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Saturday, July 11, 2020

पत्र और पुस्तक से चुनावी दांव


नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव होना है। वहां चुनाव की सरगर्मियां बहुत तेज हो रही हैं। कोरोना के भयावह संकट से जूझ रहे देश में भी राजनीति के दांव-पेंच तो अपनी गति से चल ही रहे हैं लेकिन राजनीति से इतर वो गतिविधियां तेज हो गई हैं जो राजनीति को प्रभावित करती हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के पहले उम्मीदवारों के बारे में पुस्तकें प्रकाशित होने का चलन रहा है। कभी किसी के पक्ष में तो कभी किसी को ध्वस्त करने की मंशा से पुस्तकें लिखी जाती रही हैं। चुनाव के मौसम में इस तरह की पुस्तकें बिकती भी हैं। पुस्तकों की बिक्री से प्रकाशक भी उत्साहित होते हैं और वो भी चुनाव के वक्त ऐसे लेखकों की तलाश में रहते हैं जो राष्ट्रपति के उम्मीदवार के करीब हों और उनके बारे में कुछ विस्फोटक लिख सकें। इसके अलावा पिछले दो तीन दशकों से वहां के चुनाव में लेखकों की आड़ में भी राजनीति शुरू हुई है। अमेरिका में डेमोक्रैट और रिपब्लिकन के समर्थक लेखक अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में प्रत्यक्ष या परोक्ष अपील भी जारी करते रहे हैं। अब जब इसी वर्ष नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव होना है तो वहां पुस्तकें भी छपने लगी हैं और अपील भी जारी होने लगे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बने लगभग चार साल होने को आए लेकिन इसके पहले वहां के बुद्धिजीवियों को ये याद नहीं आया था कि पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है या स्वतंत्र राय व्यक्त करने पर सत्ता द्वारा परेशान किया जाने लगा है।

कुछ दिनों पहले अमेरिका और वहां की संस्थाओं से संबद्ध डेढ सौ बुद्धिजीवियों, स्तंभकारों, नाटककारों, लेखकों ने एक पत्र जारी किया। उन्होंने पूरी दुनिया में स्वतंत्र राय रखनेवालों को हो रही मुश्किलों पर चिंता जताते हुए उदारवादी शक्तियों पर अनुदारवादी ताकतों के प्रबल होते जाने के खतरे को रेखांकित किया है। इस पत्र पर हस्ताक्षऱ करनेवालों में हैरी पॉटर सीरीज की लेखिका जे के रॉलिंग से लेकर बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार, कहानीकार और कवयित्री के रूप में पूरी दुनिया के साहित्य जगत में समादृत मार्गेट अटवुड, वामपंथियों के ‘परम श्रद्धेय’ विचारक नोम चोमस्की, विवादास्पद लेखक सलमान रशदी के अलावा भी कई नामचीन हस्तियां शामिल हैं। इन सबलोगों की चिंता ये है कि पूरी दुनिया में स्वतंत्र विचारों का विनिमय बाधित किया जा रहा है ।ये मानते हैं कि स्वतंत्र विचारों का विनिमय उदारवादी समाज की प्राणवायु है और इसपर प्रतिबंध लगाने की परोक्ष कोशिशों से अनुदारवादी समाज की तरफ बढ़ रहे हैं। इस पत्र में असहिष्णुता का मुद्दा भी उठाया गया है और अमेरिकी समाज में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। इस अपील के बाद अमेरिका में सोशल मीडिया पर इसको लेकर घमासान छिड़ गया। कुछ लोगों ने अमेरिका में ‘स्थगित संस्कृति’ का जुमला उछाला। हलांकि इस पत्र पर हस्ताक्षर करनेवाले चंद