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Saturday, July 9, 2022

ओटीटी प्लेटफार्म्स की चुनौतियां


कोरोना काल में जब लाकडाउन की वजह से सिनेमा हाल बंद हुए और लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे, ऐसे में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स काफी लोकप्रिय हुए थे। घर बैठे उनके सामने मनोरंजन का एक ऐसा विकल्प था जहां देश विदेश की असंख्य सामग्री उपलब्ध थी। सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी इन ओटीटी प्लेटफार्म को डाउनलोड करके लोगों ने मनोरंजन के इस नए विकल्प को अपनाया था। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान इन प्लेटफार्म्स पर बड़े सितारों की फिल्में भी रिलीज हुईंन थीं। उस समय दुनिया में ये आकलन किया गया था कि भारत ओटीटी प्लेटफार्म्स का या वीडियो आन डिमांड स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। अनुमान ये भी लगाया गया था कि इस वर्ष के अंत तक देश में स्मार्ट फोन या इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं की संख्या 80 करोड़ पहुंच जाएगी। इस संख्या को ध्यान में रखते हुए ओटीटी प्लेटफार्म्स ने भारतीय बाजार को लेकर अपनी रणनीति बनाई और यहां निवेश किया। वैश्विक स्तर पर भी कोरोना के दौर में इस माध्यम को दर्शकों ने अपनाया था। आपदा में मिले इस अवसर की वजह से इन प्लेटफार्म्स को चलानेवाली कंपनियों को दो साल में काफी मुनाफा हुआ। कोरोना का भय कम होने की वजह से अब इन कंपनियों के सामने अपनी उस सफलता को बनाए रखने की चुनौती है। चुनौती तो ग्राहकों की संख्या को बरकरार रखने की भी है। 

कनाडा की मार्केटिंग विशेषज्ञ रेबेका आल्टर ने अपने एक लेख में लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स की वैश्विक चुनौतियों के बारे में लिखा है। रेबेका के मुताबिक इस वर्ष की पहली तिमाही में नेटफ्लिक्स ने दो लाख ग्राहक खो दिए और विशेषज्ञों का अनुमान है कि दूसरी तिमाही में करीब बीस लाख ग्राहक इस प्लेटफार्म को छोड़ सकते हैं। रेबेका इसके लिए यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस में अपनी सेवाएं बंद करने के नेटफ्लिक्स के फैसले को तो जिम्मेदार मानती ही है, साथ ही ग्राहक शुल्क में बढ़ोतरी को भी एक कारण माना है। वैश्विक बाजार की बात छोड़ भी दें तो अपने देश में भी नेटफ्लिक्स की सेवाएं अन्य सभी ओटीटी प्लेटफार्म्स से महंगी हैं। नेटफ्लिक्स मोबाइल पर देखने की सुविधा देने के एवज में प्रतिमाह 149 रु लेता है जो कि एक वर्ष का 1788 रु बनता है। अन्य लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म वार्षिक शुल्क के तौर पर हजार रुपए तक लेती हैं। अमेजन प्राइम, डिजनी हाटस्टार और सोनी लिव आदि का वार्षिक शुल्क एक हजार रु से कम ही है। लेकिन इन सभी प्लेटफार्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने ग्राहकों को जोड़े रखने की। कोरोना महामारी के दौरान जितने ग्राहक जुड़े थे उनको बनाए रखना इनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2020 के अप्रैल से लेकर जुलाई तक विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म्स से करीब तीन करोड़ नए ग्राहक जुड़े थे। जो अब लगातार कम होते जा रहे हैं। इन प्लेटफार्म्स को नजदीक से जाननेवाले और इनकी गतिविधियों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि कोरोना काल में जितने ग्राहक इन प्लेटफार्म्स से जुड़े थे उनमें से करीब आधे ग्राहकों ने सब्सक्रिप्शन का नवीनीकरण नहीं करवाया। वैश्विक स्तर पर भी लगभग यही स्थिति है। सबसे बड़ा कारण कोरोना का भय खत्म होने लगा है और सिनेमा हाल खुल गए हैं। 

ओटीटी प्लेटफार्म्स से दर्शक क्यों जुड़े रहें, अगर इसका उत्तर ढूंढे तो सबसे पहले तो इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री की गुणवत्ता की बात होगी। दूसरी वजह इनको देखने का शुल्क। इसके अलावा हमारे देश में इन प्लेटफार्म्स को विवादों के कारण भी काफी फायदा मिला था। ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध कंटेंट को लेकर जब विवाद होता है और उसकी चर्चा होती है तो इन प्लेटफार्म्स को नए ग्राहक मिलते हैं। लोग उस सामग्री को देखना चाहते हैं। ग्राहकों की यही चाहत उनसे इन प्लेटफार्म्स को डाउनलोड करवाती है। अब अगर इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि वहां बहुत अधिक दुहराव होने लगा है। पहले कुछ सामग्री चौंकाती थी और दर्शकों को अपने साथ रोकती थी। अब लगातार एक ही तरह की सामग्री उपलब्ध होने लगी तो दर्शकों के लिए वो सामान्य बात हो गई। नेटफ्लकिस पर पहले ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज आई जिसमें नग्नता और भयंकर हिंसा थी। इन प्लेटफार्म्स पर किसी प्रकार की प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है इस वजह वो सेंसर बोर्ड की कैंची से मुक्त होकर खुले आम नग्नता और यौनिकता परोस रहे थे। हिंसा के नाम पर शरीर के अंगों को इस तरह से काटकर दिखा रहे थे कि कुछ दर्शकों को झटका लगता था। भाषा के स्तर भी सारी मर्यादा तोड़कर भरपूर गाली गलौच भरे संवाद भी दर्शकों को चौंका रहे थे। इन सबसे होनेवाली चर्चा से ग्राहक बढ़ रहे थे। धीरे धीर इनकी नवीनता खत्म हो गई।  

इसके अलावा भारतीय संस्कृति को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां या दृश्य दिखाने पर भी जमकर विवाद हुए। लैला जैसी सीरीज भी आई जिसने हिंदू मानस को झकझोरा था। नेटफ्लिक्स पर ही एक सीरीज आई थी ‘द सूटेबल बाय’। इसमें मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य पर जमकर बवाल हुआ था। केस मुकदमे भी हुए। प्लटफैर्म को अपेक्षित प्रचार मिला और परिणामस्वरूप उसके ग्राहक भी बढ़े। इसी तरह से अगर देखें तो सभी ओटीटी प्लेटफार्म ने अलग अलग तरीके से दर्शकों की जेब से पैसे निकलवाने का उपक्रम किया। जो ओटीटी प्लेटफार्म मुफ्त में कंटेंट दिखा रहा था उसने वेब सीरीज के बीच में विज्ञापन दिखाना आरंभ कर दिया। इतनी बार विज्ञापन आता है कि दर्शक परेशान हो जाते हैं। तभी स्क्रीन पर एक फ्लैश आता है कि अगर आप बगैर विज्ञापन या बिना अवरोध के वेब सीरीज देखना चाहते हैं तो अमुक राशि देकर वार्षिक ग्राहक बनें। इसके अलावा कई प्लेटफार्म्स ने तय ग्राहक शुल्क पर एक ही डिवाइस पर देखने की सुविधा दी। मोबाइल की अलग दर और मोबाइल और टीवी पर देखने के लिए अलग दर। इन सब झंझटों से भी ग्राहक इनसे दूर हुए। एक और बात जिसको रेखांकित करना आवश्यक है वो ये कि इन प्लेटफार्म्स ने हिंदी फिल्मों के बड़े सितारों को भारी भरकम रकम देकर उके साथ कंटेंट के लिए समझौता किया। सामग्री अर्जित करने के लिए निवेश किया गया लेकिन उसको अपेक्षित दर्शक नहीं मिले। डिजनी हाटस्टार पर अजय देवगन की एक वेब सीरीज आई जिसका नाम था रुद्रा, द एज आप डार्कनेस। अजय देवगन की वजह से प्लेटफार्म ने इसपर भारी भरकम रकम खर्च की लेकिन ये सीरीज अपेक्षित सफलता अर्जित नहीं कर सकी। जानकारों का मानना है कि इससे भारी नुकसान हुआ। इसी तरह कुछ फिल्में भी खरीदी गईं जिनको सफलता नहीं मिली। 

इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है लगातार कटेंट में इस तरह का बदलाव जिससे दर्शकों को अपनी ओर खींचने और फिर उनको रोके रखने में सफलता मिल सके। विवाद की गुंजाइश अब लगभग खत्म सी हो गई है क्योंकि सभी निर्माता अब इसकी परिणति से बचना चाहते हैं। वो सतर्क होकर सीरीज बनाने लगे हैं। तीसरे अगर भारतीय बाजार में उनको बने रहना है और लंबे समय तक मुनाफे का कारोबार करना है तो ये आवश्यक है कि वो अपने शुल्क निर्धारण पर काम करें। भारत में इंटरनेट की लोकप्रियता की एक वजह उसका सस्ता होना भी है। अगर ये सस्ते पैकेज पर अपना कंटेंट उपलब्ध करवाने के बारे में सोच सकते हैं तो इनकी ग्राहक संख्या बढ़ सकती है। कस्बों और गांवों तक पहुंचना है तो उनको अपना ग्राहक शुल्क कम रखना ही होगा। आधार बढ़ाकर भी मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।  


