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Saturday, August 30, 2025

फिर भी रहेंगी निशानियां


आज से करीब 70 वर्ष पूर्व राज कपूर की फिल्म श्री 420 आई थी। इस फिल्म ने राज कपूर के सोच और उनकी स्टोरीटेलिंग स्टाइल को बदल दिया। ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने उनकी व्यक्तिगत जिंदगी में भी बदलाव देखा। श्री 420 के पहले राज कपूर की फिल्म आवारा आई थी। फिल्म आवारा जब रिलीज हुई थी तो फिल्म समीक्षकों ने उसमें एक मार्क्सवादी अंडरटोन होने की चर्चा की थी। संभव है ऐसा हो। हलांकि राज कपूर अपने साक्षात्कारों में हमेशा इस बात का निषेध करते थे कि वो किसी विचार या विचारधारा से प्रेरित होकर फिल्म बनाते हैं। फिल्म आवारा ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी। अब्बास गहरे तक मार्क्सवादी विचारधारा में डूबे हुए थे। कहा जाता है कि जब इस फिल्म का स्क्रीनप्ले लिखा गया थी तो ख्वाजा अहमद अब्बास और वी पी साठे ने बेहद चतुराई के साथ कई दृष्यों और संवादों में परोक्ष रूप से कम्युनिस्ट विचार और उन विचारों का पोषण करनेवाली स्थितियां लिख दी थीं। एक समीक्षक ने तब लिखा भी था कि ख्वाजा अहमद अब्बास एक वैचारिक गाइड थे। राज कपूर जब इस फिल्म को लेकर अमेरिका गए थे तो वहां इसके प्रदर्शन के दौरान उत्साह नहीं दिखा था। कुछ महीनों बाद जब वो आवारा के प्रदर्शन के लिए सोवियत संघ गए तो वहां जबरदस्त सफलता मिली। आवारा के प्रदर्शन के लिए सोवियत संघ जाने के पहले से ही श्री 420 फिल्म आकार लेने लगी थी। इस फिल्म का नाम भी दिलचस्प है। 420 भारतीय दंड संहिता की एक धारा थी जो धोखेबाजी के केस में लगाई जाती थी। उसके ही आधार पर इस फिल्म का नाम श्री 420 रखा गया था। 420 के आगे श्री जानबूझकर लगाया गया था ताकि विवाद ना हो।  

फिल्म आवारा की तरह इसके नायक का भी नाम राजू था। ये भी लगभग आवारा ही था लेकिन पढ़ा लिखा था। देश को स्वतंत्र हुए सात-आठ साल हुए थे। नौजवानों के अपने सपने थे। उन्हीं सपनों को केंद्र में रखते हुए राज कपूर ने इस फिल्म के नायक के चरित्र को गढ़ा था। आवारा में जिस तरह से मार्क्सवादी अंडरटोन की बात होती थी वैसे ही इस फिल्म में राष्ट्रवादी अंडरटोन देखा जा सकता है। इस फिल्म का गीत मेरा जूता है जापानी, सर पे लाल टोपी रूसी.. खूब लोकप्रिय हुआ था। हिन्दुस्तानी दिल को ढंग से इस गाने में रेखांकित किया गया था। इस फिल्म में राज कपूर और नर्गिस पर फिल्माया गया अमर गीत, प्यार हुआ इकरार हुआ है जिसमें एक पंक्ति है, हम न रहेंगे तुम न रहोगे फिर भी रहेंगी निशानियां। इस गाने के एक सीन में राज कपूर के तीन बच्चे रणधीर, रितु और ऋषि कपूर भी थे। बारिश में फिल्माए इस गीत के दौरान बच्चे रेन कोट पहनकर राज और नर्गिस के सामने से निकल जाते हैं। रितू कपर ने जब राज कपूर पर पुस्तक लिखी थी तो एक चर्चा में उन्होंने मुझे बताया था कि किस तरह से वो इस सीन के बाद अपने पिता का ख्याल रखने लगी थी। उनकी मां बताती थीं कि उनको अगर पिता से कुछ कहना होता था तो वो एक कागज पर लिख कर उनके तकिए पर रख देती थीं। रितू ने बताया था कि चूंकि उनके पिता को मोगरे की खुशबू पसंद थी इसलिए वो अपने संदेश के साथ उनके तकिए पर मोगरे के फूल भी रख देती थी। 

इस फिल्म का एक और गाना मुड़ मुड़ के ना देख, नादिरा पर फिल्माया गया था। ये गाना भी हिट रहा था। इसके पहले भी नादिरा ने कई कामेडी फिल्मों में काम किया था लेकिन इस गाने ने उनको लोकप्रियता की नई ऊंचाई दी। इस फिल्म के पहले राज कपूर और नर्गिस के बीच का प्रेम बहुत गाढ़ा हो चुका था । नर्गिस के भाई जब उनसे कहते कि राज कपूर उसकी स्टारडम का उपयोग अपनी फिल्मों को सफल बनाने में कर रहे हैं तो वो इसे नकार देती थी। उनके भाई जब उनसे कहते कि राज कपूर अपनी फिल्मों में नर्गिस की शोहरत के हिसाब से स्क्रीन टाइम नहीं देते हैं तो वो इस पर ध्यान नहीं देती थी क्योंकि तब वो राज के प्रेम में दीवानी थी। जब श्री 420 रिलीज हुई तो नर्गिस को लगा कि राज कपूर ने इस फिल्म में उनके साथ न्याय नहीं किया है। तबतक दोनों के प्रेम में उसके अंजाम तक पहुंचने को लेकर बहसें भी होने लगी थीं। श्री 420 के बाद नर्गिस, राज कपूर से दूर जाने लगी थी। श्री 420 के साथ राज कपूर के कई किस्से जुड़े हुए हैं लेकिन अगर फिल्म के लिहाज से देखें, उसके क्राफ्ट को देखें तो ये एक मास्टरपीस थी। ये अनायास नहीं है कि सत्यजीत राय श्री 420 को राज कपूर की सबसे अच्छी फिल्म मानते थे. कहते भी थे। 


Saturday, December 21, 2024

प्रेम और रोमांस का कुशल चितेरा


राज कपूर एक ऐसे फिल्मकार थे जो अपनी जिंदगी में घटित घटनाओं को अपनी फिल्मों में इस तरह पिरोते थे कि वो कहानी का बेहद दिलचस्प हिस्सा हो जाता था। दो फिल्मों का जिक्र जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी की घटनाओं को फिल्मों में रिक्रिएट किया। संगम फिल्म में एक सीन है। राज कपूर जब वैजयंतीमाला के पहनने के लिए गहना निकाल रहे होते हैं तो उनको एक पत्र मिलता है। वो उसको पढ़ना चाहते हैं। अचानक फोन की घंटी बजती है और वैजंयतीमाला उनके हाथ से कागज छीनकर दूसरे कमरे में चली जाती है। फोन पर बात करते-करते वो उस कागज को फाड़कर खिड़की से बाहर फेंक देती है। राज कपूर ये देख लेते हैं। दोनों पार्टी में जाने के लिए निकलते हैं तो राज कपूर रुमाल भूलने का बहाना करके वापस लौटते हैं। खिड़की के बाहर फटे कागज को उठाने लगते हैं। वैजंयतीमाला को शक होता है। वो वापस कमरे में आती है। दोनों में झगड़ा होता है। ये सब राज कपूर की असली जिंदगी में घटित हुआ था जिसको उन्होंने फिल्म संगम में उतार दिया। 1955 में राज और नर्गिस फिल्म चोरी चोरी की मद्रास (अब चेन्नई) में शूटिंग कर रहे थे। एक होटल में रुके थे। दोनों एक पार्टी में जानेवाले थे। देर हो रही थी। वो नर्गिस के पास पहुंचे तो देखा उसके हाथ में एक कागज था। राज ने कागज के बारे में पूछा कि ये क्या है। कुछ नहीं, कुछ नहीं कहकर नर्गिस ने कागज को फाड़ कर फेंक दिया। जब दोनों कार तक पहुंचे तो राज रुमाल भूलने का बहाना बनाकर वापस उसी जगह पहुंचे और डस्टबिन से फटे हुए कागज उठाकर अपने कमरे की दराज मे रख दिया। पार्टी से लौटेने के बाद राज ने फटे कागजों को जोड़कर पढ़ा। वो शाहिद लतीफ नाम के एक प्रोड्यूसर का प्रणय निवेदन था। दोनों में जबरदस्त झगड़ा होता है। राज कपूर ने अपनी जिंदगी की इस सच्ची घटना को संगम फिल्म में रख दिया। 

