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Saturday, May 9, 2020

पुरानी कविता आज भी प्रासंगिक


कोरोना संकट के इस दौर में जब पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा है तो लोगों का समय इंटरनेट पर अपेक्षाकृत ज्यादा बीतने लगा है। इंटरनेट पर इन दिनों एक कविता लोकप्रिय हो रही है। ये कविता लिखी है हरिवंश राय बच्चन ने और उसका पाठ किया है अमिताभ बच्चन ने। कविता का प्रकाशन काल ज्ञात नहीं है लेकिन उसको पढ़ने के बाद ये लगता है कि इसकी रचना 1957 के बाद की गई। 1957 इस वजह से क्योंकि कविता के केंद्र में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास है जिसका गठन 1957 में किया गया। अब जरा हरिवंश राय बच्चन की लिखी इस कविता पर गौर कर लेते हैं, ‘राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने/ एक बड़ा दफ्तर कायम कर/टेबल, कुर्सी, मेज, फाइलों, टेलीफोनों/ टाइप की दस-बीस मशीनों की प्रदर्शनी लगवा करके/ चपरासी से महासचिव तक/ कर्मचारियों की पूरी पलटन बिठला कर के/ सालों पत्राचार कराकर/ लिक्खाड़ों की मीटिंग पर मीटिंग बुलाकर/ सफर खर्च दैनिक भत्ते का बिल भुगतान कर/ अग्रिम रायल्टी की मोटी रकम चुकाकर/ भारत के सांपों के ऊपर पुस्तक एक प्रकाशित की है/ केंचुल से चिकने कागज पर कई तिरंगी तस्वीरों की/ जिल्द बंधी, जाहिर है महंगी/ और बहुत से लोग खफा हैं/ भारत की गरीब जनता तक कैसे ये पुस्तक पहुंचेगी/ भारत की नंगी, भूखी जनता के आगे/ खड़ी समस्यायें जितनी हैं उनमें क्यों दें/ प्राथमिकता इसको कि वो सांपों का ज्ञान बढ़ाएं/ सहमत उनसे किंतु नहीं मैं/भारत के इतिहास, धर्म, संस्कृति के पीछे/ सांपों ने भूमिका अदा की जो/ वो किससे छुपी हुई है/ टिकी हुई है भूमि सांप ही के फन पर तो/ ज्ञान मिले सांपों का कितनी ही कीमत पर/ वो सस्ता है/ अ से ज्ञ तक, मैंने पूरी पुस्तक पढ़ ली/ और मेरी और ही शिकायत/ कहने का अधिकार आपको सही गलत है/ पुस्तक भर में भारत के जहरीले सांपों का/ कोई जिक्र नहीं है।‘  

