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Saturday, September 22, 2018

मृत्यु पर मौन क्यों ‘सरकार’ ?


दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हिंदी के वामपंथी कवि-आलोचक विष्णु खरे का निधन हो गया। विष्णु खरे को चंद महीने पहले ही केजरीवाल सरकार ने, मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल खत्म होने के बाद, हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके निधन के बाद दिल्ली  के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शोक जताते हुए कोई ट्वीट नहीं किया जबकि मुख्यमंत्री हिंदी अकादमी का अध्यक्ष भी होता हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जगह उनके उप ने ट्वीट कर विष्णु खरे के निधन पर शोक जताया। मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया ‘हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष, साहित्य पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्ती और हम सबके प्रेरणास्त्रोत श्री विष्णु खरे जी का देहावसान हो गया है। उनके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। इस दुखद क्षण में हम सब उनके परिवार के साथ हैं।‘ अरविंद केजरीवाल के ट्वीट नहीं करने पर सोशल मीडिया पर सवाल खडे होने लगे हैं। किसी को ये संवेदनहीनता नजर आ रही है तो कोई ये कह रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के दबाव में विष्णु खरे को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया था लिहाजा वो शुरू से खरे साहब को लेकर उदासीन थे। वजह चाहे जो हो पर एक संस्थान के उपाध्यक्ष के निधन पर उसी संस्थान के अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से शोक प्रकट नहीं करना खेदजनक और असंवेदनशील है। हिंदी अकादमी को नजदीक से जानने वाले लोग इसकी एक अलग ही वजह बताते हैं। दिल्ली के साहित्यिक हलके में इस बात की चर्चा है कि अरविंद केजरीवाल चाहते थे कि मैत्रेयी पुष्पा को एक और कार्यकाल मिले, आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडे भी इसी मत के थे लेकिन मनीष सिसोदिया, मैत्रेयी जी की जगह पर किसी और को लाना चाहते थे। मनीष सिसोदिया ने इसके लिए अपने एक पत्रकार मित्र की सलाह पर विष्णु खरे का नाम आगे बढाया और फिर उसको अनुमोदन भी करवा लिया। जब विष्णु खरे जी को दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तब भी ये सवाल उठा था कि दिल्ली-एनसीआर के लेखक को छोड़कर विष्णु खरे जी को मुंबई से क्यों लाया गया। लेकिन सरकार के अपने फैसले होते हैं जिनकी आलोचना समय के साथ दबती चली जाती है।  अब खरे साहब के निधन के बाद तो ये बातें बिल्कुल ही अर्थहीन हो गई हैं।  अब केजरीवाल के पक्ष के लोग इस बात को लेकर शोरगुल कर रहे हैं कि साहित्य और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए। मुझे इस संदर्भ में साहित्य और राजनीति के संबंधों पर लिखा विजयदेव नारायण साही का एक लेख याद आ रहा है। अपने उस लेख में विजयदेव नारायण साही ने उस वक्त कहा था ‘ जिस तरह से आज राजनीति से साहित्य को अलग रखने का नारा लगानेवाले मध्यवर्गीय कलाकार प्रतिक्रियावादी हैं, उसी तरह से राजनीति की तानाशाही में कैद करके समस्त साहित्य को पार्टी का अस्त्र मात्र घोषित करनेवाले कला के दुश्मन हैं।‘ साहित्य और राजनीति का इस तरह से घालमेल किया गया कि वो अलग हो ही नहीं सकती, कम से कम जबतक साहित्य पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। यह मैं इस वजह से कह रहा हूं क्योंकि लेनिन के प्रसिद्ध लेख ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’ का असर भारत के लेखकों, खासतौर पर हिंदी के लेखकों पर बड़ा गहरा पड़ा था। लेनिन के उस लेख में कहा गया था कि ‘साहित्य को सर्वहारा के साझा उद्देश्य का अंग होना चाहिए और उसे पार्टी यंत्र का दांता और पेंच बन जाना चाहिए।‘ लेनिन के उस लेख की व्याख्या इस तरह के की गई जिसमें प्रतिबद्धता को पार्टी की सदस्यता से जोड़ दिया गया। सालों तक इस प्रतिबद्धता को कायम रखा गया, कमोबेश अब भी है। तो जब हम साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात करते हैं तो वो सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करनेवाली बात लगती है। साहित्य और राजनीति का हमारे समाज में गहरा संबंध रहा है। लेकिन राजनीतिज्ञों में साहित्य या साहित्यकारों को लेकर जिस तरह की उदासीनता इस वक्त है वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला है। राजनीति को साहित्य के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। किसी वरिष्ठ लेखक की मृत्यु पर ‘सरकार’ का मौन सवालों के घेरे में है।  
सिर्फ राजनीति और राजनेता ही संवेदनहीन हुए हों ऐसा नहीं है। विष्णु खरे जी जब जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, तो हिंदी अकादमी में उनकी पूर्ववर्ती उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की एक टिप्पणी भी विवादास्पद हो गई है। मैत्रेयी पुष्पा ने पहले अपनी वॉल पर युवा कवि शायक आलोक का एक पत्र लगाया जो कि उऩको ही संबोधित था। पत्र में लिखा था ‘आभारी हूं कि हम दिल्ली में बसे कुछ युवा जो संघर्षरत हैं, और साहित्यिक वैचारिक रचनात्मकता से जुड़े हैं, उन्हें आपने समय समय पर हिन्दी अकादमी मंच पर आमंत्रित किया और कुछ आर्थिक लाभ भी दिया ताकि हमारा हौसला न टूटे. युवा कवि प्रकाश ने अपने संघर्ष से तंग आकर आत्महत्या कर ली. उसके बाद श्री वाजपेयी ने वार्षिक युवा संगम का आयोजन शुरू किया और माह दूमाह पर युवा कवियों से कविताएं पढ़ा उन्हें कुछ आर्थिक लाभ देते हैं. उन्होंने प्रकाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास भी किया है जहां युवा कवियों के प्रथम संग्रह छाप वे अपनी ग्लानि धो रहे. क्या हम भी आत्महत्या कर लें ताकि आचार्य विष्णु खरे की हिन्दी अकादमी जो मृतकों व मृत्यु-उत्सुक कवियों के ही आयोजन में लगी है वह शायक-वृत्ति या अविनाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास कर शेष रह जाते युवा कवियों का कुछ कल्याण कर सके?’ इसके उत्तर में मैत्रेयी ने जो लिखा उसको लेकर उनपर हमले शुरू हो गए हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने शायक के पत्र का उत्तर भी फेसबुक पर ही दिया और लिखा- तुम्हारी चिट्ठी का क्या जवाब दूं? मैंने युवा कलमकारों और कलाकारों के लिए जो संकल्प लिये थे और कार्यान्वित किये, मेरे वो इरादे पुरानी पीढ़ी को घातक लगे, जैसे उनकी सत्ता छिन रही हो। परिणाम तुम युवकों युवतियों के सामने है। हिंदी अकादमी....। मैत्रेयी पुष्पा के इस उत्तर को विष्णु खरे की परोक्ष आलोचना माना गया। पुरानी पीढ़ी और बूढ़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी उनके लिए लिए ही किया गया जान पड़ा। चर्चा तो ये भी चली कि मैत्रेयी ने ही शायक को कहकर वो खत लिखवाया फिर उसका उत्तर दिया। क्योंकि शायक का खत मैत्रेयी जी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लगाया और दस मिनट बाद ही उसका उत्तर भी पोस्ट कर दिया। इस पूरे प्रकरण के पीछे हिंदी अकादमी की पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का नया अंक और हिंदी अकादमी के आयोजनों में एक खास विचारधारा के लोगों को बुलाना है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का कहानी विशेषांक तैयार किया था और पूर्व की घोषणा के अनुसार कहानीकारों की कहानियां तय कर दी गई थीं। इस बीच उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और विष्णु खरे ने कार्यकाल संभालते ही उसमें काफी बदलाव कर दिए। साहित्य जगत को इसकी जानकारी भी मैत्रेयी पुष्पा के फेसबुक वॉल पर उनकी पोस्ट से ही हुई थी। अब शायक आलोक के पत्र के माध्यम से मैत्रेयी ने जिस प्रकार से विष्णु खरे और आयोजनों में बुलाए जानेवाले बुजुर्ग लेखकों पर निशाना साधा उसकी टाइमिंग गलत हो गई। मैत्रेयी के पोस्ट के सात-आठ घंटे के बाद ही विष्णु खरे जी का निधन हो गया। उसके बाद विवाद और बढ़ गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि अब मैत्रेयी जी फेसबुक पर विवाद खड़ा कर उसका आनंद उठाने लगी हैं। जैसे राजेन्द्र जी किया करते थे, वो भी पहले विवाद उठाते थे और फिर किनारे बैठकर उसका मजा लिया करते थे। पिछले एक साल में मैत्रेयी ने कई विवादास्पद पोस्ट लिखी, छठ के दौरान नाक तक सिंदूर लगाने को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी भी उसमें शामिल है। फेसबुक पर जिस रफ्तार से विवाद वायरल होते हैं, उसका दायरा फैलता है, पक्ष और विपक्ष में दलीलें आती हैं वो विवाद उठानेवाले को आनंद से भर देने के लिए काफी होते हैं। हिंदी अकादमी और विष्णु खरे को लेकर भले ही विवाद खडा करने की कोशिश की जा रही हो लेकिन हमारे भारतीय संस्कार में किसी की मृत्यु के बाद उनके बारे में आलोचनात्मक नहीं लिखने की परंपरा रही है। अपशब्द का इस्तेमाल तो वर्जित ही होता है। विष्णु खरे जी के निधन के बाद भले ही केजरीवाल मौन रहे हों, उनकी मृत्य के पहले मैत्रेयी पुष्पा की टिप्पणी आपत्तिजनक हो लेकिन उनकी मृत्यु के फौरन बाद तो हम सबको मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना चाहिए, विवाद को हवा देकर भारतीय परंपरा की मर्यादा को ना तोड़ें। अगर बात करनी ही है, तो विष्णु खरे की कविताओं पर बात हो, उनकी रचनात्मकता को कसौटी पर कसा जाए।

