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Saturday, August 27, 2022

राजभाषा हिंदी की बढ़ने लगी व्याप्ति


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं से प्रेम करते थे। उनके लेखन और वक्तव्यों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति उनका लगाव झलकता है। जब दिनकर राज्यसभा के सदस्य थे तो उस दौर में हिंदी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। 6 मई 1963 को राज्यसभा में दिनकर ने हिंदी को लेकर अपनी बात रखी थी। भाषा पर पेश विधायी प्रस्ताव पर संशोधन प्रस्तुत करते हुए दिनकर ने आशा प्रकट की थी कि ‘केंद्रीय सरकार तत्काल कुछ ऐसा उपयुक्त तंत्र बनाएगी जो केंद्रीय सरकार को केंद्रीय सरकार की विभिन्न शाखाओं में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग पर सलाह देगा और संसद की सभाओं को हिंदी की प्रगति के संबंध में समय समय पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा, ताकि 1975 के वर्ष तक हिंदी विधि निर्माण तथा प्रशासन का उतना ही प्रभावी माध्यम बन जाए, जितना इस समय अंग्रेजी है।‘ दिनकर की चिंता स्वाधीनता के बाद हिंदी को उसका उचित अधिकार नहीं मिलने को लेकर थी। उनके वक्तव्य से स्पष्ट है। वो इससे चिंतित थे कि शासन के तंत्र में हिंदी की प्रगति अंग्रेजी के साथ साथ कैसे की जा सकती है। उन्होने उस वक्त के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के एक वक्तव्य को भी अपनी चिंता से जोड़ा था। गृहमंत्री ने तब कहा था कि  ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए जीवन-दान दे रहे हैं, अनंत काल के लिए नहीं।‘  दिनकर ने गृहमंत्री के इस वाक्य को उद्धृत करते हुए अपना मत रखा था, ‘जिस प्रकार सरकार इस बारे में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह ‘कल-कल’ की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘  दिनकर हिंदी को राजभाषा बनाए जाने और फिर 15 वर्षों के बाद उसकी समयावधि बढ़ाने को लेकर सशंकित थे। दिनकर की आशंका स्वाधीन भारत में सही साबित हुई और हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिशें ‘कल-कल’ करते हुए सचमुच अनंतकाल तक चलती चली जा रही हैं। 

हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रश्न बहुत पुराना है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ये तय था कि स्वतंत्रता के बाद हिंदी राष्ट्रभाषा बनेगी। गांधी भी अपने लेखों और भाषणों में इसके आग्रही दिखते हैं। वो अपनी पत्रिका हरिजन में और अपने वक्तव्यों में इस बात के संकेत देते रहते थे कि हिंदी को स्वाधीनता के बाद राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। गांधी जी तो स्वराज्य के लिए भी भारतीय भाषाओं को आवश्यक मानते थे। 1921 में उन्होंने कहा था, अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी भारतीय मस्तिष्क का सर्वोच्च विकास संभव होना चाहिए। अंग्रेजी से प्रेरणा लेने की गलत भावना से छुटकारा होना स्वराज्य के लिए अत्यावश्यक है। 1947 में अपनी पत्रिका हरिजन में भी गांधी ने लिखा, ‘मेरा आशय यह है कि जिस प्रकार हमने सत्ता हड़पनेवाले अंग्रेजों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका उसी प्रकार हमें सांस्कृतिक अधिग्रहण करनेवाली अंग्रेजी को भी हटा देना चाहिए। यह आवश्यक परिवर्तन करने में जितनी देरी होगी उतनी ही अधिक राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती जाएगी।‘ गांधी निरंतर अंग्रेजी को हटाने की बात कर रहे थे लेकिन उनके अनुयायी और स्वाधीनता के बाद सत्ता में आए नेता गांधी की इन बातों को राजनीतिक वजहों से नजरअंदाज करते रहे। संविधान सभा में सदस्यों ने भाषा संबंधी गांधी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा। भाषा के प्रश्न पर लगातार बहस से बचते रहे और उसको अंतिम बैठकों के लिए टालते रहे। आखिरकार  12 सितंबर 1949 को संविधानसभा में भाषा के प्रश्न पर बहस आरंभ हुई। चर्चा तीन दिनों तक चली। तमाम तरह के तर्क वितर्क हुए। 14 सितंबर 1949 को ये तय किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी देश की राजभाषा होगी। संविधान सभा में हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर भी बहस और मतविभाजन हुआ था लेकिन हिंदी के पक्ष में बहुमत था। 