हरिवंश राय बच्चन अपनी कविता में उस संस्था के बारे में टिप्पणी कर रहे थे या उसकी कार्यशाली पर व्यंग्य कर रहे थे जिसकी स्थापना भारत में पुस्तक संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने के लिए की गई थी। ये संस्था केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है। इस संस्था का उद्देश्य हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि की पुस्तकों का प्रकाशन और पाठकों तक उचित मूल्य पर पहुंचाना है। इसके अलावा इस संस्थान का दायित्व पुस्तक पढ़ने की प्रवृति को बढ़ावा देना भी है जिसके लिए ये पुस्तक मेलों का आयोजन आदि करती है। दिल्ली में प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला विश्व पुस्तक मेला इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। लेखकों और संस्थाओं को आर्थिक अनुदान भी देती है। बच्चन जी की ये कविता तब लिखी गई थी जब इसकी स्थापना को ज्यादा समय नहीं बीता था। अब इस संस्था की स्थापना के साठ साल से अधिक हो चुके हैं लेकिन क्या ये संस्था बच्चन जी की कविता से आगे बढ़ पाई है इसपर विचार करने की जरूरत है। कांग्रेस के शासन काल में इस संस्था को चलाने के लिए जिन लोगों को जिम्मेदारी दी गई थी उन्होंने एक विचारधारा विशेष की पुस्तकों का प्रकाशन और उसका वितरण किया। अगर हम इतिहास में न भी जाएं और वर्तमान में इस संस्था के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो भी बच्चन जी कविता लगभग सटीक ही प्रतीत होती है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संचालन की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के अलावा चेयरमैन और निदेशक की होती है। वर्तमान नियम के मुताबिक चेयरमैन ट्रस्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है और नियमित कार्य करने/करवाने की जिम्मेदारी उसकी ही होती है। इस वक्त न्यास के चेयरमैन 81 वर्ष के प्रोफेसर गोविंद प्रसाद शर्मा हैं। यहां नियुक्त होने के पहले पहले गोविंद शर्मा मध्यप्रदेश के एक कॉलेज में प्राचार्य रहने के अलावा मध्य प्रदेश ग्रंथ अकादमी के निदेशक रह चुके हैं। प्रोफेसर गोविंद शर्मा नियमित रूप से न्यास आते नहीं है और ज्यादातर समय मध्य प्रदेश के अपने घर पर ही बिताते हैं। लिहाजा रोजमर्रा के कामों का जिम्मा निदेशक पर आ जाता है। निदेशक भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल हैं और प्रतिनियुक्ति पर न्यास में आए हैं। हाल ही में उनकी नियुक्ति हुई है और पुस्तक संस्कृति के बारे में, पुस्तकों के बारे में उनका अनुभव कितना है इस बारे में न्यास की बेवसाइट पर प्रकाशित उनकी प्रोफाइल में कुछ नहीं लिखा है। बताया गया है कि वो रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के कार्यालय, संयुक्त राष्ट्र के अफ्रीका मिशन में प्रशासनिक दायित्वों को निभा चुके हैं। अब पुस्तक संस्कृति के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है। उनके लिए ये बड़ी चुनौती है।
अब अगर न्यास के इस वर्ष के कामकाज पर नजर डालें तो कोई उत्साहवर्धक पहल दिखाई नहीं देती है। पुस्तकों के प्रकाशन में भी वर्षों लग रहे हैं, नई पुस्तकों के प्रकाशन के लिए विचार विमर्श के लिए हर भाषा की एक सलाहकार समिति बनाई गई थी लेकिन उसकी बैठक दो साल से अधिक समय से नहीं हुई है। 2018 में हुई बैठक में इस तरह का सुझाव भी दिया गया था कि इस सलाहकार समिति की बैठक साल में एक की जगह दो बार की जाए ताकि पुस्तकों के विषयों पर सार्थक चर्चा हो सके, सुझाव आ सकें। लेकिन उस सुझाव पर तो अमल हुआ नहीं बल्कि बैठक ही बंद हो गई। निजी प्रकाशकों के साथ भी न्यास का संवाद लगभग समाप्त ही हो गया है। ऐसे माहौल में पुस्तक संस्कृति के निर्माण को कैसे मजबूती मिलेगी। पहले निजी प्रकाशकों के साथ ना केवल संवाद होता था बल्कि उनके साथ कारोबार भी होता था। अब वो बंद हो गया है और ट्रस्ट अपना सभी काम प्रिंटरों के साथ करने लगा है।
न्यास की एक काम में और रुचि है वो विदेशों में आयोजित पुस्तक मेलों में भाग लेने में। पेरिस, लंदन, फ्रैंकफर्ट, मैक्सिको से लेकर अबू धाबी तक के पुस्तक मेलों में न्यास के अधिकारी और कर्मचारी भाग लेते रहे हैं। इस वर्ष तो कोरोना की वजह से ये मेले स्थगित हो गए और करदाताओं के पैसे बच गए। इन पुस्तक मेलों में सार्थक कुछ होता नहीं है। जिन मेलों में पुस्तकों की बिक्री होती है वहां कितनी पुस्तकें बिकती हैं इसका हिसाब कभी सार्वजनिक नहीं होता और उन मेलों में जहां सिर्फ कारोबार होता है, दूसरे देशों के साथ प्रकाशन करार होते हैं वहां भी अब तक क्या और कैसे करार हुए इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये जानना दिलचस्प होगा कि पिछले सालों में इन पुस्तक मेलों पर न्यास ने कितना व्यय किया और कितना ठोस काम हो सका। दूसरे देशों के प्रकाशकों के साथ कितने करार हो सके और उसके हिसाब से कितनी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। दिल्ली के साहित्यिक हलकों में तो ये चर्चा होती है कि इन मेलों में सरकारी खर्चे पर मौज मस्ती होती है। इस स्तंभ में मैक्सिको में आयोजित मेले को लेकर सवाल खड़े किए गए थे। सवाल तो ये भी उठता है कि विदेशों में आयोजिक होनेवाले मेलों में जानेवालों का चयन कौन करता है, क्या चयन में इस बात का ख्याल रखा जाता है कि जो लेखक जा रहे हैं वो उस देश की भाषा या कम से कम अंग्रेजी में संवाद कर सकते हैं या नहीं।
आज देश भर में पुस्तकों की अनुपलब्धता एक गंभीर समस्या है, अब वक्त आ गया है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को देशभर में पुस्तकों की उपलब्धता के बारे में एक ठोस नीति बनाकर उसपर काम करना होगा ताकि पुस्तक संस्कृति को मजबूती मिल सके। 

