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Saturday, October 29, 2016

यश-भारती के यश पर सवाल

उत्तर प्रदेश के समाजवादी कुनबे में कलह जारी है । सियासत से लेकर अंत:पुर में खेले जाने दांव-पेंच पर पूरे देश की नजर है । तमाम राजनीति विश्लेषक हर रोज रिश्तों की नई व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं । कोई मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर दांव लगा रहा है तो कोई शिवपाल-अमर सिंह की जोड़ी के पक्ष में बैटिंग कर रहा है । इन तमाम सियासी कोलाहल के बीच साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर भी उत्तर प्रदेश इन दिनों चर्चा में है । पिछले हफ्ते करीब डेढ दशक बाद संगीत नाटक अकादमी अवार्ड बांटे गए । दरअसल दो हजार तीन से लेकर दो हजार आठ तक के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों का ऐलान महीनों पहले किया गया था लेकिन पुरस्कार बांटे जाने को लेकर कोई तिथि तय नहीं की गई थी । जिनके नामों का पुरस्कार के लिए ऐलान हुआ था वो भी अंधेरे में थे और कई तो बातचीत में निराशा भी जाहिर कर चुके थे कि उनको पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । पिछले हफ्ते आनन फानन में इन पुरस्कारों को बांट दिए गए लेकिन बताया जा रहा है कि कई पुरस्कृत शख्सियत वक्त पर इत्तला नहीं मिलने की वजह से मौके पर उपस्थित नहीं हो सके । खबरों के मुताबिक इस समारोह में सड़सठ कलाकारों को अकादमी अवॉर्ड और बारह को अकादमी रत्न पुरस्कार दिया गया । इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत कलाकारों लेखकों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि जल्दी जल्दी नाम पुकारे जाने लगे जिससे अव्यवस्था फैल गई । कलाकारों को पुरस्कार के तौर पर दिए गए ताम्रपत्र पर पुरस्कार राशि अंकित करने से भी कलाकारों में क्षोभ दिखा । पंडित शंभू महाराज के बेटों को दो हजार तीन और चार के लिए अकादमी अवार्ड दिया गया । इन दोनों ने जब ताम्रपत्र पर दस हजार एक रुपए की राशि का अंकन देखा तो नाराज हो गए और कहा कि ताम्रपत्र पर राशि का उल्लेख गैरजरूरी है । भारी संख्या में बंटे इन पुरस्कारों को लेकर चर्चा अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने थोक के भाव से यशभारती पुरस्कार बांट डाले । यश भारती पुरस्कार को लेकर इस बार इस वजह से सवाल खड़े हो रहे कि पहले सरकार ने ऐलान किया था कि चौवन लोगों को इस पुरस्कार से नवाजा जाएगा । उसके बाद इसकी संख्या बढ़कर चौंसठ हो गई और अंतत: तिहत्तर लोगों को प्रदेश के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजा गया । हद तो तब हो गई जब पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान दो लोगों के नाम जोड़े गए । यशभारती पुरस्कार अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव ने शुरू किया था और यह पुरस्कार साहित्य, कला, सिनेमा, चिकित्सा, खेल, पत्रकारिता, हस्तशिल्प, शिक्षण, संस्कृति, संगीत, नाटक और उद्योग के अलावा समाजसेवा और ज्योतिष विद्या के लिए भी दिया जाता है । इस पुरस्कार के तहत पुरस्कृत व्यक्ति को ग्यारह लाख नकद और आजीवन पचास हजार रुपए हर महीने पेंशन के तौर पर दिया जाता है । इस वर्ष के पुरस्कार वितरण समारोह से मुलायम सिंह यादव दूर रहे और उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पूरे