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Saturday, February 13, 2021

लोकतंत्र में अपीलजीवियों का पाखंड


यह अनायास नहीं होता है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अचानक से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ कोलाहल आरंभ हो जाता है। यह भी अनायास नहीं होता है कि हमारे देश के कुछ वैसे कलाकार और लेखक आदि जो अपनी प्रासंगिकता तलाश रहे होते हैं, वो इस कोलाहल में शामिल हो जाते हैं। यह भी अनायस नहीं होता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक नियमित अंतराल पर कुछ जाने पहचाने लोग बयान जारी करते हैं। यह भी अनायास नहीं होता कि इस तरह के अपीलजीवी लेखक,कलाकार एकजुट होते दिखते हैं। यही सब लोग आपको दादरी कांड के दौरान भी नजर आएंगे, पुरस्कार वापसी के दौरान भी नजर आएंगे, नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में भी नजर आएंगे, कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी दिखेंगे। दरअसल ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत होता है, जिनमें बार-बार वही चेहरे होते हैं तो इन दिनों अपने अपने क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति और प्रासंगिकता के लिए संघर्षरत हैं। खुद को प्रगतिशील कहते हैं। इनको साथ मिलता है कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का भी जो भारत को इन्हीं की नजरों से देखते और समझते हैं। ये ताकतें भारतीय कानूनों की उसी व्याख्या को स्वीकार करते हैं जो लेखकों-कलाकारों का ये समूह उनके समक्ष प्रस्तुत करता है। इनको कई बार भारत विरोधी ताकतों का भी प्रत्यक्ष तो कई बार परोक्ष समर्थन मिलता है। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी ये ताकतें दिख रहीं हैं, अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी। 

अब इनको मौका मिला है स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी को लेकर। फारुकी को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दी है। फारूकी को अंतरिम जमानत मिलने के बाद भारत के कई अज्ञात कुलशील लेखकों-अभिनेत्रियों और विदेशों में रह रहे लेखकों कलाकारों के एक समूह ने अपील जारी की है कि मुनव्वर के खिलाफ आरोप वापस लिए जाएं। ये इन अपीलजीवियों का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, है भी। इस अपील को जारी करनेवाले संगठनों का नाम देखेंगे तो इनकी मंशा और राजनीति दोनों स्पष्ट हो जाती है। इन संगठनों के नाम हैं पीईएन अमेरिका, प्रोग्रेसिव इंडिया कलेक्टिव, रिक्लेमिंग इंडिया आदि। इनमें से पीईएन को छोड़कर कोई ऐसी संस्था नहीं है जिसके बारे में या जिनके काम के बारे में बहुत कुछ पता हो। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी संस्थाएं अपील करने के लिए ही बनाई जाती हैं ताकि इन अपीलजीवियों की दुकानें चलती रहें। अपीलजीवियों ने जो बयान जारी किया है उसका शीर्षक है, हास्य अपराध नहीं है (कॉमेडी इज नॉट अ क्राइम)। इसको समझने के लिए किसी शब्दकोश की या किसी टीका की आवश्यकता नहीं है। भारत में हास्य-व्यंग्य की बहुत लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। जब से ये स्टैंड अप कॉमेडियन नाम की जमात आई है जिसने हास्य के नाम पर फूहड़ता,अश्लील टिप्पणियां या फिर देवी-देवताओँ के बारे में भद्दी टिप्पणियां शुरू कर दी हैं तब से इनकी आलोचना आरंभ हुई है।

हास्य लोगों को प्रसन्न करने के लिए होता है किसी को अपमानित करने के लिए नहीं। व्यंग्य तो व्यवस्था पर चोट करती है किसी व्यक्ति या समूह की धार्मिक आस्था पर नहीं। लेकिन जब हास्य की आड़ में एजेंडा चलाया जाए, जब हास्य की आड़ में विचारधारा विशेष का पोषण होने लगे, जब हास्य की आड़ में धार्मिक आस्थाओं पर चोट होने लगे तो स्वाभाविक है कि समाज में उद्वेलन होगा। जब उद्वेलन होगा तो विरोध भी होगा, जब विरोध होगा तो कानून के दखल की अपेक्षा भी होगी। कानून जब दखल देगी तो उसके लिए संविधान सर्वोपरि होगा। और संविधान अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में क्या कहता है, उसको देखने की जरूरत पड़ेगी। इस स्तंभ में इस बात को कई बार कहा जा चुका है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं है। जो अनुच्छेद हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है वहीं पर इस बात की भी व्याख्या है कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं क्या हैं। इसलिए इन स्टैंडअप कॉमेडियन को भी और इनके लिए झंडा-बैनर लेकर खड़े होनेवाले अपीलजीवियों को भी भारत के संविधान का ज्ञान होना आवश्यक है। 

अब जरा नजर डालते हैं अपीलजीवी संस्थाओं पर। पीईएन इंटरनेशनल और उससे संबद्ध संस्थाएं भारत के बारे में वर्षों से अनर्गल प्रचार करते रहे हैं। दो हजार चौदह में जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी थी तो उसके करीब साल डेढ़ साल बाद ही पीईएन इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट का नाम था ‘इंपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉ टू सप्रेस फ्री स्पीच’। इस रिपोर्ट को पीईएन कनाडा, पीईएन भारत और युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो की लॉ फैकल्टी ने संयुक्त रूप से जारी किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लेकर स्थिति अच्छी नहीं है। जो शोध पत्र प्रस्तुत किया गया था उसमें दावा किया गया था ‘भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।‘  इस अध्ययन ने अपने निष्कर्ष का आधार बनाया था आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘पी के’ को लेकर उठे विवाद को और अमेरिकी लेखिका वेंडि डोनिगर की पुस्तक को लेकर उठे विवाद पर। उस अध्ययन में भी दोनों ही उदाहरण अनुचित तरीके से पेश किए गए थे। उस वक्त भी भारत के लिबरल अपीलजीवियों ने पीईएन इंटरनेशनल की उस रिपोर्ट को लेकर माहौल बनाने की असफल कोशिश की थी। पीईएन इंटरनेशनल का दावा है कि वो कवियों, लेखकों, उपन्यासकारों की वैश्विक संस्था है और वो पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति और कलात्मक आजादी के लिए काम करती है। परंतु पिछले करीब छह सात साल से तो ये संस्था भारत में राजनीति के औजार की तरह इस्तेमाल हो रही है।