Saturday, November 23, 2019

बने चुनौतियों से मुठभेड़ की योजना


भारत सरकार के मानव संस्थान विकास मंत्रालय से संबद्ध एक संस्था है नाम है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास। इस संस्थान की स्थापना 1957 में देश में पुस्तक संस्कृति के विकास के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि की पुस्तकों का प्रकाशन और पाठकों तक उचित मूल्य पर पहुंचाना है। इसके अलावा इस संस्थान का उद्देश्य देश में पुस्तक पढ़ने की प्रवृति को बढ़ावा देना भी है जिसके लिए ये पुस्तक मेलों का आयोजन आदि करती है। दिल्ली में प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला विश्व पुस्तक मेला इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। लेखकों और संस्थाओं को आर्थिक अनुदान भी देती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक संस्थान बच्चों के लिए भीली, गोंडी, संथाली, और कई उत्तर पूर्व की भाषाओं जैसे नागा, भूटिया, बोरो, गारो, खासी, कोकबोरोक, लेप्चा, लिंबू, मिंजो आदि में पुस्तकों का प्रकाशन करती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का दावा है कि वो उन विषयों के पुस्तकों के प्रकाशन पर विशेष ध्यान देता है जो अन्य प्रकाशकों द्वारा पर्याप्त रूप से प्रकाशित नहीं की जाती है। इसके अलावा ये जानकारी भी उपलब्ध है कि न्यास विदेशों में भी पुस्तक प्रोन्नयन के लिए केंद्रीय अभिकरण के रूप में विभिन्न अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में सहभागिता करता है और वहां भारत के विभिन्न प्रकाशकों की चुनिंदा पुस्तकों की प्रदर्शनियों का आयोजन करता है। देश में पुस्तक संस्कृति के निर्माण और विकास के लिए न्यास का काम उचित कहा जा सकता है लेकिन विदेशों में पुस्तक प्रोन्नयन का काम किस तरह होता है इसको समझने की जरूरत है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास मैक्सिको में तीस नवंबर से आठ दिसंबर तक आयोजित होनेवाले पुस्तक मेले में भाग लेने जा रहा है। इसके पहले न्यास फ्रैंकफर्ट, मास्को, संदन, बीजिंग, आबू धाबी और शारजाह के अलावा कई अन्य देशों में पुस्तक प्रोन्नयन हेतु वहां लगनेवाले पुस्तक मेलों में भाग ले चुका है। यहां इस बात पर गौर करना जरूरी है कि इनमें से ज्यादातार पुस्तक मेले बिजनेस टू बिजनेस यानि प्रकाशकों के विभिन्न कारोबार के लिए आयोजित किए जाते हैं पाठक वहां पुस्तक खरीद नहीं कर सकते हैं। मैक्सिको में आयोजित होनेवाला पुस्तक मेला बी टू सी यानि बिजनेस टू कस्टमर (कारोबार के साथ पुस्तक बिक्री) है जिसमें भाग लेने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत से 18 लेखकों का भारी भरकम प्रतिनिधिमंडल लेकर जा रहा है। इस प्रतिनिधि मंडल में सी एस लक्ष्मी, लीलाधर जगूड़ी, सुकन्या दत्ता, मकरंद परांजपे, विनॉय बहल, अरुप कुमार दत्ता, मंजुला राणा, मिनि सुकुमार, मधु पंत, अनुष्का रविशंकर, रचना यादव, कैलाश विश्वकर्मा, योगेन्द्र नाथ अरुण, सुबीर रॉय, सोन्या सुरभि गुप्ता, अमीश त्रिपाठी(सहायक के साथ), बी आर रामकृष्णा और दिव्यज्योति मुखोपाध्याय शामिल हैं। इन लेखकों के अलावा न्यास के अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम भी मैक्सिको में पुस्तकों के प्रोन्नयन हेतु जा रहे हैं। सवाल ये उठता है कि इतने लेखकों को ले जाने का औचित्य क्या है और वो किस तरह से वहां पुस्तकों का प्रोन्नयन करेंगे। वो क्या वहां आनेवाले प्रकाशकों के साथ बातचीत करके भारतीय भाषा के पुस्तकों का प्रोन्नयन करेंगे या फिर भारतीय भाषा के लेखकों की पुस्तकों के अनुवाद के अधिकार आदि पर बात करेंगे। इन सवालों के उत्तर खोजने की जरूरत है। सवाल तो ये भी उठता है कि पुस्तक न्यास के किस नियम के तहत इतनी बड़ी संख्या में लेखकों को विदेश यात्रा पर ले जाया जा रहा है और इनके चयन का मानदंड क्या है। मैक्सिको जानेवाले लेखकों का चयन एक समिति ने किया जिसमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी, साहित्य अकादमी के सचिव के एस राव और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अखिलेश मिश्र आदि शामिल थे। इस बात की पड़ताल होनी चाहिए कि क्या उनके सुझाए नामों में न्यास के अध्यक्ष ने कोई बदलाव किया या नहीं। अगर किया तो वो किन नियमों के तहत किया।
