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Wednesday, October 14, 2026

दिल्लगी ने दी हवा


गोवा में आयोजित होनेवाले भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कुछ वर्षों पूर्व एक सत्र के दौरान करण जौहर ने कहा था कि पहले फिल्मों में दो-तीन प्रकार की कहानियां ही दर्शकों को पसंद आती थीं। अगर मुझे ठीक याद आ रहा है तो करण ने कहा था कि एक तो खोया पाया का फार्मूला और दूसरा प्रेम त्रिकोण वाली कहानी को दर्शक खूब पसंद करते हैं। करण जौहर के उस वक्तव्य के बाद वहां उपस्थित फिल्म इतिहासकारों से इसपर चर्चा भी हुई थी। उस चर्चा में फिल्म दोस्ताना नहीं आई थी। फिल्म दोस्ताना करण जौहर के पिता यश जौहर की फिल्म है। इस फिल्म की कहनी भी प्रेम त्रिकोण ही है। विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शत्रुघ्न सिन्हा) दो दोस्त हैं जिनको शीतल (जीनत अमान) से प्यार हो जाता है। रवि बिंदास अंदाज में शीतल से प्यार की पींगे बढ़ाता है वहीं रवि खामोश मोहब्बत करता है। शीतल रवि को दोस्त समझती है। उसको भी रवि के प्यार का अनुमान नहीं है। रोचक तरीके से कहानी कई दिलचस्प मोड़ लेती हुआ आगे बढ़ती है। रवि और विजय दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं। कहानी के एक नाटकीय मोड़ से रवि को विजय की उसके प्रति भावना का पता चलता है। वो बेचैन हो जाता है। इस फिल्म को राज खोसला ने निर्देशित किया था। राज खोसला अपने जमाने के बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते थे। उन्होंने सलीम-जावेद की दोस्ताना की कहानी का ट्रीटमंट ऐसा किया कि दर्शकों को फिल्म भा गई। जो कहानी कई बार कही जा चुकी थी उसको दर्शकों का खूब प्यार मिला। 1980 में रिलीज हिट फिल्मों में दोस्ताना भी शामिल है। 

फिल्म दोस्ताना के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। राज खोसला ने मराठी उपन्यास आशी तुझी प्रीत पर आधारित एक हिंदी फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम था ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’। इस फिल्म के बाद राज खोसला की शराब से ऐसी दोस्ती हुई कि वो कहने लगे थे कि अब फिल्म नहीं बस स्काच के साथ जिंदगी बिताई जाएगी। ये वही दौर था जब यश जौहर फिल्मों की पब्लिसिटी और प्रबंधन से मुक्त होकर फिल्म बनाना चाह रहे थे। वो राज खोसला के पास पहुंचे और उनसे फिल्म निर्देशित करने का अनुरोध किया। पहले तो राज खोसला ने मना कर दिया लेकिन यश जौहर ने हार नहीं मानी। उनके पास सलीम-जावेद की कहानी थी। सलीम जावेद का हिंदी फिल्मों में डंका बज रहा था। एक दिन यश जौहर ने राज खोसला से आग्रह किया कि वो कहानी सुन लें। खोसला ने जब कहानी सुनी तो हां कर दी। अब कास्टिंग की बात आरंभ हुई। अमिताभ को राज खोसला ने एक फिल्म में डायरेक्ट किया था। वो तय ही थे। जीनत अमान और विनोद खन्ना भी फाइनल किए गए। राज खोसला और विनोद खन्ना ने कई फिल्में साथ की थीं। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। फिल्म दोस्ताना की रिलीज के दो साल पहले मुकद्दर का सिकंदर रिलीज हुई थी। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना दोनों की दमदार उपस्थिति थी। विनोद खन्ना अपेक्षाकृत अधिक खूबसूरत थे। सब तय हो गया था। कहानी में राज खोसला ने कुछ बदलाव बताए जिसको सलीम-जावेद ने स्वीकार कर लिया था। स्टारकास्ट भी फाइनल ही था। अचानक एक दिन राज खोसला ने कहा कि विनोद खन्ना को दोस्ताना में लेना ठीक नहीं होगा। जब उनसे कारण पूछा गया तो बोले कि नायिका विनोद खन्ना जैसे खूबसूरत हीरो को छोड़कर अमिताभ बच्चन के साथ क्यों जाएगी। यहीं से फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा के चयन का रास्ता साफ हुआ। 

1980 में रिलीज हुई फिल्म दोस्ताना को उसके गानों के लिए भी याद किया जाता है। सलीम खान कहते भी हैं कि राज कपूर के बाद राज खोसला को ही कहानी और उसमें संगीत के उपयोग की शानदार समझ थी। जिस तरह से राज कपूर संगीत को समझ कर अपनी फिल्मों में उसका उपयोग करते थे उसी तरह से राज खोसला भी अपनी फिल्मों को संगीत से बढ़ाते थे। इस गाने को याद करिए- मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया, सुना है कि तू बेवफा हो गया। आनंद बक्षी के इस गीत को मोहम्मद रफी की आवाज ने अमर कर दिया। फिल्म में कहानी के जिस मोड़ पर इस गाने का उपयोग राज खोसला ने किया वो बेहतरीन है। इसी तरह से फिल्म का आरंभ भी एक गीत से ही होता है जिसको मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने आवाज दी है। आनंद बक्षी ने लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया । गाने के बोल हैं- सलामत रहे दोस्ताना हमारा। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाए गानों में ये गाना बहुत ही अधिक पसंद किया गया या कह सकते हैं कि अब भी किया जाता है। जब करेण जौहर कह रहे थे कि प्रेम त्रिकोण वाली फिल्में भारतीय दर्शक पसंद करते हैं तो उनके जेहन में अवश्य फिल्म दोस्ताना भी रही होगी क्योंकि बहुत लंबे समय तक धर्मा प्रोडक्शन की सबसे हिट फिल्म दोस्ताना ही थी। 


Saturday, April 25, 2026

मनमोहन देसाई का जादुई सिनेमा


मनमोहन देसाई हिंदी के ऐसे फिल्मकार के तौर पर याद किए जाते हैं जिनकी फिल्मों में भरपूर मनोरंजन होता था, हास्य होता था। कई बार वो ऐसे दृष्य दिखा देते थे जो अकल्पनीय होता था। सांप्रदायिक सद्भाव दिखाने के चक्कर में फिल्म अमर अकबर एंथोनी में एक मां को उनके तीन बिछुड़े बेटे का खून एक साथ चढ़वा देते हैं। निरुपा राय (भारती) अस्पताल में भर्ती है और उनको खून की आवश्यकता है। अस्पताल में एक बेड पर वो लेटी होती हैं तीन अन्य बेड पर विनोद खन्ना(अमर), ऋषि कपूर (अकबर) और अमिताभ बच्चन (एंथोनी)। तीनों के हाथ से तीन अलग-अलग इंट्रावेनस ट्यूब से खून निकालकर एक बोतल में ले जाया जाता है। उस बोतल से एक अलग ट्यूब से निरुपा राय को खून चढ़ाया जाता है। वो ठीक होने लगती हैं और फिल्म के दर्शक मारे खुशी के उलछने लगते हैं। अब इसमें लाजिक नहीं खोजा जाता है। इस तरह के कारनामे मनमोहन देसाई ने कई फिल्मों में किया। उनसे जब पूछा जाता था तो वो कहते थे कि संदेश देने के लिए ऐसे दृष्यों का सृजन करना पड़ता है। जनता को समझने में आसानी होती है। उनकी फिल्म देशप्रेमी सबसे संतुलित और कठोर संदेश देने वाली फिल्म है। आज से करीब 44 वर्ष पूर्व जब ये फिल्म रिलीज हुई थी तो अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी लेकिन दक्षिण भारत में बहुत पसंद किया गया था। 

मनमोहन देसाई ने अपनी इस फिल्म में बेहद प्रभावशाली दृष्यों और संवादों के माध्यम से संदेश दिया था। अमिताभ बच्चन इसमें डबल रोल में थे। स्वतंत्रता सेनानी मास्टर दीनानाथ और उनके बेटे राजू की भूमिका में। मास्टर दीनानाथ को ठाकुर प्रताप सिंह (अमजद खान) के काले कारनामों को पता चलता है और  वो उसे उजागर करना चाहते हैं। ठाकुर मास्टर जी को प्रलोभन देकर रोकना चाहता है। अनिर्णय की स्थिति में मास्टर जी रातभर सो नहीं पाते हैं। इस किरदार के द्वंद्व को दिखाने के लिए फिल्मकार ने एक दृष्य रचा। दीनानाथ कमरे में बैठे सोच रहे होते हैं कि क्या करें तो अचानक उनकी निगाह स्वाधीनता सेनानी के उनके मेडल पर जाती है। वो चांद की रोशनी में चमक रहा होता है। दीनानाथ सोचते हैं कि देशभक्ति सिर्फ युद्ध के समय वीरता दिखाने से नहीं बल्कि शांति के समय ईमानदारी से समाज सेवा का कार्य करना भी है।वो ठाकुर के काले कारनामों को उजागर कर देते हैं। मास्टर दीनानाथ साहस दिखाते हैं लेकिन उनको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उनके घर को आग लगा दी जाती है उनकी बेटी और पत्नी का अपहरण कर लिया जाता है। प्रचारित कर दिया जाता है कि दोनों मर गईं। मास्टर दीनानाथ अपनी जगह छोड़कर एक बड़े स्लम भारत नगर में रहने चले जाते हैं। बेटा उनके साथ होता है। 

भारत नगर में वो अपनी नैतिकता और ईमानादरी के साथ लोगों के बीच प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। भारत नगर में भी चार छोटे-छोटे अपराधी होते हैं जो मुसलमान, पंजाबी, तमिल और बंगाली होते हैं। ये सभी अपने समुदाय के लोगों की चिंता करते हैं और एक भारतीय की तरह नहीं सोचते। मास्टर जी सबको एक करने का प्रयास करते हैं। समय ठीक गुजरने लगता है और अतीत की यादें धुंधली पड़ने लगती हैं।  इस बीच मास्टर जी का बेटा राजू खुद अपराधी बन जाता है। देश के लिए अपना संपूर्ण समय लगा देनेवाले मास्टर जी को पता ही नहीं चलता है कि उनका बेटा ठाकुर के लिए काम करने लगा है। एक समय ऐसा आता है ठाकुर उनके बेटे पर गोली चलता है और उसकी जान बचाने के लिए मास्टर जी उसके सामने आ जाते हैं। फिल्मकार ने चतुराई के साथ कई संदेश दे दिया। मास्टर दीनानाथ मरने कके पहले अपने बेटे से कहते हैं- तुम्हारी मां कोढ़ से मर गई, मगर इस भारत माता को कोढ़ मत होने देना। इसके सीने पर कोढ़ फैलानेवाले वतनफरोशों को खतम कर देना, खतम कर देना। फिल्मकार यहां कोढ़ को मेटाफर की तरह पेश करते हैं। संदेश देते हैं कि भ्रष्टाचार समाज और देश के लिए कोढ़ है। मास्टर जी जब अपनी अंतिम सांस लेते हैं और उनके मुंह से हे! राम निकलता है तो उनका बेटा राजू जोर से चिल्लाता है पिताजी। इस चिल्लाहट के साथ एक नवजात के रोने की आवाज आती है। मास्टर जी के घर तीसरी पीढ़ी का आगमन होता है। जीवन की निरंतरता का संदेश। ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने दर्शकों का मनोरंजन तो किया लेकिन देशप्रेम के हैवी डोज के साथ। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना चुका है तब भी इस फिल्म से निकलते संदेश हमें सोचने पर तो मजबूर करते ही हैं।  