संस्थाओं से अलग हटकर अरुंधति राय जैसों के वक्तव्यों का विश्लेषण करें तो ये साफ दिखता है कि इनको अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट तब दिखता है जब इनकी विचारधारा के लोगों का विरोध होता है। अरुंधति राय का तो विदेशी मंचों पर भारत विरोधी बातें कहने का लंबा इतिहास रहा है। अपनी भारत विरोधी बातों को प्रामाणिकता देने के लिए तो वो पाकिस्तान तक की तारीफ कर चुकी हैं। ये सब एक इंटरनेश्नल सिंडिकेट का हिस्सा है। ये लोग तो भारत की छवि को बिगाड़ने के उपक्रम में ही जुटे रहते हैं और ऐसा करने का कोई भी मौका नहीं चूकते। मुनव्वर फारुकी के मामले में उनको एक बार फिर से अवसर नजर आया और वो राग विरोध गाने लगे। लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इन सबको ये बात समझ लेनी चाहिए कि भारत का लोकतंत्र अब परिवक्व हो गया है, भारत की जनता भी अब बेहद समझदार हो गई है और इन भारत विरोधी बयानों की असलियत समझ चुकी है। अब इनसे ना तो भारत की जनता विचलित होती है और ना ही इनसे उनको बरगलाया जा सकता है। परोक्ष रूप से राजनीति करनेवाले इन लेखकों-कलाकारों को इस देश की जनता ने उनकी सही जगह बता दी है। लगातार दो लोकसभा चुनाव में इस भारत विरोधी विचार को जनता ने ना केवल खारिज किया बल्कि इसके पोषकों को भी नकार दिया। इस नकार को भी वामपंथ के अनुयायी या उनके पोषक समझ नहीं पा रहे हैं और अब भी उन्ही पुराने औजारों से भारत की जनता को भरमाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रसिद्ध रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है, जिससे सब परिचित हैं। लेकिन नाटक के उपकरणों की तरह इसका उपयोग भाषण के मंचों पर होता है। अपीलजीवियों को ये समझना चाहिए कि विचारधारा का पाखंड अब नहीं चलनेवाला है। 