इसके पहले भी आबू धाबी में आयोजित पुस्तक मेले में लेखकों और न्यास के कर्मचारियों और अधिकारियों को ले जाने पर विवाद हो चुका है। अबूधाबी में पुस्तक के प्रोन्नयन में न्यास के दर्जनभर से अधिक कर्माचरियों को ले जाया गया था जिसमें अधिकारियों के निजी सहायक तक शामिल थे। इसके अलावा वहा जाने वाले लेखकीय प्रतिनिधिमंडल में कुछ ऐसे लोग भी गए थे जिनकी लेखकीय प्रतिभा से अभी साहित्य जगत का परिचय होना शेष है। दरअसल इस तरह के पुस्तक मेलों में लेखकों के प्रतिनिधिमंडल को ले जाने का काम साहित्य अकादमी का होता है। मैक्सिको पुस्तक मेला में भी साहित्य अकादमी की टीम अलग से जा रही है बावजूद इसके राष्ट्रीय पुस्तक न्यास डेढ दर्जन लेखकों को लेकर जा रहा है। इस बात की पड़ताल होनी चाहिए कि विदेशों में बिजनेस टू बिजनेस पुस्तक मेलों में में कितने भारतीय लेखकों की कृतियों के अनुवाद का अधिकार बिक सका, कितनी पुस्तकों के प्रकाशन को लेकर विदेशी प्रकाशकों के साथ करार हुआ और सबसे बड़ी बात कितने भारतीय लेखकों का प्रकाशन उस देश की भाषा में हो सका। यहां पाठकों को यह भी जानना चाहिए कि पिछले मैक्सिको पुस्तक मेले में भी न्यास की टीम गई थी लेकिन प्राप्त जानकारी के मुताबिक वहां कोई कारोबारी करार नहीं हो पाया था। जरूरत इस बात की है कि न्यास के विदेशों में किए जा रहे पुस्तक प्रोन्नयन के इन कामों के बारे में सूक्ष्मता से जांच की जानी चाहिए क्योंकि न्यास करदाताओं की गाढ़ी कमाई से चलता है और वहां किसी तरह के अपव्यय पर ध्यान रखना जरूरी है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का मुख्य काम उचित मूल्य पर भारतीय भाषाओं के पुस्तकों का प्रकाशन है लेकिन पुस्तक प्रकाशन की क्या स्थिति है और किस अनुपात में भारतीय भाषाओं की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है ये जानना भी दिलचस्प होगा। हर घर तक पुस्तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है पुस्तकों की उपलब्धता को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास सुनिश्चित करे। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा किताबों का बाजार है । अनुमान के मुताबिक किताबों का ये बाजार सालाना करीब साढे उन्नीस फीसदी की दर से बढ़ेगा और 2020 तक इस बाजार का आकार तेहत्तर हजार नौ सौ करोड़ तक पहुंच जाएगा । किताबों के बाजार में हिंदी किताबों का शेयर पैंतीस फीसदी है और अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों की हिस्सेदारी मात्र दस फीसदी है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि भारतीय पुस्तक बाजार में अन्य भारतीय भाषा की पुस्तकें भी आनुपातिक हद में रहें। मैक्सिको जानेवाले लेखकों की सूची पर ध्यान दें तो यहां भी भारतीय भाषाओं के लेखकों के प्रतिनिधित्व में एक असंतुलन साफ दिखाई देता है। देश में आयोजित होनेवाले पुस्तक मेलों से पुस्तक बाजार में भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है। देश का तीन सबसे बड़े पुस्तक मेला में से एक पटना पुस्तक मेला में राष्ट्रीय पुस्तक न्स की अनुपस्थिति रेखांकित की जानी चाहिए। मैक्सिको पुस्तक मेला में भागीदारी और पटना पुस्तक मेला में अनुपस्थिति, हैरान करती है।  
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से अपेक्षा ये की जाती है कि वो उच्च कोटि के साहित्य या फिर उच्च कोटि के लेखन को भारतीय पाठकों के सामने उचित मूल्य पर प्रस्तुत करेंगे लेकिन कई ऐसी संपादित पुस्तकें वहां से प्रकाशित हुई हैं जो बहुत ही निम्न कोटि की हैं। किसी का नाम लेना यहां उचित नहीं होगा लेकिन स्तरीयता से भी कई बार समझौता होता है। उन लेखकों की वो कृतियां भी घुमा फिराकर यहां से प्रकाशित हो जाती हैं जो पहले से किसी ना किसी प्रकाशक के यहां से प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन इस संस्थान को चलाने के लिए बोर्ड ऑफ ट्रस्टी होते हैं, एक्जीक्यूटिव कमेटी होती है। अलग अलग भाषाओं की सलाहकार समितियां होती हैं। इतना बड़ा अमला होने के बावजूद राष्ट्रीय पुस्तक न्यास अपने रचनात्मक कार्यों की वजह से चर्चा में नहीं आता है। आज भी देशभर में पुस्तकों की अनुपलब्धता पर चर्चा होती है, पुस्तकों की कम होती दुकानों को लेकर बौद्धिक वर्ग में एक खास तरह की चिंता लक्षित की जा सकती है लेकिन इस दिशा में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का प्रयास भी दिखाई नहीं देता है। अपनी स्थापना के छह दशक से अधिक बाद अब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को बदलते समय के साथ अपनी कार्यशैली भी बदलनी चाहिए ताकि समकालीन समय की चुनौतियों से मुठभेड़ कर सके। यह काम तभी संभव है जब न्यास के चेयरमैन और निदेशक सही फैसले लें और राष्ट्र और पाठक हित में संस्थान के क्रियाकलापों को तय भी करें और उसका क्रिन्यावयन भी सुनिश्चित करें। वैसे कई अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं की तरह इस वक्त राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में भी निदेशक का पद खाली है।     