Saturday, August 11, 2018

भाषा अकादमियों के जरिए राजनीति


हाल ही में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने कैबिनेट की बैठक में 15 भाषा अकादमियों के गठन को मंजूरी दी। उन भाषाओं की अकादमियां भी दिल्ली में होंगी जिनके बोलने लिखनेवाले लोग राजधानी दिल्ली में रहते हैं। भारतीय भाषाओं की पैरोकारी करनेवाले सभी लोगों को ये पहल अच्छी लग सकती है, लेकिन दिल्ली में पहले से चल रही भाषाई अकादमियों के हाल देखकर आगामी दिनों में बनने वाली इन 15 अकादमियों को लेकर बहुत उम्मीद नहीं जग रही है। बल्कि ये आशंका और बलवती हो रही है कि करदाताओं के पैसे का अपव्यय ना हो। दरअसल हमारे देश में भाषा बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है और आजादी के बाद से सभी राजनीतिक दल इसको भुनाने की जुगत में रहते हैं। केजरीवाल सरकार को भी इसमें राजनीति की संभावनाएं नजर आईं होंगी तभी एक साथ 15 भाषा अकादमियों के गठन को कैबिनेट की मंजूरी दी गई है। दिल्ली की दो भाषा अकादमी ऐसी रही हैं जिनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया जाता रहा है। पहली तो हिंदी अकादमी और दूसरी मैथिली-भोजपुरी अकादमी। उर्दू अकादमी भी अपने आयोजनों को लेकर विवादित रही हैं।  
दिल्ली की हिंदी अकादमी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दिल्ली में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के संवर्द्धन, प्रचार-प्रसार और विकास के उद्‌देश्य से 1981 में तत्कालीन दिल्ली प्रशासन ने स्वायत्तशासी संस्था के रूप में हिन्दी अकादमी की स्थापना की। इस अकादमी के अध्यक्ष दिल्ली के मुख्यमंत्री होते हैं। अकादमी के कार्यक्रमों तथा गतिविधियों के क्रियान्वयन और नियोजन में निर्णय एवं परामर्श के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री दो वर्ष की अवधि के लिए संचालन-समिति गठित करते हैं। घोषित तौर पर इसमें 25 जाने-माने साहित्यकार, लेखक, विशेषज्ञ, पत्रकार आदि नामित किए जाते हैं। इसके अलावा अकादमी में समय-समय पर विभिन्न कार्यों के निष्पादन/निर्णय के लिए अलग-अलग समितियां बनायी जाती है जो उपयुक्त दिशा-निर्देशन के साथ-साथ यह सुनिश्चित करती हैं कि योजनाओं के अंतर्गत लाभ उठाने वालों के चयन में निष्पक्षता बरती जाए। इसके अलावा इसके इसके करीब दर्जन भर घोषित उद्देश्य भी हैं जिसमें हिंदी को लेकर बड़े बड़े दावे किए गए हैं।
अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने क बाद से हिंदी अकादमी भी किसी ना किसी विवाद में पड़ती रही, पहले अपने संचालन समिति के गठन को लेकर तो फिर भाषा सम्मान में अंतिम समय में जोड़े गए नामों को लेकर। मैत्रेयी पुष्पा जब हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष रहीं तब भी इसके मंच पर नेता आए, उनको लाखों का भुगतान भी किया गया। सवाल भी उठे लेकिन ये पता नहीं चल सका कि ऑडिट में उस खर्चे को किस तरह से समायोजित किया गया। कलांतार में मैत्रेयी पुष्पा ने अकादमी को लगभग विवाद मुक्त कर दिया था और अकादमी में ठोस काम-काज भी होने लगे थे, पत्रिका भी मासिक होकर अच्छी निकल रही थी। यह अलहदा मुद्दा है कि मैत्रेयी पुष्पा के इर्द-गिर्द भी कुछ लोग जमा होकर लाभ उठा रहे थे। ये तो सत्ता और समाज का चरित्र भी है। मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल के खत्म होने के बाद अब जो उपाध्यक्ष बने हैं वो तो सीधे तौर पर राजनीति पर उतर आए हैं। मैत्रेयी के बाद दिल्ली सरकार ने हिंदी अकादमी की कमान मुंबई में रहनेवाले मशहूर और बुजुर्ग मार्क्सवादी कवि लेखक विष्णु खरे को सौंपी। विष्णु खरे की नियुक्ति पर यह भी सवाल उठता है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष मुंबई में रहनेवाले व्यक्ति को क्यों बनाया गया? क्या दिल्ली की धरती साहित्यकार विहीन हो गई थी। या दिल्ली में विष्णु खरे से योग्य को व्यक्ति था नहीं? अकादमी में अबतक ये परिपाटी रही है कि इसका उपाध्यक्ष दिल्ली का रहनेवाले होता है या वो व्यक्ति होता है जो काम करने के लिए दिल्ली आता हो। यह इस वजह से भी कह रहा हूं कि मुंबई के व्यक्ति को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने से वित्तीय बोझ बढ़ता है। अगर उपाध्यक्ष हर सप्ताह अपने घर मुंबई जाना चाहे तो उसको अकादमी की तरफ से मुंबई आने जाने का हवाई किराया देना पड़ेगा। वो दिल्ली में रहेगा तो उसके रहने खाने का इंतजाम करना होगा। इसका प्रावधान दिल्ली की हिंदी अकादमी में नहीं है। अगर उपाध्यक्ष दिल्ली सरकार से अपने आवास की व्यवस्था का अनुरोध कर दें तो एक और समस्या खड़ी हो सकती है। दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के लिए कोई वेतन तय नहीं है बल्कि उनको हर महीने पांच हजार रुपए यात्रा व्यय के लिए दिए जाने का प्रावधान है। तो उपाध्यक्ष पर अगर इसके अलावा किसी प्रकार का खर्च होता है तो उसको कैसे जायज ठहराया जाएगा, ये देखना दिलचस्प होगा। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष को अकादमी के कार्यक्रमों में शामिल होने के एवज में कोई धन देने का प्रावधान भी नहीं है इस वजह से अबतक निमंत्रण पत्रों पर उपाध्यक्ष का सानिध्य छपता रहा है। अगर अकादमी का उपाध्यक्ष किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता करता है या उसमें वक्ता के तौर पर शामिल होता है तो वो धन ले सकता है लेकिन वो धन लेना कितना नैतिक होता है यह तो उपाध्यक्ष ही बता सकता है, या फिर हिंदी अकादमी के अध्यक्ष होने के नाते दिल्ली की जनता को अरविंद केजरीवाल से ये जानने का हक है।
दिल्ली की हिंदी अकादमी के नए नवेले उपाध्यक्ष खरे ने अभी वार्षिक पुरस्कार समारोह में मंच से वहां मौजूद लोगों से राजनीतिक अपील की। उन्होंने मंच से कहा कि नरेन्द्र मोदी को वोट मत देना। यह बात समझ से परे है कि एक साहित्यिक समारोह में सरकारी अकादमी का उपाध्यक्ष उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी में मोदी को वोट नहीं देने की अपील क्यों करता है और उस अपील पर उपमुख्यमंत्री खामोश क्यों रहता है। समारोह में उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा कि हो सकता है कि नए उपाध्यक्ष सूबे की सरकार को खुश करने के लिए अपनी सीमा से बाहर चले गए हों। अपने छोटे से वक्तव्य में उन्होंने साहित्यकारों से कम्युनिस्ट होने की अपेक्षा भी जता दी थी। दरअसल विष्णु खरे साहित्य की जिस पाठशाला से आते हैं वहां साहित्यिक संगठन अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करते हैं, उन्हीं के इशारे पर लेखन करते हैं। अंग्रेजी का एक कहावत है ना कि ल्ड हैबिट डाई हार्ड मतलब कि पुरानी आदतें जल्दी जाती नहीं है। यह तो हिंदी अकादमी की बात हुई लेकिन इसके पहले दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच पर नीतीश कुमार को बुलाकर केजरीवाल की राजनीति चमकाने की कोशिश की गई थी। तब भी उसको लेकर सवाल खड़े हुए थे, लेकिन ना तो सरकार से ना ही अकादमी की तरफ से कोई ठोस उत्तर आया था।
अब अगर हम दिल्ली की भाषा अकादमियों के प्रशासनिक ढांचे पर नजर डालें तो वहां सालों से तदर्श व्यवस्था चल रही है। हिंदी अकादमी की ही बात करें तो वहां कई वर्षों से पूर्णकालिक सचिव नहीं है। अभी संस्कृत अकादमी के सचिव को हिंदी अकादमी का अतिरिक्त प्रभार है। मौथिली भोजपुरी अकादमी में भी तदर्श व्यवस्था लागू है। उर्दू में भी पूर्णकालिक सचिव नहीं है। इन अकादमियों से लंबे समय से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि किसी भी भाषा अकादमी के पास स्थायी सचिव नहीं है ।भाषा अकादमियों को लेकर केजरीवाल सरकार कितनी गंभीर है यह इससे ही पता चलता है कि इन अकादमियों को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी जिस सचिव पर है वही तदर्थ है। हिंदी अकादमी में आखिरी पूर्णकालिक सचिव ज्योतिष जोशी थे उसके बाद से तदर्थ व्यवस्था चल रही है। हिंदी के लेखक भगवानदास मोरवाल का चयन हिंदी अकादमी के सचिव के रूप में हो गया था लेकिन उसाक नोटिफिकेशन नहीं हो पाया। साहित्यिक हलके में चर्चा यह है कि मैत्रेयी पुष्पा नहीं चाहती थीं कि मोरवाल जी उनके कार्यकाल मे सचिव बनें। सचिव के नहीं होने से इन अकादमियों का कामकाज प्रभावित होता है।
भाषा, साहित्य और संस्कृति का मामला ऐसा है जहां कि गंभीरता से काम करने की जरूरत होती है, तदर्थ व्यवस्था से राजनीति तो चमक सकती है, लोगों को लुभाया जा सकता है लेकिन कुछ ठोस हो नहीं पाता है। जैसे अभी हिंदी अकादमी ने जो पुरस्कार दिए हैं उसमें मुंबई के रहनेवाले जावेद अख्तर को श्लाका सम्मान दिया गया। इसपर भी सवाल है। इसी तरह से दिल्ली के बाहर वालों को भी अन्य पुरस्कार दिए गए। दिल्ली के लोगों के बीच काम करने की जिम्मेदारी इन अकादमियों पर थी लेकिन उसको राष्ट्रीय पहचान दिलाने के चक्कर में ना तो दिल्ली में ठीक से काम हो पा रहा है और ना ही राष्ट्रीय पहचान बन पा रही है, इन अकादमियों के कर्ताधर्ताओं को ये समझना होगा कि पुरस्कार दे देना सबसे आसान काम है लेकिन भाषा के लिए जमीन पर काम करना बहुत कठिन है लेकिन जब मंशा ही राजनीति की हो तो फिर उम्मीद क्यों करें ठोस जमीनी काम की।   

