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Saturday, June 5, 2021

कलाकार को ठोस मदद की दरकार


कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे देश में कलाकारों के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। ये संकट आर्थिक है लेकिन इसका असर उनके मानस पर भी पड़ने लगा है। जाहिर सी बात है कि अगर कलाकारों का मन और मानस शांत नहीं होगा तो कला का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। कोरोना की पहली लहर के दौरान भी कलाकारों के सामने आयोजन बंद होने से जीविकोपार्जन का संकट आ गया था। उस समय भी इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी और संबधित व्यक्तियों ने इस संकट को दूर करने के लिए विमर्श भी किया था। तब संस्कृति मंत्रालय की तरफ से ये आश्वासन दिया गया था कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की एक सूची तैयार की जाएगी और उस सूची के आधार पर उनकी मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से किन कलाकारों की मदद की गई या कितने कलाकारों को आर्थिक मदद दी गई ये ज्ञात नहीं हो पाया है। इन केंद्रों के माध्यम से मदद हुई भी या नहीं ये भी सवालों के घेरे में है। अगर सरकार ने इन केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की मदद की तो उस योजना का प्रचार कला जगत के लोगों के बीच इस तरह से किया जाना चाहिए कि ज्यादातर लोग उसका फायदा उठा सकें। ये इस वजह से क्योंकि सबसे अधिक परेशानी में वो कलाकार हैं जो बड़े कलाकारों के साथ संगत करते हैं और आयोजन नहीं होने से उनकी आय का स्त्रोत सूख गया है। बड़े गायकों के साथ तबले से लेकर अन्य वाद्य यंत्रों पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के सामने आर्थिक समस्या विकराल है क्योंकि उनकी नियमित आय बंद हो गई है। नाटक में भी यही स्थिति है। बड़ा कालाकर तो अपनी आय से जीवन चला रहा है लेकिन जो तकनीशियन हैं, जो लाइटमैन हैं, जो साउंड के कर्मचारी हैं या इसी तरह से नेपथ्य में रहकर काम कर रहे हैं वो परेशान हैं। अनुमान ये है कि नाटक से जुड़े वैसे कलाकार जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनकी संख्या दो फीसदी है जबकि बाकी अट्ठानवे फीसदी लोग नाटकों के मंचन से होनेवाली नियमित आय पर निर्भर रहते हैं। सरकार प्रोडक्शन और रिपर्टरी ग्रांट तो दे रही है लेकिन नेशनल प्रजेंस वाली संस्थाएं अभी तक मदद की आस में हैं।

अभी कुछ दिनों पहले संस्कार भारती ने कलाकारों की मदद के उपायों पर विचार के एक गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें देशभर के कला और संस्कृति से जुड़े लोगों ने भाग लिया था। उस बैठक का स्वर भी यही था कि कलाकारों को अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है, लिहाजा संस्कार भारती को पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी आगे आना चाहिए। इसी तरह से अन्य संस्थाएं भी कलाकारों की मदद कर रही हैं पर ये नाकाफी है। संस्कृति मंत्रालय को संकट के समय कलाकारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। संकट के समय संकट से निबटनेवाली योजनाएं बनाई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर नीतिगत बदलाव भी किए जाने चाहिए ताकि कोई नियम मदद में बाधा न बन सके। कोरोना की पहली लहर के आने से लेकर अबतक कलाकारों को केंद्र में रखकर कोई ठोस योजना नहीं बन सकी है। 