लोगों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेनिफर बॉयलेन ने तो ट्वीट करके कहा कि वो नहीं जानती कि उनके अलावा और किसने इसपर हस्ताक्षर का है, वो तो ये समझ रही थीं कि ये अपील इंटरनेट पर होनेवाले दुर्व्यवहार के विरोध में है। इतिहासकार केरी ग्रीनिज तो इससे भी एक कदम आगे चली गईं और साफ किया कि वो हार्पर पत्रिका में छपे पत्र से सहमत नहीं हैं। केरी ग्रनिज के इस विरोध के बाद हार्पर ने उनका नाम इस पत्र से हटा भी दिया। दरअसल ये वामपंथी रुझानवाले लेखकों और बुद्धिजीवियों की अपनी विचारधारा वाले राजनीति दल को समर्थन करने का एक औजार मात्र है। इसमें वो समाज में अपनी साख का उपयोग अपनी विचारधारा को मजबूत करने और उस विचारधारा के आधार पर चलनेवाले राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने के लिए करते हैं। हमारे देश ने भी चुनाव के समय बुद्धिजीवियों, नाटककारों, फिल्मकारों के कई ऐसे पत्र या अपील देखे हैं।
अमेरिका में जो पत्र जारी किया है उसमें वैश्विक स्तर पर अनुदारवादी विचार के मजबूत होने को लेकर चिंता जताई गई है। लेकिन नोम चोमस्की जैसे लोग भी ये भूल जाते हैं कि रूस के राष्ट्रपति पुतीन ने अब से कुछ दिनों पहले ही ही कहा था कि ‘उदारवादी विचार को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है। अब वो दौर आ गया है कि उदारवादी किसी को भी किसी भी समय इस अवधारणा की आड़ में कुछ भी करने को मजबूर नहीं कर सकते हैं। पिछले कई दशकों के दौरान उदारवाद के नाम पर लोगों को तरह तरह के आदेश देकर सत्ता से अपने हिसाब से काम करवाया। उदारवाद के नाम पर अराजकता की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती है। पुतीन का मानना है कि उदारवाद का सिद्धांत किसी भी देश के बहुमत के अधिकारों के खिलाफ जाता है, लिहाजा अब वो अर्थहीन हो चुका है।‘   पुतीन ने तब उदारवादी व्यवस्था की कमियों को लेकर बेहद आक्रामक तरीके से अपनी बातें रखी थीं। इस आलोक में अगर इन बुद्धिजीवियों की चिंता को देखें तो वो महज एक चुनावी दांव ही नजर आता है। 
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के पहले पुस्तकों का प्रकाशन भी शुरू हो गया है। चंद दिनों पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप की भांजी मैरी एल ट्रंप की एक पुस्तक आई है, ‘टू मच एंड नेवर एनफ, हाउ माई फैमिली क्रिएटेड द वर्ल्ड्स मोस्टडेंजरस मैन’ जिसमें ट्रंप के कई राज खोलने का दावा किया गया है। मैरी ट्रंप ने अपनी इस पुस्तक में अपने पारिवारिक झगड़ों और रिश्तों के बनने-बिगड़ने की कथा लिखी है। किताब खूब बिक भी रही है। इसके विवादास्पद अंश भी अमेरिका समेत पूरी दुनिया के अखबारों में छप रहे हैं। जैसा की पुस्तक के नाम से ही जाहिर है कि लेखिका ने किताब में क्या लिखा होगा। इस पुस्तक के विवादास्पद अंशों को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बयानबाजी भी हो रही है। अमेरिका के चुनावी इतिहास को देखते हुए इस बात की संभावना है कि इस तरह की कई किताबें नवंबर के पहले प्रकाशित होंगी।