Saturday, November 28, 2020

प्रगतिशीलता के नाम पर बौद्धिक अपराध


इन दिनों एक वेब सीरीज को लेकर विवाद जारी है। विवादों के केंद्र में एक बार फिर ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स और उसपर दिखाई जा रही सीरीज ‘अ सुटेबल बॉय’ है। ये सीरीज विक्रम सेठ की 1993 में इसी नाम से प्रकाशित औपन्यासिक कृति पर आधारित है। उपन्यास में भारत विभाजन के बाद की कहानी कही गई है, जाहिर है कि वेब सीरीज में भी इसी कहानी को चित्रित किया गया है। विवाद इस वजह से उठा कि इस सीरीज की नायिका लता और उसके मित्र कबीर के बीच मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य दिखाया गया है। इस वेब सीरीज के खिलाफ रीवा में पहली शिकायत दी गई। शिकायत में कहा गया कि सीरीज में मध्य प्रदेश के महेश्वर घाट के शिव मंदिर प्रांगण में तीन बार एक मुस्लिम लड़के ने हिंदी लड़की का चुंबन लिया है जो हिंदू समाज की भावनाओं को आहत करती है। पुलिस और प्रशासन से मांग की गई कि नेटफ्लिक्स की दो अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। पुलिस ने आरंभिक जांच के बाद केस दर्ज कर लिया और जांच कर रही है। कानून अपना काम करेगी। इस शिकायत के बाद देश-विदेश में इस बात को लेकर चर्चा आरंभ हो गई। विदेशी अखबारों में इसकी आलोचना करते हुए लेख लिखे जा रहे हैं। अपने यहां भी इंटरनेट मीडिया पर खुद को प्रगतिशील और लिबरल समझनेवाले कथित ‘विद्वानों’ ने ‘अ सुटेबल बॉय’ के चुंबन दृश्य के चित्र को खजुराहो के मंदिर की मूर्तियों के चित्र के साथ लगाकर टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं। अब इन तथाकथित प्रगतिशीलों को कौन समझाए कि चित्रों या फिल्मों के दृश्यों की प्रभावोत्पादकता का आकलन संदर्भों के बगैर अनुचित है। अगर ‘अ सुटेबल बॉय’ के चुंबन दृश्य और खजुराहो के चित्रों पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार करें तो दोनों चित्रों के संदर्भ अलग हैं, लेकिन प्रगतिशीलों की बगैर संदर्भों को समझे या जानबूझकर किसी भी चीज को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करने की प्रविधि पुरानी है। 

पूरे देश ने एम एफ हुसैन के मामले में भी प्रगतिशीलों की इस प्रविधि को देखा था। हुसैन जब हिंदू देवी देवताओं के नग्न चित्र बना रहे थे तो उसको कला का उत्कृष्ट नमूना बताया गया था। उस वक्त भी उसकी तुलना खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर बनाई गई मूर्तियों से की गई थीं। उस वक्त भी इस बात को छिपा लिया गया था कि हुसैन जब किसी को अपमानित करना चाहते थे तो उसका नग्न चित्र बनाते थे। जबकि ये बात स्वयं हुसैन ने कही थी। हुआ ये था कि हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई थी। उस पेंटिंग में उन्होंने सिर्फ हिटलर को नग्न दिखाया था। जब इस बारे में उनसे सवाल पूछा गया कि पेंटिंग में उन्होंने सिर्फ हिटलर को ही नग्न क्यों चित्रित किया तो हुसैन ने साफ तौर पर कहा था कि किसी को अपमानित करना का उनका ये तरीका है। जब उनके हिंदू देवियों के नग्न चित्र बनाने पर विरोध हो रहा था तब खुद को उदारवादी माननेवाले या कलात्मक अभिव्यक्ति की पैरोकारी करनेवालों ने हुसैन के इस कथन को छुपा लिया था ।वो खजुराहो मंदिर की मूर्तियों के बहाने से पूरे देश को कलात्मकता की परिभाषा समझाने में जुट गए थे। उद्देश्य ये था कि हुसैन का बचाव किया जाए और उनका विरोध करनेवालों को अपनी परंपरा से अनभिज्ञ करार दिया जाए। अब एक बार फिर जब ये मसला उठा है तो खजुराहो की मंदिर की मूर्तियों की आड़ लेकर इस वेब सीरीज का बचाव किया जा रहा है। 

समग्रता में नेटफ्लिक्स पर दिखाई जानेवाली वेब सीरीज पर विचार करें तो एक पैटर्न दिखाई देता है। इस प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाली सीरीज में हिंदू धर्म या हिंदू देवी-देवताओं या हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमानजनक तरीके से चित्रण किया जाता रहा है। वेब सीरीज ‘लैला’ से लेकर ‘द सूटेबल बॉय’ तक में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ये दिखता है। नेटफ्लिक्स ही क्यों अन्य ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी हिंदू धर्म प्रतीकों का अक्सर ही मजाक उड़ाया जाता है। संवादों में भी भावनाएं आहत करनेवाली टिप्पणियां की जाती हैं। पात्रों के नाम भी इस तरह से रखे जाते हैं जो इनकी मंशा को साफ तौर पर उजागर करते हैं। प्राइम वीडियो पर एक वेब सीरीज आई थी ‘पाताल लोक’ उसमें पालतू कुतिया का नाम सावित्री रखा गया था। अब इसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है, समझा जा सकता है। यूट्यूब पर मसखरी करनेवाले कई हास्य कलाकार भी हिंदू देवी देवताओं को लेकर कैसी भी बात बोल जाते हैं। शंकर भगवान को लेकर जाने कैसी कैसी फूहड़ बातें कही जाती हैं बगैर शिव के व्यक्तित्व को समझे। हनुमान जी को लेकर भी उलजलूल टिप्पणियां की जाती हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथ में वर्णित चरित्रों को लेकर भी अपमानजनक बोल बोले जाते हैं। इन सब बातों को लेकर किसी को आपत्ति हो और वो भारतीय संविधान के अंतर्गत कानून का सहारा लेता है तो देश को आहत भावनाओं का गणतंत्र करार दे दिया जाता है। ये सिर्फ वेब सीरीज आदि में ही नहीं दिखता है, फिल्मों में बहुधा इस तरह की बातें दिख जाती हैं। फिल्म ‘पीके’ से लेकर ‘ओ माई गॉड’ तक के संवाद और दृश्य देखे जा सकते हैं।

इसका एक दूसरा पक्ष भी है। जब भी किसी फिल्म में किसी मुस्लिम चरित्र को खलनायक के तौर पर पेश किया जाता है तो उसपर भी आपत्ति शुरू हो जाती है। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि फिल्म ‘पद्मावत’ में खिलजी के चरित्र चित्रण पर भी कई लोगों को आपत्ति हुई थी।  फिल्म में खिलजी के चरित्र चित्रण को इतिहास के मलबे में दबे दुर्गुणों को पेश करने जैसा बता दिया गया था। तब मलिक मुहम्मद जायसी लिखित काव्य पद्मावत की व्याख्या की जाने लगी थी। कई लोगों ने इस बात को भी रेखांकित किया कि फिल्म में हिंदू राजा को अच्छा और मुस्लिम राजा को बर्बर दिखाया गया था। तब दक्षिण एशियाई साहित्य के विदेशी विद्वान थॉमस ड ब्रूइन की पुस्तक ‘रूबी इन द डस्ट’ का सहारा लिया गया था। इस पुस्तक में ब्रूइन ने जायसी की कृति पद्मावत की व्याख्या की है। जब भी किसी फिल्म में मुसलमानों को आक्रांताओं के तौर पर दिखाया जाता है तो ये कथित प्रगतिशील तबका येन केन प्रकारेण उसकी आलोचना में जुट जाते हैं और इधर उधर से तर्क जुटाने की कोशिश करते हैं। इस बात की पैराकारी भी करने लगते हैं कि इतिहास को धर्म के आधार पर व्याख्यायित करना गलत होगा। इसी तरह से जब फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के एक सीन में अंग्रेज सैनिक बछड़े को पकड़कर कर उसका मांस खाने की तैयारी में होते हैं तो रानी लक्ष्मीबाई बछड़े को अंग्रेज सैनिकों के चंगुल से छुड़ाती हैं। वहां रानी लक्ष्मीबाई का एक संवाद है कि ‘जिस धरती पर तुम लोग खड़े हो वहां के लोगों और उनकी भावनाओं का सम्मान करना सीखो।‘ इस दृश्य और संवाद में कुछ गलत नहीं था लेकिन इसको हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया। ये भी याद दिलाने की कोशिश की गई कि रानी लक्ष्मीबाई और आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय अंग्रेजों के खिलाफ उस लड़ाई में साथ थे। इस तरह के ढेरों उदाहरण हैं जहां एक ही तरह की स्थिति में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग अलग मानदंड हैं। एक ही तरह की स्थितियों को देखने के लिए अलग अलग प्रिज्म है। ये एक तरह का बौद्धिक अपराध है जिसके लिए किसी कानूनी सजा का प्रावधान नहीं है इसको तो बौद्धिकता के अखाड़े में ही चुनौती देनी होगी। 


Friday, November 13, 2020

नियमन से सकारात्मक बदलाव की आस


मेरा बचपन गांव में बीता है। अपने गांव में सुना करता था कि मंदिर के पास की जमीन गैर-मजरुआ है। गैर-मजरुआ का शाब्दिक अर्थ भले ही ये होता है कि जो जमीन जोती न जाती हो या कृषि योग्य न हो। लेकिन गांव में रहते हुए ये समझ आया था कि गैर-मजरुआ जमीन वो होती है जिसपर किसी का मालिकाना हक नहीं होता है। इस जमीन का कोई दस्तावेज किसी के पास नहीं होता था। ये गांव की एक ऐसी जमीन होती है जिसके बारे में किसी को नहीं पता वो किसकी है। जो भी ताकतवर होता था वो उस जमीन पर कब्जा कर लेता था या फिर जिस तरीके से मन होता था उसका उपयोग करता था। इस तरह की जमीन को लेकर गांव में बहुधा झगड़ा-झंझट भी होता रहता था। कई बार मेरे गांव के बड़े बुजुर्ग मिल बैठकर ये तय कर देते थे कि इस जमीन का उपयोग सबलोग करेंगे लेकिन ये समझौता ज्यादा दिन चल नहीं पाता था। फिर से उस जमीन को लेकर मनमानी शुरू हो जाती थी। धीरे धीरे उस जमीन के आसपास रहनेवाले लोग भी उसपर अपनी दावेदारी जताने लगते थे। सरकार को मालगुजारी देकर भी गैर-मजरुआ जमीन पर फर्जी तरीके से मालिकाना हक की बात भी हम बचपन में सुनते थे। किसी भी गैर-मजरुआ जमीन को लेकर जब विवाद बढ़ता था तो जिलाधिकारी या उनका प्रतिनिधि इसका भविष्य तय कर देता था।  