संस्कृति मंत्रालय के 2001-22 के बजट को देखें तो उसमें चार सौ पचपन करोड़ रुपए कला संस्कृति विकास योजना, संग्रहालय के विकास, जन्म शताब्दियों के आयोजन आदि के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर में संस्कृति से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए एक सौ दो करोड़ आवंटित किए गए हैं। इन दोनों राशियों को मिलाकर देखें तो करीब साढे पांच सौ करोड़ से अधिक की राशि संस्कृति मंत्रालय के पास है जिसको प्रशासनिक फैसलों से कलाकारों की मदद की तरफ मोड़ा जा सकता है। इस आवंटन के तहत मंत्रालय को कोई ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे कि देशभर के विभिन्न हिस्सों में फैले रूपकंर कला के कलाकारों को मदद मिल सके। संस्कृति मंत्राल के अधीन राष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली जो अकादमियां हैं उनको भी आगे आकर मदद की पहल करनी चाहिए। संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि जैसी संस्थाओं को एक साथ आकर समन्वय बनाकर कलाकारों और लेखकों की मदद करने के लिए कार्ययोजना बनाकर काम करना चाहिए। इन अकादमियों ने पूर्व में भी आकस्मिक परिस्थितियों में कलाकारों की आर्थिक मदद की है। जैसे जब चेन्नई में बाढ़ आई थी और कई कलाकारों के वाद्य यंत्र आदि पानी से नष्ट हो गए थे, तब संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन ने अपनी पहल पर उनकी मदद की थी। इस वक्त कोरोना काल में इन अकादमियों की गतिविधियां भी लगभग ठप हैं। उनका व्यय भी न्यूनतम हो रहा है। बचे हुए धन को कलाकारों की मदद में उपयोग में लाया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस दिशा में सोचा जाए और उसको क्रियान्वयित किया जाए। 

इस काम में एक ही बाधा आ सकती है कि वो ये कि इन अकादमियों में से ज्यादातर में शीर्ष पद खाली हैं। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन का कार्यकाल 27 जनवरी 2020 को समाप्त हो गया लेकिन अबतक उस पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसका असर काम काज पर पड़ता ही है। संगीत नाटक अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कार 2018 के बाद घोषित नहीं हो सके हैं। 2018 का पुरस्कार 2019 में घोषित हुआ था जो अबतक कलाकारों को प्रदान नहीं किए जा सके हैं। ललित कला अकादमी के चेयरमैन उत्तम पचारणे का कार्यकाल पिछले महीने की 21 तारीख को समाप्त हो गया। तीन साल का उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा। उनके कार्यकाल के समाप्त होने के पहले नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ हो जानी चाहिए थी जो हो नहीं सकी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की वेब साइट के मुताबिक इसके निदेशक वामन केंद्रे का कार्यकाल सितंबर 2018 में समाप्त हो गया और उसके बाद कार्यकारी निदेशक सुरेश शर्मा संस्थान चला रहे हैं। यहां पिछले साल चेयरमैन के पद पर परेश रावल की नियुक्ति हुई लेकिन निदेशक का पद विज्ञापित होने के बाद भी अबतक भरा नहीं जा सका। कला संस्कृति और साहित्य से जुड़ी कई ऐसी संस्थाएं हैं जहां शीर्ष पद खाली है। इन पदों के खाली रहने का बड़ा नुकसान ये है कि बड़े फैसले नहीं हो पाते हैं क्योंकि उसके लिए शीर्ष स्तर की मंजूरी आवश्यक होती है।

कोरोना संक्रमण के इस दौर में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य पर जो संकट दिखता है उसको दूर करने के लिए दूरगामी योजनाएँ बनानी होंगी। यह ठीक बात है कि इस वक्त देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों की जान की रक्षा करना, वायरस को फैलने से रोकने के उपाय करना और आसन्न खतरे से निबटने की योजना बना है। अब संक्रमण की दर कम होने लगी है, टीकाकरण की रफ्तार तेज हो रही है और स्थितियां सामान्य होती दिख रही हैं तो केंद्र सरकार को ज्यादातर कलाकारों की चरमरा गई आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान देने की नीति पर काम करना चाहिए। स्थितियां इस कदर बिगड़ चुकी हैं कि इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दखल देकर एक ऐसी नीति निर्माण की दिशा में पहल करनी होगी जिससे कोरोना जैसे संकट में कलाकारों के सामने जीवन जीने का संकट पैदा नहीं हो सके। कला और संस्कृति किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर हम विश्व के इतिहास पर नजर डालें या फिर अपने ही देश के पौराणिक काल में सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करें तो यह पाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा वहां के कलाकारों के माध्यम से संस्कृति के आंगन में खिलखिलाती हैं। सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए, नीतिया बनाएं और नियुक्तियां करें ताकि समेकित योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन हो सके। 


