होकर खूब चर्चित हुई थी । नस्लीय राष्ट्रवाद पर केंद्रित ये किताब जब प्रकाशित हुई थी तब अमेरिका के आलोचकों ने इसको मास्टरपीस करार दिया था । लेकिन इस उपन्यास के प्रकाशन के चालीस साल बाद तक राल्फ एलिसन अगली कृति को लिखने को लेकर संघर्ष करते रहे थे । इन चालीस वर्षों तक वो अपना एक उपन्यास फनटीन्थ लिखते रहे थे  । उस दौरान अमेरिका में राल्फ एलिसन को लेकर मजाक भी होता था कि अनिश्चित काल तक ये उपन्यास लिखा जाएगा । अपनी मृत्यु तक राल्फ एलिसन ने अपने दूसरे उपन्यास को प्रकाशित नहीं करवाया क्योंकि वो इससे संतुष्ट नहीं थे । उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवारवालों ने उनके लिखे दो हजार पृष्ठ प्रकाशक को छपने के लिए दे दिए । प्रकाशक ने उसको संपादित करके पांच सौ पन्नों का उपन्यास बना दिया । राल्फ एलिसन का उपन्यास था, जिसके बारे में साहित्य जगत में ये चर्चा थी कि इसको चालीस साल से लिखा जा रहा है और और उनकी मृत्यु भी हो चुकी थी लिहाजा किताब को लेकर पाठकों और आलोचकों में उत्सुकता थी। किताब छपी, बिकी भी खूब लेकिन इसने पाठकों को भी निराश किया और आलोचकों ने तो विनम्रता के साथ इसको खारिज ही कर दिया । इसके बाद अमेरिका में इस बात को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी कि आखिरकार राल्फ एलिसन इस किताब को क्यों नहीं छपवाना चाहते थे । राल्फ एलिसन के कुछ मित्रों ने उस वक्त ये बताया था कि वो इसके ड्राफ्ट से असंतुष्ट थे । यही हाल हिंदी में भी होता है । कई लेखक अपने जीवन काल में अपनी कुछ रचनाओं को नहीं छपवाते हैं लेकिन उनके मूर्ख वारिस चंद पैसों की लालच में उनकी कमजोर कृतियों को छपवाकर उनकी प्रतिष्ठा कम करते हैं । क्या ऐसी कुछ व्यवस्था बननी चाहिए कि जो लेखक अपनी किसी रचना को प्रकाशित नहीं करवाना चाहते हैं उसके बारे में वसीयत करके जाएं । इससे उनकी प्रतिष्ठा बची रह सकती है ।

राइटर्स ब्लॉक का दूसरा उदाहरण है द न्यूयॉर्कर में काम करनेवाले जोसेफ मिशेल का जो सालों तक दफ्तर जाते रहे लेकिन कुछ लिख नहीं पाए । उनके बारे में कहा जाता है कि उनके दफ्तर से जाने के बाद उनके मित्र डस्टबिन खंगालते थे कि किस तरह का ड्राफ्ट फाड़ कर जोसेफ मिशेल ने फेंका है । दरअसल इस राइटर्स ब्लॉस से हर लेखक का सामना होता है जब उसके सामने रचनात्मकता का संकट उत्पन्न हो जाता है लेकिन अपने को समीचीन बनाए रखने की ललक भी जोर मारती है । हिंदी के लेखक इस चुनौती को झेल नहीं पाते हैं और राइटर्स ब्लॉक पर खुद को रेलिवेंट बनाए रखने की ललक भारी पड़ जाती है और इसी ललक में कमजोर कृतियों का प्रकाशन कर अपनी प्रतिष्ठा को कम करते चले जाते हैं। रचनात्मकता के चुक जाने पर ई एम फोस्टर ने उचित ही कहा था कि वो सुबह से लेकर शाम तक कुछ नहीं करते हैं और फिर शाम को बैठकर दिनभर के अपने कामों पर लिखना शुरू कर देते हैं । यह एक लेखक की पीड़ा है लेकिन राइटर्स ब्लॉक पर सटीक टिप्पणी भी है । 