समारोह के दौरान मुलायम सिंह का नाम लेते रहे । उन्होंने तो यहां तक कहा कि नेताजी विभूतियों का सम्मान करने में कभी नहीं हिचके और वो उनके घर तक जाकर उनको सम्मानित किया । इस संदर्भमें अखिलेश यादव ने हरिवंश राय बच्चन का उदाहरण दिया जिन्हें यश भारती से सम्मानित करने के लिए मुलायम सिंह यादव मुंबई तक गए थे । बच्चन जी के स्वास्थ्य की वजह से मुंबई में उनके घर पर उनको यश भारती से सम्मानित किया गया था । हलांकि उसके बाद मुख्यमंत्री सम्मानित शख्सियतों के साथ मुलायम सिंह यादव के घर पहुंचे औप सबकी उनसे मुलाकात करवाई । ये तो हुई सियासत की बातें लेकिन सियासत की बात यहीं खत्म नहीं होती है । सियासत या लापरवाही के संकेत तो यशभारती पुरस्कार से सम्मानित किए गए महानुभावों की सूची को देखने पर भी मिलते हैं । पुरस्कार वितरण समारोह के चंद दिनों पहले जो सूची जारी की गई उसमें बांदा के शिल्पकार शाहिद हुसैन का भी नाम था लेकिन जब बांदा के जिलाधिकारी से शाहिद हुसैन को सूचना देने के लिए संपर्क किया गया तो जो बात पता चली उससे पुरस्कारों की सूची तैयार करनेवालों के होश उड़ गए । बांदा के जिलाधिकारी ने राज्य सरकार को सूचित किया कि शाहिद हुसैन नाम का कोई शिल्पकार उनके जिले में नहीं है । बांदा के डीएम ने अपने पत्र में किसी हामिद हुसैन के नाम का उल्लेख कियाऔर बताया कि वो एक शिल्पकार के पास काम करते हैं । इस पत्र के बाद संस्कृति विभाग ने आनन फानन में शाहिद हुसैन का नाम पुरस्कृत होनेवालों की सूची से हटा दिया । लापरवाही का आलम तो वरिष्ठ उर्दू शायर शारिब रुदौलवी के नाम के साथ भी देखने को मिला । विभागों की फाइल में उनका नाम शादाब रुदौलबी लिखा था और विभागीय लोग इस नाम के शख्स को ढूंढने में रात दिन एक किए हुए थे ष बात में पता चला कि उनका सही नाम शारिब रुदौलवी है । फिर जाकर सूची में संशोधन किया गया । दरअसल इस तरह के वाकए सरकारी विभागों में होते रहते हैं । कमलेश्वर के निधन के बाद आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में उनको निमंत्रण देने के लिए विदेश मंत्रालय के अफसरों ने उनके घर पर फोन किया था और बगैर कुछ बताए ये सूचना फोन उठानेवाले को दी और फोन रख दिया । गनीमत ये रही कि किसी तरह विदेश मंत्रालय को समय रहते कमलेश्वर के निधन की जानकारी मिल गई वर्ना तो उनका नाम भी सूची में प्रकाशित कर दिया गया होता ।
अब अगर समग्रता में इस साल दिए गए यश भारती सम्मान से नवाजे गए लोगों की सूची पर नजर डालें तो यह बात साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है कि सम्मानित विभूतियों में भी सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखा गया है । संभव है कि मेधा को भी प्राथमिकता दी गई हो लेकिन जिस तरह से नाम जोड़े और घटाए गए उससे साफ है कि अकलियत से लेकर जातिगत समीकरणों का भी ध्यान रखा गया । पुरस्कारों के बहाने से राजनीतिक तौर पर समुदायों और जातियों को खुश करने की कोशिश भी दिखाई दे रही है । साहित्य, कला, संस्कृति, क्रिकेट, समाजसेवा और पत्रकारिता आदि के लिए यश भारती सम्मान के नामों का चुनाव करते वक्त अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखा गया । वर्ना ये कैसे संभव था कि बांदा के एक ऐसे शिल्पकार का नाम सूची में घोषित कर दिया जाता जिस नाम का उस जिले में तो क्या पूरे सूबे में कोई शिल्पकार ज्ञात नहीं