Translate

Showing posts with label सेंगोल. Show all posts
Showing posts with label सेंगोल. Show all posts

Saturday, June 29, 2024

सनातन प्रतीकों पर राजनीति का खेल


नई लोकसभा के गठन के बाद जब संसद का सत्र आरंभ हुआ तो विपक्षी दल के सांसदों ने संविधान का उपयोग नए राजनीतिक औजार के रूप में करना आरंभ किया। संविधान की प्रति लेकर शपथ लेना आरंभ किया। संविधान को लेकर चुनाव के समय से जो चर्चा आरंभ हुई थी वो लोकसभा तक पहुंच गई। संविधान पर चर्चा और उसके बचाने के दावे के साथ उत्साहित विपक्ष ने नई लोकसभा में सेंगोल की स्थापना को लेकर भी प्रश्न उठाया। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी सफलता से उत्साहित है। पार्टी के सांसद आर के चौधरी ने संसद में सेंगोल की जगह संविधान की प्रति लगाने की बात कहकर एक नए विवाद को जन्म दिया। आर के चौधरी ने कहा कि ‘सेंगोल राजा महाराज के टाइम का था। सेंगोल तमिल भाषा का शब्द है। जब यहां राजा महाराजा थे तब यहां सेंगोल तैयार किया गया। जब देश को स्वतंत्रता मिल गई या मिलनेवाली थी या जब सत्ता का हस्तांतरण होनेवाला था तो यहां के पुरोहितों ने प्रस्ताव दिया और उनके प्रस्ताव पर सेंगोल बनवाया गया। सेंगोल के तैयार होने के बाद उसको लार्ड माउंटबेटन को दे दिया गया जिन्होंने उसको जवाहरलाल नेहरू को ट्रांसफर कर दिया। नेहरू ने उसको इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के संग्रहालय में स्थापित करवा दिया। ये पुरानी बात हो गई। सेंगोल जहां था वहां था। वहां से सेंगोल को लाकर नई संसद भवन में रख दिया गया। संसद लोकतंत्र का मंदिर है। हम चाहते हैं कि वहां सेंगोल नहीं देश के संविधान की एक प्रति रखी जाए। उसी से देश चलेगा। देश संविधान से चलेगा। लोकतंत्र से चलेगा। अगर लोकतंत्र को बचाना है तो सेंगोल को हटाना है।‘ 

समाजवादी पार्टी के सांसद ने सेंगोल को लेकर जो टिप्पणी की उसपर विचार करने की आवश्यकता है। पहली बात तो 1950 में संविधान लागू होने के बाद से ही देश संविधान से ही चल रहा है। अगर इमरजेंसी के कालखंड को छोड़ दें जब संविधान की प्रस्तावना को न केवल अवैध तरीके बदला गया बल्कि संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों को भी खत्म कर दा गया था। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया था। संविधान में संशोधन भी किए गए। शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद संविधान को बदला भी गया। इन घटनाओं के अलावा संविधान कभी खतरे में नहीं आया। दूसरी बात जो आर के चौधरी ने कही कि सेंगोल को पुरोहितों के कहने पर तैयार करवाया गया। यह तथ्य से परे प्रतीत होता है। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण का प्रस्ताव चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर हुआ था। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण की परंपरा चोल राजवंश में थी उसको स्वतंत्र भारत में सनातन से जोड़कर अपनाया गया था। थिरूवावडुथुरई अधीनम तमिलनाडू के शिवभक्तों का एक बड़ा और प्रभावशाली समूह है। यह समूह सनातन में आस्था रखनेवाले पिछड़े समुदाय का है। समाज के उस हिस्से को सेंगोल बनाने और सत्ता हस्तांतरण समारोह की जिम्मेदारी दी गई जो गैर ब्राह्मण थे, लेकिन शिव और सनातन में उनकी आस्था थी। जब आर के चौधरी बोल रहे थे तो स्पष्ट हो रहा था कि वो सेंगोल के बारे में समग्र तथ्यों से अंजान थे। वो अपनी राजनीति करने के लिए अपनी सुविधानुसार बातों को रखने का प्रयास कर रहे हैं। आर के चौधरी के इस बयान के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषक भी अपने अपने तरीके से सेंगोल को हिंदू धर्म प्रतीक बताकर उसके विपोध की राजनीति को हवा देने में जुट गए। एक विश्लेषक ने तो यहां तक कह दिया कि सेंगोल की स्थापना के समय जिस तरह से सनातन धर्म के गुरुओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने संसद भवन में प्रवेश किया था वो पंथ निरपेक्ष संविधान के अनुकूल नहीं है। प्रधानमंत्री तक को ये सलाह दे दी गई कि उनको इस तरह से हिंदू धर्म प्रतीकों के सार्वजनिक प्रदर्शन से बचना चाहिए। उनको लगता है कि सेंगोल स्थापना या नई संसद भवन के शुभारंभ के अवसर पर किया गया आयोजन हिंदू वोटबैंक को ध्यान में रखकर किया गया था। 