Sunday, December 13, 2015

कविता में इमरजेंसी जैसे हालात

इन दिनों पूरे देश में साहित्य उत्सवों की धूम है, दिल्ली से लेकर पटना तक, बंगलुरू से लेकर मुंबई तक । दरअसल हर साल दिसंबर  से लेकर फरवरी तक ज्यादातर साहित्यक मेलों का आयोजन होता हैं । इन साहित्यक आयोजनों में विवादों को सायास उठाया जाने लगा है बावजूद इसके कुछ आयोजनों में सार्थक विमर्श भी होते हैं । साहित्यक प्रवृतियों के बारे में वरिष्ठ लेखकों की राय सामने आती है । साहित्य पर मौजूदा या आसन्न खतरों पर बात की जाती है । पटना में जारी पटना पुस्तक मेला के जनसंवाद कार्यक्रम में एक सत्र था- नई सदी की कविताई । इस सत्र में युवा कवियों – राकेश रंजन, नताशा, संजय कुंदन, और स्मिता पारिख ने अपनी कविताओं का पाठ किया । लेकिन असली बात हुई कविता पाठ के बाद जब इन युवा कवियों को सुनने के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा से इस विषय पर बोलने का आग्रह किया गया । आलोक जी ने कविता को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए । उन्होंने इशारों में यह सवाल उठाया कि किस वजह से कविता आज पाठकों से दूर होती जा रही है और पाठकों को कविता की ओर लाने के लिए क्या प्रयास किए जाने चाहिए ।  इस संदर्भ में आलोक धन्वा ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिन की कविताओं और उनके मंच पर उसके पाठ करने से पैदा होनेवाले प्रभाव का उल्लेख किया । आलोक धन्वा ने रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविताओं का पाठ भी किया । उन्होंने दिनकर की मशहूर काव्य कृति रश्मिरथी के उस प्रसंग को बताया जहां कर्ण का निकट अंत आ गया था और वो शल्य से कहता है कि घोडों को तेज चलाकर उस जगह पर ले चले जहां कृष्ण और अर्जुन मौजूद हैं । कर्ण के रथ का पहिया रक्त से पंकिल जमीन में इस कदर फंसा गया कि वो कर्ण के निकाले भी नहीं निकल रहा था । अपनी काव्य कृति रश्मि रथी में दिनकर इस स्थिति को यूं कहते हैं – महि डोली/ससिल-आगार डोला/भुजा के जोर से संसार डोला/न डोला, किंतु , जो चक्का फंसा था /चला वह जा रहा नीचे धंसा था ।‘ इस स्थिति को देखते हुए युद्ध के मैदान में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यही मौका है और कर्ण का वध कर दो । अर्जुन यहां भी तर्क करने लग जाते हैं कि ये उचित नहीं होगा क्योंकि कर्ण विरथ है । कृष्ण एक बार फिर से अर्जुन को समझाते हैं जिसको दिनकर अपनी कविता में यूं वयक्त करते हैं – खड़ा है देखता क्या मौन भोले?/शरासन तान, बस, अवसर यही है/घड़ी फिर और मिलने को नहीं है/विशिख कोई गले के पार कर दे /अभी ही शत्रु का संहार कर दे ।‘ आलोक धन्वा ने कहा कि दिनकर जब इन कविताओं का पाठ करते थे तो ऐसा प्रतीत होता था कि युद्ध का वो पूरा प्रसंग पाठकों की आंखों के सामने जीवंत हो उठा है । आलोक जी भी जब दिनकर की कविताओं का पाठ कर रहे थे तो पूरे सभागार में सन्नाटा छाया था और कविता रसिक श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे । आलोत धन्वा का मानना था कि जब कविताएं कवियों से सुनी जाती हैं तो उलका एक अलग प्रभाव पाठकों के मन पर पड़ता है । कविता पाठकों को अपने साथ बहाने लग जाती है । उनके मुताबिक कवि और कविता को पाठकों के साथ सीधे संवाद करना चाहिए और यह कविता पाठ से ही संभव है । अपनी बात को मजबूती देने के लिए आलोक धन्वा ने हरिवंश राय बच्चन, जयशंकर प्रसाद आदि की कविताओं को उद्धृत किया । बच्चन की कविताओं की लोकप्रियता की वजह भी उनका पाठ था । आलोक धन्वा के पहले मुंबई की कवयित्री स्मिता पारिख के संग्रह – नज्मे इंतजार की – का विमोचन करते हुए हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में से एक केदारनाथ सिंह ने भी कुछ इसी तरह की बात की थी । केदार जी ने कहा कि कविता लिखे से ज्यादा पढ़े जाने की चीज है । पहले तो वहां मौजूद दर्शकों को लगा कि केदार जी पता नहीं क्या कहना चाह रहे हैं लेकिन बाद में उन्होंने साफ किया कि कवि के लिए कविता लिखना जितना महत्वपूर्ण है पाठकों के लिए उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कवि उन कविताओं का पाठ करे । उन्होंने कहा कि स्मिता की कविताएं मंचों पर पढ़ी जानी चाहिए ।