दूसरी घटना भी नर्गिस से ही जुड़ी हुई है। नर्गिस अपनी मां के साथ बांबे (अब मुंबई) के चित्तो मैंशन में रहती थीं। एक दिन राज कपूर उनके घर पहुंचे और उन्होंने घंटी बजाई। थोड़ी देर बाद एक सुंदर सी लड़की ने दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उसने अपने हाथ से बाल ठीक किए। वो सीधे रसोई से आई थी और उसके हाथ में बेसन लगा हुआ था। जब वो बाल ठीक कर रही थीं तो गीला बेसन उनके बालों में लग जाता है। राज कपूर के मन पर ये सुंदर दृश्य अंकित हो जाता है। वर्षों बाद जब वो बाबी फिल्म बनाते हैं तो ये दृष्य डिंपल कपाड़िया पर फिल्माते हैं। 

राज कपूर ने अपने लंबे फिल्मी करियर में एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में उस सपने को पर्दे पर उतारा जो कि भारतीय मध्यमवर्ग लगातार देख रहा था। अपने आंरंभिक दिनों में राज कपूर ने फिल्मों का व्याकरण और निर्माण कला की बारीकियों को सीखने के लिए इससे जुड़े प्रत्येक विभाग में कार्य किया। किशोरावस्था से ही वो सुंदर लड़कियों और महिलाओं के प्रति आकर्षित रहने लगे थे। कलकत्ता (तब कोलकाता) के अपने घर में उन्होंने जब बलराज साहनी की खूबसूरत पत्नी को देखा तो आसक्त हो गए थे। जब उनको केदार शर्मा ने फिल्म का आफर दिया तो उन्होंने बहुत संकोच के साथ उनके कान में फुसफुसफाते हुए कहा था कि प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। बेबी मुमताज को मधुबाला के नाम से जाना गया।

स्वाधीनता के पहले राज कपूर ने ‘आग’ फिल्म बनाने की सोची जो आजादी के बाद प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में राज कपूर ने स्वाधीन भारत के युवा मन को पकड़ने का प्रयास किया। इस फिल्म को सफलता नहीं मिली। इसके बाद राज कपूर ने ‘बरसात’ बनाई। इस फिल्म से राज कपूर पर धन और प्रसिद्धि दोनों की बरसात हुई। यहीं से राज ने एक टीम बनाई जिसने साथ मिलकर हिंदी फिल्मों में सार्थक हस्तक्षेप किया। नर्गिस, गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी, गायक मुकेश और लता मंगेशकर, संगीतकार शंकर जयकिशन, कैमरापर्सन राधू करमाकर और कला निर्देशक एम आर आचरेकर की टीम ने राज कपूर के साथ मिलकर हिंदी फिल्मों को एक ऐसी ऊंचाई प्रदान की जिसको छूने का प्रयत्न अब भी हो रहा है। 

शैलेन्द्र और राज कपूर के मिलने की दिलचस्प कहानी है। स्वाधीनता का संघर्ष अपने चरम पर था। बांबे (अब मुंबई) में प्रोफेशनल राइटर्स एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में शैलेन्द्र ने एक गीत गाया था, मेरी बगिया में आग लगा गया रे गोरा परदेशी। वहां राज कपूर भी थे। कार्.क्रम के बाद राज ने  शैलेन्द्र से अपनी फिल्म आग के लिए गीत लिखने का अनुरोध किया। शैलेन्द्र ने ये रहकर मना कर दिया कि वो पैसे के लिए कविता नहीं लिखते हैं। बात आई गई हो गई। आग के बाद जब राज कपूर अपनी अगली फिल्म की तैयारी कर रहे थे। एक दिन शैलेन्द्र उनके महालक्ष्मी वाले आफिस में पहुंचे। राज कपूर से मिलकर बोले शायद आप मुझे पहचान रहे हों। मेरी पत्नी गर्भवती और बीमार है, मुझे 500 रुपयों की आवश्यकता है। कुछ दिनों के लिए उधार दें। मैं रेलवे में नौकरी करता हूं। दो तीन महीने में वापस कर दूंगा। राज कपूर ने उनको रुपए दे दिए। दो महीने बाद शैलेन्द्र पैसे वापस करने आए। राज कपूर ने वापस लेने से मना कर दिया, बोले कि आपकी जरूरत के समय पैसे दिए थे मैं साहूकार नहीं कि पैसे देकर वापस लूं। स्वाभिमानी शैलेन्द्र को ये बात जंची नहीं। उन्होंने कहा कि मैं कर्ज कैसे उतारूं। राज कपूर ने हंसते हुए कहा कि अगर कर्ज उतारना चाहते हैं तो मेरी फिल्म बरसात के लिए गीत लिख दें। शैलेन्द्र ने बरसात के लिए दो गीत लिखे। राज की अगली आवारा के गीत लिखने के लिए शैलेन्द्र तैयार नहीं थे। ख्वाजा अहमद अब्बास के कहने पर उन्होंने आवारा के गीत लिखे। शैलेन्द्र और राज कपूर की मित्रता इस तरह से प्रगाढ़ हुई। 

फिल्म बरसात के बाद राज कपूर ने आर के स्टूडियोज की स्थापना की। यहीं अपनी फिल्म आवारा बनाई। ये फिल्म भारतीय गणतंत्र की मासूमियत को सामने लाती है। राज कपूर ने कहा भी था कि ये भारत के गरीब युवाओं के निश्छल प्रेम की कहानी है। इस फिल्म ने राज कपूर को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। आलोचकों ने तब इस फिल्म को साम्यवादी दृष्टि की प्रतिनिधि फिल्म बताने की चेष्टा की थी लेकिन राज कपूर किसी वाद की चौहद्दी में नहीं घिरे थे। फिल्म आवारा से लेकर राम तेरी गंगा मैली पर विचार करने के बाद ये लगता है कि राज कपूर प्रेम के ऐसे कवि थे जिनकी कविता फिल्मी पर्दे पर साकार होती रही। प्रेम पगे दृश्यों के बीच वो भारतीय समाज की विसंगतियों पर प्रहार भी करते चलते हैं। वो कहते थे कि मेरा पहला काम मनोरंजन करना है। ऐसा करते हुए अगर समाज को कोई संदेश जाता है तो अच्छी बात है। राज कपूर के बारे में उनके भाई शशि कपूर ने कहा था कि वो घोर परंपरावादी हिंदू हैं। इसका संकेत उनकी फिल्म के आरंभ में भी मिला करता था जहां उनके पिता पृथ्वीराज कपूर के शिवलिंग के सामने बैठकर श्लोक पढ़ने के दृष्य से होता था।


Friday, June 21, 2024

ये मेरा प्रेम पढ़कर...


आज से 60 वर्ष पहले बनी फिल्म संगम का एक गाना है, ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम। उस गीत के पहले के एक दृष्य को याद करिए। फिल्म में आईने के सामने बैठकर वैजयंतीमाला गहने पहन रही होती हैं। राज कपूर आते हैं और नायिका से दूसरा गहना पहनने का अनुरोध करते हैं। वैजंयतीमाला कहती है कि तुम अपवनी पसंद के गहने निकाल लाओ। जब वो लाकर से गहना निकाल रहा होता है तो उसके हाथ एक प्रेम पत्र लगता है। वो उसको पढ़ने लगता है। वो जानना चाहता है कि किसने लिखा। तभी फोन की घंटी बजती है। वैजंयतीमाला उसके हाथ से प्रेमपत्र लेकर फोन उठाने दूसरे कमरे में चली जाती है। फोन पर बात करते-करते वो प्रेमपत्र फाड़कर खिड़की से बाहर फेंक देती है। राज कपूर ये देख लेते हैं। जब वो दोनों पार्टी में जाने के लिए निकलते हैं तो राज कपूर रुमाल भूलने का बहाना करके वापस घर में घुसते हैं। खिड़की के बाहर फटे प्रेमपत्र को उठा रहे होते हैं। वैजंयतीमाला को शक हो जाता है। वो भी वापस कमरे में आती है। दोनों में झगड़ा होता है। फिर राजकपूर पिस्तौल लेकर आते हैं। वैजंयतीमाला से कहते हैं कि जबतक उनको ये पता नहीं चल जाएगा कि ये खत किसने लिखे तबतक वो अंगारों पर लोटते रहेंगे, जैसे ही पता चलेगा ये अंगारा उसके सीने में उतार देंगे। इस संवाद के बाद दरवाजा बंद हो जाता है। पर्दे पर कुछ देर के लिए सन्नाटा। आपको लग रहा होगा कि इस दृष्य के बारे में विस्तार से चर्चा क्यों? वो इसलिए ये सीन राज कपूर की असली जिंदगी में घटित हुआ था जिसको उन्होंने फिल्म संगम में उतार दिया। 