Saturday, October 17, 2020

अपनी जड़ों की ओर लौटता भारत


एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि ‘किसान क्षेत्र के हित के लिए करनेवाला हमारा संगठन सर्वमान्य संगठन बन गया है, और ऐसे हमारे संगठन को अनुकूलता भी प्राप्त हो गई है। क्योंकि जो हमारा विचार है, विज्ञान ने ही ऐसी करवट ले ली है कि हमने जिन तत्वों का उद्घोष अपनी स्थापना के समय से हम करते आए, विरोधों के बावजूद, उनको मान्यता देने के बजाए दूसरा कोई पर्याय रहा नहीं अब दुनिया के पास। कृषि के क्षेत्र में और जो कॉलेज में से पढ़ा है ऐसा कोई व्यक्ति आपकी सराहना करे ऐसे दिन नहीं थे। आज हमारे महापात्र साहब भी आपके कार्यक्रम में आकर जैविक खेती का गुणगान करते हैं। जैविक खाद के बारे में पचास साल पहले विदर्भ के नैड़प काका बड़ी अच्छी स्कीम लेकर केंद्र सरकार के पास गए थे। ये स्कीम अपने भारत की है, भारत के दिमाग से उपजी है, केवल मात्र इसके लिए उसको कचड़े में डाला गया। आज ऐसा नहीं है। पिछले छह महीने से जो मार पड़ रही है कोरोना की, उसके कारण भी सारी दुनिया विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधनेवाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है, आशा से देख रही है।‘ मोहन भागवत के भाषण के इस छोटे से अंश में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनकी ओर उन्होंने संकेत  किया है। पहली बात तो ये कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को मान्यता मिलने लगी है। मोहन भागवत ने ठीक ही इस बात को रेखांकित किया कि पूरी दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है।

मोहन भागवत के इस वक्तव्य के उस अंश पर विचार करने की जरूरत है जिसमें वो कह रहे हैं कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। दरअसल हमारे देश में हुआ ये कि मार्कसवाद के रोमांटिसिज्म में पर्यावरण की लंबे समय तक अनदेखी की गई। आजादी के बाद जब नेहरू से मोहभंग शुरू हुआ या यों भी कह सकते हैं कि नेहरू युग के दौरान ही मार्क्सवाद औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए उकसाने वाला विचार लेकर आया। औद्योगिकीकरण में तो विकास पर ही जोर दिया जाता है और कहा भी जाता है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। अगर विकास नहीं होगा तो औद्योगिकीकण संभव नहीं हो पाएगा।लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया। औद्योगिकीकरण का समर्थन करनेवाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव है। ये उपेक्षा इस हद तक है कि मार्क्स ने ‘मास्टरी ओवर नेचर’ की बात की है यानि प्रकृत्ति पर प्रभुत्व। सृष्टि के इस महत्वपूर्ण अंग, प्रकृति पर प्रभुत्व की कल्पना मात्र से ही इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत में बुनियादी दोष है। क्या ये मनुष्य के लिए संभव है कि वो प्रकृत्ति पर प्रभुत्व कायम कर सके। लेकिन मार्क्स ऐसा चाहते थे। उनके प्रकृत्ति को लेकर इस प्रभुत्ववादी नजरिए को उनके अनुयायियों ने जमकर बढ़ाया। इस बात का उल्लेख यहां आवश्यक है कि स्टालिन ने सोवियत रूस की सत्ता संभालने के बाद संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट किया। औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। नतीजा क्या हुआ ये सबके सामने है। बाद में इस गलती को सुधारने की कोशिश हुई लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका था। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। अभी तो इसके उल्लेख सिर्फ ये बताने के लिए किया गया कि साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद प्रकृति को लेकर बेहद उदासीन और प्रभुत्ववादी रही है। इसके विपरीत अगर हम विचार करें तो भारतीय विचार परंपरा में प्रकृत्ति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। इस पंचतत्व का निषेध या उससे आगे जाकर कुछ और नया खोज वैज्ञानिक अभी तक कर नहीं पाए हैं सिवा इसके कि वो इन पंच तत्वों के अंदर के अवयवों को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं। हमारी परंपरा में तो नदी पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। कभी भी आप देख लें किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृत्ति को भी याद किया जाता है। 