पिछले तीन चार साल से ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स को देखकर हमेशा से ये लगता था कि ये गैर-मजरुआ जमीन की तरह है। वैसे तो हमारे देश में 2008-09 में ही ओटीटी प्लेटफॉर्म की शुरुआत हो गई लेकिन 2015 में जब स्टार इंडिया ने हॉटस्टार लांच किया तो पूरे देश का ध्यान इस माध्यम की ओर गया। इसके बारे में इस वजह से भी ज्यादा चर्चा हुई थी क्योंकि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के प्रसारण का अधिकार स्टार इंडिया के पास था । आईपीएल के मैच को हॉटस्टार पर भी देखा जा सकता था। इसके एक साल बाद नेटफ्लिक्स ने भी हमारे देश में अपने प्लेटफॉर्म को लांच किया। अब तो दर्जनों ओटीटी प्लेटफॉर्म देश के दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं। ज्यादातर ओटीटी प्लेटफॉर्म एक तय शुल्क पर ग्राहकों को अपनी सेवा देते हैं लेकिन कुछ मुफ्त भी उपलब्ध हैं। इन प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले कंटेंट को लेकर पिछले तीन-चार साल से देशभर में बहस चल रही है। इस स्तंभ में भी कई बार ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर लिखा जा चुका है। वापस लौटते हैं इन प्लेटफॉर्म और गैर-मजरुआ जमीन की तुलना वाली बात पर। दरअसल ओटीटी प्लेटफॉर्म पर परोसी जानेवाली सामग्री को देखकर यही भान होता था कि इसकी हालत भी गैर-मजरुआ जमीन जैसी है। किसी को पता नहीं था कि इस तरह के प्लेटफॉर्म किस कानून या किस मंत्रालय के अधीन हैं। चूंकि इन प्लेटफॉर्म्स के प्रशासनिक अधिकार को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं थी। इसपर दिखाए जानेवाले कंटेंट को लेकर किसी प्रकार की कोई कानूनी सीमा नहीं है। इसको रेगुलेट करनेवाली कोई संस्था नहीं है लिहाजा यहां लगभग अराजकता जैसा माहौल है। जिसको जो मन हो रहा है वो दिखाया जा रहा है। धर्म और धार्मिक प्रतीकों को किसी खास एजेंडे के तहत व्याख्यायित किया जा रहा है। हिंदू या सनातन धर्म को लेकर इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है जैसे भारत बस हिंदू राष्ट्र बनने ही जा रहा है। 

2018 में नेटफ्लिक्स पर प्रसारित एक सीरीज ‘लैला’ में तो चालीस साल बाद हिंदुओं की काल्पनिक कट्टरता को उभारने के उपक्रम की कहानी दिखाई गई थी। परोक्ष रूप से एक फेक नैरेटिव खड़ा किया गया था। उस वेब सीरीज में भविष्य के भारत की जो तस्वीर दिखाई गई थी उसमें हिन्दुस्तान नहीं होगा, उसकी जगह आर्यावर्त होगा। वहां राष्ट्रपिता बापू नहीं होंगे बल्कि एक आधुनिक सा दिखने वाला शख्स जोशी उस राष्ट्र का भाग्य-विधाता था। आर्यावर्त के लोगों की पहचान उनके हाथ पर लगे चिप से होती थी। लोग एक दूसरे का अभिवादन ‘जय आर्यावर्त’ कहकर करते थे। आर्यावर्त में दूसरे धर्म के लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी।  कुल मिलाकर एक ऐसी तस्वीर रची गई थी जो ये साफ तौर पर बताती थी कि भविष्य का भारत हिंदू राष्ट्र होगा और तमाम कुरीतियां मौजूद होंगी। ‘आर्यावर्त’ में अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी करती है तो उसके पति की हत्या कर लड़की को आर्यावर्त के ‘शुद्धिकरण केंद्र’ ले जाया जाता है। धर्म के अलावा वहां सामाजिक विद्वेष को बढ़ानेवाला जातिगत भेदभाव को पेश किया गया था। इस सीरीज के अलावा कई अन्य वेब सीरीज में खास राजनीति एजेंडे के तहत विचारधारा विशेष को महिमामंडित और दूसरे का निंदाख्यान पेश किया जाता है। किसी में पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर अनर्गल आरोप की शक्ल में उनका चित्रण किया जा रहा है। कहीं जुगुप्साजनक हिंसा और यौनिकता, अप्राकृतिक यौनाचार का फिल्मांकन किया जा रहा है। एक सीरीज में तो खुलेआम यौन प्रसंगों के लंबे लंबे दृश्य बेहद घटिया तरीके से दिखाया गया। संवादों में निम्नतम स्तर की गालियों का उपयोग तो वेबसीरीज की पहचान ही बन गई है। गालियां भी जबरदस्ती ठूंसे हुए प्रतीत होते हैं। जिन भौगोलिक इलाकों की कहानियां होती हैं, उन इलाकों में चाहे उस तरह की गालियों का प्रयोग हो या न हो, इन वेबसीरीज उस तरह की गालियों की भरमार रहती हैं। ओटीटी पर चलनेवाले एक वेबसीरीज में भारतीय वायुसेना और कश्मीर को लेकर भी देशहित के विपरीत कहानियां गढ़ी गई और उसको इन अराजक प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के सामने पेश किया जाता रहा है।

स्थिति चूंकि स्पष्ट नहीं थी कि ये प्लेटफॉर्म किस मंत्रालय के दायरे में आते हैं तो किसी प्रकार की कोई कार्रवाई हो नहीं पाती थी। वेब सीरीज में आपत्तिजनक मामले के खिलाफ अदालतों में कई मुकदमे हुए। मंत्रालयों को अदालती नोटिस गए। उस समय तक स्थिति साफ नहीं थी कि ओटीटी के लिए संचार और सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय जिम्मेदार है या सूचना और प्रसारण मंत्रालय। अब जाकर केंद्र सरकार ने ये तय कर दिया है कि ओटीटी का मामला सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आएगा। अब जबकि ओटीटी नाम के इस गैर-मजरुआ जमीन का मालिकाना हक तय कर दिया गया है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी है कि वो इसके लिए यथोचित नियम कानून बनाए।

पिछले तीन साल से सूचना और प्रसारण मंत्रालय ओटीटी के लिए निमयन बनाने की दिशा में काम भी कर रहा था। ओटीटी प्रदाता कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के कई दौर भी हुए थे। कई प्रस्ताव भी तैयार हुए लेकिन उसपर सहमति नहीं बन पाई थी। इस वर्ष सितंबर में भी 15 बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म ने स्वनियमन का एक प्रस्ताव तैयार किया था। इसमें कंटेंट का वर्गीकरण करने का प्रयास किया गया था लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इसको खारिज कर दिया था। ओटीटी के बारे में नियमन तय करने के पहले यहां पेश किए जानेवाले कंटेंट पर समग्रता में विचार करना चाहिए। कुछ ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जो भारतीय समाज और यहां की संस्कृति को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए। इस बात का ङी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कंटेंट में हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को उसका मूल आधार न बताया जाए। समाज को बांटने वाली बातें न हो, देश की व्यवस्था के खिलाफ जनता के मन में जहर भरने का परोक्ष उपक्रम न हो। परोक्ष रूप से संवाद में इस तरह की बातें न हों जो किसी विचारधारा विशेष का पोषण करती हों। विदेशी सीरीज को भी हमारे देश में जस का तस दिखाए जाने को लेकर विचार किया जाना चाहिए। वैश्विक श्रृंखला के नाम पर नग्नता और जुगुप्साजनक हिंसा को दिखाए जाने की प्रवृत्ति को सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाना चाहिए। इस बात पर भी विचार हो कि क्या हमारा समाज कुछ पश्चिमी देशों की तरह की नग्नता के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए तैयार है। भारतीय सेना को दिखाते समय इस बात का ध्यान रहे कि राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मंच पर उसकी बदनामी न हो और उनके मनोबल पर इसका असर न पड़े। 

कुछ लोग अभी से आशंकित हैं। ओटीटी के आसन्न नियमन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर इसकी आलोचना के संकेत देने लगे हैं। उनको पता होना चाहिए कि हमारे देश में मनोरंजन सेक्टर को लेकर पहली बार नियमन नहीं होगा। उदारीकरण के दौर में जब देश में निजी टीवी चैनलों का आगमन हुआ था तब भी कई मनोरंजन चैनलों पर अंतराष्ट्रीय कंटेंट या प्रोग्राम दिखाने को लेकर देशव्यापी बहस हुई थी। भारतीय संस्कृति को और समाज को ध्यान में रखते हुए उस वक्त की सरकार ने भी 1995 में केबल टेलीविजन नेटवर्क रेगुलेशन एक्ट बनाया था। अंतराष्ट्रीय चैनलों के हमारे देश में प्रसारण के लिए अनुमति देने के पहले डाउनलिंकिंग लाइसेंसिंग की व्यवस्था की गई थी। उन नियमनों के बाद हमारी संस्कृति और समाज की संवेदनाओं को ध्यान में रखकर स्थानीय स्तर पर ही प्रोग्राम बनने लगे। नतीजा यह हुआ कि आज हमारे देश का टीवी उद्योग बेहद समृद्ध है। अगर समाचार पत्र, न्यूज चैनल, मनोरंजन चैनल या सिनेमा के लिए नियमन है तो फिर ओटीटी को लेकर क्यो नहीं। किसी भी तरह का अनुशासन उस क्षेत्र के विकास में ही सहायक होता है। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सामने चुनौती ये है कि ओटीटी को लेकर वो जो नियमन की व्यवस्था बनाए वो इस क्षेत्र को मजबूत करनेवाला हो बाधित करनेवाला नहीं।   

Thursday, July 30, 2020

कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर...