1955 की बात है, राज कपूर और नर्गिस फिल्म चोरी चोरी की मद्रास (अब चेन्नई) में शूटिंग कर रहे थे। उस दौरान एक दिन दोनों के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ था। वो झगड़ा एक प्रेमपत्र को लेकर हुआ था। लगभग तीन दशक बाद राज कपूर ने पत्रकार सुरेश कोहली से बातचीत करते हुए ये स्वीकार भी किया था। जब दोनों के बीच बातचीत हो रही थी तो अचानक राज कपूर ने अपनी दराज से एक फ्रेम किया हुआ पत्र निकाला। उस पत्र के कुछ हिस्से गायब थे। फटे हुए टुकड़ों को चिपका कर फ्रेम करवाया गया था। राज कपूर ने उस दिन की बातचीत में दिल खोल दिया था, पूरी दुनिया रहती है कि मैंने नर्गिस को धोखा दिया। लेकिन कहानी इसके उलट है। हुआ ये कि हमलोग एक पार्टी में जानेवाले थे। देर हो रही थी। मैं नर्गिस के पास पहुंचा तो देखा उसके हाथ में एक कागज था। मैंने उससे पूछा कि क्या है तो उसने कहा, कुछ नहीं, कुछ नहीं। इतना कहकर उसने उस कागज को फाड़ दिया और मेरे साथ चल पड़ी। जब हम कार के पास पहुंचे तो मैं रुमाल भूलने का बहाना बनाकर वापस उसी जगह पहुंचा। तबतक मेड ने कागज के टुकड़ों को फर्श से हटाकर डस्टबिन में डाल दिया था। मैंने डस्टबिन से फटे हुए कागज उठाकर अपने कमरे की दराज मे रख दिया। जब हम पार्टी से लौटे तो उन फटे कागजों को जोड़कर पढ़ा। वो शाहिद लतीफ नाम के एक प्रोड्यूसर का प्रणय निवेदन था। नर्गिस ने पहली बार मुझसे झूठ बोला था और मेरा विश्वास तोड़ा था।‘  इस घटना के बाद राज कपूर और नर्गिस के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ था। कहा जाता है कि तभी से राज कपूर की जिंदगी में शराब का प्रवेश हुआ । राज कपूर ने अपनी जिंदगी की इस सच्ची घटना को संगम फिल्म में जस का तस रख दिया। फिल्म में भी इस घटना के बाद की पार्टी में राज जमकर शराब पीते हैं। 

संगम एक ऐसी फिल्म थी जिसने राज कपूर को प्रसिद्धि तो दिलाई लेकिन उनकी पारिवारिक जिंदगी में भूचाल ला दिया था। इस फिल्म की नायिका वैजंयतीमाला अचानक सफेद साड़ी पहनने लगी थी। माना जाता था कि जो स्त्री राज कपूर के प्रेम में होती थी वो सफेद साड़ी या कपड़े पहनने लगती थी।  उसके और राज कपूर के रोमांस के किस्से आम होने लगे थे। शम्मी कपूर ने अपनी भाभी कृष्णा कपूर को राज कपूर के नए रिश्ते को लेकर सावधान किया था। मुंबई  में चेंबूर के राज कपूर के घर में इस फिल्म के बनने के समय झगड़े शुरू हो गए थे। बात इतनी बढ़ी कि राज कपूर जब फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन के लिए लंदन गए तो कृष्णा को भी साथ लेकर जाना पड़ा। वैजंयतीमाला वहीं थीं। उस समय कृष्णा की मित्र ने उनसे पूछा था कि आप ये सब कैसे झेल पाती हैं। उन्होंने कहा था कि छाती पर पत्थर रखकर। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वैजंयतीमाला और राज कपूर के रिश्ते से कृष्णा इतनी झुब्ध हुईं कि घर छोड़कर चली गईं थी। वो तो भला हो इंकम टैक्स डिपार्टमेंट का कि राज कपूर के घर रेड मारी तो उनको अपनी पत्नी  की याद आई, क्योंकि सारे कागज वही संभालती थीं। किसी तरह मिन्नतें करके कृष्णा को वापस घर लाए। संगम को एक सुपर हिट फिल्म के तौर पर तो याद किया ही जाता है लेकिन उस दौरान राज कपूर की जिंदगी की बदलती कहानी भी याद आती है। 


Saturday, June 5, 2021

सच्ची कहानी उस प्यार की


शाम ढल चुकी थी, समंदर की लहरें हिलोरें ले रही थीं, हवा में थोड़ी ठंडक थी, मुंबई(तब बांबे) की सड़क पर एक फिएट कार धीमी गति से चली जा रही थी। नई चमचमाती उस कार को अभिनेता सुनील दत्त चला रहे थे और उनकी बगल वाली सीट पर उस वक्त फिल्मों की सफल अभिनेत्री नर्गिस बैठी हुई थीं। शूटिंग खत्म होने के बाद सुनील दत्त, नर्गिस को छोड़ने उनके घर जा रहे थे। कार की खिड़की का शीशा थोड़ा खुला था और ठंडी हवा सुनील दत्त के गालों को छूकर निकल रही थी। पर सुनील दत्त के माथे पर पसीने की बूंदें थीं, वो बार-बार नर्गिस से कह रहे थे, ‘मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं’ जब नर्गिस ने बोला कहिए तो वो चुप हो गए। फिर सुनील दत्त ने कहा कि ‘मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं’। नर्गिस ने फिर कहा फर्माएं। लेकिन वो फिर खामोश। इसी तरह से बातचीत चल रही थी और कार भी अपने रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी। सुनील दत्त के दिल की बात जुबां पर आ नहीं पा रही थी। उनको लग रहा था कि अगर नर्गिस ने मना कर दिया तो उनका क्या होगा? इतने में नर्गिस का घर आ गया। सुनील दत्त ने गाड़ी रोकी तो नर्गिस ने उनकी तरफ इस तरह से देखा जैसे आंखें कोई पर्सनल सा सवाल करना चाह रही हों। लेकिन वो भी कुछ कह नहीं पाईं और कार का दरवाजा खोलकर उतरने लगीं। तब सुनील दत्त ने लंबी सांस लेकर कहा ‘मैं तुमको पसंद करता हूं और तुमसे शादी करना चाहता हूं’ । नर्गिस ने सुनील दत्त की बातें सुनीं और कार का दरवाजा बंद करके बगैर कोई उत्तर दिए अपने घर की ओर चल पड़ीं। अब सुनील दत्त परेशान। अपनी पसंदीदा फिएट कार लेकर वो वापस घर की ओर लौटे। किसी तरह बेचैनी में रात कटी। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि अगर नर्गिस ने उनके प्रणय निवेदन को स्वीकार नहीं किया तो वो हरियाणा में अपनी मां के गांव लौट जाएंगे।

किसी तरह रात कटी, सुनील दत्त अगले दिन तैयार होकर शूटिंग पर चले गए। दिनभर बेचैन रहे। नर्गिस का कोई उत्तर या उनकी तरफ से कोई संकेत उनतक नहीं पहुंचा। शाम को काम खत्म करके वो अपनी फिएट से वापस घर लौट आए। बुझे बुझे से जब सुनील दत्त अपने घर में दाखिल हुए तो उऩकी बहन रानी खुशी से चहक रही थीं। उन्होंने सुनील दत्त का हाथ पकड़कर कहा ‘भाई मुबारक हो’। बेमन से सुनील दत्त ने पूछा ‘किस बात की बधाई’। तो उनकी बहन ने कहा कि ‘उन्होंने हां कर दी है’। सुनील दत्त कुछ देर के लिए समझ ही नहीं पाए कि किन्होंने हां कर दी है। वो कुछ पूछते तबतक रानी ने ही राड खोला, ‘नर्गिस जी आई थीं और उन्होंने रजामंदी दे दी है’। सुनील दत्त की खुशी का पारावार नहीं रहा। वो मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चले गए। ये किस्सा सुनील और नर्गिस की बेटी नम्रता दत्त ने अपनी किताब में विस्तार से लिखी है। लोकचर्चा इस बात की होती है कि ‘मदर इंडिया’ फिल्म में आग से बचाने की वजह से नर्गिस ने सुनील दत्त को प्रपोज किया था लेकिन सचाई ये है कि सुनील दत्त ने उनको अपनी फिएट कार में प्रपोज किया था। यही वजह है कि सुनील दत्त ने बहुत पुरानी हो जाने के बाद भी अपनी उस 1933 नंबर की फिएट कार को अपने पास रखे रखा था। ‘मदर इंडिया’ में आग की घटना के बाद दोनों के बीच प्यार और गहरा जरूर हुआ था।

अब नर्गिस ने हां तो कर दी थी लेकिन दोनों अपने प्यार की और शादी की बात सार्वजनिक नहीं कर पा रहे थे। फिल्म ‘मदर इंडिया’ के निर्माता निर्देशक महबूब खान नहीं चाहते थे कि उनकी फिल्म रिलीज के पहले इस प्यार की खबर बाहर निकले। उनका मानना था कि अगर नर्गिस और सुनील दत्त के प्यार और रोमांस की खबरें छपीं तो उनकी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। उनकी सोच थी कि भारतीय दर्शक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएंगे कि फिल्मी पर्दे पर मां बेटा की भूमिका निभाने वाले कलाकार असल जीवन में शादी करने जा रहे हैं और रोमांस कर रहे हैं। उन्होंने दोनों पर दबाव बनाया कि वो अपने प्यार को छिपा कर रखें। दूसरी दिक्कत ये थी नर्गिस के बड़े भाई अख्तर इस विवाह के खिलाफ थे। खैर 11 मार्च 1958 को दोनों की शादी हो गई। तबतक मदर इंडिया रिलीज होकर हिट हो चुकी थी।  

