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Saturday, May 30, 2026

ज्ञान का इकोसिस्टम बनाती पत्रकारिता


हिंदी पत्रकारिता के दौ सौ वर्ष पूर्ण होने पर देश के अलग-अलग हिस्से में गोष्ठियों का आयोजन हो रहा है। हिंदी के पहले समाचारपत्र उद्दंत मार्तंड और उसके संपादक जुगुल किशोर सुकुल से लेकर वर्तमान दौर की पत्रकारिता पर चर्चा हो रही है और इस क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी-अपनी राय और विश्लेषण रख रहे हैं। पत्रकारिता और साहित्य के संबंध पर भी बातें हो रही है। कुछ दिनों पूर्व सहितम् संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। वहां देश के विभिन्न प्रांतों से आए युवाओं से संवाद हुआ। संवाद का विषय हिंदी साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं जैसा था। सहितम् का ये प्रयास युवाओं को लेखन की दुनिया से जोड़ने और उनको एक मंच प्रदान करने का है। युवा लेककों से बात करते हुए साहित्य सृजन पर बात हुई। कुछ दिनों पूर्व हिंदी के वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी से कामायनी और छायावाद पर लंबी बात हुई थी। कामायनी और छायावाद को वो इन दिनों बिल्कुल अलग तरीके से व्याख्यित करने का कार्य कर रहे हैं। उनकी स्थापना है कि छायावादी कविता देशप्रेम के भाव से युक्त एक राष्ट्रवादी कविता है। सहितम् की गोष्ठी में युवाओं से संवाद के दौरान सुधीश जी से हुई बातचीत अवचेतन मन में थी। इस कारण जब साहित्य सृजन पर बात होने लगी तो साहित्य सृजन की एक अलग परिभाषा पर चर्चा आरंभ हो गई। साहित्य सृजन को परिभाषित करते हुए बात ज्ञान की पारिस्तिथिकी (इकोसिस्टम आफ नालेज) तक पहुंच गई। स्वाधीनता के पूर्व के साहित्य सृजन को देखकर यही प्रतीत होता है कि अधिकतर साहित्यकरों ने और लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत किया। विशेषकर यदि हम भक्तिकाल के कवियों को देखें तो उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से एक इकोसिस्टम तैयार किया। ज्ञान के इस इकोसिस्टम से भारत की उस समय की जनता लाभान्वित तो हुई ही संगठित भी हुई। उनके टूटे मनोबल को बल मिलने लगा।  

जयशंकर प्रसाद की महान कृति कामायनी को देखें तो उसमें लेखक एक साथ कई स्तरों पर अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ते हैं। देवत्व जब दानत्व की ओर बढ़ता है तो प्रलय आती है। प्रलय सबको नष्ट कर देती है। कामायनी का नायक मनु जीवन से हताश निराश हो जाता है। हिमालय चला जाता है। कविता आगे बढ़ती है तो मनु को श्रद्धा मिलती है। श्रद्धा से ज्ञान मिलता है। प्रलय से ज्ञान की जिस पारिस्थितिकी को क्षति पहुंची थी वो उसका परिष्कार होने लगता है। कामायनी में वर्णित स्थितियां और पात्रों के मनोविज्ञान को पकड़ने और उसको विश्लेषित करने का काम आलोचकों का है। लेकिन पत्रकारिता को या ज्ञानार्जन करनेवालों के लिए एक बड़ी व्यवस्था जयशंकर प्रसाद ने अपनी इस रचना में दी। प्रलय के बाद भी अगर आपके पास श्रद्धा है तो आपको ज्ञानार्जन से कोई रोक नहीं सकता है। सृजन क बाधित नहीं किया जा सकता। ज्ञान अर्जन करने के लिए विनयशील होना आवश्यक है। श्रद्धा नाम कामायनी की नायिका का अवश्य है लेकिन उसको प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है। आदर बिना ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है। यही बात तो पत्रकारिता पर भी लागू होती है। पत्रकार भी अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाता है। पूर्व में बने हुए इकोसिस्टम को मजबूत करता है। अब यहां हमें दो बातों पर विचार करना चाहिए कि दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता के किस कालखंड के पत्रकारों ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाने या उसको मजबूत करने का काम किया। स्वाधीनता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता को देख लेते हैं। उस कालखंड की पत्रकारिता के आकलन से निष्कर्ष निकलता है कि वो ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत करके देश की जनता को जागरूक कर रही थी। उस दौर के साहित्यकार भी यही कर रहे थे। ये अनायास नहीं है कि उस कालखंड में अधिकतर पत्रकार साहित्यकार भी थे या कह सकते हैं कि जो साहित्यकार थे वही पत्रकारिता भी कर रहे थे। क्योंकि दोनों का उद्देश्य समान था।

पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास को देखें तो भी स्पष्ट होता है कि जो आदर और विनयशीलता के साथ पत्रकारिता कर रहे थे वो शीर्ष पर पहुंचे। आक्रामकता कभी पत्रकारिता को आगे नहीं बढ़ाती है। विनम्र होकर आदर के साथ प्रश्नों के उत्तर ढूंढेंगे तो बेहतर उत्तर मिलने की संभावना बनेगी। संभव है कि उत्तर उस तरह का मिले कि ज्ञान की पारिस्थितिकी में कुछ जोड़ें। वहीं अगर आक्रामकता के साथ पत्रकारिता की जाती तो पूर्वज पत्रकारों द्वारा बनाई गई ज्ञान की पारिस्थितिकी कमजोर होने का खतरा रहता है। पत्रकारिता में हमेशा से ये कहा जाता है कि पत्रकारों को प्रश्नाकुल होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए। परंतु प्रश्नाकुलता के साथ विनयशीलता होनी चाहिए। पत्रकारिता के जरिए जब ज्ञान के इकोसिस्टम को बल देने की बात होती है तो स्मरण आता है इस वर्ष तीन खंडों में प्रकाशित समग्र भारतीय पत्रकारिता। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित लेखक विजयदत्त श्रीधर ने श्रमपूर्वक इसको तैयार किया है। विजयदत्त क्षीधर पत्रकार रहे हैं। उन्होने भोपाल में माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना भी है। ये अपनी तरह का एक अनोखा संग्रहालयय है। वहां शोधार्थियों के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा। समग्र भारतीय पत्रकारिता के तीन खंडों को देखने के बाद ये विश्वास पक्का होता है कि पत्रकार अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाते रहे हैं। तीन खंडों के 49 अध्यायों में विजयदत्त श्रीधर ने बेहद श्रमपूर्वक भारतीय पत्रकारिता की विकास यात्रा को दर्शाने का प्रयास किया है। वो इन तीन खंडो को समग्र भारतीय पत्रकारिता की सन 1780 से लेकर 1948 तक की 128 वर्ष की यात्रा कथा बताते हैं। उनकी इस कृति में हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप को भी देखा-समझा जा सकता है। विजयदत्त श्रीधर ने जहां भी पत्र-पत्रिकाओं के उद्धरण दिए हैं वहां उसकी भाषा को यथावत रखा है। इस कृति में पाठकों को तमिल, मलयालम, तेलुगु, ओडिया और अंग्रेजी पत्रकारिता के बारे में भी अलग अलग अध्यायों में जानकी मिलती है। पुस्तक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता और उनकी ओजस्वी वाणी को भी रेकांकित किया गया है। 

विजयदत्त श्रीधर की इस पुस्तक से ये स्पष्ट होता है कि किस तरह से भारतीय पत्रकारिता ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाया। श्रीधर जी स्वाधीनता के बाद रुक जाते हैं। आज इस बात की पड़ताल करने की आवश्यकता है कि स्वाधीनता के बाद किस विचार और किस प्रचार ने भारतीय पत्रकारिता निर्मित ज्ञान के इकोसिस्टम को बाधित या खंडित करने का प्रयत्न किया। 1948 के बाद भारतीय पत्रकारिता में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए। 1962 के युद्ध में चीन से पराजय, 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा और उसके बाद नागरिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होना, 1991 में आर्थिक उदारीकरण का आरंभ होना। पत्रकारिता और पत्रकार ने नई तकनीक आई, चुनौतियों के साथ संभावनाएं आईं। इसो पत्रकारिता ने किस तरह से लिया। इस पर विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है। पत्रकारिता किस तरह से ज्ञान के इकोसिस्टम से दूर होकर राजनीतिक परिवार के इकोसिस्टम को मजबूत करने में लग गई। ये भी देखा जाना चाहिए। 


Saturday, March 19, 2011

पत्रकारिता के अभिमन्यु !