पिछले दिनों दो ऐसी खबरें आईं जिसने ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटऑर्म की बढ़ती लोकप्रियता की ओर इशारा किया। पहली खबर तो ये कि पिछले तीन महीनों में डेढ करोड़ ग्राहकों ने नेटफ्लिक्स का एप डाउनलोड किया। ये इतनी बड़ी संख्या है जिसकी कल्पना नेटफ्लिक्स के कैलिफोर्निया में बैठे कर्ताधर्ताओं ने सपने में भी नहीं की होगी। इस संख्या में उनको व्यापक संभावना नजर आ रही है, बहुत बड़ा बाजार नजर आ रहा है और इसके साथ ही मुनाफे का एक ऐसा फॉर्मूला भी उनके हाथ लग गया है जिसमें जोखिम कम है। अगर हम सिर्फ इस डेढ़ करोड़ की संख्या को ही लें और उसको सबसे कम यानि 199 रु प्रतिमाह की सदस्यता शुल्क के आधार पर देखें तो करीब तीन अरब रुपए प्रतिमाह का कारोबार होता है। ये तो सिर्फ इन तीन महीनों में बने नए ग्राहकों के न्यूनतम सदस्यता शुल्क के आधार पर कारोबार का टर्न ओवर है। अब जरा इसी से जुड़ी दूसरी खबर पर विचार कर लेते हैं। एक और प्लेटफॉर्म है जिसका नाम है एमएक्स प्लेयर। इसपर एक वेब सीरीज है जिसका नाम है मस्तराम। एक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक इस वेब सीरीज को तीन जुलाई को एक दिन में एक करोड़ दस लाख से अधिक दर्शकों ने देखा। इसके मुताबिक इसको अबतक छत्तीस करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। ये वेब सीरीज तमिल, तेलुगू और हिंदी में उपलब्ध है और ये संख्या इन तीन भाषाओं के दर्शकों को मिलाकर है। निर्माता इस वेब सीरीज को भले ही वयस्क की श्रेणी में डालकर पेश कर रहे हों लेकिन ये है अश्लील। मस्तराम के नाम से कुछ वर्षों पूर्व पीली पन्नी में लपेटकर इरोटिक पुस्तकें बेची जाती थीं लेकिन अब ये खेल खुलकर चल रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर न केवल यौनिकता को खुलकर बढ़ावा दिया जा रहा है बल्कि वहां हमारे देश और देश की संस्थाओं के खिलाफ भी बहुधा अमर्यादित टिप्पणियां की जा रही हैं। 
अगप हम देखें तो वेब सीरीज में गाली गलौच और यौनिकता की शुरुआत को विदेशा कंटेंट से हुई लेकिन कुछ भारतीय निर्माताओं ने इसकी भौंडी नकल करनी शुरू कर दी और वो हिंसा और यौनिकता दिखाने में जुट गए। इसके अलावा उनकी जो राजनैतिक विचारधारा है उसका प्रकचीकरण भी उनके द्वारा निर्मित वेब सीरीज में दिखाई देने लगा। अगर विचार करें तो इस तरह को मामलों ने जोर पकड़ा लस्ट स्टोरीज और सेक्रेड गेम्स के बाद । ‘सेक्रेड गेम्स’ 2006 में प्रकाशित विक्रम चंद्रा के इसी नाम के उपन्यास पर बनाया गया धारावाहिक था, जिसको अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाणी ने निर्देशित किया है। भारतीय बाजार में सफलता के लिए कुछ तय फॉर्मूला है जिसपर चलने से कामयाबी मिल जाती है। ये फॉर्मूले हैं धर्म, हिंसा, सेक्स और अनसेंसर्ड सामग्री दिखाना। नेटफ्लिक्स ने ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ में इन फॉर्मूलों का जमकर इस्तेमाल किया।‘लस्ट स्टोरीज’ में भी सेक्स प्रसंगों को भुनाने की मंशा दिखती है। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है। फिल्म, धारावाहिक या साहित्य तो ‘जीवन’ जैसी कोई चीज है ‘जीवन’ तो नहीं है। अगर हम धारावाहिक या फिल्म में ‘जीवन’ को सीधे-सीधे उठाकर रख देते हैं तो यह उचित नहीं होता है। जीवन को जस का तस कैमरे में कैद करना ना तो फिल्म है ना ही धारावाहिक। जिस भी फिल्म में इस तरह का फोटोग्राफिक यथार्थ दिखता है वो कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है।‘सेक्रेड गेम्स’ में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है जिसका लाभ उठाया गया है।
इन वेब सीरीज के माध्यम से दलितों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और राष्ट्रवाद की भ्रामक परिभाषाओं के
आधार पर एक अलग तरह का नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के क्रियाकलापों को कट्टरता से जोड़कर एक अलग ही तरह की तस्वीर पेश करने की कोशिशें भी की गई। इसका उदाहरण वेब सीरीज ‘लैला’ में देखा जा सकता है। ये सीरीज लेखक प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित है। ये हिंदुओं के धर्म और उनकी संस्कृति की कथित भयावहता को दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई है। इस वेब सीरीज का निर्देशन दीपा मेहता ने किया है। भविष्य के भारत को आर्यावर्त बताया गया है। आर्यावर्त के लोगों की पहचान उनके हाथ पर लगे चिप से होगी। यहां दूसरे धर्म के लोगों के लिए जगह नहीं होगी। कुल मिलाकर भविष्य के भारत को हिंदू राष्ट्र की तरह पेश किया गया है। ‘आर्यावर्त’ में अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी कर लेती है तो उसके पति की हत्या कर लड़की को ‘शुद्धिकरण केंद्र’ लाया जाएगा। इस ‘शुद्धिकरण केंद्र’ का भी घिनौना चित्रण किया गया है। धर्म के अलावा इस वेब सीरीज में जातिगत भेदभाव को उभारा गया है ताकि सामाजिक विद्वेष बढ़े। इसमें बेहद शातिर तरीके से हिंदुत्व को बदनाम करने की मंशा दिखती है।
सेक्रेड गेम्स के दूसरे सीजन में निर्माताओं ने एक कदम और बढ़ा दिया। उनको मालूम है कि इस माध्यम पर किसी तरह की कोई बंदिश नहीं है लिहाजा वो सांप्रदायिकता फैलाने से भी नहीं चूके जो परोक्ष रूप से एक राष्ट्र के तौर पर भारत को कमजोर करता है। इसके एक संवाद में जब मुसलमान अभियुक्त से पुलिस पूछताछ के क्रम में कहती है कि उसको यूं ही नहीं उठाकर पूछताछ किया जा रहा है तो अभियुक्त कहता है कि इस देश में मुसलमानों को उठाने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती है। अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि इस सीरीज के निर्माता और निर्देशक इस तरह के संवाद किसी पात्र के माध्यम से सामने रखकर क्या हासिल करना चाहते हैं। इस तरह के कई प्रसंग और संवाद इस सीरीज में है। जो मुसलमानों के मन में देश की व्यवस्था के खिलाफ गुस्से और नफरत के प्रकटीकरण की आड़ में उनको उकसाते हैं। इसी तरह से अभी एक वेब सीरीज आई पाताल लोक, इस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर बेहद ही अगंभीर टिप्पणियां की गईं और परोक्ष रूबप से ये बताने की कोशिश की गई कि भारतीय एजेंसियां मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित रहती हैं। इस वेब सीरीज में साफ तौर पर पुलिस और सीबीआई दोनों को मुसलमानों के प्रति पूर्वग्रह से ग्रसित दिखाया गया। थाने में मौजूद हिंदू पुलिसवालों के बीच की बातचीत में मुसलमानों को लेकर जिस तरह के विशेषणों का उपयोग किया जाता है उससे ये लगता है कि पुलिस फोर्स सांप्रदायिक है। इसी तरह से जब इस वेब सीरीज में न्यूज चैनल के संपादक की हत्या की साजिश की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपी जाती है, और जब सीबीआई इस केस को हल करने का दावा करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है तो वहां तक उसको मुसलमानों के खिलाफ ही दिखाया गया है। मुसलमान हैं तो आईएसआई से जुड़े होंगे, नाम में एम लगा है तो उसका मतलब मुसलमान ही होगा आदि आदि। संवाद में भी इस तरह के वाक्यों का ही प्रयोग किया गया है ताकि इस नेरेटिव को मजबूती मिल सके। और अंत में ऐसा होता ही है कि सीबीआई मुस्लिम संदिग्ध को पाकिस्तान से और आईएसआई से जोड़कर उसे अपराधी साबित कर देती है। कथा इस तरह से चलती है कि जांच में क्या होना है ये पहले से तय है, बस उसको फ्रेम करके जनता के सामने पेश कर देना है। अगर किसी चरित्र को सांप्रदायिक दिखाया जाता तो कोई आपत्ति नहीं होती, आपत्तिजनक होता है पूरे सिस्टम को सांप्रदायिक दिखाना जो समाज को बांटने के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बात यहीं तक नहीं रुकती है, इस वेब सीरीज में तमाम तरह के क्राइम को हिंदू धर्म के प्रतीकों से जोड़कर दिखाया गया है।
ये सब सिर्फ इन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ही नहीं दिखाय जा रहा है बल्कि फिल्मों में भी परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से इस तरह के प्रसंगों को फिल्माया जाता है। अगर हम एक फिल्म मुक्काबाज की बात करें तो उसमें एक जगह एक संवाद है, वो आएंगें भारत माता की जय बोलेंगे और तुम्हारी हत्या करके चले जाएंगे। अब इस संवाद का फिल्म में जहां उपयोग हुआ है उसकी जरूरत बिल्कुल भी नहीं है लेकिन फिर भी निर्देशक को अरनी विचारधारा को आगे बढ़ाना है और भारत माता की जय बोलनेवाले को नीचा दिखाना है लिहाजा वो उसको ठूंस देते हैं। फिल्मों में चूंकि प्रमाणन की व्यवस्था है इसलिए ये दबे छुपे होता है लेकिन होता है। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोई बंधन नहीं है किसी तरह का नियमन नहीं है लिहाजा वहां स्वच्छंदता है। कई बार ये तर्क दिया जाता है कि इन प्लेटफॉर्म पर जानेवाले लोग जानते हैं कि वो क्या करने जा रहे हैं. वो इनकी सदस्यता लेते हैं, शुल्क अदा करते हैं और उसके बाद वेब सीरीज देखते हैं। तो किसी को भी क्या सामग्री देखनी है ये चयन करने का अधिकार तो होना ही चाहिए। ठीक बात है, कि हर किसी को अपनी रुचि की सामग्री देखने का अधिकार होना चाहिए लेकिन उन अपरिपक्व दिमाग वाले किशोरों का क्या जिनके हाथ में बड़ी संख्या में स्मार्टफोन भी है, उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है और इतने पैसे तो हैं कि वो इन ‘ओवर द टॉप’ प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले सके। क्या हम या इन प्लेटफॉर्म पर सामग्री देनेवाली संस्थाएं ये चाहती हैं कि हमारे देश के किशोर मन को अपरिपक्वता की स्थिति से ही इस तरह से मोड दिया जाए कि आगे चलकर इस तररह की सामग्री को देखनेवाला एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग तैयार हो सके। इसके अलावा जो एक और खतरनाक बात यहां दिखाई देती है वो ये कि इन प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह के विदेशी सीरीज भी उपलब्ध हैं जहां पूर्ण नग्नता परोसी जाती है। ऐसी हिंसा दिखाई जाती है जिसमें मानव शरीर को काटकर उसकी अंतड़ियां निकाल कर प्रदर्शित की जाती हैं। जिस कंटेंट को भारतीय सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता है उस तरह के कंटेंट वहां आसानी से उपलब्ध हैं। चूंकि वेब सीरीज के लिए किसी तरह का कोई नियमन नहीं है लिहाजा वहां बहुत स्वतंत्र नग्नता और अपनी राजनीति चमकाने या अपनी राजनीति को पुष्ट करनेवाली विचारधारा को दिखाने का अवसर उपलब्ध है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि सरकार इन वेब सीरीज के नियमन के बारे में जल्द से जल्द विचार करे।  