Saturday, August 31, 2019

बयान से बेनकाब होती विचारधारा


इन दिनों एक बार फिर से बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अरुंधति राय चर्चा में हैं। 2011 में दिए उनके एक भाषण के अंश को पाकिस्तानी मीडिया ने भारत को बदनाम करने की नीयत से छाप दिया। पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भी उसकी आड़ में भारत को घेरने की कोशिश की। अरुंझति के उस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर एक बवंडर सा उठा, जमकर चर्चा शुरू हो गई। भारत और बांग्लादेश के ट्वीटर उपभोक्ताओं ने उनकी लानत-मलामत शुरू की और ‘डबलस्टैंडर्ड’ हैशटैग के साथ ये मसला ट्वीटर पर ट्रेंड करने लगा। दरअसल 2011 में अरुंधति राय ने एक चर्चा के दौरान घोर आपत्तिजनक बातें कही थीं। ये ऐसी बातें हैं जो सीधे सीधे राष्ट्र के खिलाफ हैं। उनका अंदाज ही भारत को अपमानित करने जैसा था और कहीं से भी ये नहीं लग रहा था कि एक भारतीय बोल रहा हो। भारत के बारे में अरुंधति ने कहा कि वो भारत जैसी जगह के बारे में बात कर रही हैं जहां कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम में तब से युद्ध हो रहे हैं जब से भारत एक संप्रभु राष्ट्र बना। भारत जब गुलामी की बेड़ियों से आजाद हुआ तब से ही वो एक औपनिवेशिक राष्ट्र बन गया। तमाम झंझावातों के बीच हिन्दुस्तान का लोकतंत्र मजबूत और परिपक्व हुआ ये अरुंधति को ना तो दिखा और ना ही वो समझ पाई। अपने जहर बुझे बयान में अरुंधति ने कहा कि वि भारत में 1947 से ही कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम, पंजाब, तेलंगाना, गोवा, हैदराबाद में निरंतर युद्ध जारी है और भारत ने अपने ही आवाम के खिलाफ सेना की तैनाती की और युद्ध किया। अरुंधति का पाकिस्तान प्रेम तब झलक उठा जब वो बोली कि पाकिस्तान ने अपनी सेना को उस तरह से अपने देश की जनता के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जिस तरह से लोकतांत्रिक भारत ने किया। उनका ये वीडियो सामने आते ही भारत और बांग्लादेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। बांग्लादेश के लोगों ने अरुंधति को 1971 के महीनों में पाकिस्तानी सेना के पूर्वी बंगाल में किए कुकृत्यों की याद दिलानी शुरू कर दी। एक के बाद एक अत्याचार की फेहरिश्त सामने आने लगी। दरअसल अरुंधति जैसे लोग भारत के खिलाफ बोलकर अंतराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरते हैं। अरुंधति की इस चर्चा को सुनते हुए मुझे 24 फरवरी 2016 को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी का लोकसभा में दिया भाषण याद आ गया। स्मृति इरानी के भाषण के पहले तृणमूल कांग्रेस के सांसद डॉ सुगतो बोस ने भाषण दिया था और उनके भाषण पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी मुग्ध थे, तालियां बजा रहे थे। जब स्मृति इरानी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने भी सुगतो बोस के भाषण की सराहना की लेकिन सोनिया और राहुल गांधी के सामने बोस की बहन शर्मिला बोस की किताब के कुछ पन्ने खोल दिए थे। जिस सुगतो बोस के भाषण पर कांग्रेसी लहालोट हो रहे थे उन्हीं की बहन इतिहासकार शर्मिला बोस ने एक किताब लिखी थी, द डेड रेकनिंग। उस किताब में शर्मिला बोस ने लिखा है कि ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम एक भ्रांति है, मिथ्या है, पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी बंगाल के लोगों पर किसी तरह का कोई अत्याचार किया ही नहीं था, जिसको बचाने के लिए इंदिरा गांधी गई थीं।‘ दरअसल अरुंधति ने कोई नया राग नहीं छेड़ा है बल्कि इस तरह के जहर बुझे बयान या लेखन लंबे समय से होते रहे हैं। बहुधा पाकिस्तान के पक्ष में।
अरुंधति तो इतने पर ही नहीं रुकी उसने तो भारत की इस तरह की तस्वीर पेश की जैसे यहां दलितों और अल्पसंख्यकों को सेना की मदद से कुचला जा रहा हो, उनके खिलाफ सेना का उपयोग कर उनका दमन किया जा रहा हो। अरुंधति अपने भाषण में प्रश्न उठाती हैं कि ये कौन लोग हैं जिनके खिलाफ भारत ने युद्ध झेड़ रखा है या युद्ध करना तय किया है। फिर खुद ही उसका उत्तर देती है पूर्वोत्तर में आदिवासियों, कश्मीर और हैदराबाद में मुसलमानों, तेलंगाना में आदिवासियों, गोवा में क्रिश्चियन और पंजाब में सिखों के खिलाफ। इतना बोलते बोलते वो यह भी कह जाती हैं कि ये सब ‘अपर कास्ट हिंदू स्टेट’ की तरफ से किया जा रहा है। अब इस अंतिम वाक्य से ही उनका एजेंडा साफ हो जाता है। ये सीधे-सीधे समाज को बांटनेवाला बयान है, देश के खिलाफ वहां की जनता को उकसानेवाला बयान है। जब वो ये बात कह रही थीं तब वो भूल गईं थीं कि उस वक्त देश को तीन अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही चला रहे थे, मनमोहन सिंह जो उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थे वो सिख समुदाय से आते हैं, सत्ताधारी दल कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी क्रिश्चियन और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल मुसलमान। क्या तब किसी कोने से ये आवाज आई थी कि बहुसंख्यक हिंदुओं के देश में तीन सबसे ताकतवर शख्सियत जो सत्ता चला रहे थे वो अल्पसंख्यक समुदाय के थे। नहीं। आज भी इस तथ्य को रेखांकित करना इस वजह से आवश्यक हो गया क्योंकि अरुंधति के बयान को पाकिस्तान अपने हक में प्रचारित करने में लगा है। अरुंधति जिन माओवादियों और अलगाववादियों को भारत की आवाम मान रही हैं उनकी आस्था भारत में कभी नहीं रही। वो भारत को तोड़ने का सपना देखते रहे और किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अपने देश की संप्रुभता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने का अधिकार है। अब भी अरुंधति के पक्ष में लेख लिखे जा रहे हैं लेकिन उनके समर्थक ये भूल गए हैं कि भारत में कभी भी माओवादियों या नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं किया गया।
दरअसल अरुंधति जैसे लोगों की, उन जैसे लेखकों की बुनियाद ही भारत वोध पर टिकी है। वो वैश्विक मंचों पर जाकर भारत में हो रहे तमाम तरह के कथित अत्याचारों पर, कथित मानवाधिकार हनन पर भाषण देती रही हैं। उनके समर्थन में लेख लिखनेवाले कुछ लोग अभी हाल में प्रकाशित उनकी किताब ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ से उदाहरण देकर उनका बचाव करने की कोशिश करने में लगे हैं। जब ये पुस्तक प्रकाशित हुई थी तो इसको फिक्शन कहकर प्रचारित-प्रसारित किया गया था, बुकर प्राइज के लिए उसको फिक्शन कैटेगरी में ही नामित भी किया गया था। अब उनके समर्थक उस उपन्यास को ही तथ्य के तौर पर पेश कर रहे हैं। अगर हम अरुंधति के समर्थकों के तर्कों मान भी लें तो उस किताब में और भी बूहुत कुछ लिखा गया है। अरुंधति का उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ एक लड़के की कहानी से शुरू होता है। घटनाओं के बाद जैसे ही पात्रों के बीच संवाद शुरू होता है वैसे ही लेखक पर एक्टिविस्ट हावी हो जाता है और वो अपनी वैचारिकी का बोझ पाठकों पर लादने लग जाती है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं वो अपने पूर्वग्रहयुक्त नजरिए को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं – ‘मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं।‘ कश्मीर की समस्या में उनको जंग नजर आ रहा था। अपनी सैद्धांतिकी को फिक्शन की चाशनी में लपेटकर पेश कर रही हैं ताकि निकल गया तो ठीक है पाठकों के दिमाग में बात घर कर जाएगी और अगर ज्यादा आलोचना हुई तो उसको फिक्शन कहकर पल्ला झाड़ लिया जाएगा। उस उपन्यास का एक पात्र बिप्लब दासगुप्ता एक सरकारी मुलाजिम है, जो जमकर शराब पीता है, और कश्मीर में पदस्थापित है। उनकी हरकतों को भी अरुंधति ने विषय बनाया है। संकेत ये कि सरकारी मुलाजिम ठीक व्यवहार नहीं करते। उस उपन्यास में अरुंधति ने बताया है कि किस तरह परिस्थियों के चलते कश्मीरी युवक आतंकवादी बन जाता है, कहीं भी आतंक की असली वजह पर , उसकी जमीन तैयार करने में पाकिस्तान की भूमिका पर जोर डाला है, ऐसा याद नहीं पड़ता। अब भले ही अरुंधति ने अपने भारतीय सेना की तैनाती को लेकर दिए अपने बयान पर माफी मांग ली है लेकिन जो जहरीली सोच अंदर तक घुसी है उसका क्या किया जा सकता है, इसपर विचार करना चाहिए। मशहूर रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है ।‘ तो क्या ये माना जाए कि अरुंधति वो पाखंड रच रही थीं और भाषण के मंच का इस्तेमाल कर रही थी।