Saturday, December 6, 2025

जीते हैं शान से


हिंदी फिल्मों के इतिहास में कई ऐसी फिल्में हैं जो कारोबार के हिसाब से बेहद सफल नहीं हो सकीं लेकिन कल्ट फिल्म के तौर पर याद की जाती हैं। उन फिल्मों के क्राफ्ट के कारण उनको वर्षों बाद भी याद किया जाता है। जाने भी दो यारो, मेरा नाम जोकर और लम्हे कुछ ऐसी ही फिल्में हैं जिनको आज भी बेहतरीन फिल्म के तौर पर याद किया जाता है लेकिन वो सफल फिल्मों की श्रेणी में नहीं आती। ऐसी ही एक और फिल्म है आज से 45 वर्ष पूर्व रिलीज हुई शान। फिल्म शोले की सफलता के बाद रमेश सिप्पी एक शहरी और आधुनिक कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे। ऐसी फिल्म जिसमें नायक, नायिकाएं, खलनायक सभी शहरी हों और फिल्म का वातावरण भी आधुनिक लगे। लेखक सलीम-जावेद की हिट जोड़ी उनके साथ थी। फिल्म शान की कहानी तैयार हो गई। इस कहानी में इयान फ्लेमिंग के उपन्यासों और जेम्स बांड सीरीज की फिल्मों के खलनायक ब्लोफेल्ड पर आधारित एक खलचरित्र रचा गया। शाकाल नाम का ये चरित्र गंजा है। शोले की तरह ही इस फिल्म को मल्टी स्टारर बनाने की योजना बनी। रमेश सिप्पी चाहते थे कि फिल्म शोले में काम करनेवाले अभिनेता और अभिनेत्री फिल्म शान में भी अलग अलग भूमिका करें। शाकाल की भूमिका के लिए रमेश सिप्पी पहले संजीव कुमार को चाहते थे लेकिन उनकी अन्यत्र व्यस्तता थी। धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी भी शान फिल्म के लिए समय नहीं निकाल सके तो शशि कपूर और बिंदिया गोस्वामी को भूमिकाएं दी गईं। कुछ दिनों पहले धर्मेन्द्र ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वो चाहते थे कि फिल्म शान में काम कर सकें लेकिन उनके पास डेट्स नहीं थी। जब फिल्म शोले बन रही थी तब भी गब्बर सिंह के किरदार के लिए रमेश सिप्पी की पसंद संजीव कुमार थे। इस बात का उल्लेख कई पुस्तकों में मिलता है। फिल्म शोले के रिलीज होने के दो वर्ष बाद शान का निर्माण आरंभ हो गया था। तीन वर्षों में ये फिल्म बनकर तैयार हुई। इस फिल्म पर निर्माता ने काफी खर्च किया था। ये उस समय की सबसे महंगी फिल्मों में एक थी। एक द्वीप पर फिल्म का भव्य सेट और सुनहरी चील ने दर्शकों का ध्यान खींचा था। 

आज से करीब 45 वर्ष पूर्व एक द्वीप के अंदर तकनीक के तामझाम के साथ शूट करना कठिन था। कुलभूषण खरबंदा अभिनीत किरदार शाकाल जिस कुर्सी पर बैठता था उसके सामने कई रंगों की जलती बुझती बत्तियां और कई तरह के स्विच और लीवर एक शहरी खलनायक की ऐसी छवि दर्शकों के समक्ष उपस्थित करते थे जिसके मोहपाश में बंधने की संभवना थी। अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, जीनत अमान, राखी जैसे कलाकार फिल्म को हिट कराने के लिए काफी थे। शाकाल के गुर्गों की भूमिका भी बेहतरीन अभिनेताओं को दी गई। शोले में सांभा की भूमिका निभानेवाले मैकमोहन शाकाल के साथी जगमोहन की भूमिका में थे। सितारों और भव्यता के बावजूद फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी। बाद में शान को लोगों ने पसंद किया। यह अद्भुत संयोग है कि रमेश सिप्पी की फिल्म शोले भी पहले सफल नहीं हुई लेकिन बाद के दिनों में जबरदस्त हिट रही। शान जबरदस्त हिट तो नहीं हो सकी लेकिन इसके क्राफ्ट ने इसको कल्ट फिल्म बना दिया। रमेश सिप्पी ने सलीम जावेद के लिखे किरदार शाकाल को इस तरह से पर्द पर गढ़ा कि उसका गंजापन और संवाद अदायगी दर्शकों को पसंद आई। कुलभूषण खरबंदा ने पर्दे पर शाकाल को जीवंत कर दिया। फिल्म के अंतिम दृष्य में जब उसको गोली लगती है और तो वो कहता है कि मुझे मालूम है कि मैं मरनेवाला हूं लेकिन तुमलोग भी बचोगे नहीं। ऐसा कहने के पहले शाकाल एक हैंडल को नीचे की ओर झुका देता है जिससे उसका ठिकाना धमाके में नष्ट हो जाए। कुलभूषण खरबंदा की संवाद अदायगी बढिया थी। इस फिल्म में एक गाना है यम्मा यम्मा, इसको आर डी बर्मन और मोहम्मद रफी ने साथ मिलकर गाया है। दोनों का साथ गाया ये एकमात्र गाना है। आज इस फिल्म को बने 45 वर्ष हो गए लेकिन जब भी हिंदी फिल्मों के खलनायकों की बात होती है तो शाकाल का नाम भी उसमें आता है। 

Saturday, October 11, 2025

अब न रहे वो पीने वाले...


जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान दिल्ली के सीरी फोर्ट आडिटोरियम में अमिताभ बच्चन-धर्मेन्द्र अभिनीत फिल्म शोले का रिस्टोर्ड वर्जन प्रदर्शित किया गया था। इस फिल्म को बड़े पर्दे पर बेहतर आवाज के साथ देखना एक अलग ही अनुभव था। करीब बीस वर्षों का बाद शोले फिर से देख रहा था। बड़े पर्दे पर फिल्म देखना रोमांचकारी था। फिल्म के आखिरी सीन में अमिताभ बच्चन अभिनीत पात्र जय को जब गोली लगती है तो उसके चेहरे के भाव और पीड़ा बड़े पर्दे पर इतने प्रभावी लगते हैं कि दर्शक उस पीड़ा के साथ एकाकार हो जाता है। जब जय, बसंती की मौसी के पास वीरू के रिश्ते की बात करने पहुंचता है तो उनके चेहरे की शरारत बड़े पर्दे पर इतना जीवंत दिखती है कि दर्शकों को खूब मजा आता है। सिर्फ अमिताभ ही नहीं बल्कि ठाकुर के रूप में संजीव कुमार, बसंती के रूप में हेमा मालिनी और बीरू के रूप में धर्मेंद्र की आदाकारी की प्रशंसा इस कारण मिल पाई की दर्शक बड़े पर्दे पर अभिनय की बारीकियों को महसूस कर सके थे। आज जब मोबाइल पर फिल्में देखी जाने लगी हैं तो चेहरे के उन भावों को दर्शक महसूस नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि आज अभिनय की बारीकियों पर बात नहीं होती है बल्कि कपड़ों के डिजायन से लेकर हिंसा के तरीकों पर बात होती है। हाल फिल्हाल में किसी फिल्म का कोई ऐसा सीन याद नहीं पड़ता जिसको लेकर चर्चा होती हो। उसके छायांकन को लेकर उसको फिल्माने को लेकर चर्चा बहुत ही कम होती है। एक जमाना था जब अमिताभ बच्चन की फिल्मों के दृष्यों और संवादों की चर्चा होती थी। ये चर्चा फिल्म से अलग होती थी। संवादों के आडियो कैसेट अलग से बिका करते थे। अब फिल्मों को लेकर अधिक चर्चा इसकी होती है कि कितने दिनों में 100 करोड़ का बिजनेस कर लिया। फिल्म कितने दिन में 500 करोड़ के क्लब में शामिल हो गई।

अमिताभ बच्चन ने रविवार को 83 वर्ष की आयु पूरी की। वो अब भी खूब सक्रिय हें। लोकप्रिय भी। इतनी लंबी आयु के बावजूद उनकी लोकप्रियकता क्यों कायम है, इसपर विचार किया जाना चाहिए। धर्मेन्द्र भी 90 वर्ष की आयु को छूने वाले हैं। वो भी इंटरनेट् मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। अपने फार्म हाउस से वीडियो पोस्ट करते रहते हैं। उनके वीडियो भी लोग खूब पसंद करते हैं। कभी शायरी सुनाते हैं, कभी अपनी तन्हाई को लेकर कमेंट करते नजर आते हैं। कई बार खेतों में घूमते उनके वीडियो भी दिख जाते हैं। इन दो अभिनेताओं के अलावा रेखा जब भी किसी अवार्ड शो में आती हैं या परफार्म करती हैं तो उसका वीडियो खूब प्रचलित होता है। लोग वीडियो को पोस्ट और रीपोस्ट करते हैं, अपनी टिप्पणियों के साथ। अमिताभ बच्चन, धर्मन्द्र, रेखा, हेमा मालिनी और बहुत हद तक देखें तो माधुरी दीक्षित की लोकप्रियता में बड़े पर्द का बड़ा योगदान है। शोले के अलावा भी याद करिए दीवार और जंजीर में अमिताभ बच्चन की अदायगी। फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच का चर्चित संवाद, मेरे पास गाड़ी है बंगला है... और जब शशि कपूर इसके उत्तर में कहते हैं मेरे पास मां है तो पूरा हाल तालियों से गूंज उठता है। आज भी इस संवाद की चर्चा होती है। गाहे बगाहे सुनने को मिल जाता है। इसका कारण ये है कि लोगों ने बड़े पर्दे पर इस संवाद को घटित होते देखा है। दोनों अभिनेताओं के चेहरे के भाव को पढ़ा है। उसको महसूस किया है। अभिनय की गहराई ने लोगों को प्रभावित किया। इस कारण यह संवाद लगभग कालजयी हो गया। फिल्म से जुड़े शोधार्थियों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि डायलाग डिलीवरी और अभिनय के अलावा इसका बड़े पर्द पर आना भी एक कारण रहा है।

इस पीढ़ी के बाद भी अगर विचार किया जाए तो जितने भी अभिनेता और अभिनेत्री लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं वो कहीं न कहीं बड़े पर्द पर यादगार भूमिका कर चुके हैं। श्रीदेवी की फिल्में तोहफा, मवाली, जस्टिस चौधरी क्या ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज होकर इतनी सफल हो पाती। क्या तेजाब फिल्म में माधुरी दीक्षित के नृत्य का आनंद छोटी स्क्रीन पर लिया जा सकता है?  आज छोटी स्क्रीन के जमाने में जब लोग मोबाइल या पैड पर फिल्में देख रहे हैं तो दर्शक अभिनय की बारीकियों को पकड़ नहीं पाता है। वो कहानी  की रफ्तार के साथ तेज गति से चलने में ही रोमांचित महसूस करता है। इसलिए फिल्मों की स्पीड पर चर्चा होती है उसके ठहराव पर नहीं। कुछ फिल्म समीक्षक तो अपनी फिल्म समीक्षा में फिल्मों के स्लो होने की बात करते हैं, यहां तक लिख देते हैं कि कहानी धीमी गति से चलती है। कहानी कही कैसे गई है इसपर बहुत कम चर्चा होती है। शाह रुख खान, आमिर खान भी अगर सुपर स्टार बने तो बड़े पर्दे पर उनकी फिल्मों की लोकप्रियता के कारण। आज भी जिन फिल्मों को दर्शक बड़े पर्दे पर पसंद करते है उनके ही अभिनय की प्रशंसा होती है, लोकप्रियता भी उनको ही मिलती है। कुछ वेब सीरीज के अभिनेता या कलाकार इसके अपवाद हो सकते हैं लेकिन उनका संवाद या उनका अभिनय कालजयी साबित होगा इसका आकलन होना अभी शेष है। इतने वेब सीरीज आते हैं, बताया जाता है कि युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय भी हैं लेकिन कुछ ही समय बाद दर्शकों के मानस से ओझल भी हो जाते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सिनेमा को सिनेमा हाल तक वापस लेकर चला जाए। आज महानगरों में सिनेमा हाल हैं, लेकिन टिकट इतने महंगे हैं कि वहां तक जाने के लिए आम लोगों को सोचना पड़ता है। छोटे शहरों में सिंगल स्क्रीन सिन्मा हाल बंद हो गए हैं। लोगों के पास सिनेमा हाल का विकल्प ही नहीं है। लोगों को छोटे स्क्रीन पर फिल्म देखने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मुझे याद है कि जब हम कालेज में थे भागलपुर में छह या सात सिनेमा हाल हुआ करते थे लेकिन अब वहां एक मल्टीप्लैक्स है। सारे सिंगल स्क्रीन सिनेमा हाल बंद हो गए। किसी में शापिंग कांपलैक्स खुल गया। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार सिंगल स्कीन सिनेमाघर को लेकर कोई नीति बनाए। इसमें कर में कुछ वर्षों की छूट हो सकती है। सस्ते दर पर सिनेमा हाल बनाने के लिए ऋण की व्यवस्था हो सकती है। साथ ही इस प्रकार की व्यवस्था करनी चाहिए कि टिकट दर दर्शकों की पहुंच में रहे। ये बार बार साबित भी हो चुका है कि जब जब निर्माताओं और सिनेमा हाल मालिकों ने टिकट की दरों में कटौती की है दर्शक सिनेमा हाल तक लौटे हैं। अगर दर्शक सिनेमा हाल तक लौटते हैं तो अभिव्यक्ति के इस सबसे सशक्त माध्यम को बल मिलेगा और फिर कोई सदी का महानायक बनने की राह पर चल निकलेगा। अभी तो फिल्मों के हाल पर हरिवंश राय बच्चन जी की एक पंक्ति याद आती है- अब न रहे वो पीनेवाले अब न रही वो मधुशाला ।  