Saturday, May 13, 2017

नंबर टू के झगड़े में AAP का बंटाधार! ·

आम आदमी पार्टी का झगड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। जो चीजें सामने नहींआ रही थीं वो भी अब सामने आने लगी हैं। अरविंद केजरीवाल पर अपने रिश्तेदारों को आर्थिक फायदा पहुंचाने का आरोप लगा है। एक समय में उनके लेफ्टिनेंट रहे दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा ने ही केजरीवाल पर पैसों के लेनदेन का आरोप लगाया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ छवि केजरीवाल की सबसे बड़ी पूंजी थी। उनकी ईमानदारी को चौबीस कैरेट का माना जाता था, लेकिन जिस तरह से आरोप लग रहे हैं उससे उनकी बेदाग छवि पर बट्टा लग रहा है। दरअसल कपिल मिश्रा भी उस रणनीति को अपना रहे हैं जोकेजरीवाल अपनाते थे। आरोप लगाकर नेताओं को संदिग्ध बना देना। केजरीवाल ने तो अपनी उस रणनीति को मीडिया के कंधे पर बैठकर सत्ता तक पहुंचा दिया था लेकिन कपिल मिश्रा कहां तक पहुंचा पाएंगे यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन इतनी कम अवधि में दिल्ली में प्रचंड बहुत हासिल करनेवाली पार्टी का ये हश्र होगा इसकीकल्पना तक किसी ने नहीं की थी। एक बार मैंने इनकी पार्टी की गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए ट्वीट किया था कि अनुभवहीनता का कोई विकल्प नहीं होता तो दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को ये टिप्पणी बुरी लगी थी और उन्होंने ट्वीट पर ही उसका प्रतिवाद भी किया था । अब एक बार मनीष जी से आग्रह है कि वो फिर से मेरी टिप्पणी पर दौर करेंगे तो उनको अपनी टिप्पणी तात्कालिकता में की गई प्रतीत होगी। खैर ये अलहदा मुद्दा है।
अब हम इस बात पर विचार करते हैं कि आम आदमी पार्टी में इस तरह की कलह क्यों हो रही है। कई लोगों का मानना है कि कुमार विश्वास पार्टी के संयोजक बनना चाहते हैं और वो कपिल मिश्रा के कंधे पर रखकर बंदूक चला रहे हैं। संभव है कि इस तरह के आंकलन करनेवालों के पास अपने तर्क हों लेकिन मेरा मानना है कि ये लड़ाई पार्टी में नंबर टू की है। कुमार विश्वास को लगता है कि अरविंद केजरीवाल के बाद वो आम आदमी पार्टी के सबसे विश्वसनीय ना भी हों तो सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं। कुमार को सुनने के लिए कवि सम्मेलनों में भीड़ लगती रही है लेकिन राजनीति में उनके कितने समर्थक हैं यह सामने आना बाकी है। कुमार विश्वास और मनीष सिसोदिया दोनों गाजियाबाद के पास के पिलखुआ कस्बे से आते हैं और उनको नजदीक से जाननेवालों का मानना है कि कुमार और मनीष सहपाठी भी रहे हैं। आंदोलन के दौर और उसके पहले दोनों दोस्त भी थे। लेकिन एक पुरानी कहावत है कि सत्ता ना तो दोस्त देखती है और ना ही दुश्मन, उसका अपना ही व्याकरण चलता है। अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मनीष सिसोदिया को उपमुख्यमंत्री बनाकर प्रशासनिक कमान सौंप दी। उस वक्त अरविंद केजरीवाल को लग रहा होगा कि पूरे देश को उनकी आवश्यकता है, लिहाजा वो दौरे आदि करेंगे । अरविंद अपनी इसी महात्वाकांक्षा के चलते पंजाब भी गए और गोवा का चुनाव भी लड़ा। पंजाब में प्रमु विपक्षी दल बन पाए तो गोवा विधानसभा चुनाव में पार्टी अपना खाता नहीं खोल पाई। पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल ने दिल्ली को कम वक्त दिया और पार्टी में नेताओं से भी दूर होते चले गए। दिल्ली पूरी तरह से मनीष के हवाले कर दिया लेकिन आंदोलन के दौर के साथी कुमार विश्वास को कुछ भी नहीं मिला। कुमार को अपेक्षा थी कि पार्टी उनका उपयोग करेगी लेकिन उनकी तो दिल्ली की हिंदी अकादमी में भी ज्यादा नहीं चल पा रही थी। अब कवि मन को जख्मी करने के लिएइतना काफी था। दूसरे जब कुमार विश्वास ने दिल्ली में अपने जन्मदिन की पार्टी रखी तो उसमें बीजेपी के नेताओं समेत दिल्ली के उस वक्त के पुलिस कमिश्नर बस्सी को आमंत्रित कर लिया था। उस जश्न में केजरीवाल साहब को भी आना था लेकिन जब केजरीवाल को वहां उपस्थित मेहमानों का पता चला तो उन्होंने काफिले को इंडिया गेट से ही वापस घर की तरफ मोड़ लिया था । ऐसी चर्चा उस वक्त राजनीतित हलकों में थी। माना जाता है कि कुमार के प्रति अविश्वास वहीं से पनप गया। यह अविश्वास बढ़ता ही गया क्योंकि दोनों के बीच संवाद भी कम होने लगे थे।

फिर राज्यसभा की तीन सीटों को लेकर पार्टी में रणनीतियां बनने लगीं। अगले साल जनवरी में दिल्ली से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। अगर सब सामान्य रहा तो ये तीनों सीटें आम आदमी पार्टी को मिलनी तय हैं। इन तीन सीटों के लिए कम से कम आधे दर्जन दावेदार हैं जिनमें से कुमार विश्वास भी एक हैं। कुमार को यह लगता होगा कि मनीष को उपमुख्यमंत्री का पद मिला तो उनको राज्यसभा तो मिलना ही चाहिए। अपेक्षाएं बढ़ी जा रही थीं लेकिन केजरीवाल अपने पत्ते खोलने को तैयार नहीं थे।इस बीच कुमार विश्वास और बीजेपी की नजदीकियों की खबरें भी फिजां में तैरती रहीं और इन खबरों ने भी पार्टी में अविश्वास को गहरा किया। दरअसल अगर हम देखें तो केजरीवाल जी अपनी पार्टी के लोगों को संभाल कर नहीं रख पा रहे हैं। आंदोलन के जमाने के उनके साथी एक एक करके उनसे अलग होते चले गए चाहे वो शाजिया इल्मी हों, शिवेन्द्र सिंह या फिर प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और योगेन्द्र यादव जैसे वरिष्ठ सहयोगी। सवाल यही उठता है कि ऐसा क्यों होता है। ऐसा इस वजह से भी होता है कि इस तरह की पार्टी में जब लोग जुड़ते हैं तो उनका कोई वैचारिक आधार नहीं होता है। वो बस किसी खास मकसद के लिए पार्टी से जुड़ते चलते हैं और वो मकसद पूरा होने और ना होने की दशा में लोगों का मोहभंग होता चलता है। आम आदमी पार्टी के साथ भी कमोबेश वही हो रहा है। दूसरी वजह होती है सत्ता की चाहत। इसके बारे में क्या कहा जाए ये तो साफ ही है। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी में नंबर टू होने की इस लड़ाई में कुमार को विजय मिलती है या मनीष बने रहते हैं ।      