Monday, February 24, 2014

फैसले पर उठते सवाल

हिंदू धर्म पर कई किताब लिखनेवाली मशहूर लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब- द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को पेंग्विन बुक्स ने भारतीय बाजार से वापस लेने और छपी हुई अनबिकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया । प्रकाशक के इस फैसले के बाद लेखकों के एक बड़े समुदाय में इस बात को लेकर खासी निराशा और क्षोभ है । पेंग्विन के कोर्ट के बाहर किए गए इस समझौते पर लेखकों ने विरोध जताना शुरू कर दिया है । बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका अरुंधति राय ने तो पत्र लिखकर पेंग्विन से स्थिति स्पष्ट करने की गुजारिश की है । वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ वरदराजन और लेखक ज्योतिर्मय शर्मा ने पेंग्विन से अपनी किताबों को नष्ट करने और क़ापीराइट वापस करने का अनुरोध किया है । सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने पत्र में साफ लिखा है कि उन्हें अब पेंग्विन पर भरोसा नहीं रह गया है लिहाजा वो गुजरात दंगों पर लिखी गई उनकी किताब- दे मेकिंग ऑफ अ ट्रेजडी- के अधिकार वापस कर दें । सिद्धार्थ का मानना है कि कल को अगर किसी समूह की भावना इस किताब से आहत हो जाती है और वो भारतीय दंड विधान की धारा 295 के तहत केस कर देता है, तो संभव है कि पेंग्विन उनकी किताब को भी वापस लेने का फैसला कर ले । विरोध के इस तरह के स्वर ‘सहमत’ की ओर से भी उठे । पीइएन इंटरनेशनल की भारत इकाई ने भी प्रकाशक के इस फैसले का विरोध किया । पेंग्विन विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक है और उसके पास ना तो साधन की कमी है और ना ही संस्धान की तो फिर उसके एक छोटे से संगठन  के सामने घुटने टेकने से साहित्य जगत हैरान है । दिल्ली की एक अदालतत में वेंडी डोनिगर की किताब पर शिक्षा बचाओ समिति नाम के एक अनाम संगठन ने केस किया । इसको किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और इसके अगुवा दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था । तीन साल बाद पेंगिवन ने याचिकाकर्ता से समझौता कर लिया । ये तो किताब के प्रकाशक की कमजोरी है जो अदालती कार्रवाई के झमेले में नहीं पड़ना चाहता है । विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक, जिसके पास ना तो पैसे की कमी है और ना ही संसाधनों की, उसने अदालती कार्रवाई के झंझट से मुक्त होने के लिए समझौता किया । वैसे भी इंटरनेट के इस युग में किसी भी कृति पर पाबंदी संभव ही नहीं है ।पेंग्विन के फैसले के बाद जिस तरह से किंडल पर ये कृति ई बुक्स के रूप में धड़ाधड़ बिक रही है इससे यह बात साफ हो गई है कि किताब वापसी का कोई अर्थ है नहीं । इस मामले में तो वेंडी डोनिगर चाहे तो किताब छापने का अधिकार पेंग्विन से लेकर किसी अन्य प्रकाशक को दे सकती है । दूसरा प्रकाशक इसको छापने के लिए स्वतंत्र होगा क्योंकि अदालत ने इस किताब के भारत में प्रकाशन और वितरण पर पाबंदी नहीं लगाई है ।
इस तरह का ये कोई पहला केस नहीं है । इसके पहले भी प्रकाशकों ने भय और आशंका के मारे गुटों के सामने घुटने टेक दिए थे । मशहूर स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित किताब भारत में अब तक छप नहीं सकी है । अपनी किताब रेड साड़ी में जेवियर मोरो ने सोनिया गांधी की जीवन यात्रा को इटली से लेकर भारत तक अपने नजरिए से देखने की कोशिश की है । जैसे ही इस किताब के भारत में छपने की खबर आई तो कांग्रेस के नेताओं के कान खड़े हो गए और उन्होंने जोरदार विरोध शुरू कर दिया । पार्टी के नेता और मशहूर वकील अभिषेक मनुसिंघवी ने अदालती कार्रवाई की भी धमकी दी थी । अब तक जेवियर मोरो की किताब भारत में छप नहीं पाई है । इसी तरह से महात्मा गांधी पर जब पत्रकार जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब द ग्रेट सोल प्रकाशित हुई तो खूब हो हल्ला मचा था । एयर इंडिया पर लिखी जितेन्द्र भार्गव की किताब के कुछ पन्ने हटाने के बाद ही उसको प्रकाशक ने रिलीज किया । प्रकाशकों के बीच ये एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है । पहले दुनियाभर के प्रकाशक लेखकीय स्वतंत्रता को लेकर ना केवल सजग रहते थे बल्कि अंतिम दम तक उसको बनाए रखने के लिए संघर्ष भी करते थे । अब अगर किसी किताब पर कहीं से धमकी आ गई तो प्रकाशक बीच का रास्ता तलाशने में लग जाते हैं । प्रकाशन जगत के साथ साथ अभिव्यक्ति की आजादी के लिए प्रकाशकों की ये प्रवृत्ति खतरनाक है ।