Monday, January 20, 2025

सशक्त कहानी, दमदार अभिनय


फिल्म दीवार ने अमिताभ बच्चन की एंग्री यंगमैन की छवि को मजबूती प्रदान की। साथ ही एक लेखक जोड़ी को भी स्थापित किया जिसकी कहानी सफलता की गारंटी मानी गई। सलीम जावेद की जोड़ी ने जब फिल्म दीवार की कहानी लिखी तो पहले अमिताभ बच्चन को ही सुनाई। अमिताभ उस समय फिल्म गर्दिश की शूटिंग कर रहे थे। सलीम-जावेद ने फिल्म के सेट पर ही कहानी सुनाई थी। अमिताभ कहानी सुनकर अभिभूत थे। तीनों ने मिलकर तय किया कि इसपर फिल्म बनाने के लिए यश चोपड़ा से संपर्क किया जाए। सलीम-जावेद और अमिताभ, यश चोपड़ा के पाली हिल, बांद्रा के घर गिरनार अपार्टमेंट पहुंचे। इसी अपार्टमेंट में पहली बार यश चोपड़ा ने दीवार की कहानी सुनी। नैरेशन के समय निर्माता गुलशन राय भी थे। इस बात का उल्लेख मिलता है कि कहानी सुनाते सुनाते जावेद साहब अचानक रुकते और कहते कि फिल्म कम से कम 25 सप्ताह चलेगी। कहानी फिर आगे बढ़ती और जब रुकते तो सलीम साहब कहते कि इसपर बनी फिल्म कम से कम 50 सप्ताह चलेगी। इनकी बात सच हुई और कई शहरों में तो दीवार फिल्म 100 से भी अधिक समय तक चली थी। कहानी सुनने के बाद यश चोपड़ा और गुलशन राय दोनों को लगा था कि स्टोरी बहुत रूखी है और फिल्म में गाने होने चाहिए। निर्माता की राय पर फिल्म में गाने डाले गए। आप ध्यान से फिल्म देखेंगे तो लगेगा कि इन गानों की आवश्यकता नहीं थी। इंटरवल के बाद शशि कपूर और नीतू सिंह का जो गीत है उसका लाजिक समझ में नहीं आता है।  

निर्माता और निर्देशक के तय होने के बाद अभिनेताओं  के चयन पर बात आरंभ हुई । सलीम जावेद ने लीड रोल के लिए अमिताभ का नाम सुझाया। निर्माता गुलशन राय चाहते थे कि राजेश खन्ना को लिया जाए। वो एक फिल्म के लिए साइन खन्ना को अग्रिम भुगतान कर चुके थे। वो अपने पैसे की चिंता कर रहे थे। सलीम-जावेद इसपर राजी नहीं हुए। भूमिका अमिताभ को मिली। उनके भाई रवि की भूमिका के लिए लेखकों ने ही शशि कपूर को तैयार किया। स्क्रिप्ट सुनने के बाद शशि तैयार हो गए। उनकी भूमिका छोटी पर सशक्त थी। उनके बोले गए संवाद दर्शकों को खूब पसंद आए। संवाद की बात हो रही है तो कहना न होगा कि फिल्म दीवार का संवाद हिंदी फिल्मों में संवाद लेखन का शीर्ष है। इसके छोटे छोटे टुकड़े कई बार अब भी दोहराए जाते हैं। मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता, मेरे पास मां है, या निरूपा राय का शशि कपूर को ये कहना कि भगवान करे कि गोली चलाते समय तुम्हारे हाथ नहीं कांपे जैसे संवाद बहुत ही पावरफुल हैं। ये फिल्म दर्शकों को मानसिक तौर पर झकझोरती है। जब एक बच्चे के हाथ पर ‘मेरा बाप चोर है’ लिख दिया जाता है तो उस बच्चे की मानसिक स्थिति की कल्पना की जा सकती है। फिल्म दीवार की कहानी में मदर इंडिया और गंगा जमुना का मिला जुला प्लाट नजर आते है लेकिन सलीम जावेद ने जिस तरह से कहानी का ट्रीटमेंट किया है वो इसको एकदम ही अलग जमीन पर लाकर खड़ा कर देता है। 

फिल्म दीवार के रिलीज होने के बाद ये प्रचारित किया गया था कि ये मुंबई के अंडरवर्ल्ड डान हाजी मस्तान के जीवन से प्रेरित है। समानता है भी। हाजी मस्तान ने भी मझगांव डाकयार्ड में कुली के तौर पर जीवन शुरु किया था। उसने भी वहां पठान गैंग की दादागीरी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। फिल्म दीवार में भी विजय यही करता है। फिल्म दीवार के रिलीज होने के दौर को भी याद करना चाहिए। उस समय देश में छात्रों और युवाओं का असंतोष चरम पर था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश का असंतुष्ट युवा आंदोलनरत था। फिल्म में भी उस वक्त के युवा वर्ग का सिस्टम के प्रति गुस्सा और अपने बूते पर ही सब करना होगा की मानसिकता का प्रतिबिंब नजर आता है। इस कारण जब फिल्म रिलीज हुई तो युवाओं को उसमें अपनी कहानी नजर आई । वो इससे जुड़ते चले गए। फिल्म के अंत में कानून, न्याय और सत्य की जीत दिखाकर नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया गया है।कुल मिलाकर अगर फिल्म के रिलीज होने के 50 वर्ष बाद आज विचार करें तो यही लगता है कि पावरफुल कहानी, सही स्टारकास्ट और यश चोपड़ा जैसे मंझे हुए निर्देशक के बदौलत ये कल्ट फिल्म बन गई। एक निर्देशक के तौर पर यश चोपड़ा को भी इस फिल्म से एक नई पहचान मिली, अमिताभ तो स्थापित हो ही गए।    


Sunday, August 18, 2024

कितने आदमी थे...


शोले जो भड़क न सका। करीब चार दशक पहले पढ़ा ये शीर्षक दिमाग पर इस कदर अंकित हो गया कि वर्षों बाद आज भी स्मृति में बना हुआ है। जब भी फिल्म शोले देखता हूं या इससे जुड़ी कोई चर्चा होती है तो ये शीर्षक कौंध जाता है। स्कूल में था, फिल्मों में रुचि थी। उसी समय फिल्म शोले पर एक समीक्षानुमा लेख देखा था। उसमें ये बताया गया था कि शोले फिल्म सफल नहीं हो सकी। बाद में शोले ने सफलता का इतिहास रच दिया। 15 अगस्त 1975 को शोले फिल्म के प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे हुए। एक बार फिर से इस शीर्षक की याद आई। इसी समय पता चला कि सलीम खान और जावेद अख्तर एक बार फिर से साथ आ रहे हैं। सलीम-जावेद की जोड़ी पर प्राइम वीडियो पर तीन पार्ट में एक डाक्यूमेंट्री आ रही है। ये सलीम जावेद की जोड़ी ही थी जिसने हिंदी सिनेमा के एंग्री यंगमैन को गढ़ा था। शोले फिल्म की कहानी और पटकथा सलीम- जावेद की है। जिसके प्रदर्शन पर लिखा गया था कि शोले जो भड़क न सका वो शोले ऐसा भड़का कि मुंबई (तब बांबे) के मिनर्वा सिनेमा हाल में लगातार पांच वर्षों तक दिखाई जाती रही। उस दौरे को जिसने देखा है उनका कहना है कि दो साल तो मिनर्वा के बाहर तक टिकट लेनेवालों की लाइनें लगा करती थी। इतना ही नहीं दिल्ली के प्लाजा सिनेमा में फिल्म देखने के लिए दूर दूर से लोग थे। पंजाब के दर्शकों को दिल्ली लाने के लिए चलनेवाली बस का नाम ही शोले एक्सप्रेस रख दिया गया था। 

यह बात सही है कि शोले फिल्म ने अपने प्रदर्शन के पहले सप्ताह में अच्छा बिजनेस नहीं किया था। रिव्यू भी अच्छे नहीं थे। तब फिल्मों के कारोबार के बारे में बताने वाली फिल्म पत्रिका द ट्रेड गाइड में सलीम-जावेद ने अपने नाम से एक विज्ञापन देकर भविष्यवाणी की थी। उन्होंने विज्ञापन में दावा किया था कि फिल्म हर वितरण के लिहाज से बनाए गए हर क्षेत्र में ये फिल्म एक करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करेगी। ये इनका आत्मविश्वास था। इसी तरह से इन दोनों से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है। एक फिल्म प्रदर्शित होनेवाली थी। फिल्म के पटकथा लेखक सलीम-जावेद ने निर्माताओं से कहा कि पोस्टर पर उनका भी नाम होना चाहिए। निर्माता नहीं माने। पूरे मुंबई में फिल्म के पोस्टर लग गए। सलीम-जावेद ने तय किया शहर के हर पोस्टर पर अपना नाम लिखवाएंगे। रातों रात उन्होंने कुछ पेंटर्स से संपर्क किया। अगले दिन अधिकतर पोस्टर्स पर सलीम जावेद का नाम लिखा था। परिणाम ये हुआ कि भविष्य में निर्माता पोस्टर पर पटकथा लेखक के तौर पर इस जोड़ी का नाम लिखने लगे। सलीम-जावेद की जोड़ी ने जिस तरह के संवाद लिखे वो भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। चाहे फिल्म दीवार में अमिताभ और शशि कपूर के बीच का संवाद- आज मेरे पास बिल्डिंग है,प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है? उत्तर मिलता है- मेरे पास मां है। या फिल्म शोले में अमिताभ का ये पूछना कि तुम्हारा नाम क्या है बसंती अथवा गब्बर का ये कहना कि अरे ओ साभां, कितने आदमी थे। शोले के तो कई संवाद बेहद लोकप्रिय हुए, अब भी गाहे बगाहे लोग दोहराते हैं। संवाद के कैसेट तक बिके थे। सलीम-जावेद कि संवाद की एक और विशेषता है कि वो अश्लील या द्विअर्थी नहीं होते हैं। शोले में जब गब्बर बसंती को देखकर कहता है कि- अरे ओ साभां, ये रामगढ़ वाले अपनी बेटियों को कौन सी चक्की का आटा खिलाते हैं रे, जरा दारी के हाथ पांव देख, बहुत करारे हैं। इस संवाद पर तालियां बजी थीं किसी को गुस्सा नहीं आया था। सलीम जावेद एक कथा में कई उपकथा यानि कहानी के भीतर कहानी की कला में पारंगत हैं। शोले की कथा में कई गैप हैं लेकिन उन गैप्स को उपकथाएं भर देती हैं और दर्शक मनोरंजन की सपनीली दुनिया में चला जाता है। 


Saturday, December 17, 2022

समग्रता में प्रश्न उठाने से चूके बच्चन


कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह का मंच सजा था। मंच पर बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अलावा सुपरस्टार अमिताभ बच्चन, शाह रुख खान, अभिनेत्री रानी मुखर्जी, निर्देशक महेश भट्ट, पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली समेत अन्य फिल्मी सितारे बैठे थे। भव्य आयोजन था। इन दिनों शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान को लेकर चर्चा में हैं। उनकी फिल्म के एक गाने बेशरम रंग में नायिका दीपिका पादुकोण के वस्त्र के रंग पर विवाद है। ट्विटर पर बायकाट पठान हैशटैग बेहद प्रचलित होकर कई घंटों तक ट्रेंड हो चुका है। भारतीय फिल्मों के संवाद और फिल्मांकन को लेकर इस वर्ष विवाद उठते रहे हैं। सबको उम्मीद थी कि शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान पर उठे विवाद पर अवश्य बोलेंगे। वो बोले भी। उन्होंने इंटरनेट मीडिया की नकारात्मकता को रेखांकित किया। अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि कोई कुछ भी कर ले लेकिन आप और हम सब जिंदा हैं। शाह रुख से इस तरह की बात की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन जब बच्चन साहब मंच पर आए तो उन्होंने सेंसरशिप, मानवाधिकार, काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद, मोरल पुलिसिंग आदि पर बात करके सबको चौंका दिया। 

अमिताभ बच्चन के बोलने के पहले उनकी पत्नी और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा की सदस्य जया बच्चन ने बेहद संक्षिप्त वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि उनको पता है कि बच्चन साहब पिछले तीन साल से जिन बातों पर मंथन कर रहे हैं या जो बातें सोच रहे हैं उसको आज सबके सामने रखनेवाले हैं। इतना कहने के बाद जया बच्चन ने ममता बनर्जी की ओर देखकर कहा कि वो हमेशा उनके साथ हैं। ये बताने के पीछे उद्देश्य सिर्फ इतना है कि अमिताभ बच्चन ने बहुत सोच समझकर अपनी बातें कोलकाता इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल के मंच से कही। बच्चन साहब को कई बार सुनने का अवसर मिला है। लेकिन जिस तरह से कोलकाता में वो लिखित भाषण पढ़ रहे थे वो उनके पूर्व की भाषण शैली से अलग था। ऐसा लग रहा था कि उनका भाषण श्रमपूर्वक तैयार किया गया था, जिसमें शब्दों के चयन को लेकर सावधानी बरती गई थी। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के सेंसरशिप पर बात की। स्वाधीनता पूर्व किस तरह से भारतीय फिल्मकारों को प्रताड़ित किया जाता था, विस्तार से उसकी क्रोनोलाजी बताई। सेंसरशिप पर क्रोनोलाजी बताते हुए वो भारत की स्वाधीनता तक पहुंचे। बताया कि 1952 में सिनेमेटोग्राफी एक्ट बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने जो कहा उसपर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज भी नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। ये कहने के क्रम में उन्होंने कहा कि मंच पर बैठे महानुभाव उनकी बात से सहमत होंगे। इसके बाद बच्चन साहब फिल्मों के कंटेंट पर चले गए और उसकी विविधता का कालखंड गिना दिया। कंटेंट की विविधता की बात करते हुए काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद और मोरल पुलिसिंग पर जा पहुंचे।