कुछ लोग संविधान सभा में हिंदी के पक्ष में बहुमत को भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद लोगों के मत बदलने से भी जोड़कर देखते हैं। प्रख्यात गांधीवादी अप्पा साहब पटवर्धन ने भी कहा था कि ‘यह उचित ही है कि हमलोग अब हिंदी को ही राष्ट्रभाषा कहें क्योंकि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी।‘ हिंदी को लेकर पक्ष विपक्ष की बातें होती रहीं पर यह प्रविधान बना कि संविधान के लागू होने के 15 वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी। 15 वर्षों के बाद अगर संसद को लगता है कि आगे भी इस प्रविधान की जरूरत है तो वो कानून बनाकर इसको लागू रख सकती है। फिर भाषा आयोग बना,अध्यादेश जारी हुए। हिंदी राजभाषा तो बनी रही पर सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा। 1963 तक पूरे देश में ऐसी स्थिति बन गई जिससे साफ हो चला था कि 1965 में यानि संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद भी शासन की भाषा हिंदी नहीं हो पाएगी। 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में घोषणा कर दी कि ‘जबतक अहिंदी भाषी राज्य अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तब तक हिंदी के साथ-साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी।‘ नेहरू का ये वक्तव्य भाषा अधिनियम का आधार बना। तब से लेकर अबतक अंग्रेजी शासन की भाषा बनी हुई है। उसका दबदबा कायम है क्योंकि इसको लेकर गंभीरता से प्रयास नहीं हुए, जो भ्रांतियां हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच पैदा की गईं उनको दूर करने का राजनीतिक स्तर पर प्रयास नहीं हुआ। देश को चलानेवाले अधिकतर लोग अंग्रेजीदां रहे और उनके लिए शासन की भाषा अंग्रेजी रखना आसान रहा। 

लेकिन हिंदी को मजबूती देने का काम अहिंदी भाषियों ने भी किया चाहे वो वीर सावरकर हों, तिलक हों, भूदेव मुखर्जी हों, सुनीति कुमार चाटुर्ज्या हों या अन्य महानुभाव। उसी तरह से जब 2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजराति होते हुए भी उन्होंने अपनी प्राथमिक भाषा हिंदी बनाई तो शासन की भाषा बदलने लगी। 2019 में जब अमित शाह गृह मंत्री बने तो उन्होंने खामोशी से राजभाषा हिंदी को मजबूत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। अमित शाह भी गुजराती हैं और उन्होंने हिंदी सीखी। वो खुद हिंदी में लिखने लगे और अधिकारियों को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने लगे। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी में कार्य करने लगे तो अन्य मंत्रियों ने भी इसको प्राथमिकता देना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ कि अन्य मंत्रालयों में हिंदी में कामकाज को वरीयता मिलने लगी। राजभाषा गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी को प्राथमिकता दे रहे हैं। 2019 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में दूसरी बार सरकार बनी तो गृह मंत्री अमित शाह ने रुचि लेकर 49 मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समिति का गठन करवाया। राजभाषा विभाग की सक्रियता सतह पर दिखने लगी। अन्य भारतीय भाषाओं को हिंदी से जोड़ने का कार्य आरंभ हुआ। ‘लीला राजभाषा’ और ‘लीला प्रवाह’ के अंतर्गत 14 भारतीय भाषाओं में हिंदी सीखने की सहूलियतें प्रदान की गई। अनुवाद का साफ्टवेयर ‘कंठस्थ’ और ‘ईमहाशब्दकोश’ तैयार हुए। संसदीय राजभाषा समिति ने दस खंडों में अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को दीं। पिछले वर्ष काशी में पहला अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन आयोजित किया गया। हिंदी दिवस के अवसर पर अगले महीने सूरत में राजभाषा का एक सम्मेलन गृह मंत्रालय आयोजित कर रहा है। एक शब्दकोश पर भी कार्य हो रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों के हिंदी प्रशिक्षण को लेकर भी राजभाषा विभाग सक्रिय दिख रहा है। गृह मंत्रालय की पहल पर गैर हिंदी भाषी कर्माचरियों में हिंदी सीखने की ललक बढ़ी है। गृह मंत्री अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि वो खुद हिंदी के व्यापक प्रयोग को लेकर सतर्क रहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि दिनकर ने जो आशंका जताई थी वो अब निर्मूल साबित होगी और हिंदी को उसका उचित स्थान मिलेगा और वो शासन के साथ ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।  