वेंडी डोनिगर को इस बात की आशंका थी कि उसकी इस किताब को लेकर कुछ हिंदुओं को आपत्ति हो सकती है । प्रोफेसर वेंडी डोनिगर ने लिखा था– कई हिंदू धार्मिक नेता इस किताब को समुद्र में फेंक देना चाहेंगे क्योंकि उन्हें इसमें तथ्यों के साथ खिलवाड़, धार्मिक प्रसंगों की गलत व्याख्या आदि आदि दिखाई देंगे । लेखिका इतने पर ही नहीं रुकती हैं उन्होंने अपनी इसी किताब में ये भी लिखा है कि – हमें हिंदू धर्म मैं मौजूद ज्ञान और दर्शन का उपयोग करना चाहिए क्योंकि यहां मौजूद साहित्य उच्च कोटि का है और हिंदू धर्म सर्व को समाहित करता चलता है । वेंडी डोनिगर को भारतीय धर्म और धर्मग्रंथों की रुचि के केंद्र में रहे हैं । उन्होंने ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का अनुवाद किया है । उनकी किताब- शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी काफीमशहूर है । द हिंदूज- एन ऑलटेरनेटिव हिस्ट्री की भूमिका में वो स्वीकार करती है कि दलितों और महिलाओं ने हिंदू धर्म के फैलाव और उत्थान में बड़ा योगदान किया है । महिलाओं और दलितों के इस योगदान को सदियों से नजरअंदाज किया जाता रहा है । वेंडी डोनिगर ने अपनी इस किताब में हाशिए के इन लोगों की नजरों से इतिहास को देखने की कोशिश की है । इस किताब में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को लेकर पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है । उनकी इन प्रस्थापनाओं पर कई विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं । वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है । हमारे धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक एक आदर्श हिंदू वह है जो लगातार सवाल खड़े करता है, जवाब को तर्कों की कसौटी पर कसता है और किसी भी चीज, अवधारणा और तर्क को अंतिम सत्य नहीं मानता है । हिंदू धर्म की इस आधारभूत गुण को आत्मसात करते हुए वेंडी डोनिगर ने कई व्याख्याएं की हैं और कुछ असुविधाजनक सवाल खड़े किए हैं । इस किताब में कई ऐसी बातें हैं जो वेंडी डोनिगर ने संस्कृत में पहले से सुलभ हैं और उसको अंग्रेजी के पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है । अंत में फिर से सवाल वही उठता है कि क्या तथ्यों और संदर्भों को समझे बगैर किए गए विरोध के सामने घुटने टेकना कितना जायज है । यह सवाल तब और बड़ा हो जाता है जब पेंग्विन जैसा बड़ा संस्थान अदने से विरोध के आगे सरेंडर कर देता है । 

