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Saturday, May 2, 2026

स्तरीय शोध-प्रकाशन को कैसे लगे पंख


कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में आयोजित अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला (फिलबो) में अलग अलग मंडप में देश-विदेश के प्रकाशकों ने अपने स्टाल लगाया था। फिलबो में एक मंडप में कोलंबिया के विभिन्न शहरों में स्थित सरकारी और निजी विश्वविद्यालय के करीब 75 स्टाल लगे थे। अलग-अलग विश्वविद्यालय के स्टाल और वहां उस विश्वविद्लय के प्रकाशनों को प्रदर्शित किया गया था। सभी विश्वविद्यालयों की अपनी पत्रिकाएं थीं, पुस्तकें थीं। उन स्टालों पर घूमते हुए ये महसूस हुआ कि कोलंबिया के निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों के अपने-अपने नियमित प्रकाशन हैं जो साहित्य, कला, संगीत से लेकर इतिहास और विज्ञान की पुस्तकों का नियमित प्रकाशन करते हैं। अधिकतर पुस्तकें स्पैनिश भाषा में थीं। मंडप में दो तीन घंटे बिताकर विश्वविद्यालय के प्रकाशनों को देखकर जब बाहर निकला तो मन में प्रश्न उठ रहा था कि भारत के विश्वविद्यालयों में इस तरह के प्रकाशन क्यों नहीं होते हैं। अपने यहां के विश्वविद्यालयों से कोई स्तरीय पत्रिका क्यों नहीं निकलती है। विश्वविद्यालयों में होनेवाले दर्जनों शोध प्रबंधों में से चुनिंदा शोध के प्रकाशन की व्यवस्था क्यों नहीं है। हम अपने देश के राज्य विश्वविद्यालयों को छोड़ भी दें तो जो चार दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं वहां से भी कोई स्तरीय शोध पत्रिका नहीं निकलती है। संभव है कि इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से कुछ विश्वविद्यालय या उनके विभाग पत्रिकाएं निकालते हों, लेकिन उन पत्रिकाओं की प्रतिष्ठा नहीं है और उनकी पहुंच अकादमिक जगत से बाहर होती नहीं है। जिन कुछ विश्वविद्यालय से पत्रिकाएं निकलती हैं वो स्तरीय नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने बताया कि सागर स्थित डा हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय से मध्य भारती नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन होता है लेकिन स्तरीयता का अभाव है। 

देश की राजधानी दिल्ली में भी कई केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। हर वर्ष यहां से सैकड़ों छात्र अलग अलग विषयों पर शोध करते हैं। इन विश्वविद्यालयों से उत्कृष्ट शोध को प्रकाशित करने की जानकारी नहीं मिल पाती है। कोलंबिया पुस्तक मेला में ये पता चला कि वहां के विश्वविद्यालय प्रकाशन करते हैं या फिर निजी प्रकाशकों से करार करके बेहतर पुस्तकों का प्रकाशन करवाते हैं। निजी प्रकाशकों को विश्वविद्यालय के शिक्षकों के स्तर से पुस्तकें तैयार करवाकर प्रकाशकों को दी जाती हैं ताकि स्तरीयता बरकरार रह सके। वर्धा में जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल की स्थापना हुई थी और अशोक वाजपेयी उसके पहले कुलपति बने थे, तब इस तरह के कुछ प्रयास हुए थे। विश्वविद्यालय ने बहुवचन, पुस्तक वार्ता और अंग्रेजी में हिंदी नाम की एक पत्रिका निकाली थी। कुछ पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ था। पर अशोक वाजपेयी की अपनी सीमाएं हैं और ये सीमाएं बेहतर करने में बाधक होती रही हैं। विभूति नारायण राय के समय पत्रिकाएं ठीक निकलीं। वर्धा शब्दकोश का भी प्रकाशन हुआ लेकिन शब्दकोश अपडेट नहीं हो पाया। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय की पत्रिकाएं अनियमित हो गईं, संयुक्तांक निकलने लगे। जो पत्रिकाएं निकलीं उनको ही पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया गया। स्तरीयता का भी ध्यान नहीं रहा। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की गई थी कि वहां से कुछ स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन होगा। पुस्तकों का प्रकाशन हुआ भी लेकिन संपादित लेखों से आगे जाकर कोई उल्लेखनीय पुस्तक नहीं आई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आए पांच वर्ष से अधिक हो गए लेकिन उसपर आधारित उल्लेखनीय पुस्तकें नहीं आ पाई। इन दिनों विश्वविद्यालयों के शिक्षकों में विभिन्न लेखकों से लेख लिखवाकर संपादित पुस्तकें प्रकाशित करवाने का चलन बढ़ा है। मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा संपादित पुस्तकें अधिक आ रही हैं। ये कार्य आसान है। कोई विषय चुनिए और लेखकों से लेख लिखवा कर अपने नाम से संपादित पुस्तक प्रकाशित करवा लीजिए। 