जब भी इस तरह की टिप्पणी सुनने को मिलती है तो इन राजनीतिक विश्लेषकों की खटाखट और फटाफट सोच पर हंसी आती है। आज जो लोग संविधान की बात कर रहे हैं। उसको हाथ में लेकर संविधान की कसमें खा रहे हैं उनको और उनके राजनीतिक विश्लेषकों को संविधान की प्रति को खोलकर देखना चाहिए। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की अगुवाई में जब संविधान का ड्राफ्ट तैयार हो गया था तब संविधान सभा में उसी साज सज्जा को लेकर चर्चा हुई थी। सदस्यों के साथ चर्चा के उपरांत ये तय किया गया कि प्रख्यात चित्रकार नंदलाल बोस से इसकी साज सज्जा करवाई जाए। संविधान को देखें तो उसका जो भाग तीन है, जिसमें मौलिक अधिकारों की चर्चा की गई है, उस भाग के आरंभ में प्रभु श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या वापसी के चित्र अंकित हैं। इसी तरह से संविधान के भाग दो का आरंभ वैदिक काल के गुरुकुल के चित्र से की गई है। इस भाग में नागरिकता से संबंधित बातें हैं। संविधान के पहले भाग में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रतीक जैबू, जो नंदी जैसे प्रतीत होते हैं, का चित्र है। इसके आलोक में देखा जाए तो क्या ये मान लिया जाए कि संविधान निर्माताओं ने हिंदू धर्म प्रतीकों को अंगीकार किया था। क्या वो सनातन के प्रतीक चिन्हों का सार्वजनिक प्रदर्शन था या संविधान सभा के सदस्यों की मूल भावना थी। दरअसल इसको और कालांतर में संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए पंथनिरपेक्षता से मिलाकर देखें तो ये स्पष्ट होता है कि संविधान और संविधान सभा के सदस्यों के मूल भावना के विरुद्ध जाकर प्रस्तावना में पंथ निरपेक्षता जैसे शब्द जोड़े गए। 

संविधान और कानून के रक्षक सुप्रीम कोर्ट का ध्येय वाक्य देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के लोगो पर लिखा है यतो धर्मस्ततो जय: । इसका अर्थ है जहां धर्म है वहां जय है। अब इन राजनीतिक विश्लेषकों को कौन समझाए कि ये वाक्य कहां से लिया गया है। महाभारत में अनेकों बार ये पंक्ति आती है। क्या ये भी हिंदू धर्म का सार्वजनिक प्रदर्शन है। संविधान सभा के सदस्य भारत भूमि और भारत की सनातन संस्कृति की विराटता के परिचित थे। इस कारण उन्होंने सनातन और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों को उसकी मूल भावना के साथ रखा। राम और प्रकृति को समान महत्व दिया गया। बाद के दिनों में जब संकुचित मानसिकता के लोग सत्ता में आए तो वो सनातन की विराटता और भारतीय संस्कृति को समझ नहीं पाए। पंथ निरपेक्षता जैसे संकुचित शब्द से भारतीय संस्कृति को बांधने की कुचेष्टा की गई। परिणाम यह हुआ कि भारतीय समाज की सनातन परंपरा खांचों में विभाजित होती चली गई। आज जो लोग संविधान और सनातन प्रतीकों पर शोर शराबा मचा रहे हैं दरअसल वो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। संविधान को राजनीति का औजार बनाकर अपने राजनीतिक हित साध रहे हैं। संविधान का मूलाधार सनातन है जो आत्मा की तरह अजर अमर है। वो शरीर तो बदलता है लेकिन आत्मा वही रहता है। संविधान पर लाख बातें हो, खूब चर्चा हो लेकिन उसकी मूल भावना से खिलवाड़ न हो।      