Saturday, January 14, 2017

किताब पढ़ी नहीं है लेकिन...

दिल्ली में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित विश्व पुस्तक मेला आज समाप्त हो रहा है । इस वर्ष का विश्व पुस्तक मेला कई मायनों में अनोखा रहा । पुस्तक मेलों में हर वर्ष ताबड़तोड़ पुस्तक विमोचन होते रहे हैं लेकिन इस बार ये मेला विमचनों के रेला के लिए याद किया जाएगा । यह कोई बहुत असमान्य बात नहीं है, समय बीतने के साथ साथ हर चीज में बढ़ोतरी होती ही है । लेकिन इसके साथ जो असमान्य प्रवृत्ति देखने को मिली वो ये कि जिन पुस्तकों का विमोचन महानुभाव कर रहे थे उनको उसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती थी । विमोचन के बाद अमूमन हर वक्ता यह कहता था मैंने इनकी कहानी पढ़ी नहीं है लेकिन..., मैंने इनका उपन्यास पढ़ा नहीं है लेकिन...। क्या आलोचक, क्या वरिष्ठ कथाकार सबों की जुबां पर यही लफ्ज आते थे । यह प्रवृत्ति लगभग सभी प्रकाशकों के विमोचनों में देखने को मिली । सवाल यही उठता है कि विमोचनों की इतनी हड़बड़ी क्यों ? क्यों नहीं इस बात का इंतजार किया जा रहा था कि जिस भी पुस्तक का विमोचन हो, विमोचनकर्ता तैयारी के साथ आएं । कृति पर थोड़ी बात हो ताकि वहां मौजूद पाठकों के बीच जारी होनेवाली किताब को लेकर उत्सुकता बने और वो इसको खरीद सकें । हालात तो ये हो रहे थे कि विमोचन वाले स्टॉल के आगे से कोई वरिष्ठ, कनिष्ठ, समकालीन रचनाकार गुजर रहा हो तो उनको भी बुला लिया जाता था कि आइए आइए जरा विमोचन कर दीजिए । गुजरनेवाले भी खुशी खुशी किताब हाथ में लेकर पंक्ति में खड़े हो जाते थे । समारोह में शामिल होनेकी तस्वीर कैमरे में कैद हो जाती थी । भारतीय परंपरा में खुशी बांटने की परंपरा भी है लेकिन हद तब हो जाती थी जब खुशी बांटने के लिए विमोचन समारोह में शामिल होने वाले लेखक से कहा जाता था कि आप भी विमोचित कृति पर कुछ बोलिए । फिर वही शब्द गूंजता हैं, मैंने इस कृति को पढ़ा तो नहीं है लेकिन...। यहां जानबूझकर किसी विमोचनकर्ता का नाम नहीं लिखा जा रहा है क्योंकि लेख का उद्देश्य इस प्रवृत्ति को रेखांकित करना है किसी का नाम लेकर उनका उल्लेख करना नहीं । इसके अलावा इस बार कई पुस्तक विमोचन हाईटेक रहे । लेखकों ने तकनीक का फयदा उठाया । जिस लेखक की किताब विमोचित हो रही हो और वो किसी वजह से पुस्तक मेले में मौजूद नहीं रह पाया तो उनके मित्रों ने उनको फोन कर स्पीकर ऑन कर दिया या फिर स्काइप या वीडियो क़लिंग के जरिए उनको कार्यक्रम से जोड़ लिया । यह तकनीक का फायदा रहा लेकिन वीडियो कॉल या फोन के जरिए जुड़े लेखक को भी सुनना पड़ा कि- इनकी कृति मैंने पढ़ी तो नहीं है लेकिन...। विश्व पुस्तक मेले की इस प्रवृत्ति को इस वजह से भी रेखांकित किए जाने की जरूरत है क्योंकि प्रसिद्धि की फौरी चाहत में साहित्य पिछड़ता जा रहा है । पढ़ी नहीं है लेकिन... की प्रवृत्ति ज्यादातर वरिष्ठ लेखकों में देखने को मिली, कुछ प्रौढ होते लेखक भी इस तरह से विमोचन करते घूमते दिखे । दरअसल होता क्या है कि लेखकों को लगता है कि अपने से वरिष्ठों से विमोचन करवाकर फोटो उतार लिए जाएं और उसको फेसबुक पर चढ़ा कर लाइक्स की लोकप्रियता हासिल कर ली जाए । ज्यादातर विमोचनों को देखकर यही लगा कि इस बार भी पुस्तक मेले में फेसबुक को ध्यान में रखकर बहुत से काम किए गए । लेकिन फेसबुक की लाइक्स से साहित्य सृजन में गहराई आए या फिर बेहतर रचना के लिए लेखक और मेहनत करें ऐसा अबतक देखने को नहीं मिला है ।