बच्चन साहब को आज देश में नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े होते हुए दिख रहे हैं। लेकिन जब वो स्वाधीनता के बाद के परिदृष्य पर पहुंचे तो उससके बाद वो फिल्मों के विषयों पर चले गए। स्वाधीन देश में फिल्मकारों पर लगाई जानेवाली पाबंदियों पर बोलने से बचकर निकल गए। भारत में जब फिल्मों के सेंसरशिप पर बात होगी और जब उसकी क्रोनोलाजी बताई जाएगी तो क्या इमरजेंसी के दौर में हुई ज्यादतियों पर बात नहीं होगी? क्या जब नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात होगी तो इमरजेंसी के दौर में हुई घटनाओं से बचकर निकला जा सकता है? बच्चन साहब ने देश की आजादी के पहले के दौर की फिल्म भक्त विदुर पर अंग्रेजों की पाबंदी पर विस्तार से बताया कि कैसे और किन दृष्यों की वजह से उस फिल्म को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। बच्चन साहब ने वी शांताराम की फिल्म स्वराज्य पर लगी पाबंदी के कारणों को गिनाया। ये भी बताया कि किस तरह से दबाव डालकर इस फिल्म का नाम बदलकर उदय काल करवाया गया था। इसके बाद वो आज के नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों की बात करने लगे। क्या पिछले तीन साल से इन विषयों पर मंथन करनेवाले अमिताभ बच्चन को फिल्म आंधी और उसके निर्माताओं के साथ जो हुआ उसकी याद नहीं आई। किस तरह से फिल्म आंधी की रील को मुंबई के स्टूडियो से उठाकर नष्ट करवा दिया गया था। किस तरह से इमरजेंसी के दौरान देवानंद को धमकाया गया था, किशोर कुमार के गानों के आकाशवाणी पर बजाए जाने पर प्रतिबंध लगाया गया था। नेहरू के खिलाफ लिखने पर किस तरह से मजरूह सुल्तानपुरी को प्रताड़ित किया गया था। 

अगर हम नागरिक स्वतंत्रता की बात करें तो स्वाधीनता के बाद क्या पहली बार अब नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है? क्या पहली बार मानवाधिकार की हनन हो रहा है। अमिताभ बच्चन जिस बंगाल की जमीन पर खड़े होकर मानवाधिकार और नागरिकता स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह की बात कर रहे थे उसी जमीन पर 1967 से लेकर 1972 तक  क्या हुआ था। इसकी याद उनको नहीं आई। अमिताभ बच्चन तो 1912 तक चले गए थे लेकिन उनको 1970 की याद नहीं आई जब बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त कांग्रेस की सरकार ने औपनिवेशिक काल के बंगाल सप्रेशन आफ टेररिस्ट आउटरेजस एक्ट 1932 को लागू कर दिया था। तब नागरिक स्वतंत्रता का हनन हुआ था। ऐसे कई उदाहरण हैं जो अमिताभ बच्चन को याद नहीं आए। बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद किस तरह की घटनाएं हुईं वो पूरी दुनिया को पता हैं। क्या उसमें किसी प्रकार का मानवाधिकार हनन हुआ था। अमिताभ बच्चन को शायद पता हो। 

अमिताभ 1984 में लोकसभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। कुछ वर्षों के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी थी। तब से अबतक वो विवादित मुद्दों से बचते रहे थे। उनकी पत्नी जया बच्चन गाहे-बगाहे राजनीतिक बयान देकर विवादों में घिरती रही हैं लेकिन अमिताभ इससे अलग रहते हैं। अमिताभ बच्चन के राजनीति से दूर रहने की वजह से एक प्रतिष्ठा रही है। जब उनको दादा साहब फाल्के अवार्ड देने कि घोषणा की गई थी तो वो पुरस्कार ग्रहण के लिए विज्ञान भवन के समारोह में नहीं आए थे। उनके लिए सरकार ने अलग से राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार अर्पण समारोह आयोजित किया था। तब भी किसी ने समानता के सिद्धांत का प्रश्न नहीं उठाया था। इस तरह के न जाने कितने प्रश्न हैं जो अमिताभ बच्चन की वरिष्ठता को ध्यान में रखकर कभी नहीं उठे। जया बच्चन का फिल्म समारोह के मंच से ममता बनर्जी को उनके साथ रहने का आश्वसान देना और उसके बाद अमिताभ बच्चन का सधे हुए अंदाज में परोक्ष रूप से राजनीतिक भाषण देना क्या संकेत करता है। अमिताभ बच्चन ने जिस दिन ये बोला उसके एक या दो दिन पहले केरल के फिल्मकार अदूर गोपालकृष्णन ने भी सुपर सेंसरशिप का मुद्दा उठाया था। उन्होंने भी कहा था कि सरकारी सेंसर के बाद इंटरनेट मीडिया का अदृष्य इकोसिस्टम फिल्मों को सेंसर करता है। ऐसा करनेवाले लोग असामाजिक हैं। क्या अदूर और अमिताभ बच्चन के बयानों में लगभग समानता एक संयोग है या फिर प्रयोग है। ये तो आनेवाले दिनों में ही स्ष्ट हो पाएगा। लेकिन इतना तय है कि अमिताभ बच्चन जैसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ कलाकार को किसी भी कलामंच से इस तरह की बातें करने के पहले काफी सोच विचार करना चाहिए। उनके कहे गए शब्दों के क्या मायने निकाले जाएंगे और उसका असर कितना गहरा होगा। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर उसको कैसे विश्लेषित किया जाएगा, आदि। प्रतीत होता है कि अमिताभ बच्चन ने अपने वक्तव्य के शब्दों के बारे में गंभीरता से मंथन नहीं किया। 

Saturday, January 1, 2022

रचनात्मकता से भरपूर होगा नववर्ष


नववर्ष 2022। हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत को इस वर्ष से बहुत उम्मीदें हैं। समकालीन साहित्यिक और प्रकाशन परिदृश्य से जिस तरह का समाचार प्राप्त हो रहा है वो बेहद उत्साहजनक है। इस समय हिंदी साहित्य में कई पीढ़ियां एक साथ सृजनरत हैं। एक तरफ रामदरश मिश्र और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे बुजुर्ग लेखक हैं तो दूसरी तरफ नवीन चौधरी और भगवंत अनमोल जैसे युवा लेखक अपनी रचनाशीलता से हिंदी साहित्य जगत की रचनात्मकता को जीवंत रखे हुए हैं। इनके बीच में यतीन्द्र मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, रजनी गुप्त, रत्नेश्वर और संजय कुंदन की पीढ़ी के लेखक भी लगातार लिख रहे हैं। मैत्रेयी पुष्पा और उषाकिरण खान की भी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। हिंदी साहित्य की रचनाशीलता के हिसाब से ये वर्ष बेहद आश्वस्तिकारक लग रहा है। वाणी प्रकाशन से वरिष्ठ लेखिका पुष्पा भारती की एक महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन इस वर्ष होगा जिसका नाम है अमिताभ बच्चन एक जीवनगाथा। पुष्पा भारती हिंदी की समर्थ लेखिका और धर्मवीर भारती की पत्नी हैं। धर्मवीर भारती और हरिवंशराय बच्चन के परिवार में निकटता रही है। पुष्पा भारती ने अमिताभ बच्चन के संघर्ष और सफलता को बहुत करीब से देखा है। उनके इस पुस्तक की साहित्य जगत को उत्सुकता से प्रतीक्षा है। हिंदी फिल्मों से जुड़े एक और व्यक्तित्व पर पुस्तक इस वर्ष प्रकाशित होगी। गीतकार, पटकथा लेखक और निर्देशक गुलजार के जीवन पर यतीन्द्र मिश्र की बहुप्रतीक्षित पुस्तक का प्रकाशन भी वाणी प्रकाशन से ही होगा। यतीन्द्र मिश्र ने हिंदी में पुस्तक लेखन की एक शैली विकसित की है जिसमें वो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से लंब समय तक बातचीत रिकार्ड करते हैं फिर उसके आधार पर पुस्तक लिखते हैं। गुलजार से भी यतीन्द्र पिछले 15 साल से उनके जीवन और फिल्मों पर बातचीत रिकार्ड कर रहे थे। पिछले दो साल से वो इसको पुस्तक का स्वरूप देने में लगे थे। अब इस वर्ष उसका प्रकाशन होता दिख रहा है। यतीन्द्र मिश्र के मुताबिक इस पुस्तक में गुलजार और उनकी कला के बारे में, उनके कवि रूप के बारे में पाठकों को कई नई जानकारियां मिलेंगी। गुलजार ने जो फिल्में बनाई हैं या जो गीत लिखे हैं उसमें उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं। यतीन्द्र ने उन प्रयोगों को अपनी इस पुस्तक में संजोया है। 

इक्कसवीं शताब्दी के आरंभ में हिंदी में कई महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुए थे। इसमें मैत्रेयी पुष्पा का अल्मा कबूतरी, चित्रा मुद्गल का आवां, असगर वजाहत का कैसी आगी लगाई आदि प्रमुख हैं। उसके बाद भी उपन्यासों का प्रकाशन होता रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उपन्यास लेखन कम हुआ। नई वाली हिंदी के सत्य व्यास ने अपने उपन्यासों से हिंदी साहित्य जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप किया। लेकिन लंबे समय तक याद रखे जानेवाले उपन्यासों की कमी को आलोचक लगातार रेखांकित करते रहे। इस वर्ष कई महत्वपूर्ण उपन्यास आनेवाले हैं। एक तो चित्रा मुदगल का उपन्यास नकटौरा जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाश्य है। लड़के के विवाह के लिए जब घर के पुरुष बारात चले जाते थे तो उस रात को घर की स्त्रियां नकटौरा आयोजित करती थीं। इसमें पास पड़ोस की स्त्रियां भी शामिल होती थीं। इसमें स्त्रियां एक तरह से स्वांग रचाती थीं और अपने मन की बातें किया करती थीं। कुछ महिलाएं, पुरुष का वेश बनाकर संवाद किया करती थीं। इसमें स्त्रियां उन प्रसंगों की चर्चा भी करती थीं जो आमतौर पर वो नहीं करती थीं। गाली से लेकर स्त्री पुरुष संबंध भी नकटौरा का विषय हुआ करती थी। नकटौरा में सिर्फ महिलाएं ही हुआ करती थीं। परंपरा ये थी कि जब सारे पुरुष बारात चले जाते थे तो नकटौरा के बहाने महिलाएं सारी रात जागती थीं ताकि किसी प्रकार की चौरी आदि की घटनाएं न हों। कुछ सालों पहले तक ये बेहद चर्चित परंपरा थी। चित्रा मुदगल के उपन्यास के नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस पंरपरा को ही केंद्र में रखकर लिखा है। इस उपन्यास के कवर पर लिखा है कि हमारा समाज जैसा दिखाई पड़ता है वैसा है नहीं। वह अपने तमाम दुर्गुणों , विकृतियों, विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों की परंपरा को पुरस्कृत करनेवाली विरासत का उत्तराधिकारी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चित्रा मुदगल ने नकटौरा के बहाने अपने विरासत में से सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को खोजकर पाठकों के लिए पेश किया होगा। 

