Translate

Showing posts with label पाकीजा. Show all posts
Showing posts with label पाकीजा. Show all posts

Sunday, January 31, 2021

पचास की 'पाकीजा'


आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे। फिल्म ‘पाकीजा’ ये संवाद बहुधा सुनाई देता है। ये भी सुनने को मिलता है कि ये संवाद अमर हो गया है। दरअसल ये संवाद फिल्म ‘पाकीजा’ की मूल स्क्रिप्ट में नहीं था। जब ये सीन फिल्माया जा रहा था और कैमरा मीना कुमारी के पांव पर पहुंचा तो अचानक कमाल अमरोही के दिमाग में एक मुजरे की याद कौंधी। वो मुजरा था चंदेरी नाम की एक खूबसूरत बाई का, जिसे उन्होंने काफी पहले सुना था। मुजरे में वो अपने पांव को अदा से लहराती थी। कमाल अमरोही ने शूटिंग रोकी और स्क्रीनप्ले में बदलाव करके ये पंक्ति जोड़ दी। हिंदी फिल्मों के इतिहास में कई ऐसी फिल्में हैं जिनके बनने के दौरान के कई रोचक किस्से आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच याद किए जाते हैं। कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ इस तरह की फिल्मों में शीर्ष पर है। इसको लेकर सैकड़ों कहानियां कही-सुनी जाती हैं। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि 1957 में जिस फिल्म का मूहुर्त हुआ हो और वो पंद्रह साल बाद 1972 में रिलीज हो तो कहानियां तो बनेंगी हीं। इन पंद्रह सालों में इस फिल्म के निर्माता कमाल अमरोही ने कई बार फिल्म का नाम बदला। ‘पाकीजा’ का नाम ‘लहू पुकारेगा’ तो लगभग तय हो गया था, लेकिन जब फिल्म के रिलीज होने का वक्त आया तो वो फिर से ‘पाकीजा’ पर ही जा पहुंचे। कई पुस्तकों में और उस वक्त की पत्रिकाओं में इसका उल्लेख मिलता है कि जब कमाल अमरोही ने फिल्म बनाने की सोची थी उनके दिमाग में अपने जमाने की दो बाइयों का जीवन था। एक तो जद्दनबाई, जिनकी महफिल में जुल्फिकार अली भुट्टो और के एल सहगल जैसे दिग्गज जाते थे और दूसरी थीं गौहर जान, जिसकी आन-बान के किस्से मशहूर हैं। इसके अलावा भी कमाल अमरोही ने कई बाइयों की जिंदगी को नजदीक से देखा था और कइयों के बारे में सुना था। जब मीना कुमारी से उनकी शादी हुई तो कमाल अमरोही ने उनको लीड रोल में लेकर बाइयों की जिंदगी पर एक फिल्म बनाने की सोची जिसका नाम रखा ‘पाकीजा’।

फिल्म शुरू हुई और सबकुछ ठीक चल रहा था इस बीच कमाल अमरोही और उनकी पत्नी और फिल्म की नायिका मीना कुमारी के बीच संबंध खराब हो गए और फिल्म का काम रुक गया। इसको लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन सात साल के व्यवधान के बाद अगर ‘पाकीजा’ फिर से शुरू हो सकी तो उसके लिए संगीतकार खय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है। ये वो समय था जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को साथ काम करने के लिए अनुरोध पत्र भी लिखा था जिसे मीना कुमारी ने ठुकरा दिया था। कमाल अमरोही परेशान थे। इसी दौर में वो एक दिन अपने दोस्त ख्य्याम के घर गए। वहां जगजीत कौर ने ‘पाकीजा’ की चर्चा छेड़ दी और कमाल अमरोही से अनुरोध किया कि वो अब तक शूट की गई फिल्म उनको दिखाएं। कमाल तैयार हो गए। खय्याम, उनकी पत्नी और कमाल अमरोही ने आधी फिल्म देखी। जगजीत फिल्म के अधूरे हिस्से को देखकर इतनी उत्साहित हो गईं कि उसने मीना कुमारी को मनाने का बीड़ा उठाया। खय्याम और उनकी पत्नी मीना कुमारी के भी अच्छे दोस्त थे। जगजीत कौर ने मीना कुमारी से बात की। मीना कुमारी ने उनको बताया कि कमाल से उनकी बोलचाल बंद है, संबंध बहुत खराब हैं इसलिए ये संभव नहीं है। जगजीत ने हार नहीं मानी और मीना कुमारी को मनाने में लगी रहीं। धीरे-धीरे उनको तैयार कर लिया । मीना कुमारी ने फिर खुद ही कमाल अमरोही को संदेश भेजा कि वो पाकीजा को पूरा करने के लिए तैयार हैं। सात साल के व्यवधान के बाद ‘पाकीजा’ की शूटिंग शुरू हो सकी।