Wednesday, May 3, 2017

AAP की बुनियाद उसकी चुनौती

एक के बाद एक हार के बाद दिल्ली की आम आदमी पार्टी अब आंतरिक कलह से जूझ रही है। दो ढाई साल पहले जिस पार्टी को दिल्ली ती जनता ने प्रचंड बहुमत से दिल्ली की गद्दी सौंपी थी वो इतने कम समय में ही इतने बड़े कलह का शिकार हो जाएगी किसी ने सोचा भी नहीं था। पंजाब में हार, दिल्ली उपचुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी और फिर दिल्ली नगर निगम में हार के बाद पार्टी के संस्थापकों में से एक कुमार विश्वास ने बगावत का बिगुल फूंक दिया है। कुमार विश्वास की पीड़ा है कि पार्टी में उनकी पूछ नहीं हो रही और पार्टी के एक विधायक ने उनको भारतीय जनता पार्टी का एजेंट कह दिया। विधायक के इस आरोप के बाद भड़के कुमार को मनाने का दौर चल रहा है।पार्टी के नेता पहले उनको सार्वजनिक रूप से नसीहत भी देते हैं और फिर उनको मनाने उनके घर भी पहुंच जाते हैं। किसी का आंकलन है कि कुमार विश्वास अपनी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पर दबाव बनाकर राज्यसभा की सीट पक्की करना चाहते हैं। दिल्ली में अगले साल जनवरी में तीन राज्यसभा की सीट खाली हो रही है। कुमार विश्वास को मनाने के लिए पार्टी के नेता क्यों परेशान हो रहे हैं यह समझ से परे है। क्या कुमार का इतना बड़ा जनाधार है कि वो आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुमार के जनाधार का टेस्ट होना अभी शेष है।
कुमार विश्वास को लेकर पार्टी में भले ही अलग अलग राय दिख रही हो लेकिन आम आदमी पार्टी की समस्या कुछ अलग है। पार्टी के नेताओं के झगड़े के बीच राजनीतिक विश्लेषक भी इस समस्या पर गंभीरता से विचार किए बिना सतही तौर पर अंतर्कलह के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल का बड़बोलापन, उनकी नकारात्मक राजनीति, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मर्यादाहीन शब्दों से संबोधित करने आदि को जनता से उनके दूर जाने की वजह बता रहे हैं । जबकि इसके मूल में वजह कुछ और है। जब केजरीवाल ने अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को राजनीतिक पार्टी में बदलकर चुनावी राजनीति में आने का एलान किया था तब उनके पास भ्रष्टाचार से लड़ने के जज्बे की पूंजी थी। जब उन्होंने राजनीतिक दल बनाया तो उनका कोई वैचारिक आधार नहीं था। वो भ्रष्टाचार विरोधी लहर पर सवार थे और लोगों को लग रहा था कि एक ऐसा नेता आया है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ सकता है। उत्साह में उस वक्त कई लोगों ने केजरीवाल की तुलना ‘नायक’ फिल्म के हीरो अनिल कपूर के किरदार से करना शुरू कर दिया था। लेकिन कोई भी पार्टी बगैर वैचारिक आधार के लंबे समय तक राजनीति नहीं कर सकती है। केजरीवाल ने एक बार वैचारिक आधार के बारे में पूछे जाने पर सवाल का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि वैचारिकता से पेट नहीं भरता है। उन्होंने तब हल्के में ये भी कहा था कि जहां जनता का हित हो रहा होगा वहां वो लेफ्ट या राइट दोनों में से किसी विचारधारा से परहेज नहीं करेंगे।  
दरअसल अगर पूरी दुनिया पर नजर डालें तो एक मुद्दे की पार्टी बनकर कोई भी दल लंबे समय तक राजनीति में टिकी नहीं रह सकती है चाहे वो अमेरिका की प्रोहिबिशन पार्टी ही क्यों ना हो। जब वो पार्टी शुरू हुई थी तो उसको जोरदार जनसमर्थन मिला था जो समय के साथ छीजता चला गया। यूरोप में कई पार्टियां पर्यावरण आदि जैसे एक मुद्दे को लेकर चली लेकिन वो सफल नहीं हो पाईं।
आम आदमी पार्टी के दो-ढाई साल के कार्यकाल पर अगर गंभीरता से विचार करें तो इस पार्टी ने दिल्ली की जनता को सब्सिडी का लॉलीपॉप देने के अलावा कोई बिग टिकट आइडिया पर काम नहीं किया। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भले ही शिक्षा के क्षेत्र में हाथ-पांव मारे लेकिन वो नाकाफी थे। आधारभूत ढांचा ठीक करने की दिशा में क्या हुआ। दिल्ली की सड़कें बेहाल हैं, बारिश के मौसम में सड़कों पर पानी जमा हो जाता है। एमसीडी के साथ दिल्ली सरकार का तालमेल कभी बन ही नहीं पाया। दिल्ली की जनता ने कई बार सड़कों पर कूड़े का अंबार देखा। इसी तरह से ट्रैफिक जाम को काबू में करने के लिए आड ईवन का प्रयोग किया गया था लेकिन उसकी सफलता का आंकलन आना बाकी है।

आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाली पार्टी की छवि थी। डिमोनेटाइजेशन के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से पूरे देश के लोगों को ये संदेश दिया कि वो कालेधन के खिलाफ इस मुहिम में मजबूती से खड़ी है उसने आम आदमी पार्टी को इस मुद्दे पर भी कमजोर कर दिया। इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से नोटबंदी का विरोध किया उसका भी जनता के बीच गलत संदेश गया। अब आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाली पार्टी के तौर पर फिर से उभरने का उपक्रम करे। इसके अलावा सस्ती बिजली और पानी देकर जनता को लंबे समय तक खुश नहीं रखा जा सकता है । पार्टी को दिल्ली की जनता के उन समस्याओं को दूर करने के लिए कमर कसना होगा जिसे जनता का हर रोज सामना होता है। और इन सबसे ऊपर उनको दिल्ली के अपने जनाधार को मजबूत करना होगा ना कि देश के अन्य राज्यों में जाकर चुनाव लड़कर अपनी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के यत्न में लगना होगा। जब जब केजरीवाल दिल्ली के बाहर जाकर चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं, असफल तो होते ही हैं, दिल्ली के जनाधार में सेंध लगती है। आमआदमी पार्टी की समस्या कुमार विश्वास नहीं बल्कि पार्टी के क्रियाकलाप हैं, उसको सुधारना होगा ।           

Tuesday, April 18, 2017

तेते पांव पसारिए, जेते लांबी सौर


अकबर-बीरबल से संबंधित एक मशहूर किस्सा है। अकबर हमेशा से बीरबल की तीक्ष्ण बुद्धि और प्रतिभा से प्रभावित रहते थे। लगभग हर मसले पर बीरबल से राय मशविरा करते थे। दोनों एक दूसरे पर व्यंग्य आदि भी करते थे, कहने का अर्थ यह कि दोनों में मित्रवत संबंध थे । अकबर-बीरबल के बीच के इस तरह के संबंध को देखकर अकबर के नवरत्नों समेत अन्य दरबारियों को ईर्ष्या होती थी । उन्हें जब भी मौका मिलता वो बादशाह अकबर से बीरबल की शिकायत करते कि वो जरूरत से ज्यादा बीरबल को तरजीह देते हैं । जब बीरबल के खिलाफ अन्य दरबारियों की शिकायत बढ़ने लगी तो अकबर आजिज आने लगे और एक दिन शिकायत करनेवालों को कह दिया कि आप लोग भी बीरबल जैसे गुणी बनिए और चुनौती दी कि अगर उनमें से कोई बीरबल से ज्यादा बुद्धिमान है तो उसको बीरबल से अधिक तवज्जो दी जाएगी। अकबर ने ये कह तो दिया लेकिन उनको यह बात सालती रही । एक दिन अकबर ने अपने सभी दरबारियों को दरबार में हाजिर रहने का आदेश दिया । उस निश्चित दिन अकबर ने तीन फुट लंबी और दो फुट चौड़ी एक चादर मंगवाई । अकबर ने अपने दरबारियों से कहा कि मैं यहा लेट रहा हूं । यह चादर मुझे इस प्रकार ओढ़ाना है कि सिर से पैर तक मेरा पूरा शरीर ढक जाए। एक एक करके सभी लोग आने लगे और अकबर को उस चादर से ढंकने की कोशिश करने लगे लेकिन सामान्य कद-काठी के अकबर उस चादर से पूरी तरह से ढंक नहीं पा रहे थे। जब सब दरबारियों ने कोशिश करके देख लिया तो अकबर ने बीरबल को भी चादर ओढाने के लिए कहा । बीरबल वहां पहुंचे जहां अकबर लेटे हुए थे और अकबर से कहा- तेते पांव पसारिए जेते लांबी सौर यानि चादर के अनुसार अकबर को पैर सिकोड़ने के लिए कहा । पूरा दरबार बीरबल की बात सुनकर चकित था । अकबर ने बीरबल की बात मानी और पांव सिकोड़ लिए। छोटे चादर में भी उनका शरीर ढंक गया । अब बारी अकबर की थी, उन्होंने सभी दरबारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आप लोगों ने बीरबल की समझदारी देख ली ।
अकबर-बीरबल की इस कहानी से जो संदेश निकलते हैं वो ये कि हर शासक के पास एक तो बीरबल जैसा बुद्धिमान सलाहकार होना चाहिए और उसको पांव उतना ही फैलाना चाहिए जितनी उसकी चादर हो । दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी को अगर देखें तो वो रह-रहकर चादर का ध्यान नहीं रखती हैं और अपने पांव फैलाने लगती है। दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव के वक्त पार्टी को लगा था कि वो देश में एक वैकल्पिक राजनीतिक दल के रूप में स्वीकृत हो जाएगी और देशभर में अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए । नतीजा सबके सामने था । अरविंद केजरीवाल और कुमार विश्वास समेत तमाम नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा था । इस वक्त पार्टी के नातओं ने माना था कि देशभर में चुनाव लड़ने का फैसला गलत था और उसके पहले पार्टी को दिल्ली में मजबूत करना चाहिए। जनता ने लोकसभा चुनाव के बाद 2015 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को अभूतवूर्व बहुमत दिया। एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल की अखिल भारतीय महात्वाकांक्षा कुलांचे मारने लगी थी । पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव आए और पार्टी ने फैसला किया कि वो विधानसभा चुनावों में अपनी किस्मत आजमाएगी । पार्टी के नेता तो पंजाब में सरकार बनना तय मान रहे थे । एक बार फिर से विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की महात्वाकांक्षा औंधे मुंह गिरी, पंजाब तक में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। बीरबल की उक्ति एक बार फिर चरितार्थ होती नजर आई- तेते पांव पसारिए जेती लांबी सौर।
अब दिल्ली के उपचुनाव के नतीजे में जब आम आदमी पार्टी की जमानत जब्त हो गई तो पार्टी के लिए संकट का वक्त है। आम आदमी पार्टी का हर किसी से टकराना दिल्ली की जनता को रास नहीं आ रहा है। एक जमाने में जो आम आदमी पार्टी की ताकत थी वही अब इसकी कमजोरी बनती जा रही है। दिल्ली में ऐतिहासिक बहुमत मिलने के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं से जनता की अपेक्षा भी ऐतिहासिक थी । आम आदमी पार्टी के नेता आरोपों से लेकर कोर्ट कचहरी तक में उलझे रहे और दिल्ली की बेहतरी के लिए कुछ खास कर पाए, ये दिखा नहीं। मोहल्ला क्लीनिक से लेकर स्कूलों में बेहतर कामकाज का दावा जरूर किया गया लेकिन जिस तरह से मोहल्ला क्लीनिक में स्वास्थ्य मंत्री की बेटी को सलाहकार बनाने का मुद्दा गरमाया उसको पार्टी ठीक से हैंडल नहीं कर पाई । जाली डिग्री के मसले पर मंत्री का जेल जाना, भ्रष्टाचार में मंत्री का लिप्त पाए जाने के बाद पद से हटाया जाना, विधायक की सेक्स सीडी, इन घटनाओं से आम आदमी पार्टी की छवि छीज रही थी लेकिन पार्टी के नेता बजाए दिल्ली में अपनी जमीन मजबूत करने के दूसरे राज्यों में अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा के पोषण में लगे रहे। दिल्ली की जमीन उनके हाथ से छूटती जा रही थी । आम आदमी पार्टी के मंत्रियों पर अपने चहेतों को सरकार में नियुक्ति कर मनमाने तरीके से वेतन घर आदि दिलाने का मामला भी सामने आने लगा। 
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल के बयानों ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मनोरोगी कहना, वित्त मंत्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना आदि का भी दिल्ली की जनता पर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि जनता हर दिन इस तरह के आरोपों आदि से ऊबने लगी थी । इसका यह नुकसान हुआ कि हर कोई कहने लगा था सबसे झगड़ कर शासन नहीं चल सकता है। केजरीवाल को भले ही दिल्ली की जनता ने प्रचंड बहुमत दिया लेकिन जब दो साल बाद भी जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं तो उनकी नाराजगी सामने आने लगी । आम आदमी पार्टी ने जो चुनावी वादे किए थे उसमें से भी ज्यादातर हवाई ही साबित हुए। अब पार्टी के सामने एमसीडी चुनाव में अपनी प्रासंगिकता साबित करने का एक मौका है लेकिन जिस तरह से केजरीवाल चुनाव टालने की बात कर रहे हैं उससे लगता है कि उनका आत्मविश्वास हिल गया है और राजनीति में हिले आत्मविश्वास से जंग नहीं जीती जा सकती है ।   