इसके अलावा इस वर्ष के पुस्तक मेले में साहित्य की वरिष्ठम पीढ़ी की लगभग अनुपस्थिति भी दर्ज की गई । ऐसा लगता है कि नामवर सिंह अस्वस्थता और कड़ाके की ढंड की वजह से कम आ पाए । कुंवर नारायण बहुत कम बाहर निकलते हैं । विश्वनाथ त्रिपाठी और अशोक वाजपेयी मेले में दिखाई अवश्य दिए लेकिन एकाध विमोचन या कार्यक्रमों की अध्यक्षता की ही जानकारी मिल पाई । इसके अलावा कई वरिष्ठ साहित्यकार अकेले घूमते नजर आए । तो क्या इन वरिष्ठ लेखकों का दौर या आकर्षण या फिर इनसे अपने कृति के बारे में प्रमाण-पत्र लेने का दौर खत्म हो गया । या फिर इन लोगों ने इतने प्रमाण-पत्र बांट दिए कि अब उनके स्टॉक में सर्टिफिकेट्स खत्म हो गए हैं । यह भी हो सकता है कि वरिष्ठतम लेखकों ने नई पीढ़ी के आकांक्षाओं की रफ्तार से तालमेल नहीं बिठा पाए और नेपथ्य में चले गए । वाजपेयी जी जैसे स्टार लेखकों की स्टार वैल्यू को छीजता देखकर दुख होता है । एक जमाना होता था कि पुस्तक मेले में वाजपेयी जी के आगमन के साथ हिन्दी के हॉल में लगता था कि बहार आ गई हो । वो जब चलते थे तो उनके आगे पीछे लेखकों की फौज होती थी । इस बार वैसा नजारा देखने को नहीं मिला । वाजपेयी जी के अकेले होने की वजह उनका सत्ता से दूर होना भी हो सकता है । यह पहली बार हुआ है कि वाजपेयी जी की सत्ता प्रतिष्ठान में कोई पूछ नहीं रही । वो किसी सरकारी पद आदि पर भी नहीं हैं, लिहाजा हिंदी लेखकों को पहली बार हवाई यात्रा करवाने जैसा दंभपूर्ण बयान भी नहीं दे सकते हैं, पुरस्कार आदि देना तो दूर की बात है । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि साहित्यक सत्ता के केंद्रों की अहमियत कम होने के बाद नया साहित्यक सत्ता केंद्र उभरेगा या फिर उसका विकेन्द्रीकरण हो जाएगा ।
विश्व पुस्तक मेले में छिटपुट विवाद भी हुआ । हिंदी अकादमी दिल्ली की उपाध्यक्ष और मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा और अपेक्षाकृत नई पीढ़ी की लेखिकाओं में टकराहट लंबे समय से चल रही है । पुस्तक मेले में एक बार फिर से प्रत्यक्ष रूप से इस टकराहट से पाठक भी रूबरू हुए । एक चर्चा के दौरान लेखकीय विरासत के बाबत पूछे गए सव सवाल का जब मैत्रेयी पुष्पा ने नकारात्मक जवाब दिया तो विवाद बढ़ा । वहां मौजूद उपन्यासकार अल्पना मिश्र ने विरोध दर्ज करवाया । अब सवाल यही है कि लेखकीय विरासत है क्या ? क्या लेखन कोई संपत्ति है जिसकी विरासत किसी को सौंपी जाए या फिर उसकी वसीयत की जाए । दरअसल पिछले दिनों नासिरा शर्मा ने एक पत्रिका में अपनी साहित्यक वसीयत लिखी थी और कुछ रचनाकारों का नाम भी लिया था । उनके वसीयतनामे के बाद विरासत की साहित्यक राजनीति शुरू हो गई । संगीत में तो विरासत फिर भी मुमकिन है लेकिन साहित्य में विरासत की अवधारणा ही गलत है । बेहतर साहित्यक लेखन तो वो होता है जो परंपरा से अलग हटकर अपनी राह खुद बनाए । यह बात भी समझ से परे है कि मैत्रेयी पुष्पा से स्वीकृति की मोहर क्यों लगवाने की जरूरत है । मैत्रेयी ने अपने तरह का लेखन किया और अब नई पीढ़ी की लेखिकाएं अपनी तरह का लेखन कर रही हैं । इस विवाद की जड़ में विरासत आदि होगा लेकिन आपत्ति इस बात को लेकर ज्यादा हुई होगी कि मैत्रेयी पुष्पा ने मनीषा कुलश्रेष्ठ का नाम ले लिया । कुछ दिनों पहले जब मैत्रेयी पुष्पा ने अपेक्षाकृत युवा लेखिकाओं को निशाने पर लेते हुए एक लेख लिखा था तब मनीषा कुलश्रेष्ठ ने भी विरोध का झंडा उठाया था । अब बदले साहित्यक परिदृश्य में मैत्रेयी जी ने मनीषा को बेहतर रचनाकार माना तो उनसे सवाल पूछे जाने लगे । स्त्री लेखन में साहित्यक विरासत की गूंज मेले में रही लेकिन एक दो दिनों में ही ये थम सा गया । इन दिनों हिंदी साहित्य में असहिष्णुता भी बढती जा रही है । कोई भी अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने को तैयार नहीं है । अगर किसी ने रचना की भी आलोचना कर दी तो लेखक आगबबूला हो जाता है । प्रकरांतर में इस प्रवृत्ति का नुकसान साहित्य की अलग अलग विधाओं को होता है । देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर छाती कूटनेवालों में भी सहिष्णुता का आभाव दिखाई देता है । वो अपनी आलोचना तो क्या ही बर्दाश्त करेंगे अपनी रचना पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी उनको नहीं सुहाती है । लेखकों के लिए आत्ममंथन का वक्त है ।