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता और ग्लोबल समस्याएं विषय पर एक सेमिनार आयोजित था । कॉलेज के उत्साही शिक्षक डॉ हरीश अरोड़ा ने बेहद श्रमपूर्व दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी । दो दिनों की इस संगोष्ठी के अंतिम दिन और अंतिम सत्र में मुझे भी बोलना था । मेरा साथ वक्ता थी साप्ताहिक आउटलुक की सहायक संपादक गीताश्री और हमारे सत्र के अध्यक्ष थे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के के एएम मुंशी इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदी स्टडीज के प्रोफेसर हरिमोहन । दो विद्वान वक्ताओं के बीच में मुझे ही सबसे पहले बोलना था । गीता जी मुझसे वरिष्ठ हैं और नब्बे के शुरुआती दशक में जब मैं दिल्ली आया था और काम और पहचान की तलाश से जूझ रहा था तो गीता जी ने ही मुझे पहला असाइनमेंट दिया था । उस वक्त वो स्वतंत्र भारत अखबार के आईएनएस दफ्तर में बैठती थी । इस अवांतर प्रसंग की चर्चा इस वजह से कर रहा हूं क्योंकि मुझे दोनों से पहले बोलना था और मेरी हालात खराब हो रही थी ।
जब मैं वहां पहुंचा तो सभागार लगभग भरा हुआ था लेकिन यह जानकर आश्चर्य हुआ कि श्रोताओं में दिल्ली विश्वविद्यालय के तमाम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग से जुड़े शिक्षक मौजूद थे । पहले मुझे यह अंदाज था कि कॉलेज के पत्रकारिता विभाग के छात्र होंगे जिनसे बातचीत करनी होगी । खैर समारोह शुरू हुआ और मंच संचालन कर रहे सज्जन ने पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चिंता जताते हुए पिछले दिन और पूर्वान्ह के सत्र में हुई बातचीत का संक्षिप्त ब्योरा दिया । पहली बात उन्होंने कही कि पूर्ववर्ती वक्ताओं ने मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के गिरते स्तर पर चिंता जताई । उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यूज चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों ने खुद को अभिमन्यु बताया और कहा कि वो पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंस गए हैं और उससे निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पा रहे हैं लिहाजा वहीं नौकरी करने को अभिशप्त हैं । दूसरी बात उन्होंने ब्लाग के माध्यम से हो रही पत्रकारिता को प्रमुखता से रेखांकित किया । इस भूमिका के बाद उन्होंने मुझे मंच पर आमंत्रित कर लिया । मैंने सबसे पहले खबरिया चैनलों के अभिमन्युयों को पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंसे होने पर दुख प्रकट किया । मेरा साफ तौर पर मानना है कि न्यूज चैनलों में कुछ ऐसे पत्रकारों की जमात है जो न्यूज चैनल के मंच का, उसके ग्लैमर का, उसकी पहुंच का इस्तेमाल कर अपनी छवि भी चमकाते हैं और जब भी जहां भी सार्वजनिक तौर पर बोलने का मौका मिलता है वहां न्यूज चैनलों को गरियाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । उनका यह रूप और चरित्र मुझे हमेशा से परेशान करता है । मेरा मानना है कि यह अपने पेशे से एक तरह का छलात्कार है जो क्षणिक तो मजा देता है लेकिन पत्रकारिता का बड़ा नुकसान कर डालता है । खुद की छवि को चमकाने के लिए पत्रकारिता पर सवाल खड़े करनेवाले इन पत्रकारों की वजह से दूसरे लोगों को आलोचना का मौका और मंच दोनों मिल जाता है । मेरा मीडिया के उन अभिमन्युओं से नम्र निवेदन है कि वो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फंसकर दम तोड़ने की बजाए युद्ध का मैदान छोड़ दें । अगर न्यूज चैनलों में उनका दम घुटता है तो वो वहां से तत्काल आजाद होकर अपना विरोध प्रकट करें लेकिन जिसकी खाते हैं उसको ही गरियाना कहां तक उचित है यह मेरी समझ से बाहर है । मैं कई न्यूज चैनलों के अभिमन्युओं से वाकिफ हूं और मेरे जानते अब तक ऐसा कोई वाकया सामने नहीं आया जहां इस तरह के पत्रकार वंधुओं ने व्यवस्था का विरोध किया हो । विरोध करना तो दूर की बात कभी अपनी नाखुशी भी जताई हो । मालिकों से सामने भीगी बिल्ली बने रहनेवाले इन पत्रकारों को सार्वजनिक विलाप से बचना चाहिए, यह उनके भी हित में है और पत्रकारिता के हित में भी । किसी भी चीज की स्वस्थ आलोचना हमेशा से स्वागतयोग्य है लेकिन वयक्तिगत छवि चमकाने के लिए की गई आलोचना निंदनीय है ।