कोलंबिया से लौटकर अकादमिक जगत के एक वरिष्ठ प्रोफेसर से इस संबंध में विस्तृत चर्चा की। उनसे इसका कारण जानना चाहा। उन्होंने जो बताया वो मेरे लिए चौंकानेवाला था। उनका कहना था कि विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकार ने पहले से कई गुणा अधिक सुविधाएं दी हैं। शिक्षकों को पठन-पाठन का बेहतर वातावरण उपलब्ध करवाया है। परंतु अधिकतर विश्वविद्यालयों के नेतृत्व का ध्यान अकादमिक उत्कृष्टता की ओर कम है। अकादमिक उत्कृष्टता से अधिक उनका ध्यान आयोजनों पर होता है, समें लोगों को उपकृत करने का अवसर होता है।आयोजन करना बुरी बात नहीं है लेकिन उन आयोजनों से क्या संदेश निकले या उन आयोजनों में जो वक्तव्य दिए गए उनको आधार बनाकार ही उसके दस्तावेजीकरण का प्रयास नहीं होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर विश्वविद्यालयों में स्तरीय शोध हो इसके लिए तमाम तरह के संसाधन मुहैया करवाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे लेकिन शोध तो शिक्षकों को ही करना होगा। विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसरों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो अपने अधीन बेहतर शोध करवाएं चाहे विषय विज्ञान का हो, इतिहास का हो या मानविकी का हो। ऐसा होता दिखता नहीं है। पिछले दिनों राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी से बात हो रही थी उन्होंने इसपर चिंता व्यक्त की कि भारतीय साहित्य जगत पिछले एक दशक में भारत में हो रहे बदलावों को दर्ज करने में लगभग असफल रहा है। उन्होंने इसमें समाज विज्ञानियों और राजनीति पर लिखनेवालों को भी जोड़ा और कहा कि समाज, राजनीति, विदेश नीति आदि में जो उल्लेखनीय बदलाव हुआ है उस ओर लेखकों और अकादमिक जगत का ध्यान नहीं जा रहा है। कहना ना होगा कि हरिवंश जी की चिंता उचित है। मैं इसमें देशभर के विश्वविद्यालयों को भी जोड़ता हूं जिनके पास अवसर है इन बदलावों को रेखांकित करने का। 