Saturday, April 16, 2022

हिंदी को देशभाषा बनाने का हो प्रयास


कुछ दिनों पहले ‘द कपिल शर्मा शो’ पर फिल्म आर आर आर के अभिनेता एनटीआर जूनियर, राम चरण, फिल्म के निर्देशक राजामौली और अभिनेत्री आलिया भट्ट आए थे। कपिल शर्मा के शो का नाम भले ही अंग्रेजी में है, इसमें ज्यातार बातचीत हिंदी में ही होती है। दक्षिण भारतीय फिल्मों के दोनों अभिनेता न केवल हिंदी समझ रहे थे बल्कि अच्छी हिंदी बोल भी रहे थे। उस शो में उन दोनों अभिनेताओं को अच्छी हिंदी बोलते देख अर्चना पूरन सिंह ने उनसे जानना चाहा कि उन्होंने इतनी अच्छी हिंदी कहां से और कैसे सीखी जबकि वो दोनों तो दक्षिण भारत में पले बढे हैं। एनटीआर जूनियर ने तपाक से इसका उत्तर दिया कि स्कूल में। उन्होंने कहा कि स्कूल में उनकी प्रथम भाषा हिंदी थी जिससे उनको बहुत मदद मिली। इसके अलावा अब जिस तरह से क्रास पालिनेशन (परागण) मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई के बीच हो रहा है, उससे। वो भाषाई परागण की बात कर रहे थे जिसमें देश के अलग अलग हिस्सों में बनने वाली फिल्में अलग अलग भाषाओं में डब होकर रिलीज हो रही हैं। एनटीआर की बात सुनकर आलिया ने एक और दिलचस्प तथ्य बताया कि एनटीआर जूनियर ने पूरी फिल्म में अपने संवाद को अपनी आवाज में ही हिंदी में डब किया है। आलिया के मुताबिक इससे दर्शकों को एक प्रामाणिक अनुभव मिलता है। एक घंटे से अधिक के इस शो में राम चरण और एनटीआर जूनियर ने हिंदी और अंग्रेजी में अपनी बात रखी लेकिन हिंदी समझ सब रहे थे। दक्षिण भारत की फिल्में डब होकर हिंदी में जितनी सफल हो रही हैं उसने वहां की भाषा में बनने वाली फिल्मों को सफलता का नया क्षितिज दिया है। अब वहां बनने वाली कई फिल्में तमिल और तेलुगू के साथ-साथ हिंदी में भी बन रही हैं। हिंदी में बनने वाली कुछ फिल्में भी दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनकर एक साथ सब जगह रिलीज होती हैं।  

उपरोक्त प्रसंग बताने का उद्देश्य ये है कि पिछले दिनों हिंदी को लेकर दक्षिण भारत के नेताओं और अंग्रेजी के पैरोकारों ने अकारण विवाद खड़ा किया। हुआ ये था कि कुछ दिनों पहले गृह मंत्री अमित शाह ने राजभाषा समिति की एक बैठक में कहा था कि ‘हमारे देश में अनेक प्रकार की भाषाएं हैं, कुछ प्रकार की बोलियां हैं। कई लोगों को लगता है कि ये देश के लिए बोझ हैं। मुझे लगता है कि अनेक भाषाएं और अनेक बोलियां हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। …परंतु जरूरत है कि देश की एक भाषा हो। जिसके कारण विदेशी भाषाओं को जगह न मिले। देश की एक भाषा हो, इसी दृष्टि को ध्यान में रखते हुए हमारे पुरखों ने हमारे स्वातंत्र्य सेनानियों ने राजभाषा की कल्पना की थी और राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किया था।‘  अपने भाषण में अमित शाह ने ना तो कुछ गलत कहा और ना ही कोई नई बात कही। अमित शाह के वक्तव्य का आशय स्पष्ट है कि हिंदी को संपर्क भाषा के तौर पर मजबूती दी जानी चाहिए और भारतीय भाषाओं को मजबूत किया जाना चाहिए। आज से दो साल पहले भी अमित शाह ने भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए आंदोलन करने जैसी बात कही थी। 