Thursday, February 16, 2017

वादों की कसौटी पर आम आदमी पार्टी सरकार

वेलेंटाइन डे के दिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के दो साल पूरे हो गए । दो साल किसी भी सरकार के काम-काज का आंकलन करने के लिए काफी होता है । वेलेंटाइन डे वाली सरकार दो साल तक केंद्र सरकार से टकराव के रास्ते पर चलती रही और उनके कुछ मंत्री विवादों में पड़े । संभव है कि आम आदमी पार्टी ने टकराव को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया हो लेकिन लोकतंत्र में जनहित के कामों को लेकर आंकलन किया जाना चाहिए लिहाजा दो साल बाद प्रधानमंत्री को साइकौपैथ कहने की बात हम नहीं करेंगे ना ही फर्जीवाड़े में फंसे कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर को लेकर सवाल खड़े करेंगे और ना ही मंत्री के भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त होने को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार पर ऊंगली उठाएंगे । हम तो चुनाव पूर्व जनता से किए वादों को परखने की कोशिश करेंगे । दिल्ली महानगर में तीन बुनियादी सवालों से हर रोज यहां की जनता को जूझना पड़ता है, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य । सुरक्षा को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार पल्ला झाड़ लेती है कि दिल्ली पुलिस उसके पास नहीं है लिहाजा वो कुछ नहीं कर सकती । हलांकि चुनाव पूर्व रेडियो पर इस बात का धुंआधार प्रचार किया गया था कि राजधानी में ब्लैक स्पॉट को चिन्हित कर वहां रोशनी का इंतजाम किया जाएगा । इसका क्या हुआ पता नहीं । वादा तो सैंतालीस फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का भी था लेकिन जानकारी के मुताबिक अब तक एक भी नया फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बनाया जा सका है बल्कि आरोप तो यह भी लग रहे हैं कि दो साल बीत जाने के बाद भी सरकार इस काम के लिए जरूरी धन मुहैया नहीं करवा पाई है ।
वादा तो ये भी किया गया था कि दिल्ली में बसों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे । वादे के मुताबिक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिल्ली की करीब साढे तीन हजार बसों में सीसीटीवी कैमरा लगाया जाना था । लेकिन वादे हैं वादों का क्या । इसी तरह से फ्री वाई फाई सुविधा का भी अता-पता नहीं है । हो सकता है व्यवस्थागत दिक्कतें आ रही हों लेकिन अब तो ये चुटकुला चलने लगा है कि दिल्ली में फ्री वाई-फाई का पासवर्ड पंजाब है । खैर ये अलहदा बातें हैं । सुरक्षा के बाद सबसे जरूरी है शिक्षा । आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि वो दिल्ली में पांच सौ सरकारी स्कूल और बीस नए कॉलेजों की स्थापना करेगी । यह सही है कि दिल्ली सरकार ने पहले से बने स्कूलों में कमरों की संख्या बनाई है और सरकार के दावों के मुताबिक आठ सौ नए कमरे बनाए गए हैं । लेकिन स्कूलों में कमरों की संख्या को बढ़ाकर नए स्कूल खोलने के वादे को पूरा करने का तर्क समझ से परे हैं । शिक्षा के क्षेत्र में काम हो रहा है । हाल ही में पैरेंट्स-टीचर मीट भी हुए जो सरकारी स्कूलों में नहीं हुआ करते थे । लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये सब कॉस्मेटिक बदलाव हैं जो शिक्षा की सुधार की दिशा में किए गए वादों की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है ।
अब बात करते हैं स्वास्थ्य की । स्वास्थ्य के क्षेत्र में वादा किया गया था कि नौ सौ नए प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोले जाएंगे और अस्पतालों में तीस हजार बेड बढाए जाएंगे । इस दिशा में आम आदमी पार्टी की सरकार ने एक सौ पांच मोहल्ला क्लिनिक खोलें हैं लेकिन अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो पाया है । मोहल्ला क्लिनिक में भी मंत्री सतेन्द्र जैन की बेटी को कंसलटेंट बनाए जाने को लेकर विवाद हुआ था जिसके बाद उन्होंने पद छोड़ दिया था । बिजली बिल को आधा करने के वादे पर अमल हुआ था लेकिन उससे क्या फायदा हुआ । सरकार बिजली कंपनियों को सब्सिडी देकर उनकी ही तिजोरी भर रही है । आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि पांच साल में दिल्ली बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगी लेकिन सिर्फ पिछले ही साल दिल्ली ने बाहर से करीब अट्ठाइस हजार मिलियन यूनिट बिजली खरीदी । बिजली के बाद पानी को लेकर आम आदमी पार्टी ने मुद्दा बनाया था और कहा था कि सरकार में आते ही देश की राजधानी में पानी माफिया को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे लेकिन शुरुआती दिनों में छापेमारी के बाद अब निर्बाध गति से पानी माफिया अपना काम कर रही है । यमुना को लेकर भी बड़े बड़े वादे किए गए थे लेकिन दिल्ली की जनता हर रोज देखती है कि यमुना का क्या हाल हो गया है । यमुना किनारे आरती का कार्यक्रम करने से इस मरती हुई नदी का भला नहीं हो सकता है । इसके लिए ठोस इच्छा शक्ति और कड़े प्रशासनिक फैसलों की दरकार है । यमुना टैक्सी तो दूर की बात है यमुना सफाई भी नहीं हो पाई।

अगर समग्रता में आम आदमी पार्टी के वादों को देखें तो कमोबेश बहुत सारा काम अभी होना बाकी है । दिल्ली के कई इलाकों में सड़कों का बुरा हाल है । प्रदूषण रोकने के लिए ऑड इवन का प्रयोग कितना सफल रहा यह कहा नहीं जा सकता है क्योंकि सरकार ने इस प्रयोग की आवर्तिता बढ़ाई नहीं । आम आदमी पार्टी से दिल्ली की जनता को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन दो साल बीतने के बाद जिस तरह से काम हो रहा है उससे लगता नहीं है कि ये उम्मीदों पर खरा उतर पाएगी । जिस तरह से इसके रहनुमा अन्य राज्यों की राजनीति में उतरते जा रहे हैं उससे दिल्ली पर ध्यान देने का वक्त उनको नहीं मिल पाता है । उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के सामने अब बड़ी चुनौती है कि बाकी बचे तीन सालों में इन वादों में से कुछ को तो पूरा कर दिखाएं । 