जब से हमारे देश में चुनाव लड़वाने वालों की पूछ बढ़ी है, जो आंकड़ों के अलावा चुनावी माहौल बनाने का वैज्ञानिक तंत्र खड़ा करने का दावा करते हैं, तब से यहां भी चुनाव के पहले पुस्तकों का प्रकाशन या बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों या नाटककारों से अपील करवाने का चलन बढ़ा है। मतलब कि अमेरिका की तर्ज पर उन चुनावी औजारों का यहां भी उपयोग होने लगा है। हमारे देश में भी चुनावों के पहले असहिष्णुता का मुद्दा एक बार अवश्य उठता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले तो चुनाव को ध्यान में रखकर किताबें भी लिखी भी गईं और प्रकाशित भी हुईं। चुनाव के पहले ‘व्हाई आई एम अ हिंदू” से लेकर ‘व्हाई आई एम अ लिबरल’ जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उदारवादियों ने 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार अनुदारवादी है। दो हजार चौदह से लेकर दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक ये भी कहा जाता रहा कि सरकार में अनुवादरवादी शक्तियां प्रबल हैं। केंद्र सरकार पर तानाशाही से लेकर फासिज्म तक के आरोप जड़े जाते रहे। लेकिन चुनाव लड़वाने वाले और जितवाने वाले चाहे जितना दावा करें लेकिन जनता के मानस को समझने की जो दृष्टि जमीन से जुड़े नेताओं में होती है वो इन चुनावी मैनेजरों के पास नहीं होती। इसलिए न तो अमेरिका के चुनाव में अपील और किताबों के प्रकाशन का बहुत असर दिखता है और न ही भारत दो आम चुनाव में दिखा।

Friday, April 14, 2017

बमबारी से निकलते सख्त संदेश


अमेरिका में अपने फैसलों के लिए आलोचनाओं और विवादों से घिरे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरूवार को बेहद अहम फैसला लेते हुए अफगानिस्तान के अचिन जिले में दस हजार किलो का गैर परमाणु बम गिराने का आदेश दे दिया। कहा जा रहा है कि ट्रंप ने ये फैसला अपने एक सिपाही की मौत का बदला लेने के लिए किया है लेकिन इस फैसले से ट्रंप ने कई देशो को संदेश दिए हैं । पेंटागन के दावे के मुताबिक इस जगह पर गुफाओं के जाल में इस्लामिल स्टेट के करीब आठ हजार आतंकवादी छिपे हुए थे । यह जगह पाकिस्तान की सीमा के बेहद करीब है और माना जा रहा है कि इस बमबारी में सैकड़ों आतंकवादियों की जान गई है । हलांकि पश्चिमी मीडिया और न्यूज एजेंसी की खबरों के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े बम से हुए हमले में सिर्फ छत्तीस आतंकवादियो की जान गई है । पेंटागन के सूत्रों का दावा है कि इस दस हजार किलो के बम से किसी भी नागरिक की जान नहीं गई है । व्हाइट हाऊस के प्रेस सेक्रेट्री सीन स्पाइसर के मुताबिक इस बम को गिराते वक्त लक्ष्य निश्चित किया गया था और उसके निशाने पर उस इलाके के सुरंग और गुफाएं थीं । अमेरिका ने इस हमले के पहले पूरी तैयारी की थी और नंगरहार प्रांत के इस इलाके में अमेरिकी फौज ने सारी खुफिया जानकारी जुटाई थी । दस हजार किलो के बम, जिसे मदर ऑफ ऑल बॉम्ब कहते हैं, को गिराने के लिए कुछ ही दिनों पहले अमेरिका से विशेष मालवाहक जहाज को अफगानिस्तान भेजा गया था । दरअसल ये वही प्रांत है जहां ओसामा बन लादेन के अल कायदा के आतंकी भी तोरा-वोरा इलाके में रहा करते थे । पाकिस्तान की सीमा से सटे होने का भी आतंकवादी फायदा उठाते रहे हैं और जब इस इलाके में खतरा बढ़ता है तब वो पाकिस्तानी सीमा में शरण लेते रहे हैं । ओसामा के मरने के बाद इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने इस इलाके की गुफाओं और सुरंगों में अपना ठिकाना बना लिया था । यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान साफ किया था वो अगर सत्ता में आए तो आईएसआईएस के आतंकवादियों को नेस्तानाबूद कर देंगे ।