Sunday, March 29, 2020

आपदा को अवसर में बदलते किरदार


इस वक्त पूरी दुनिया में एक तिलिस्मी वायरस कोरोना का खौफ जारी है। अपने देश में भी कोरोना की वजह से लॉकडाउन चल रहा है. आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सबकुछ बंद कर दिया गया है। सड़कों पर सन्नाटा का साम्राज्य है लेकिन देश की जनता का मनोबल ऊंचा है। सबके मन में बस एक ही बात चल रही है कि कैसे इस वायरस को मात देनी है। कोरोना वायरस घातक है, जानलेवा है लेकिन हम भारतीयों के हौसले के आगे, हमारी दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे, हमारे संकल्प की शक्ति के आगे उसका झुकना ही होगा। हम भारतीयों की इस ताकत का, दृढ़ इच्छाशक्ति का दर्जनों फिल्मों में चित्रण हुआ है। जहां फिल्म निर्देशकों ने अपनी फिल्मों के माध्यम से ऐसे चरित्रों को पेश किया है जो अपनी जिजीविषा के दम पर दर्शकों के दिलोदिमाग पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं.
ह्रषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘आनंद’ का आखिरी सीन है, जहां अस्पताल में अमिताभ बच्चन अपने दोस्त राजेश खन्ना को झकझोरते हुए कहते हैं ‘उठो आनंद उठो’ लेकिन वो तो चिरनद्रा में लीन हो चुके थे। ये चल ही रहा था कि कमरे में चल रहे टेप से एक आवाज आती है, ‘बाबू मोशाय! जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है जहांपनाह, जिसे न तो आप बदल सकते हैं न ही मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपरवाले की ऊंगलियों से बंधी हैं. कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं बता सकता है।‘ इसके बाद चंद पलों तक जोरदार ठहाका गूंजता रहता है। साउंड टेप टूटने के बाद आवाज रुक जाती है। फिर स्क्रीन पर गुब्बारा उड़ता है और बैकग्रुंड से आवाज आती है, ‘आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं।‘ हिंदी फिल्मों के इतिहास में इस फिल्म को इसके पात्र ‘आनंद’ की जिजीविषा के लिए याद किया जाएगा। राजेश खन्ना ने अपने शानदार अभिनय से ‘आनंद’ के चरित्र को जीवंत कर दिया था। ये चरित्र इतना सकारात्मक है जिसने अपने इस गुण से अपना इलाज कर रहे डॉक्टर तक की मानसिकता को बदल दिया। उसके अंदर की नकारात्मकता और निराशा को खत्म कर दिया। आनंद को पता था कि उसको कैंसर है और वो छह महीने से अधिक जिंदा नहीं रह सकेगा. बावजूद इसके वो अपनी जिंदगी को भरपूर जिंदादिली से जीता है। उसक इलाज कर रहे डॉक्टर भास्कर के मन में इस बात की निराशा होती है कि वो अपने सभी मरीजों को ठीक नहीं कर पाता है लेकिन जब वो आनंद के संपर्क में आता है तो उसमें बदलाव आता है और उसकी नकारात्मकता खत्म होने लगती है और जिंदगी को देखने का उसका नजरिया बदलने लगता है। आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं के जरिए इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी समाज के एक संदेश देते हैं। इसको अगर इस तरह से व्याख्यायित करें कि आनंद (प्रसन्नता) मरा नहीं, आनंद (फिल्म का पात्र) मरते नहीं, तो संदेश साफ पकड़ में आ जाता है।
इसी तरह की अदम्य जिजीविषा वाले चरित्रों का चित्रण किया संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म ब्लैक में। इसमें एक मूक बधिक लड़की और उसका संघर्ष तो है ही उसको शिक्षित करनेवाले शिक्षक का जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी है। इस फिल्म में बहुत छोटी बच्ची मूक बधिर बच्ची को जीवन का रंग सिखाने में लगे हैं। अमिताभ बच्चन ने जिस शिक्षक देवराज की भूमिका निभाई है वो खुद उम्रदराज और सनकी है । लेकिन तमाम अपमान सहते हुए भी एक दृष्टि बाधित लड़की को पढ़ाने का संकल्प लेता है, उसको पूरा भी करता है। जो लड़की बेहद आक्रामक थी वो भी इस अपने शिक्षक की प्रेरणा से सीखना शुरू करती है। लंभ संघर्ष के बाद मिशेल नाम की लड़की को स्नातक में दाखिला भी मिल गया। तमाम झंझावातों को झेलते हुए करीब बारह साल बाद वो बीए पास करती है। अपने अबिनय के गांभीर्य की वजह से रानी मुखर्जी ने दृष्टिबाधित लड़की के चरित्र को नई ऊंचाई दी है, उसके संघर्ष को यथार्थ के बेहद करीब ले गई। उधर अमिताभ बच्चन बढ़ती उम्र की वजह से अल्जाइमर की गिरफ्त में आ जाते हैं लेकिन कहते हैं न कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। इस फिल्म के अंत में भी आखिरी सीन में नेपथ्य से संवाद चलता है जिसमें रानी मुखर्जी कहती है, वो दुनिया का सबसे महान टीचर है, जिसने आज फिर से साबित कर दिया कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं, जिसने फिर से मुझे सिखाया कि दूसरों के लिए जीने को ही जीना कहते हैं। यहां भी फिल्म निर्देशक ने इस संवाद के जरिए पूरे समाज को एक संदेश दिया है और फिल्म के माध्यम से ये बताया है कि अंधेरा चाहे कितना भी घना हो लेकिन उम्मीद की किरण जलाकर उस अंधेरे को उजाले में बदला जा सकता है।
आज जब कोरोना की दहशत में लोग घरों के अंदर रहने को मजबूर हैं वैसे ही प्लेग की वजह से लोग पलायन को मजबूर हो गए थे। उसकी ही पृष्ठभूमि पर 1966 में एक फिल्म बनी थी ‘फूल और पत्थर’। इस फिल्म में बीमार शांति, जिसके किरदार को मीना कुमारी को ने निभाया है, के घरवाले अकेले छोड़कर चले जाते हैं। शाका, जिसकी भूमिका धर्मेन्द्र ने निभाई है, जो एक अपराधी की भूमिका में हैं जो उसी घर में घुसते हैं जहां के लोग बीमार शांति को मरने के लिए छोड़कर चले जाते हैं। फिल्म की कहानी कई मोड़ लेती है लेकिन अपराधी की भूमिका निभा रहे धर्मेन्द्र ने सबकुछ छोड़कर बीमार शांति की सेवा की और वो स्वस्थ हो गईं। फिर फिल्म में शांति के घर-परिवार का विरोध, समाज का विरोध आदि आदि है लेकिन इस फिल्म के माध्यम से निर्देशक ओ पी रल्हन ने साफ तौर पर ये संकेत दिया है मदद करनेवाला कोई भी हो सकता है। जान बचाने के लिए कोई भी आ सकता है। साथ ही ये संदेश भी है कि जीवन जीने की इच्छाशक्ति सबसे बड़ी दवाई है। इस संदेश को रल्हन ने शांति के चरित्र के माध्यम से रेखांकित किया है।
एक और फिल्म 1982 में बनी थी जिसे सुनील दत्त ने निर्देशित किया था, ‘दर्द का रिश्ता’। अगर हम इस फिल्म को ऊपरी तौर पर देखें तो इसमें कई इत्तफाक दिखाई देते हैं जो दर्शकों को चौंकाते हैं लेकिन ये फिल्म कैंसर जैसी बीमारी से लोहा लेने की और उसको मात देने की कहानी कहती है। सुनील दत्त, स्मिता पाटिल, रीना रॉय और खुशबू ने इस फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया है। इसमें ग्यारह साल की बच्ची अपनी जन्म के साथ ही अपनी मां को खोती है, फिर ग्रह साल की उम्र में कैंसर दबोच लेता है. अपने डॉक्टर पिता के साथ भारत से लेकर अमेरिका तक के अस्पतालों में वो इस बीमारी से जूझती है। अपनी सकारात्मकता और खुशमिजाजी से सफलतापूर्वक मुकाबला करती है। कहने का अर्त ये है कि हिंदी फिल्मों में कई ऐसे किरदार गढ़े गए जिन्होंने विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया। इनमें से कई चरित्र तो यथार्थ के बिल्कुल करीब हैं या फिर सत्य घटनाओं पर आधारित या उनसे प्रेरित हैं। जब भी इस तरह की फिल्में बनीं तो दर्शकों ने उसको खूब पसंद किया। धर्मेन्द्र-मीना कुमारी की फिल्म फूल और पत्थर कई सप्ताह तक सिनेमाघरों में चलती रही थीं, इसी तरह से ब्लैक ने तो पूरी दुनिया में ही धूम मचा दी थी। ‘आनंद’ और ‘दर्द का रिश्ता’ ने भी सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। कहना न होगा कि दृढ्ता और संकल्पशक्ति के साथ ना केवल आप निजी जिंदगी में सफल हो सकते हैं बल्कि आपदा को भी अवसर में बदल सकते हैं।   