चित्रा मुदगल  के अलावा राजकमल प्रकाशन समूह से ह्रषिकेश सुलभ का एक उपन्यास दातापीर भी इस वर्ष प्रकाशित होगा। इस उपन्यास में सुलभ ने कब्रिस्तान में काम करनेवालों को केंद्र में रखा है। उस उपन्यास में पटना शहर के पुराने इलाकों की भी कहानी साथ चलती रहती है।  लंबे समय तक कहानी और नाटक लिखने वाले सुलभ का ये दूसरा उपन्यास है। रत्नेश्वर ने भी एक उपन्यास त्रयी लिखी है जिसका नाम है महायुग। इसका पहला खंड है 32000 साल पहले, दूसरा खंड होगा हिमयुग में प्रेम और तीसरा खंड होगा प्रार्थना का आरंभ। इसका प्रकाशन भी इस वर्ष संभव है। उषाकिरण खान हिंदी और मैथिली की ऐसी लेखिका हैं जो अपनी लेखनी के माध्यम से लगातार युवा लेखकों को टक्कर देती रहती हैं। रचनाकर्म में वो कई युवा लेखकों और लेखिकाओं से अधिक सक्रिय हैं। उषाकिरण खान का मैथिली में एक बहुत चर्चित उपन्यास है पोखरि रजोखरि। इस वर्ष सामयिक प्रकाशन से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम है कथा रजोखर। मैथिली से इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद मीना झा ने किया है। रजोखर मिथिला का एक बड़ा जल स्त्रोत है जिसके माध्यम से मिथिला की सत्तर साल की दशा-दुर्शा की कथा कही गई है। पुस्तक के कवर पर ये बताया गया है कि उषाकिरण खान ने कथा रजोखर में स्वतंत्रता आंदोलन, नेहरू-गांधी के स्वप्न, चरखा, खादी ग्रामोद्योग का गठन और उसके विघटनकारी तत्व, स्वातंत्र्योत्तर मिथिला के नवनिर्माण की सरकारी योजनाएं और उसका परिणाम, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वार्थ की राजनीति, राजनीति का अपराधीकरण, छूआछूत, विधवा विवाह और पलायन जैसी समस्याओं पर सवाल उठाया है। 

एक और महत्वपूर्ण अनुवाद पुस्तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन से होने जा रहा है। इस पुस्तक का नाम है छत्रपति शिवाजी महाराज। अंग्रेजी में ये पुस्तक शिवाजी द ग्रैंड रेबल के नाम से इस प्रकाशित है जिसके लेखक हैं डेनिस किनकेड। एक और रोचक पुस्तक प्रभात प्रकाशन से आ रही है रामायण से स्टार्टअप सूत्र, इसको लिखा है प्राची गर्ग ने। इसी कड़ी में एक और पुस्तक आएगी वेदांत व जीवन प्रबंधन जिसको कलमबद्ध किया है विक्रांत सिंह तोमर ने। पौराणिक ग्रंथों से प्रबंधन के सूत्र निकालकर पाठकों के सामने पेश करना एक श्रमसाध्य कार्य है। लेकिन ये हिंदी साहित्य के क्षितिज का विस्तार करनेवाली पुस्तकें हैं।

हिंदी के अलावा अगर हम अंग्रेजी की बात करें तो कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद की आत्मकथा भी इस वर्ष प्रकाशित होनेवाली है। इस पुस्तक की प्रतीक्षा राजनीति से जुड़े लोग उत्सुकता से कर रहे हैं। लंबे समय तक गांधी परिवार के साथ रहे गुलाम नबी आजाद का परिवार से मोहभंग हुआ। सब लोगों की निगाह इस पर टिकी है कि अपनी इस पुस्तक में वो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में क्या लिखते हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस से होनेवाला है। दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश करनेवाला है। समाचारों के मुताबिक इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के संपादन में दिल्ली विश्वविद्यालय पर केंद्रित एक पुस्तक प्रकाशित होगी जिसमें विश्विद्यालय के पूर्व छात्र अपने अनुभवों को लिखेंगे। अंग्रेजी में कई अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रकाशन की खबर है, रामविलास पासवान और जार्ज फर्नांडिस की जीवनी के अलावा पत्रकार नीरजा चौधरी के राजनीतिक संस्मरणों की किताब भी इस वर्ष आएगी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्ष 2022 रचनात्मकता से भरपूर होगा।   



Saturday, September 19, 2020

महानायक के लिए भी सजी थीं थालियां


फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद हिंदी फिल्म जगत लगातार एक के बाद एक विवाद में घिरता जा रहा है। हिंदी फिल्म जगत का ये विवाद पिछले दिनों संसद में भी गूंजा जब गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन ने ड्रग्स का मामला लोकसभा में उठाया। रवि किशन के अगले दिन अपने जमाने की प्रख्यात अभिनेत्री और अब समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सदस्य जया बच्चन ने बैगर किसी का नाम लिए बॉलीवुड को बदनाम करने का आरोप जड़ा। अपने छोटे से वक्तव्य में जया बच्चन ने बेहद हल्की बात कह दी। उन्होंने बॉलीवुड पर सवाल उठानेवालों को निशाने पर लेते हुए कहा कि कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। अब ‘जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं’ से जया बच्चन एक ऐसा रूपक गढ़ने की कोशिश करती हैं जो उनकी मानसिकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है। इस समय थाली और छेद के रूपक का उपयोग करके जया बच्चन अपनी सामंती मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर गईं। मतलब ये कि बॉलीवुड में कोई मालिक है जो छोटे लोगों के लिए थाली सजाता है। परोक्ष रूप से ये बयान रवि किशन और कंगना पर वार था। इन दोनों ने अपनी मेहनत से फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाई किसी ने इनके लिए थाली सजाई हो अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है। थाली और छेद का रूपक जया जी और उनके परिवार को कठघरे में खड़ा कर देता है। जया बच्चन फिल्मी दुनिया की बेहद समादृत अभिनेत्री रही हैं, फिर लंबे समय से सांसद भी हैं। उनके पति अमिताभ बच्चन तो सदी के महानायक ही हैं, उनके भारत में करोड़ों प्रशंसक हैं।

जब जया जी राज्य सभा में थाली और उसमें छेद का रूपक गढ़ रहीं थीं तो शायद वो यह भूल गईं कि अमिताभ बच्चन और उनके परिवार के लिए भी थाली कई लोगों ने कई बार सजाई थी। ख्वाजा अहमद अब्बास से लेकर अमर सिंह तक ने। उन्होंने थाली में छेद किया या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन थाली के पलट दिए जाने की कहानी कई लोग कहते हैं। फिल्म अभिनेता महमूद का एक बेहद चर्चित साक्षात्कार है जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के बारे में, उनके संघर्षों के बारे में बताया है। बात उन दिनों की थी जब अमिताभ बच्चन फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ कर रहे थे। उस फिल्म का निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास कर रहे थे। उसमें महमूद के छोटे भाई अनवर अली भी काम कर रहे थे। उस दौर में महमूद ने और उनके भाई अनवर अली ने अमिताभ की काफी मदद की थी। उनको अपने घर में रखा। महमूद तो उनको अपना बेटा मानते थे। उसके बाद भी जब अमिताभ की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं तब भी महमूद ने अपनी फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ में अमिताभ को लीड रोल में लिया। इसमें शत्रुघ्न सिन्हा, अरुणा इरानी के अलावा अनवर अली ने भी काम किया था। इस फिल्म ने औसत से थोड़ा ही बेहतर बिजनेस किया था पर अमिताभ के काम को यहीं से पहचान मिली। महमूद ने उसी साक्षात्कार में बताया कि किस तरह से बाद के दिनों में अमिताभ बच्चन ने उनको भुला दिया। जब महमूद की बाइपास सर्जरी हुई थी तो वो मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थी। वहीं अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन भी अपना इलाज करवा रहे थे। महमूद को इस बात का बेहद दुख था कि एक ही अस्पताल में रहने के बावजूद अमिताभ उनसे मिलने नहीं आए, गेट वेल सून का कार्ड या एक फूल तक नहीं भेजा। महमूद की ‘थाली’ का क्या हुआ?   

फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ के बाद अमिताभ को फिल्म ‘जंजीर’ से काफी शोहरत मिली। फिल्म ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन के चयन की दिलचस्प कहानी है। प्रकाश मेहरा के सामने जब ‘जंजीर’ की कहानी आई तो वो इसको लेकर धर्मेन्द्र और देवानंद के पास गए लेकिन दोनों ने इंकार कर दिया। वो दौर राजेश खन्ना का था और उनका जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा था। ज्यादातर अमिनेता रोमांटिक फिल्में कर रहे थे या करना चाहते थे। ‘जंजीर’ की कहानी अलग हटकर थी। जब प्रकाश मेहरा को धर्मेन्द्र और देवानंद ने मना कर दिया तब फिल्म ‘जंजीर’ लिखनेवाली मशहूर जोड़ी के सलीम खान ने उनको अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था। उन्होंने फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ देखी थी और उसमें अमिताभ का फाइट सीन उनको खास पसंद आया था। उसके बाद की कहानी तो इतिहास है। लेकिन जब सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी टूटी थी तो इसकी खबर उस वक्त मुंबई के एक समाचार पत्र में छपी थी। अखबार के उसी अंक में अमिताभ बच्चन के हवाले से ये कहा गया था कि वो जावेद अख्तर के साथ हैं। सलीम-जावेद और अमिताभ के अन्य प्रसंग दीप्तकीर्ति चौधरी की किताब, ‘द स्टोरी ऑफ हिंदी सिनेमा’ज ग्रेटेस्ट स्क्रीन राइटर्स’ में देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं इस बात का भी अन्यत्र उल्लेख मिलता है कि बाद के दिनों में प्रकाश मेहरा जब अमिताभ से मिलने की कोशिश करते थे तो लंबी प्रतीक्षा के बाद भी उनको ये सौभाग्य प्राप्त नहीं होता था। वजह का पता नहीं। अमिताभ बच्चन के लिए सफल फिल्मों की ‘थाली’ तो प्रकाश मेहरा ने भी सजाई थी।  

बच्चन परिवार और गांधी परिवार की नजदीकियां और दूरियां भी सबको पता ही हैं उसको फिर से दोहराने की जरूरत नहीं हैं। लेकिन इतना तो कहना ही होगा कि गांधी परिवार या कांग्रेस ने भी बच्चन परिवार के लिए ‘थाली’ तो सजाई थी। हर किसी की जिंदगी में उतार चढ़ाव आते हैं, बच्चन साहब की जिंदगी में भी आए। तब उनकी मदद के लिए अमर सिंह सामने आए थे। संकट के समय बच्चन परिवार के लिए ‘थाली’ तो अमर सिंह ने भी सजाई। जया जी को समाजवादी पार्टी से सांसद बनवाने में भी उनकी भूमिका मानी जाती है। कालांतर में अमर सिंह की ‘थाली’ भी पलट गई और वो बच्चन परिवार से दूर हो गए। दरअसल जया बच्चन उम्र और प्रतिष्ठा के उस पड़ाव पर हैं जहां उनसे इस तरह की हल्की टिप्पणी की बजाय गंभीर और सकारात्मक टिप्पणियों की अपेक्षा होती है। आज बॉलीवुड को लेकर जो भी कहा या लिखा जा रहा है उसपर जया जी जैसी फिल्म जगत की वरिष्ठ और सम्मानित सदस्यों को सामने आकर देश को भरोसा देना चाहिए था। कहना चाहिए था कि अगर वहा नशा या कुछ और गलत हो रहा है तो उससे इंडस्ट्री को मुक्त करने की जरूरत है। ये अपेक्षा तो तब की जा सकती थी जब फिल्म जगत से जुड़े वरिष्ठ लोग सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस दिखा पाते। वरिष्ठ साहस नहीं दिखाते और कनिष्ठ या मानसिक रूप से विपन्न निर्देशक राजनीति करते हैं।

संजय दत्त ड्रग्स की गिरफ्त में आए थे, उसके बाद अन्य आपराधिक गतिविधि के चलते जेल में भी रहे। जब उनको नायक बनाने के लिए फिल्म ‘संजू’ का निर्माण होता है और उस फिल्म में संजय दत्त तीन सौ से अधिक महिलाओं के साथ हम बिस्तर होने की बात कहते हैं तो किसी को गटर की याद नहीं आती। कोई भी इस बात पर आपत्ति नहीं जताता कि इस फिल्म में इस प्रसंग को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए था। बल्कि इस फिल्म की सफलता को बॉलीवुड ने सेलिब्रेट किया गया। तब फिल्मी दुनिया से जुड़े वरिष्ठ सदस्य उद्वेलित नहीं हुए कि राजू हिरानी ने अपनी फिल्म में महिलाओं को घोर आपत्तिजनक तरीके से पेश किया। अब समय आ गया है कि बॉलीवुड साहस दिखाए। साहस सही को सही और गलत को गलत कहने का। 