प्रोफेसर साहब ने एक और बात रेखांकित की, केंद्रीय विश्वविद्लयों में कुलपतियों की नियुक्तियां भी समय पर नहीं हो पाती हैं। उनके मुताबिक अभी भी आधे दर्जन या उससे अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन है। उन्होंने पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए बताया कि कुलपति के लिए चयनित प्रत्याशियों से चयन समिति ने बात-चीत कर ली थी। संभावित पैनल भी तैयार हो गया था लेकिन कुछ दिनों पहले दस या ग्यारह अन्य उम्मीदवारों बुलाकर चयन समिति ने बात की। नियुक्ति फिर भी नहीं हो पाई है। सागर, अमरकंटक, लेह, विजयनगरम, गुजरात और हैदराबाद स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय बगैर कुलपति के या कामचलाऊ कुलपति के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि अगर विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन होंगे तो वहां काम क्या होगा। उतने ही काम होंगे जिससे कि विश्वविद्यालय चलता रहे। किसी नवाचार की आशा करना व्यर्थ है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने का प्रयास कर रहे हैं ऐसे में आधे दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति में देरी होने का कारण समझ नहीं आता। नियुक्ति से इतर भी बात करें तो विश्वविद्यालय के शिक्षकों की भी जबावदेही तय होनी चाहिए। अगर उनको पठन पाठन और अध्ययन के लिए उचित समय और अवसर उपलब्ध करवाए जा रहे हैं तो हर वर्ष इस बात का स्पष्ट आकलन हो कि उन्होंने पद के अनुरूप कितना कार्य किया। अभी जो व्यवस्था है उसमें शिक्षक स्वयं का आकलन करके विश्वविद्यालय के इंटरनल क्वालिटी अस्योरेंस सेल को भेजते हैं। इसमें बदलाव की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वो इस बारे में विचार कर निर्णय ले। 


Saturday, March 2, 2024

हिंदी और गांधी के सपनों पर ग्रहण


एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, जिसका नाम है महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। ये विश्वविद्यालय महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित है। इसकी वेबसाइट पर प्रकाशित परिचय में बताया गया है कि वर्ष 1997 में संसद में पारित एक अधिनियम के माध्यम से इसकी स्थापना की गई। इस विश्वविद्यालय के उद्देश्यों में क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी का सम्यक विकास करना, हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सुसंगत प्रयास करना। हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने के लिए प्रयत्न करना, अंतराष्ट्रीय शोध और विमर्श केंद्र के रूप में विवविद्यालय का विकास करना। संसद के पारित अधिनियम के आलोक में कांग्रेस समर्थक अधिकारी अशोक वाजपेयी को विश्वविद्यालय का पहला कुलपति बनाया गया। वो लगभग चार वर्षों तक विश्वविद्यालय को दिल्ली से ही चलाते रहे। कभी कभार वर्धा चले जाते थे। उनके कार्यकाल में कुछ विवाद भी हुए। उनके बाद कई कुलपति नियुक्त हुए लेकिन विश्वविद्यालय अपने उद्देश्यों की तरफ बहुत धीरे-धीरे बढ़ पाया। वर्धा इस स्थित यह विश्वविद्यालय कभी छोटे तो कभी बड़े विवाद में घिरा रहा। तभी नियुक्तियों को लेकर तो कभी निर्माण को लेकर। पिछले वर्ष 14 अगस्त को अप्रिय परिस्थितियों में कुलपति रजनीश कुमार शुक्ल ने कुलपति के पद से इस्तीफा दे दिया। रजनीश शुक्ल का कार्यकाल भी विवादित रहा। जब उन्होंने पद छोड़ा तो विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम प्रोफेसर एल कारूण्यकरा को कुलपति का प्रभार दिया। करीब दो महीने तक रजनीश शुक्ल का इस्तीफा स्वीकृत नहीं हुआ और प्रोफेसर कारूण्यकरा विश्वविद्यालय चलाते रहे। शिक्षा मंत्रालय ने जब रजनीश शुक्ल का इस्तीफा स्वीकृत किया तो साथ ही नागपुर के इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट (आईआईएम) के निदेशक को विश्वविद्यालय के कुलपति का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। इसके बाद प्रोफेसर कारूण्यकरा अदालत चले गए जहां मामला अभी लंबित है। अतिरिक्त प्रभार के रूप में नागपुर आईआईएम के निदेशक विश्वविद्लाय चला रहे हैं। इस बीच नए कुलपति की नियुक्ति के लिए शिक्षा मंत्रालय ने विज्ञापन दे दिया। प्रक्रिया चल रही है। 