अब अगर अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले का विश्लेषण करें तो सतह पर तो यह आतंक और आतंकवादियों के खिलाफ अमेरिकी की पुरानी नीति का ही विस्तार नजर आता है लेकिन अगर सूक्ष्मता से और गहराई से इसका आंकलन करें तो संदेश बहुत साफ नजर आते हैं । इस हमले से अमेरिका ने एक साथ चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को संदेश दिया है कि वो अपने दायरे में रहें । पाकिस्तान में पहले भी अमेरिका घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार चुका है । अब पाकिस्तान सीमा के पास इतना बड़ा हमला कर साफ संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान आतंकियों को पनाह ना दे वर्ना एक बार फिर से वहां भी सैन्य कार्रवाई हो सकती है । पाकिस्तान को ट्रंप प्रशासन समय समय पर अपने कदमों से आतंकवादियों की मदद के खिलाफ चेताता रहता है । अपने चुनावी अभियान के दौरान ट्रंप ने इन तीनो देशों को निशाने पर लिया था और चीन को तो करेंसी मैनिपुलेटर तक करार दे दिया था । हाल ही में शी जिन पिंग के अमेरिका दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच रिश्तों की बर्फ पिघलती नजर आई जब ट्रंप ने शी जिन पिंग की तारीफ भी की और कहा कि वो अब चीन को करेंसी मैनिपुलेटर नहीं मानते हैं लेकिन साथ ही ट्रंप ये जोड़ना नहीं भूले कि अगर चीन उत्तर कोरिया का मसला अच्छे से सुलझा लेता है तो दोनों देशों के कारोबारी रिश्ते और बेहतर हो सकते हैं । दरअसल कुछ दिनों पहले उत्तर कोरिया ने अमेरिका के साथ परमाणु युद्ध तक की धमकी दी थी और अमेरिका इस समस्या को हमेशा के लिए निबटाना भी चाहता है । ।
अब अफगानिस्तान पर अमेरिका के दस हजार टन के बम गिराने के बाद चीन ने चिंता जताई है । चीन के कहा है कि जिस तरह से पूरे इलाके में तनाव बढ़ रहा है उसमें किसी भी तरह की घटना से इंकार नहीं किया जा सकता है । चीन की ये प्रतिक्रिया बम गिराने के बाद उत्तर कोरिया की तरफ से छठे न्यूक्लियर टेस्ट की खबरों के बीच आई है। इस तरह की खबरें आ रही हैं कि अफगानिस्तान में आतंकवादियों पर अमेरिकी हमले के बाद उत्तर कोरिया एक और परमाणु परीक्षण कर अपनी ताकत का एहसास करवा सकता है । अमेरिका ने जिस तरह से कोरियाई प्रायद्वीप में अपने विमानों का बेड़ा भेजा है उससे भी उत्तर कोरिया सख्त खफा है । उत्तर कोरिया का मानना है कि अमेरिका ने जिस तरह की कार्रवाई की है उससे इस पूरे इलाके में किसी भी वक्त परमाणु युद्ध छिड़ सकता है जिससे पूरी दुनिया की सुरक्षा और शांति खतरे में पड़ सकती है । अफगानिस्तान पर बम गिराकर जिस तरह से अमेरिका ने अपनी रणनीतिक कूटनीति में परिवर्तन करते हुए सीधी कार्रवाई की है उससे साफ है कि वो अब बानबाजी में नहीं उलझना चाहता है । उत्तर कोरिया और चीन की चिंता इसी रणनीतिक कूटनिति में बदलाव का परिणाम है । दरअसल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में सत्ता में आने के बाद इस बात का अंदाज लगाया ही जा रहा था कि वो कार्रवाई के पक्षधर हैं, लिहाजा जमीनी कार्रवाई होगी । जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ये पूछा गया कि क्या वो अफगानिस्तान पर बमबारी कर अमेरिका उत्तर कोरिया को कोई संदेश देना चाहता है तो ट्रंप ने कहा कि मुझे नहींमालूम कि इस कार्रवाई से कोई संदेश जाता है या नहीं, इससे कोई फर्क भीनगीं पड़ता कि संदेश जाता है या नहीं लेकिन उत्तर कोरिया एक समस्या है और उस समस्या को देखा जाएगा । इस बयान के बाद संदेश और साफ हो जाता है ।


Thursday, November 10, 2016

प्री पोल सर्वे फिर एक्सपोज

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डॉनल्ड ट्रम्प की जीत ने एक बार फिर से आंकड़ों के आधार पर की जाने वाली पत्रकारिता को एक्सपोज कर दिया । एक बार फिर से ये साबित हो गया कि राजनीति आंकड़ों के आधार पर नहीं चलती है । वोटरों का मूड तकनीक भांप नहीं पा रहा है । अमेरिकी चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि वहां के पोलस्टर्स ने ट्रम्प की ताकत को आंकने में जबरदस्त गलती की । ट्रम्प ने जिस तरह से अपने पक्ष में वोटरों को किया या फिर जिस तरह से उन्होंने अपने मुद्दों को लोगों तक पहुचाया वो भी आंकड़ेबाज पत्रकारों की समझ में नहीं आ पाया । चुनाव से दो दिन पहले तक अमेरिका के न्यूज चैनलों पर यह लगातार भविष्यवाणी की जा रही थी कि डेमोक्रैट उम्मीदवार हिलरी क्लिंटन उस देश की पैंतालीसवीं राष्ट्रपति बनने जा रही हैं । पिछले साल जब डॉनल्ड ट्रम्प ने अपनी उम्मीदवारी का एलान किया था तो उन्होंने जिस तरह से आतंकवाद के खिलाफ अपना रुख रखा था, जिस तरह से बेरोजगारी को अपना मुद्दा बनाया था उसने वहां की जनता के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी । इस असर को पकड़ने में अमेरिकी पत्रकारिता नाकाम रही थी । न्यूज चैनलों के स्टूडियो में नई नई तकनीक से मैप के जरिए ये बताया जा रहा था कि किस किस राज्य में हिलरी क्लिंटन को बढ़त हासिल है और लगभग सभी राज्यों में डॉनल्ड ट्रम्प पिछड़ रहे हैं । बड़े बड़े प्लाज्मा, वीडियो वॉल और टच स्क्रीन लगाकर जनता को बताया जा रहा था कि हिलरी जीत रही है । लेकिन जब चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए तो ये साफ हो गया कि अमेरिकी मीडिया डॉनल्ड ट्रम्प की रणनीति को भांप नहीं सकी और मैप पर लगभग पूरा अमेरिका लाल दिखने लगा।
चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह से डॉनल्ड ट्रम्प के खिलाफ एक के बाद एक महिलाएं सामने आती रहीं और उनपर छेड़खानी से लेकर जबरदस्ती किस करने के आरोप लगे उसने भी मीडिया को भ्रम में रखा । अमेरिकी मीडिया ये नहीं समझ सकी कि हिलेरी क्लिंटन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और निजी ईमेल का मुद्दा अन्य मुद्दों पर भारी पड़ रहा था । चुनाव के दो दिन पहले जब एफबीआई ने ईमेल के मसले पर हिलरी को क्लीन चिट दी तो अमेरिकी मीडिया ने लगभग ये मान लिया कि जनता अब हिलरी को माफ कर देगी । कहा तो यहां तक गया कि एफबीआई की क्लीन चिट ने हिलरी की व्हाइट हाउस की राह आसान कर दी है लेकिन यहां भी मीडिया और सर्वेक्षण करनेवाली एजेंसी वोटरों को समझ नहीं पाई । प्री पोल सर्वे के नतीजे जनता के बराक ओबामा के आठ साल के शासन के दौरान लगातार बढ़ रही एंटी इंकबेंसी, बराक के ट्रेड समझौते के नौकरियों पर पड़नेवाले आसन्न खतरे से उपजे जनता के गुस्से को पकड़ने में सफल नहीं हो पाई ।