Saturday, March 14, 2020

फूहड़ संवाद और दृश्यों की फिल्म ‘गिल्टी’


ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर लंबे समय से विमर्श हो रहा है। इंटरनेट के फैलते दायरे को देखते हुए इसपर विमर्श कभी तेज होता है तो कभी वो नेपथ्य में चला जाता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी इस प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले वेब सीरीज और फिल्मों की कथावस्तु से लेकर उसके संवादों और दृश्यों को लेकर नजर बनाए हुए है। मंत्रालय की पहल पर कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है। लेकिन अबतक ये बातचीत के स्तर पर ही है। कोई ठोस फैसला नहीं लिया जा सका है। इस बीच इन प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज के अलावा फिल्में भी आ रही हैं। अभी एक फिल्म आई है नेटफ्लिक्स पर जिसका नाम है ‘गिल्टी’। इस फिल्म को करण जौहर की कंपनी धर्माटिक इंटरटेनमेंट ने पेश किया है। पिछले साल सितंबर में करण जौहर की कंपनी और नेटफ्लिक्स के बीच करार हुआ था। ये कंपनी नेटफ्लिक्स के लिए फिल्मों और वेब सीरीज का निर्माण कर रही है। ‘गिल्टी’ फिल्म के प्रोड्यूसर करण जौहर हैं। इस महीने के शुरुआत में ये फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध हुई। करण जौहर का नाम जुड़ा होने की वजह से इस फिल्म को पर्याप्त प्रचार मिला, दर्शकों के बीच एक उत्सकुकता का माहौल भी बना। करण जौहर पारिवारिक और रोमांटिक फिल्मों के निर्माता के तौर पर जाने जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वो बहुत हद तक साफ सुथरी फिल्में भी बनाते हैं। इस वजह से भी लोगों में एक उत्सुकता थी कि करण की कंपनी जब फिल्म बना रही है तो वो बेहतर फिल्म होगी। इस फिल्म का निर्देशन रुचि नारायण ने किया है जो इसके पहले ‘कल, यस्टरडे एंड टुमारो’ नाम की फिल्म का निर्देशन कर चुकी हैं। हलांकि ये फिल्म कुछ खास अच्छा नहीं कर पाई थी। उनके निर्देशन में ये दूसरी फिल्म है।
हम फिल्म ‘गिल्टी’ की समीक्षा नहीं कर रहे बल्कि इस फिल्म के माध्यम से उस प्रवृत्ति या ट्रेंड की तरफ इशारा करना चाह रहे हैं जिसने वेब सीरीज या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलने वाले कंटेंट को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ओटीटी पर पेश किए जानेवाले कंटेंट को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं है। वहां निर्माता-निर्देशकों को खुलकर कुछ भी दिखाने की छूट है और ये प्लेटफॉर्म इस छूट का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। किसी भी तरह का नियमन नहीं होने की वजह से भरपूर यौनिक दृश्य, जुगुप्साजनक और लंबे यौनिक संवाद, अश्लीलता की सीमा पार करनेवाली गालियां आम बात हो गई है। इसके अलावा इन वेब सीरीज के माध्यम से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश भी कई बार होती है,धर्म को बदनाम करने की कोशिश भी। कुछ वेब सीरीज में तो भारतीय सेना का भी आपत्तिजनक तरीके से चित्रण किया गया है। इस बारे में इस स्तंभ में समय-समय पर लिखा भी गया है। पहले के वेब सीरीज की सामग्रियों को छोड़ भी दें तो अब भी जो पेश किया जा रहा है उसपर भी यथास्थितिवादियों का ध्यान नहीं जा रहा है।
हम ‘गिल्टी’ फिल्म की ही बात करें तो इसमें जिस तरह के दृश्य और संवाद हैं उसपर बहुत ही संजीदगी से ध्यान देने की जरूरत है। इस फिल्म की कहानी मी टू के इर्द गिर्द घूमती है। कॉलेज के छात्रों के बीच एक छात्रा का रेप होता है और फिर सोशल मीडिया और मीडिया पर उठे बवंडर के मध्य कहानी चलती है। कियारा आडवाणी ने बेहतरीन अभिनय करते हुए पात्र को जीवंत कर दिया है। लेकिन एक तरफ वो लड़की बेहतरीन कविताएं लिखती है, फैज अहमद की शायरी सुनती है लेकिन संवाद इतने घटिया हैं कि वो उस जीवंतता पर ग्रहण लगा देते हैं। छात्रों की आपसी बातचीत में इतनी गालियां और घटिया और अश्लील शब्द आते हैं जो निर्देशक या संवाद लेखकों की कुंठा को ही प्रदर्शित करते हैं। संवाद में जितनी गालियां आती हैं वो बिल्कुल ही ठूंसे हुए लगते हैं। यौनिक दृश्यों की बहुतायत भी कॉलेज छात्रों को अपमानित करने जैसा है। क्या ऐसी फिल्में या सीरीज बनानेवाले ये मानते हैं कि देश के युवाओं की भाषा इतनी घटिया है। फिल्म को यथार्थ के करीब ले जाने की कोशिश में निर्देशक इसको यथार्थ से बहुत दूर ले जाती है। इस पूरी फिल्म को देखने के बाद यही लगता है कि फिल्मकारों को छात्र जीवन के बारे में जानकारी नहीं है या किसी तीसरी दुनिया के छात्रों के बारे में बात हो रही है। कम से कम भारतीय समाज में अभी छात्र इतने घटिया स्तर पर संवाद नहीं करते हैं। एक बेहतरीन फिल्म को,कियारा के बेहतरीन अभिनय को संवाद के घटियापन ने सतही और फूहड़ बना कर रख दिया। भारत अभी भी भारत है, इसकी अपनी एक संस्कृति है।   
दरअसल भारत में बनने वाले वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाली फिल्मों को लेकर एक अजीब सी धारणा विकसित होती जा रही है। मानसिक रूप से विपन्न एक निर्माता और निर्देशक ने जिस तरह की शुरुआत की थी वो एक ट्रेंड के तौर पर विकसित हो रहा है। मानसिक रूप से विपन्न और कुंठित उस निर्देशक ने अपने एक वेब सीरीज में मुंबई की दुनिया दिखाने के चक्कर में जिस तरह की भाषा और दृश्य का उपयोग वेब सीरीज में किया था, वो उनके अपने जीवन का प्रतिबंब हो सकता है, समाज का तो कतई नहीं है।ये मानसिक विपन्नता और कुंठा उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों में बहुधा दिखती भी है। वेब सीरीज के निर्माताओं को लगता है कि गालियों के बगैर दर्शक नहीं मिलेंगे। यहीं पर सरकार की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। कुछ लोगों के तर्क हैं कि ओटीटी पर दिखाए जानेवाले इस तरह के कंटेंट में छोटा सा लिखा होता है कि ये अठारह साल से अधिक उम्र के लोगों के देखने के लिए है। लेकिन क्या ये लिख भर देने से किसी माध्यम को अश्लील दृश्य या बर्बरता पूर्ण हिंसा दिखाने की अनुमति मिल जाती है। क्या कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर युवा पीढ़ी के सामने अश्लीलता परोसने की इजात दी जा सकती है। कलात्मक अभिव्यक्ति की भी एक सीमा तो तय करनी चाहिए।
इसके अलावा एक तर्क और दिया जाता है कि इन प्लटफॉर्म पर वही जा सकते हैं जो जाना चाहते हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्में दर्शक सामूहिक रूप से देखते हैं लेकिन ओटीटी पर निजी तौर पर देखते हैं। ये तर्क बचकाना है। लाख आधुनिकता के दावे किए जाएं लेकिन यहां के लोग अब भी पारिवारिक संस्कार या सामाजिक मर्यादा के बंधन में बंधे हैं। ये अमेरिका नहीं है कि जहां लोक-लाज के लिए कोई जगह नहीं है। दरअसल ये ऑनलाइन बाजार पर कब्जा और उससे मुनाफा कमाने की होड़ है। पिछले दिनों कई रिपोर्ट आईं जो यह बताती हैं कि भारत में इंटरनेट का फैलाव बहुत तेज गति से हो रहा है और इंटरनेट पर वीडियो देखनेवालों की संख्या में इजाफा हो रहा है। लोग देर तक इंटरनेट पर वीडियो देखने लगे हैं। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले दो साल में वीडियो कंटेंट देखने के समय में दोगुने से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। दो साल पहले उपभोक्ता दिनभर में ग्यारह मिनट वीडियो देखता था जो अब बढ़कर चौबीस मिनट हो गया है। जैसे जैसे स्मार्ट फोन के उपभोक्ता बढ़ेंगे वैसे वैसे ये समय और बढ़ेगा। एक और अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट ये कहती है कि हमारे देश में अभी प्रति उपभोक्ता औसत करीब 10 जीबी डेटा की खपत है जिसके 2024 तक अठारह जीबी प्रतिमाह प्रति उपभोक्ता होने का अनुमान है। इस तरह से हम देखें तो ये एक बड़े बाजार का आकार ले रहा है। यहां पेश किए जानेवाले वीडियो कटेंट की व्याप्ति बहुत अधिक होनेवाली है। जाहिर सी बात है कि व्याप्ति का सीधा संबंध मुनाफे से है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार इस बारे में शीघ्र कोई फैसला ले। स्वनियम की बात लंबे समय से चल रही है। इसके लिए एक ड्राफ्ट भी तैयार किया जा चुका है लेकिन कई प्लेटफॉर्म इसको मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसी खबरें आई हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्री ने इन प्लेटफॉर्म्स को सौ दिन का समय दिया है ताकि वो किसी प्रकार के नियमन के बारे में अंतिम निर्णय पर पहुंच सकें। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या मुनाफा कमाने के लिए कलात्मक अभिव्यक्ति की आड़ को सरकार स्वीकार करेगी। स्वनियमन को एक प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है लेकिन जिस तरह का ट्रेंड है उसमें ओटीटी कंटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था बनाने की दिशा में ही सरकार को सोचना होगा। आज नहीं तो कल।