इस बार विश्व पुस्तक मेले के पहले प्रकाशकों को इस बात का अंदेशा था कि नोटबंदी का असर दिखाई देगा । कई प्रकाशकों ने कार्ड से लेकर पेटीएम तक से भुगतान लेने का इंतजाम किया हुआ था । लेकिन जिन प्रकाशकों के यहां ईपेमेंट का इंतजाम नहीं था उनको भी कोई दिक्कत नहीं हुई । नोटबंदी का किसी प्रकार का कोई असर देखने को नहीं मिला । भारी संख्या में पाठक पुस्तक मेले में पहुंचे और जमकर खरीदारी की । आमतौर पर होता था कि हिंदी के मंडप में अंग्रेजी की तुलना में कम पाठक पहुंचते थे लेकिन इस बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हिंदी के पाठकों ने अंग्रेजी वालों को पीछे छोड़ दिया है, संख्या के लिहाज से भी और बिक्री के हिसाब से भी । यह हिंदी के लिए सुखद संकेत है ।    

Monday, December 28, 2015

पुस्तक संस्कृति के लिए जरूरी मेले

साल भले ही सर्दियों में खत्म होता है लेकिन पुस्तक प्रेमियों के लिए पुस्तक मेले उष्मा प्रदान करते रहते हैं । पुस्तक मेलों की शुरुआत नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले से होती है । दिल्ली विश्व पुस्तक मेले से इस साल जो रचनात्मक ऊर्जा और उष्मा साहित्य जगत में पैदा होनी चाहिए थी उसपर भी मौसम का असर दिखा था । साहित्यकारों और लेखकों के बीच पुस्तक मेले में हुए विमर्श की गर्माहट गायब सी दिखी थी । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले के दौरान नौ दिनों तक अलग अलग विषयों और पुस्तकों के विमोचवन के बहाने से तकरीबन सौ गोष्ठियां और संवाद हुए थे । पुस्तक मेला के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट ने मेला का चरित्र बदलकर साहित्य उत्सव करने की भरसक कोशिश भी की थी। हाल ही में खत्म हुए पटना पुस्तक मेले को देश का दूसरा बड़ा पुस्तक मेला कहा जा सकता है । यह एक तथ्य है कि बिहार में सबसे ज्यादा पत्र-पत्रिकाएं बिकती हैं । लोग सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यक रूप से बहुत ज्यादा जागरूक हैं । यहां के लोग किताबें पढ़ने के बाद उसपर प्रतिक्रिया भी देने में नहीं हिचकते हैं । बिहार में इस जागरूकता को और फैलाने और नई पीढ़ी की पढ़ने की रुचि को संस्कारित करने में पटना पुस्तक मेला की सकारात्मक भूमिका रही है । पटना पुस्तक मेले के आयोजकों ने पुस्तक मेले को सांस्कृतिक उत्सव में तब्दील कर दिया है । पटना पुस्तक मेला में देशभर के बुद्धिजीवियों की भागीदारी उसको एक व्यापक फलक भी प्रदान करती है । इस साल तो कॉफी हाउस के नाम से एक खास कार्यक्रम भी शुरू किया गया जिसमें पाठकों को संपादकों, फिल्मकारों और साहित्यकारों से रू ब रू होने का मौका मिला । कविता पर गंभीर विमर्श के दौरान वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह और आलोक धन्वा ने मंचों पर कविता की वापसी की जरूरत को रेखांकित किया था 

इस साल पटना पुस्तक मेले को अपने पूर्व सहयोगी नेशनल बुक ट्रस्ट से ही टक्कर मिली । पटना पुस्तक मेले के ऐन पहले ही नेशनल बुक ट्रस्ट ने उसी स्थान पर अपना अलग से पुस्तक मेला लगाया । इसका असर भी दिखा । नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना देशभर में पाठक संस्कृति के विकास के लिए किया गया था लेकिन पटना में आयोजित उनके पुस्तक मेले ने एक स्थापित मेले के अस्तित्व को संकट में डाला । नेशनल बुक ट्रस्ट को करना यह चाहिए कि वो देश के उन हिस्सों में पुस्तक मेले लगाए जहां कि पुस्तकों की पहुंच नहीं है ।  महानगरों और हवाई मार्ग से जुड़े शहरों में तो फिर भी पुस्तकें मिल जाती है लेकिन देश के कोने अंतरे में अब भी पुस्तकें  पहुंच नहीं पाती हैं । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि घर में पुस्तकों के लिए अलग जगह नहीं होती । हर घर में पुस्तकों के लिए अलग जगह हो इसकी लिए जरूरी है पुस्तकों की उपलब्धता को अनबीटी सुनिश्चित करे। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा किताबों का बाजार है । उस रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त भारत में किताबों का बाजार इक्कसी हजार छह सौ करोड़ रुपए का है । अनुमान के मुताबिक किताबों का ये बाजार सालाना करीब साढे उन्नीस फीसदी की दर से बढ़ेगा और 2020 तक इस बाजार का आकार तेहत्तर हजार नौ सौ करोड़ तक पहुंच जाएगा । किताबों के बाजार में हिंदी किताबों का शेयर पैंतीस फीसदी है और अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों की हिस्सेदारी मात्र दस फीसदी है । पुस्तक मेलों से पुस्तक बाजार में भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है । यह बात अभी जारी इलाहाबाद पुस्तक मेले में भी देखी जा सकती है जहां किताबों की जमकर बिक्री हो रही है । उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, कानपुर और लखनऊ के पुस्तक मेले पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय रहे हैं और पाठक उनका इंतजार भी करते हैं । जमशेदपुर और रायपुर के पुस्तक मेले भी अपने छोटे कलेवर के बावजूद पाठकों को आकर्षित कर रहे हैं । 