मोहन भागवत ने इस ओर भी इशारा किया है कि कोरोना के बाद स्थितियां बहुत बदल गई हैं। सचमुच बहुत बदली हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती हैं आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। हमारे जो वामपंथी प्रगतिशील मित्र आयुर्वेद का मजाक उड़ाया करते थे उनको सुबह शाम काढ़ा पीते या फिर गिलोई चबाते देखा जा सकता है। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। हमारे यहां तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए सूर्यास्त और और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है। आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। स परंपरा को अंग्रेजी के आभिजात्य मानसिकता और वामपंथ के विदेशी ज्ञान ने पिछले कई दशकों से नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की। सफल भी हुए। मोहन भागवत जी ने विदर्भ के एक किसान का जो उदाहरण दिया वो बेहद सटीक है। किसी भी प्रस्ताव को इस वजह से रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा कि वो भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित होती थी। अब देश एक बार फिर से अपनी जड़ों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरास की ओर लौटता नजर आ रहा है। 

अगर इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम ह पाते हैं कि हमारे देश में कथित तौर पर प्रगतिशील विचारों के शक्तिशाली होने की वजह से आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण शुरू हो गया। भारतीय विचारों को, भारतीय चिकिस्ता पद्धति को, भारतीय दर्शन को, भारतीय पौराणिक लेखन को सायास पीछे किया गया। उसको दकियानूसी, पुरानतनपंथी या परंपरावादी आदि कहकर उपहास किया गया। पश्चिमी आधुनिकता के आख्यान का गुणगान या उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय जीवन शैली और भारतीय पद्धति को प्रभावित करना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में एक ऐसा समाज बनने लगा था जो पूरी तरह से न तो भारतीयता में यकीन करता था और न ही पूरी तरह से पश्चिमी रीति-रिवाज को आत्मसात कर पा रहा था। पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के इस द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया। कोरोना की वजह से और देश में बदले राजनीति हालात ने एक अवसर प्रदान किया है जिसकी वजह से एक बार फिर से देश अपनी जड़ों की ओर लौटता दिख रहा है।   


Thursday, April 2, 2020

ऑनलाइन संवाद से जुड़ रहे लेखक


कोरोना के खतरे को देखते हुए जो लॉकडाउन किया गया है उसने लेखकों, पुस्तकों, प्रकाशकों और पाठकों की श्रृंखला भी प्रभावित हुई है। ना तो पुस्तकें छप पा रही हैं और ना ही वो पाठकों तक पहुंच पा रही हैं। ऐसे माहौल पाठकों और लेखकों के बीच संवाद बाधित होता देख दिल्ली के कई प्रकाशकों ने एक बेहतर पहल की। उन्होंने लेखकों और पाठकों के बीच संवाद करवाने की ठानी। इसके लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म एक ऐसी जगह थी जिसका दायरा भी बड़ा था और जिससे हिंदी का पाठक वर्ग जुड़ा भी था। सभी हिंदी के बड़े प्रकाशक सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं और अह उन्होंने सोशल मीडिया का उपयोग लेखकों और पाठकों के बीच संवाद बनाने में किया। हलांकि इसमें एक चुनौती भी थी। हिंदी के वरिष्ठ लेखकों में से अब भी कई ऐसे हैं जो फेसबुक पर तो हैं पर उसके तकनीकी पक्ष से बहुत ज्यादा परिचित नहीं हैं। उनको तकनीक समझाना और लाइव करवाना एक बड़ी चुनौती थी. कहते हैं न कि आवश्यकता सबकुछ करवा लेती है लिहाजा थोड़ी मेहनत के बाद हिंदी के उन वरिष्ठ लेखकों ने भी फेसबुक पर लाइव करना सीख लिया, जो अबतक इसका उपयोग नहीं जानते थे। वाणी प्रकाशन ने ऑनलाइन साहित्य महोत्सव की शुरुआत की थी जिसमें देश-विदेश के लेखक भाग ले रहे हैं लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर समय और समाज ऑनलाइन गोष्ठी कर दिया गया। अदिति के मुताबिक ये नाम इस वजह से बदला गया क्योंकि उन्होंने जब दिल्ली से बाहर जानेवालों की भीड़ और उनका दर्द देखा तो उनको लगा कि ऐसे माहौल में किसी तरह का महोत्सव उचित नहीं है, लिहाजा उसको गोष्ठी का नाम दे दिया गया।