अमेरिकी न्यूज चैनलों के अलावा वहां के बड़े अखबार भी डॉनल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता का आंकलन नहीं कर पाए या अगर उस दौरान छपे सर्वेक्षणों और उसके बाद स्तंभकारों से लेकर पत्रकारों के विश्लेषणों को देखा जाए तो ये साफ तौर पर लगता है कि आंकड़ों को पवित्र और अंतिम सत्य मानकर लेख आदि लिखे गए थे । दो दिन पहले तक यह कहा जाता रहा कि संभव है कि हिलरी की जीत ऐतिहासिक ना हो लेकिन जीत तय है । हिलरी की बढ़त को पांच फीसदी से शुरू रिया गया था जो घटते घटते एक फीसदी तक आ गया था । जैसे जैसे नतीजे आने लगे तो ये साफ हो गया कि तमाम भविष्यवाणियां काल्पिनक साबित होने जा रही हैं । दरअसल अगर हम देखें तो अमेरिका में दो हजार चार के चुनाव में वहां की मीडिया ने ये गलती की थी और बराक ओबामा के पक्ष में लोगों के मानस को भांप नहीं सकी थी । सवाल ये उठता है कि अमेरिका जैसे देश में जहां तकनीक बेहद उन्नत किस्म की है वो भी राजनीति की महीन चालों को समझ पाने में क्यों नाकाम रहती है । कमोबेश ये कहा जा सकता है कि प्री पोल सर्वे करने की जो पद्धति है उसमें ही बुनियादी कमी है । छोटे सैंपल सर्वे के आधार पर या मोबाइल या इंटरनेट पर होनेवाले पोल के आधार पर पूरे देश के वोटरों के मूड के बारे में भविष्यवाणी गलत ही साबित होती है । सैंपल सर्वे के आधार पर किसी प्रोडक्ट की पसंदगी या नापसंदगी का अंदाज तो लगाया जा सकता है लेकिन राजनीति किस करवट बैठने जा रही है उसका अंदाज लगा पाना मुमकिन नहीं है । संभव है कि किसी प्रोडक्ट को पूरा परिवार पसंद करता हो लेकिन जब वोटिंग की बात आती है तो पति पत्नी तक की पसंद अलग हो जाती है ।

प्री पोल सर्वे सिर्फ अमेरिका में ही नाकाम होते हैं ऐसा नहीं है, हमारे देश में भी बहुधा चुनावी सर्वे गलत ही साबित होते रहे हैं । अगर हम पिछले तीन लोकसभा चुनाव के दौरान किए गए सर्वेक्षणों पर नजर डालें तो जो इसी तरह की तस्वीर उभर कर सामने आती है । दो हजार चार के लोकसभा चुनाव के पहले साइनिंग इंडिया के माहौल में लगभग सभी सर्वेक्षणों ने एनडीए की जीत दिखाई गई थी लेकिन नतीजा ठीक उसके उलट रहा । इसी तरह से अगर दो हजार नौ और दो हजार चौदह के लोकसभा के नतीजों ने सर्वेक्षण के नतीजों में भारी उलटफेर किया था । दो हजार चौदह में एनडीए को यूपीए से आगे दिखाया जा रहा था लेकिन शायद ही किसी सर्वेक्षण में बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिया गया था । यही हाल दिल्ली और बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों में भी सर्वे का हुआ । एकाध बार तुक्का चल भी जाता है लेकिन बहुधा प्री पोल सर्वे फेल ही होते रहे हैं । सवाल यही कि इस तरह के सर्वेक्षणों से कबतक पत्रकारिता की खिल्ली उड़ती रहेगी । क्या कभी कोई न्यूज चैनल अपनी गलती के लिए माफी मांगने का साहस दिखा पाएगी