Saturday, March 28, 2020

मीना कुमारी और अकेलेपन का दंश


इस वक्त पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा है। ये लॉकडाउन कोरोना वायरस की वजह से किया गया है ताकि इसके फैलाव को रोका जा सके। सरकार के इस फैसले के बाद लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। सारा देश कोरोना को रोकने के आह्वान की वजह से लगभग ठप है। लगभग इस वजह से कह रहा हूं कि आवश्यक सेवाएं जारी हैं। बड़े-बुजुर्ग, महिलाएं-पुरुष, बच्चे-किशोर सभी घरों में ही रह हैं। वो बाहर बिकुल नहीं निकल रहे हैं। महानगरों में जहां फ्लैट की संस्कृति है, जहां संयुक्त परिवारों का चलन लगभग नहीं है, वहां लोग अकेले अपने घरों में रह रहे हैं। शहरों के अलावा कस्बों और गांवों में भी ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जो अपने घरों में अकेले रहकर कोरोना के इस संकट को मात देने में लगे हैं। इसके लिए धैर्य और संकल्प की जरूरत है। अपने घरों में इक्कीस दिनों तक अकेले रहना बेहद मुश्किल है। जो लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं उनको तो बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही है लेकिन जो लोग कारोबारी हैं, जिनका अपना काम है, जो छात्र हैं ऐसे लोगों को घर में बहुत अधिक काम नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ‘कई बार अकेलापन लोगों को अवसाद की ओर भी ले जाता है।‘
हिंदी फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी की आगामी 31 मार्च को पुण्यतिथि है। इस माहौल में उनकी जिंदगी की कहानी याद आती है कि किस तरह से अकेलापन एक बिंदास शख्सियत को अवसाद की ओर ले कर चला गया था। उनतालीस साल की अपनी छोटी सी उम्र में जब-जब मीना कुमारी ने अपना अकेलापन दूर करने की कोशिश की वो जिंदगी के तमाम रंगों को अपने व्यक्तित्व में उतारने में सफल रहीं। अपनी निजी जिंदगी में भी और अपने प्रोफेशन में भी। जब-जब अकेलापन उनपर भारी पड़ा तब-तब वो अवसाद में गईं और उनका और पूरे कलाजगत का नुकसान हुआ।
इस संदर्भ में मशहूर अभिनेत्री नर्गिस ने एक प्रसंग लिखा है, ‘राजेश खन्ना और मीना कुमारी अभिनीत फिल्म ‘दुश्मन’ की शूटिंग खत्म हो चुकी थी। उसकी एडिटिंग शुरू हो चुकी थी। इस फिल्म की डबिंग का काम नरगिस के घर पर स्थित छोटे से थिएटर में शुरू हो चुका था। एक दिन फिल्म की डबिंग के लिए मीना कुमारी वहां पहुंची। उन्हें पता था कि ये थिएटर नर्गिस के घर में ही है। उन्होंने किसी से कहा कि जाओ देखकर आओ नर्गिस है कि नहीं। जब उनको पता चला कि नर्गिस घर पर हैं तो उन्होंने अपने स्टॉफ को नर्गिस के पास इस अनुरोध के साथ भेजा कि वो उनसे मिलना चाहती हैं।‘ नर्गिस किसी काम में व्यस्त थीं लेकिन मीना कुमारी के अनुरोध को वो ठुकरा नहीं सकती थीं क्योंकि दोनों में काफी दोस्ती हो चुकी थी। मीना कुमारी को नर्गिस मंजू कहती थीं और वो नर्गिस को बा’जी के नाम से बुलाती थी। दोनों के बीच की दोस्ती फिल्म ‘मैं चुप रहूंगी’ की शूटिंग के दौरान अंतरंगता में बदल गई थी। जब इस फिल्म की शूटिंग चेन्नई में चल रही थी तो उसका शेड्यूल काफी लंबा हो गया था। सुनील दत्त साहब ने नर्गिस को फोन कर अपने दोनों बच्चों संजय और नम्रता के साथ वहां बुला लिया था। तब संजय दत्त ढाई साल के थे और नम्रता दो महीने की थी। ये सभी लोग जब चेन्नई पहुंचे तो वहां होटल ओसनिक में रुके थे। उनके कमरे के बगल के कमरे में ही मीना कुमारी भी रह रही थीं। वहीं दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी थी। एक दिन शाम को सुनील दत्त ने चाइनीज खाने का प्रोग्राम बनाया तो नर्गिस ने मीना कुमारी को भी साथ चलने का निमंत्रण दिया। मीना कुमारी उस दिन शूटिंग करते हुए बहुत थक गई थी इसलिए उसने साथ जाने में असमर्थता जताई। लेकिन मीना कुमारी ने नर्गिस के सामने एक प्रस्ताव रखा कि वो उनके दोनों बच्चों को अपने साथ रख लेंगी ताकि वो और दत्त साहब अकेले डिनर पर जा सकें। नर्गिस और सुनील दत्त को मीना कुमार का ये प्रस्ताव भाया और वो दोनों बच्चों को उनके पास छोड़कर चाइनीज खाने का आनंद लेने चले गए। जब वो लौटकर आए तो दोनों बच्चे मीना कुमारी से चिपटकर सो रहे थे। नर्गिस ने लिखा कि ‘उस वक्त मीना कुमारी के चेहरे पर सुखद संतुष्टि का भाव था और उसका एक हाथ संज और एक हाथ नम्रता के ऊपर था’
हम बात कर रहे थे ‘दुश्मन’ फिल्म की डबिंग के दौरान मीना कुमारी का नर्गिस को अपने पास बुलाने की। नर्गिस जब वहां पहुंची तो मीना कुमारी ने वहां मौजूद सभी कर्मचरियों से अनुरोध किया कि वो ग थोड़ी देर के लिए कहीं चले जाएं, दोनों अकेले में कुछ बातें करना चाहते हैं। जैसे ही लोग वहां से निकले तो मीना कुमारी ने अपना सर नर्गिस के कंधे पर रख दिया और सुबकने लगी। अचानक मीना कुमारी के इस बर्ताव से नर्गिस हतप्रभ रह गईं। मीना कुमारी लगातार रोए जा रही थीं और नर्गिस उनके पीठ पर हाथ फेरते हुए उनको सांत्वना दे रही थी। रोते-रोते मीना कुमारी ने नर्गिस से कहा ‘बा’जी, मैं कितनी अभागन हूं कि कोई भी मुझे प्यार नहीं करता, आप भी नहीं। आप भी मुझसे महीनों नहीं मिलती हैं, कोई मुझसे बात नहीं करता, मैं किसको अपने मन की बात कहूं’ । इतना सुनते ही नर्गिस भी भावुक हो गईं और उन्होंने मीना कुमारी को बच्चों की तरह अपने सीने से लगा लिया और समझाना शुरू कर दिया। नर्गिस के भरोसे के बाद मीना कुमारी बेहद खुश दिखीं और उन्होंने नर्गिस से वादा लिया कि वो ‘पाकीजा’ के प्रीमियर पर जरूर आएंगी। इस पूरे प्रसंग को बताने का मकसद इतना है कि मीना कुमारी के अवसाद में जाने की वजह उनका अकेलापन था। वो इस बात को लेकर खुद को अभागन तक मानने लगी थीं कि कोई न तो उनसे बात करता है न ही उनकी बात सुनता है। अकेलापन को लेकर लोगों में मतैक्य नहीं है। कई लोग इसको रचनात्मकता बढ़ानेवाला मानते हं तो कई इसको अवसाद का रास्ता। पर ज्यादातर केस में देखा गया है कि अकेलापन लोगों को अवसादग्रस्त करता है। ग्रेट ब्रिटेन के ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स के मुताबिक ‘अकेलापन एक गंभीर बीमारी है. पूरी दुनिया में डायबिटीज से जितनी मौत होती है उतनी ही मौत अकेलेपन के शिकार लोगों की होती है।‘
अगर हम मीना कुमारी के जिंदगी को ही देखें तो एक इतनी कामयाब अभिनेत्री जिसने ‘बैजू बावरा’ से लेकर ‘पाकीजा’ जैसी बेहतरीन फिल्में की। अभिनय की जिन ऊंचाइयों को उन्होने अपनी निभाई भूमिकाओं में छुआ उसने उनको कला के शिखर तक पहुंचा दिया था। मीना कुमारी जब भी तन्हा होती थी तो उनकी व्यक्तिगत जिंदगी उनको परेशान करती थीं। जब भी उनकी जिंदगी में तन्हाई दूर होती थी तो उनकी जिंदगी सतरंगी हो जाती थी। आज जब सभी लोगो कोरोना वायरस से बचने के लिए अपने घरों में बंद हैं तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आप अकेलापन के शिकार न हों। शारीरिक दूरी इस भयंकर बीमारी को रोकने के लिए जरूरी है लेकिन अपनी सामाजिकता को बाधित न होने दें। फोन, इंटरनेट और अन्य आभासी माध्यम से अपने संपर्कों को जीवंत रखें। दोस्तों से अपने मन की बात कहें और दोस्तों के मन की बात सुनें। मीना कुमारी जब भी किसी वजह से परेशान होकर घर बैठ जाती थीं तो वो अकेलेपन का शिकार हो जाती थीं क्योंकि वो खुद को घर में सबसे दूर कर लेती थीं। लेकिन जब-जब को किसी रिलेशनशिप में रहीं या किसी काम में व्यस्त रहीं तो उनकी जिंदगी बेहतरीन हो जाती थीं। जब वो अपनी व्यक्तिगत जिंदगी के संघर्षों से बाहर निकलकर ‘पाकीजा’ फिल्म करने के लिए वापस तैयार हुईं तो भी वो इस अकेलेपन से मुक्त हो गईं, उनके जीवन का खालीपन भर गया। लेकिन फिल्म ‘पाकीजा’ के रिलीज होने के बाद वो फिर से अकेलेपन की गिरफ्त में चली गईं। नाम, इज्जत शोहरत, काबिलियत, रुपया-पैसा हासिल करने के बाद कई बार लोगों को लगता है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के सभी लक्ष्य हासिल कर लिया है। सारी भौतिक सुख सुविधाएं हासिल कर लेने के बाद भी जिंदगी पूर्ण नहीं होती। मीना कुमारी की जिंदगी इस बात का उदाहरण है कि तमाम चीजें हासिल करने के बाद भी इंसान अगर अकेला है तो वो उसकी जिंदगी अधूरी है। आप भी अपने जीवन में अकेलेपन को आने न दें।