Saturday, August 3, 2013

विचारों का वामपंथी फासीवाद

प्रेमचंद की जयंती के मौके पर हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका हंस की सालाना गोष्ठी राजधानी दिल्ली के साहित्यप्रेमियों के लिए एक उत्सव की तरह होता है । जून आते आते लोगों में इस बात की उत्सुकता जागृत हो जाती है कि इस बार हंस की गोष्ठी के लिए उसके संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव किस विषय का चुनाव करते हैं । इस उत्सुकता के पीछे पिछले अट्ठाइस साल से इस गोष्ठी में होने वाला गहन चिंतन और मंथन करनेवाले प्रतिष्ठित वक्ताओं के विचार रहे हैं । पिछले तीन चार सालों से इस गोष्ठी पर विवाद का साया मंडराने लगा है । कई लोगों का कहना है कि राजेन्द्र यादव जानबूझकर विषय और वक्ता का चुनाव इस तरह से करते हैं ताकि विवाद को एक जमीन मिल सके । हो सकता है ऐसा सोचनेवालों के पास कोई ठोस और तार्किक आधार हो, लेकिन इतना तय है कि इस आयोजन में बड़ी संख्या में राजधानी के बौद्धिकों की सहभागिता होती है । पूर्व में हंस पत्रिका की संगोष्ठी में हुए विमर्श की गरमाहट राजधानी के बौद्धिक समाज के अलावा देशभर के संवेदनशील लोगों ने महसूस की । लेकिन इस वर्ष की हंस की संगोष्ठी साहित्य से जुड़े एक ऐसे विषय से जुड़ा है जिसपर साहित्य जगत को गंभीरता से सोचने की आवश्कता है । इस बार की संगोष्ठी ने खुद को हिंदी समाज का प्रगतिशील और जनवादी बौद्धिक तबका करार देने वालों के पाखंड को उजागर कर दिया ।
दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा । प्रेमचंद की जयंती इकतीस जुलाई को होने वाले इस सालाना जलसे का विषय था- अभिव्यक्ति और प्रतिबंध – और वक्ता के तौर पर हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दीक्षित और पूर्व भारतीय जनता पार्टी नेता गोविंदाचार्य, अंतराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका और नक्सलियों की हमदर्द अरुंधति राय, नक्सलियों के एक और समर्थक और कवि वरवरा राव को आमंत्रित किया गया था । वरवरा राव की कविताओं से हिंदी जगत परिचित हो या ना हो लेकिन उनकी ऐसी क्रांतिकारी छवि गढ़ी गई है जो उनको वैधता और प्रतिष्ठा दोनों प्रदान करती है । माओवाद के रोमांटिसिज्म और मार्क्सवाद की यूटोपिया की सीढ़ी पर चढ़कर वो प्रतिष्ठित भी हैं । कार्यक्रम की शुरुआत शाम पांच बजे होनी थी। अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य तो समय पर पहुंच गए । अरुंधति राय और वरवरा राव का घंटे भर से ज्यादा इंतजार के बाद कार्यक्रम शुरु हुआ । पहले तो बताया गया कि वरवरा राव दिल्ली पहुंच रहे हैं और कुछ ही वक्त में सभास्थल पर पहुंच रहे हैं । नहीं पहुंचे । कार्यक्रम के खत्म होने के बाद से सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर चर्चा शुरु हो गई । किसी ने लिखा कि जनपक्षधर कवि वरवरा राव ने हंस के कार्यक्रम का बहिष्कार किया क्योंकि उन्हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था । किसी ने अरुंधति की बगैर मर्जी के कार्ड पर नाम छाप देने को लेकर राजेन्द्र जी पर हमला बोला ।  
यह सब चल ही रहा थी कि सोशल मीडिया पर ही वरवरा राव का एक खुला पत्र तैरने लगा । उस पत्र की वैधता ज्ञात नहीं है लेकिन कई दिनों के बाद भी जब वरवरा राव की तरफ से कोई खंडन नहीं आया तो उस खत को उनका ही मान लिया गया है । उस पत्र में वरवरा राव ने गोष्ठी में नहीं पहुंचने की बेहद बचकानी और हास्यास्पद वजहें बताईं । अपने पत्र में वरवरा राव ने लिखा- मुझे हंस की ओर से ग्यारह जुलाई को लिखा निमंत्रण पत्र लगभग दस दिन बाद मिला । इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेन्द्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण पत्र में डाल देने की घोषणा कर रखी थी । बहरहाल मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन और क्यों और किस मंशा से बुला रहा है । मेरे साथ इस मंच पर मेरा साथ बोलनेवाले कौन हैं । वरवरा राव के इस भोलेपन पर विश्वास करने का यकीन तो नहीं होता लेकिन अविश्वास की कोई वजह नहीं है । भोलापन इतना कि किसी ने बुलाया और आप विषय देखकर चले गए । वरवरा राव ने आगे लिखा कि दिल्ली पहुंचने पर उनको यह जानकर हैरानी हुई कि उनके साथ मंच पर गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी हैं । राव के मुताबिक अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट से जुड़ाव सर्वविदित है । राव यहीं तक नहीं रुकते हैं और अशोक वाजपेयी की प्रेमचंद की समझ को लेकर भी उनको कठघरे में खड़ा कर देते हैं । इसके अलावा गोविंदाचार्य को हिंदूवादी राजनीति करनेवाला करार देते हैं। गोविंदाचार्च के बारे में उनकी राय सही हो सकती है लेकिन अशोक वाजपेयी के कॉरपोरेट से संबंधों की बात वरवरा राव की अज्ञानता की तरफ ही इशारा करती है । वरवरा राव को अशोक वाजपेयी का सांप्रदायिक राजनीति से विरोध ज्ञात नहीं है । शायद हिंदी के चेले चपाटों ने उन्हें बताया नहीं । खैर अशोक वाजपेयी वरवरा राव से कमतर ना तो साहित्यकार हैं और ना ही उनसे कम उनके सामाजिक सरोकार हैं । अशोक वाजपेयी को राव के सर्टिफिकेट की भी जरूरत नहीं है  । अरुंधति की तरफ से समारोहा में उनके ना आने की वजह का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया । लेकिन साहित्यक हलके में यही चर्चा है कि उनको भी गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करना मंजूर नहीं था । अरुंधति हंस के कार्यक्रम में पहले भी ऐसा कर चुकी हैं जब उनको और छत्तीसगढ़ के डीजी रहे विश्वरंजन को एक मंच पर आमंत्रित किया गया था । उस वक्त भी वो नहीं आई थी ।  
दरअसल हंस की गोष्ठी के दौरान हुआ यह ड्रामा वामपंथी फासीवाद का बेहतरीन नमूना है । वरवरा राव ने अपने खुले पत्र में खुद की लाल विचारधारा का भी परचम लहराया है । राजसत्ता द्वारा अपनी अपनी प्रताड़ना का छाती कूट कूट कर प्रदर्शन किया है ।  राजेन्द्र यादव भी खुद को वामपंथी रचनाकार कहते रहे हैं लेकिन इस मसले पर वामपंथियों के इस फासीवाद के बचाव में उनके तरकश में कोई तीर है नहीं, बातें चाहे वो जितनी कर लें। राजनीति की किताबों में फासीवाद की परिभाषा अलग है लेकिन लेनिन के परवर्तियों ने फासीवाद की अलग परिभाषा गढ़ी । उसके मुताबिक फासीवाद अन्य लोकतांत्रिक दलों का खात्मा कर पूरे समाज को एक सत्ता में बांधने का प्रयास करता है । फासीवाद के उनके इस सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण रूस और चीन हैं जहां लाखों लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता की विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी । सैकड़ों नहीं, हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया । वामपंथी राजनीति का दुर्गुण ही यही है कि जिसे वो फासीवाद मानते हैं वास्तविकता में उसी को अपनाते हैं । हंस की गोष्ठी में वरवरा राव और अरुंधति का गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ शामिल नहीं होना यही दर्शाता है । दरअसल यह विचारों का फासीवाद तो है ही एक तरह से विचारों को लेकर अस्पृश्यता भी है । क्या वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों के पास इतनी तर्कशक्ति नहीं बची कि वो दूसरी विचारधारा का सामना कर सकें । क्या वाम विचारधारा के अंदर इतना साहस नहीं बचा कि वो दूसरी विचारधारा के हमलों को बेअसर कर सकें । अगर मैं ऑरवेल के डबल थिंक और डबल टॉक शब्द उधार लूं तो कह सकता हूं कि हिंदी समाज के वामपंथी विचारधारा को माननेवाले लोग इस दोमुंहे बीमारी के शिकार हैं । दरअसल सोवियत संघ के विघटन के बाद भी हमारे देश के मार्क्सवादियों ने यह सवाल नहीं खड़ा किया कि इस विचारधारा में या उसके प्रतिपादन में क्या कमी रह गई थी । दरअसल सवाल पूछने की जगह भारत के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने मार्कसवाद की अपने तरीके से रंगाई पुताई की और उसकी बिनाह पर अपनी राजनीति चमकाते रहे । रूस में राजसत्ता का कहर झेलनेवाले मशहूर लेखक सोल्झेनित्सिन ने भी लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है ।‘ भारत में इस तरह के उदाहरण लगातार कई बार और बार बार मिलते रहे हैं । एक विचारधारा के तौर पर मार्क्सवाद पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं लेकिन उसको एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता है । लेकिन इस विचारधारा के वरवरा राव जैसे अनुयायी उसको फासीवादी बाना पहनाने पर आमादा हैं । राव और अरुंधति को गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ अभिव्यक्ति और प्रतिबंध विषय पर अपने विचार रखने चाहिए थे । अपने तर्कों से दोनों को खारिज करते । लेकिन हमारे समाज में वरवरा राव जैसे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अब भी मौजूद हैं जो विचारधारा की कारागार में सीखचों के पीछे रहकर प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं । इस बार जिस तरह से हंस की गोष्ठी में राव और राय के नहीं आने को लेकर सोशल मीडिया और अखबारों में संवाद शुरू हुआ है उससे तो यही कहा जा सकता है कि हंस की गोष्ठी अब शुरू हुई है और वो विचारों के कारागार से मुक्त है ।
 