Thursday, May 14, 2020

बेहतर मंजिल की आस


कोरोना की वजह से सभी सिनेमा हॉल बंद हैं, नई फिल्मों की शूटिंग नहीं हो पा रही है, जिन फिल्मों की शूटिंग पूरी हो गई हैं उनकी एडिटिंग और डबिंग आदि नहीं हो पा रही हैं। सिनेमा हॉल्स के बंद होने की वजह से फिल्मों की रिलीज लगातार टलती जा रही है। फिल्मों में पैसे निवेश कर घर बैठे प्रोड्यूसर्स के लिए संकट बढ़ता जा रहा है। लेकिन संकट के इस समय अब एक नया रास्ता निकल कर सामने आया है। निर्देशक शूजित सरकार की फिल्म गुलाबो सिताबो अब ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर 12 जून को रिलीज होने जा रही है। भारतीय फिल्मों के इतिहास में इस घटना को एक अहम मोड़ के तौर पर देखा जा सकता है। अभी तक के फिल्मों के व्याकरण में सिनेमा हॉल या मल्टीप्लैक्स की बड़ी भूमिका होती थी। फिल्मों की रिलीज के समय इस बात को लेकर रणनीति बनती थी कि किस फिल्म को देशभर में कितने स्क्रीन मिलेंगे? सौ करोड़ और दो सौ करोड़ के फिल्मों के अर्थतंत्र में स्क्रीन की संख्या की अहमियत बहुत ज्यादा होती थी। निर्माता निर्देशक से लेकर अभिनेता और अभिनेत्री सभी इस बात को लेकर सतर्क ही नहीं बल्कि प्रयासरत रहते थे कि उनकी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा स्क्रीन मिले, मतलब ये कि उनकी फिल्में ज्यादा से ज्यादा स्थान पर और आवृत्ति में दर्शकों के लिए उपलब्ध हों। फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ के अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज करने के फैसले के बाद अब फिल्मों के रिलीज होने का ट्रेंड बदल सकता है। अमेजन के प्लेटफॉर्म पर सीधे फिल्मों की स्ट्रीमिंग कर देने से अब दर्शकों को अपनी सुविधानुसार समय पर फिल्म देखने की सहूलियत भी मिलेगी।
इसका एक दूसरा असर थिएटर मालिकों और फिल्म प्रोड्यूसर्स के बीच के संबंधों पर भी पड़ सकता है। अमेरिका में इस तरह की एक घटना हो चुकी है जब एएमसी थिएटर्स ने यूनिवर्स पिक्चर्स को इस वजह से बैन कर दिया क्योंकि वो पहले ओटीटी प्लेटऑर्म पर चले गए थे। पिछले दिनों तमिलनाडू थिएटर और मल्टीप्लैक्स एसोसिएशन ने उन प्रोड्यूसर्स को धमकी दी थी कि जो थिएटर को छोड़कर दूसरे माध्यमों पर अपनी फिल्म रिलीज करने की सोच रहे हैं या रिलीज करने जा रहे हैं। दरअसल अब इस तरह की कई खबरें आने लगी हैं कि फिल्म प्रोड्यूसर्स अपनी फिल्मों के रिलीज के लिए वैकल्पिक माध्यम तलाश कर रहे हैं। पिछले दिनों ये खबर आई थी कि अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म लक्ष्मी बॉंब को डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज करने की बात हो रही है। इसी तरह से एक खबर ये भी आई थी कि नेटफ्लिक्स भी टी सीरीज से उनकी फिल्मों को अपने प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने को लेकर बातचीत कर रही है। अब जब गुलाबो सिताबो के अमेजन पर रिलीज होने की डेट आ गई है तो इन चर्चाओं को एक बार फिर से बल मिलेगा। गुलाबो सिताबो के रिलीज का जो पोस्टर अमेजन प्राइम वीडियो ने जारी किया है उसमें सोनी टीवी का लोगो भी लगा है। क्या ये इस बात का संकेत है कि प्राइम पर फिल्म के रिलीज होने के बाद ये फिल्म सोनी पर भी रिलीज होगी।आनेवाले दिनों में स्थितियां साफ होंगी। लेकिन इस घटना से इतना तो साफ है कि जब भई किसी तरह का संकट आता है तो उससे ही रास्ता भी निकलता है और नया रास्ता बहुधा बेहतर मंजिल तक पहुंचाता है।    

Sunday, March 29, 2020

आपदा को अवसर में बदलते किरदार


इस वक्त पूरी दुनिया में एक तिलिस्मी वायरस कोरोना का खौफ जारी है। अपने देश में भी कोरोना की वजह से लॉकडाउन चल रहा है. आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सबकुछ बंद कर दिया गया है। सड़कों पर सन्नाटा का साम्राज्य है लेकिन देश की जनता का मनोबल ऊंचा है। सबके मन में बस एक ही बात चल रही है कि कैसे इस वायरस को मात देनी है। कोरोना वायरस घातक है, जानलेवा है लेकिन हम भारतीयों के हौसले के आगे, हमारी दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे, हमारे संकल्प की शक्ति के आगे उसका झुकना ही होगा। हम भारतीयों की इस ताकत का, दृढ़ इच्छाशक्ति का दर्जनों फिल्मों में चित्रण हुआ है। जहां फिल्म निर्देशकों ने अपनी फिल्मों के माध्यम से ऐसे चरित्रों को पेश किया है जो अपनी जिजीविषा के दम पर दर्शकों के दिलोदिमाग पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं.
ह्रषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘आनंद’ का आखिरी सीन है, जहां अस्पताल में अमिताभ बच्चन अपने दोस्त राजेश खन्ना को झकझोरते हुए कहते हैं ‘उठो आनंद उठो’ लेकिन वो तो चिरनद्रा में लीन हो चुके थे। ये चल ही रहा था कि कमरे में चल रहे टेप से एक आवाज आती है, ‘बाबू मोशाय! जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है जहांपनाह, जिसे न तो आप बदल सकते हैं न ही मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपरवाले की ऊंगलियों से बंधी हैं. कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं बता सकता है।‘ इसके बाद चंद पलों तक जोरदार ठहाका गूंजता रहता है। साउंड टेप टूटने के बाद आवाज रुक जाती है। फिर स्क्रीन पर गुब्बारा उड़ता है और बैकग्रुंड से आवाज आती है, ‘आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं।‘ हिंदी फिल्मों के इतिहास में इस फिल्म को इसके पात्र ‘आनंद’ की जिजीविषा के लिए याद किया जाएगा। राजेश खन्ना ने अपने शानदार अभिनय से ‘आनंद’ के चरित्र को जीवंत कर दिया था। ये चरित्र इतना सकारात्मक है जिसने अपने इस गुण से अपना इलाज कर रहे डॉक्टर तक की मानसिकता को बदल दिया। उसके अंदर की नकारात्मकता और निराशा को खत्म कर दिया। आनंद को पता था कि उसको कैंसर है और वो छह महीने से अधिक जिंदा नहीं रह सकेगा. बावजूद इसके वो अपनी जिंदगी को भरपूर जिंदादिली से जीता है। उसक इलाज कर रहे डॉक्टर भास्कर के मन में इस बात की निराशा होती है कि वो अपने सभी मरीजों को ठीक नहीं कर पाता है लेकिन जब वो आनंद के संपर्क में आता है तो उसमें बदलाव आता है और उसकी नकारात्मकता खत्म होने लगती है और जिंदगी को देखने का उसका नजरिया बदलने लगता है। आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं के जरिए इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी समाज के एक संदेश देते हैं। इसको अगर इस तरह से व्याख्यायित करें कि आनंद (प्रसन्नता) मरा नहीं, आनंद (फिल्म का पात्र) मरते नहीं, तो संदेश साफ पकड़ में आ जाता है।
इसी तरह की अदम्य जिजीविषा वाले चरित्रों का चित्रण किया संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म ब्लैक में। इसमें एक मूक बधिक लड़की और उसका संघर्ष तो है ही उसको शिक्षित करनेवाले शिक्षक का जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी है। इस फिल्म में बहुत छोटी बच्ची मूक बधिर बच्ची को जीवन का रंग सिखाने में लगे हैं। अमिताभ बच्चन ने जिस शिक्षक देवराज की भूमिका निभाई है वो खुद उम्रदराज और सनकी है । लेकिन तमाम अपमान सहते हुए भी एक दृष्टि बाधित लड़की को पढ़ाने का संकल्प लेता है, उसको पूरा भी करता है। जो लड़की बेहद आक्रामक थी वो भी इस अपने शिक्षक की प्रेरणा से सीखना शुरू करती है। लंभ संघर्ष के बाद मिशेल नाम की लड़की को स्नातक में दाखिला भी मिल गया। तमाम झंझावातों को झेलते हुए करीब बारह साल बाद वो बीए पास करती है। अपने अबिनय के गांभीर्य की वजह से रानी मुखर्जी ने दृष्टिबाधित लड़की के चरित्र को नई ऊंचाई दी है, उसके संघर्ष को यथार्थ के बेहद करीब ले गई। उधर अमिताभ बच्चन बढ़ती उम्र की वजह से अल्जाइमर की गिरफ्त में आ जाते हैं लेकिन कहते हैं न कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। इस फिल्म के अंत में भी आखिरी सीन में नेपथ्य से संवाद चलता है जिसमें रानी मुखर्जी कहती है, वो दुनिया का सबसे महान टीचर है, जिसने आज फिर से साबित कर दिया कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं, जिसने फिर से मुझे सिखाया कि दूसरों के लिए जीने को ही जीना कहते हैं। यहां भी फिल्म निर्देशक ने इस संवाद के जरिए पूरे समाज को एक संदेश दिया है और फिल्म के माध्यम से ये बताया है कि अंधेरा चाहे कितना भी घना हो लेकिन उम्मीद की किरण जलाकर उस अंधेरे को उजाले में बदला जा सकता है।
आज जब कोरोना की दहशत में लोग घरों के अंदर रहने को मजबूर हैं वैसे ही प्लेग की वजह से लोग पलायन को मजबूर हो गए थे। उसकी ही पृष्ठभूमि पर 1966 में एक फिल्म बनी थी ‘फूल और पत्थर’। इस फिल्म में बीमार शांति, जिसके किरदार को मीना कुमारी को ने निभाया है, के घरवाले अकेले छोड़कर चले जाते हैं। शाका, जिसकी भूमिका धर्मेन्द्र ने निभाई है, जो एक अपराधी की भूमिका में हैं जो उसी घर में घुसते हैं जहां के लोग बीमार शांति को मरने के लिए छोड़कर चले जाते हैं। फिल्म की कहानी कई मोड़ लेती है लेकिन अपराधी की भूमिका निभा रहे धर्मेन्द्र ने सबकुछ छोड़कर बीमार शांति की सेवा की और वो स्वस्थ हो गईं। फिर फिल्म में शांति के घर-परिवार का विरोध, समाज का विरोध आदि आदि है लेकिन इस फिल्म के माध्यम से निर्देशक ओ पी रल्हन ने साफ तौर पर ये संकेत दिया है मदद करनेवाला कोई भी हो सकता है। जान बचाने के लिए कोई भी आ सकता है। साथ ही ये संदेश भी है कि जीवन जीने की इच्छाशक्ति सबसे बड़ी दवाई है। इस संदेश को रल्हन ने शांति के चरित्र के माध्यम से रेखांकित किया है।
एक और फिल्म 1982 में बनी थी जिसे सुनील दत्त ने निर्देशित किया था, ‘दर्द का रिश्ता’। अगर हम इस फिल्म को ऊपरी तौर पर देखें तो इसमें कई इत्तफाक दिखाई देते हैं जो दर्शकों को चौंकाते हैं लेकिन ये फिल्म कैंसर जैसी बीमारी से लोहा लेने की और उसको मात देने की कहानी कहती है। सुनील दत्त, स्मिता पाटिल, रीना रॉय और खुशबू ने इस फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया है। इसमें ग्यारह साल की बच्ची अपनी जन्म के साथ ही अपनी मां को खोती है, फिर ग्रह साल की उम्र में कैंसर दबोच लेता है. अपने डॉक्टर पिता के साथ भारत से लेकर अमेरिका तक के अस्पतालों में वो इस बीमारी से जूझती है। अपनी सकारात्मकता और खुशमिजाजी से सफलतापूर्वक मुकाबला करती है। कहने का अर्त ये है कि हिंदी फिल्मों में कई ऐसे किरदार गढ़े गए जिन्होंने विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया। इनमें से कई चरित्र तो यथार्थ के बिल्कुल करीब हैं या फिर सत्य घटनाओं पर आधारित या उनसे प्रेरित हैं। जब भी इस तरह की फिल्में बनीं तो दर्शकों ने उसको खूब पसंद किया। धर्मेन्द्र-मीना कुमारी की फिल्म फूल और पत्थर कई सप्ताह तक सिनेमाघरों में चलती रही थीं, इसी तरह से ब्लैक ने तो पूरी दुनिया में ही धूम मचा दी थी। ‘आनंद’ और ‘दर्द का रिश्ता’ ने भी सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। कहना न होगा कि दृढ्ता और संकल्पशक्ति के साथ ना केवल आप निजी जिंदगी में सफल हो सकते हैं बल्कि आपदा को भी अवसर में बदल सकते हैं।   