Sunday, October 20, 2019

नर्गिस की वादा खिलाफी से बने डांसर


हिंदी फिल्मों की चर्चा में राजेश खन्ना की सफलता की चर्चा आ ही जाती है और इस बात को रेखांकित किया जाता है कि उनकी लगातार सत्रह फिल्में सुपरहिट रहीं। लेकिन इस बात की चर्चा कम या नहीं के बराबर होती है कि एक सितारा ऐसा भी था जिसने एक के बाद एक अठारह फ्लॉप फिल्में दीं। पांच साल में अठारह फ्लॉप फिल्मों के बावजूद वो फिर से उठ खड़ा हुआ और उसके बाद हिट फिल्मों की झड़ी लगा दी। इस अभिनेता का नाम है शम्मी कपूर। दरअसल शम्मी कपूर जब फिल्मों में आए तब दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद अपने करियर के शिखर पर थे। इस त्रिमूर्ति के दबदबे और अपनी लगातार असफलताओं के बोझ तले दबे शम्मी कपूर को नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ में लिया। यहां भी नासिर हुसैन ने एक प्रयोग किया था और असफल फिल्मों के हीरो के तौर पर जाने जानेवाले शम्मी कपूर के साथ उन्होंने एकदम नई हिरोइन अमीता को लिया था। नासिर हुसैन इस बात तो भांप चुके थे कि स्थापित नायिकाओं के साथ शम्मी को दर्शक पसंद नहीं कर रहे थे क्योंकि शम्मी की अठारहल असफल फिल्मों की नायिकाओं में मीना कुमारी, मधुबाला, नूतन और सुरैया रह चुकी थीं। ये प्रयोग सफल रहा और ‘तुमसा नहीं देखा’ जबरदस्त हिट रहा। इसके बाद अगली फिल्म ‘दिल देके देखो’ ने तो सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे।
शम्मी कपूर का जीवन शुरू से ही ट्रैजिक भी रहा और दिलचस्प भी। जब वो मां की कोख में पल रहे थे तो पंद्रह दिनों के अंतराल पर उनके दो भाइयों बिंदी और देवी की मौत हो गई थी। पूरा परिवार टूट गया था। दो बच्चों की मौत से टूट चुकी महिला की गोद में समय से पहले पैदा हुआ बेहद कमजोर बच्चा आया, परिवार में कम ही लोगों को उसके बचने की उम्मीद थी। शम्मी कपूर का शैशवस्था इस माहौल में बीत रहा था। घर में लोग शम्मी को छोटा चूहा बुलाते थे। जब को किसी तरह से चौदह साल के हुए तो एक बार उनकी भाभी कृष्णा उनको अपने मायके रीवां लेकर गईं। वहां शम्मी कपूर का स्वास्थ्य काफी सुधरा और शम्मी ने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि रीवां में तैराकी करने से उनके स्वास्थ्य में सुधार के साथ शारीरिक विकास भी हुआ। शम्मी कपूर जब रीवां से मुंबई लौटे तो बदले हुए थे। उनकी शरारतें भी बढ़ती जा रही थीं। स्कूल के बाद कॉलेज पहुंचे लेकिन वहां मन नहीं लगा। शैतानियां बढ़ते देख उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने उनको सत्रह साल की उम्र में 1948 में पृथ्वी थिएटर में पचास रुपए महीने की मौकरी पर रख लिया। यहीं से उनका हिंदी फिल्मों में जाने का रास्ता खुला था।
ये बहुत कम लोगों को पता है कि शम्मी कपूर को शिकार का बहुत शौक था। 1946 में उनकी मुलाकात जोधपुर की महारानी से हुई। महारानी अपने दो बेटों के साथ पृथ्वी थिएटर में नाटक देखने आई थी। शम्मी कपूर उनकी अदाओं और शाही अंदाज से बेहद प्रभावित हुए थे। उनके दोनों बेटों से भी उनकी पहचान हो गई। उनके साथ पहली बार वो शिकार पर गए थे। बाद तो में तो शिकार में इतना मन रमा कि भोपाल के पास के जंगल और तराई तक जाने लगे। शम्मी कपूर ने वेबसाइट पर भोपाल के पास के जंगल में अपने पहले बाघ के शिकार के बारे में विस्तार से लिखा भी था। गीता बाली के साथ शादी के बाद भी ये शौक बरकरार रहा। कई बार तो दोनों मुंबई से देहरादून तक अपनी गाड़ी के शिकार करने चले जाते थे। कार की पिछली सीट पर गद्दा होता था और दोनों में से जो थकता था वो पीछे जाकर सो जाता था। ये बात भी दिलचस्प है कि शम्मी कपूर अपने दोस्त जॉनी वॉकर के साथ शिकार पर जाना सबसे अधिक पसंद करते थे।
शम्मी कपूर के गानों और उनके डांस स्टाइल की बहुत चर्चा होती है। उनके पसंदीदा संगीत सुनने और उसपर नृत्य करने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। हुआ ये कि एक दिन वो आर के स्टूडियो में नर्गिस के मेकअप रूम के सामने से गुजर रहे थे तो देखा कि नर्गिस रो रही हैं। उनके पास गए और पूछा तो पता चला कि उसके परिवारवालों ने उनको राज कपूर के साथ फिल्म करने से मना कर दिया है। उस वक्त ‘बरसात’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। नर्गिस फिल्म ‘आवारा’ में काम करना चाहती थी लेकिन पारिवारिक बंदिश लगी थी। शम्मी ने उनको दिलासा दिलाया और वादा किया कि वो भगवान से प्रार्थना करेंगे कि उनको राज कपूर के साथ काम करने की अनुमति मिल जाए । नर्गिस ने वादा किया कि अगर उनकी प्रार्थना सफल गोती है तो वो शम्मी को किस देंगी। समय गुजर गया, ‘बरसात’ हिट हो गई। नर्गिस को फिल्म ‘आवारा’ में काम करने की अनुमति मिल गई। जब शम्मी कपूर को इस बात का पता लगा तो वो फिल्म ‘आवारा’ के सेट पर पहुंचे और नर्गिस को उनका वादा याद दिलाया। नर्गिस ने शम्मी से कहा कि उनको वादा याद है लेकिन अब शम्मी बड़े हो गए हैं लिहाजा वो वादा नहीं निभा पाएंगीं। नर्गिस ने शम्मी से कुछ और मांगने को कहा। शम्मी ने नर्गिस से एक ग्रामोफोन मांगा, जो नर्गिस ने उसी दिन खरीद कर शम्मी को दे दिया। शम्मी कपूर ने बाद में इस बात को लिखा कि उनके अलबेले डांस स्टाइल के पीछे वो ग्रामोफोन है जो उनको किस के बदले मिला था। हिंदी फिल्मों के देसी काउ बॉय की छवि वाले इस अभिनेता की जिंदगी भी कई बार उनकी छवि से मेल खाती है लेकिन बहुधा उनको इससे दूर ले जाती है।   