Sunday, September 4, 2011

लोक से दूर लेखक

बचपन से सुनता था कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद कहा करते थे कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । एक और बात सुनता था कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं बल्कि समाज के आगे चलनेवाली मशाल है । मैं इसे सुनकर यह सोचता था कि अगर साहित्य मशाल हैं तो साहित्यकार उस मशाल की लौ को लगातार जलाए रखने का काम करते हैं । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का दिल्ली में ऐतिहासिक अनशन खत्म हो गया है । अब तमाम तरीके से लोग उस जन उभार और आंदोलन को मिले व्यापक जनसमर्थन का आकलन कर रहे हैं । यह वो वक्त था जब साहित्य और साहित्यकारों के सामने यह चुनौती थी कि वो साबित करे कि राजनीति के पीछे चलनेवाली मशाल नहीं है । लेकिन अन्ना के आंदोलन के दौरान कमोबेश साहित्यकारों का जो ठंडा या विरोध का रुख रहा उससे घनघोर निराशा हुई । हंस के संपादक और दलित विमर्श के पुरोधा राजेन्द्र यादव को को अन्ना के आंदोलन में आ रहे लोग भीड़ और उनका समर्थन एक उन्माद नजर आता है । उस भीड़ और उन्माद को दिखाने-छापने के लिए वो मीडिया को कोसते नजर आते हैं । उनका मानना है कि अन्ना के आंदोलन के पीछे व्यवस्था परिवर्तन का विचार कम और एक समांतर सत्ता कायम करने की आकांक्षा ज्यादा है । पता नहीं राजेन्द्र यादव को इसमें समानंतर सत्ता खड़ा करने के संकेत कहां से मिल रहे हैं, जबकि अन्ना हजारे और उनके लोग मंच से कई कई बार ऐलान कर चुके हैं कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं । अन्ना हजारे ने तो कई बार अपने साक्षात्कार में इस बात को दोहराया है कि अगर वो चुनाव लड़ते हैं तो उनकी जमानत जब्त हो जाएगी । टीम अन्ना भी हर बार व्यवस्था परिवर्तन की बात करती है । दरअसल ये जो सोच है वो अपने दायरे से बाहर न निकलने की जिद पाले बैठे है । राजेन्द्र यादव तो दूसरी शिकायत है कि अन्ना हजारे का जो आंदोलन है वो लक्ष्यविहीन है और जिस भ्रष्टाचार खत्म करने की बात की जा रही है वो एक अमूर्त मुद्दा है । उनका मानना है कि जिस तरह से आजादी का लड़ाई में हम अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ लड़े थे या फिर जयप्रकाश आंदोलन के दौरान इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ पूरा देश उठ खड़ा हुआ था वैसा कोई साफ लक्ष्य अन्ना के सामने नहीं है । भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी जा रही है वह अदृश्य है । करप्शन व्यापक रूप से समाज और नौकरशाही की रग रग में व्याप्त है, उसे खत्म करना आसान नहीं है । एक तरफ तो राजेन्द्र यादव कहते हैं कि ये समांतर सत्ता कायम करने की आंकांक्षा है तो दूसरी तरफ उन्हें कोई मूर्त लक्ष्य दिखाई नहीं देता है । राजेन्द्र यादव को अन्ना का आंदोलन बड़ा तो लगता है लेकिन इसके अलावा उन्हें सबसे आधारभूत आंदोलन नक्सलवाद का लगता है । उनका मानना है कि नक्सलवादी आंदोलन सारे सरकारी और अमानवीय दमन के बावजूद व्यवस्था परिवर्तन के लिए सैकड़ों लोगों को बलिदान के लिए प्रेरित कर रहा है । यादव जी को नक्सलवादी आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लगता है जबकि अन्ना का आंदोलन समांतर सत्ता कायम करने की आकांक्षा । क्या यादव जी यह भूल गए कि भारतीय सत्ता को सशस्त्र विद्रोह में उखाड़ फेंकने के सिद्धांत पर ही नक्सवाद का जन्म हुआ लगभग पांच दशक बाद भी नक्सलवादी उसी सशस्त्र विद्रोह के सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनका अंतिम लक्ष्य दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना है । जबकि अन्ना का आंदोलन ना तो कभी सत्ता परिवर्तन की बात करते है और न ही हिंसा की ।