Saturday, October 5, 2019

राजनीति का औजार बनते वेब सीरीज


इन दिनों हमारे देश में वेब सीरीज की जमकर चर्चा हो रही है। एक तरफ तो इस प्लेटफॉर्म ने कलाकारों के लिए अभिनय और कमाई का नया क्षितिज खोला है तो दर्शकों के लिए भी एक ऐसी दुनिया सामने आ रही है जहां किसी तरह की कोई बंदिश नहीं है, पाबंदी नहीं है। कल्पना का खुला आकाश है जहां विचरण करने की पूरी छूट है। निर्माताओं और निर्देशकों के लिए मुनाफे का नया द्वार खुला है। कलाकारों, कहानीकारों, फिल्मकारों को काफी पैसे मिल रहे हैं, कई बार तो अभिनेताओं को फिल्म से ज्यादा पैसे वेब सीरीज में काम करने के लिए मिलने की खबरें आती हैं। ऐसी ही एक खबर सैफ अली खान के बारे में आई थी कि उन्होंने ‘सेक्रेड गेम्स’ करने के लिए एक फिल्म के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। कला के क्षेत्र में इसको एक सुखद स्थिति के तौर पर देखा जा सकता है। सुखद इसलिए कि कलाकारों को अपनी कल्पना को पंख लगाने का एक प्लेटफॉर्म मिल रहा है जहां उनकी कल्पना की उड़ान को बाधित करने के लिए किसी सेंसर या प्रमाणन की कानूनी बाध्यता नहीं है। कोई सिनेमेटोग्राफी एक्ट उनपर लागू नहीं होता है। लेकिन कई बार ये देखा गया है कि पाबंदी या बंदिश या पाबंदी के कानून आदि की अनुपस्थिति में स्थितियां अराजक हो जाती हैं। इन दिनों जिस तरह के वेब सीरीज आ रहे हैं उसमें कई बार कलात्मक आजादी या रचनात्मक स्वतंत्रता की आड़ में सामाजिक मर्यादा की लक्ष्मण रेखा ना केवल लांघी जाती है बल्कि इस रेखा को मिटाकर नई रेखा खींचने की एक कोशिश भी दिखाई देती है। इस बात पर बहस हो सकती है कि कलाकारों की स्वतंत्रता या उनकी कल्पनाशीलता को किस हद तक छूट दी जा सकती है। रचनात्मक आजादी पर जितनी बहस आवश्यक है उतनी ही व्यापक बहस इस बात पर भी होनी चाहिए कि इस आजादी की सीमा क्या हो। हमारे देश की अदालतों ने कई बार इसको परिभाषित भी किया है, चाहे वो एम एफ हुसैन का केस हो या तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन का केस या फिर एक पुस्तक में गांधी के बारे में लिखी गई भाषा का केस हो।
दो हजार चार में एम एफ हुसैन से संबंधित एक केस में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जे डी कपूर ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उस फैसले में साफ तौर पर ये कहा गया था कि ‘अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है। कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को अलग अलग तरीकों से अभिव्यक्त कर सकता है। इन मनोभावों को अभिव्यक्ति की किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। लेकिन कोई भी इस बात को भुला नहीं सकता है कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होगी। अगर किसी को अभिव्यक्ति का असमीमित अधिकार मिला है तो उससे ये अपेक्षा की जाती है कि वो इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी-देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हें अपमानित करने के लिए करे।‘ यही बात इन वेब सीरीज पर भी लागू होती है। उन्हें कलात्मक आजादी के नाम पर असीमित अधिकार मिला है तो उनसे अपेक्षा भी अधिक है कि वो कलात्मक आजादी के नाम पर अराजक ना हो जाएं। हमारे देश में जब वेबसीरीज का जोर बढ़ने लगा तो इसपर भी बहस तेज होने लगी।  अगर सूक्ष्मता से इसके कंटेंट को देखें या इनके संवाद पर नजर डालें तो कई बार बेहद आपत्तिजनक बातें सामने आती हैं।
हाल ही में अमेजन के प्राइम वीडियो प्लेटफॉर्म पर एक वेब सीरीज आई जिसका नाम है ‘द फैमिली मैन’ । ये वेब सीरीज यहां चार भाषाओं में उपलब्ध है। मनोज वाजपेयी इस सीरीज में मुख्य भूमिका में हैं। इस सीरीज को अगर कला की कसौटी पर भी कसें तो कमजोर नजर आती है। बहुत लंबा और उबाऊ। ये अलग विषय है। जिस चीज पर चर्चा होनी चाहिए वो ये है कि इस सीरीज में साफ तौर पर आतंकवाद को जस्टिफाई करने की कोशिश दिखाई देती है। 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगा हुआ, उसमें एक परिवार के कई लोग मारे गए। उसकी प्रतिक्रिया में या उसका बदला लेने के लिए एक मुस्लिम युवक आतंकवादी बन जाता है। हमेशा प्रतिक्रियास्वरूप मुस्लिम युवक को ही क्यों आतंकवादी बनते दिखाया जाता है? दरअसल आतंकवादी बनना एक मानसिकता है उसको धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए लेकिन ये एक चलन चल गया है कि मुस्लिमों पर अत्याचार होगा तो वो आतंकवादी बनेगा और हिंदुओं पर अत्याचार होगा तो वो अपराधी बन जाएगा। अब यह भी एक तरह की मानसिक सांप्रदायिकता है। नेटफ्लिक्स पर ‘सेक्रेड गेम्स सीजन टू’ में एक अपराधी पुलिसवाले को कहता है कि ‘इस देश में मुसलमानों को पकड़ने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती।‘ ‘द फैमिली मैन’ में भी उसी तरह का एक संवाद है जहां एक पात्र कहता है कि ‘मुसलमान हूं इसलिए उठा लाए हो ना।‘ अब ये क्या है? ये कौन सी कलात्मक स्वतंत्रता के दायरे में आता है। क्या ये समाज को बांटनेवाला नहीं है? संवादों के जरिए एक समुदाय विशेष के मन में भारतीय व्यवस्था के खिलाफ जहर नहीं भरा जा रहा है। इस तरह के दर्जनों उदाहरण इन वेब सीरीज को खंगालने पर आपको मिल सकते हैं, जहां व्यवस्था के खिलाफ परोक्ष रूप से एक समुदाय विशेष को भड़काया जा रहा है। इसी तरह से कश्मीर के हालात को लेकर राजनीतिक टिप्पणियां हैं। राजनीतिक टिप्पणियों से किसी को कोई आपत्ति नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए, लेकिन जब वो टिप्पणियां किसी राजनीति का या एजेंडा का हिस्सा हो जाती हैं तो उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है।
‘द फैमिली मैन’ में एक और दिलचस्प प्रसंग है। आतंकवादी के बारे में सूचना देनेवाले तो दस लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा है। एक व्यक्ति जानकारी लेकर आता है और अफसर से पूछता है दस लाख दोगे ना? वो कहता है सरकार का फैसला है, जरूर मिलेगा। जानकारी लेकर आया व्यक्ति क्या कहता है जरा सुनिए, ‘पंद्रह लाख देने का भी तो वादा था, वो तो मिला नहीं, उसी चक्कर में मैंने बैंक में खाता भी खुलवा लिया।‘ राजनीतिक फैसलों की आलोचना का, उसका मजाक उड़ाने का अधिकार सबको है लेकिन आतंकवादी के बारे में सूचना देनेवाले को इनाम की घोषणा और एक राजनैतिक रैली में दिए गए बयान को एक साथ रखकर क्या कहना चाहते हैं? इससे वेब सीरीज के निर्माताओं की सोच का पता चलता है। हमारे देश में एक से बढ़कर एक राजनीतिक व्यंग्य लिखे गए लेकिन किसी में इस तरह की तुलना की गई हो, ध्यान नहीं पड़ता।
पहले हिंदू धर्म की कुरीतियों में काल्पनिकता की छौंक लगाकर उसको मुख्य आधार बनाकर पेश करना, फिर समाज को बांटने की बात करना, देश की व्यवस्था के खिलाफ मन में जहर भरना और अब परोक्ष रूप से राजनीतिक टिप्पणियों से मौजूदा सरकार के खिलाफ जनता के मन में अविश्वास पैदा करना ये वो कारक हैं जिसके आधार पर वेब सीरीज को नियमन के दायरे में लाने का आधार तैयार होता है। इसके अलावा हॉट स्टार जैसे प्लेटफॉर्म पर ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ जैसा सीरीज चला उसकी ओर भी ध्यान जाना चाहिए। जिस तरह से वैश्विक श्रृंखला के नाम पर नग्नता और जुगुप्साजनक हिंसा को दिखाया गया उसपर भी सख्ती से विचार किया जाना चाहिए। विचार तो इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि क्या हमारा समाज अभी इस तरह की नग्नता के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए तैयार है। इसके पक्ष में ये तर्क दिया जाता है कि ये फिल्मों से अलग हटकर है और निजी तौर पर देखा जाता है लेकिन क्या इन प्लेटफॉर्म पर कोई इस तरह की व्यवस्था है कि वो देखनेवाले से उनकी पसंद पूछे। उनकी उम्र पूछे। एक बार जिसने सब्सक्रिप्शन ले लिया वो देख सकता है। वेब सीरीज के कोने में छोटा सा अठारह प्लस और हिंसा और भाषा की चेतावनी देकर भयंकर खूनखराबा दिखाना, हर वाक्य में गाली-गलौच और यौनिक दृश्यों का प्रदर्शन उचित प्रतीत नहीं होता। इन सबके पक्ष में ये तर्क दिया जाता है कि ये सीरीज फलां पुस्तक पर आधारित है और उसमें वैसा है इस वजह से वैसा दिखाया गया है। या बातचीत में भी तो गाली का उपयोग होता है आदि आदि। इन फिल्मकारों को ये समझाना होगा कि जीवन को जस का तस उठाकर फिल्मों में नहीं रखा जा सकता है, जीवन जैसा कुछ दिखा सकते हैं। सरकार को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए और अगर स्व-नियमन से बात नहीं बन रही है तो सभी के साथ मिल बैठकर इसको किसी संवैधानिक नियमन के दायरे में लाने पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। अन्यथा कलात्मक आजादी के नाम पर अराजकता बढ़ती जाएगी।  