Saturday, June 15, 2019

हुस्न और सुर का संगम सुरैया


सुरैया, भारतीय सिनेमा का एक ऐसा नाम है जिसने अपने हुस्न और गायकी से पूरे मुल्क को चकाचौंध कर दिया। उनके जैसा दूसरा कोई हुआ नहीं। गायिका-अभिनेत्री सुरैया का जलवा ऐसा कि फिल्मों में होना मतलब सफलता की गारंटी। सुरैया बाल-कलाकार के तौर पर फिल्मों में आईं लेकिन समय के साथ जब नायिका की भूमिका निभानी शुरू कीं तो फिर तो पृथ्वीराज कपूर से लेकर सहगल साहब के साथ काम करने लगीं। पृथ्वीराज कपूर को सुरैया पापाजी कहती थी और उनसे डरती भी बहुत थी। एक के बाद एक दर्जनभर हिट फिल्में सुरैया के नाम हैं।   सुरैया के अभिनय और गायिकी के कॉकटेल का जादू भारतीय दर्शकों के होश उड़ा देता था। जहां से वो निकल जाती थीं तो ट्रैफिक जाम हो जाता था। मुंबई के मरीन ड्राइव के उनके घर के बाहर हर रोज तमाशा होता था। क्या फिल्म प्रोड्यूसर, क्या डायरेक्टर, क्या अभिनेता सभी सुरैया पर जान छिड़कते थे। एक समय तो ऐसा आया कि एक शख्स सुरैया के घर के बाहर प्रणय निवेदन करते हुए धरने पर बैठ गया। पुलिस कार्रवाई में बेचारे आशिक को वहां से रुखसत होना पड़ा। इसी तरह एक बार बेहद दिलचस्प वाकया तब हुआ जब सुरैया और उसकी मां अपने फ्लैट में थी। अचानक फ्लैट के बार जोर-जोर से बैंड बजने की आवाज आने लगी। धीरे धीरे बैंड का शोर बढ़ता ही चला गया। सुरैया और उसकी मां को आनेवाले खतरे का अंदाजा नहीं था। जब बैंड का शोर काफी बढ़ गया तो सुरैया की मां ने अपने फ्लैट का दरवाजा खोला तो उनके ही दरवाजे पर बैंड बज रहा था और एक शख्स दूल्हे की पोशाक पहनकर सामने खड़ा था। सुरैया की मां ने जब उससे पूछा कि क्या बात है तो उसने कहा कि वो सुरैया से शादी करने के लिए पूरी बारात लेकर जालंधर से यहां आया है। जब तक उसकी मां कुछ समझ पाती तबतक दूल्हा पूरी बारात समेत उनके फ्लैट में दाखिल हो गया। बाराती और दूल्हा सुरैया से शादी रचाने पर जोर डालने लगे। इस बीच सुरैया ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया था। सुरैया की मां के लाख समझाने के बाद भी जालंधर वाले टस से मस नहीं हो रहे थे। वो चीखने चिल्लाने लगे थे कि इतने महंगे गहने बनवा कर लाए हैं, इतनी साडियां लेकर आए हैं, बारात पर इतना खर्च किया है बगैर शादी के वापस नहीं जाएंगे। सारे गहने बक्से से निकालकर उन्होंने सुरैया की मां के सामने रख दिया। लाखों के गहने और साडियां। इस बीच कुछ बाराती बदतमीजी पर उतारू होने लगे तो सुरैया कि मां ने पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने लाठी डंडा मारकर सबको बाहर निकाला और दूल्हा बेचारा सारे गहने आदि समेट कर वापस जालंधर चला गया। लेकिन सबसे दिलचस्प रही थानेदार की टिप्पणी। उसने जाते-जाते सुरैया की मां से कहा कि पता नहीं आप लोग क्या करते हो कि कभी कोई खुदकुशी करने चला आता है तो कभी कोई शादी के लिए धरने पर बैठ जाता है तो कभी बारात लेकर घर में घुस आता है। जाते जाते चेता भी गया कि अब आगे से कुछ करना मत।
सुरैया ने गाने की कोई औपचारिक ट्रेनिंग कभी नहीं ली थी। समय की मांग ने उनको गायिका बना दिया था। जब नर्गिस लोकप्रिय होने लगीं तो सुरैया का सिंहासन डोला, फिर कामिनी कौशल और निम्मी से सुरैया को टक्कर मिली। इसी दौर में मधुबाला का भी फिल्मों में पदार्पण हुआ। एक साथ इन नायिकाओं की फौज ने सुरैया की सल्तनत को चुनौती दी थी। सुरैया और देवानंद के प्रेम पर बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है लेकिन लाहौर से मुंबई आई इस अभिनेत्री ने फिल्म इंडस्ट्री पर अपनी शर्तों पर राज किया और फिर अपनी ही शर्तों पर इससे अलग भी हो गईं।

Saturday, June 1, 2019

नैसर्गिक प्रतिभा की 'नर्गिस'


आज नर्गिस का जन्मदिन है। आज वो नब्बे साल की होतीं। 51 साल की छोटी सी उम्र में नर्गिस दुनिया छोड़ कर ची गईं। पिछले दिनों राज कपूर की फिल्म बरसात (1949) देख रहा था। क्या गजब की फिल्म बनाई थी। पूरी फिल्म में नर्गिस और पहाड़ी सौंदर्य बांधे रखता है। राज कपूर और नर्गिस के बीच की केमेस्ट्री लाजवाब है। इस फिल्म में नर्गिस बेहद खूबसूरत लगी हैं। इस फिल्म में मोहब्बत करने की सजा के तौर ऑनर किलिंग की कोशिश भी है। नर्गिस और राज कपूर का प्रेम भी इस फिल्म के बाद ही परवान चढ़ा। देवानंद से लेकर ऋषि कपूर तक ने इस प्रेम के बारे में लिखा है। पर जब नर्गिस ने आर के स्टूडियो छोड़ा तो फिर चौबीस साल बाद आर के स्टूडियो के कैंपस में लौटीं। मौका था ऋषि कपूर की शादी का और उसके समारोह में नर्गिस और सुनील दत्त आए थे। 1956 के बाद नर्गिस ने आर के स्टूडियो में 1980 में कदम रखा था। जब वो वहां पहुंती तो थोड़ नर्वस लग रही थी। अचानक राज कपूर की पत्नी कृष्णा की नजर नर्गिस पर पड़ी और वो उसके पास जा पहुंची। उसने नर्गिस का हाथ पकड़ा और उसको अलग ले गईं। कृष्णा ने नर्गिस से कहा कि मैं जानती हूं कि मेरा पति बेहद खूबसूरत है, वो रोमांटिक भी बहुत है। मैं आपके आकर्षण को समझ सकती हूं। मुझे मालूम है कि इस वक्त आपके दिमाग में क्या चल रहा है पर पुरानी बातें भूल जाइए। आप खुशी के मौके पर हमारे घर आई हैं, हमलोग मिलकर जश्न मनाते हैं। आप हमारी ना केवल मेहमान हैं बल्कि दोस्त भी हैं। नर्गिस यह सुनकर सामान्य हो सकीं।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में नर्गिस और उसकी मां जद्दनबाई दो ऐसे किरदार हैं जिन्होंने अपने संघर्ष के बूते फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई। अपनी मां के साथ शहर दर शहर भटकते हुए, बहुत छोटी उम्र से फिल्मों में काम करते हुए नर्गिस ने जो जगह बनाई वो अप्रतिम है।