कविता को लेकर कई वरिष्ठ कवियों और लेखकों ने चिंताएं व्यक्त की हैं । कवि नरेश सक्सेना ने भी कुछ दिनों पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि एक छोटी लाइन और एक बड़ी लाइन लिखकर लोग समझते हैं कि वो कवि हो गए हैं । उनके मुताबिक इस तरह की कविताओं ने छंदशास्त्र को भी निगेट किया । इसी तरह की बात कई वरिष्ठ कवि लेखक अलग अलग मंचों पर अलग अलग तरीके से कह चुके हैं । इन कवियों की चिंताओं के केंद्र में कविता का पाठकों से दूर होते जाना है । केदार नाथ सिंह जब यह कहते हैं कि कविता लिखे से ज्यादा पढे जाने की चीज है तो वो मंच से कविता पाठ की वकालत करते हुए नजर आते हैं । मंच से कविता पाठ की संस्कृति का लगभग खत्म हो जाने का हिंदी कविता को बहुत नुकसान हुआ । साठ के अंतिम वर्षों या सत्तर के दशक की शुरुआत के बाद मंच पर कविता पाठ करनेवालों कवियों को मंचीय कवि कहकर हेय दृष्टि से देखे जाने की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा । इसका नतीजा यह हुआ कि बड़े पैमाने पर आयोजित किए जानेवाले कवि सम्मेलनों में बड़े कवियों ने जाना पहले कम किया और फिर बंद कर दिया । क्योंकि माहौल ही ऐसा बना दिया गया कि जो मंच पर कविता पाठ करेगा उसको प्रतिष्ठा नहीं मिल सकती है । इस प्रचार से कुछ तुकबंदी करनेवाले कवियों की पौ बारह हो गई । संजीदगी से कविताई करनेवाले नेपथ्य में चले गए और कविता के नाम पर चुटकुले सुनानेवाले बढ़ते गए । इससे उस दुष्प्रचार को बल मिला कि मंच पर गंभीर कवि कविता पाठ नहीं करते हैं । बहुत दिन नहीं बीते हैं जब हिदी की साहित्यक पत्रिका पाखी में मंचीय कवि कुमार विश्वास का एक साक्षात्कार छपा था तो कविता के मठधीशों और उनके चेलों ने बवाल खड़ा कर दिया था । कुमार को और पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज को इस बावत सफाई देनी पड़ी थी । कुमार ने तो बेहद तल्ख अंदाज में अपनी बात रखी और साहित्यक लॉबियों पर सवाल खड़ा कर दिया । यह ठीक है कि कुमार कई बार तुकबंदियां करते हैं लेकिन उनकी कविताओं ने हिंदी कविता को एक नया पाठक वर्ग तो दिया ही है । हिंदी में मंचीय कवि, लुगदी साहित्य, पॉपुलर कल्चर, पॉपुलर सिनेमा आदि शब्द नकारात्मकता के साथ प्रचारित कर दिए गए । ये शब्द उस दौर में नकारात्मक हुए जिस दौर में हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता, जनवादिता का जोर चल रहा था । इस बात की गंभीरता से पड़ताल होनी चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ कि मंच पर कविता पाठ करनेवाले कवियों को मुख्यधारा का कवि नहीं माना गया, बल्कि उनके मूल्यांकन में भी भेदभाव बरता गया । दिनकर जी जैसे बड़े कवि को प्रगतिशील आलोचकों ने वो स्थान नहीं दिया जिसके वो हकदार थे । निराला के उन लेखों को सायास छुपा दिया गया जो कि उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे । निराला के कल्याण में छपे लेखों को दबा देने के पीछे की मंशा सिर्फ इतनी नजर आती है कि उनका वामपंथ की तरफ के झुकाव को उभार कर स्थापित किया जा सके  । वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र की किताब -पत्रों में समय संस्कृति- से यह बात साफ है कि निराला जी ने कल्याण पत्रिका में हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के अनुरोध पर कई लेख लिखे थे । उनको सामने आना चाहिए ।   इस तरह की हरकतों या तिकड़मों का नतीजा यह हुआ कि पाठकों के बीच कविता को लेकर एक संस्कार या पढ़ने की संस्कृति का विकास बाधित हो गया । लंबे समय तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया जिसकी वजह से कविता के नए पाठक बनने बंद हो गए । आज हिंदी में कविता की इतनी बुरी गत हो चुकी है कि कोई भी प्रकाशक कविता संग्रह छापने में रुचि नहीं दिखाता है । वरिष्ठ कवियों को भी इस दिक्तत का सामना करना पड़ता है युवाओं की तो बात ही छोड़ दीजिए । कवियों को पैसे देकर अपनी किताबें छपवानी पड़ रही हैं । अब जब कविता को लेकर साहित्य में इमरजेंसी जैसे हालात हो गए हैं तो वरिष्ठ जनों का ध्यान इस ओर गया है जो कि साहित्य में कविता की वापसी के लिए किए जा रहे प्रयत्नों के संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए । लेकिन वरिष्ठ कवियों का इतना कहना भर ही काफी नहीं है उनको मंचों पर जाकर अपनी कविताओं का पाठ कर पाठकों को कविता की ओर वापस लाने का भागीरथ प्रयास करना होगा । अगर वो इस तरह की पहल करते हैं तो युवा कवियों को भी बल मिलेगा और संभव है कि साहित्य में कविता की वापसी हो जाए ।