Sunday, September 8, 2019

वेब सीरीज के नियमन पर हो मंथन


पिछले दिनों इस तरह की खबरें आई कि सरकार वेब सीरीज पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विचार विमर्श शुरू करने जा रही है । खबरों के मुताबिक सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि वेब सीरीज पर जो कुछ भी दिखाया जा रहा है उसको लेकर इस महीने से मंथन शुरू हो रहा है। पिछले दिनों सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड और फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से मिले थे। उस बैठक में मंत्री ने भी इस बात की ओर इशारा किया था कि सरकार जल्द ही वेब पर दिखाई जानेवाली सीरीज और उसके कंटेंट को लेकर उससे जुड़े सभी लोगों से बातचीत करनेवाली है। दरअसल पिछले दिनों कई वेब सीरीज ऐसी आईं जिनमें भयानक हिंसा और अश्लील दृश्यों की भरमार दिखाई देती है। कहानी की मांग से इतर कई निर्माताओं ने जबरदस्ती हिंसा और यौनिक दृष्यों को पेश किया। माना गया कि ये सब लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दिखाया गया। जब इस, तरह के कंटेंट की बहुतायत होने लगी तो उसपर लेख आदि लिखे जाने लगे। इस स्तंभ में भी कई बार इस ओर इशारा किया गया। अभी पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर एक वेब सीरीज का दूसरा सीजन दिखाया गया था। इस सीरीज का नाम है सेक्रेड गेम्स। इसमें कई संवाद ऐसे हैं जो साफ तौर पर इसके निर्देशक की सोच को दर्शाते हैं और समाज को बांटने जैसा है। जैसे एक जगह जब एक मुसलमान अभियुक्त से पुलिस पूछताछ के क्रम में कहती है कि उसको यूं ही नहीं उठाकर पूछताछ किया जा रहा है तो अभियुक्त कहता है कि इस देश में मुसलमानों को उठाने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती है। अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि इस सीरीजज क निर्माता और निर्देशक इस तरह के संवाद किसी पात्र के माध्यम से सामने रखकर क्या हासिल करना चाहते हैं। इस तरह के कई प्रसंग और संवाद इस सीरीज में है। इसके पहले सीजन में भी इस तरह के अनेक दृश्य और संवाद दिखाए गए थे। मुसलमानों के मन में देश की व्यवस्था के खिलाफ एक खास किस्म के गुस्से और नफरत का प्रकटीकरण नियमित तौर पर होता रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब इसी तरह की एक वेब सीरीज आई थी ‘लैला’। इस पूरी सीरीज में हिंदू धर्म को लेकर जो भयावह तस्वीर पेश की गई थी। जिस तरह से हिंदू लड़कियों के मुसलमान लड़के से शादी करने के परिणामों की बेहद आऐपत्तिजनक तस्वीर पेश की गई थी वो निश्चित तौर पर समाज को बांटनेवाले या एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय के मन में शंका के बीज बोने जैसा था। मुस्लिम लड़कों से शादी करनेवाली हिंदू लड़कियों के शुद्धिकरण को लेकर जिस तरह के संवाद और दृश्य पेश किए गए थे, उसको देखने के बाद स्वाभाविक तौर पर मन में यह प्रश्न उठते हैं कि इसके पीछे का एजेंडा क्या है। इसके पीछे एक खास तरह की विचारधारा का पोषण और एक दूसरी विचारधारा को पुष्ट करने की मंशा को रेखांकित किया जा सकता है। इस तरह की एजेंडा सीरीज की पहचान इसके निर्देशकों के नाम और उनके पूर्व के काम को देखकर साफ तौर पर किया जा सकता है।
इसी तरह से अगर हम देखें तो कई सीरीज में देश को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बदनाम करने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं। एक सीरीज में तो यहां तक दिखा दिया गया है कि कश्मीर में भारतीय वायुसेना के विमान स्कूल पर बम गिराकर छात्रों को मार डालते हैं। ये कैसी क्लपनाशीलता है जिसमें एक देश की सेना को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। एक और सीरीज में कश्मीर की जेल का चित्रण है जिसमें ये दिखाया जाता है कि वहां का जेलर एक पाकिस्तानी लड़की का जेल में ही रेप करता है। निर्माताओं को ये मालूम होना चाहिए कि भारतीय जेल में महिला कैदियों के साथ किसी तरह की यौनिक हिंसा करना कितना मुश्किल है। इस तरह के केंटेंट हमारे देश की संस्थाओं को ना केवल बदनाम करते हैं बल्कि उनके खिलाफ जनता के मन में नफरत और जहर भी भरते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर इस तरह की छूट दी जानी चाहिए, इसपर विचार करना आवश्यक है।
समाज में नफरत के बीज बोने के अलावा ‘सेक्रेड गेम्स’ में जिस तरह के अश्लील दृश्य और अप्राकृतिक यौनाचार दिखाई गए थे या दिखाए जा रहे हैं, उस तरह के दृश्यों के लिए क्या हमारा समाज तैयार है, इसपर भी गहरे मंथन और विचार विमर्श की जरूरत है। इसी तरह से ‘लस्ट स्टोरीज’ में जिस तरह के यौन प्रसंगों को उभारा गया था उसको भी कलात्मक अभिव्यक्ति की श्रेणी में डालकर प्रश्न नहीं पूछना अनुचित होगा। क्या हमारा समाज पश्चिमी देशों की तरह इस बात के लिए तैयार है कि टॉपलेस नायिकाओं और रति प्रसंगों का सार्वजनिक प्रदर्शन हो। कई वेब प्लेटऑर्म तो ऐसे हैं जो अपने को ‘हॉट और वाइल्ड एंड लस्टफुल’ कहकर प्रचारित भी करते हैं। सरकार को इसके नियमन के बारे में भी विचार करना चाहिए, क्योंकि फिल्मों और वेब सीरीज के लिए दोहरे मानदंड उचित नहीं है। फिल्मों में गाली हो तो उसको बीप करना होता है, बेव सीरीज पर गालियों की भरमार, फिल्मों में लंबे चुंबन दृष्यों पर कैंची और वेब सीरीज में रति प्रसंगों को फिल्माने की छूट। फिल्मों में विकृत हिंसा के दृष्यों को संपादित करने का नियम तो बेव सीरीज में हिंसा के जुगुप्साजनक दृष्यों की भरमार। अश्लील दृश्यों की भरमार वाले सीरीज दिखानेवाले ये तर्क देते हैं कि इंटरनेट पर तो कितने ही पोर्न साइट हैं जहां इस तरह की सामग्री मौजूद है तो जिनको इस तरह के दृष्य देखने होंगे वो वहां बहुत आसानी से देख सकते हैं। लेकिन इस तरह के तर्क देनेवालों को यह सोचना चाहिए कि इंटरनेट पर मौजूद पोर्न सामग्री और इस तरह के वैध प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध पोर्न को देखने में फर्क है। यहां कहानी की शक्ल में इसको पेश किया जाता है। दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि इन प्लेटफॉर्म पर जानेवाले लोग जानते हैं कि वो क्या करने जा रहे हैं. वो इनकी सदस्यता लेते हैं, शुल्क अदा करते हैं और उसके बाद वेब सीरीज देखते हैं। तो किसी को भी क्या सामग्री देखनी है ये चयन करने का अधिकार तो होना ही चाहिए। ठीक बात है कि हर किसी को अपनी रुचि की सामग्री देखने का अधिकार होना चाहिए लेकिन उन अपरिपक्व दिमाग वाले किशोरों का क्या जिनके हाथ में बड़ी संख्या में स्मार्टफोन भी है, उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है और इतने पैसे तो हैं कि वो इन ‘ओवर द टॉप’ प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले सके। क्या हम या इन प्लेटफॉर्म पर सामग्री देनेवाली संस्थाएं ये चाहती हैं कि हमारे देश के किशोर मन को अपरिपक्वता की स्थिति से ही इस तरह से मोड दिया जाए कि आगे चलकर इस तररह की सामग्री को देखनेवाला एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग तैयार हो सके। इसके अलावा जो एक और खतरनाक बात यहां दिखाई देती है वो ये कि इन प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह के विदेशी सीरीज भी उपलब्ध हैं जहां पूर्ण नग्नता परोसी जाती है। ऐसी हिंसा दिखाई जाती है जिसमें मानव शरीर को काटकर उसकी अंतड़ियां निकाल कर प्रदर्शित की जाती हैं। जिस कंटेंट को भारतीय सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता है उस तरह के कंटेंट वहां आसानी से उपलब्ध हैं। चूंकि वेब सीरीज के लिए किसी तरह का कोई नियमन नहीं है लिहाजा वहां बहुत स्वतंत्र नग्नता और अपनी राजनीति चमकाने या अपनी राजनीति को पुष्ट करनेवाली विचारधारा को दिखाने का अवसर उपलब्ध है। इस तरह की सामग्री को जब लगातार दिखाया जाता है तो कहीं न कहीं से इसके निमयन को लेकर बात शुरू होती है।
फिछले दिनों इस तरह की वेब सीरीज दिखानेवाले कई प्लेटफॉर्म्स ने स्व नियमन करने की कोशिश की लेकिन सभी के बीच सहमति नहीं बन पाने से यह बहुत प्रभानी नहीं हो पाया है। किसी भी कंटेंट पर सेंसरशिप अंतिम कदम होना चाहिए उसके पहले सभी तरह के विकल्पों पर विचार करना होगा। क्या इस तरह की कोई ऐसी स्वयत्त संस्था बन सकती है जो इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाले कंटेंट की शिकायत मिलने पर विचार करे और उसपर फैसला ले लेकिन इस संस्था को इतना अधिकार होना चाहिए कि उसके फैसले का सम्मान हो और उसको लागू करवाने के लिए उसके पास वैध अधिकार हों। अगर इस दिशा में कुछ नहीं किया गया तो इंटरनेट की इस दुनिया में अराजकता और बढ़ेगी और फिर उसको काबू करने के लिए बेहद कठोर कदम उठाने होंगे जो बेवजह विवाद को जन्म दे सकते हैं।