है । क्या सिर्फ नाम देखकर शाहिद हुसैन को पुरस्कार देना तय कर लिया गया । क्या ये जरूरी नहीं था कि संबंधित विभाग नामों का ऐलान करने के पहले उसकी जांच करवा लेता । संस्कृति विभाग क सचिव खुद बेहतरीनन शायर हैं और कला संस्कृति और साहित्य जगत से गहरे जुड़े हुए भी हैं । बावजूद इसके ऐसा हुआ तो इससे तो ये भी लगता है कि संस्कृति सचिव को उपर से नाम भेजकर उसका ऐलान करने को कहा जा रहा था । अपने स्तर से जब उन्होंने जांच करवाई तो कई खामियां नजर आईं लेकिन तबतक तो तीर कमान से निकल चुका था । सवाल यही उठता है कि इन सरकारी पुरस्कारों को लेकर कोई ठोस पारदर्शी नीति क्यों नहीं बनाई जाती है । कोई मानक क्यों नहीं तय किया जाता है । जनता को ये क्यों नहीं बताया जाता है कि अमुक नाम के चयन के पीछे की वजह ये रही है । क्या जनता के पैसे से दिए जानेवाले इन भारी भरकम पुरस्कारों के बारे में जनता को जानने का हक नहीं है । उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री की छवि अबतक साफ सुथरी है लेकिन इस तरह के वाकयों से ये तो साफ होता है कि वो भी राजनीति की काली कोठरी में आकर उससे बचकर निकल नहीं पा रहे हैं । दरअसल हमारे देश में पुरस्कारों को लेकर कोई ठोस नीति नहीं है । जैसे यूपी में तो यश भारती पुरस्कारों की संख्या भी निश्चित नहीं है । जो सत्ता में है वो अपने जितने चाहे उतने चहेतों को पुरस्कृत कर सकता है । ये पुरस्कार भी सरकारी स्कीमों की तरह राजनीति की शिकार होती रही हैं । सत्ता बदलने पर पुरस्कार या तो बंद कर दिए जाते हैं या दिए ही नहीं जाते हैं । क्या सरकारें कोई ठोस नीति बनाकर इसको स्थायी नहीं कर सकती हैं जिसमें पारदर्शिता हो और पुरस्कारों की प्रतिष्ठा भी स्थापित हो सके । संगीत नाटक अकादमी और यश भारती पुरस्कार इतनी भारी संख्या में बांटे गए कि लगता है कि कोई बच ही नहीं पाएगा । रही सही कसर हिंदी संस्थान के पुरस्कार पूरी कर देते हैं । नब्बे के आखिरी दशक में दिल्ली में एक मजाक चलता था कि अगर करोलबाग में पत्थर फेंका जाए तो हर दूसरा जख्मी शख्स एमबीए डिग्रीधारक होगा । यही हाल उत्तर प्रदेश में पुरस्कारों को लेकर है ।   


Saturday, March 23, 2013

पुरस्कार का कारोबार


इन दिनों उत्तर प्रदेश में साहित्यिक पुरस्कारों की बाढ़ आई हुई है । मायावती के शासनकाल के दौरान रुके या रोके गए साहित्यक पुरस्कारों को अर्पित किया जा रहा है । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन पुरस्कार अर्पण समारोह में शिरकत कर रहे हैं और गाजे बाजे के साथ पुरस्कृत साहित्यकारों का सम्मान किया जा रहा है । पुरस्कार समारोह में युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की उपस्थिति से उम्मीद भी जगती है कि अब उत्तर प्रदेश की समृद्ध साहित्यक विरासत को इस शासनकाल में फिर से अहमियत मिलेगी । मुख्यमंत्री ने पिछले शासनकाल में पुरस्कारों के बंद होने को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए अगले साल से सम्मान राशि बढ़ाने का भी ऐलान किया । अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि साहित्य शाश्वत होता है और वो समाज को रास्ता भी दिखाता है । यह सब तो ठीक था, उम्मीद भी जगा गया । लेकिन इन पुरस्कारों से कई सवाल भी खड़े हो गए हैं । इस बार का यश भारती पुरस्कार हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव को दिया गया है और सम्मान स्वरूप उन्हें ग्यारह लाख रुपए भी मिलेंगे । आमतौर पर यादव जी पुरस्कार नहीं लेते लेकिन लखटकिया पुरस्कारों से उन्हें परहेज भी  नहीं है । उनका तर्क होता है कि पुरस्कार राशि को वो हंस में लगा देते हैं और हंस पत्रिका को चलाने के लिए वो कहीं से भी राशि ले सकते हैं । तमाम विरोध के बावजूद बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का गुणगान करनेवाले विज्ञापन तो वो छापते ही रहते हैं । लेकिन यह एक अवांतर प्रसंग हैं । लेकिन यादव जी के अलावा जिन दो लेखकों को यह पुरस्कार दिया गया है, साहित्य जगत अबतक उनसे अपरिचित है । यह उसी तरह से है जब साहित्य अकादमी के जनरल काउंसिल में प्रोफेसरों के कॉकस एक दूसरे को चुनते हैं जिनका साहित्य में कोई योगदान नहीं है ।
बात हिंदी में पुरस्कारों की हो रही थी । हिंदी में पुरस्कारों की महत्ता और प्रतिष्ठा लगातार कम होती जा रही है । हिंदी में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार साहित्य अकादमी सम्मान को माना जाता था लेकिन पिछले एक दशक से जिस तरह से साहित्य अकादमी पुरस्कारों की बंदरबांट हुई है उससे अकादमी पुरस्कारों की साख पर बट्टा लगा है । दो हजार एक से लेकर दो हजार दस तक की साहित्य अकादमी पुरस्कारों के लिए बनाई गई पुस्तकों की आधार सूची पर नजर डालने से यह बात और साफ हो जाती है । दो हजार तीन में जब कमलेश्वर को उनके उपन्यास - कितने पाकिस्तान - पर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था तो उस वक्त की आधार सूची में इकतीस लेखकों के नाम थे जिसे मृदुला गर्ग ने तैयार किया था । इस सूची में तेजिन्दर, गौरीनाथ, हरि भटनागर, संजना कौल और जयनंदन आदि के नाम शामिल थे । तब अकादमी पर यह आरोप लगा था कि कमलेश्वर का नाम पहले से तय था । कई अखबारों ने तो उस वक्त पुरस्कारों के ऐलान के पहले ही उनके नाम का खुलासा कर दिया था । दो हजार चार में तो और भी आरोप लगे थे । पुरस्कार मिला था वरिष्ठ और चर्चित कवि वीरेन डंगवाल को उनके कविता संग्रह दुश्चक्र में स्रष्टा पर। उस वक्त के संयोजक थे उपन्यासकार गिरिराज किशोर और आधार सूची तैयार की थी कहानीकार प्रियंवद ने । हद तो तब हो गई थी जब निर्णायक मंडल के तीन सदस्यों में से दो कमलेश्वर और श्रीलाल शुक्ल बैठक में उपस्थित ही नहीं हो सके थे । अपनी टिप्पणी में निर्णायक मंडल के तीसरे सदस्य से रा यात्री ने लिखा- दुश्चक्र में स्रष्टा- काव्य कृति को हम सभी निर्णायक मंडल के सदस्य एक समान प्रथम वरीयता देते हैं और साहित्य अकादमी के दो हजार चार के पुरस्कार के लिए सहर्ष प्रस्तुत करते हैं । लेकिन संस्तुति पत्र पर सिर्फ उनके ही दस्तखत हैं । उसी जगह हिंदी भाषा के तत्कालीन संयोजक गिरिराज किशोर ने लिखा- श्री श्रीलाल शुक्ल एवं कमलेश्वर जी उपस्थित नहीं हो सके । उन्होंने अपनी लिखित संस्तुति बंद लिफाफे में भेजी है । श्रीलाल जी ने ज्यूरी के उपस्थित सदस्य से रा यात्री से फोन पर लंबी बातकर दुश्चक्र में स्रष्टा को 2004 के पुरस्कार के लिए समर्थन दिया । हलांकि साहित्य अकादमी के दस्तावेजों में श्रीलाल जी की संस्तुति मौजूद नहीं है । कमलेश्वर का बीस दिसंबर खत है जो इक्कीस दिसंबर की बैठक के पहले प्राप्त हो गया था । इस तरह की जल्दबाजी ने सवाल भी खड़े किए । वीरेन डंगवाल की प्रतिष्ठा पर किसी को कोई शक नहीं है । वो साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व भी करते थे लेकिन जिस तरह की अफरातफरी में उन्हें पुरस्कार देने का ऐलान किया गया उससे उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई । कालांतर में अकादमी पुरस्कारों के चयन को लेकर कई गंभीर आरोप लगे । नतीजा यह हुआ कि अकादमी पुरस्कार को हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं रहा जो नब्बे के दशक में हुआ करता था । अब अकादमी में पहली बार हिंदी भाषा के प्रतिनिधि प्रोफेसर विश्वनाथ तिवारी अध्यक्ष बने हैं । उनपर यह महती जिम्मेदारी है कि अकादमी पुरस्कारों की विश्वसनीयता और साख बहाल करें ।
इसके अलावा भी हिंदी में कई पुरस्कार दिए जाते हैं । कुछ पुरस्कार तो ऐसे हैं जो बकायदा लेखकों से एक निश्चित राशि के बैंक ड्राफ्ट के साथ आवेदन मांगते हैं । हिंदी के पुरस्कार पिपासु लेखक बड़ी संख्या में इस तरह के पुरस्कारों के लिए आवेदन भेजते हैं । कहना नहीं होगा कि हिंदी के बहुतायत लेखकों में बगैर काम किए या यों कहे कि हल्का काम करके भी प्रसिद्धि की ललक ऐसे पुरस्कारों को प्राणवायु प्रदान करती है । उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में कई ऐसे पुरस्कार हैं जिनकी धनराशि तो पांच से दस हजार रुपए तक होती है लेकिन उन पुरस्कारों की आड़ में साहित्य का खेल खेला जाता है । जिस पत्रिका की कोई पहचान नहीं बन पाती है या उसके दो एक अंक निकले होते हैं वह भी अपने नाम पर शॉल श्रीफल देकर साहित्याकारों और लेखकों को उपकृत करते हैं और उसके एवज में जाने क्या क्या होता है । लेकिन जो भी होता है वह हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठा को धूमिल करता है । सवाल यह उठता है कि हिंदी के लेखकों में पुरस्कार को लेकर इतनी भूख क्यों है । क्योंकर वो हजार दो हजार के पुरस्कार के लिए सारे दंद फंद और पुरस्कार देनेवालों की चापलूसी पर उतारू है । अगर हम विस्तार से इसकी पड़ताल करते हैं तो जो तस्वीर सामने आती है वह बेहद निराशाजनक है । हिंदी के लेखकों जिस एक प्रवृत्ति का लागातार क्षय हो रहा है वह है मेहनत से दूर भागने का । बगैर व्यापक शोध के और कल्पना के आधार पर यथार्थ लिखने की प्रवृत्ति ने साहित्य का बड़ा नुकसान किया है । विचारधारा वाली साहित्य ने तो नुकसान किया ही । इसके अलावा जो एक और प्रवृत्ति नई पीढ़ी के साहित्यकारों लेखकों में दिख रहा है वह है जल्दबाजी, धैर्य की कमी, कम वक्त में सारा आकाश छेक लेने की तमन्ना और वह भी किसी कीमत पर । इसी मानसिकता का फायदा उठाकर कुछ साहित्य के कारोबारी पुरस्कारों का कारोबार करते हैं और उसमें फंसा कर लेखकों को उलझा देते हैं । नवोदित लेखक तो कोंपल की तरह होता है जिसे बहुत सावधानी से विकसित किया जाता है लेकिन हिंदी के नए लेखक तो शुरू से ही आसमान पर चढ़ने की तमन्ना पाले बैठे रहते हैं । महात्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है।  हर किसी को महात्वाकांक्षी होना चाहिए लेकिन उसमें अति के जुड़ने से जो बेचैनी आ जाती है वह एक खतरनाक संकेत है और पुरस्कार देनेवाले इस प्रवृत्ति को बढ़ाकर खतरा और बढ़ा देते हैं । हिंदी के कर्ता धर्ताओं की यह जिम्मेदारी है कि वो इस वक्त आगे आएं और टुटपुंजिए पुरस्कारों को चिन्हित कर उसके बहिष्कार का विरोध करें ताकि हिंदी से पुरस्कारों के कारोबार पर रोक लगाई जा सके ।