फिर वो दिन आया जब फिल्म रिलीज हुई। फिल्म के प्रीमियर पर मीना कुमारी और कमाल अमरोही साथ बैठे थे। मीना कुमारी के साथ ही खय्याम और जगजीत कौर भी थीं। फिल्म खत्म होने के बाद मीना कुमारी ने जगजीत कौर को गले से लगा लिया। सिनेमा हॉल में ही दोनों काफी देर तक आलिंगनबद्ध रहे और फिर मीना कुमारी ने जगजीत से कहा कि ‘तुम्हारी वजह से ही कमाल का ये सपना साकार हो सका है। तुम्हारी वजह से मैं इतनी अच्छी फिल्म को पूरा कर सकी।‘ भावुकता के इन क्षणों की गवाह बहुत सी फिल्मी हस्तियां बनीं। रिलीज के बाद इस फिल्म ने इतिहास रच दिया। आज पचास साल बाद भी इस फिल्म के गीत, संगीत, फिल्मांकन और निर्देशन की बारीकियां इसको क्लासिक की श्रेणी में रखती हैं।

Monday, February 13, 2017

मोहब्बत की मिसाल 'पाकीजा'

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो काल से होड़ लेती हुई कालजयी हो जाती हैं । ऐसी ही एक फिल्म है ‘पाकीज़ा’ । आज से करीब साठ साल पहले यानि सत्रह जनवरी 1957 में एक फिल्म का मुहूरत हुआ था और मुहूरत के पंद्रह साल बाद 4 फरवरी 1972 में ये फिल्म रिलीज हो पाई । यह एक ऐसी ऐतिहासिक फिल्म थी जिसको लेकर फिल्मी दुनिया में कई किवदंतियां अब भी मौजूद हैं । कहा जाता है कि जब फिल्म ‘पाकीज़ा’ बनकर तैयार हो गई तो कमाल अमरोही ने फिल्म के जानकारों और समीक्षकों को यह फिल्म दिखाई । फिल्म के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया उनको मिली उससे उनका दिल टूट गया । उन्होंने जमकर शराब पी और घर लौटकर फिर शराब पीने लगे । उस दिन कमाल अमरोही ने जितनी शराब पी थी उतनी कभी नहीं पी थी । शराब के नशे में उन्होंने अपने बच्चों को पास बुलाया और कहा कि उनके मरने के बाद वो स्टूडियो और कामकाज को अच्छी तरह से संभालें । कमाल के परिवारवाले उनकी यह हालत देखकर बेहद परेशान हो गए । उन्होंने मीना कुमारी के पास जाकर कमाल की हालत बतलाई, तब मीना कुमारी उनसे अलग रहने लगी थी । जब 1964 में मीना कुमारी कमाल का घर छोड़कर बाहर निकली थीं तो उन्होंने कसम खाई थी कि उस घर में कभी नहीं जाएंगीं । लेकिन कमाल की हालत में वो उनके घर तक आई और बाहर ही गाड़ी में बैठी रहीं । उनके बच्चों से कहा कि सब ठीक हो जाएगा । जब रात ढलने लगी तो कमाल के बच्चों ने गाड़ी में बैठी मीना कुमारी को बताया कि वो सो गए हैं तो मीना कुमारी अपने घर लौट आईं । इस तरह के कई किस्से इस फिल्म से जुड़े हैं ।
दरअसल फिल्म ‘दायरा’ के फ्लॉप होने के बाद कमाल अमरोही के दिमाग में ‘पाकीज़ा’ का आइडिया आकार लेने लगा था । वो दस्तों से कहते थे कि मीना कुमारी को लेकर ऐक ऐसी फिल्म बनाना चाहते हैं जो ना केवल ऐतिहासिक हो बल्कि अपनी महबूब पत्नी की प्रतिभा को सर्वोत्तम तरीके से उभार सके । उनके करीबी बताते हैं कि कमाल साहब हमेशा कहते थे कि शाहजहां ने अपनी मोहब्बत के लिए ताजमहल बनवाया और वो अपनी मोहब्बत के लिए ‘पाकीज़ा’ बनाना चाहते हैं । ‘पाकीज़ा’ फिल्म के संवाद की हर पंक्ति इस बात की गवाही देती है कि वो मीना कुमारी को ध्यान में रखकर लिखी गई थी । फिल्म ‘पाकीजा’ को बनाते वक्त कमाल अमरोही के दिमाग में के आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ थी और वो चाहते थे कि भव्यता और विजुअल ट्रीटमेंट में ‘पाकीज़ा’ उससे आगे निकल जाए । ‘पाकीज़ा’ पहले व्लैक एंड व्हाइट में शूट होनी शुरू हुई, तकनीक बदली तो फिर से कलर फिल्म पर शूट होने लगी उसके बाद सिनेमास्कोप का जमाना आया तो उसमें शूटिंग हुई । पहले के सारे शूट रद्दी में डाल दिए गए ।