इस क्रोनोलाजी को बताने का उद्देश्य ये है कि किस तरह से महात्मा गांधी और हिंदी के नाम पर बना ये केंद्रीय विश्वविद्लाय निरंतर विवादों में रहा। इन विवादों का असर विश्वविद्यालय के कामकाज पर पड़ रहा है। स्थायी कुलपति के इस्तीफे के छह महीने की अवधि बीत जाने के बाद भी कुलपति की नियुक्ति नहीं होने के कारण विश्वविद्यालय के सामने जो बड़े उद्देश्य थे उन पर ब्रेक लग गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा के भारतीयकरण के लक्ष्य को पाना चाह रहे हैं। इसके लिए वो खुद बहुत सक्रिय रहे हैं, अब भी हैं। भारतीय भाषा भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्राथमिकता में है। भारतीय भाषा को रोजगार से जोड़ने के लिए भी बड़े स्तर पर कार्य हो रहे हैं। पाठ्यक्रम से लेकर पाठ्य सामग्री तक तैयार करने के लिए पिछले दो वर्षों से हर स्तर पर श्रम हो रहा है । लेकिन जब हिंदी के इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसी लचर हो तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य को समग्रता में पाने में कठिनाई हो सकती है। इस समय जब  महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, के माध्यम से हिंदी को शक्ति देने का उपक्रम जोर शोर से चलाया जाना चाहिए था तब विश्वविद्यालय केस मुकदमों में उलझा हुआ है। जिनके पास विश्वविद्यालय का अतिरिक्त प्रभार है वो अतिरिक्त दायित्व की तरह ही निर्वाह भी कर रहे हैं। विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने अभी हाल ही में कुलपति को एक पत्र लिखने की बात कही है जिसमें वो ये मांग करेंगे कि प्रशासन विश्वविद्यालय की स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी करे। शिक्षकों को संबोधित उसी पत्र में शिक्षक संघ ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय में नियम कानून को दरकिनार कर निर्णय लिए जा रहे हैं। कर्माचरियों और शिक्षकों को परेशान किया जा रहा है आदि आदि। ये आरोप हैं और इनकी जांच होगी तभी सचाई का पता चल पाएगा। 

इन दिनों एक बेहद दिलचस्प बात इस विश्वविद्लय से जुड़ी है वो ये कि इसके रोजमर्रा के निर्णय व्हाट्सएप पर हो रहे हैं। चाहे वो शिक्षकों के अवकाश की स्वीकृति का मामला हो, चाहे किसी के जीपीएस खाते से पैसे निकालने की अनुमति का संदर्भ हो या किसी शिक्षक को किसी कार्यक्रम आदि में भाग लेने की अनुमति का मामला हो। अधिकतर मामलों में कुलपति का अप्रूवल व्हाट्सएप पर हो रहा है। इस प्रवृत्ति के कारण विश्वविद्यालय में ये चर्चा होने लगी है कि महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अब व्हाट्सएप युनिवर्सिटी बन गया है। अभी तक विमर्श या चर्चा के दौरान जब काल्पनिक बातों को तथ्य बनाकर पेश किया जाता था तो कहा जाता था कि व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का ज्ञान मत दो। व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का प्रयोग हल्के फुल्के अंदाज में होता था उसको अब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से जुड़े कुछ लोग अपनी युनिवर्सिटी का मजाक बनाने के लिए प्रयोग करने लगे हैं। यह ऐसी स्थिति है जिसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी। अकादमिक परिषद और कार्य परिषद की लंबे समय से बैठक नहीं होने के कारण बड़े निर्णय नहीं लिए जा रहे हें। व्हाट्सएप पर जितने निर्णय हो सकते हैं वो हो रहे हैं। व्हाट्सएप के स्क्रीन शाट के प्रिंट लेकर फाइलों में लगा दिए जाते हैं। 

महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय एक स्वप्न था। एस ऐसा स्वप्न जिसको 1975 में नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान देखा गया था। उस सम्मेलन के दौरान प्रस्ताव पारित किया गया था कि वर्धा में हिंदी के एक विश्वविद्यालय की स्थापना हो। 1993 में मारीशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान एक अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी। तब ये भी कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए भी एक ऐसे विश्वविद्यालय की आवश्यकता है। महात्मा गांधी के हिंदी प्रेम को भी इस विश्वविद्लय की स्थापना की आवश्यकता से जोड़ा गया था। तब जाकर 1997 में संसद ने ऐसे विश्वविद्यालय की स्थपना को स्वीकृति दी थी। आज इस विश्वविद्लाय के दो मान्यता प्राप्त केंद्र कोलकाता और प्रयागराज में चल रहे हैं। महाराष्ट्र के अमरावती जिले में भी एक केंद्र कार्यरत है जिसको विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मान्यता मिलना शेष है। गुवाहाटी में चौथा केंद्र खोलने की कवायद हो रही थी। कोलकाता का केंद्र काफी समय से किराए के मकान में चल रहा है। वहां बहुत कम जगह है। आरोप है कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन किसी को प्रताड़ित या दंडित करना चाहता है तो उसका तबादला कोलकाता केंद्र में कर दिया जाता है। प्रयागराज में विश्वविद्यालय का अपना परिसर है लेकिन वो भी आधारभूत सुविधाओं की बाट जोह रहा है। यह शोध का विषय हो सकता है कि इस केंद्र में जितने कर्मचारी या अध्यापक हैं उस अनुपात में विद्यार्थी रहे हैं या नहीं। अमरावती जिले के केंद्र को जब मान्यता ही प्राप्त नहीं है तो उसकी चर्चा व्यर्थ है। हिंदी के नाम पर बने इस विश्वविद्यालय पर केंद्र सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर ऐसा हो पाता है तो इसको एक ऐसे केंद्र के रूप में विकसित किया जाए जो हिंदी पठन पाठन के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित हो सके। विश्व के अन्य देशों के विश्वविद्लायों में हिंदी शिक्षण के समन्वयक के रूप में काम कर सके। वहां के लिए पाठ्यक्रम तैयार कर सके, शिक्षक तैयार कर सके। इस विश्वविद्यालय को उच्च शिक्षा के एक ऐसे वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना होगा जहां विश्व की अन्य भाषाओं में चल रही गतिविधियों पर विमर्श हो सके, शोध हो सके। अगर ऐसा हो पाता है तो प्रधानमंत्री के विकसित भारत के सोच को भी शक्ति मिल सकती है। अन्यथा व्हाट्सएप युनिवर्सिटी तो चलती ही रहेगी। 


Thursday, April 9, 2009

हिंदी साहित्य का राग 'कुलपति'