Saturday, November 19, 2016

आरोपों की सियासत का हासिल क्या

बैंकों में नोट बदलने और पुराने नोटों को जमा करने के बीच सियासी बयानबाजी भी चरम पर है । विरोधी दल सरकार के इस फैसले के साथ दिखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन एक बड़े प्रश्नचिन्ह के साथ । प्रश्नचिन्ह सरकार की उस फैसले के पहले तैयारियों को लेकर लगाए जा रहे हैं । सरकार के फैसलों की आलोचना करना और जनता को हो रही दिक्कतों के पक्ष में खड़े होना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है । उसे करना भी चाहिए । लेकिन लोकतंत्र में आरोपों की एक लक्ष्मणरेखा ना हो लेकिन मर्यादा तो होती ही है, होनी भी चाहिए । नोटबंदी के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मोर्चा खोला हुआ है । केजरीवाल सरकार ने इस फैसले के खिलाफ विधानसभा का एक दिन का विशेष सत्र बुलाया । इस सत्र में केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले के खिलाफ जमकर भाषण आदि हुए लेकिन जब अरविंद केजरीवाल के बोलने की बारी आई तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर संगीन इल्जाम जड़ दिए । उन्होंने आयकर विभाग के दस्तावेजों को विधानसभा में दिखाते हुए आरोप लगाया कि वर्ष दो हजार तेरह में एक औद्योगिक घराने पर इंकमटैक्स पर हुई रेड के दौरान जो दस्तावेज आदि मिले थे उसमें गुजरात सीएम को पच्चीस करोड़ देने का जिक्र है । उन्होंने इसको सत्य मानते हुए नरेन्द्र मोदी के साथ साथ कांग्रेस को घेरा । उनका आरोप है कि कांग्रेस ने उस वक्त मोदी के खिलाफ कार्रवाई इस वजह से नहीं कि अगली सरकार अगर मोदी की बनती है तो वो भी उनके नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगे । अपने आरोपों को वजनदार बनाने के लिए उन्होंने राबर्ट वाड्रा को भी घसीट लिया । इस तरह के आरोप लगाकर अरविंद केजरीवाल ने सनसनी फैलाने की कोशिश की । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हवाला कांड में डायरी में लालकृष्ण आडवाणी का नाम आने के बाद उनके इस्तीफा का उदाहरण देते हुए मोदी को ललकारा । यहीं केजरीवाल से चूक हो गई । उन्होंने डायरी में नाम आने पर लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफे का हवाला तो दे दिया लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र नहीं किया । यह उसी तरह है जैसे महाभारत के युद्ध में जब द्रोणाचार्य को पराजित की योजना बनी तो कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर के ये कहते ही कि अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो वा में हतो के बाद इतनी जोर से शंख बजा दिया कि द्रोणाचार्य को नरो वा कुंजरो नहीं सुनाई दिया और उन्होंने ये मानकर कि अश्वत्थामा की मौत हो गई है, हथियार डाल दिए । हवाला के केस में सुप्रीम कोर्ट ने एविडेंस एक्ट को परिभाषित करते हुए साफ कहा था कि किसी भी डायरी में किसी का नाम होने से वो दोषी नहीं हो जाता है । डायरी में नामोल्लेख के साथ साथ सबूत भी होने चाहिए कि जिसका नाम है उसको पैसे दिए गए हैं । केजरीवाल के मोदी पर आरोप में कोई सबूत नहीं हैं ।
दरअसल अगर हम देखें तो अरविंद केजरीवाल की सियासत की बुनियाद ही आरोप रहे हैं । उन्होंने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ मिलकर मुहिम शुरू की थी तब भी उन्होंने यूपीए सरकार के सोलह मंत्रियों की एक सूची जारी कर उनपर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम लगाए थे । उन मंत्रियों में मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नाम भी शामिल था । ये उनकी रणनीति है कि आरोप लगाओ, शक का एक वातावरण तैयार करो और फिर उसका राजनीतिक फायदा उठाओ । यूपीए सरकार के दौरान लगातार भ्रष्टाचार के मामलों ने केजरीवाल के आरोपों की सियासत को उर्वर जमीन मुहैया करवाई थी । तब लोग उनपर यकीन भी कर लेते थे और उनकी सियासी जमीन मजबूत भी हो जाती थी । जब उनके आरोपों पर सवाल खड़े किए जाते थे तो वो या उनके सिपहसालार ये कहकर बच जाते थे कि मैसेंजर को क्यों शूट किया जा रहा है । कई बार तो ऐसा हुआ है कि जिनपर आकोप लगाए हैं वो खड़े हो जाते हैं तो मामला लगभग खत्म सा भी होने लगता है । नितिन गडकरी पर जब केजरीवाल ने आरोप लगाए थे तो उन्होंने अरविंद के  खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस किया था । उस केस में निचली अदालत ने जब केजरीवाल को जमानत लेने को कहा तो उन्होंने इंकार कर दिया था । हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जब उनको राहत नहीं मिली तो उनको जमानत लेनी पड़ी थी । इसी तरह से उन्होंने पिछले दिनों दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर आरोपों की झड़ी लगा दी थी जिसके बाद उनके खिलाफ जेटली ने आपराधिक मानहानि का केस दर्ज किया है जो कि अदालत में लंबित है ।  दरअसल जैसा कि उपर कहा गया है कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की शुरुआत से ही बड़े लोगों के खिलाफ शक पैदा कर आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई । खुलासा दर खुलासा किया । बड़े उद्योगपति से लेकर राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद तक पर सनसनीखेज आरोप लगाए । एक से एक संगीन इल्जाम ।  उन आरोपों को अंजाम तक पहुंचाने की मंशा नहीं थी । तर्क ये कि जाचं का काम तो एजेंसियों का है । लेकिन क्या अपने आरोपों पर अरविंद ने कभी भी पलटकर सरकार से ये पूछने कि कोशिश की कि क्या हुआ । वो सिर्फ सनसनी के लिए थे लिहाजा वो सनसनी पैदा कर खत्म होते चले गए । तात्कालिक फायदा यह हुआ कि अरविंद केजरीवाल देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ योद्धा के तौर पर स्थापित होते चले  गए । लोगों के मन में एक उम्मीद जगी कि ये शख्स अलग है । कुछ कर दिखाना चाहता है ।
सवाल यही है कि इस तरह की राजनीति कितनी दीर्घजीवी हो सकती है । दरअसल आरोपों की राजनीति काठ की हांडी की तरह होती है जो एक बार तो चढ़ सकती है बार-बार नहीं । आरोपों की सियासत का नतीजा यह हुआ कि लोग अब ये बातें करने लगे कि केजरीवाल सिर्फ आरोप लगाते हैं उसके बाद वो खामोश हो जाते हैं । दिल्ली में सरकार चलाने के दौरान उनके साथियों पर जिस तरह के आरोप लगे उससे उनकी छवि छीजती जा रही है और एक बार वो फिर से अपनी इस छीजती छवि को आरोपों की राजनीति के सहारे बेहतर करने की जुगत में लगे हैं ।
दूसरा सवाल ये खड़ा होता है कि क्या किसी विधानसभा को राजनीतिक आरोपों प्रत्यारोपों का अखाड़ा बनाने की इजाजत दी जा सकती है । आमतौर पर ये संसदीय परंपरा रही है कि जो व्यक्ति सदन का सदस्य नहीं होता है उसके बारे में आरोप लगाने या उसका नाम नहीं लिया जाता है । कई बार संसद में इस तरह के मसले उठते हैं लेकिव पीठासीन अधिकारी या खुद सदन के अध्यक्ष या सभापति उसको रोक देते हैं । लेकिन दिल्ली विधानसभा में सदन का नेता खड़े होकर एक शख्स पर आरोप लगा रहा था और विधानसभा अध्यक्ष खामोशी के साथ उनको सुन रहे थे । इस आरोप के बाद विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारियों पर भी एक बार फिर से विचार करने की जरूरत है । विधानसभा का का विशेष सत्र लोकहित से जुड़े आपात मसलों में बुलाने की परंपरा रही है लेकिन दिल्ली में तो विधानसभा का विशेष सत्र इतवनी जल्दी जल्दी बुलाए जा रहे हैं कि लोकहित के आपात मसलों को भी फिर से परिभाषित करने की जरूरत आन पड़ी है क्योंकि किसी भी दल को अपनी राजनीति के लिए विधानसभा का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।  



Friday, June 17, 2016

लाभ के पद को लेकर भ्रम

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब आम आदमी पार्टी ने सत्तर में से सड़सठ सीटें जीती थीं तब ना तो पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को और ना ही उनके इक्कीस विधायकों को ये अंदाज रहा होगा कि उनको पांच साल के पहले एक बार फिर से चुनाव मैदान में जाना पड़ेगा । अब इस बात के आसार बन रहे हैं कि सड़सठ में से इक्कीस विधायकों को पांच साल के पहले ही जनता की अदालत में जाना पड़े । दरअसल ये पूरा मामला लाभ के पद से जुड़ा है । केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने 70 में से 67 सीटें जिताकर विराट बहुमत दिया था । इस विराट बहुमत और जनता की अन्य राजनीतिक दलों से नाराजगी की वजह से केजरीवाल सरकार ने केंद्र से दो दो हाथ करने की ठान ली थी । लंबे समय तक उपराज्यपाल से उनकी ठनी हुई है ।  दिल्ली की स्थिति देश के अन्य राज्यों से अलग है और यहां के नियम कायदे भी अलग हैं । केजरीवाल ने कई नियमों को चुनौती देने का जोखिम उठाना शुरू कर दिया । संविधान और कानून की व्याख्या अलग अलग तरीके से होने लगी । केजरीवाल सरकार ने कई नियमों को अदालत में तो कई को मीडिया के मंचों के पर चुनौती दी । इसी कोलाहल के बीच केजरीवाल सरकार ने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया और अलग अलग मंत्रालयों से उनको अटैच कर दिया गया । उस वक्त तक दिल्ली में एक संसदीय सचिव नियुक्त करने का प्रावधान था । इस बारे में भी भ्रम की स्थिति है कि एक संसदीय सचिव भी लाभ के पद के दायरे में आता है या नहीं । बीजेपी के शासनकाल के दौरान नंदकिशोर गर्ग मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव बनाए गए थे लेकिन जब बाद में उसपर विवाद हुआ को उन्होंने पद छोड़ दिया था । इसी तरह से इस वक्त के दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन भी शीला दीक्षित के संसदीय सचिव रह चुके हैं । तब लाभ के पद का मामला नहीं उछला था । लेकिन जब केजरीवाल ने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाया तो इसको लाभ का पद मानते हुए एक शख्स ने चुनाव आयोग के समक्ष याचिका दायर कर दी । विवाद बढ़ता देख दिल्ली सरकार ने विधानसभा में एक बिल पास करवाया जिसमें संसदीय सचिवों को लाभ के पद के दायरे से बाहर करते हुए इसको भूतलक्षी ( रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू कर दिया ताकि उनके विधायकों पर कोई आंच नहीं आए । लेकिन इस बिल को राष्ट्रपति ने मंजूरी देने से इंकार कर दिया ।