Saturday, July 14, 2018

'सेक्रेड गेम्स' पर शांति का षडयंत्र


इन दिनों भारतीय वेब-टेलीविजन सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ की चारों ओर चर्चा हो रही है, देश-विदेश के अखबारों में इस क्राइम थ्रिलर पर लेख लिखे जा रहे हैं, इसकी समीक्षा हो रही है। सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर बहुत चर्चा हो रही है। इस सीरीज में राजीव गांधी को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद भी हो गया है। मामला कोर्ट तक जा पहुंचा है। असहिष्णुता का शोर मचानेवाले लोग खामोश हैं। हाथों में प्लाकार्ड थामे अभिनेत्रियों के बयान नहीं आ रहे हैं। देश छोड़ने की बात करनेवाले भी शांत हैं।अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बुक्का फाड़कर चिल्लानेवाले लोग खामोश हो गए हैं। इन सारे लोगों भी सवाल उठाए जा सकते हैं और पूछा जा सकता है कि शांति का षडयंत्र क्यों?  ‘सेक्रेड गेम्स’ नाम के इस सीरीज के निर्देशक अनुराग कश्यप ने 2016 में अपने एक फेसबुक पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ये अपेक्षा की थी कि वो धौंस देनेवाले अपने समर्थकों पर लगाम लगाएं। वो अनुराग कश्यप भी खामोश हैं जबकि कांग्रेस पार्टी के लोग ‘सेक्रेड गेम्स’ को लेकर हमलावर हो रहे हैं। उनकी राहुल गांधी से अपेक्षा करते हुए कोई फेसबुक पोस्ट या ट्वीट दिखाई नहीं दे रही है। अगर मुक्तिबोध की कविता पंक्ति उधार लेकर कहें तो कह सकते हैं कि ‘सब सरदार हैं खामोश’, क्योंकि मामला अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चुनिंदा अवसरवाद का है। किसी लेखक संगठन ने राजीव गांधी को लेकर ‘सेक्रेड गेम्स’ पर पाबंदी लागने के लिए कोर्ट जाने पर कांग्रेस के नेता को कठघरे में खड़ा नहीं किया। किसी ने इस बाबत राहुल गांधी से भी प्रश्न नहीं पूछा। अगर यही काम किसी बीजेपी के छोटे से नेता ने भी किया होता तो अवॉर्ड वापसी ब्रिगेड से लेकर असहिष्णुता की बात करनेवाले लोग बिलबिलाकर प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा कर चुके होते और उनसे इस मसले पर हस्तक्षेप की अपेक्षा भी करते। कई अवसरों पर इस तरह की चुनिंदा प्रतिक्रिया देखने को मिली है। खैर ये अलहदा मुद्दा है और इस पर विस्तार से कभी और चर्चा।  
फिलहाल हम बात कर रह हैं नेटफ्लिक्स पर आठ एपिसोड में प्रसारित इस धारावाहिक ‘सेक्रेड गेम्स’ की। दरअसल ये 2006 में प्रकाशित विक्रम चंद्रा के इसी नाम के उपन्यास पर बनाया गया धारावाहिक है जिसको अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाणी ने निर्देशित किया है। नेटफ्लिक्स ने भारतीय बाजार में मजबूती हासिल करने के लिए स्थानीय कटेंट को बढ़ावा देने का फैसला किया है। इसी के तहत पहले ‘लस्ट स्टोरीज’ और अब ‘सेक्रेड गेम्स’ को प्रस्तुत किया गया है। भारतीय बाजार में सफलता के लिए कुछ तय फॉर्मूला है जिसपर चलने से कामयाबी मिल ही जाती है। ये फॉर्मूले हैं धर्म, हिंसा, सेक्स और अनसेंसर्ड सामग्री दिखाना। नेटफ्लिक्स ने ‘लस्ट स्टोरीज’ में भी और अब ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी इन फॉर्मूलों का जमकर इस्तेमाल किया है। ‘लस्ट स्टोरीज’ के अलग अलग एपिसोड को अलग-अलग निर्देशकों ने डायरेक्ट किया था। इन निर्देशकों में भी अनुराग कश्यप थे और उनके अलावा जोया अख्तर, दिवाकर बनर्जी और करण जौहर थे। ‘लस्ट स्टोरीज’ में भी सेक्स प्रसंगों को भुनाने की मंशा दिखती है। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है, आठ एपिसोड में जमकर गाली गलौच है। गाली गलौच के बचाव में ये तर्क दिया जा रहा है कि मुंबई के जिस भौगोलिक इलाके और परिवेश की कहानी है उसमें हर शब्द के आगे और पीछे गाली होती है। अब सवाल यही उठता है कि जीवन और फिल्म या धारावाहिक या साहित्य में क्या फर्क है। फिल्म, धारावाहिक या साहित्य तो ‘जीवन’ जैसी कोई चीज है ‘जीवन’ तो नहीं है। अगर हम धारावाहिक या फिल्म में ‘जीवन’ को सीधे-सीधे उठाकर रख देते हैं तो यह उचित नहीं होता है। जीवन को जस का तस कैमरे में कैद करना ना तो फिल्म है ना ही धारावाहिक। जिस भी फिल्म में इस तरह का फोटोग्राफिक यथार्थ दिखता है वो कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है। अनुराग कश्यप बहुधा इस दोष के शिकार होते नजर आते हैं, यहां भी हुए हैं।
इसके अलावा ‘सेक्रेड गेम्स’ में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है जिसका लाभ उठाया गया है। लगभग हर एपिसोड में इस तरह से दृश्य हैं और ये सबसे सस्ता तरीका है दर्शकों को अपनी ओर खींचने का। नवाजुद्दीन सिद्दिकि ने गैंगस्टर गायतोंडे की भूमिका निभाई है लेकिन उसके चरित्र का चित्रण लगभग सेक्स मैनियाक की तरह किया गया है। यह वही गायतोंडे है जो अपनी मां के विवाहेत्तर सेक्स संबंध को जानने के बाद इतना उत्तेजित हो जाता है कि बचपन में ही मां के प्रेमी की हत्या कर घर से भाग जाता है। आठ एपिसोड के इस धारावाहिक में धर्म का तड़का भी लगाया गया है। धर्म-राजनीति-पुलिस-माफिया का गठजोड़ तो दिखता ही है, देश के खिलाफ एक बड़ी साजिश भी है।
अगर हम नेटफ्लिक्स के इस तरह के कंटेंट की तरफ बढ़ने की वजह तलाशते हैं तो इसके कारोबारी पक्ष को देखना होगा। सक्रिय मासिक उपभोक्ता के आधार पर नेटफ्लिक्स हमारे देश का एक बड़ा और लोकप्रिय वीडियो एप है। एक सर्वे के मुताबिक इस एप पर उभोक्ताओं द्वारा बितानेवाले समय को आधार मानते हैं तो नेटफ्लिक्स सातवें स्थान पर है और डाउनलोड को आधार बनाते हैं तो वो चौदहवें स्थान पर चला जाता है। भारतीय वीडियो बाजार में नेटफ्लिक्स का मुकाबला अमेजन प्राइम वीडियो और हॉटस्टार से है। ये दोनों प्लेटफॉर्म वीडियो के साथ साथ कुछ अतिरिक्त भी ऑफर करते हैं। अमेजन प्राइम वीडियो के उपभोक्ताओं को उसके ई-कामर्स प्लेटफॉर्म पर सहूलियतें मिलती हैं तो हॉटस्टार पर आईपीएल देखने को मिलता है। इस बीच जियो ने भी अपने आप को इस बाजार में मजबूत किया है। सक्रिय मासिक उपभोक्ताओं की संख्या के आधार पर जियो टीवी तीसरे नंबर पर है, यूट्यूब और हॉटस्टार के बाद। ऐसे में नेटफ्लिक्स ‘सेक्रेड गेम्स’ के जरिए भारतीय बाजार में खुद को मजबूत करने की कोशिशों में जुटा है। जिस तरह से इंटरनेट पर इस प्रोग्राम को प्रमोट किया गया है या महानगरों में होर्डिंग आदि लगे हैं उससे साफ है कि नेटफ्लिक्स की मंशा क्या है। नेटफ्लिक्स के एक अधिकारी ने कहा भी है कि स्थानीय कटेंट के अलावा तकनीकी दिक्कतों को दूर करना उनकी प्राथमिकता है। कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी के बावजूद नेटफ्लिक्स पर अबाधित वीडियो देखा जा सकता है।
‘सेक्रेड गेम्स’ में अनुराग कश्यप अपनी विचारधारा के साथ उपस्थित हैं, कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से। इस एपिसोड में यह दिखाया गया है कि कैसे एक निर्दोष मुस्लिम लड़को का पुलिस एनकाउंटर कर देती है। और परोक्ष रूप से राजनीतिक स्टेटमेंट तब देते हैं जब उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा होता है और उसकी कोई सुध लेनवाला नहीं होता है। सिस्टम को निशाने पर तो लेते हैं लेकिन उसके पीछे की मंशा कुछ और होती है। एक एपिसोड में तो बाबारी विध्वंस के फुटेज को लंबे समय तक दिखाया जाता है और फिर बैकग्राउंड से उसपर राजनीतिक टिप्पणी आती है। इसी तरह से मुंबई बम धमाकों के फुटेज को दिखाकर बैंकग्राउंड से टिप्पणियां आती हैं जो सीरियल निर्माता की सोच को उजागर करती है। इससके अलावा भी अनुराग कश्यप को जहां मौका मिलता है वो राजनीतिक टिप्पणी करने और मौजूदा सरकार और उसकी विचारधारा को कठघरे में खड़ा करने में नहीं चूकते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वैचारिक आग्रहों का प्रतिपादन उचित है लेकिन फिक्शन के नाम पर जब ये किया जाए तो उसका रेखांकन भी करना जरूरी है। ‘सेक्रेड गेम्स’ में जिस तरह से लंबे लंबे सेक्स प्रसंगों या टॉपलेस नायिका को दिखाया गया है उसपर भी ध्यान देने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर क्या अश्लीलता या पोर्न परोसने की छूट दी जा सकती है? अपनी कुंठा के सार्वजनिक प्रदर्शन किस हद तक किया जा सकता है?  इसपर विचार करने की जरूरत है। यह तर्क दिया जा सकता है कि जो भी इस तरह के प्लेटफॉर्म पर जाते हैं उनको मालूम होता है कि वहां किस तरह की सामग्री मिल सकती है। बावजूद इसके हमारे सामाजिक मार्यादा या लोकाचार का ध्यान तो रखना ही चाहिए। लोकप्रियता हासिल करने के लिए परोसी जानेवाली अश्लीलता पर विचार होना चाहिए। बेहतर तो यही होता कि फिल्मकार आत्म नियंत्रण करते और कलात्मकता के नाम पर अश्लीलता परोसने से बचते। इसका एक फायदा यह भी होता कि सरकारी हस्तक्षेप का अवसर नहीं मिल पाता।