Tuesday, September 24, 2019

पीढ़ियों को अभिनय से प्रभावित किया


अमिताभ की अदाकारी ने भारतीय फिल्म जगत को गहरे तक प्रभावित किया। पहले तो कहानीकारों ने उनकी फिल्मी छवि को ध्यान में रखकर कहानियां लिखीं। उनके बोलने के अंदाज को ध्यान में रखकर डॉयलॉग लिखे गए। वर्ष 1980 तक आते आते अमिताभ बच्चन की छाप हिंदी सिनेमा पर इतनी गहरी हो गई कि उनके उनके बाद की पीढ़ी के अभिनेताओं ने उनकी अदाकारी के प्रमुख आयाम- एंग्री यंगमैन, को अपने अभिनय का अभिन्न अंग बना लिया। संभव है कि ये निर्देशकों की या कहानी लिखने वालों की सोच रही हो लेकिन एक पूरी पीढ़ी पर अमिताभ के अंदाज, फिल्मों में उनके प्रदर्शन, उनकी फिल्मी छवि का असर दिखा और हिंदी फिल्मों ने उसको शिद्दत से अपनाया। किसी भी फिल्म अभिनेता के लिए यह बहुत बड़ी बात है। अमिताभ बच्चने के बाद के दौर के अभिनेताओं ने अपनी अलग छवि बनाने की जरूर कोशिश की लेकिन उसमें अमिताभ की झलक लगातार दिखती रही।
मिथुन चक्रवर्ती भले ही डिस्को डांसर के तौर पर लोकप्रिय हुए लेकिन अपनी ज्यादातर फिल्मों में वो डांसर के साथ-साथ एंग्री यंगमैन भी होते थे। डांसर के साथ-साथ गुस्सा और मार-धाड़ अवश्य होता था। मिथुन के बाद अगर हम अनिल कपूर की अदाकारी को देखे तो उसमें भी एंग्री यंगमैन की छवि साफ तौर पर दिखती है। फिल्म मशाल में अनिल कपूर के अभिनय के कई भाव को अमिताभ की अभिनय की छाप और छाया के तौर पर लक्षित किया जा सकता है। हलांकि बाद की फिल्मों में अनिल कपूर ने एंग्री यंगमैन की छवि के साथ एक खिलंदड़ापन जोड़ा लेकिन उसमें भी अमिताभ के अभिनय के कई शेडस दिखते हैं। अगर आप याद करें फिल्म शोले में अमिताभ का किरदार, जब वो तांगे पर पीछे बैठे होते हैं और धर्मेन्द्र आगे हेमा मालिनी के साथ । तांगे पर जिस तरह का संवाद होता है वैसा ही संवाद फिल्म रामलखन में अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के बीच देखा जा सकता है। सिर्फ ये दो ही नहीं बल्कि संजय दत्त की फिल्मी छवि भी प्रयत्नपूर्वक एंग्री यंगमैन की बनाई गई। उस छवि को अलग दिखाऩे के लिए उसको थोड़ा संवेदनशील दिखाया गया। जैकी श्राफ ने तो पूरी तरह से एंग्री यंगमैन की छवि को अपनाया और सफल भी रहे। अमिताभ के चलने तक का स्टाइल आप जैकी की चाल में देख सकते हैं। इस छाप को अब के नायकों पर भी देख सकते हैं। अमिताभ ने अपने अभिनय में जितने प्रयोग किए उतना कम ही अभिनेताओं ने किया ज्यादातर तो अपनी सफल फिल्मी छवि की गिरफ्त में ही जकड़ कर रह गए।  

Saturday, February 16, 2019

लहर सा उठा सारे तट धो गया


1942 एक ऐसा वर्ष है जिसने भारत की राजनीति, कला और पत्रकारिता पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। इसी साल अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का सूत्रपात हुआ जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया। इसी वर्ष झांसी की ऐतिहासिक धरती से दैनिक जागरण का प्रकाशन का प्रारंभ हुआ और इसी वर्ष प्रयागराज की धरती पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ। कम लोगों को ही ये मालूम है कि अमिताभ बच्चन को उनके जन्म के सामय चंद दिनों के लिए एक नाम मिला था- इंकलाब राय। कुछ ही दिनों बाद हरिवंश राय बच्चन और तेजी को लगा कि उन्हें अपने बेटे का कोई पारंपरिक नाम रखना चाहिए। फिर दोनों ने तय कर अपने पुत्र का नाम इंकलाब राय की जगह अमिताभ रखा । पिछले दिनों अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में अपने करियर के पचास साल पूरे किए। अमिताभ बच्चन के पुत्र अभिषेक बच्चन ने इंस्टाग्राम पर और उनकी बेटी श्वेता नंदा ने अपने ट्वीटर अकाउंट पर जब इस बात को साझा किया तो पूरी दुनिया से बॉलीवुड के इस शहंशाह को बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया। अभिषेक बच्चन ने अपनो पोस्ट में अपने पिता को अपना सबसे अच्छा दोस्त, गाइड, सबसे बड़ा आलोचक, अपना आदर्श बताते हुए अंत में कहा कि वो हीरो हैं। अभिषेक के इस पोस्ट को पौने दो लाख से ज्यादा लोगों ने लाइक किया। श्वेता ने ट्वीटर पर एक वीडियो साझा किया जिसमें 1969 से लेकर अबतक के वर्षों को बेहद कलात्मक तरीके से पेश किया।
हिंदी फिल्मों को जिन चंद कलाकारों ने अपने क्राफ्ट से बदला और उसको एक नई दिशा दी उसमें अमिताभ बच्चन का नाम शीर्ष पर लिया जा सकता है। अमिताभ बच्चन की साहित्य में गहरी रुचि थी पर वो उस क्षेत्र में जाना नहीं चाहते थे। स्कूली दिनों से उनके अंदर थिएटर को लेकर गहरा लगाव था। अमिताभ की अभिनय कला को पहचान 1957 में निकोलाई गोगल के नाटक ‘इंस्पेक्टर जनरल’ में मेयर की भूमिका से मिली। इसमें उनकी भूमिका इतनी दमदार थी कि उन्हें बेस्ट एक्टर के लिए केंडल कप मिला । उनको ये पुरस्कार जेफ्री कैंडल के हाथों मिला था, जो कि खुद ही एक महान अभिनेता थे। शशि कपूर ने उनकी बेटी से विवाह किया था। दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद अमिताभ बच्चन कोलकाता पहुंचे और वहां नौकरी करने लगे। अच्छी नौकरी थी, घर, गाड़ी और मोटी तनख्वाह लेकिन मन अभिनय में अटका हुआ था। कोलकाता में भी नाटकों में काम करने लगे, सराहना मिली। अभिनय के जुनून को देखते हुए उनके भाई अजिताभ ने कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल के सामने उनकी एक तस्वीर खींची फिल्मफेयर-माधुरी की राष्ट्रीय प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में भेज दी। अमिताभ का चयन नहीं हुआ। लेकिन इसी फोटो को देखकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने अमिताभ को मिलने के लिए बुला लिया था। ‘सात हिन्दुस्तानी’ फिल्म मिलने की कहानी की कई बार चर्चा हो चुकी है लेकिन कम ही लोगों को ये पता होगा कि अमिताभ बच्चन को मनोज कुमार ने अपनी फिल्म ‘यादगार’ में एक रोल ऑफर किया था। छोटा रोल होने की वजह से अमिताभ ने उसमें काम करने से मना कर दिया था। फिल्मों में रोल के लिए अमिताभ बच्चन का मुंबई के रूप तारा स्टूडियो में स्क्रीन टेस्ट भी हुआ था जिसमें भी वो सफल नहीं हो पाए थे। वहां उनको लेखन की ओर जाने की सलाह गई थी। फिर ‘सात हिन्दुस्तानी’ में रोल मिला। बॉलीवुड में कहा जाता है कि जिसकी पहली फिल्म पिटती है वो बाद में हिंट होता है। अमिताभ के साथ भी यही हुआ। उनकी शुरुआती दस फिल्में पिटीं लेकिन ‘जंजीर’ की सफलता ने अमिताभ के साथ साथ फिल्मों की भी दुनिया बदल दी।
अमिताभ बच्चन ने भी अपनी जिंदगी में उतार चढ़ाव देखे। सेट पर लगी गंभीर चोट से उबरने में लंबा वक्त लगा। फिर एक दौर आया जब उनकी फिल्में बुरी तरह से पिटने लगीं। उन्होंने एंटरटेनमेंट कंपनी बनाई वो घाटे में चली गई, राजनीति में गए वहां से बेआबरू होकर निकले। उन्होंने टीवी को चुना और ‘कौन बनेगा करोड़पति’ को होस्ट किया। सफलता एकबार फिर से सदी के महानायक के कदम चूमने लगी। उस दौर में किसी सुपर स्टार के लिए फिल्म को छोड़कर टी वी को चुनना बहुत मुश्किल था लेकिन बिग बी ने ये जोखिम उठाया। फिल्मों और भूमिकाओं के चुनाव में भी सतर्क हुए। अमिताभ बच्चन को बचपन में मुक्केबाजी का शौक था। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन ने उनको मुक्केबाजी पर एक किताब दी जिसपर प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि यीट्स की एक पंक्ति लिखी थी- ‘तगड़ा प्रहार दिमाग के लिए बेहद आनंददायी होता है।‘ संभव है बचपन में पिता से मिली इस सीख की वजह से हर मुश्किल को आनंदपूर्वक झेलते चले गए। प्रसून जोशी ने अमिताभ बच्चन पर एक कविता लिखी है जिसकी अंतिम पंक्ति है ‘लहर सा उठा सारे तट धो गया।‘ सचमुच।    

Saturday, December 2, 2017

विवाद उछालने की नीयत !