राष्ट्रपति के इंकार करने के बाद दिल्ली की आम आदमी पार्टी और उसके सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल आगबबूला हैं और प्रधानमंत्री मोदी पर अपनी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगा रहे हैं । बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों एक दूसरे पर बयानों की तीरंदाजी कर रहे हैं । आम आदमी पार्टी को लग रहा है कि उनके इक्कीस विधायक गंभीर संकट में फंस गए हैं तो वो इसका भी राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं । हर बार की तरह इस बार भी उनके निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं ।  दरअसल इस मसले पर. ऐसा लगता है कि, आम आदमी पार्टी से गलती हो गई है लेकिन अपनी गलती को छुपाने के लिए अब इस तरह की दलीलें भी दी जा रही हैं कि उनके विधायकों ने किसी प्रकार का कोई धनालाभ या अन्य आर्थिक लाभ सरकार से नहीं लिया । कहा तो यहां तक जा रहा है कि उनके विधायकों ने संसदीय सचिव के लिए बने दफ्तरों का इस्तेमाल भी नहीं किया । लेकिन इस मामले में शिकायतकर्ता का दावा है कि उनके पास एक आरटीआई का जवाब है जिसमें बताया गया है कि विधानसभा परिसर में इन सभी इक्कीस संसदीय सचिवों को दफ्तर के लिए कमरे अलॉट किए गए थे । ये सारा मामला अब चुनाव आयोग के समक्ष है और वो सभी विधायकों का पक्ष सुनने के बाद अपना फैसला सुनाएगा । विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को फैसला लेने में करीब छह माह का समय लग सकता है । तबतक राजनीति की बिसात पर शह और मात का खेल चलता रहेगा । लेकिन यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि दो हजार छह में सोनिया गांधी ने जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष का पद संभाला था तब उनको लेकर भी सवाल खड़े हुए थे और उन्होंने रायबरेली के सांसद के तौर पर इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ा था । इसी तरह से समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सांसद जया बच्चन भी जब यूपी फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष नियुक्त की गई थी तब उनकी सदस्यता भी गई थी । बाद में वो फिर से चुनकर आई थी । इसलिए यह माना जाना चाहिए कि दिल्ली में इक्कीस सीटों पर फिर से चुनाव होना लगभग तय है, वक्त चाहे जितना लगे । दरअसल संसदीय सचिवों को लेकर हर राज्य में अलग अलग कायदे कानून हैं । पूर्वोत्तर के कई राज्यों में जहां साठ विधायकों वाली विधानसभा है वहां भी अठारह संसदीय सचिव हैं लेकिन जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने दो हजार तेरह में तेरह संसदीय सचिवों की नियुक्ति की तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने उसको जून दो हजार पंद्रह में रद्द कर दिया जबकि ये नियुक्तियां दो हजार बारह के एक कानून के तहत की गई थी । कई राज्यों के हाईकोर्ट ने संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को रद्द कर दिया है जिसके खिलाफ राज्यों की कई अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है । हिमाचल प्रदेश का मामला तो 2005 से सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है । इस मामले में अलग अलग राज्यों में भ्रम की स्थिति होने से अब वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की उचित व्याख्या कर स्थिति को साफ करे ।     

Monday, August 24, 2015

भाषाई अकादमी का दुरुपयोग ?

बिहार में विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है, औपचारिक एलान बाकी है लेकिन सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है । सभी राजनीतिक दल अपने अपने मोहरे चल रहे हैं । शह और मात का खेल जारी है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बिहार दौरों ने चुनावी फिंजा को संगीन बना दिया है । इस बार का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार और बारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए बेहद अहम है, लालू के लिए तो अस्तित्व को बचाने की लड़ाई ही है । लेकिन इन सबसे इतर भी एक वजह है जिसके कारण ये चुनाव चर्चित हो रहा है । विधानसभा की इस सियासी बाजी में इस बार साहित्यक और सांस्कृतिक संस्थाओं को भी मोहरा बनाया जा रहा है । जिन संस्थाओं पर भाषा और संस्कृति के विकास की जिम्मेदारी है वो अपने मंच का इस्तेमाल राजनीति चमकाने के लिए करने की इजाजत दे रहे हैं । ताजा मामला है दिल्ली का । दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी ने दिल्ली में एक आयोजन किया । इस कार्यक्रम का उद्देश्य भाषा से जुड़े साहित्यकारों कलाकारों और अहम शख्सियतों का सम्मान करना था ।  इस कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी बुलाया गया था । यहां तक तो सब कुछ ठीक था । कोई भी अकादमी किसी भी राजनेता को साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए या सम्मान समारोह का गवाह बनने के लिए बुला सकती है । लेकिन क्या किसी भी राजनीतिक दल के नेता या किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को इस मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करने की इजाजत दी जा सकती है । दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी के उद्देश्यों में राजनीतिक कार्यक्रमों के बारे में कुछ लिखा लिखा नहीं है । ये राजनीतिक कार्यक्रम था भी नहीं । ये कार्यक्रम तो उस सरोगेट विज्ञापन की तरह था जो हमारे यहां टेलीविजन पर चलते या अखबारों में छपते हैं । शराब के विज्ञापन पर रोक है तो फिर शराब के नाम से ही पानी की बोतल बना लो और फिर उसके विज्ञापन से जनता को बताओ कि अमुक नाम से शराब भी है । इसी तरह से दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी ने भी एक सरोगेट साहित्यक कार्यक्रम आयोजित किया था । इस कार्यक्रम में मंच पर जेडीयू और आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री बैठे थे । हाथ में हाथ डालकर उपर उठाकर नेताओं ने फोटो भी खिंचवाए और साथ होने का संदेश भी जनता को दिया । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों ने  मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच से पूरी तरह से राजनैतिक भाषण दिया । नीतीश और केजरीवाल दोनों ने मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जोरदार हमला बोला । बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयानों को खारिज किया बल्कि अपने तर्कों को सामने रखने के लिए लंबा वक्त भी लिया । नीतीश कुमार को मालूम था कि कार्यक्रम दिल्ली में है और केजरीवाल की मंच पर मौजूदगी सुर्खियां बनेंगी लिहाजा उन्होंने उस अवसर का बेहतरीन इस्तेमाल किया । दिल्ली के मुख्यमंत्री और मैथिली भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने भी इस मंच से भारतीय जनता पार्टी, नरेन्द्र मोदी, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग आदि की आलोचना की । साहित्यक सम्मान नेपथ्य में चला गया । सारी चर्चा मोदी बनाम नीतीश-केजरीवाल पर आकर टिक गई । नीतीश और केजरीवाल की दोस्ती पर भी चर्चा शुरू हो गई । इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दिल्ली की अन्य भाषाई अकादमियों के कर्मचारियों को भी काम पर लगाया गया था । जाहिर है कि दिल्ली सरकार इस कार्यक्रम को बेहतर करना चाहती थी । कार्यक्रम में राजनेताओं को भी न्योता दिया गया था । उन राजनेताओं को भी जिनका मैछिली भोजपुरी से कोई लेना देना नहीं था । आयोजकों की मंशा साफ थी । इस कार्यक्रम को राजनीतिक रखना और दिल्ली और बिहार के मुख्यमंत्रियों को अपननी बात रखने का मंच देना । उसमें मैथिली पंजाबी अकादमी सफल रही ।  
दिल्ली में जब शीला दीक्षित की सरकार ने मैथिली भोजपुरी अकादमी का गठन किया था तब उसका लक्ष्य था – मैथिली और भोजपुरी भाषओं व साहित्य-संस्कृति का उन्नयन व पल्लवन । इसके अलावा इस अकादेमी की कार्य और उद्देश्यों की एक बड़ी लंबी फेहरिश्त बेवसाइट पर मौजूद है लेकिन उसमें ये कहीं नहीं लिखा गया है कि इसके मंच से राजनीति होगी । नई बनी कमेटी ने इन दोनों भाषाओं के उन्नयन और पल्लवन के लिए क्या काम ये तो अभी ज्ञात नहीं हो सका है क्योंकि सरकार की बेवसाइट इपडेट नहीं है । हां इतना अवश्य हुआ कि केजरीवाल- नीतीश को एक साथ मंच पर लाकर अकादमी ने अपने अध्यक्ष का काम कर दिया । मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच के इस दुरुपयोग पर मुझे हरिशंकर परसाईं का एक लेख – हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं - का स्मरण हो आया है। अपने उस लेख में परसाईं जी ने कई चुटीले वाक्य लिखे हैं जो आज भी वर्षों बाद मौजूं हैं – ‘मेरे नाम, काम,, धाम सब बदल गए हैं । मैं राजनीति में शिफ्ट हो गया हूं । उसी लेख में हरिशंकर परसाईं ने आगे लिखा है – पार्टी का नाम जनमंगल कांग्रेस होगा । नाम में जन या जनता, या लोक रखने का आधुनिक राजनीति में फैशन चल पड़ा है । इसलिए हमने भी जन शब्द रख लिया । जनता से प्रार्थना है कि वो इसे गंभीरता से ना लें, इसे वर्तमान राजनीति का एक मजाक समझें । ...जनता कच्चा माल है । इससे पक्का माल विधायक मंत्री आदि बनते हैं । पक्का माल बनाने के लिए कच्चे माल को मिटाना ही पड़ता है । हम जनता को विश्वास दिलाते हैं उसे मिटाकर हम ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाएंगे । हमारा न्यूनतम कार्यक्रम सरकार में रहना है । ‘  तो क्या ये मान लिया जा कि दिल्ली की मैथिलि भोजपुरी अकादमी राजनीति में ‘शिफ्ट’ हो गई है  । क्या वो पक्का माल बनाने के काम में लग गई है । क्या वो साहित्य संस्कृति के विकास के कामों को मिटाकर ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाने में लग गई है । क्या उनका न्यूनतम कार्यक्रम सरकार बनवाना हो गया है । अगर इन सारे प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है तो ये बेहद चिंता की बात है ।  कम से कम मैथिली और भोजपुरी भाषा-भाषियों के लिए । पहले भी इन अकादमियों का राजनीति के लिए इस्तेमाल होता रहा है लकिन इस तरह से खुले आम, अकादमी के मंच से राजनीतिक भाषण पहली बार हुआ है । दरअसल दिल्ली में नई सरकार के गठन के बाद इन भाषाई अकादमियों में उपाध्यक्षों की नियुक्तियां हुईं । सरकार ने अपने मनमाफिक लेखकों और पत्रकारों को इन पदों पर बैठाया । यह सरकार का विशेषाधिकार है कि वो अपने मनमुताबिक लोगों का चयन करे लेकिन इन पद पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वो भाषा और साहित्य के विकास के लिए कोई ठोस रूपरेखा बनाएंम और उसको क्रियान्वित करें ।