ऑनलाइन साहित्य संवाद की पहल करनेवाली वाणी प्रकाशन की युवा निदेशक अदिति माहेश्वरी कहती हैं कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद उनके पास लेखकों के फोन आते थे तो कईबार एक निराशा का भाव भी महसूस करती थी। उन्होंने कहा ’मैंने महसूस किया कि एक सवादहीनता की स्थिति बन रही है और मुझे लगा कि कहीं इससे निराशा न व्याप्त हो जाए। फिर मैंने ऑनलाइन साहित्य महोत्सव शुरू करने का फैसला लिया। कई लेखकों को लॉगइन करके लाइव करना सिखाना पड़ा, उनको वाणी प्रकाशन के पेज से लाइव किया। इसके बहुत अच्छे नतीजे रहे। लाइव के वक्त हजारों की संख्या में पाठक जुड़े।‘ अब तो रास्ता खुल गया था और हिंदी के कई प्रकाशकों ने भी लाइव करने शुरू कर दिया। राजपाल एंड संस की कर्ताधर्ता मीरा जौहरी कहती हैं कि ‘लेखकों को फेसबुक पर लाइव करवाने का अनुभव बेहद अच्छा है। इसका एक फायदा यह भी हुआ है कि आप अगर लाइव के दौरान अपने पसंदीदा लेखक की बात नहीं सुन सकते हैं तो आप बाद में भी उसको देख सकते हैं। लेखक का वीडियो और उनकी बातें हमारे फेसबुक पेज पर लगी ही रहती हैं, पाठकों को जब इच्छा होती है तो वो अपनी सुविधानुसार इसके देख सकते हैं। हां, लाइव में एक फायदा ये होता है कि कि कोई पाठक अगर चाहे तो अपने लेखक से सवाल भी पूछ सकता है, उनकी रचनाओं के बारे में बात भी कर सकता है.यह एक बिल्कुल नई शुरुआत है और इसने संवाद को लेकर एक नई उम्मीद जगाई है।‘
लॉकडाउन के इस दौर में जब सबलोग अपने घरों में ही रह रहे हैं और अभी लगभग एक पखवाड़ा तक ये दौर चलेगा उसमें दिल्ली के प्रकाशकों की इस पहल का असर हिंदी साहित्य पर असर डालनेवाला है। जैसे-जैसे इंटरनेट का दायरा बढ़ेगा वैसे-वैसे ये संवाद और भी बढ़ेगा। पश्चिम के देशों में इस प्रवृत्ति के कई लाभ देखने को मिले हैं। कुछ सालों पहले ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्राएलॉजी प्रकाशित हुई थी जिसने पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी। इस उपन्यास का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। इसपर फिल्म भी बनी। लेखिका को करोड़ों की कमाई हुई थी। ई एल जेम्स ने इस उपन्यास को लिखने के पहले छोटे छोटे अंश लिखकर इंटरनेट पर डाले थे और पाठकों की प्रतिक्रिया मांगी थी। पाठकों की प्रतिक्रिया के आधार पर वो उस अंश को आगे बढ़ाती थी। उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था इस उपक्रम से उसको फिफ्टी शेड्स लिखने में काफी मदद मिली थी। कहने का मतलब ये है कि ऑनलाइन इस तरह के संवाद से पाठकों की रुचि जानने में लेखकों को मदद मिल सकती है। अगर पाठकों के फीडबैक को लेखक अपनी रचनाओं में शामिल करते हैं तो हो सकता है कि पाठक उसको अधिक पसंद करें और लेखक की लोकप्रियता बढ़े।