दूसरी बात बताई गई कि हिंदी में ब्लाग के माध्यम बड़ा काम हो रहा है । यह बिल्कुल सही बात है कि ब्लाग और नेट के माध्यम से हिंदी के लिए बडा़ काम हो रहा है ।लेकिन कुछ ब्लागर और बेवसाइट जिस तरह से बेलगाम होते जा रहैं वह हिंदी भाषा के लिए चिंता की बात है । ब्लाग पर जिस तरह से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए उलजलूल बातें लिखी जा रही हैं वो बेहद निराशाजनक हैं । कई ब्लाग तो ऐसे हैं जहां पहले किसी फर्जी नाम से कोई लेख लिखा जाता है फिर बेनामी टिप्पणियां छापकर ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता है । कुछ कमजोर लोग इस तरह की ब्लैकमेलिंग के शिकार हो जाते हैं और कुछ ले देकर अपना पल्ला छुडा़ते हैं । लेकिन जिस तरह से ब्लाग को ब्लैकमेलिंग और चरित्रहनन का हथियार बनाया जा रहा है उनसे ब्लाग की आजादी और उसके भविष्य को लेकर खासी चिंता होती है । बेलगाम होते ब्लाग और बेवसाइट पर अगर समय रहते लगाम नहीं लगाया गया तो सरकार को इस दिशा में सोचने के लिए विवश होना पड़ेगा । ब्लाग एक सशक्त माध्यम है, गाली गलौच और बेसिर पैर की बातें लिखकर अपनी मन की भड़ास निकालने का मंच नहीं । इस बात पर हिंदी के झंडाबरदारों को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है । मैंने विनम्रतापूर्वक ब्लाग पर चल रहे इस घटिया खेल पर विरोध जताया और हॉल में फैले सन्नाटे से मुझे लगा कि वहां मौजूद लोग मेरी बातों से सहमत हैं ।
चूंकि उक्त सेमिनार में दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता पढ़ानेवाले शिक्षक उपस्थित थे और वैश्विक समस्या पर मुझे बोलना था । मुझे लगा कि पत्रकारिता की फैक्ट्री में काम करनेवाले लोग वहां मौजूद हैं इस वजह से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के सामने मुझे उनसे जुड़ी बात ही रखनी चाहिए । वैश्विक समस्या पर तो बाद में चर्चा हुई लेकिन सबसे पहले मैंने पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के बाबा आदम जमाने के होने की बात उठाई । कुछ दिनों पहले मैंने देश के सबसे प्रतिष्ठित युनिवर्सिटी में से एक के पत्रकारिता के छात्रों से मिला था जहां उनके सिलेबस पर बात की थी । प्रथम वर्ष में एक पेपर था- लेटर प्रेस और मुद्रण की विधियां । जब मैंने ये विषय देखा तो अपना सर पीट लिया । क्योंकि अखबार भी अब इनसे आगे निकल चुके थे । अब तो सारा कुछ कंप्यूटराइज्ड होता है । वो दिन लदे भी अब सालों हो गए जब लेटर प्रेस पर अखबार छपा करते थे । लेकिन हमारे युनिवर्सिटी के पत्रकारिता के छात्रों को अब भी लेटर प्रेस और मुद्रण की विधियां पढाई जा रही है । इसके अलावा भी अगर पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को देखें तो उसे समय के हिसाब से बिल्कुल नहीं बदला गया है । पता नहीं सालों पहले जब उसको बनाया गया था उसके बाद किसी ने भी उसको अद्यतन करने की जरूरत समझी या नहीं । अगर हम न्यूज चैनलों की कार्यपद्धति की बात करें तो उसमें तकनीक ने क्रातिकारी परिवर्तन किया है और हर रोज कोई ना कोई अपडेट हो रहा है जिसकी छात्रों को तो दूर विश्वविद्यालय में पढानेवाले शिक्षकों को भी जानकारी नहीं । तो पत्रकारिता की फैक्ट्री में जहां से देश के होनहार पत्रकार निकलते हैं वहां यह आधारभूत दोष अब भी कायम है और इसको दूर करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जाना अफसोसनाक है । अपनी इस चिंता को मैंने सेमिनार में जाहिर किया जिसपर बाद में कई शिक्षकों ने कड़ी आपत्ति जताई कि उनके ज्ञान पर सरेआम सवाल कैसे खड़ा किया जा रहा है । लेकिन बातचीत के बाद उन्होंने माना कि तकनीक के अपडेशन के बारे में उनकी जानकारी नहीं के बराबर है । छात्रों को कैमरा पढ़ानेवाले शिक्षक ने शायद ही कभी कैमरा देखा-छुआ हो यह जरूरी भी नहीं है लेकिन कम से कम कैमरा तकनीक में हुए आधुनिकीकरण के बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिए । न्यूजरूम सिस्टम के बारे में तो पता होना ही चाहिए ।
सवाल सिर्फ पत्रकारिता के सिलेबस का नहीं है सवाल अन्य विषयों का भी है जहां के सिलेबस में समय के साथ बदलाव नहीं किया गया । शिक्षा के तमाम कर्ताधर्ताओं को भी कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई । अब वक्त आ गया है कि सरकार को इस ओर तत्काल ध्यान देकर इन खामियों को दूर करना होगा ताकि देश में शिक्षा का स्तर उंचा हो सके और कॉलेजों में दी जानेवाली शिक्षा का उपयोग नौकरी में हो सके ।