अब अगर हम दिल्ली के अलावा पूरे देश की भाषाई अकादमियों पर विचार करें तो लगभग सारी अकादमियां सरकारी कार्यक्रमों को ही बढ़ावा देती हैं । इन अकादमियों पर होनेवाला खर्च करदाताओं के खून पसीने की कमाई से अर्जित किए गए पैसों की बर्बादी है । इनका उद्देश्य देखने में बहुत अच्छा लगता है , आदर्शवाद की तमाम बातें भी होती हैं लेकिन जब कार्यक्रमों को करने का वक्त आता है तो फिर राजनीतिक आकाओं की ओर देखा जाने लगता है । कभी मंत्री तो कभी मुख्यमंत्री की इच्छा पर कार्यक्रम तय किए जाते हैं, बहुधा इस बात का ख्याल रखा जाता है कि जिस पार्टी की सरकार हो उस पार्टी के विरोधियों को ना बुलाया जाए । इस चक्कर में कई बार कार्यक्रमों में भारी भरकम खर्च होने के बावजूद उससे भाषा और साहित्य को कुछ हासिल नहीं होता है । इन अकादमियों का गठन भाषा और साहित्य को बढ़ाना देने के लिए किया गया था लेकिन काला्ंतर में हुआ यह कि भाषा और साहित्य की बजाए ये अपने अपने सूबे के मुख्यमंत्रियों की छवि के विकास के लिए काम करने लगीं । नतीजा क्या हुआ कि ये अकादमियां राज्य सरकार के सूचना विभाग का एक्सटेंशन बन गईं और इसके सचिव वगैरह उस विभाग के अफसरों की तरह काम करने लगे । इन अकादमियों को चलाने के लिए कभी कभार अच्छे लेखकों का भी चयन हो जाता है लेकिन उन अच्छे लेखकों के सामने सरकारी बाबुओं से निपटने की बड़ी चुनौती होती है । सुविधाएं भी कम होती हैं । उपाध्यक्षों के लिए मात्र चार हजार रुपए महीने के मानदेय का प्रावधान है जो कि मेरी समझ से इस पद पर बैठनेवाले का अपमान है । या तो इसको अवैतनिक कर देना चाहिए या फिर सम्मानजनक राशि का प्रावधान किया जाना चाहिए । वर्ना वही होगा कि अकादमी के कार्यक्रमों को राजनीतक मंच बनाकर उसके कर्ताधर्ता अपना रसूख बढ़ाने में लग जाएंगे, और यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है जो न इन अकादमियों को खत्म कर दे सकती हैं । 

Friday, July 4, 2014

भरोसे का छलात्कार

एक पार्टी है जिसका नाम है आम आदमी पार्टी । उसके नेता हैं अरविंद केजरीवाल । दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त देश के राजनीतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह चमके थे । उसी चमक के आलोक में देश पर शासन का सपना देखने लगे थे । लोकसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस से ज्यादा लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए । जब चुनाव के नतीजे आए तो सबसे ज्यादा उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने का रिकॉर्ड बना । पार्टी के बनने के दो साल के पहले ही राजनीति का ये सितारा अस्ताचल की ओर क्यों चल पड़ा है । यह गंभीर मंथन और चिंतन की मांग करता है । राजनीतिशास्त्र के छात्रों के लिए केस स्टडी भी है । आम  आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के व्यक्तित्व के इर्द गिर्द बनी यह पार्टी उनकी ही महात्वाकांक्षा, जिद और दूसरे की नहीं सुनने की आदत का शिकार हो गई । मैंने पहले भी आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की सियासी चालों को परखते हुए कई लेख लिखे हैं । उन लेखों में इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि केजरीवाल की महात्वाकांक्षा और मैं सही बाकी सब गलत का एटीट्यूड पार्टी को ले डूबेगी । वही होता नजर आ रहा है । अरविंद केजरीवाल अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज हैं । कई लोग उनको अन्ना हजारे के आंदोलन का रणनीतिकार भी मानते हैं । होंगे भी । अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली में हुए आंदोलन के दौरान से लेकर अगर अब तक अगर केजरीवाल के कदमों का विश्लेषण किया जाए तो साफ है कि पारदर्शिता की बात करनेवाले केजरीवाल सियासत के माहिर और शातिर खिलाड़ी हैं और उतनी ही बातें सामने लाते हैं जितनी बातों से उनको लाभ होता है । जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था तब भी केजरीवाल मंच से लगातार पारदर्शिता का दावा करते थे । अनशन के वक्त रामलीला मैदान के अनशन मंच से बार बार ये एलान किया जाता था कि सरकार से पर्दे के पीछे कोई बात नहीं चल रही है । बाद में माना कि सरकार से बैक चैनल से बात हो रही थी । जनता को सरकार से अपनी बातचीत के हर कदम की चीख चीख जानकारी देनेवाले अरविंद जनता से बिना बताए सरकार से बात कर रहे थे, यह उनका खुद का खुलासा है जो हैरान करनेवाला है । बाद में केजरीवाल ने अपनी इस सिसासी बिसात को और आगे बढ़ाया और कहा कि वो अहम फैसले जनता की राय से करेंगे । उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के पहले रायशुमारी का दांव चला था । जोर शोर से प्रचारित किया गया था कि भारत में ये अपनी तरह का अनूठा प्रयोग है । लेकिन उसके पहले भी वो एक बार जनता से इस बाबत पूछ चुके थे कि क्या उन्हें कांग्रेस या यूपीए के खिलाफ प्रचार करना चाहिए या नहीं । उस वक्त भी हरियाणा के हिसार में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करने से पहले अरविंद केजरीवाल ने जनता से नहीं पूछा था । उस वक्त भी केजरीवाल कंपनी ने बगैर जनता से पूछे हिसार के उपचुनाव को लोकतंत्र का लिटमस टेस्ट घोषित कर दिया था । वहां कांग्रेस की हार को लोकतंत्र की जीत और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ जनता के गुस्से की परिणति के तौर पर पेशकिया था । दरअसल केजरीवाल या ये दोहरा रवैया बार बार दोहराया जाता रहा और बार बार जनता छली जाती रही । दिल्ली में सरकार बनाने से पहले रायशुमारी और छोड़ने का फैसला अकेले का । साथियों तक से न पूछा और ना उनकी राय मानी ।  
दरअसल अगर हम इस पूरे उठान और पतन का विश्लेषण करें तो देखते हैं कि अन्ना के दो अनशन की सफलता से उत्साहित टीम अन्ना को यह लगने लगा था कि पूरे देश की जनता उनके साथ है । भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी जनता को अन्ना में एक उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी थी । नतीजे में लोग घरों से बाहर सड़कों पर निकले । वह मध्यवर्ग घरों से निकला जिनके बारे में यह माना जाता था कि आमतौर पर वह ड्राइंगरूम में बहस कर संतोष कर लेता है । लोगों ने बदलाव का एक सपना देखा था । अन्ना में उन्हें एक ऐसा भारतीय नजर आया था जो मंदिर में रहता है, जिसका कोई परिवार नहीं है । गांधी टोपी पहनता है । बदलाव की अकुलाहट में जनता ने उनको समर्थन दिया । बाद में टीम अन्ना खंड खंड होकर बिखर गई । अलग होनेवाले सभी साथियों ने केजरीवाल पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया था । जब केजरीवाल ने अन्ना से अलग होने का फैसला किया तो मीडिया का चतुराई से इस्तेमाल करते हुए टीम केजरीवाल नाम चलवा दिया । टूटी और बिखरी हुई टीम अन्ना के बरक्श टीम केजरीवाल खड़ी होने लगी । मीडिया के कैमरों और टेलीविजन के तरंगों पर सवार होकर टीम केजरीवाल और उनका संदेश घर घर तक पहुंचने लगा । कंसेंट मैन्युफैक्टर होने लगे । दिल्ली में बिजली पानी की बढ़ती कीमतों के खिलाफ केजरीवाल की मुहिम को समर्थन मिलने लगा । नेताओं को चोर लुटेरा कहने से बॉलीवुड फिल्मों की तरह उनकी सभाओं में तालियां बजने लगी थी । तालियों की गड़गड़ाहट ने केजरीवाल की महात्वाकांक्षाओं को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया । उन्हें लगने लगा कि ताकतवर लोगों को गाली देने से जनता उनपर खुश हो जाएगी । जनता की इसी खुशी को भुनाने के लिए केजरीवाल ने राजनीति के अलावा उद्योग जगत के लोगों को भी भ्रष्ट कहना शुरू कर दिया । पुराने उपलब्ध कागजातों के आधार पर सनसनीखेज खुलासों का दावा किया जाने लगा । अबतक मीडिया उनपर मेहरबान थी । बीजेपी नेता गडकरी अपने उपर लगे आरोपों के खिलाफ कोर्ट गए तो अपनी जिद में केजरीवाल को जेल जाना पड़ा । न्यायपालिका के आगे ना तो जिद चली और ना ही जेल जाने का सियासी ड्रामा हिट हो सका ।
दिल्ली का मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद केजरीवाल की आक्रामकता बढ़ने लगी थी । फिल्म नायक का किरदार हकीकत में दिखाई देने लगा था । सियासत इतना क्रूर होता है कि वहां फिल्मी किरदार और लटके झटके चलते नहीं हैं । उसपर से उस वक्त केजरीवाल से एक रणनीतिक चूक हो गई । दिल्ली में लोकपाल के मुद्दे पर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया । लोकसभा चुनाव खत्म होने तक अपने पद छोड़ने को जायज ठहराते रहे । चुनाव में पार्टी की और खुद की करारी हार के बाद सचाई को स्वीकारते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए जनता से माफी मांगते हुए कह रहे हैं कि एक बार और मौका दें अब पद नहीं छोड़ूंगा । उनचास दिन के कार्यकाल में कई विवाद उठे । उन विवादों के बावत सवाल पूछ जाने पर उन्होंने मीडिया पर भी बिकने का आरोप लगा दिया । केजरीवाल की सबको बेईमान बताने से जनता उबने लगी थी । सबको बेईमान कहने में यह छुपा होता था कि वो ही ईमानदार हैं । लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी की कथित ईमानदारी को भी कई लोगों ने देखा ।

अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी में जनता ने जो भरोसा दिखाया था उसके साथ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने छलात्कार किया । अब ना केवल भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा निकल गई है बल्कि केजरीवाल की राजनीति भी चौराहे पर खड़ी है । उन्हें कहां जाना है इस बात को लेकर भ्रम में हैं । कभी दिल्ली में सरकार बनाने की कोशिश करते नजर आते हैं तो कभी चुनाव में जाने की बात करते हैं । अरविंद केजरीवाल को यह समझना होगा कि जनता भी उसी चौराहे पर खड़ी है जहां उनकी राजनीति खड़ी है । सबको बेईमान, चोर, लुटेरा कहने से राजनीति नहीं चलती । राजनीति का यथार्थ बेहद खुरदरा और रास्ता पथरीला होता है । अगर संभल कर नहीं चले तो लुढ़कने का खतरा रहता है, चुनाव नेता को करना होता है ।