सिनेमास्कोप को लेकर भी एक दिलचस्प प्रसंग इस फिल्म से जुडा़ हुआ है । कमाल अमरोही को परफैक्शनिस्ट के तौर पर जाना जाता है । वो फिल्म के लोकेशन से लेकर हर शॉट का बेहद बारीकी से ध्यान रखते थे । जब उन्होंने पाकीजा के कलर शूट को रद्दी में डालकर सिनेमास्कोप में शूट शुरू किया तो उन्हें लगा कि सिनेमास्कोप के जिस लैंस से वो शूटिंग कर रहे थे उसका फोकस ठीक नहीं था । उस जमाने में एमजीएम नाम की विदेशी कंपनी से लैंस आता था कभी किराए पर तो कभी अन्य शर्तों पर । कमाल अमरोही उस जमाने में इस लैंस के लिए पचास हजार रुपए महीने चुका रहे थे । कमाल अमरोही ने लेंस के फोकस की त्रुटि के बारे में एमजीएम कंपनी को खत लिखा । कंपनी के नुमाइंदों ने लेंस की जांच की तो अमरोही की शिकायत सही पाई गई । बाद में उस लेंस को कंपनी ने कमाल अमरोही को उपहार के तौर पर भेंट कर दिया ।
पाकीजा को तकनीक से आधुनिक बनाने के कमाल अमरोही के जुनून के बीच उनका और मीना कुमारी के संबंध में खटास आनी शुरू हो गई थी । लोकेशन को लेकर कमाल अमरोही ने इतनी यात्राएं की कि उस वक्त ये भी कहा जाने लगा था कि इस फिल्म का नाम ‘इंडिया ट्रिप’ रख देना चाहिए । मीना कुमारी की ज्वेलरी के लिए भी उन्होंने बनारस, जयपुर और त्रिवेन्द्रम तक की यात्रा की । फिल्म के शुरू होने के सात वर्षों के बाद मार्च उन्नीस सौ चौंसठ में मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग हो गए । जब कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो गए तो लगा था कि ये फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाएगी । इस बीच इस फिल्म में काम करने वाले कई लोग इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए तो कइयों की मौत हो गई । मीना कुमारी भी अपना इलाज करवाने विदेश गईं, लौट कर आईं लेकिन फिल्म की गाड़ी पटरी पर लौट नहीं रही थी । मीना कुमारी की बॉक्स ऑफिस पर तूती बोल रही थी । आखिरकार कमाल अमरोही ने 25 अगस्त 1968 को मीना कुमारी को एक पत्र लिखा- ‘सिर्फ पाकीज़ा की रिलीज ही बच गई है । तुमने एक शर्त रखी है कि जबतक मैं तुमको तलाक नहीं दूंगा तबतक तुम पाकीज़ा पूरी नहीं करोगी । मैं तुम्हें इस बंधन से आजाद कर दूंगा अगर तुम अपनी पाकीजा को पूरा रना चाहोगी तो मुझे खुशी होगी ।‘ अब ये इस पत्र का कमाल था या फिर कुछ और मीना कुमारी मे फिल्म में दोबारा काम करने की हामी भर दी । फिल्म पूरी हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर अच्छी शुरुआत नहीं मिली । लेकिन इस बीच मीना कुमारी अस्पताल में भर्ती हो गईं और उनकी बीमारी की खबर फैलने लगी थी । 31 मार्च को उन्होंने अंतिम सांसे ली । उनकी मौत के बाद ‘पाकीज़ा’ देखने दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी । कहा गया कि पहले तो मीना कुमारी ने अपने पैसों से फिल्म पाकीज़ा बनाई और फिर अपनी मौत से ।