Saturday, June 10, 2023

कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पर राजनीति


नई संसद के उद्घाटन को करीब एक पखवाड़ा होने को आया लेकिन सेंगोल पर प्रश्न अब भी उठ रहे हैं। स्वाधीनता के समय सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर सेंगोल को लार्ड मांउटबैटन को सौंपा गया था।फिर उनसे लेकर समारोहपूर्वक जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। सरकार का तर्क है कि सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर बनाया गया था। विपक्ष इसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। कांग्रेस इस प्रसंग को कालपनिक बता रही है। 14 अगस्त 1947 का एक चित्र भी उपलब्ध है जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में सेंगोल है और उनके साथ थिरूवावडुथुरई अधीनम के कुमारस्वामी तम्बीरमन खड़े हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर सेंगोल तैयार करने का दायित्व थिरूवावडुथुरई अधीनम को अनुरोधपूर्वक सौंपा गया था। जिस जूलर ने सेंगोल बनया था उसने भी इसको प्रमाणित कर दिया। अभी थिरूवावडुथुरई अधीनम की तरफ से एक लिखित बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वो 1947 के सेंगोल समारोह का हिस्सा रहे हैं। सरकार के आमंत्रण पर थिरूवावडुथुरई अधीनम से संतों का एक समूह सेंगोल लेकर दिल्ली गया था। वहां सबसे पहले सेंगोल को लार्ड मनाउंटबेटन को सौंपा गया। माउंटबेटन से वापस लेकर सेंगोल का गंगाजल से अभिषेक करवाया गया। अभिषेक के बाद सेंगोल को जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। 

थिरूवावडुथुरई अधीनम के मुताबिक हाल ही में अधीनम का इतिहास प्रकाशित हुआ है। उस पुस्तक में सेंगोल सिरापु नाम से एक अध्याय है जिसमें भी इस बात का उल्लेख है कि सेंगोल को पहले लार्ड माउंटबेटन को सौंपा गया और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू को। थिरूवावडुथुरई अधीनम से जुड़े मसीलामणि पिल्लै इस पूरे घटनाक्रम को अपनी आंखों से देख चुके हैं। वो इस वक्त 96 वर्ष के हैं और इस पूरे घटनाक्रम को सही बता रहे हैं। पिल्लै ने ये भी बताया कि सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण का पूरा कार्य चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर हुआ था। इस बात के भी प्रमाण हैं कि 1947 में मद्रास के कलेक्टर थिरूवावडुथुरई अधीनम आए थे और उन्होंने सेंगोल की व्यवस्था के कार्य को परखा था। कुछ लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि अगर माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था तो उसकी कोई तस्वीर क्यों नहीं है। अधीनम ने उसका भी उत्तर दिया है कि माउंटबेटन से मिलने संतों का जो समूह गया था उसमें कोई कैमरामैन नहीं था। सवाल ये उठता है कि थिरूवावडुथुरई अधीनम के दावों पर प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं। जब उस पूरी घटना के दो जीवित गवाह हैं जो ये कह रहे हैं कि माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था उसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। उनके बयान के बाद संदेह की गुंजाइश बचती कहां है। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण की परंपरा चोल राजवंश में थी उसको स्वतंत्र भारत में सनातन से जोड़कर अपनाया गया। समाज के उस हिस्से को सेंगोल बनाने और सत्ता हस्तांतरण समारोह की जिम्मेदारी दी गई जो गैर ब्राह्मण थे, लेकिन शिव और सनातन में उनकी आस्था थी। थिरूवावडुथुरई अधीनम तमिलनाडू के शिवभक्तों का एक बड़ा और प्रभावशाली समूह है। इस समुदाय को स्वाधीन देश से जोड़ने का चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का सोच था जिसको माउंटबेटन से लेकर नेहरू तक ने माना था।   