Monday, December 14, 2015

रॉयल्टी का रगड़ा

असम की एक लेखिका शर्मिष्ठा प्रीतम, जो व्हीलचेयर के सहारे अपनी जिंदगी गुजार रही हैं, ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खत लिखकर नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी अपनी किताब की रॉयल्टी दिलवाने की मांग की है । शर्मिष्ठा ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने खत में बताया है कि साल दो हजार चौदह में उनकी किताब प्रकाशित हुई थी, लेकिन करीब डेढ साल बीत जाने के बाद भी उनको ना तो एग्रीमेंट की कॉपी मिली और ना ही रॉयल्टी ।उनका आरोप है कि किताब छपने के पहले ये वादा किया गया था कि एडवांस रॉयल्टी दी जाएगी जिसका उनको अबतक इंतजार है । शर्मिष्ठा का कहना है कि उन्होंने जब भी नेशनल बुक ट्र्स्ट के अफसरों से संपर्क किया तो उनको रटा रटाया जवाब मिला कि कार्यवाही चल रही है । उनका कहना है कि वो आठ साल की उम्र से चल फिर नहीं सकती हैं जिसकी वजह से वो बार बार दिल्ली जाकर इस काम को करवाने की स्थिति में नहीं हैं । यह एक ऐसी स्थिति है जिसका सामना हर भाषा के लेखक को करना पड़ता है । यह स्थिति है नेशनल बुक ट्रस्ट की. जो भारत सरकार यानि कि करदाताओं के पैसे से चलती है । रॉयल्टी के मुद्दे पर विवाद की गूंज गाहे बगाहे हिंदी में भी सुनाई देती रहती है । लेखकों की हमेशा से शिकायत रहती है कि प्रकाशक उनकी किताबों की बिक्री का आंकड़ा सही तरीके से उनके सामने पेश नहीं करते हैं । नतीजा यह होता है कि उनको अपेक्षित रॉयल्टी नहीं मिल पाती है ।  रॉयल्टी का ये झगड़ा बहुत पुराना है लेकिन इसकी तरफ गंभीरता से कभी भी लेखकों और प्रकाशकों ने साथ मिलकर नहीं सोचा ।
दरअसल अगर हम गंभीरता से विचार करें तो ये लगता है कि हिंदी में लेखकों और प्रकाशकों के संबंध बहुत प्रोफेशनल कभी नहीं रहे । ज्यादातर किताबें मौखिक सहमति और लेखक-प्रकाशक संबंधों के आधार पर छपती रही हैं । कई बार एग्रीमेंट हो जाता है पर बहुधा छपने के पहले एग्रीमेंट नहीं होता है । किताब छपने के पहले लेखकों को लगता है कि किसी तरह से बड़े प्रकाशक के यहां से किताब छप जाए । ज्यादातर प्रकाशकों की तरफ से भी एग्रीमेंट को लेकर ढिलाई बरती जाती रही है । हिंदी के एक दो अग्रणी प्रकाशकों ने अब इस दिशा में गंभीरता से काम शुरू कर दिया है और अपने कारोबार को बेहद प्रोफेशनल तरीके से चलाने की राह पर बढ़े है। लेकिन सवाल यही है कि यह एक इतना सरल मुद्दा नहीं है कि एक दो प्रकाशकों के आगे बढ़ने से ये हल हो जाए । हिंदी में लंबे समय से ये समस्या रही है । लोक और जन की बात करनेवाले लेखकों के दबदबे वाले काल में भी इस दिशा में कुछ नहीं सोचा गया । आजादी पूर्व बने प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की । अपने अपने संगठनों से संबद्ध लेखकों को आगे बढ़ाने का इन लेखक संघों ने किया लेकिन उनके बुनियादी अधिकारों के लिए कोई लड़ाई उन्होंने नहीं लड़ी । ना तो लेखकों और प्रकाशकों के बीच के एग्रमेंट को बेहतर बनाने की कोशिश की गई और ना ही लेखकों के हितों के लिए प्रकाशकों के साथ बैठक कर हल निकालने की कोशिश की गई । असहिष्णुता के नाम पर मुंह पर पट्टी बांधकर साहित्य अकादमी की परिक्रमा करनेवाले लेखकों को भी कभी अपने अधिकारों की याद नहीं आई । साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों ने कभी भी अकादमी पर इस बाबत दबाव बनाया हो यह बात सामने नहीं आई । लेखकों के मुद्दे पर लेखक संगठनों की निष्क्रियता और लेखकों के बीच एक दूसरे को लेकर उपेक्षा का भाव इस समस्या के जड़ में है । हिंदी के ज्यादातर लेखकों की सोच बहुत सीमित हो गई है । आवश्यकता है अपने सोच का दायरा बढ़ाने की ।