Wednesday, April 1, 2020

पीएम के संबोधन ने रचा कीर्तिमान

कोरोना वायरस की आशंका से पूरे देश में लॉकडाउन करने के लिए प्रधानमंत्री ने मंगलवार को रात आठ बजे का समय चुना। प्रधानमंत्री जब भी रात आठ बजे राष्ट्र को संबोधित करने आते हैं तो लोगों के बीच एक खास किस्म की उत्सुकता पैदा हो जाती है। 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा की तब भई रात के आठ ही बजे थे। 19 मार्च 2020 को जब उन्होंने राष्ट्र को संबोधित करते हुए रविवार को जनता कर्फ्यू का आह्वान किया तब भी रात के आठ बजे थे। इसलिए जब 22 मार्च को प्रधानमंत्री के राष्ट्र के संबोधन की खबर आई तो भी समय आठ बजे का ही दिया गया था। लोगों में इस बात को लेकर जबरदस्त उत्सुकता थी कि प्रधानमंत्री क्या बोलेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ठीक आठ बजे आए और उन्होंने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए 21 दिनों के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर की। कोरोना के तमाम तरह के खतरों से भी देश को आगाह किया, अपनी क्षमताओं और सीमाओं का भी उल्लेख किया। दर्शकों के बारे में जानकारी और टेलीविजन चैनलों की रेंटिंग जारी करनेवाली एजेंसी ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के मुताबिक आठ से साढे आठ बजे के बीच पीएम मोदी के उस संबोधन को 19.7 करोड़ दर्शकों ने टेलीविजन पर देखा। इस टेलीकास्ट को भारत में 210 चैनलों ने प्रसारित किया था। दर्शकों की ये संख्या के लिहाज से अबतक का कार्तिमान है। अभी तक किसी भी जॉनर में किसी भी शो या समाचार को इतने दर्शकों ने एक साथ नहीं देखा है। जानकारों के मुताबिक ये कोरोना की आशंका में उपजी उत्सुकता तो थी ही लोगों की ये जानने में भी रुचि थी प्रधानमंत्री मोदी इससे निबटने के लिए किस तरह के कदमों का एलान करते हैं।  
बार्क के आंकड़ों का अगर विश्लेषण किया जाए तो हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं क्रिकेट के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का फाइनल भी इतनी बड़ी संख्या में दर्शकों ने नहीं देखा। पिछले साल के आईपीएल फाइनल को 13.3 करोड़ दर्शकों ने देखा था। जब पीएम मोदी ने जनता कर्फ्यू का एलान करते हुए देश को संबोधित किया था तब 8.3 करोड़ दर्शकों ने उस संबोधन को सुना था। इसके पहले भी जब प्रधानमंत्री का कश्मीर से धारा 370 हटाने के संबंध में उद्बोधन हुआ था तब भी देशभर में साढे छह करोड़ दर्शकों ने देखा था. प्रधानमंत्री के उस भाषण को 163 चैनलों पर एक साथ दिखाया  गया था। नोटबंदी की घोषणा के लिए नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को देश की जनता को संबोधित किया था तो उस समय 114 चैनलों ने उस भाषण को दिखाया था और 5.7 करोड़ दर्शकों ने देखा था।
कोरोना जैसी रहस्यमय बीमारी और उससे निबटने के कदमों को लेकर देश की जनता की उत्सकुकता इतना बड़ा दर्शक वर्ग खड़ा करने की एक वजह हो सकती है लेकिन अगर सूक्षम्ता से प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों के दर्शक संख्या का विश्लेषम करें तो एक वजह और सामने आती है वो है उनपर भरोसा और विश्वास।