Saturday, May 4, 2019

यादों में सिमटी आर के की विरासत


अपने जीवन के अंतिम दिनों में मेरे पिता ने बहुत कम पैसों में आर के स्टूडियोज के दो स्टेज बेच दिए थे। उनके बेटे और उत्तराधिकारी के रूप में डब्बू, चिंपू और और मैं सफल फिल्में भले नहीं बना पाए लेकिन हमने संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं बेचा। हम अपनी विरासत को संभाल कर रखे हैं। ये बातें ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लम-खुल्ला में लिखी हैं, जो 2017 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुई थी। जब आर के स्टूडियोज के बिकने की खबर आई तो उपरोक्त पंक्तियां अचानक से दिमाग में कौंध गईं। दो साल पहले जो ऋषि कपूर अपनी विरासत को लेकर इतने बड़े दावे कर रहे थे, वो इतने कम समय में कैसे बदल गए, क्या हुआ कहा नहीं जा सकता है। क्या वजह रही कि राज कपूर के वारिसों ने, उनके बेटों ने ऐतिहासिक आर के स्टूडियोज को बेचने का फैसला किया। उन्हें यह हक है कि वो अपने पिता की संपत्ति को जिसे चाहे उसको बेचें। लेकिन भारतीय सिनेमा के इस अत्यंत महत्वपूर्ण स्मारक को गिराकर अब उसकी जगह शॉपिंग मॉल और लग्जरी अपार्टमेंट बनाए जाएंगें। राज कपूर और हिंदी फिल्म प्रेमियों के लिए ये एक झटके की तरह था। हलांकि इस बात की आशंका तभी से जताई जाने लगी थी जब स्टूडियो भयानक आग का शिकार हुआ था और कहा गया था कि सबकुछ जलकर खाक हो गया। इस तरह की बातें भी आने लगी थीं कि अब फिल्म निर्माता चेंबूर जाकर फिल्मों की शूटिंग करना नहीं चाहते हैं क्योंकि उससे ज्यादा सहूलियतें अंधेरी में उपलब्ध स्टूडियोज में है। इस वजह से आर के स्टूडियोज को चला और बचा पाना राज कपूर के वारिसों के लिए मुश्किल हो रहा था। दो एक ड़ से अधिक में फैला ये परिसर हिंदी फिल्म का एक ऐसा स्मारक था, एक ऐसी जगह थी जो दर्जनों बेहतरीन फिल्मों के बनने की गवाह रही हैं, यहां राज कपूर की मुहब्बत की शुरुआत होती है और यहीं उसपर परदा भी गिरता है। यह वो जगह थी जिसने गीत और संगीत की दुनिया को कई सितारे दिए। शंकर जयकिशन से लेकर शैलेन्द्र तक को। बॉबी की डिंपल से लेकर राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी तक ने इसी परिसर में काम करके प्रसिद्धि का स्वाद चखने को मिला था।   
फिल्म इतिहासकार मिहिर बोस के मुताबिक 1950 में राज कपूर ने आर के फिल्म्स को विस्तार देने की योजना बनाई थी और आर के स्टूडियोज के नाम से चेंबूर में सभी सुविधाओं से लैस एक स्टूडियो की स्थापना की थी। उस वक्त राज कपूर का ये स्टूडियो उनके घर से करीब चार किलोमीटर की दूरी पर था। जब राज कपूर ने इस स्टूडियो की स्थापना की थी तो यह जगह उस वक्त के बंबई का बाहरी हिस्सा हुआ करता था। इलाका भी सुनसान होता था लेकिन अब इस इलाके की जमीन करोड़ की हैं। आर के स्टूडियोज के परिसर में राज कपूर का प्रसिद्ध कॉटेज होता था जहां कई ऐतिहासिक फिल्मों की शरूआती की बातें हुई थीं, कई मशहूर गानों और धुनों के बनाने- बनने पर बातें हुईं। फिल्मों को लेकर चर्चाओं के दौर चला करते थे। कई जगह तो इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि फिल्मों पर चर्चा सत्र को राज कपूर टेप किया करते थे। अगर ये सच है तो वो टेप फिल्म निर्माण करनेवालों के लिए अमूल् हो सकते हैं। राज कपूर का कॉटेज स्टूडियो परिसर में कार्यालय के पीछे की तरफ हुआ करता था। कॉटेज में राज कपूर का एक कमरा था। अपने कॉटेज को राजकपूर अपनी कला का मंदिर मानते थे और अपने कमरे को मंदिर का गर्भगृह। राज कपूर के कमरे में सभी धर्मों के देवी देवताओं के चित्र लगे हुए थे यहां तक कि कुरान की एक आयत भी दीवार पर उकेरी गई थी।
राज कपूर के लिए सिनेमा उनकी जिंदगी हुआ करती थी। कपूर खानदान पर पुस्तक लिखनेवाली मधु जैन ने लिखा है कि राज कपूर के कॉटेज का दरवाजा फिल्मकार राज कपूर और पति, भाई, पिता, दादा राजकपूर के बीच लाइन ऑफ कंट्रोल हुआ करता था। उनके परिवार ने कभी भी इस लाइऩ को लांघने की कोशिश नहीं की। आर के स्टूडियोज में राज कपूर के कमरे के पीछ नरगिस का भी एक कमरा हुआ करता था। और आर के स्टूडियोज में ही प्रसासनिक भवन के पीछे पहली मंजिल पर नरगिस का ड्रेसिंग रूम बना था। इसके ठीक सामने राज कपूर का ड्रेसिंग रूम होता था। नरगिस और राज कपूर के अलगाव के बाद उनका ड्रेसिंग रूम आर के बैनर तले काम करनेवाली अन्य नायिकाओं के उपयोग में आने लगा था। पर राज कूपर के कॉटेज में नरगिस का जो कमरा था वो जस का तस बना रहा। उसमें नरगिस का सामना भी उसी तरह से रखा रहा था जैसा वो छोड़कर गई थी। राज कपूर ने नरगिस से अलगाव के करीब बीस साल बाद 1974 में अपने एक इंटरव्यू में बताया कि जब नरगिस ने अलग होने का फैसला किया तो वो कभी आर के स्टूडियोज में वापस नहीं लौटीं। एक दिन अचानक उनका ड्राइवर आया और राज कपूर से कहा कि बेबी ने अपने हाईहील वाले सैंडल मंगवाए हैं। राज कपूर ने ड्राइवर को कहा ले जाइए। थोड़े दिनों बाद एक दिन फिर ड्राइवर आया और उसने राज कपूर से कहा कि बेबी ने बाजा (हारमोनियम) मंगवाया है। राज कपूर ने कहा कि जब ड्राइवर नरगिस का हारमोनियम ले जा रहे थे तो उनकी समझ में आ गया कि अब सबकुछ खत्म हो गया है।
राज कपूर और नरगिस के अलगाव का गवाह भी आर के स्टूडियोज ही बना था। 1956 में एक फिल्म आई थी ‘जागते रहो’। इस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो नरगिस पूरी तरह से कंट्रोल कर रही थी। हर तरह के निर्देश आदि देती थी लेकिन धीरे धीरे राज और उनके बीच के संबंध में खटास इतनी बढ़ गई कि इस फिल्म का आखिरी सीन नरगिस का आर के बैनर की अंतिम फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के अंतिम सीन में जब प्यासा राज कपूर भटक रहे होते हैं तो नरगिस उनको पानी पिलाती हैं। नरगिस इस सीन को करना नहीं चाहती थी लेकिन वहां मौजूद सभी लोगों के आग्रह को वो टाल नहीं पाईं। माना यह गया कि ये सीन नरगिस को आर के स्टूडियोज की तरफ से दिया जानेवाला फेयरवेल था।
राज कपूर और नरगिस से जुड़े सैकड़ों किस्से और यादें तो इस जगह से जुड़े ही हैं अन्य नायक नायिकाओं और कलाकारों से जुड़े दिलचस्प किस्सों का भी ये परिसर गवाह रहा है। यहीं राज कपूर और राजेश खन्ना के बीच रात भर बात होती रही थी। राज कपूर चाहते थे कि सत्यम शिवम सुंदरम में राजेश खन्ना काम करें। उन्होंने रात को उनको अपने कॉटेज पर बुलाया और फिर रसरंजन के दौर चले लेकिन बात नहीं बन सकी। जीनत अमान के साथ शशि कपूर को इस फिल्म में रोल मिला था। इस फिल्म को लेकर ही राज कपूर और लता मंगेशकर के रिश्तों में खटास आनी शुरू हुई थी। दरअसल राज कपूर ने लता मंगेशकर के साथ मिलकर ‘सूरत और सीरत’ नाम से एक फिल्म की योजना बनाई थी जो परवान नहीं चढ़ सकी थी। बाद में जब राज कपूर ने उसी थीम पर ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ बनाई तो लता को जीनत अमान का चुनाव अखर गया। लता और राज कपूर के संबंध भी बहुत मधुर थे। कई रात सता मंगेशकर ने राज कपूर के कॉटेज में तानपूरे पर गाते हुए बिताई थी। ऐसी कई घटनाओं का गवाह रहा आर के स्टूडियोज अब किताब के पन्नों में रह जाएगा। हिंदी सिनेमा के एक सौ साल के इतिहास में आर के स्टूडियोज लगभग पचास साल तक हिंदी फिल्मों के केंद्र में रहा लेकिन अब वहां गगन चुंबी इमारत होगी और ये सभी यादें उन गगन चुंबी इमारतों के नीचे दफन हो जाएंगी। इसको बचाने की कोई कोशिश भी नहीं की गई। राज कपूर जैसे शोमैन से डुड़ी यादों को सहेजने के लिए कोई पहल नहीं हुई। राज कपूर और उनकी कला सिर्फ कपूर परिवार का नहीं है वो हमारे देश का है। इसको संभालने और बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी थी, लेकिन ऐसा हो ना सका।
जरूरत इस बात की है कि हमारे देश में एक सांस्कृतिक नीति बने जिसमें अपनी विरासत और धरोहर को संजोने के लिए ठोस कदम उठाने की नीति शामिल की जाए। ये सिर्फ फिल्मों से जुड़ा मसला नहीं है हमारी कला संस्कृति की समृद्ध विरासत कई स्थानों पर बेहतर रख-रखाव आदि के अभाव में नष्ट हो रही है। भारतीय प्राच्य विद्या का खजाना कई प्राचीन पुस्तकालयों में नष्ट होने के कगार पर है। उनको संभालने की भी जरूरत है अन्यथा एक समय ऐसा आ सकता है जब हम विकास की गगनचुंबी इमारत पर तो खड़े होंगे लेकिन हमारे पास ना तो कोई धरोहर बचेगा और ना ही हमारी विरासत होगी। इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ ठोस नीति चाहिए।