सेंगोल की कहनी पर प्रश्न उठ रहे हैं तो पंडित नेहरू से जुड़ा एक और प्रसंग याद आ रहा है। उस प्रसंग को बताने के पहले नेहरू के बारे में आधुनिक भारत के इतिहासकारों की राय देखते हैं। लगभग सभी इतिहासकारों ने इस बात पर बल दिया है कि नेहरू धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे। उनकी छवि भी इसी प्रकार से गढ़ी गई कि वो सरकारी कामों से धर्म को अलग रखना चाहते थे। इतिहासकारों से इस आकलन में चूक हुई। नेहरू सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह का कार्य किया करते थे। जब उनको लगता था कि सत्ता के लिए या राजनीति के लिए धर्म का उपयोग आवश्यक है तो वो बिल्कुल नहीं हिचकते थे। अब उस प्रसंग पर आते हैं जिससे ये बात साफ भी हो जाएगी। तिथि 14 अगस्त 1947। शाम के समय डा राजेन्द्र प्रसाद के घर पूजा और हवन आदि का आयोजन किया गया। हिंदू पुरोहितों को बुलाया गया था कि वो हवन आदि करवाएं। भारत की नदियों से पवित्र जल मंगवाए गए थे। डा राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे थे और वहां उपस्थित महिलाओं ने दोनों के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। फिर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन आदि किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने सार्वजनिक रूप से ये स्टैंड लिया था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। नेहरू इस हिंदू तरीके को अपनाने को तैयार हो गए। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। कई अन्य जगहों पर भी। बावजूद इसके आधुनिक भारत के अधिकतर इतिहासकारों ने नेहरू के व्यक्तित्व को धर्म से निरपेक्ष व्यक्तित्व के तौर पर गढ़ा। 

नेहरू से जुड़ा एक और किस्सा है। 1952 में लोकसभा का चुनाव चल रहा था। नेहरू उत्तर प्रदेश के फूलपुर में एक स्थान पर चुनावी सभा कर रहे थे। तभी उसी रास्ते से स्थानीय राजा अपने हाथी पर सवार होकर निकले। नेहरू की सभा के कारण राजा और उनके हाथी को रोक दिया गया। राजा नाराज हो गए। मंच पर बैठे नेहरू को जब इस बात का पता चला तो वो वहां से उतरकर राजा के पास पहुंचे। वहां पहुंचकर नेहरू ने महाराज की जय हो कहकर उनका अभिवादन किया। राजा खुश हो गए। हाथी से उतरकर नेहरू के साथ मंच पर गए और सभा में उपस्थित जनता से नेहरू को वोट देने की अपील कर दी। उसके बाद राजा वहां से चले गए। राजा के जाने के बाद नेहरू ने उस अधिकारी को समझाया कि राजा को जयकारे की जरूरत थी और और मुझको वोट की। मैंने राजा की इच्छा पूरी की और उन्होंने मेरी। इसी तरह से लेनार्ड मोस्ले की 1961 में प्रकाशित पुस्तक द लास्ट डेज आफ ब्रिटिश राज में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नेहरू रेडक्लिफ को भारत पाकिस्तान के सीमा निर्धारण के लिए अधिक समय देने के पक्ष में नहीं थे। उनको लगता था कि जल्द से जल्द भारत की स्वाधीन सरकार बने। सीमा निर्धारण बाद में दोनों देश आपसी सहमति से कर लेंगे। परिणाम सबके सामने है। 

सेंगोल प्रकरण में प्रश्न तो ये उठाया जाना चाहिए कि भारत के इतिहास का इतना महत्वपूर्ण अध्याय क्यों दब या दबा दिया गया। सेंगोल जैसा महत्वपूर्ण प्रतीक राष्ट्रीय संग्रहालय में न होकर प्रयागराज के संग्रहालय में क्यों और कैसे पहुंचा। सनातन को मानने वाले समाज के पिछड़े वर्ग के समूह अधीनम को प्रतिनिधित्व देने के राजा जी की इंक्लूसिव सलाह को इतिहास के पन्नों में गुम करने का षडयंत्र किसने रचा। देश इन प्रश्नों का उत्तर चाहता है। कहानियों में उलझाने से बेहतर है कि इन प्रश्नों पर बात हो।