अपने एक लेख में मशहूर सांस्कृतिक इतिहासकार लोटमान ने लिखा है कि – चिन्हों और प्रतीकों के जरिए संप्रेषण मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि है लेकिन इसती भी नियति तकनीकी सुधार की तरह ही है। जैसे प्राय: सभी तकनीकी सुधार एक प्रकार से दुधारी तलवार होती है जहां उन्हें सामाजिक प्रगति और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है वहां नकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी उनका उपयोग चालाकी से किया जाता है। चिन्हों और प्रतीकों के उपयोग का उद्देश्य सही रचना देना होता है लेकिन इसका उपयोग बहुधा गलत रचना देने के लिए किया गया गया है। उनका मानना है कि इस प्रकार के चलन से एक बहुत ही विचित्र किस्म की हठवादी विपरीत अवधारणा का विकास हुआ। इस अवधारणा के तहत यह माना जाने लगा कि एक विषय जो कि असत्य हो सकता है बनाम एक विषय जो कि असत्य नहीं हो सकता है। हाल ही में गोवा में संपन्न हुए अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान जिस तरह से ‘एस दुर्गा’ फिल्म को लेकर विवाद उठाने की कोशिश की गई, उसको अगर लोटमान की इन अवधारणाओं के आलोक में देखें तो उसमें भी एक हठवादी अवधारणा की अंतर्धारा दिखाई देती है। फिल्मकार ने पहले ‘सेक्सी दुर्गा’ के नाम से फिल्म बनाई, बाद में उसको ‘एस दुर्गा’ कर दिया। फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग नहीं हो पाई, वो अदालत चले गए वहां से स्क्रीनिंग का आदेश लेकर आए। फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अदालत में अपील की जहां से जूरी को फैसला लेने को कह दिया गया। फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों तक इस फिल्म को दिखाए जाने पर सस्पेंस बना रहा। इन दो दिनों के दौरान फिल्म सनल शशिधरन ने गोवा में धरना प्रदर्शन आदि की भी कोशिश की लेकिन ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। इस पूरे विवाद का पटाक्षेप सेंसर बोर्ड के एक फैसले से हो गया जिसमें उसने इस फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द कर दिया। हलांकि अगर इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाता तो एक गलत परंपरा की शुरुआत होती कि कोई भी अदालत जाकर जूरी के फैसले को चुनौती देता और फिर अदालत के आदेश के बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हो जाती। ऐसा होने से जूरी की आजादी पर भी फर्क पड़ता जो कि स्वस्थ सिनेमा के लिए उचित नहीं होता। हलांकि इस तरह के आयोजनों में फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति का अंतिम अधिकार स्थानीय राज्य सरकार के पास होता है।  
इस पूरे विवाद को हवा देने की कोशिश की गई लेकिन इन तथ्यों को छुपा लिया गया कि फिल्मकार ने ‘एस’ के बाद तीन आयताकार सफेद बॉक्स लगा कर फिल्म को गोवा अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अर्जी दी थी। सेंसर बोर्ड से जुड़े जानकारों का कहना है कि ‘एस’ के बाद तीन आयताकार बॉक्स लगाकर उसके बाद दुर्गा लिखने के कई अर्थ हैं। इन आयताकार बॉक्स लगाकर फिल्मकार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हो सकते हैं कि उन्होंने विरोध स्वरूप ‘सेक्सी’ की तीन अक्षरों दो ढंक दिया। शबाना आजमी जैसी अदाकारा ने गोवा फिल्म फेस्टिवल के बहिष्कार का आह्वान किया था लेकिन उसको फिल्मी दुनिया में ही किसी ने तवज्जो नहीं दी। गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ से लेकर करण जौहर, पूजा हेगड़े, भूमि पेडनेकर और सुशांत सिंह राजपूत के अलावा कई अन्य सितारे मौजूद थे। दरअसल एक खास विचारधारा के पोषकों को बहिष्कार आदि का रास्ता सबसे आसान लगता है। उससे भी आसान है कि कहीं कुछ हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में होने की बात उछाल दो। यह एक ऐसा जुमला बन गया है जो हर जगह फिट हो जाता है चाहे वो फिल्म हो, साहित्य हो, पत्रकारिता हो, पेंटिंग हो, कहीं भी।
अगर कहीं कुछ गलत होता लग रहा हो तो उसके लिए संवाद करने की जरूरत है, सरकार या आयोजक से बात की जा सकती है। शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को मसलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए ना कि किसी भी विवाद में अपनी राजनीति को चमकाने का अवसर तलाशना चाहिए। एक अभिनेत्री के तौर पर उनका जितना सम्मान है उसका उपयोग उनको बॉलीवुड के सकारात्मक पैरोकारी में करना चाहिए क्योंकि नकारात्मकता का अंत तो नकार से ही होता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है, विरोध जताने का हक भी है लेकिन जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं तो लोगों की आकांक्षा अलग हो जाती है। इस फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन ने एक बेहतरीन बात की। उन्होंने कहा कि ‘फिल्म ही एक ऐसा माध्यम है जहां तीन घंटे तक हमें अपने बगल में बैठे इंसान के जाति, धर्म, विचारधारा आदि के बारे में पता नहीं होता और ना ही उससे कुछ लेना लेना देना होता है।‘ लेकिन अफसोस कि अमिताभ बच्चन की सोच वाले लोग कम हैं यहां तो लोग फिल्म को लेकर भी राजनीति करने से नहीं चूकते।
विवादों से बेअसर गोवा फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष कुछ बेहद सार्थक काम भी हुए। फिल्म फेस्टिवलों में भी अबतक ज्यादातर एकालाप होता था। या तो फिल्मकार की बातें सुनकर फिल्म देखो, या सितारों की स्पीच सुनो, लेकिन अड़तालीस साल बाद अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने अपना दायरा बढाया और एकालाप को संलाप में बदलने की कोशिश की गई।
साहित्य और सिनेमा को लेकर पूर्व में बहुत बातें होती रही हैं। खासतौर पर हिंदी में तो साहित्यकारों के सिनेमा को लेकर अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग के बारे में रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया। बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।‘ प्रेमचंद के अलावा अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों का भी सिनेमा से साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया।
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष साहित्य और सिनेमा से लेकर कहानी की ताकत, उसके कहने का अंदाज और बच्चों के सिनेमा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ। वाणी त्रिपाठी टिक्कू द्वारा क्यूरेट किए गए इन विषयों को लेकर श्रोताओं में खासा उत्साह रहा। साहित्यक प्रेरणा, सिनेमा और लिखित शब्द पर पौऱाणिक कथाओं को आधुनिक तरीके से लिखनेवाले लेखक अमीश त्रिपाठी, कवि और संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के अलावा गीतकार और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने विचार रखे। इसका संचालन वाणी ने किया था। कहानी की ताकत और किस्सागोई पर एक पैनल में बेहद रोचक चर्चा हुई। अगर हम बॉलीवुड को देखें या फिर पूरे भारतीय भाषा की फिल्मों को देखें तो बच्चों की फिल्मों का अनुपात बहुत कम होता है। एक सत्र बच्चों के सिनेमा पर भी केंद्रित था जिसमें प्रसून जोशी और नितेश तिवारी जैसे वक्ता मौजूद थे। चर्चाओं का फलक इतना बड़ा था कि एक पूरा सत्र टैगोर के संसार पर केंद्रित था। आज के जमाने में डिजीटल प्लेटफॉर्म को लेकर बात ना हो तो आयोजन अधूरा सा लगता है। मशहूर फिल्मकार भारतबाला ने इस विषय पर एक सत्र संचालित किया।

दो सत्र बेहद रोचक रहे जिसमें एक तो था ‘अपनी अगली फिल्म कैसे बनाएं’ जिसमें करण जौहर के अलावा एकता कपूर, सिद्धार्थ रॉय कपूर और स्टार फॉक्स के सीईओ विजय सिंह ने अपनी बातें रखीं। दूसरा सत्र ‘नए यथार्थ से मुठभेड़’ पर केंद्रित था। इन दोनों सत्रों में करण जौहर ने बेहद सधे अंदाज में अपनी बात रखी। एकता कपूर हमेशा की तरह संक्षिप्त पर दू द प्वाइंट रहीं। करण जैहर ने एक सत्र में सोशल मीडिया पर फिल्म समीक्षा को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की । उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन दिनों ट्वीटर आदि पर फिल्मों की लाइव समीक्षा होती है वो अच्छा संकेत नहीं है। इन सत्रों की परिकल्पना करनेवाली समिति की अध्यक्ष वाणी त्रिपाठी टिक्कू के मुताबिक इस आयोजन का मकसद देश में सिनेमा लिटरेसी को बढ़ावा देना है। इन सत्रों में लोगों की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि इस तरह का प्रयोग लोगों को पसंद आया। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो बेवजह के विवादों को उठाने की कोशिशों को सकारात्मक पहल ने हाशिए पर पहुंचा दिया।  

Monday, February 15, 2016

वीराने में टहलती यादों की परछाइयां

निदा फाजली ने अपनी किताब ‘तमाशा मेरे आगे’ की भूमिका में मैडम बॉवेरी को याद करते हुए कहा है कि– ‘काश मेरे पास इतना पैसा होता कि सारी किताबें खरीद लेता और उसको फिर से एक बार लिखता ।‘ उसके बाद निदा साहब कहते हैं...समय का आभाव नहीं होता तो मैं भी ऐसा ही करता । मैडम बॉबेरी के कथन को जेहन में रखते हुए वो अपना एक शेर कहते हैं – ‘कोशिश के बावजूद एक उल्लास रह गया/ हर काम में हमेशा कोई काम रह गया ‘। निदा फाजली के निधन की जब खबर मिली तो मेरी स्मृति में निदा साहब का ये शेर कौंध गया । वो इसलिए कि उनसे जनवरी 2013 में हुई दो बार हुई बातचीत याद आ गई । उसके पहले निदा साहब से मेरा कोई संपर्क नहीं था । हां उनके लिखे फिल्मी गीत – ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है’ और ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ मुझे बेहद पसंद हैं । उनकी आत्मकथात्मक उपन्यासों को पढ़कर उनके संघर्षों और विचारों से अवगत था । लेकिन जब दो हजार तेरह में साहित्यक पत्रिका ‘पाखी’ में उनका एक खत पढ़ा तो हैरान रह गया था । उन्हें तुरंत फोन किया था और उनसे काफी लंबी बात हुई थी । दरअसल उन्होंने ‘पाखी’ के संपादक के नाम एक पत्र में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तुलना मुंबई हमले के गुनहगार आतंकवादी आमिर अजमल कसाब से कर दी थी । दरअसल निदा फाजली पूर्व के अंक में संपादकीय में कहानीकार ज्ञानरंजन की तुलना अमिताभ बच्चन से किए जाने से खफा थे । निदा ने संपादक के नाम खत में लिखा था- ‘दूसरी बात जो आपके संपादकीय मे खटकी वो यह है कि ज्ञानरंजन जैसे साहित्यकार की तुलना सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन से की गई है । एंग्री यंगमैन को सत्तर के दशक तक कैसे सीमित किया जा सकता है । क्या 74 वर्षीय अन्ना हजारे को भुलाया जा सकता है । मुझे तो लगता है कि सत्तर के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत है और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाजा गया । वो तो केवल अजमल आमिर कसाब की तरह गढ़ा हुआ खिलौना है । एक को हाफिज सईद ने बनाया था तो दूसरे को सलीम-जावेद की कलम ने गढ़ा था । आपने भी खिलौने की प्रशंसा की लेकिन खिलौना बनाने वालों को सिरे से भुला दिया । किसी का काम, किसी का नाम कहावत शायद इसलिए गढ़ी गई है ।‘ जब मैंने उनको फोन किया तो वो अपने तर्क और राय पर कायम थे । जब मैंने उनसे सवाल किया कि आप अमिताभ कि तुलना कसाब से कैसे कर सकते हैं तो उन्होंने दो टूक कहा था कि मैंने अपनी राय लिख दी, आप अपनी लिखें । जनवरी में ही मैंने उनकी इस राय के खिलाफ लेख लिखा । लेख छपने के तीन दिन बाद निदा साहब का फोन आया और उन्होंने कहा कि कर ली ना तुमने अपने मन की । फिर काफी बातें हुई लेकिन मुझे उसमें कहीं से तल्खी नहीं महसूस हुई । मुझे लगा कि उनमें अपनी आलोचना को स्पेस देने का माद्दा था ।
उसके बाद मैंने निदा को और पढ़ना शुरू किया तो मुझे यह लगा कि निदा फाजली हिंदी-उर्दू की तरक्कीपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर थे । मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । उन्होंने हिंदी-उर्दू की जुबां में शायरी की । कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी उनकी शायरी में बेहतरीन रूप से सामने आई । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । वो इस बात के विरोधी थे कि मुशायरों में सिर्फ शायरों को और कवि सम्मेलनों में सिर्फ कवियों को बुलाया जाए । उन्होंने कई मंचों पर गोपाल दास नीरज के साथ साझेदारी में कविताएं पढ़ी थी । उनकी शायरी को देखते हुए ये लगता था कि उन्होंने हिंदू मायथोलॉजी का गहरा अध्ययन किया था । सूरदास और कबीर के पदों से उन्होंने प्रेरणा ली औक शायरी की । निदा बेखौफ होकर अपनी बात कहते थे । जिस तरह से कबीर ने मस्जिदों और मंदिरों को लेकर काफी बेबाकी से लिखा था उसी तरह से निदा ने भी लिखा- ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान’ या फिर ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।‘ उनकी शायरी के ये स्वर लंबे वक्त तक साहित्य में याद किए जाएंगे ।

निदा फाजली का जन्म 12 अक्तूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था और वो अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे और उनका असली नाम मुक्तदा हसन था । बंटवारे के वक्त उन्होंने पाकिस्तान जाने की बजाए भारत में ही रहना ताय किया था क्योंकि वो दोस्तों से बिछुड़ना नहीं चाहते थे । उनका बचपन ग्वालियर में बीता था जहां उन्होंने उस वक्त के विक्टोरिया कॉलेज से पढ़ाई पूरी की थी । ग्वालियर में रहते हुए उन्होंने उर्दू अदब में अपनी पहचान बना ली थी । उस वक्त ही उन्होंने अपना नाम बदल कर निदा फाजली रख लिया । उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘लफ्जों का पुल’ जब छपा तो उन्हें काफी शोहरत मिली, भारत में भी और पाकिस्तान में भी । बाद में वो मुंबई चले गए और फिर वहीं के होकर रह गए । उनकी शायरी परवान चढ़ी और जगजीत सिंह की आवाज ने उनको लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया । कालांतर में उन्होंने फिल्मों के लिए गीत लिखने शुरू किए जो काफी हिट रहे । ‘आप तो ऐसे ना थे’, ‘रजिया सुल्तान’, ‘सरफरोश’, ‘अहिस्ता-अहिस्ता’, ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘चोर पुलिस’ में लिखे उनके गीतों ने धूम मचा दी थी । 2013 में निदा फाजली तो भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा था । इसके अलावा भी उनको दर्जनों पुरस्कार मिले थे । निदा फाजली को 1998 में उनकी कृति ‘खोया हुआ सा कुछ’ के लिए साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया था । ‘खोया हुआ सा कुछ’ के अलावा ‘सफर में धूप’, ‘आंखों भर आकाश’, ‘मौसम आते जाते हैं’ ‘लफ्जों के फूल’ ‘मोर नाच’ आदि उनकी प्रमुख कृतियां हैं । ‘दीवारों के बीच’ उनकी गद्य रचना थी जो आत्मकथात्मक उपन्यास है । इस उपन्यास में उन्होंने विभाजन से लेकर 1965 तक की घटनाओं को सिलसिलेवार ढंग से पेश किया था । इसके बाद उन्होंने ‘दीवारों के बाहर’ नाम से बाद की घटनाओं को समेटा । फिर ‘तमाशा मेरे आगे’ का पकाशन हुआ जिसमें निदा के छिटपुट लेख संग्रहीत हैं । अंत में निदा की स्मृति को नमन करते हुए उनकी ही एक कविता – ‘हर कविता मुकम्मल होती है, लेकिन वो कलम से कागज पर, जब आती है, थोड़ी सी कमी रह जाती है ।‘ अलविदा निदा साहब ।