दरअसल राजेन्द्र यादव भी उसी तरह की भाषा बोल रहे हैं जिस तरह की माओवादियों की समर्थक लेखिका अरुंधति राय बोल रही हैं । अरुंधति राय को भी जनलोकपाल बिल में समानंतर शासन व्यवस्था की उपस्थिति दिखाई देती है । अन्ना के आंदोलन में पहले भारत माता की तस्वीर लगाने और उसके बाद गांधी की तस्वीर लगाने और वंदे मातरम गाने पर भी ऐतराज है । ऐतराज तो अन्ना के मंच पर तमाम मनुवादी शक्तियांयों के इकट्ठा होने पर भी है । लेकिन अन्ना के साथ काम कर रहे स्वामी अग्वनवेश और प्रशांत भूषण तो अरुंधति के भी सहयोगी हैं । अरुंधति को इस बात पर आपत्ति थी कि अनशन के बाद अन्ना एक निजी अस्पताल में क्यों गए । इन सब चीजों को अरुंधति एक प्रतीक के तौर पर देखती हैं और उन्हें यह सब चीजें एक खतरनाक कॉकटेल की तरह नजर आता है । पता नहीं हमारे समाज के बुद्धिजीवी किस दुनिया में जी रहे हैं । अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब में दलितो,अल्पसंख्यकों और आदिवासियों को ढूंढने में लगे हैं । बड़े लक्ष्य को लेकर चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन में जिस तरह से स्वत: स्फूर्त तरीके से लोग शामिल हो रहे हैं वह आंखें खोल देनेवाला है । घरों में संस्कार और आस्था जैसे धार्मिक चैनलों की जगह न्यूज चैनल देखे जा रहे थे, जिन घरों से सुबह-सुबह भक्ति संगीत की आवाज आया करती थी वहां से न्यूज चैनलों के रिपोर्टरों की आवाज या अन्ना की गर्जना सुनाई देती थी। अन्ना के समर्थन में सड़कों पर निकले लोगों के लिए ट्रैफिक खुद ब खुद रुक जाता था और आंदोलनकारियों को रास्ता देता था । ये सब एक ऐसे बदलाव के संकेत थे जिसे पकड़ पाने में राजेन्द्र यादव और अरुंधति जैसे लोग नाकाम रहे । अन्ना हजारे के आंदोलन से तत्काल कोई नतीजा न भी निकले लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे जिसको समझने में राजेन्द्र-अरुंधति जैसे महान लेखक चूक गए ।

लेखकों के अलावा हिंदी में काम कर रहे लेखक संगठनों की भी कोई बड़ी भूमिका अन्ना के आंदोलन के दौरान देखने को नहीं मिली । अगर किसी लेखक संगठन ने चुपके से कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी हो तो वह ज्ञात नहीं है । यह एक ऐतिहासिक मौका था जिसमें शामिल होकर हिंदी के मृतप्राय लेखक संगठन अपने अंदर नई जान फूंक सकते थे । लेकिन विचारधारा के बाड़े से बाहर न निकल पाने की जिद या मूर्खता उन्हें ऐसा करने से रोक रही है । समय को न पहचान पाने वाले इन लेखक संगठनों की निष्क्रियता पर अफसोस होता है ।प्रगतिशील लेखक संघ अपने शुरुआती सदस्य प्रेमचंद की बात को भी भुला चुका है । साहित्य समाज का दर्पण तो है पर आज के साहित्यकार उस दर्पण से मुंह चुराते नजर आ रहे हैं । जब लेखकों के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू नहीं है तो वो खामोश रहकर इस चुनौती से मुंह चुरा रहे हैं । इस खामोशी से लेखकों और लेखक संगठनों ने एक ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया है । ऐसा नहीं है कि हिंदी के सारे साहित्यकार अन्ना के आंदोलन के विरोध में हैं – कई युवा और उत्साही लेखकों के अलावा नामवर सिंह और असगर वजाहत जैसे वरिष्ठ लेखकों को अन्ना का आंदोलन अहम लगता है । नामवर सिंह कहते हैं कि अन्ना का आंदोलन समाज को एक नई दिशा दे सकता है,यह सदिच्छा से किया गया आंदोलन है और इसका अच्छा परिणाम होगा । वहीं असगर वजाहत को भी लगता है कि अन्ना का आंदोलन एक नया रास्ता खोल रहा है । नामवर और असगर जैसे और कुछ लेखक हो सकते हैं, होंगे भी लेकिन बड़ी संख्या में जन और लोक की बात करनेवाले लेखक जन और लोक की आंकांक्षाओं को पकड़ने में नाकाम रहे ।