Sunday, September 28, 2008

जादुई यथार्थवादी पत्रकार की परेशानी

आजकल एक खास फैशन चलन में है । फैशन के बारे में आपको थोड़ी देर में बताता हूं उससे पहले ये बता दूं कि इस इस फैशन का जादू किनके सर चढकर बोल रहा है । ये इसी दुनिया के जीव हैं, यकीन मानिए एलियन तो नहीं ही हैं, न ही ये यू ट्यूब से निकाले गए हैं, न ही ये डेस्क पर क्रिएट किए गए हैं । ये हमारे आपके बीच के हैं । इनका वास्ता भी उन्हीं चीजों से पड़ता है जिनसे आपका और हमारा पड़ता है । ये भी हर रोज सुबह साढे नौ बजे और तीन बजे परेशान भी होते हैं,इनको भी खबर चाहिए होती है । लेकिन इनकी परेशानी जरा हट के होती है । ये इस बात से परेशान होते हैं कि अब इस देश में प्रधानमंत्री को भाव नहीं दिया जा रहा है,केंद्रीय मंत्री की कोई नहीं सुन रहा, मुख्यमंत्री अगर कोई बयान देते हैं तो उसे खबर नहीं माना जाता, सर्वहारा की सुनने वाला कोई नहीं है, कोई नेता अगर कुछ बोल देता है तो उसे खबर क्यों नहीं बनाया जाता है । ये इसको पत्रकारिता का पतन या पतित काल मानते हैं और अपने साथियों को इस पतित काल पर प्रवचन देते रहते हैं । तरह तरह के तर्कों से ये साबित करने में लगे रहते हैं कि आज पत्रकारिता के नाम पर जो हो रहा है वो इस पवित्र पेशे को धंधा बना रहा है । पवित्रता पर बाजार के आक्रमण को जी भर कर गरियाते हैं । इन्हें इस तरह के बौद्धिक मैथुन में एक खास किस्म के आनंद की प्राप्ति होती है । ये काम ये कभी भी कहीं भी करते हुए पाए जाते हैं । इन्हें तो बस अवसर की तलाश रहती है । इन्हें लगता है कि इस क्रिया के बाद उनका रसूख कुछ और बढ़ गया है, साथियों पर बौद्धिक होने का आतंक भी कायम हो गया है । चलिए अब आपको ज्यादा इंतजार नहीं करवाते हैं और बता देते हैं - ये हैं कुछ अखबारों और टीवी के वो पत्रकार जिन्हें लगता है कि पत्रकारिता का पतित काल आ गया है। खबर की जगह चैनलों में भांडगीरी हो रही है । अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर ऐसी खबरें छप रही हैं जो खबर नहीं है । अखबारों में पिछले पन्ने की खबरें पहले पन्ने पर आ गई है । सबकुछ ऐसे लोगों के हाथ में चला गया है जिनको न तो पत्रकारिता की समझ है और न ही पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास और परंपरा की समझ । ये खबरों के साथ होने वाले सलूक का रंडी रोना रोज रोते हैं । उन्हें लगता है कि अब पत्रकारिता के नाम पर धर्म कर्म, जादू टोना, मारपीट, सेक्स और लुगदी साहित्य की भरमार हो गई है ।