जब प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिला की प्राचीर से स्वाधीनता के अमृत महोत्सव की घोषणा की थी उसके बाद भी अमित शाह ने भाषाई आत्मनिर्भरता की बात की थी। उस वक्त गृहमंत्री ने कहा था कि आत्मनिर्भर शब्द केवल उत्पादन के लिए नहीं है, राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिए नहीं है बल्कि भाषाओं को लेकर भी आत्मनिर्भर होना होगा। तब जाकर आत्मनिर्भर भारत की कल्पना साकार होगी। बिना भाषाई आत्मनिर्भरता के आत्मनिर्भर भारत अर्थहीन है। उन्होंने उस वक्त स्वाधीनता संग्राम के दौरान तीन ‘स्व’ के महत्ता की भी चर्चा की थी। स्वदेशी, स्वभाषा और स्वराज। इन तीनों को अमित शाह ने स्वाधीनता संग्राम का स्तंभ बताते हुए कहा था कि आजादी मिलते ही स्वराज का सपना पूरा हो गया। स्वदेशी के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अभियान छेड़ा हुआ है लेकिन स्वभाषा के लिए हम सबको मिलकर खासकर नई पीढ़ी को विशेष रूप से आगे आना होगा। तब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक मंचों पर हिंदी में बोलने और बात करने को रेखांकित करते हुए कहा था कि अब अपनी भाषा को लेकर किसी लघुता ग्रंथि में रहने की जरूरत नहीं है। तब भी अमित शाह ने भारतीय भाषाओं की बात की थी। हिंदी की अनिवार्यता या उसको किसी अन्य भारतीय भाषा पर थोपने जैसी कोई बात नहीं कही थी। विवाद तब भी हुए थे क्योंकि कई क्षेत्रीय दलों को लगता है कि भाषा एक भावनात्मक मुद्दा है और उसको भुनाकर राजनीतिक लाभ कमाया जा सकता है। आज भले ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  स्टालिन हिंदी को लेकर आक्रामक हो रहे हैं लेकिन उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले सालों में हुए चुनाव के दौरान उनकी पार्टी डीएमके ने मदुरैई और उसके आसपास हिंदी में पोस्टर लगाए थे। तब उका हिंदी विरोध कहां गया था।

अमित शाह ने जब स्वतंत्रता सेनानियों और पुरखों की बात की थी तो वो ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित कर रहे थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंदी को लेकर हमारे पुरखों ने अपनी भावनाओं को सार्वजनिक किया था और उसको ताकत देने का प्रयास भी किया था। आज भले ही बंगाल की मुखख्यमंत्री ममता बनर्जी हिंदी का विरोध कर रही हैं लेकिन उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि भूदेव मुखर्जी, शारदाचरण मित्र, सुनीति कुमार चटर्जी ने कभी हिंदी का विरोध नहीं किया। बंकिमचंद्र चटर्जी ने कहा था, ‘हिंदी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी क्योंकि हिंदी भाषा की सहायता से भारत के विभिन्न प्रदेशों में जो ऐक्य-बंधन स्थापित कर सकेगा वही भारत बंधु कहलाने के योग्य हैं।‘ महर्षि अरविंद ने तो अपने पत्र ‘धर्म’ में स्पष्ट लिखा था कि ‘भाषा-भेष से देश की एकता में बाधा नहीं पड़ेगी। सब लोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए , हिंदी को साधारण भाषा के रूप में अपनाकर, इस भेद को नष्ट कर देंगे।‘  उस समय महर्षि अरविंद हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में देख रहे थे। अमित शाह भी महर्षि अरविंद के सोच को लेकर ही आगे चल रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड में हमारे उन पुरखों ने हिंदी को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जो अहिंदी भाषी प्रदेशों से आते थे और जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर, केशव राव पेठे, वेणीमाधव भट्टाचार्य, शारदाप्रसाद सान्याल, रायबहादुर प्रमदादास मित्र, प्यारी मोहन वंधोपाध्याय, नीलकमल मित्र, सी राजगोपालचारी आदि के नाम इसमें प्रमुख हैं। यह सूची बहुत लंबी है। राजगोपालाचारी जब मद्रास(अब चेन्नई) जाकर राजनीति करने लगे तो उन्होंने हिंदी का विरोध आरंभ किया था, उसके पहले वो हिंदी के प्रबल समर्थक थे। 

आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है. तो हमें अपने पुरखों की हिंदी को लेकर जो सोच था उसका सम्मान करना चाहिए। राजनीति ने भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता पैदा की उसको दूर करने का उपक्रम करना चाहिए। इस देश में भाषा के नाम पर पहले ही बहुत हिंसा हो चुकी है, राज्यों का विभाजन हो चुका है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है उससे एक उम्मीद जगती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष काशी हिंदू विश्वविद्यालय में महाकवि सुब्रह्णण्य भारती चेयर की स्थापना की घोषणा की थी। जिस भाषाई परागण की बात एनटीआर जूनियर कर रह थे वो इस तरह के कदमों से आगे बढ़ेगा और उसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कभी कहा था ‘प्रत्येक के लिए अपनी मातृभाषा और सबके लिए हिंदी।‘ यही सोच भारतीय भाषाओं को मजबूत करेगा।