28 मार्च को दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा की तीन पत्रिकाओं का पुनर्जीवन समारोह हुआ । नए संपादकों के साथ तीन पुरानी पत्रिकाओं- बहुबचन (संपादक- राजेन्द्र कुमार), हिंदी ( संपादक- ममता कालिया) और पुस्तक वार्ता ( संपादक- भारत भारद्वाज) का विमोचन समारोह बेहद सफल रहा । त्रिवेणी सभागार श्रोताओं से खचाखच भरा था और लोग सीढियों पर बैठे थे और मंच पर हिंदी साहित्य की तीन विभूतियों- नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव और अशोक वाजपेयी के साथ श्रद्धेय कवि कुंवर नाराय़ण और कुलपति विभूति नारायण राय थे । लेकिन असली किस्सा तो समारोह शुरू होने के पहले और बाद का है । समारोह के पहले हर छोटे-बड़े साहित्यकार के बीच कुलपति महोदय के चरणों की धूल लेकर अपने को धन्य करने की होड़ सी मची थी । कुलपति के सामने हाजिरी बजाने की हड़बड़ी में एक वरिष्ठ कवि ये भी भूल गए कि आसपास भी लोग खड़े हैं । उन्होंने तो सरेआम अपने से उम्र में छोटे कुलपति के से कहा कि मुझ गरीब पर कृपा-दृष्टि बनाए रखिए । उनके बात करने का जो अंदाज था वो चापलूसी की सारी हदें तोड़ रहा था । याचक का ये अंदाज सिर्फ इन वरिष्ठ कवि का ही नहीं बल्कि वहां मौजूद कई साहित्यकारों का था जो कुलपति से आशीर्वाद लेने के लिए लाइन में खड़े थे । 
दरअसल कुलपति के इर्द गिर्द ये जमावड़ा सिर्फ उस दिन नहीं लगा था, ये हालत तो तब से हो गई है जबसे उन्होंने विश्वविद्यालय का कार्यभार संभाला है । लेकिन ये शर्मनाक स्थिति सतह के उपर जितनी दिखाई देती है, सतह के नीचे उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक है । हर छोटा बड़ा साहित्यकार विभूति नारायण राय के पीछे पड़ा है- कोई चाहता है कि विश्वविद्यालय उसे प्रमुख साहित्यकारों पर फिल्म बनाने का ठेका दे दे, किसी की ख्वाहिश है कि संचयिता के संपादन की जिम्मेदारी उसे सौंप दी जाए, कोई विश्वकोष का प्रस्ताव लिए दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, कोई चाह रहा है कि विश्वविद्यालय द्वारा खरीदी जानेवाली पत्रिकाओं में उसकी पत्रिका का भी नाम डाल दिया जाए,  हद तो ये हो गई कि विभूति नाराय़ण राय को कुलपति की दौड़ से बाहर करार देने वाला तथा अखबार में लेख लिखने के एवज में महिला लेखिकाओं से 'फेवर' मांगनेवाला एक पत्रकार मीडिया सेंटर में निदेशक बनने के लिए अपना बायोडाटा लिए गणेश परिक्रमा कर रहा था । और एक बेहद चतुर अधिकारी की तरह कुलपति हर किसी को विश्वविद्यालय मुख्यालय वर्धा आने का न्योता दे रहे थे । इस वजह से सबकी आकांक्षाएं हिलोरे ले रही थी । 
इस पूरे किस्से को बयां करने के पीछे हिंदी के साहित्याकारों की याचक मानसिकता को उजागर करना है । दरअसल आज हिंदी साहित्य की स्थिति इतनी शर्मनाक हो गई है कि जहां भी साहित्यकारों को कुछ लाभ दिखाई देता है वहीं वो हाथ फैलाए खड़े नजर आते हैं । सारे आदर्श और ज्ञान सिर्फ लेखन तक सिमटकर रह गए हैं । जब भी अपनी बारी आती है तो सारे आदर्श और सिद्धांत ताक पर रख दिए जाते हैं । एक जमाने में जब अशोक वाजपेय़ी इस विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो एक वरिष्ठ आलोचक ने उन्हें समकाली कविता का प्रमुख हस्ताक्षर करार दे दिया जबकि यही आलोचक महोदय वाजपेयी को पतनोन्मुख परंपरा के सबसे सशक्त और खूबसूरत हस्ताक्षर बताते नहीं थकते थे । उन्हें कलावादी बताकर उनके लेखन को कारिज कर दिया करते थे । ये अलग बात है कि बाद में उन्हीं आलोचक को विश्विविद्यालय के संचयिता का संपादन मिला। ये हाल तो शीर्ष आलोचक का था तो बाकिय़ों की तो छोड़िए । 
मेरे कहने का आशय ये है कि हिंदी के लेखकों से जिस तरह की गरिमापूर्ण और गंभीर व्यवहार की अपेक्षा की जाती है वो उसके आसपास भी नहीं पहुंच पाते हैं । कुछ लेखकों को अगर छोड़ दें तो आप पाएंगें कि तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि कहीं से कुछ प्राप्त हो जाए । आप हिंदी के प्रकाशकों से बात करिए तो आपको ये पता चलेगा कि किताबों के विमोचन समारोह में आने के लिए भी वरिष्ठ साहित्यकार सौदा करते हैं, मार्ग व्यय से लेकर मानदेय तक की बात तय करते हैं । इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन ये सौदेबाजी टुच्चेपन की हद तक चली जाती है ।  
तो आज जिस तरह से हिंदी साहित्य में राग 'कुलपति' गूंज रहा है और हर कोई इस राग में डूबकर 'गीला' होना चाहता है तो दिमाग में यही गूंजता है - हाय रे ! हमारे मूर्धन्य, हाय रे ! हमारे नायक, हाय रे ! लेखकीय आदर्श