इनकी परेशानी राखी, राम और राजू यानि की तीन आऱ को लेकर भी है , वो इस बात पर खासे खफा हैं कि इन तीन आर को खबरिया चैनल इतना भाव क्यों दिया जा रहा है । राजू श्रीवास्तव जैसे मसखरे को टीवी चैनल वाले इतना क्यों दिखाते हैं । राखी सावंत अगर कुछ भी करती है, जो वो अमूमन हर दिन कर ही डालती हैं, तो उसे इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है । राम के बारे में अबतक देश की अदालत कुछ तय नहीं कर पाई है लेकिन खबरिया चैनल हैं कि राम के परिवार उनके जन्म स्थान से लेकर इनका पुष्पक विमान तक सबकुछ तलाश ले रहे हैं । न सिर्फ तलाश ले रहे हैं बल्कि सबकुछ बता देने के लिए घंटो तक तमाम तरह के दंद फंद के साथ टीवी स्क्रीन पर मौजूद भी रहते हैं । इन बातों से ये जादुई यथार्थवादी पत्रकार बेहद परेशान हो जाते हैं । परेशानी के आलम में करवटें बदलते बदलते अचानक रिमोट से एसी ऑ कर देते हैं । चिंता में कब आंख लग जाती है पता ही नहीं चलता । चिंता करते करते परेशानी में सोए हैं, जाहिर है ख्वाबों में भी यही सब आ रहा है । सपने में सबसे पहले आते हैं भगवान राम, लेकिन उन जैसा ही एक साथी भी अचानक सपने में आता है और कहता है कि राम को भुनाकर बीजेपी सत्ता में आ गई, ये बात तो समझ में आती है, लेकिन अब न्यूज चैनल राम को इतना दिखाकर क्या हासिल करना चाहते हैं, क्या ये निरी भक्ति है या फिर कुछ और । जबाव नहीं मिलता है और सपने का दृष्य बदल जाता है और राम की जगह राजू श्रीवास्तव लतीफा सुनाते हुए आते हैं लेकिन इस जादुई यथार्थवादी पत्रकार को जोरदार हंसी आती है और वो ठहाका लगाकर हंसने लग जाते हैं, फिर अचानक से उनका वही साथी दिखाई देता है और पूछ लेता है कि अरे तुम तो राजू के लतीफो पर हंस रहे हो, अचानक पत्रकार महोदय का चेहरा धीर गंभीर हो जाता है और गंभीरता के आवरण से कछुए की तरह मुंह निकाल कर अपने साथी को लगभग डांटते हुए कहते हैं कि राजू को सुनकर हंसी नहीं आ रही बल्कि ये सोचकर हंसी आ रही कि खबरिया चैनल में काम करनेवाले मित्रगण इसको इतना बाव क्यों देते हैं । क्यों कर इनको एयर टाइम देते हैं । किसी तरह समझा बुझाकर अपने दोस्त को विदा करते हैं और फिर करवट बदल कर राजू और राम की सोच से मुक्त होने की कोशिश में जुट जाते हैं । लेकिन राम और राजू को निबटाकर जैसे ही चैन की नींद लेते हैं कि अचानक से बलखाती इठलाती राखी सपने में आ जाती है । इठलाती हुई आइटम गर्ल राखी को सपने में देखकर यथार्थ और ख्बाब का जबरदस्त संघर्ष होता है । आखिरकार यथार्थ पर ख्बाव बारी पड़ता है और भाई साहब राखी के ख्बाबों में डूब जाते हैं । लेकिन फिर वही दुष्ट मित्र सपने में आता है और सवाल कर डालता है कि खबरिया चैनलों में राखी को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है । ख्बाब में खलल से परेशान भाई साहब की चिंता इतनी बढ जाती है कि बौद्धिक स्खलन होते होते बचता है और नींद खुल जाती है । जैसे ही नींद खुलती है तो अपने खाकी निकर में बाथरूम की ओर भागते हैं , दोपहर की एडिट मीटिंग में जाने की तैयारी करनी जो करनी थी। लेकिन जब घर से निकलते हैं तो यथार्थ का लाल चोला पहनकर दफ्तर जाने के लिए निकलते हैं, क्योंकि भाइयो चाहे जो भी हो अगर आपके विचार लाल नहीं तो आप बौद्धिक नहीं ।